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20151230

प्रेम रतन धन पायो की लॉन्चिंग


सलमान खान और सूरज की एक बार फिर से वापसी हुई है।फिल्म का फर्स्ट लूक हाल मैं ही जारी किया गया है।सलमान ने इस दौरान कहा कि उन्होंने अबतक जितने भी निर्देशकों क साथ काम किया है  उनमे सूरज की जगह बिल्कुल अलग है। और वे दुनिया मैं उनकी इज्जत सबसे ज्यादा करते हैं। इसकी वजह यह है कि आप जब उनकी फिल्म को देखकर थियेटर से निकलते हैं आप अपना सिर्फ मनोरंजन करके नहीं लौटते बल्कि आप एक अच्छे इंसान बनकर निकल रहे होते हैं। इनकी फिल्मों में वह बात होती है। सलमान इसकी लांचिंग के दौरान काफी भावुक भी थे। इससे स्पष्ट होता है कि वे अपने पहले निर्देशक के कितने करीब हैं।इस दौरान एक खास बात और हुई कि इस फिल्म की लौन्चिंग के दौरान सूरज ने सबसे पहले अपनी फिल्म के तकनिशियों को स्टेज पे सम्मनित किया। क्योंकि सूरज मानते हैं कि वे परिवार क लिए फिल्में बनाते हैं और ये सभी उनके परिवार का हिस्सा है। अनुपम खेर ने इस दौरान एक खास बात बताई कि कई सालों पहले सूरज सारांश क सेट पे एक असिस्ट की भूमिका मैं थे। और उन्होंने जब उन्हें कहा कि जाओ मेरी फाइल लेकर आओ। उस काम को भी सूरज ने काफी अच्छे से किया था। और आज तीस सालों क बावजूद आज व उसी शिद्दत से काम करते हैं।एक खास बात यह भी रही कि इस दौरान सूरज पूरे परिवार क साथ थे। इस ग्लैमर की दुनिया मैं जिस तरह सूरज और सूरज क परिवार ने शालीनता बरकरार रखी है। दरअसल यही हक़ीक़त है कि सूरज ने शुरुआती दौर से लेकर अबतक सूरज उन निर्देशकों मैं से एक हैं जो आज भी पारिवारिक मूल्यों क साथ खुश हैं  संतुष्ट हैं। एक बार फिर एक नई कहानी लेकिन अपने पुराने प्रेम के साथ हैं। सूरज खुद मानते हैं कि वह खुद इस खोज मