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20160130

एंटरटेनमेंट का कंफ्यूजन



एक ही वक्त पर तीन चैनल एक साथ अकबर के चरित्र का अलग-अलग चित्रण कर रहे होते हैं. दर्शक उन्हें लेकर असमंझस में होते हैं. तो कहीं किसी शो में अचानक राम की बहन शांता का जिक्र होता है. तो दर्शक इस सोच में पड़ जाते हैं कि क्या पहले जो उन्हों ने रामायण देखी तो उसमें आधी-अधूरी जानकारी थी. चाणक्य अशोक के गुरु बताये जाते हैं, तो कभी कर्ण और राधा के प्रेम पर सवालिया निशान लगाये जाते हैं.  लेकिन  फिर भी वे इन बातों की फिक्र नहीं करते, चूंकि उनके लिए भी अब कोई पौराणिक कथाओं, या धार्मिक कथाओं या ऐतिहासिक शोज सिर्फ एंटरटेनमेंट का जरिया हैं. लेकिन चिंतनीय विषय उस वक्त होता है, जब बच्चे धारावाहिकों में दिखाये जा रहे पात्रों को ही और कहानियों को ही इतिहास और हकीकत मान बैठते हैं. ऐसे में क्या धारावाहिकों के मेकर्स, लेखक की यह नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अध्ययन के साथ इतिहास की कहानी परोसें, और उसे केवल भव्य सेट, आभूषणों व परिधानों पर ध्यान केंद्रित करने वाले शोज न बना कर. थोड़ी ठोस जानकारी वाले शोज के रूप में भी दर्शाये या फिर सिर्फ डिस्क्लेमर मात्र भर दे देने भर से उनकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है. जितने शोज, उतने नजरिये भी हैं. इस पूरे मुद्दे पर अनुप्रिया अनंत और उर्मिला कोरी की पड़ताल 



मल्कानी कमिटी और डिस्क्लेमर 
 डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी
 डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी इतिहास, पौराणिक व शास्त्रों की गहरी और गंभीर समझ रखते हैं. उनके धारावाहिक चाणक्य को आज भी टेलीविजन जगत के श्रेष्ठ धारावाहिकों में से एक माना जाता रहा है. चूंकि उन्होंने इस शो का निर्माण इतिहास के प्रमाण और साक्ष्य के साथ किया था. उनका मानना है कि जहां प्रमाण और साक्ष्य है. भले ही वह विशुद्ध इतिहास न हो. लेकिन वह आधार है.वहां इतिहास है. टीवी के इतिहास में चाणाक्य को रियलिस्टिक शो माना गया है. विशेषज्ञ भी उसे चाणाक्य विषय पर महत्वपूर्ण दस्तावेज मानते हैं.   उन्होंने हाल ही में उपनिषद गंगा की सीरिज का भी निर्माण किया था. वे अपने धारावाहिक और उस दौर की बातें याद करते हुए बताते हैं कि जब मैं 80 या 90 के दशक की बात करता हूं तो उस वक्त कबीर का विरोध हुआ. हालांकि  उनका विरोध दूसरे कारणों से हुआ. तमस का विरोध हुआ. चाणाक्य का विरोध हुआ. टीपू सुल्तान का विरोध हुआ. लेकिन उस वक्त जो विरोध हुआ. उस समय जो भी दशक था. समूह था. विचारों को लेकर सक्रिय था.  जो भी विरोध करने वाले थे. वे विचारों को लेकर सक्रिय थे. जिनको लगता  था कि इतिहास के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए और इसकी शुरुआत टीपू सुल्तान के साथ शुरू हुई. उस वक्त जब काफी विवाद हुए तो एक कमिटी बनाई गयी थी. मल्कानी कमिटी बनी थी. वही यह निर्णय हुआ कि अब  से धारावाहिकों में यह डिस्क्लेमर डाला जायेगा और उस वक्त से इसका चलन शुरू हुआ. मुझे याद नहीं कि टीपू सुल्तान से पहले बने शोज में मैंने डिस्क्लेमर देखा होगा या फिर मैंने ही किसी डिस्क्लेमर के साथ चाणक्य बनाया था. मल्कानी कमिटी बनी थी. जो भी कंटेंट दिखाया जाता था इसमें टीपू सुल्तान या मल्कानी साहब का दोष नहीं था. सच्चाई  यह है कि अब दर्शक बदल चुके हैं. चाणाक्य में हर हर महादेव के नारे को लेकर लोगों ने हंगामा किया था.बहस की थी.अखबारों ने भी उस बहस को आगे बढ़ाया था.तमस को लेकर काफी विवाद हुआ था. तो इन मुद्दों को लेकर गंभीर चर्चा होती थी पूरे देश में कि किस तरह के कंटेंट िदखाये जा रहे हैं और उसमें इतिहास कितना है.अब वह सक्रियता नजर नहीं आती. न ही वह अखबारों में है. अब यह विमर्श का विषय ही नहीं रहा है. राष्टÑीय स्तर पर  कई स्थानों पर विमर्श होती थी. होना यह चाहिए था कि दर्शक जो यह शो देख रहा है. वह प्रश्न करे सोचे कि क्या जो दिखाया जा रहा है वह सच है. इस पर विमर्श करे.लेकिन अब मिलावट है. मिलावट इतनी है कि इतिहास अब बहुत कम रह गया है.और फिक् शन और कल्पना हो चुका है. बहुत सारे इतिहासकार इस बात पर सोचते हैं और यह चर्चा का विषय रहा है कि आखिरकार कल्पना में कितना इतिहास है.मेरा मानना यह है कि जहां इतिहास मौन है. वहां आप कल्पना का सहारा ले सकते हैं. लेकिन जहां साक्ष्य हैं. प्रमाण है.वहां आप कल्पना का विस्तार नहीं कर सकते. इतिहास के साथ. यहां आप इतिहास का उल्लंघन करते हैं. वह उल्लंघन नहीं करना चाहिए. यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी है. लेखकों की नैतिक जिम्मेदारी ज्यादा है. निर्देशकों को तो जो दिया जाता है. वही वे बनाते हैं. लेकिन लेखक को इस पर अध्ययन करना चाहिए. अब यह किसी के  लिए बड़ा प्रश्न नहीं रह गया है कि क्या सच है और क्या झूठ है.सबके लिए एंटरटेनमेंट अहम है. इस समय सप्ताह के छह दिन अगर किसी ऐतिहासिक पात्र से उनका मनोरंजन होता है. तो वह इस बात को लेकर गंभीर नहीं हैं कि सही क्या गलत क्या है. कुल मिला कर  यह सच है कि इतिहास के नाम पर जो धारावाहिक बन रहे हैं. जो कुछ इतिहास के नाम पर  दिखाया जा रहा है. उसमें इतिहास है ही नहीं. सवाल यह है कि इसको रोका जाना चाहिए. क्या उस उपाय है. तो इसका जवाब यह है कि इसका हल अदालत में है. संविधान में है. चूंकि संविधान में डिस्टॉरशन आॅफ हिस्ट्री पर भी आप अदालत में गुहार लगा सकते हैं. पर पिछले कुछ वर्षों से ऐसी कोई बात सुनने को नहीं मिली है कि किसी ने अदालत में जाकर गुहार लगाई हो.  छोटे छोटे मसलों को लेकर हम अदालत के पास चले जाते हैं. लेकिन जहां गंभीर मसलों की बात है. हम चुप रहते हैं. फिल्म को लेकर अधिक तमाशे हो जाते हैं. लेकिन गंभीर अध्ययन के मसले होते हैं. वहां सभी शांत हो जाते हैं. और गौर करें तो मेरी जितने भी इतिहासकारों से बातचीत होती है. वे इस मसले को लेकर उदासीन हैं. उनको  लगने लगा है कि सिर्फ यूनिवर्सिटी में पढ़ाना उनकी जिम्मेदारी है.टेलीविजन पर जो आ रहा है. उस पर कुछ कहना जिम्मेदारी नहीं है. यह भी हकीकत है कि हर धारावाहिक के बाद ब्राडकास्ट काउंसिल नोट देता है कि अगर आपको किसी धारावाहिक के कंटेंट से शिकायत है तो उनके पास दर्ज करें. लेकिन मेरी समझ से कभी भी उनके पास ऐसी कोई शिकायत गयी ही नहीं होगी, क्योंकि यह अध्ययन का मामला है. श्याम बेनगल साहब ने डिस्कवरी आॅफ इंडिया जैसा शो बनाया था. वह पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक थी. और मेरा मानना है कि वह एक श्रेष्ठ धारावाहिक था. वह कबीर, तूलसीदास के साथ आसाढ़ का महीना की भी बात होती है.वहां कल्पना और काव्य का वह विस्तार करते हैं. वह उस शो में उस दौर के समकालीन लेखकों की श्रेष्ठ कृतियों का इस्तेमाल करते हैं. बिना इतिहास को चोट पहुंचाये.सच्चाई यह है कि हमारे पास पात्रों के बारे में अधिक जानकारी ही नहीं है. स्कूल में पढ़ानेवाले जानते हैं कि जो दिखाया जा रहा है. वह हकीकत नहीं है. उसे इतिहास नहीं कहा जा सकता. जैसे मैंने चाणक्य और अर्थशास्त्र की नीति को लेकर कई प्रमाण और साक्ष्य रखे थे. फिर चरित्र को गढ़ने की कोशिश की थी. और इसके लिए मेरे पास प्राप्त पुस्तकें थीं. तो उस वक्त अगर कोई विवाद होता था. तो मैं कहता था कि आप मुझे अदालत में बुलायें. हम वही बात करेंगे. इतिहासकार आज के परिदृश्य से दुखी हैं. अभी जरूरत शिक्षक और अभिभावकों को जरूरत है कि वह अपने बच्चों को समझायें कि इतिहास क्या है और क्यों जो दिखाया जा रहा है वह सही नहीं है. मैं अपनी बेटी को समझाता हूं कि इतिहास को जानना है तो बहुत अच्छी अच्छी किताबें लिखी गयी हैं. उसे पढ़ो.चैनल देख कर आप इतिहास नहीं समझ सकते. यही बात उन लोगों को भी कहता हूं जो यह कहते हैं कि बच्चों पर इन धारावाहिकों का क्या प्रभाव पड़ता है. गलत प्रभाव पड़ रहा. अगर आप यह जानते हैं तो बोलें और नहीं तो आप बच्चों को ही समझायें कि अध्ययन करें तब इतिहास समझेंगे. किताबें काफी अच्छी अच्छी लिखी गयी हैं. उन्हें पढ़ना जरूरी है. अध्ययन करेंगे तो इतिहास जान पायेेंगे. लेकिन दर्शकों में वह ललक नहीं है. उस वक्त के इतिहासकार मानते हैं कि 80-90 के दशक में कोई ऐतिहासिक शो बनता था तो उनका कम से कम अप्रोच होता था.अब तो अप्रोच ही नहीं है. तो बात नैतिक जिम्मेदारी की भी है.जाहिर है कि किसी निर्माता की यह जिम्मेदारी नहीं. आप इस बात क ोलेकर उन पर दोष नहीं मढ़ सकते पूरी तरह. दर्शक को खुद को अध्ययन करना होगा.और चुप्पी तोड़नी होगी. तभी कुछ संभव है. हम जब शोज बनाते थे. तो इन बातों का ख्याल जरूर रखते थे कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ न हो और दर्शकों को सही मेसेज ही जाये. प्रमाण और साक्ष्य के आधार पर.
असली को नकली नकली को असली मान बैठे हैं : 
डॉ बोद्धी सत्व, कविताएं लिखता हूं, स्क्रिप्ट राइटर, रिसर्चर, स्टोरी राइटर( जोधा अकबर, हनुमान)
 मेरा मानना  है कि टेलीविजन में कोई डायरेक्ट सेंसर नहीं होता, जो हर दिन किसी एपिसोड की जांच होकर कि क्या दिखाया जा रहा, क्या नहीं. यह दर्शकों तक पहुंचे. लोग पहले ही डिस्क्लेमर के रूप में मापी मांग लेते हैं. लेकिन मेरी समझ से यह लेखक और निर्माता के विवेक पर निर्भर करता है कि वह कितनी हकीकत दिखाते हैं, कितना नहीं. यह उनकी ही जिम्मेदारी है. हमारे यहां सोच है कि चलो दिखा देते हैं...क्या होता है. इसलिए बस भेड़चाल में लोग बढ़ते चले जा रहे हैं. आपने अभी प्रश्न किया कि हनुमान और रावण की कभी बचपन में लड़ाई ही नहीं हुई है. गलत दिखाया जा रहा है. हकीकत यह है कि इसका वर्णन पूर्णरूप से भविष्य पुराण में है. लेकिन लोगों ने पढ़ा ही नहीं है तो आपको पता कैसे चलेगा कि सच क्या है. लोग असली को नकली, नकली को असली मान रहे हैं. इसलिए पढ़ना जरूरी है. तभी आप तय कर पायेंगे. रही बात धारावाहिकों की तो मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता कि इतिहास की मर्यादा के साथ खिलवाड़ न हो. मैंने कई बार कई दृश्य रोक वाये हैं. अपने राइटर से कहा है कि उसे सुधारें. किसी के पास वक्त ही नहीं है कि वह इतनी गंभीरता से अध्ययन करें. जबकि यह बेहद अहम पहलू है. यह हमारा दुर्भाग्य है. लेकिन मेरी कोशिश होती है कि मैं सही तरीके से ही लोगों तक अपनी बात पहुंचाऊं.  जो पढ़ेंगे वही जानेंगे कि कैकयी की भी बेटी थी. ऐसे कई बातें हैं, जो आने चाहिए सामने. लेकिन इन चीजों की मेकिंग में अध्ययन में वक्त लगता है. और डेली सोप के पास इतना वक्त नहीं होता. 

रिसर्च -एंटरटेनमेंट का मिश्रण 
एक चैनल के पूर्व प्रोग्रामिंग हेड रह चुके नमित का मानना है कि  एक ऐतिहासिक और पौराणिक शो बनाने में बहुत सारे रिसर्च की जरूरत पड़ती है. 60प्रतिशत तक जहां रिसर्च होता है 40 प्रतिशत एंटरटेंमेंट वैल्यू को ध्यान में रखा जाता है, जिसमें रिसर्च के साथ-साथ इंटरटेंमेंट का भी ध्यान रखा जाता है. चूंकि हम सीरियल बनाते हैं, कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं. इसलिए हमें एंटरटेनमेंट के लिए थोड़ी बहुत सिनेमाटिक लिबर्टी लेनी ही पड़ती है. लेकिन कोई भी धारावाहिक कभी कोई दावा नहीं करता है कि वह ऐताहासिक प्रमाण है. धारावाहिक  देवों के देव महादेव व सिया के राम के निर्माता अनिरुद्ध पाठक मानते हैं कि लेखक जो होते हैं, वह अपने लेखनी में उस दौर  की संरचना और अपनी सोच भी डालते हैं. जैसे तुलसीदास के रामचरित्रमानस में पुरुष की सोच दिखती है. रामचरित्रमानस में शूद्र, पशु और नारी ये हैं तारण के अधिकारी...इससे समझ आता है कि आपके लेखक का भी क्या दृष्टिकोण होता है. वह एक पुरुष के नजरिये से हैं. जैसे सीता के अग्निपरीक्षा वाले प्रकरण में रामचरित कुछ और कहता. बाकी रामायण में अलग बातें हैं तो यह कह पाना मुश्किल है कि कौन सी बातें सही थीं कौन सी गलत. 
ऐतिहासिक चरित्रों के चित्रण से खिलवाड़
 समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता मानते हैं कि इन दिनों पौराणिक और ऐतिहासिक शो की धूम मची हुई है. हमें कहीं न कहीं ये शो हमारे वास्तविक जड़ों और समृद्ध इतिहास की ओर ले जा रहे हैं. मौजूदा दौर में हम सभी बहुत परेशान हैं किसी न किसी वजह से हमारा फ्रस्ट्रेशन लेवल बढ़ाता ही जा रहा है. ये शोज हमें जीवन की चुनौतियों से लड़ने और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ते हैं. ऐसे में आप एंटरनटेंमेंट के नाम पर यह नहीं कर सकते हैं कि आप किसी तथ्य या शख्स को गलत साबित कर दे. तथ्यों के साथ खिलवाड़ कर आप भारत के समृद्ध इतिहास को गलत बना रहे हैं. महाराणा प्रताप शो की बात करें तो उसमे जिस तरह से महाराणा प्रताप के किरदार को ज्यादा अच्छा बताने के लिए अकबर के किरदार को प्रस्तुत किया गया था. उससे शायद ही कोई पांच या दस साल का बच्चा अकबर को अच्छा समझेगा. फिर वह जब स्कूल की किताब में पढ़ेगा कि अकबर अच्छा था तो वह किस पर यकीन करेगा.  
बजट, प्रोमोशन है प्राथमिकता
 जी हां, यह भी हकीकत है कि जब जब इस तरह  के शोज की लांचिंग होती है. इसे बड़े स्तर पर लांच किया जाता है. शो के सेट पर अत्यधिक खर्च किया जाता है. ताकि सबकुछ भव्य नजर आये. स्टारकास्ट के कॉस्टयूम पर भी पानी की तरह पैसे बहाये जाते हैं. लेकिन कहानी और उसकी मौलिकता पर किसी का खास ध्यान नहीं जाता. स्टार प्लस पर कुछ महीने पहले प्रसारित हुआ महाभारत सीरियल की बात करें तो यह शो १०० करोड़ की लागत से बना था. यह टेलीविजन के  बजट के स्तर से एक मेगा बजट प्रोजेक्च था. भारी भरकम और चमकीले गहने, कपड़ों, हथियार से लेकर मुकुट सभी पर विश्ोष ध्यान दिया गया था.इस सीरियल के प्रमोशन के लिए इन्हीं ज्वेलरी, कपड़ों  और हथियारों का जगह-जगह पर प्रर्दशन कर इस मायथोलोजिकल शो का प्रमोशन किया गया था. सीरियल के वीएफएक्स पर भी बहुत ध्यान दिया गया था.बस कहानी पर नहीं. इस पौराणिक महागाथा के सूत्रधार भगवान कृष्ण थे,  जिस तरह से बी आर चोपड़ा के महाभारत के सूत्रधार समय का वह चक्र था. कृष्ण के महाभारत की कहानी के सूत्रधार बनाए जाने से कई लोग नाराज भी हुए थे. उनका कहना था कि कृष्ण का जन्म ही नहीं हुआ था ऐसे में वह पांडु और धृतराष्ट्र की कहानी को कैसे सुना सकते हैं.  गौर करें तो मौजूदा शो सूर्यपुत्र कर्ण की बात करें तो उसमे में तथ्यों के साथ बहुत खिलवाड़ देखने को मिल रहा है. व्यास के महाभारत में कर्ण का नदी के किनारे राधे और आदिरथ को मिलने की बात ही अब तक थी. लेकिन इस शो में दिखाया गया है कि कुंती की दासी सबकुछ प्लान कर आदिरथ को कर्ण को सौंप देती है. आदिरथ को सबकुछ पता है लेकिन उनकी पत्नी राधे को नहीं.इस तरह के कई तथ्यों के साथ इस सीरियल में समय समय पर छेड़छाड़ देखने को मिलता है. कुछ ऐसा ही रजिया सुल्तान, जोधा अकबर जैसे धारावाहिकों के साथ भी होता रहा है. फैशन डिजाइनर्स बताते हैं कि कई ऐतिहासिक शोज ने फैशन ट्रेंड भी सेट करते हैं. जैसे जोधा अकबर के गहने कई दुल्हनों की पसंद बने थे. तो गौर करें कि ये विषय मनोरंजन के रूप में इस कदर दर्शकों पर हावी हो जाते हैं कि वे इन्हें इतिहास नहीं एंटरटेनमेंट के रूप में ही देखने लगते हैं और उनके अंदाज को वे अपना स्टाइल स्टेटमेंट भी मानने लगते हैं. तो इस बात से भी उस शो की लोकप्रियता बढ़ती जाती है. एक तरह से वह शो सिर्फ फैशनेबल शो बन कर ही रह जाता है. और दर्शक भी उससे ही प्रभावित होते हैं. उन्हें भी कहानी से कोई खास फर्क नहीं पड़ता. और न ही किसी की यह चिंता है कि क्या हकीकत है. िकतना वास्ता है हकीकत से. यह भी वजह है कि टीवी पर इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखायी जा रही है. लेखक, निर्देशक और निर्माता इसे लेकर कैचुअल अप्रोच ही रखते हैं.


अधूरी हैं जानकारियां 
देवदत्त पटनायक, इतिहासकार व सिया के राम के कंसलटेंट लेखक
स्टार प्लस के धारावाहिक सिया के राम में जब राम की बहन शांता के वाक्ये को दर्शाया जाता है. तो दर्शक भी आश्तर्यचकित रहते हैं और वे भी चौंकते हैं कि इससे पहले कभी भी शांता की कहानी दर्शकों के सामने नहीं आती है. गौर करें तो बहुत हद तक सिया के राम में कई नयी घटनाओं से परिचित कराया जा रहा है. एक महिला के दृष्टिकोण को भी शो में दर्शाने की कोशिश है. इस शो की खासियत है कि इसे तर्कपूर्ण बनाने की कोशिश की गयी है. साथ ही इसे धार्मिक न बना कर वैचारिक दृष्टिकोण देने की कोशिश की गयी है. कई स्थानों पर सीता के कई सवाल कई सवाल खड़े करते हैं. शांता प्रकरण एक नयी दुनिया में ले जाते हैं रामायण के. सो, इस लिहाज से सिया के राम में कई बातें नवीन हैं. लेकिन वाकई क्या यह घटनाएं हुई थीं. इसके साक्ष्य हैं. इस बारे में देवदत्त पटनायक अपना नजरिया प्रस्तुत करते  हैं.  देवदत्त पटनायक इन दिनों सिया के राम के कंसलटिंग राइटर हैं. वे मानते हैं कि कोई दावा नहीं कर सकता कि कौन सा रामायण सही है कौन सा नहीं. वे मानते हैं कि अब तक राम की दृष्टिकोण वाले रामायण ही दर्शक देखते आये हैं. लेकिन सिया के राम में कोशिश है कि सीता की जिंदगी के अहम पहलू को दिखाया जाये. मेरा मानना है कि रामायण के कई वर्जन हमने बचपन से सुने और देखे हैं. सिर्फ रामायण ही नहीं, महाभारत और कई गंथ्रों के बारे में हम बचपन से सुनते आते हैं और देखते आते हैं. लेकिन हम कभी यह दावा नहीं कर सकते कि कौन सी कहानी सच है. कौन सी नहीं. मैं मानता  हूं कि वे सारी अधूरी जानकारियां है.रामायण के बहुत सारे अनछुए पहलू हैं. जिनसे आज भी हम सभी अनजान हैं. आज तक हमने रामायण को राम के नजरिये से देखा है और उसे ही सच मान लिया है. जबकि रामायण के भी अपने वर्जन है. जैन धर्म में तो लोग मानते हैं कि राम ने हथियार उठाया ही नहीं था. लक्ष्मण ने उठाया था. तुलसीदास के रामचरितमानस  और वाल्मिकि के रामायण में भी काफी अंतर हैं. जैन धर्म में रामायण में अहिंसा पर जोड़ है. रावण की हत्या लक्ष्मण करते हैं. वाल्मीकि की रामायण में लक्ष्मणरेखा का शायद जिक्र ही नहीं है. लेकिन बाकी जगहों पर है. तो हम इस पर दावा नहीं कर पाते कि कौन सा रामायण बिल्ुल सटीक है. कौन सा नहीं. सिया के राम में गौर करें तो हर दृश्य के साथ व्याख्या है कि यह कौन सी रामायण पर आधारित या मेल खाती है. इसमें सिया की दृष्टि से अग्निपरीक्षा राम का फैसला जैसे चली आ रही बातों का भी अलग नजरिया दिखाया गया है. शेष दावा तो कोई नहीं कर सकता. इन विषयों पर कई तरह के कंफ्यूजन हैं. और वह बने ही रहेंगे. लेकिन हर लेखक का नजरिया होता है और वह उस नजरिये के साथ जिस आधार पर बात कह रहा. उसका वह जिक्र कर देता है. 


पौराणिक और ऐतिहासिक सीरियल से जुड़े विवाद 
 द सोर्ड आॅफ टीपू सुल्तान : 90 के ही दशक के ऐतिहासिक शो द सोर्ड टीपू सुल्तान पर ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करने की बात आयी थी. बात सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह आॅर्डर दिया कि यह शो बंद नहीं होना चाहिए लेकिन सीरियल के शुरुआत में डिस्क्लेमर होना चाहिए। यह एक फिक्शन शो है. जो टीपू सुल्तान की जिंदगी और नियमों से जुड़े होने का दावा नहीं करता है बल्कि  भगवान गिड़वानी के उपन्यास का काल्पनिक रुपांतरण है. इस सीरियल के साथ ही भारतीय टेलिविजन पर  डिस्क्लेमर दिखाया जाने लगा. 

चंद्रकांता :90 के दशक की प्रसिद्ध सीरियल चंद्रकांता  देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता पर आधारित था लेकिन नीरजा गुलेरी का यह टेलिविजन रुपांतरण पौत्र कमलपंति खत्री को पसंद नहीं था. उन्होंने साफ कह दिया था कि नीरजा गुलेरी ने खत्री की चंद्रकांता की आत्मा के साथ न्याय नहीं किया था. उन्होंने उपन्यास के कई कांसेप्ट को गलत ढंग से पेश किया. अय्यारी और तिलिस्म को उन्होंने जादू टोने के रुप में दिखाया. 

वीर शिवाजी: कर्लस पर २०११ में प्रसारित हुए वीर शिवाजी शो में छत्रपति शिवाजी को महाराज को हिंदू शासक के रुप में दिखाया गया था. इस बात से कई धर्म निरपेक्ष लोगों को परेशानी थी. छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा  अफजल खान के हत्या सीन को लेकर काफी हंगामा मचा था. कई लोगों ने इसे भड़काऊ करार दिया था. गौरतलब है कि महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज सभी के आदर्श हैं. कई राजनीति पार्टियां उनके नाम पर राजनीति करती रही हैं. सूत्रों की मानें तो शो की स्क्रिप्टिंग हो या प्रस्तुतिकरण उनको खुश रखने की पूरी कोशिश की गयी ताकि शो को लेकर विवाद न हो. 

जोधा अकबर -टेलीविजन क्वीन एकता कपूर के ऐतिहासिक शो जोधा अकबर को लेकर काफी हंगामा मचा था.  राजपूतों ने तो इस बात से ही इंकार कर दिया था कि जोधा अकबर की पत्नी थी. उनका साफ कहना था कि किसी किताब या ऐतिहासिक दस्तावेज में इस बात का जिक्र नहीं है. ऐसे में सीरियल में राजपूत समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. बात इस कदर बड़ गयी थी कि जीटीवी चैनल को कई जगहों पर बंद करवाने की इस समुदाय के लोगों ने तैयारी कर ली थी. एकता कपूर को कोर्ट का नोटिस भी मिला था. जिसके बाद यह शो कई दिनों तक टेलिविजन पर बंद भी था हालांकि बाद में डिस्क्लेमर के साथ यह वापस लौट आया. डिस्क्लेमर न सिर्फ शो के शुरुआत में बल्कि शो के बीच में नीचे एक पट्टी पर लिखा नजर आने लगा. जिसके बाद ही यह मामला शांत हुआ.  उसके बाद शो में किसी सास बहू ड्रामा शोज की तरह अजीबोगरीब टिवस्ट नजर आने लगे थे. फिर चाहे जोधा की बहन शिवानी का किरदार हो .

बुद्धा :  सीरियल में भगवान बुद्ध का पहला एपिसोड़ टेलिकास्ट ही नहीं हुआ था और नेपाल में इस सीरियल और जीटीवी चैनल को लेकर विवाद पैदा हो गया. दरअसल इस सीरियल के प्रमोशन के दौरान सीरियल के ही कलाकार कबीर बेदी ने गलती से भगवान बुद्ध के जन्मस्थान को भारत बता दिया था जिसके बाद नेपाल में हंगामा हो गया. कई लोग सड़को पर उतर आए थे. नेपाल ने भारतीय चैनलों को कुछ दिनों के लिए बंद ही कर दिया था. आखिरकार कबीर बेदी के सोशल साइट्स पर माफी मांगने के बाद  विवाद खत्म हुआ. 

20160129

रंग दे बसंती के 10 साल

कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता. उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है. जिंदगी जीने के दो ही रास्ते होते हैं. जो हो रहा है उसे होना दिया जाये या फिर उसे बदलने की जिम्मेदारी उठाई जाये...कुछ ऐसी सोच के साथ राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने आज से 10 सालों पहले रंग दे बसंती की नींव रखी थी. फिल्म युवाओं पर आधारित थी और लंबे अरसे के बाद किसी क्रांतिकारी फिल्म ने उन्हें झकझोरा था. हाल ही में फिल्म के 10 साल पूरे हुए. इस मौके पर फिल्म के सारे कास्ट व सदस्य एक साथ मिल कर जश्न में शामिल हुए और उन्होंने फिल्म से जुड़े कई पहलुओं से रूबरू कराया. 

 कैसे पड़ी थी नींव
रंग दे बसंती पहले सिर्फ डॉक्यूमेंट्री के रूप में बनाई जानेवाली थी. निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा व लेखक कमलेश पांडे ने साथ में मिल कर इससे पहले अक् श बनाई थी. मन में उलझन थी कि अब आगे क्या. उस वक्त कमलेश पांडे को संत तुकाराम के बारे में कहानी सुनने को मिली थी कि किस तरह तुकाराम को पूजने वाले ही खुद को तुकाराम समझ बैठे थे...वहां से कमलेश पांडे के जेहन में यह बात आयी कि कोई ऐसी कहानी गढ़नी चाहिए, जहां कलाकार किरदारों को निभाते- निभाते, मजाक-मजाक में वही किरदार जीने लगे. उन्होंने रंग दे बसंती में अपनी यह सोच डालने की पूरी कोशिश की. बकौल लेखक कमलेश पांडे इस फिल्म का नाम पहले आहूति रखा गया था. लेकिन आहूति उस दौर की कहानी के लिए फिट शीर्षक नहीं था. सो, उन्होंने फिर इसे यंग गन आॅफ इंडिया के नाम से बनाना शुरू किया. लेकिन यह नाम भी फिट नहीं बैठा.बाद में रंग दे बसंती नाम पर सबने हामी भरी.
दलेर पाजी के इटैलियन निर्देशक
दलेर मेहंदी इस फिल्म का शीर्षक गीत गाने वाले थे. वे स्टूडियो पहुंच चुके थे. फिल्म के गीतकार प्रसून जोशी के साथ उनकी बातचीत का सिलसिला जारी था. दलेर मेहंदी लगातार सवाल पूछ रहे थे कि आखिर रिकॉर्डिंग कब होगी. रिकॉर्र्डिंग में वक्त लग रहा था, क्योंकि एआर रहमान अपने टयून पर और काम कर रहे थे. ऐसे में जब निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा उनके सामने आये तो दलेर को लगा कि वह कोई इटैलियन निर्देशक हैं. चूंकि उनके बाल भी काफी लंबे थे. और उनकी बातचीत का लहजा भी वही था. बाद में उन्हें जानकारी मिली कि वह इंडियन ही हैं. दलेर मेहंदी लंबे इंतजार के बाद जाकर सो गये थे. उस वक्त सुबह के चार बज रहे थे. उस वक्त एआर रहमान अपने कमरे से बाहर आये और उन्होंने आकर कहा कि दलेर जी को बुला लीजिए. सबने कहा कि वह सो चुके हैं...रहमान ने कहा कि तो क्या हुआ. जगा कर बुलाइए. उस वक्त दलेर फौरन उठ कर आये और उन्होंने एक टेक में ही पूरा गाना ओके कर दिया था.
लता जी की लुक्का- छुप्पी
इस फिल्म के गीत लुक्का छुप्पी को लेकर भी खास बात यह हुई थी कि यह गीत पहले फिल्म का हिस्सा नहीं बनने वाला था. चूंकि शूटिंग पूरी होने के बाद गाने की रिकॉर्र्डिंग थी. लेकिन प्रसून को महसूस हुआ कि यह गीत फिल्म का हिस्सा बनना ही चाहिए. और उनकी ही यह इच्छा थी कि लुक्का छुप्पी शब्द मैं फिल्म में जरूर इस्तेमाल करूं. बहरहाल यह तय हुआ कि गाना फिल्म का हिस्सा बनेगा. लेकिन इसे गायेगा कौन. उस वक्त लता जी खुद स्टूडियो आयीं. और वे लगातार गाने की रिहर्सल करती रहती थीं. वे रिहर्सल के वक्त भी लगातार खड़ी होकर ही रिहर्सल करतीं. लगभग आठ घंटे वह खड़ी रहीं और उन्होंने फिर इस गाने की रिकॉर्डिंग पूरी की.
जब नहीं बन रहा था संयोग
इस फिल्म को लेकर राकेश जब आमिर के पास गये थे तो आमिर ने स्क्रिप्ट सुन कर हामी भर दी थी. वे यह फिल्म करेंगे. लेकिन राकेश बजट का इंतजाम नहीं कर पा रहे थे. लेकिन आमिर के जेहन में यह बात बैठ गयी थी कि यह फिल्म उन्हें करनी ही है. वे एक दिन राकेश से मिलने गये तो राकेश से पूछा क्या कर रहे इन दिनों. राकेश ने उन्हें अपनी किसी दूसरी फिल्म के ड्राफ्ट्स दिखाया. उस वक्त आमिर ने कहा कि मेहरा जिसमें दिल है वो बना... फिर एक दिन उन्हें मेसेज करके उनकी ही स्क्रिप्ट की बात कही कि जिंदगी जीने के दो ही रास्ते होते हैं. जो हो रहा है, उसे होने दें या फिर उसे सुधारने की जिम्मेदारी उठायें. फिर जाकर राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने ठान लिया कि वह यह फिल्म बनायेंगे और वह इस बात का पूरा श्रेय आमिर खान को दे देते हैं.
यूं मनाया वहीदा जी को
वहीदा रहमान को राकेश इस फिल्म में किसी भी तरह शामिल करना चाहते थे. लेकिन वहीदा जी तैयार नहीं हो रही थीं. राकेश और उनकी पत् नी भारती कई बार वहीदा जी से बेंग्लुरु में जाकर मिल कर भी आये थे. वहीदा बताती हैं कि भारती को जब यह पता चला कि वहीदा जी बेंग्लुरु हैं तो उन्होंने उन्हें ढेर सारे अचार बना कर भी भेजे. लेकिन जब फिर भी बात नहीं बनी. तो राकेश ने वहीदा जी से कहा कि अगर वह कहें तो वह उनके घर के बाहर ही सेट तैयार कर देंगे. लेकिन उनके बगैर फिल्म नहीं बनायेंगे. आखिरकार वहीदा जी मानी और फिल्म का हिस्सा बनीं.



गीतकार शैलेंद्र कुमार ने लिखा है कि
भगतसिंह इस बार न काया लेना देशवासी की,
क्योंकि देश प्रेम के लिए अभी भी सजा मिलेगी फांसी की...मैं मानता हूं कि रंग दे बसंती फिल्म का भी यही सार था. -कमलेश पांडे, फिल्म के लेखक

यह तो रांची की रंग दे बसंती है...

यह तो रांची की रंग दे बसंती है...
हाल ही में रंग दे बसंती के दस साल पूरे हुए. मैं खुशनसीब हूं कि आज से 10 साल पहले जब रंग दे बसंती सिनेमा थियेटर में देखी थी. उस वक्त इस बात का अनुमान नहीं था कि भविष्य में कभी मुझे अपनी इस पसंदीदा फिल्म के 10 साल पूरे होने के अवसर पर साक्षी बनने का मौका मिलेगा.  रंग दे बसंती ने उन चंद फिल्मों में से एक है, जिसने कई लिहाज से प्रभावित किया था. उस वक्त कॉलेज में अंतिम साल था मेरा. 2006 की बात है. रांची के सुजाता सिनेमा में देखी थी यह फिल्म. दोस्तों के साथ. दोबारा देखी. तब भी दोस्तों के साथ ही. अब सुजाता मल्टीप्लेक्स थियेटर में बदल चुका है शायद. उस वक्त सिंगल थियेटर था. फिल्म लंबे समय तक थियेटर में चली. लेकिन थियेटर से जाने के बावजूद इस फिल्म का प्रभाव जेहन से नहीं गया. वह दौर सोशल नेटवर्किंग का नहीं था. होगा भी तो मैं एक्टिव नहीं थी. न फेसबुक़ न टिष्ट्वटर. यहां तक कि आॅरकुट पर नहीं. और ब्लॉगिंग के बारे में तो मुंबई आने के भी तीन सालों के बाद जाना और जिंदगी में जिनकी बातें मेरे लिए अहमियत रखती हैं, उन्हीं मेंटर्स में से एक शख्सियत के बार -बार प्रोत्साहित करने के बाद अनुख्यान नाम  से ब्लॉगिंग की शुरुआत की. और वाकई उनका शुक्रिया, ब्लॉगिंग के एक ऐसे माध्यम से रूबरू कराने के लिए, जो शब्दों की संख्या की मोहताज नहीं है. जो बार-बार मुझे यह एहसास नहीं कराती, कि मैं परफेक् शनिस्ट नहीं.  बहरहाल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स न होने के बावजूद काफी अपडेट रहती थी. वजह यह थी कि हिंदुस्तान अखबार के फीचर डेस्क में काम कर रही थी. और घनश्याम श्रीवास्तव सर के साथ जिन्होंने भी काम किया है. वे जानते होंगे कि घनश्याम सर अपनी टीम को अपडेट और हर दिन नयी सोच, नये आइडियाज लाने के लिए किस तरह प्रेरित करते थे. और मैंने तो जर्नलिज्म ककहरा ही उनकी पाठशाला में सीखा है.खासतौर से किसी पर्व, त्योहार में उनकी कोशिश यही होती थी कि रटे-रटाये तरीके से पन्ने न निकाले जायें. तभी दर्शकों की रुचि बरकरार रहेगी. इसी क्रम में उन्होंने हमेशा युवा लेखकों को प्रेरित किया. उनके जेहन में यह बातें हमेशा से स्पष्ट थीं कि युवा के लिए पन्ना बन रहा तो लिखने वाले भी युवा हों. तभी बात बनेगी. और उनकी इसी सोच की वजह से हमें योगिता बीर,  सौरभ रॉय ,तौसिफ अहमद, विनीत कुमार, शिल्पा श्री, आत्रेयी विश्वास, संयुक्ता, सुरुचि, शिल्पा मिश्रा जैसे कई अच्छे और नयी सोच वाले युवा लेखक मिले थे. ये सभी उस वक्त जेवियर्स कॉलेज से ही मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर रहे थे. हर  शुक्रवार हिंदुस्तान सिटी नामक चार पन्नों का फीचर प्रकाशित होता था. उसके संयोजन, परिकल्पना और इन युवा लेखकों के साथ आइडिया मंथन की जिम्मेदारी मेरी थी. इसी दौरान एक इश्यू में शिल्पा श्री का आलेख हमने रीमिक्स सिटी में प्रकाशित किया था. शिल्पा का वह आलेख रंग दे बसंती की तर्ज पर उस मौजूदा दौर के युवा, छोटे शहर के युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया था. अंदाजा फिल्माना था. मतलब स्क्रिप्टिंग अंदाज में. घनश्याम सर ने तुरंत मंजूरी दी थी. और फीचर के पहले पन्ने पर इसे खूबसूरती से प्रकाशित किया गया था. उस दिन कई युवा पाठकों के फोन आये थे. सभी बधाई दे  रहे थे. कईयों ने कहा था कि यह तो रांची सिटी का रंग दे बसंती है. वेलडन.यकीन मानिए. वह शुरुआती दौर थे नौकरी के. जिस ऊर्जा, उत्साह से उस वक्त हम परिकल्पना करते, स्टोरी प्लानिंग और फिर प्रकाशन के बाद ऐसी सराहना. खुशी और दोगुनी हुई. जब उस आलेख पर मेरे अहम गुरु बीके सिन्हा सर की निगाह गयी. उन्होंने फौरन फोन मिलाया. वे इस बात से वाकिफ थे कि उस दौर में मैं और अमित उनकी गाइडेंस में कुछ नया करने को हमेशा आतुर रहते थे. खासतौर से विजुअल  माध्यम में. उन्होंने एक और आइडिया सुझाया कि क्यों न शिल्पा के इस आलेख को फिल्म का रूप दिया जाये. हमने बिना देर किये. निर्णय लिया. और अपनी इसी ऊर्जावान टीम को तैयार किया. शिल्पा भी चहक उठी थीं. और चहकती भी क्यों न...शुरुआती दौर में अगर लेट्स टू एडिटर लिखने पर भी वाहवाही मिलती तो खुशी होती थी. यहां तो लोगों को उसके लेख पसंद आ रहे थे. यह अफसोस है कि मेरे पास उस आलेख की कॉपी नहीं है. मगर उम्मीद है कि शिल्पा ने जरूर संभाल कर रखे होंगे. बहरहाल, हमने तय किया और टीम बनायी. योगिता, आत्रेयी, सौरभ, तौसिफ, अमित, विनीत, निधि, अतुल के साथ हमने टीम तैयार की. प्रकाशित आलेख को स्क्रिप्ट का रूप दिया. लोकेशन अपने जेवियर्स कॉलेज के कैंटीन से बेहतर और क्या हो सकता था. कुछ घंटों में स्क्रिप्ट का खाका तैयार किया और शूटिंग भी शुरू हो गयी. कैमरामैन अमित अर्ज और उनका हैंडी कैमरा तो हमेशा ही तैयार रहता था. कास्ट से बातचीत शुरू हुई. स्क्रिप्ट में एक किरदार नौकर का भी था. सबकुछ तैयार. बस नौकर किसी को नहीं बनना. कच्चेपन में भी कितना सच्चापन होता है न. कॉलेज कैंटीन में बन रही फिल्म में भी कोई नौकर नहीं बनना चाहता. हैट्स आॅफ कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के राजू किरदार कि जिसने नौकर के किरदार से लोकप्रियता हासिल की. हमारी फिल्म को भी आखिरकार एक राजू मिला. विनीत कुमार. विनीत को भी कॉमेडी नाइट्स के राजू से कम लोकप्रियता नहीं मिली इस फिल्म के बाद. और रूबरू के रूप में रंग दे बसंती को समर्पित वह फिल्म बन कर साकार हुई. रंग दे बसंती के 10 साल पूरे होने पर यह ख्याल आया कि हमारी रंग दे बसंती के भी तो दस साल पूरे हो गये....सो, दुनिया नहीं तो न सही कम से कम हमारी टीम को तो याद दिलायी जाये. भले ही हमारी फिल्म परफेक्ट नहीं...लेकिन रांची वही  थे हमारे चंद्रशेखर, वही थे हमारे भगत. सच ही तो कहा था उस पाठक ने कि हमारा तो रंग दे बसंती यही है.वैसे भी कोई भी फिल्म परफेक्ट नहीं होती..उसे परफेक्ट बनाना होता है. रंग दे बसंती का वह खुमार तब भी नहीं उतरा था. बाद में जब प्रभात खबर की युवाओं को समर्पित यूथ प्लस की जिम्मेदारी मिली,तब भी यही टीम और एक महत्वपूर्ण नाम जिनके बिना यह पूरी कहानी ही अधूरी है. हेमंत कुमार. शुक्रिया मेघनाथ सर का, हमारे प्रयासों को बचकाना न कह कर हमें प्रोत्साहित करने के लिए. याद है न सर, एडिंटिंग के लिए हमने आपके ही घर पर कब्जा किया था. शुक्रिया अक्षय मिश्रा दमदार आवाज के लिए, शायद उस आवाज के बिना वाकई सुबह नहीं होती...हम सबने न जाने कितने आलेख, कितने आलेखों के शीर्षक रंग दे बसंती से प्रभावित होकर लिखे थे. रंग दे बसंती के 10 साल पूरे होने पर उन सभी यारों, दोस्तों को याद करने का जी कर दा... क्योंकि बेमौसम भी आम की कच्ची कैरी पेपरबोट के रूप में होंठों तक पहुंचे. तब भी राहत ही देती है...क्योंकि कच्चेपन के  अधूरेपन में जो मिठास है. वह खास है. थैंक्यू राकेश ओमप्रकाश मेहरा व टीम रंग दे बसंती.हमारी इस प्रेरणा के लिए.

ये रहा हमारा वाला पेपरबोट...
https://www.youtube.com/watch?v=PV5tUnm4NJQ

अभिषेक के ओसमा


हाल ही में फिल्म तेरे बिन लादेन डेड और अलाइव के निर्देशक अभिषेक शर्मा और अभिनेता प्रद्युमन से बातचीत हुई. अमेरिका को लेकर अभिषेक का एक अलग ही दृष्टिकोण है. और वह अपनी सोच से चौंकाते हैं. वे मानते हैं कि अमेरिका एक देश नहीं बल्कि कई लोगों की धरती है. वह कई लोगों के समावेश से बना है. कई संस्कृति के समावेश से बना है. उन्हें यही वजह है कि अमेरिका काफी आकर्षित करता है. वे मानते हैं कि अमेरिका ने हॉलीवुड की फिल्में बना कर दुनिया में राज किया. भारत भी चाहता तो वह बॉलीवुड को उस स्तर पर ले जा सकता था. लेकिन यहां 70 के दशक के बाद बेहतरीन फिल्मों का निर्माण ही नहीं हो पाया है. आज भी लोग एंग्रीयंग मैन ही देखना चाहते हैं. लोग बॉलीवुड के नायक को स्टूपिड या बेवकूफ के रूप में नहीं देखना चाहते हैं. लेकिन उनकी फिल्म तेरे बिन लादेन का ओसामा जिसका किरदार प्रद्ुमन ही निभा रहे हैं. वे उसे बेवकूफ के रूप में ही दर्शाना चाहते हैं. चूंकि जो बेवकूफ है, वही स्मार्ट है. अभिषेक से बातचीत कर यह महसूस हुआ कि किसी निर्देशक ने खुद को किसी बंधन में बांध कर जवाब नहीं दिया. उन्होंने स्पष्ट रूप से बातें की  हैं और अमेरिका को लेकर, ओसामा को लेकर उनकी सोच कितनी स्पष्ट है. वे भले ही अपनी बातों को कहने के लिए सटायर फिल्मों का सहारा ले रहे हैं, लेकिन वे बिंदास तरीके से बेबाकी से अपनी बात रख रहे हैं. वे मानते हैं कि ओसामा ने अपनी यात्रा एक भले व्यक्ति की तरह की थी. उसने कई लोगों को भला किया है. लेकिन बाद में जाकर उसकी दिशा बदली और वही उसने अपने प्रति लोगों का प्यार खो दिया. प्रद्ुमन की ये बातें कि जब भी वे ओसामा को देखते हैं और उनकी आंखों को उन्होंने बार बार देखा है. वह खौफनाक हरगिज नहीं लगती. एक अलग ही दृष्टिकोण देती है हमारे नजरिये को. उम्मीदन फिल्म में वे इसलिए अपनी बातों में स्पष्ट हैं. 

20160127

और भी पहलू हंै सनी की जिंदगी के


हाल ही में सनी लियोने से एक वीडियो साक्षात्कार में उनके पोर्न स्टार की छवि को लेकर कई प्रश्न पूछे गये, जिन पर सनी लियोने ने बड़ी ही कुशलता से जवाब दिये. यह पहली बार नहीं, जब सनी से उनके इतिहास को लेकर सवाल दागे गये हैं. यह सनी भी जानती हैं कि उनका इतिहास उनका पीछा कभी नहीं छोड़ेगा. लेकिन उन्हें अब लोगों के तानों से कोई फर्क नहीं पड़ता. दरअसल, हमने यह सोच बना रखी है कि चूंकि वह पोर्न स्टार हैं, तो उनकी अपनी कोई निजी जिंदगी नहीं होगी. पत्रकार अपने मनचाहे अंदाज में सवाल पूछ सकते. सनी लियोने के बारे में चूंकि लगातार मीडिया में सिर्फ उनकी इसी छवि के बारे में चर्चा होती है. इसलिए लोगों ने भी यही अवधारणा बना रखी है कि उनकी जिंदगी 24 घंटे पर इसी हिस्से तक सीमित है. जिस तरह शेष कलाकारों की जिंदगी में लोगों को दिलचस्पी है. सनी की निजी जिंदगी के भी पक्ष लोगों के सामने आने चाहिए. जो सनी से व्यक्तिगत तौर पर मिले हैं, वे जानते होंगे कि सनी को बिजनेस की अच्छी समझ है. उन्हें मार्केटिंग और बिजनेस की काफी स्किल्स की जानकारी है. और वे प्रोडक्टस के बिजनेस में काफी दिलचस्पी रखती हैं. और ग्लैमर जिंदगी से इतर वे अपना स्किल्स भी बढ़ाती रहती हैं और खुद को काफी अपडेट रखती हैं. उन्हें यह सवाल हमेशा घेरे रहता है कि क्या उन्हें अपनी पिछली जिंदगी का पछतावा है. इसके जवाब में जब सनी बिना किसी ढोंग के  और बिना लाग-लपेट किये ईमानदारी से जवाब देती हैं कि उन्हें पछतावा क्यों होगा. उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि मर्जी से उस फील्ड को चुना था. तो उन तमाम विचारधाराओं से ग्रस्त लोगों के मुंह पर तमाचा लगता है और उन लड़कियों पर जो लोगों के सामने दिखावे के लिए अपनी जरूरतों का वास्तां देती हैं. ग्लैमर दुनिया का हिस्सा बनने के बावजूद अब भी वे ईमानदारी से अपनी बात रखती हैं और बनावटीपन से दूर हैं. उनका यह अंदाज मोहता है. 

लादेन रिटर्न्स


तेरे बिन लादेन2  का ट्रेलर जारी हो चुका है. फिल्म के निर्देशक अभिषेक शर्मा है. फिल्म का पहला संस्करण काफी लोकप्रिय रहा. इस बार ओसामा बिन लादेन के वर्तमान परिस्थिति को ध्यान में रख कर कहानी बुनी गयी है. ऐसा ट्रेलर से प्रतीत हो रहा है. अभिषेक शर्मा ने पिछली कड़ी में व्यंग्यात्मक तरीके से एक महत्वपूर्ण बात कही थी. इस बार भी उनकी तैयारी रोचक नजर आ रही है. सीक्वल के वक्त फिल्म को पहली कड़ी की तरह ही रोचक बनाना एक कठिन कला है. चूंकि कई फिल्में सिर्फ नाम के लिए सीक्वल होती हैं. लेकिन उनमें पुरानी कड़ी से मेल खाती खास परिस्थिति नहीं होती. फिल्म के ट्रेलर में एक दृश्य में लादेन के किरदार में जो बहूरुपिया है. वह बताता है कि हेलीकॉप्टर साइलेंट है. निश्चित तौर पर निर्देशक ने इस दृश्य को गढ़ने में कुछ गंभीर बात रखी है, जो फिल्म देखने के बाद ही सामने होगा. मेरे ख्याल से वेष बदल कर किसी और की जिंदगी जी रहे कई बहूरुपिये फिल्में में नजर आ रहे हैं. यह भी किसी खास मकसद से ही है. दरअसल, अभिषेक ने अपनी पहली  ही पारी में एक वाकई अलग मिजाज की फिल्म सोच ली और उसे साकार कर दिखाया था. लादेन को लेकर वास्तविक जिंदगी में भी अब भी कई प्रश्न चिन्ह हैं और विश्व के इतिहास में यह महत्वपूर्ण अध्याय है. यह कल्पना मात्र ही है. लेकिन अभिषेक चाहें तो जेम्स बांड की  सीरिज की तरह लादेन की कई सीरिज बना सकते हैं. जैसे लादेन मिट्स लादेन जैसी सीरिज में बहूरुपिया लादेन जब असली लादेन से मिलता है...तो क्या क्या बातें होती हैं. क्या  परिस्थितियां आती हैं. इन पर एक रोचक मेटाफर वाली कहानी लिखी जा सकती है. और वाकई में अगर अचानक से लादेन दोबारा वापसी करता है तो क्या हड़कम मच सकता है.जैसे विषय भी रोचक रहेंगे. 

रंग दे बसंती के 10 साल


फिल्म रंग दे बसंती के दस साल पूरे हो रहे हैं.इस फिल्म ने एक दौर में युवाओं को काफी प्रभावित किया था. देशभक्ति की कहानी को निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने एक अलग ही रूप दिया था. मुझे याद है, पत्रकारिता में वह मेरे शुरुआती दिन थे. मैंने यह फिल्म रांची के सुजाता थियेटर में देखी थी. उस वक्त वह सिंगल थियेटर था. अब मिनीप्लेक्स बन चुका है. शो के खत्म होने के बाद युवाओं में ही खूब जोश नजर आ रहा था. संत जेवियर्स कॉलेज के कुछ छात्रों ने मिल कर इस फिल्म से प्रेरित होकर रूबरू नामक शॉर्ट फिल्म भी बनाई थी, जिसे काफी लोकप्रियता भी मिली थी. फिल्म में कुछ युवा आपस में कॉलेज कैंटीन में बैठ कर अपने भविष्य की चर्चा कर रहे होते हैं. और देशभक्ति को लेकर उनके मन में खास रुझान नहीं हैं. वे बेपरवाह हैं.   कुछ फिल्मोत्सव में अवार्ड भी मिले. उस वक्त कुछ युवा अखबारों में इंटरनशिप कर रहे थे और अधिकतर युवाओं की इच्छा थी कि वे रंग दे बसंती के थीम पर कुछ लिखना चाहते हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि फिल्म ने किस हद तक युवाओं को प्रभावित किया था. लंबे दौर के बाद किसी देशभक्ति पर आधारित फिल्म में भाषणबाजी नहीं बल्कि एक् शन दिखाया गया था. कहीं न कहीं से फिल्म ने युवाओं को झकझोरा था. दरअसल, उस दौर से अधिक यह फिल्म अभी अधिक प्रासंगिक है. चूंकि कम से कम वह दौर युवाओं के इतने आत्म केंद्रित और सोशल नेटवर्र्किंग साइट्स पर सिर्फ भड़ास निकालने का दौर नहीं था. शायद इसलिए फिल्म की थीम को सराहा भी गया. आज अधिक चुप्पी है. आज युवाओं के पास माध्यम है. मगर वह जज्बा नहीं कि वह किसी बेगुनाह को सजा से बचा पायें. यह देखना भी रोचक होता कि आज के दौर में अगर यह फिल्म बनती तो निर्देशक किस तरह युवाओं को प्रेरित करते, चूंकि अब बसंत का रंग गेरुआ हो चुका है. अब आंदोलन का नहीं प्रेम रंग भी गेरुआ है. 

रणबीर, कैट और तमाशा


रणबीर और कट्रीना कैफ के रिश्तों को लेकर कयास लगाये जा रहे हैं कि दोनों में दूरियां आ चुकी हैं और इसे ब्रेकअप का नाम दिया जा रहा है. इस प्रेम कहानी के कई हिस्से इम्तियाज अली की फिल्म तमाशा की कहानी सी नजर आ रही. शायद इम्तियाज वाकई प्रेम कहानियों के पहलुओं से भलिभांति वाकिफ हैं. तभी उन्होंने फिल्म में जवाब भी दिया है कि हर बार एक ही प्रेम कहानी क्यों...चूंकि हर प्रेम कहानी वे सारे हालात आते ही हैं. तमाशा में मीरा और वेद तय करते हैं कि वह इनकॉरसिका में एक साथ कुछ दिन बितायेंगे बिना एक दूसरे के बारे में कुछ भी जानें. वास्तविक जिंदगी में रणबीर-कैट ने भी अपने आशियाने को इनकॉरसिका बनाया. मीरा वेद को कई रूपों में बदलती है. वास्तविक जिंदगी में भी कैट ने रणबीर को कई रूपों में प्रभावित किया है. लेकिन तमाशा की कहानी में भी अल्पविराम उस वक्त ही लगता, जब वेद मीरा को शादी के लिए प्रपोच करता और मीरा कहती कि वह इस रोबोट वेद से शादी नहीं करना चाहती. वास्तविक जिंदगी में भी कैट और रणबीर के रिश्ते में शादी को ही रुकावट मानी जा रही है.दरअसल, रणबीर कपूर की वास्तविक छवि इम्तियाज  की फिल्मों में ही नायक के रूप में नजर आयी है. बहुद हद तक ये जवानी है दीवानी में भी. रणबीर जॉर्डन की तरह प्यार में पागल हैं, लेकिन शादी उसका विराम नहीं. वह तमाशा के वेद की तरह अब भी अपनी कहानी की खोज में हैं, चूंकि कहीं न कहीं उनके दिल में ये जवानी है दीवानी का कबीरा भी है.लेकिन इस आधार पर उनके प्यार की तोहमत करना नाइंसाफी होगी. चूंकि रणबीर ने खुद स्वीकारा है कि उन्हें कैट और दीपिका दोनों ने ही कई रूपों में बदला  है. प्यार पूरा न हो, तो इसका मतलब वह प्यार था ही नहीं. ऐसा कहना प्यार का ही अपमान है.

कनेक् शन हो गया तो हो गया...


शाहरुख खान की फिल्म फैन जल्द ही रिलीज होनेवाली है. फिल्म का विषय एक फैन और उसके सितारे के बीच के रिश्ते की कहानी है. यशराज ने इस फिल्म के प्रोमोशन के लिए पूरे विश्व के उन फैन्स को शामिल किया है जो शाहरुख के तो फैन है हीं. साथ ही भारत के वे फैन्स भी उस वीडियो में शामिल हैं, जो किसी भी शख्सियत के फैन हैं. इसी क्रम में हम चार्ली चैपलीन के बेहतरीन फैन की झलकियां देखते हैं. जो पेशे से डॉक्टर हैं. और हर वर्ष चैपलीन के जन्मदिवस पर वह चैपलीन यात्रा निकालते हैं. वे न सिर्फ उनकी तरह वेशभूषा धारण कर रखते हैं. बल्कि वे अपने मरीजों को भी हमेशा यह राय देते हैं कि अगर वे चैपलीन की फिल्में देखेंगे तो आधी बीमारी से तो यूं ही उन्हें राहत मिल जायेगी. इसी वीडियो में एक ऐसे फैन का नाम भी सामने आता है, जो अमिताभ बच्चन के फैन हैं, लेकिन उन्होंने कभी अमिताभ से मिलने या उनसे आॅटोग्राफ लेने की कोशिश नहीं की, बल्कि उनके कामों को देख कर खुद अमिताभ ने उनकी किताब को सपोर्ट किया. स्पष्ट है कि शाहरुख खान की फिल्म में फैन से जुड़ी हर बारीकियों और उनके इमोशन को दर्शाया जायेगा. फिल्म के टीजर में एक जगह फैन गौरव का किरदार कहता है कि लोगों के लिए वह होगा फिल्मस्टार मेरे लिए तो वह दुनिया है.एक बार कनेक् शन हो गया तो हो गया. यह हकीकत है कि यह कहना है कि मैं उनका डाय हार्ड फैन हूं. मुरीद हूं. आसान है. लेकिन फैन वाकई वे ही हैं, जिनका उनके स्टार से कनेक् शन. कनेक् शन दिल का. उसी वीडियो में मन्नत के बाहर जब शाहरुख आते हैं, तो किसी फैन ने उनकी तरफ जैकेट फेंका है और शाहरुख ने उसे स्वीकार कर पहन भी लिया है. एक महिला कहती है कि ऐसा लगता है कि उस दिन भरपेट खाना खा लिया है. फैन यही हैं और स्टार फैन से ही हैं. इसके बावजूद फैन के कद्रदान कम ही स्टार्स हैं.

20160125

स्ट्रीट हॉकी की चैंपियन थी मैं : सनी लियोनी


सनी लियोनी एक बार फिर से एक चैनल पर दिये साक्षात्कार को लेकर चर्चे में हैं. खास बात यह रही कि इस बार मीडिया ने पत्रकार का नहीं, सनी का ही साथ दिया है. सनी भी खुश हैं कि लोगों ने धीरे-धीरे ही सही उनके प्रति अपना नजरिया बदला है. वे इन दिनों फिल्म मस्तीजादे की रिलीज को लेकर व्यस्त हैं. 
 सनी, आपको हाल ही में चैनल पर दिखाये गये साक्षात्कार को लेकर काफी लोगों का सपोर्ट मिला है. खासतौर से इंडस्ट्री का. इस बारे में आपको क्या कहना है?
मैं शुक्रगुजार हूं कि धीरे-धीरे ही सही लोगों ने मेरे प्रति अपना नजरिया बदला है. बॉलीवुड मुझे इसलिए पसंद है, क्योंकि लोग यहां आपके पास्ट को नहीं देखते. आपका आज देखते हैं. मैं खुश हूं कि लोगों ने सपोर्ट किया है. यह दर्शाता है कि उन्होंने मुझे इस इंडस्ट्री का हिस्सा मान ही लिया है आखिर. मैं अपने पास्ट से कभी दुखी नहीं होती और मैं यह नहीं जताना चाहती कि लोग समझें कि मैं किसी मजबूरी में काम किया है. मैं भी एक इंसान हूं तो बुरा लगता है. खासतौर  से यह सवाल कि मैंने यब सब क्यों किया तो मुझे गुस्सा आता है. मुझे उसमें बुराई नजर नहीं आती. मैं अपनी बॉडी को सेलिब्रेट करती हूं. किसी मजबूरी की वजह से नहीं किया था वह सब. और लोगों को गलतफहमी है कि मैं बस हर वक्त एक ही काम करती. तो मुझे दुख होता है. मैंने उस जिंदगी को भी एंजॉय किया है और आज की जिंदगी को भी एंजॉय कर रही हूं.
इंडस्ट्री में अपनी सफलता को किस तरह देखती हैं आप?
मैं सफलता को लेकर बहुत ज्यादा कांसस नहीं हूं. बस यह तसल्ली रहती है कि चलो अगर अब तक गलत नहीं हुआ है तो यही मेरी सफलता है. बस मैं यही सोचती हूं कि आज कल से बेहतर हो. यह महीना पिछले महीने से बेहतर हो. मैं प्लानिंग नहीं करती. मैं मानती हूं कि हर वक्त बदलता रहता है, क्योंकि कल क्या होगा, क्या नहीं तय नहीं और जो कल होगा, उससे जिंदगी को फिर नया मोड़ मिल सकता. सो, मैं प्लान नहीं करती. 
मस्तीजादे से कैसे जुड़ीं?
मस्तीजादे एक हास्य फिल्म है. लोग इसे लेकर काफी बातें कह रहे. लेकिन मेरे पास जब मिलाप( फिल्म के निर्देशक) यह फिल्म लेकर आये थे तो मुझे लगा कि मुझे यह फिल्म करनी ही चाहिए. मजेदार फिल्म लगी थी स्क्रिप्ट मुझे. सो, मैंने हां कह दिया. इस तरह की फिल्में मैं वेस्ट में बहुत देखती आयी हूं. जेनिफर वहां इस तरह की काफी फिल्में करती हैं. भारत के दर्शकों को कॉमेडी तो पसंद आती है. ग्रैंड मस्ती को काफी हिट रही थी. 100 करोड़ हुए थे फिल्म के. इसका मतलब है कि ऐसी फिल्में दर्शकों को पसंद आती है. यह एडल्ट कॉमेडी है और इसमें कोई बुराई नहीं है. मुझे नहीं लगता. 
आपकी बातचीत के अंदाज से लगता है कि आप निजी जिंदगी में भी काफी चंचल ह ैं. बचपन में आप शरारती थीं?
हां, बिल्कुल मैं बहुत शरारती रही हूं. बचपन से ही. मैं काफी हंसती थी. बिना मतलब के भी. मेरे दोस्त मुझे क्रेजी कहते थे. तब भी मैं हंसती रहती थी. मुझे न बचपन से ही लोगों की बातों की परवाह नहीं थी. मैंने जिंदगी को कभी सीरियस नहीं लिया. मैं मस्तीखोर हूं और यही रहना पसंद करती हूं. मुझे अपनी जिंदगी पसंद है. काफी कम लोगों को ऐसी जिंदगी जीने का भी मौका मिलता है, जहां जो वह करना चाहते हैं. वह कर पाते हैं. मैं खुश हूं. मेरी जिंदगी से मुझे बेइतहां प्यार है.
बचपन किस तरह बीता?
मुझे सब टॉम ब्वॉय बोलते थे. मैं क्योंकि बहुत अधिक स्पोर्ट्स खेलती थी. हर वक्त कुछ न कुछ गेम खेलती ही रहती थी. बास्केटबॉल में लड़कों की हालत खराब कर देती थी. स्ट्रीट हॉकी खेलती थी.जब भी वक्त मिलता था मैं खेल के मैदान में ही रहती थी और लड़कों के  साथ ही खेला करती थी. लड़कियों वाले कोई गुण नहीं थे मेरे में. मुझे तो 18-19 की उम्र में यह बात समझ आयी कि मैं लड़की हूं. स्ट्रीट हॉकी में तो चैंपियन थी मैं
सेलिब्रिटी होने के बाद उस जिंदगी को मिस करती हैं?
दरअसल, जब मैं लॉस एंजिल्स जाती हूं. वहां मैं बिल्कुल आजाद रहती हूं. वहां मैं अब भी अपने दोस्तों के साथ अब भी सारे गेम खेलती हूं. शॉपिंग करती हूं. खूब घूमती फिरती हूं. काफी मजा आता है मुझे वहां. वहां मुझे कोई भी सेलिब्रिटी जैसा ट्रीट नहीं करता. भारत में स्टारडम अलग होता है. लेकिन यहां के लोग स्टार्स को पलकों पर बिठा कर रखते हैं. मैं काफी खुशी खुशी इसे एंजॉय करती हूं.
आपका हमेशा से सपना था कि एक्ट्रेस बनना है.
नहीं, जब मैं छोटी थी तो उस वक्त मुझे फोटोग्राफी में काफी दिलचस्पी थी. मैं फोटोग्राफी काफी करती थी. फिर मुझे टीचिंग करने का भी काफी शौक हुआ था. 
लेकिन मैंने सोचा था कि फोटोग्राफी को गंभीरता से लूंगी. जब मैंने अपने पेरेंट्स को इस बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि मैं क्रेजी हो गयी हूं.इसके बारे में दोबारा मत सोचना. 
आप कभी दुखी होती हैं, तो उससे खुद को कैसे उबारती हैं?
मैं अधिक दुखी नहीं होती. लेकिन मेरे पति डैनियल को काफी चीजें बुरी लगती हैं. तो मैं उन्हें ही कंसोल करती हूं. उन्हें चियर अप करने की कोशिश करती हूं. मेरी पहली प्राथमिकता मेरे पति की ही खुशी है. 
आपकी बातों से लगता है कि आप पारिवारिक भी हैं?
इसे कैसे बोलूं समझ नहीं आता.लेकिन मुझे अपने परिवार के लोगों और दोस्तों से घिरे रहना पसंद है. मैं घर पर काफी डिनर पार्टी करती हूं और काफी कूकिंग करती हूं. मुझे वेजीटेरियन खाना बनाना बहुत पसंद है. खासतौर से मुझे मेरे भाई को उसका पसंदीदा लजानिया खाना खिलाना पसंद है. अब मेरे पेरेंट्स नहीं हैं और इसलिए मैं अपने भाई को अपने पास बुलाती हूं. भारत में रहते रहते यहां की मेहमाननवाजी सीख ली है और अपने भाई की खूब खातिरदारी करती हूं.
एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के अलावा किन चीजों में दिलचस्पी है?
मुझे बिजनेस में काफी दिलचस्पी है. मैं प्रोडक्ट बिजनेस में काफी दिलचस्पी रखती हूं. मैं उनकी बारीकियों के बारे में खूब जानना चाहती हूं. धीरे धीरे मैं अपना ब्रांड का या कुछ तो बिजनेस करूंगी. 

20160122

स्टारडम के बंधन में फंसना नहीं चाहता : आर माधवन


आर माधवन खुद को किसी स्टारडम के घेरे में कैद नहीं करना चाहते. उन्हें देख कर अगर किसी फैन के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है तो उनके लिए इतना ही काफी है. वे अपनी बेफिक्री को ही अपना स्टाइल स्टेटमेंट मानते हैं. तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बाद एक अलग लीग की फिल्म उन्होंने चुनी है. फिल्म साला खड़ूस में एक अलग ही तेवर नजर आ रहे हैं माधवन के.

साला खड़ूस जैसे विषय का आइडिया कहां से आया?
मेरी दोस्त हैं सुधा.उनकी ही कहानी है. ज्यादातर जब कोई नया निर्देशक फिल्म बनाने की चाहत रखता है या रखती है तो वह प्यार मोहब्बत वाले विषय लेकर आते हैं.तो मैं हैरान हो गया कि यह अलग तरह की कहानी लेकर कैसे आयी है. उन्होंने कहा कि मैं स्क्रिप्ट पढ़ लीजिए. और उन्होंने लेडीज बॉक्सर्स पर रिसर्च भी भेजा था.किस तरह के परिवार से ये लड़कियां होती हैं, क्यों बॉक्सिंग करने के लिए मजबूर होती हैं, जो उन्होंने रिसर्च किया था. वह देख कर मैं बौखला गया था. मुझे लगा कि यार ये तो बहुत अच्छी कहानी है. और स्क्रिप्ट पढ़ा तो और दिल को छू गयी.उस वक्त  मैं प्यार मोहब्बत की ही फिल्म कर रहा था. तो मुझे लगा कि एक चेंज जरूरी है.इसलिए मैंने तय किया कि मैं यह फिल्म करूंगा.
राजू हिरानी का जुड़ना कैसे हुआ?
दरअसल, मैं कई निर्माताओं से मिल चुका था. लेकिन सबने यही कहा कि मैडी आप नयी फिल्म बना रहे हो. रियल लेडी बॉक्सर है. निर्देशक नयी है. आप निर्देशक बदल लो...वगैरह वगैरह. कोई हीरोइन लेलो. हमें मार्केटिंग में आसानी होगी. लेकिन मुझे यकीन था इस कहानी पर कि इसे देख कर पब्लिक हैरान हो सकती है. मेरे साथ हमेशा ही यही होता रहा है. तनु वेड्स मनु भी सिर्फ मैं बनाना चाहता था और कोई तैयार ही नहीं था. बाद में फिल्म खरीदी स्टूडियो. लेकिन मेरा दिल बैठ चुका था. फिर मुझे लगा कि मैं ये तो पता कर लूं कि स्क्रिप्ट में दम है भी कि नहीं कि मैं ही अड़ियल की तरह लेकर घूम रहा हूं. मैंने फिर राजू जी को मेसेज किया. रात के 11 बज रहे थे. राजू जी ने फौरन घर बुलाया.तो मैंने कहा कि स्क्रिप्ट है. 20 मिनट में मैंने सुनाया.और उनका रियेक् शन था कि भाई कहानी तो बहुत अच्छी है. उनकी आंखों में आंसू थे. और उन्होंने कहा कि बताओ मैं किस तरह जुड़ सकता. उनका यही रियेक् शन काफी था मेरे लिए. मैं कहूंगा कि इस फिल्म के लिए व ेमेरे साला खड़ूस( मेरे मेंटर) रहे हैं. हमारी दोस्ती थी. लेकिन मैं अब डिवोटी हो गया हूं उनका.
साला खड़ूस में साला होने के बावजूद सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी दिखा दी है.
हां, उनका बहुत शुक्रिया और दूसरी बात उन्होंने कहा कि उन्हें कभी साला शब्द से दिक्कत नहीं है. साला के बाद कौन सा शब्द आता है. उस पर सेंसर है. अगर साला गाली या अपशब्द के रूप में है तो फिर उस पर सेंसर तो होगा ही. 
स्पोर्ट्स पर फिल्म बनाते हुए या किसी स्पोर्ट्स मैन की जिंदगी को जब परदे पर दर्शाया जाता है तो क्या सीखने को मिलता है बतौर एक्टर?
हां, एक एक्टर के रूप में हमें लगता है ऐसा कि हम तो सबकुछ कर लेंगे. कुछ भी मुश्किल नहीं है. हम तो कर ही लेंगे. लेकिन जब आप रिंग में उतरते हो तो असलियत पता चलती है. इस फिल्म के लिए ही जब मैंने शुरुआत की तो मुझे पता चला कि 40 मिनट की बॉक्सिंग करने में 40 सेकेंड में मैं थक गया था. तब पता चला कि आपको कितना स्टेमिना और कितने तजुर्बे की जरूरत होती है. मैं तो खुद को बहुत तेज समझता था. लेकिन मुझसे हुआ ही नहीं शुुरुआती दौर में. लेकिन अब इज्जत बढ़ जाती है, उन महिलाओं के लिए जो बॉक्सिंग के फील्ड से जुड़ी हैं. आप और अधिक अनुशासित हो जाते हैं और आपको वक्त की अहमियत समझा देते है.
आपकी जिंदगी में आपने किसी को मेंटर माना है?
हां, मेरी जिंदगी के मेंटर कमल हसन साहब हैं,जिनके साथ मैंने एक फिल्म की थी और उस फिल्म में उन्होंने मुझे एक्टिंग के बारे में सबकुछ सिखाया, जिसकी वजह से मेरा रोल बहुत मजबूत हो गया था उस फिल्म में. खास बात यह थी कि उस फिल्म के लिए अवार्ड मुझे मिला. तो मेरा मानना है कि एक मेंटर ही यह काम कर सकता है.मेंटर को कभी-कभी सख्त भी होना पड़ा है. तो वह जबरदस्त तरीके से सख्त भी रहे हैं. लेकिन वह मेरी अच्छाई के लिए ही रहा है. आज मुझे थोड़ी बहुत जो एक्टिंग की समझ मिली है. उन्हीं से मिली है.
मैरी कॉम इस विषय पर पहले बन चुकी है. तो आपको लगता है कि तूलना होगी?
दोनों फिल्म अलग है. ये मुझे लगता है कि यह लोगों की इनसेक्योरिटी है. लोग जान बूझ कर जोड़ते हैं. उन्हें लगता है कि हमारे पास तो कहानी है ही नहीं. हमारी फिल्म दो ऐसे लोगों की कहानी है, जिन्हें समाज से निकाल दिया गया है. और बॉक्सिंग ने उन्हें वह दिलाया, जिसके वह हकदार हैं. ऐसा तो नहीं है कि जब चक दे रिलीज हुई. उसके बाद मिलियन डॉलर बेबी रिलीज हुई तो लोगों ने तो उस वक्त नहीं कहा कि यह चकदे की कॉपी है. क्योंकि हॉलीवुड फिल्म है इसलिए.
बॉलीवुड के अब तक का सफर कैसा रहा है?
मुझे लगता है कि काफी अच्छा रहा. इंडस्ट्री में वह स्टारडम मुझे नहीं मिला, जो लोगों को लगता है कि मुझे मिलना चाहिए. पर मैं ये कहना चाहता हूं कि मैं स्टारडम से जुड़ना भी नहीं चाहता. मेरे लोग हैं, जो मेरी कुछ आॅडियंस हैं जो मुझे बहुत पसंद करती हैं. जो मीडिया मेरी फिल्में पसंद करती हैं. उनके हिसाब से मैं बहुत बड़ा स्टार हूं. लेकिन मैं उन स्टार्स में से नहीं हूं कि डिजाइनर कपड़े पहन कर हर जगह जाने लगा, जहां मैं एंजॉय नहीं करता हंूं तो मैं अपना वजूद खो बैठूंगा. तो शाायद मैं उस इंसान से दूर हो जाता, जो मैं दरअसल हूं. मुझे रोड पर चलना अच्छा लगता है. एयरपोर्ट पर मैं हूं और मेरे  साथ 15 लोग होंगे तो मुझे अच्छा नहीं लगता. अकेले रहना पसंद है. अगर चार लोग मुझसे वहां मिलना चाहते हैं.तो मिलने दो. हो सकता है कि मुझे देख कर वह थोड़ी देर के लिए ही खुश तो हो जायें. और मेरे साथ ऐसा हुआ है. मियां बीवी लड़ रह ेहैं और अचानक मुझे देख कर खुश हो गये हैं. मैं इस बंधन में फंसना ही नहीं चाहता. मुझे लगता है कि हां, मैं अगर शाहरुख खान नहीं हूं तो नहीं हूं यार...मैं बनना भी नहीं चाहता.मैं अपना मुकाम बनाना चाहता हूं. मैं वैसी जिंदगी नहीं जी सकता. मैं गार्ड से गार्ड नहीं हो सकता. मेरी सभ्यता ऐसी है कि मैं तो गार्ड को भी बैठने को बोल दूंगा. मैं खुश हूं कि मैं उस तरह का कलाकार हूं जिसको खुद को अदरक बोलवाना कि कहीं से भी बढ़ रहा है कि ताकत रखता हंूं. वरना, कौन सा स्टार खुद की ऐसी बेइज्जती किरदार के लिए करा सकता 
किरदार को सरल कैसे बना देत ेहैं आप. तनु वेड्स मनु या आपकी किसी भी फिल्म में आप सहज दिखते हैं अभिनय करते हुए?
मुझे लगता है कि आपको एहसास करना पड़ता है. आंखें हो, चेहरा हो. सबकुछ सिंक में होना जरूरी है.  लोग इसलिए स्वीकारते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आपका प्यार उन्हें भी दिख रहा है. आपका दर्द आॅडियंस तक पहुंचना चाहिए. आॅडियंस कहे नहीं फील करें कि हां उन्हें आपका काम पसंद आया. यह सबकुछ थियेटर और टेलीविजन एक्टिंग से मैंने काफी सीखा है. आनंद एल राय जैसे निर्देशक होते हैं. तो आप कर पाते हैं. जिस तरह की फिल्में मैं करता हूं. उनके लिए. मैं इन बातों का भी ख्याल रखता हूं कि चेहरा मेरा एक ही है और फिल्में कई करनी है या की है. इस चेहरे में मुस्कुराहट और एंगर सब एक ही तरह का है. पर जिस माहौल के लिए रिलेवेंट है वह महत्वपूर्ण है. जैसे 3 इडियट्स में मैं तब हंस रहा हंू जब आमिर कोई जोक सुना रहा है. या फिर तनु वेड्स मनु में तब हंस रहा हूं.जब पप्पी मुझे कोई जोक सुना रहा है. ये सब हंसी के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि मैं रियल हूं. और मैं इसलिए रियलिस्टिक फिल्में अधिक करता हूं.

इंसानीयत की हीरोइज्म दर्शाती एयरलिफ्ट

फिल्म : एयरलिफ्ट
कलाकार : अक्षय कुमार, निमरत कौर, इनामुल हक, अजय कुमार, कुमुद मिश्रा  प्रकाश बेलावड़ी, पूरब कोहली .
रेटिंग : 4.5 स्टार
निर्देशक : राजा कृष्णा मेनन
लेखक : सुरेश नायर, राहुल नंगिया, रितेश शाह
अनुप्रिया अनंत 
 एयरलिफ्ट इतिहास में घटी एक महत्वपूर्ण घटना को दर्शाती एक महत्वपूर्ण फिल्म है. ताज्जुब है, इतने सालों में कैसे किसी निर्देशक को इस विषय पर कहानी नहीं सुझी. बहरहाल, सबसे पहले निर्माता निखिल आडवाणी, हरि ओम प्रोडक् शन और टी सीरिज बधाई के पात्र हैं कि तीनों ने इस विषय के लिए हां कहा. खुशी है कि पिछले कई सालों से लगातार अक्षय कुमार साल की कुछ ऐसी चौंकानेवाली फिल्में करते हैं, जिन्हें देख कर यकीन होता है कि सुपरस्टार अगर ऐसे विषयों के लिए हामी भरे तो ऐसी कहानियों की ताकत बन सकते हैं. एयरलिफ्ट एक ऐसे आम आदमी की खास कहानी है, जिसने अपने देश के लोगों की रक्षा एक सैनिक की तरह नहीं, बल्कि एक पारिवारिक सदस्य के रूप में की है. हम इसे सिर्फ देशभक्त फिल्म नहीं कह सकते, बल्कि यह मानवता, संवेदना, अपने अस्तित्व को ढूंढने की कहानी है. एक व्यक्ति अपनी पूरी विरासत बसाता है. उसे गढ़ता है और पल में वह सड़क पर आ जाता है, तब उसे एहसास होता है कि सिर्फ इंसानीयत ही वह कूंजी है, जिसे लेकर वह हजारों रास्ते तय कर सकता है. इस बात की भी खुशी है कि निर्देशक ने इसे जबरन देशभक्ति फिल्म साबित करने के लिए बड़े-बड़े भाषण नहीं लिखे. देशभक्ति के गाने नहीं ठूसे. उन्होंने संजीदगी से फिल्म के हर किरदार, किरदारों के संवाद और पात्रों को गढ़ा है. यह निर्देशक राजा कृष्णा की पहली फिल्म है. लेकिन वह अपनी दक्षता साबित करते हैं. वे एयरलिफ्ट गढ़ने में कहीं भी चूके नहीं हैं. उन्होंने विषय की गंभीरता और संजीदगी को बरकरार रखते हुए जो भावनात्मक संदेश दिया है. वह फिल्म को खास बना देती है. आमतौर पर हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को यह बातें आउट डेटेड लगने लगी हैं कि वे दर्शकों को इमोशनल कनेक्ट देने से बचते हैं. लेकिन हकीकत यही है कि वही फिल्म कामयाब है, जिसे भावनाओं को उकेरने के लिए जबरदस्ती न करनी पड़े. एयरलिफ्ट उन्हीं फिल्मों में से एक है, जो आपको झकझोर देती है. कहानी सच्ची घटना पर आधारित है. 1990 में जब इराक ने कुवैत पर हमला किया. उस वक्त 1 लाख 70 हजार भारतीय कुवैत में फंसे थे और तीन आम आदमियों ने अपने दम पर उन्हें वापस भारत भेजा. यह ऐतिहासिक जीत थी. विश्व के सबसे बड़े हीरोइज्म एक्ट में से एक. लेकिन दुखद है कि हमें हमारे इतिहास ने इसके बारे में खास जानकारी नहीं दी और हमने जानने की कोशिश नहीं की. हर लिहाज से निर्देशक बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसे विषय को चुना. हम लीक से हटकर फिल्मों की बातें करते हैं. वाकई में इसे विषय कहते हैं. रंजीत काटयाल के माध्यम से उन तीन भारतीयों की कहानी को खूबसूरत तरीके से गढ़ा है निर्देशक ने. रंजीत कुवैत के बड़ा बिजनेसमैन है. उसे हर अप्रवासी हिंदुस्तानियों की तरह भारत में सिर्फ कमियां नजर आती हैं. उसे अपने देश से कोई लगाव नहीं. वह देश लौटना भी नहीं चाहता. बल्कि उसे इस कदर चिढ़ है कि भारत का जिक्र होना भी वह अपनी शोहरत और कद की तौहीन मानता है. लेकिन एक दिन एक झटके में सब सच्चाई उसके सामने होती है. उसके अस्तित्व पर सवाल उठते हैं, तो सिर्फ वह इसलिए जिंदा रह पाता, चूंकि वह भारतीय हैं. उस वक्त उसे एहसास होता है कि जब दर्द होता है, तो सबसे पहले मां ही याद आती है. हर सफल बिजनेसमैन और नाकामयाब पति की तरह रंजीत काटयाल को भी अचानक ख्याल आता है कि सिर्फ उनकी पत् नी और बच्ची उसका परिवार नहीं है. बल्कि वे तमाम भारतीय उनके परिवार के ही सदस्य हैं. लेकिन वह देशभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए किसी आंदोलन की घोषणा नहीं करता, जैसा कि आमतौर पर हिंदी सिनेमा में होता आया है. ताकि सुपरस्टार्स का हीरोइज्म सामने आये. वह पूरी परिघटना को वैसे ही जीता है. जैसे उस दौर में घटना घटी होगी. हर तरफ इराकी सैनिकों के अत्याचार का नजारा आपको एक दर्शक के रूप में डराता है. रुहे कांपती हैं. आप महसूस कर सकते हैं कि जब जब इस तरह के बंटवारे या कब्जे होते होंगे. हुकूमत बदलती होगी. दर्द आवाम ही झेलती है. सरकारें तो हमेशा ही सिर्फ भगौड़े ही बनती रही है. रंजीत अपनी कुशलता और प्रेजेंस आॅफ माइंड से सारी परिस्थितियों को  संभालता है. वह लार्जर देन लाइफ वाले एक् शन में नहीं, बल्कि दिमागी कसरत से परेशानियों का हल निकालने की कोशिश करता है, जिसमें उसका साथ उसकी पत् नी भी देती है. इराकी- कुवैत और भारत के साथ उस दौर के विदेशी संबंधों को भी इस फिल्म के माध्यम से बारीकी से समझा जा सकता है. यह इस फिल्म की खूबसूरती है कि फिल्म का नायक अचानक सुपरनैचुरल पॉवर हासिल करके सैनिकों से मुंठभेड़ नहीं करने लगता. वह आदमी की तरह ही बर्ताव करता है. इस लिहाज से यह फिल्म वास्तविक के बेहद करीब लगती है. निर्देशक का यह रियलिस्टिक अप्रोच उन्हें खास बना देता है. फिल्म की दूसरी खूबी फिल्म के सहायक कास्ट हैं, जिनमें पूरब कोहली, कुमुद मिश्रा , इनामुल हक, अजय कुमार और प्रकाश बेलावड़ी प्रमुख हैं. पूरब कोहली के पात्र की संजीदगी आकर्षित करती है और इंसानीयत की मिसाल देती है. अजय कुमार और पीयूष मिश्रा की सहजता लुभाती है. इनामुल हक ने एक ईराकी मेजर के रूप में उनके लहजे और अंदाज को खूबसूरती से निभाया है. अजय कुमार हर दृश्य में अक्षय के साथ सारथी के रूप में नजर आये हैं. उनका अभिनय भी काफी आकर्षित करता है. एक खास किरदार निर्देशक ने प्रकाश बेलावड़ी के रूप में गढ़ा है, जो कहानी को न सिर्फ रोचक बनाते हैं, बल्कि कई रूप से लोगों की सोच व कई मुद्दों पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया भी देते हैं. निमरत ने अक्षय का पूर्णरूप से साथ दिया है. एक पत् नी के रूप में वह लाउड नहीं दिखी हैं और फिल्म को वह भी रियलिस्टिक बनाये रखने में योगदान देती हैं. अक्षय कुमार ने हर रूप से इस फिल्म को निर्देशक की कमान के अनुसार ढलने दिया है. उन्होंने अपने स्टारडम को फिल्म में हावी नहीं होने दिया है. हर दृश्य में आप खुद को रंजीत कटयाल की जगह महसूस करते हैं. उनकी पूरी यात्रा, उनके मर्म के साथ आपको भी इस बात की हड़बड़ी है कि कब वे अपने देश लौटेंगे.  दरअसल, उन्होंने इसमें एक बार फिर से नया प्रयोग किया है, जिसमें वे सफल रहे हैं. निर्देशक कहानी से भटकते नहीं, न ही उन्होंने कुछ भी थोपने की कोशिश की है. बेवजह गाने या रंजीत कटयाल को हीरो बनाने के चक्कर में अतिरिक्त दृश्य जोड़े गये हैं. फिल्म के कई संवाद आपको सोचने पर मजबूर करते हैं. झकझोरते हैं. इस लिहाज से फिल्म के सारे लेखक भी बधाई के पात्र हैं. राजा ने अपनी पहली फिल्म से ही साबित कर दिया है कि वे सधे हुए निर्देशकों में शामिल हो सकते हैं. बेशक तमाम बातों से परे जब भारत का झंडा लंबे इंतजार के बाद लहराता है तो वाकई भारतीय होने पर गर्व होता है. यह फिल्म उन शिकायती टोलों के मुसाफिर को भी करारा जवाब देती है कि हां, हर देश में दिक्कत होती है. हर देश में परेशानी है. सरकारी दफतर, मंत्रालय में काफी भ्रष्टाचार  है. लेकिन इन सबके बीच एक संजीव कोहली जैसा कर्मचारी भी होता है, जो देश के लिए जीता है. 26 जनवरी के मौके पर इससे बेहतरीन फिल्म और क्या हो सकती है. यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए, बल्कि स्कूली छात्रों और इतिहास के छात्रों को जरूर देखनी चाहिए.

20160118

वाह, क्या सेंस आॅफ ह्ुमर है


एक एंटरटेनमेंट चैनल ने एक कॉमेडी शो के अंतिम एपिसोड का प्रसारण इस वजह से नहीं किया, चूंकि उस कॉमेडी शो के प्रमुख से उनकी अनबन हो गयी है. इस कॉमेडी शो को लगातार कई सालों से लोकप्रियता  हासिल हुई है और शो के सारे किरदारों ने दर्शकों के दिलों में जगह बनाई है. शो के कई किरदार आइकॉनिक बने. बॉलीवुड का हर सितारा इस शो में इस वजह से ही शिरकत करता था, चूंकि यह टेलीविजन के सबसे कामयाब शोज में से एक था. ऐसे में एक हास्य शो का अंत यह होगा, यह उम्मीद नहीं थी. अंत भला तो सब भला. शो के होस्ट ने इस शो के अंतिम एपिसोड के माध्यम से दर्शकों के प्रति अपना आभार प्रकट करने की तैयारी की थी. चूंकि शुरुआत बेहतरीन हो और उसका अंत भी उसी खूबसूरती से किया जाये तो वह लम्हा खास हो जाता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इस शो ने किसी चैनल की वजह से लोकप्रियता हासिल नहीं की. उन्होंने अपने व अपने सहयोगी कलाकारों की वजह से यह लोकप्रियता हासिल की है.लेकिन आपसी अनबन की वजह से उनसे वह आखिरी मौका छीनना, चैनल की क्रूरता का परिचय है. यह हकीकत है कि पलरा हमेशा उन्हीं का भारी होता है, जिनके पास धन हैं. यह पहला विवाद नहीं,जब क्रियेटिव शक्ति के सामने आर्थिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति की जीत हुई है. लेकिन चैनल कम से कम अपनी तरफ से इतनी आत्मीयता तो दर्शा ही सकता था, कि शो को एक खूबसूरत विराम के साथ विदाई दी जाये. चैनल को लोकप्रिय शोज की वजह से विज्ञापन हासिल होते हैं. शो की लोकप्रियता से चैनल ने लंबे समय तक मुनाफा कमाया है. लेकिन एक हास्य शो का यह हश्र दर्शाता है और कई हकीकत को बयां करता है कि यहां रिश्ते कितने दिखावटी हैं. कीकू शारदा की गिरफ्तारी से अगर एक कलाकार का अपमान होता है तो यह भी अपमान ही है. और अगर कोई चैनल अपनी शक्ति दिखा कर कमजोर पक्ष पर खुश है तो हकीकत यह है कि उनका यह सेंस आॅफ हुमर कमाल का है.

अमिताभ व वक्त की पाबंदी

हाल ही में अमिताभ बच्चन फिल्म वजीर के प्रोमोशन के दौरान अपने घर से जब कुछ ही दूरी स्थित एक सात सितारा होटल की तरफ निकले, तो सड़क पर ट्रैफिक जाम को देख कर वे दंग रह गये. उन्होंने अपने ड्राइवर से कहा कि वक्त पर पहुंच पाना मुमकिन नहीं होगा. अगर ट्रैफिक में फंसे तो. तो उन्होंने निर्णय लिया वे कार से उतरे और पैदल ही पंचसितारा होटल पहुंच गये. वे मीडिया से रूबरू होने वाले थे और वे बिल्कुल वक्त पर पहुंचे. उन्हें देखने हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ पड़ी थी. अमिताभ बच्चन ने यह रास्ता इसलिए इख्तियार किया क्योंकि वे हमेशा वक्त के पाबंद रहे हैं. वे मीडिया को इंतजार कराना पसंद नहीं करते. यही वजह है कि मुंबई की मीडिया भी जब अमिताभ बच्चन के इंटरव्यू के लिए आमंत्रित की जाती है. वे वक्त से पहले पहुंचती है. वरना, शेष सभी कलाकार अपनी मनमर्जी से आते हैं और घंटो इंतजार के बाद उनके चंद मिनट मिलते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि अमिताभ आज भी इस बात को अहमियत देते हैं कि वक्त सबसे महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने अपनी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव देखे हैं और वे जानते हैं कि वक्त सबसे बलवान होता है. यही वजह है कि सदी के महानायक को वक्त की इज्जत करना पसंद है फिर चाहे वह इसके लिए अपनी शानदार कार से निकल कर सड़क पर ही क्यों न आ जायें. सड़क पर आ जाना...इस मुहावरे का भावार्थ यही है कि दिवालिया निकल जाना. किसी दौर में अमिताभ उस परिस्थिति से गुजर चुके हैं. लेकिन उस सड़क को पार करने के बाद उनके लिए वाकई सड़क पर आने की परिभाषा बदली होगी . यही वजह है कि वे कई बार जब उन्हें यह महसूस होता है कि उन्हें वक्त पर पहुंचने के लिए पैदल ही निकल जाना चाहिए तो वह फौरन तैयार हो जाते हैं. अमिताभ बच्चन की ये बातें प्रेरणादायी हैं.

रणबीर व चार्ली टैटू


रणबीर कपूर ने कहा है कि वे यह नहीं जानते कि वाकई वह कभी अपने शरीर पर टैटू बनवायेंगे या नहीं. लेकिन अगर भविष्य में उन्होंने कभी बनवाया तो उनकी इच्छा होगी कि वह चार्ली चैपलीन का टैटू बनवायें. चूंकि वे चार्ली चैपलीन से हमेशा ही प्रभावित रहे हैं. उनका मानना है कि चार्ली संसार के बेहतरीन कलाकारों में से एक थे. गौरतलब है कि उनके  दादाजी राज कपूर साहब भी चार्ली चैपलीन से बहुत अधिक प्रभावित थे. उन्होंने अपनी फिल्मों में कई बार चार्ली से प्रभावित किरदार और वेशभूषा धारण किये हैं. कई लोग तो उन्हें हिंदुस्तानी चार्ली कह कर भी संबोधित करते थे. सो, रणबीर उस लिहाज से भी चैपलीन की जिंदगी से काफी प्रभावित रहे हैं. उन्होंने भी अपनी दो फिल्में अजब प्रेम की गजब कहानी और बर्फी में चार्ली से प्रभावित किरदार किये हैं. दरअसल, रणबीर कपूर के कई अंदाज उनके दादाजी से मेल खाते हैं. शायद यही वजह है कि आनेवाले दौर का उन्हें सुपरस्टार तो माना ही जा रहा है. लोग यह भी मानते हैं कि राज कपूर साहब की लीगेसी को रणबीर कपूर ही भलिभांति लेकर आगे बढ़ेंगे. रणबीर की इच्छा पूछने पर वे हमेशा अपनी बात जाहिर करते हैं कि उनकी चाहत है कि उन्हें वह स्टारडम मिले जो किसी दौर में राज कपूर साहब को मिली थी कि लोग उनके कार के चक्के उठा कर चले थे. इससे भी स्पष्ट है कि रणबीर अपने दादाजी से किस हद तक प्रभावित हैं.फिल्म तमाशा के शुरुआती दृश्य में भी वह अपने दादा राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर की याद दिलाते हैं. लेकिन बड़ी बात यह है कि उन्होंने कभी भी खुद को उनकी परछाई बनने नहीं दिया है. आमतौर पर कलाकार अपने परिवार के सदस्य और प्रेमी के नाम गुदवाते हैं. लेकिन रणबीर चैपलीन के नाम का टैटू बनवाना चाहते हैं, इससे यह जाहिर होता है कि वे अपनी कला का कितना सम्मान करते हैं और उसे ही लेकर गंभीर हैं. उनके लिए टैटू बनवाना  फैशन ट्रेंड भर नहीं है.

स्टार व साक्षात्कार


हाल ही में एक न्यूज चैनल में एक सुपरस्टार को आमंत्रित किया गया था. यह सुपरस्टार किसी फिल्मी बैकग्राउंड से संबंध नहीं रखते हैं. उन्होंने खुद अपनी पहचान बनायी है. अपनी मेहनत के बलबूते.उनसे बातचीत के दौरान मशहूर पत्रकार ने कई सवाल पूछे. मगर कुछ सवालों में पत्रकार कुछ इस कदर अभिनेता से पेश आ रहे थे. जैसे अभिनेता का कोई मुकाम ही न हो. अक्सर यह होता है कि हम पत्रकार इस सोच के साथ किसी अभिनेता या अभिनेत्री का साक्षात्कार करते हैं, जैसे हमने जिंदगी में बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर रखा है. और सेलिब्रिटीज ने कुछ किया ही न हो. हां, यह सही है कि एक पत्रकार की भी यह जिम्मेदारी है कि वे किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री से मंत्रमुग्ध होकर उनके मनमुताबिक न सवाल करे और न ही उनके जवाब पर हामी भरे. और न ही जी हुजूरी करे. लेकिन यह बात तो जरूर याद रखी जानी चाहिए कि उस शख्सियत ने भी भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाई है. उनसे तीखे सवाल किये जायें. लेकिन व्यवहार तीखा नहीं होना चाहिए. मुमकिन है कि आप बहुत जानकार हैं, देश दुनिया के बारे में भी आपको तमाम जानकारियां हासिल हैं. आप बुद्धिजीवी वर्ग से हैं. लेकिन व्यवहार में आपका तीखापन यह दर्शाता है कि आप इस पूर्वाभास में होते हैं कि सिनेमा इंडस्ट्री के लोगों के पास समझ ही नहीं होती. अक्सर स्टार्स की हर बात का मतलब उनकी फिल्म की रिलीज से जोड़ दिया जाता है. यह हकीकत है कि स्टार्स भी अपनी फिल्म के प्रोमोशन के वक्त ही मीडिया से अधिक रूबरू होते. लेकिन कुछ फिल्में वाकई उनके दिल के करीब भी होती है और कभी कभी वे माहौल के अनुसार भी अपनी बातें करते हैं. खास कर नये कलाकारों के साथ बातचीत के दौरान मीडिया उन्हें कम आंकने का कोई मौका नहीं छोड़ती, जो कि सरासर गलत है.

कलाकार की आजादी


कॉमेडी नाइट्स फेम किकू शारदा को एक धार्मिक गुरु की मिमिक्री करने के लिए जेल हो गयी है. यह एक कलाकार की नहीं, बल्कि पूरी कला बिरादरी का अपमान है. मिमिक्री की कला का प्रदर्शन भारत में नया नहीं है. कई कलाकारों ने कई सुपरस्टार्स की मिमिक्री की है. कई लोगों की तो जिंदगी ही सुपरस्टार्स की मिमिक्री से चलती है. सुनील ग्रोवर ने हाल ही में शाहरुख खान की मिमिक्री की थी. कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में. शाहरुख के सामने ही. लेकिन शाहरुख ने इसका आनंद लिया था. और हास्य प्रेमियों ने उनके परफॉरमेंस की जम कर तारीफ की थी. राजू श्रीवास्तव ने कई समारोहों में लालू प्रसाद यादव के सामने उनकी मिमिक्री की है और लालू ने इसका हंसते हंसते आनंद लिया है. फिर किसी एक व्यक्ति को क्यों तकलीफ हो गयी. हास्य कलाकारों का पुराना इतिहास है. वे कई कलाकारों, बड़ी बड़ी शख्सियत की भी नकल उतारते हैं. गौरतलब है कि एक समारोह में जहां चार्ली चैप्लीन की मिमिक्री  की प्रतियोगिता हो रही थी. वहां खुद चार्ली चैप्लीन स्वयं मौजूद थे और उन्होंने वेष बदल कर उस शो का खुद को हिस्सा भी बनाया था. लेकिन खुद चार्ली अपनी मिमिक्री करके भी विजेता नहीं बने थे. किसी अन्य ने जीत हासिल की थी. तो इस कला व कलाकारों की सोच, उनके परफॉरमेंस के लिए उन्हें सजा का हकदार समझना कहां तक मुमकिन है. दरअसल, इन घटनाओं से भी यह बातें स्पष्ट होने लगी है कि हम किस तरह सीमित होते जा रहे हैं. अक्षय कुमार ने हाल ही में हुई बातचीत के दौरान सही बात कही है कि यहां हर कोई, कभी भी, किसी पर भी केस कर देता. इसलिए बेहतर है कि यह शांत रहना. सोशल नेटवर्र्किंग व वायरल वीडियो के इस दौर में दरअसल, हकीकत यह है कि हमें गूंगा बनाया जा रहा है. सिर्फ शोर नजर आ रहा. लेकिन हम अब सिर्फ सुन रहे हैं. आवाज तो छीनी जा रही है. 

राजकुमार व नयी पीढ़ी


राजकुमार हिरानी की फ़िल्म साला खड़ूस के साथ अपने निर्माण कंपनी की शुरुआत कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसी फिल्मों को मौके मिलने ही चाहिए। उन्होंने बताया कि वे संजय दत्त पर बायोपिक इस लिहाज़ से नहीं बना रहे, क्योंकि संजय उनके मित्र हैं। उन्होंने तो पहले फ़िल्म न बनाने का मन बना लिया था।लेकिन फिर जब उन्होंने पूरी कहानी सुनी तो यह महसूस किया कि इस कहानी में वैसी कई बातें हैं जिनकी वजह से मैंने हां कहा। राजकुमार मानते हैं कि   उनकी कहानी लोगों तक इसलिए पहुंचनी चाहिए क्योंकि उनकी जिंदगी के ऐसे कई पहलू हैं जो दर्शकों से रूबरू नहीं हैं।और उनके बारे में दर्शकों को जरूर जानना चाहिए। राजकुमार हिरानी यह भी मानते हैं कि दर्शकों के सामने ऐसी कहानी पहुंचनी इसलिए भी जरुरी है क्योंकि ऐसे लोगों को मौके मिलने चाहिए।दरअसल इस तरह के फ़िल्म मेकर का ऐसी फिल्मों से जुड़ना इसलिए भी जरुरी है ताकि दर्शक फिल्मों से जुड़ें। ज्यादा से ज्यादा दर्शकों का जुड़ना ही ऐसी फिल्मों के फिल्ममेकर को हिम्मत देती है। राजकुमार खुद मानते हैं कि पिछले लम्बे समय ताल एक दौर में स्पोर्ट्स की फिल्में नहीं आ पाती थी। लेकिन अब अज़हर, एमएस धोनी पर आधारित फिल्में बन रही हैं और अब इन फिल्मों की संख्या भी बढ़ी है और यह एक बेहतर संकेत हैं। इस फ़िल्म के माध्यम से नए निर्देशक को मौके मिल रहे हैं। साथ ही राजू को जिस तरह मेंटर मिले विधु के रूप में। वे भी मेंटर के रूप में नई प्रतिभाओं को मौके दे रहे हैं।यह एक अच्छे दौर की शुरुआत है।

स्टार व स्टारडम की गंभीरता


आर माधवन ने अपनी हाल ही में हुई बातचीत में कहा कि उनकी कोशिश होती है कि वे जिस ईमानदारी से अपने किरदारों को परदे पर निभाते हैं. वास्तविक जिंदगी में भी वे इतने ही सरल बने रहें. उन्हें हर वक्त स्टारडम से घिरे रहना पसंद नहीं हैं. उन्होंने बताया कि हाल ही में जब वह एयरपोर्ट पर थे. मियां-बीवी की आपस में लड़ाई हो रही थी. और वे वहां से गुजरे. दोनों मियां-बीवी अपनी लड़ाई भूल कर माधवन को मैडी मैडी कह कर पुकारने लगे और फिर दोनों ने हंसते-मुस्कुराते हुए तसवीरें खींचवायीं और दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गयी. माधवन को ये बातें प्रभावित करती हैं. वे स्वीकारते हैं कि मैं स्टार हूं. लेकिन यह भी नहीं भूल सकता कि मेरी उम्र क्या है. मेरे अगल बाल सफेद हो चुके हैं तो हो चुके हैं. मैं उन्हें हरगिज डाइ नहीं करूंगा. जब तलक किरदार की डिमांड न हों. वे यह भी स्वीकारते हैं कि इंडस्ट्री ऐसे कितने स्टार्स हैं,( फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के एक संवाद की तरफ ईशारा करते हुए),जो यह किरदार के रूप में भी सुनने के लिए तैयार होते हैं कि अदरक के जैसे फैलते जा रहे हो. दरअसल, अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैंने भी महसूस किया है कि बॉलीवुड में स्टारडम की परिभाषा कुछ और है. यहां नये नये सितारे भी हर वक्त सार्वजनिक  स्थानों पर महंगे और डिजाइनर आउटफिट पहने ही नजर आते हैं. जबकि बॉलीवुड से इतर दक्षिण सिनेमा के स्टार आम अंदाज में ही दर्शकों के सामने आते हैं. रजनीकांत जैसे सुपरस्टार्स के बारे में हमेशा ही खबरें आती रही हैं कि वे आम जिंदगी में कितने आम होते हैं.कुछ सालों पहले एक वीडियो,  जिसमें जैकी चान को सुपरस्टार्स की मौजूदगी में मंच की सफाई करते देख चुके हैं. इन बातों से यही स्पष्ट होता है कि कौन से स्टार स्टारडम को कितनी गंभीरता से लेते हैं. 

bollywood 2016

वर्ष 2016 ने दस्तक दे दी है. बॉलीवुड के लिए यह साल फिर से एक नयी चुनौती और आशाओं को लेकर आ रहा है. खास बात यह है कि वर्ष 2015 में तीन खानों में से आमिर की फिल्म रिलीज नहीं हुई थी. लेकिन इस बार एक बार फिर से तीनों खान आपस में टकराने वाले हैं. कई नये चेहरों को भी मौके मिलेंगे और कई बड़ी फिल्में भी रिलीज होनेवाली  हैं. 


आनंद एल राय, निर्देशक
मुझे लगताहै कि 2016 कहानियों के लिए लिहाज से लीड करेगा. कंटेंट वाली काफी फिल्में आ रही हैं, जिनमें मोहनजोदाड़ो, दंगल, नीरजा, मिर्जाया जैसी फिल्मों से काफी उम्मीदें हैं. 2016 में बॉलीवुड में हर लिहाज से विकास हो इसके लिए नये चेहरों को भी मौका देना जरूरी है. और छोटी फिल्मों को प्रोमोट करना आवश्यक है. ऐसा मेरा मानना है.
.संजय लीला भंसाली
मुझे नहीं लगता कि दीपिका के स्टारडम पर इस बात से फर्क पड़ेगा कि उनकी फिल्म रिलीज नहीं हो रही. बल्कि लोग जब उन्हें एक नये अवतार में देखेंगे और चौकेंगे. आनेवाले समय में दीपिका और बड़ा धमाका करनेवाली है.



तीन खान फिर से हैं आमने सामने
जी हां, जब जब इंडस्ट्री के तीनों खान्स की फिल्में रिलीज होनेवाली होती हैं. वह साल काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. चूंकि अब भी शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान के स्टारडम में कमी नहीं आयी है. दर्शकों को उनकी फिल्मों का इंतजार रहता है. इस बारे में ट्रेड एनलिस्ट कोमल नहाटा का कहना है कि 2016 बॉक्स आॅफिस के लिए भी काफी खास रहेगा. चूंकि इस वर्ष शाहरुख खान की दो फिल्में रिलीज होनेवाली हैं. रईस और फैन. दोनों में ही शाहरुख बिल्कुल अलग अंदाज में हैं. शाहरुख फिल्म फैन में दोहरी भूमिका में होंगे और उन्होंने फैन वाले अवतार में पहले कभी किसी फिल्म में काम नहीं किया है. यह फिल्म मार्च में रिलीज होनेवाली है और खुद शाहरुख को भी फिल्म से काफी उम्मीदें हैं. इसके बाद उनकी फिल्म रईस अगस्त में रिलीज होगी. इस फिल्म में वे डॉन की भूमिका में हैं. और फिल्म में उनका अंदाज बिल्कुल अलग है. फिल्म के टीजर ने दर्शकों को चौंकाया है. सो, इस लिहाज से शाहरुख के लिए यह महत्वपूर्ण साल है. शाहरुख की फिल्म दिलवाले को कामयाबी मिली लेकिन जितनी की अपेक्षा थी उतनी नहीं मिली. सो, यह दोनों फिल्में शाहरुख की महत्वपूर्ण फिल्में होंगी. सलमान खान की फिल्म सुलतान इस साल रिलीज होगी. सुलतान के लिए सलमान काफी मेहनत कर रहे हैं. वे लगातार अपनी बॉडी पर काम कर रहे हैं. उनकी पिछली फिल्म प्रेम रतन धन पायो काफी कामयाब रही है और लोगों की उम्मीदें सलमान खान से और अधिक बढ़ गयी हैं. सुलतान को लेकर अनुमान लगाया जा रहा है कि फिल्म 300 करोड़ का आंकड़ा पार कर सलमान की पिछली फिल्मों के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी. वर्ष 2015 में सलमान तीनों खानों में सबसे अधिक प्रभावशाली रहे हैं.आमिर खान की फिल्म दंगल वर्ष 2016 के अंत में रिलीज होनेवाली है. फिल्म का निर्देशन नितेश तिवारी कर रहे हैं. फिल्म को लेकर काफी चर्चा है. उम्मीद की जा रही है कि यह फिल्म भी अच्छी कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ेगी. खास बात यह है कि उम्मीद की जा सकती है कि 2016 में तीनों खान जिन फिल्मों में काम कर रहे हैं, इन सभी फिल्मों में अच्छे कंटेंट हैं. फिल्म की कहानी में भी दम है तो दर्शकों को सिर्फ इनका स्टारडम ही नहीं, कहानी भी आकर्षित करेगी. ऐसी उम्मीद है.
दीपिका की फिल्म नहीं होगी रिलीज
निस्संदेह  दीपिका के दर्शकों के लिए यह खबर चौंकानेवाली है कि पिछले चार सालों से लगातार दीपिका की फिल्में हिट हो रही हैं और वह फिलवक्त नंबर वन पर विराजमान हैं. वर्ष 2015 में उनकी फिल्में पीकू, तमाशा, बाजीराव मस्तानी रिलीज हुई और तीनों ही कामयाब रही हैं. लेकिन दीपिका ने यह फैसला क्यों किया है. इस सवाल पर दीपिका ने कहा है कि मैं सोच समझ कर ही निर्णय लूंगी. सिर्फ दिखने के लिए फिल्में नहीं कर सकती.इसलिए कोई फिल्म साइन नहीं की है. तो वर्ष 2016 में अब तक की खबर के मुताबिक दीपिका ने कोई फिल्म साइन नहीं की है तो उनकी कोई फिल्म 2016 में रिलीज होने की संभावना नहीं है. इस बारे में निर्देशक संजय लीला भंसाली का मानना है कि अब दीपिका उस मुकाम पर पहुंच चुकी हैं कि उन्हें दर्शक सिर्फ फिल्मों की रिलीज से याद रखेंगे. ऐसा नहीं होगा. दीपिका फिर से कोई बड़ा धमाका करेगी. इस बात का मुझको यकीन है.
रणवीर और रणबीर
रणवीर सिंह और रणबीर कपूर में प्राय: तूलना होती रही है. जहां रणबीर बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद अपनी फिल्मों से पूर्ण रूप से कामयाबी हासिल नहीं कर पा रहे हैं.रणवीर सिंह को फिल्म बाजीराव मस्तानी से बड़ी सफलता मिल गयी है. निर्देशक उनका लोहा मान रहे हैं. वर्ष 2016 रणबीर कपूर के लिए भी मानक साल रहेगा. चूंकि रणबीर की फिल्में ऐ दिल  है मुश्किल और जग्गा जासूस इसी साल रिलीज होनेवाली है. और इन दोनों फिल्मों का हिट होना बेहद जरूरी है. चूंकि रणबीर को फिल्म तमाशा से सराहना मिली है. लेकिन फिल्म को उतनी बड़ी कामयाबी नहीं मिली, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. वही रणवीर सिंह ने फिलहाल सिर्फ बेफिक्रे की घोषणा की है. बेफिक्रे आदित्य चोपड़ा निर्देशित कर रहे हैं तो उस लिहाज से इसे महत्वपूर्ण फिल्म माना जा रहा है. 
न्यू लांचिंग 
बी टाउन में इस बात की चर्चा जोर शोर से है कि कई सुपरस्टार अपने बच्चों की लांचिंग 2016 में कर सकते हैं, जिनमें अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन की लांचिंग मिर्जयां से हो रही हैं. इस फिल्म का निर्देशन राकेश ओम प्रकाश मेहरा कर रहे हैं. इस फिल्म को लेकर काफी चर्चाएं हैं. सनी देओल अपने बेटे करन देओल को इंडस्ट्री में लांच करनेवाले हैं. खबर है कि सनी के बेटे को पहले आदित्य चोपड़ा लांच करनेवाले थे. लेकिन कुछ कारणों से बात नहीं बन पायी और सनी ने खुद ही निर्णय लिया है कि वे खुद लांचिंग करेंगे. सैफ अली खान के बेटे की लांचिंग की खबरें जोरों पर हंैं और श्रीदेवी की बेटी की लांचिंग की खबरें भी सुनी जा रही हैं.
कहानियां मचायेंगी धूम
जी हां, वर्ष 2016 में बॉलीवुड के लिए यह खास बात होगी कि इस साल ऐसी कई फिल्में होंगी जो कहानियों की वजह से काफी पसंद की जायेंगी. कई अलग विषयों पर फिल्मों का निर्माण हो रहा है, जिनमें अक्षय कुमार की एयरलिफ्ट महत्वपूर्ण फिल्म है. फिल्म एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित है, जिसने अपनी जान जोखिम में डाल कर कई लोगों की रक्षा की थी. कुबैत भारत के रिश्ते पर बनी महत्वपूर्ण फिल्म है एयरलिफ्ट, इसके अलावा साला खड़ूस में भी कहानी दमदार नजर आ रही है.कई अच्छे और बड़े निर्देशक अपनी कहानी लेकर आ रह े हैं. विशाल भारद्वाज की फिल्म रंगून में आमने सामने होेंगे शाहिद और सैफ़. फिल्म उड़ता पंजाब में करीना शाहिद साथ होंगे. रंगूना और उड़ता पंजाब भी अच्छी कहानियों वाली फिल्म है. आशुतोष ग्वारिकर की बहुप्रतिक्षित फिल्म मोहनजोदाड़ो भी इसी साल रिलीज होगी.
आशुतोष ग्वारिकर की यह फिल्म पिक्चराइजेशन के लिहाज से काफी बड़ी होगी और बड़े कैनवॉस पर फिल्म का निर्मा्रण भी हो रहा है. फिल्म बड़े बजट की फिल्म है. मुमकिन है कि पिछले साल की बाजीराव मस्तानी की तरह यह हिस्टोरिक व पीरियड ड्रामा बेहतरीन कैनवॉस पर फिल्मायी जाये और दर्शकों को पसंद भी आयेगी.
महिला प्रधान फिल्में
वर्ष 2016 की भी कुछ फिल्में महिला प्रधान फिल्में हैं और जिन्हें लेकर काफी चर्चा है. फिल्म जय गंगाजल के ट्रेलर में प्रियंका चोपड़ा के तेवर सबको पसंद आ रहे हैं. वह फिल्म में पुलिस आॅफिसर की भूमिका में हैं. इस फिल्म में खुद प्रकाश झा काम कर रहे हैं. इनके अलावा नीरजा को लेकर काफी चर्चाएं हैं. नीरजा बायोपिक फिल्म है, जो नीरजा बनोट पर बनी है. उड़ता पंजाब में करीना को बेहतरीन भूमिका दी गयी है. इस लिहाज से यह फिल्म भी महिलाओं के लिए खास होगा. फिल्म की एं का में भी करीना के किरदार की काफी चर्चाएं हैं.

जब नहीं हुई थी बात पक्की...


बॉलीवुड में बात पक्की तब तक नहीं मानी जा सकती, जब तक वह फिल्म पूरी तरह से बन कर तैयार न हो जाये.आपको जान कर आश्चर्य होगा, लेकिन यह हकीकत है कि  फिल्में बनना संयोग है. ऐसे कई कलाकार हैं, जिन्हें बाद में बड़े मौके जरूर मिले.लेकिन जब उन्होंने अपना पहला आॅडिशन दिया था तो कुछ कामयाब हुए और कुछ नहीं हो पाये थे.उनकी जगह किसी अन्य को मौके मिले थे. 

 सलमान खान- मैंने प्यार किया
हाल ही में जब फिल्म प्रेम रतन धन पायो रिलीज होनेवाली थी.उस वक्त पहली बार निर्देशक सूरज बड़जात्या ने सलमान खान के पहले आॅडिशन के वीडियो दिखाये, जिसमें सलमान साइकिल चलाते हुए एंट्री लेते हैं. इस वीडियो को दिखाने के बाद खुद सलमान खान ने इस फिल्म से संबंधित कई बातें शेयर की. उन्होंने बताया कि इस फिल्म के लिए दीपराज राणा, जिन्होंने उनके साथ फिल्म प्रेम रतन धन पायो में भी काम किया है. सलमान ने बताया कि इस फिल्म के लिए जब वह आॅडिशन देने आये थे. उस वक्त दीपराज राणा भी आॅडिशन दे चुके थे और सूरज को दीपराज पसंद भी आये थे. सलमान मानते हैं कि वे लकी रहे कि उन्हें अपना पहला मौका मिला और उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई. चर्चा यह भी रही है कि इस फिल्म के लिए बिंदू दारा सिंह ने भी आॅडिशन दिया था.
जो जीता वही सिंकदर-अक्षय कुमार
फिल्म जो जीता वही सिंकदर एक दौर की कामयाब फिल्म है और खासतौर से युवाओं में इस फिल्म को लेकर काफी क्रेज था. इस फिल्म में आमिर खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी. फिल्म में दीपक तिजोरी खलनायक की भूमिका में थे. अक्षय कुमार ने भी इस फिल्म के लिए आॅडिशन दिया था और उनकी इच्छा थी कि वह दीपक तिजोरी वाला किरदार निभायें. लेकिन आॅफर दीपक तिजोरी को ही मिला था. बाद में अक्षय कुमार ने अलग तरीके से अपनी पहचान स्थापित की.
नीलम-मैंने प्यार किया
फिल्म मैंने प्यार किया की पहली च्वाइस भाग्यश्री नहीं थीं. फिल्म में शबाना दत्त नामक नयी लड़की काम करने वाली थीं. उन्होंने ही सलमान खान का नाम भी सूरज को सुझाया था. शबाना का नाम तय भी हो चुका था. लेकिन अचानक शबाना से संपर्क नहीं हो पाया. शबाना ने फोन ही नहीं उठाया. उस वक्त मोबाइल फोन तो हुआ नहीं करते थे. सो, बाद में फिल्म नीलम के नाम पर भी विचार किया गया था.नीलम उस दौर में हिट थीं. सूरज को पसंद भी थीं. सलमान खान को भी खुशी थी कि किसी जाने पहचाने चेहरे के साथ उन्हें काम करने का मौका मिल रहा है. लेकिन सूरज के पिता राजकुमार बड़जात्या को भाग्यश्री का आॅडिशन काफी पसंद आ गया था और उन्होंने तय किया कि वे भाग्यश्री को हंी फिल्म में लेंगे. बाद में नीलम हम आपके हैं कौन का भी हिस्सा बनती बनती रह गयीं. अंतत: वे हम साथ साथ हैं में सूरज के साथ काम कर पायीं.
अदिति राव हैदरी-दिल्ली 6
यह बात अदिति राव हैदरी खुद स्वीकार चुकी हैं कि उन्होंने फिल्म दिल्ली 6 के लिए लीड एक्ट्रेस के लिए आॅडिशन दिया था. उन्हें खुद ऋषि कपूर ने उस वक्त कहा था कि वह काफी यंग हैं और उन्हें यंग किरदार ही निभाने चाहिए. खुद हैदरी को यह लगा था कि उन्हें अलग तरह के किरदार मिलेंगे और वह अपनी पहली शुरुआत करेंगी. लेकिन फिर उन्हें दिल्ली 6 में बुआजी का किरदार निभाने का मौका मिला. लेकिन वे खुश थीं कि उनके किरदार को काफी पसंद किया गया था.
अनुष्का शर्मा - 3 इडियट्स
यह बात तब सामने आयी जब फिल्म पीके की शूटिंग के दौरान अनुष्का ने राजू हिरानी से यह बात शेयर की कि उन्होंने फिल्म 3 इडियट्स के लिए आॅडिशन दिया था. उस वक्त उनका फिल्मी करियर शुरू नहीं हुआ था. राजू हिरानी भी यह बात सुन कर बहुत चौंक गये थे. यहां तक कि फिल्म के एक दृश्य में राजू हिरानी ने अनुष्का के पोस्टर्स भी इस्तेमाल किये हैं. लेकिन राजू इस बात से अवगत नहीं थे.चूंकि उन्होंने हजारों लड़कियों का आॅडिशन लिया था. अनुष्का ने खुद स्वीकारा कि यह उनके लिए बड़ी उपलब्धि है कि जिस फिल्म के लिए उन्होंने आॅडिशन दिया, लेकिन उनका चयन नहीं हो पाया ाथा. उसी निर्देशक के साथ उन्हें अब काम करने का अवसर प्राप्त हुआ.
मुन्नाभाई एमबीबीएस-आर माधवन
राजू हिरानी की कभी इच्छा थी कि वे आर माधवन के साथ मुन्नाभाई एमबीबीएस का टेलीविजन सीरिज बनायें. लेकिन आर माधवन ने यह आॅफर ठुकरा दिया था तो बाद में राजू हिरानी ने इस फिल्म से अपने करियर की शुरुआत की. फिल्म में संजय दत्त ने लीड किरदार निभाया.

अपने लिए माइलस्टोन खुद तय कर रही : प्रियंका चोपड़ा


फिल्म बाजीराव मस्तानी में प्रियंका चोपड़ा ने शीर्षक किरदार नहीं निभाया था. लेकिन उन्होंने अपने किरदार काशीबाई से साबित कर दिया कि काशीबाई नहीं होतीं तो बाजीराव मस्तानी की प्रेम कहानी पूरी नहीं होती. हाल ही में फिल्म जय गंगाजल का ट्रेलर भी जारी किया गया है, जिसमें वह अहम किरदार में हैं. प्रियंका इन दिनों भारत के साथ साथ विदेशों में भी अपने अभिनय का डंका बजा रही हैं. वे एक साथ कई विधाओं में काम कर रही हैं, लेकिन पूरे परफेक् शन के साथ. बाजीराव की सफलता से चहक रही हैं. 
फिल्म बाजीराव मस्तानी को जिस तरह से प्यार मिल रहा है और फिल्म में काशीबाई के किरदार में आपने जो जान डाली है. आपको किस तरह की प्रतिक्रिया मिल रही है लोगों से.
पहले तो मैं अपने फैन्स और दर्शकों की शुक्रगुजार हूं. मैं हमेशा से जानती थी कि काशीबाई के किरदार को दर्शक जरूर सराहेंगे.काशी बहुत स्पेशल कैरेक्टर है. इसलिए मैंने हां भी कहा. मैं पहली व्यक्ति थी कि जिसकी इस फिल्म में कास्टिंग हुई थी. मुझे याद है, मैं मैरी कॉम शूट कर रही थी. मनाली में. वहां आये थे संजय सर.मुझसे बातचीत करने के लिए.काशी की सबसे खूबसूरत बात यह है कि कहानी बाजीराव और मस्तानी की है. लेकिन इतिहास काशी को भूल गया है.क्योंकि उस दौर में बाजीराव और मस्तानी की कहानी सेंशेनल थी. इंटर रिलीजन थी तो सभी ने उस पर ही ध्यान दिया. किसी ने सोचा ही नहीं कि उस बीवी का क्या हुआ होगा. क्रेडिट टू संजय सर कि उनके लिए काशी का किरदार तय करना सबसे पहले जरूरी है. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं सबसे पहले इस किरदार को तैयार करना चाहता हूं.मेरे लिए झिलमिल का किरदार इस किरदार  से ज्यादा आसान था. जबकि उसमें बहुत वेरियेशन थे.मगर फिर भी काशी के किरदार सा कठिन था. चूंकि वह बच्ची सा किरदार था. उसने जिंदगी में सिर्फ राव से ही प्यार किया. बचपन से दोनों दोस्त थे.वह हमेशा राव राव करती रहती थी.राधा मां मां की तरह थी उसके लिए. और उसे शनिवाड़ वाड़ा में घूमना फिरना छोटी सी दुनिया में रहना पसंद था. जब तक मस्तानी उसकी जिंदगी में नहीं आती है. काशी का दिल भी बच्चे सा ही था.लेकिन इसके बाद उसकी जिंदगी अचानक से मैच्योर हो जाती है. यह कठिन इसलिए भी था कि संवाद बहुत नहीं थे फिल्म में मेरे लिए. वह सबसे बड़ा चैलेंज था. मोनोलोग करना आसान होता है. बिना कहे उस बात को बयां करना  बहुत इंटरेस्टिंग था.और यह आज की दौर की महिलाओं के साथ भी होता है. तो वह तो फिर भी 1700 का दौर था.तभी भी काशी ने उस वक्त राव को कहा कि तुम जाओ. लेकिन आज भी कितनी समाज के दबाव में कुछ नहीं कर पातीं.उनके पास आवाज नहीं होतीं. काशी की आवाज मेरे ख्याल से उस औरत को आवाज देती है, जिसके पास आवाज नहीं है. मेरे लिए वह बहुत जरूरी था. और यह फिल्म देखने के बाद मेरे पास ऐसे ऐसे लोगों के फोन आये हैं, जिनसे मैं मिली नहीं हूं कभी. कितनी पत्नियों के फोन आये हैं कि आप सही हैं ऐसे सिचुएशन में हमको सोचने के लिए कुछ दिया.और मैं खुश हूं कि मैंने कोई ऐसा कैरेक्टर जिया जो मुद्दे को एड्रेस करता है.
लेकिन क्या आज के दौर में काशीबाई सा दिल होना संभव है?
मैं मानती हूं कि मस्तानी की क्या गलती थी. काशी तो मस्तानी को जानती भी नहीं थी.गलती आदमी की है. काशी फिल्म में कहती है कि तुमने मेरा गुरुर छीना तो होना यही चाहिए कि उस लड़की को दोष मत दो. अपने पति से पूछो.मैं साधारण हूं. एक महिला के लिए उसका गहना उसका सेक्ररिफाइस नहीं होता है. उसका गुरुर होता है.यह डबल स्टैंडर्ड की बात है. मैं वैसी फेमिनिस्ट हूं कि सिर्फ पुरुष को गलत समझूं. मेरा मानना है कि आप जिसके साथ हो. उसके साथ खुश रहो. हां, मगर मेरा जो सम्मान है. मुझे दो जिसकी मैं हकदार हूं. मेरा मानना है कि आप अपना सेल्फ रिस्पेक्ट मत खो.वह  अंत तक पेशवर रही. यहां तक कि इतिहास भी गवाह है कि काशीबाई ने ही मस्तानी के बच्चे शमशेर को पेशवर की तरह तैयार किया.मराठा वॉरियर बनाया. यह काशीबाई था.
मस्तानी के साथ वाकई में हुआ वह इतिहास था. लेकिन अगर दर्शक के रूप में बात की जाये तो जो मस्तानी के साथ हुआ क्या वह सही था. आपका इस पर क्या नजरिया है?
मेरा मानना है कि मजहब के ऊपर से वॉर क्रियेट होते हैं.उन सबके खिलाफ हूं. जिसको बचपन से सिखाया गया है कि सभी धर्म के लोग एक हैं.मैं बिलिव नहीं करती कि कोई भी प्रेम मजहब से छोटा है. मजहब के नाम पर होनेवाली तमाम चीजें मुझे पसंद नहीं हैं. हम इंसानीयत को भूल जाते हैं. बाजीराव मस्तानी मुझे लगता है कि उस लिहाज से प्रोगेसिव फिल्म है, जब बाजीराव बोलता है कि ठीक है आप इसे मराठा नहीं मानेंगे तो मैं इसे मस्तानी का ही मजहब दूंगा. शमशेर बहादूर नाम रखूंगा. और काशी ने भी जाकर मस्तानी से कहा कि तुमने तय किया है कि तुम यहां आयोगी तो लोग तुमसे बातें कहेंगे. लेकिन मजहब की बात अब भी बहुत रिलेवेंट है. पूरी दुनिया में बुरे हालात हैं. इंसान को क्या हो गया है. पता नहीं. संजय सर ने कहानी दिखाते दिखाते इन सारी बातों को कहा है.
आपने किस तरह से काशीबाई के किरदार के लिए तैयारी की थी?
मैं महाराष्टÑ में काफी वक्त से हूं. मेरे कई दोस्त हैं जो महाराष्टÑ से हैं. उनके बीच रही हूं मैं. मेरी पूरी टीम को खुशी थी कि वह काशीबाई का मेकअप करेंगी. चूंकि वे भी महाराष्टÑ से हैं. मेरी हेयरस्टाइलिश, मेरी मेकअप आर्टिस्ट सभी.बहुत इंटरेस्टिंग चीजें हमने की भी, साड़ी मैं दो घंटे में पहनती थी. क्योंकि उस जमाने में जिस तरह से औरतें साड़ियां पहनती थीं. जैसे राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स आप देखें तो उससे आपको रेफरेंस मिलता है. मेरे बाल में एक भी इलेक्ट्रॉनिक आॅब्जेक्ट इस्तेमाल नहीं किया गया है. हाथ से मेरी हेयर ड्रेसर प्रियंका कर्ल करती थी. डेढ़ घंटे लगते थे उसको.ताकि वह ओथेंटिक लगे. मेरी जो बिंदी थी. मेरे मेकअप आर्टिस्ट थे वह मेरी बिंदी हाथों से पेंट करते थे. चूंकि उस जमाने में बिंदी चिपका नहीं सकते थे. तो ऐसी डिटेलिंग डाली है. मेरी आंखों का कलर ऐसा रखा है, जो ब्राह्मणी महाराष्टÑीयन का होता है. वर्षा उधगांवकर जैसा. बहुत प्यार से संजय सर ने इस किरदार को रचा है. और क्रेडिट सुदिप्ता को जाता है.
फिल्म का शीर्षक किरदार आपने नहीं निभाया है. मगर फिर भी सारी तारीफें इस किरदार के लिए आपको मिल रही हैं. दीपिका से हो रही आपकी तूलना के बारे में क्या कहेंगी?
मुझे लगता है कि मैंने जब से अपना फिल्मी करियर शुरुआत किया है. ऐतराज से लेकर अब तक मैंने कई दो अभिनेत्रियों वाली फिल्मों में काम किया है और यह तूलना तो होती ही आयी है.मैंने हमेशा इन बातों को अहमियत दी है कि मैं फिल्म में अच्छी हूं. लेकिन फिल्म अच्छी नहीं है. तो फिर मेरे अच्छे होने का क्या फायदा. मुझे कभी भी मेरे करियर में बैड रिव्यूज नहीं मिले हैं. कुछ फिल्मों को छोड़ कर. सबसे बड़ी बात है कि सबलोग के योगदान से फिल्म बनती हैं. मैं काशी नहीं बन पाती अगर दीपिका मस्तानी नहीं होती. जिसका नाम क्रेडिट पर होता है. फिल्म उसी की होती है. चाहे जितने लोग के नाम आये हों बोर्ड पर. लेकिन दीपिका और रणवीर ने ही उसे जिया है. तो यह उनकी कहानी है. यह शुरू से पता था. मुझे लगता है कि सबका कंट्रीब्यूशन से फिल्म बनी. संजय सर ने काशी के किरदार को बहुत इज्जत दी है.उन्होंने तीनों के कंफ्यूजड रिलेशन को रेशम की तरह ट्रीट किया है.
प्रियंका, एक दौर में लगातार भारत को मिस यूनिवर्स, मिस वर्ल्ड जैसे खिताब हासिल हो रहे थे. खासतौर से जब आपने यह खिताब जीता था. उस दौर में ऐश, सुष्मिता, लारा, डायना, दीया कई नाम थे. लेकिन अचानक से वह दौर खत्म होता नजर आ रहा है. कई सालों से भारत को यह खिताब नहीं मिल रहा. आपकी क्या राय है इस बारे में?
हां, इस बात को लेकर मैं भी कई बार सोचती हूं. मुझे भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर परेशानी क्या है. क्यों ऐसा हो रहा है. चूंकि मैं चयन कमिटी में हूं भी नहीं, ब्लेकिन मुझे यह नहीं लगता कि किसी में भी कोई कमी हैं और टैलेंटेड लड़कियां नहीं आ रहीं. मुझे ऐसा लगता है कि कमी रह रही है कहीं और.  और इस बारे में गंभीरता से सोचा जाना बहुत जरूरी है.
विदेश में भी आपके शो को काफी लोकप्रियता मिल रही है? अब आगे क्या?
मैं खुद नहीं जानती कि अब आगे क्या करूंगी. लेकिन इतना तय है कि मेरी प्रतियोगिता अब मुझसे खुद से है. मुझे दूसरों का नाम देखने की फुर्सत ही नहीं है. मेरे पास वक्त ही नहीं है. मैं अपने लिए माइलस्टोन खुद ही तय करते जा रही हूं और एक एक कर अपने ही माइलस्टोन को तोड़ती जाऊंगी. यही कोशिश है.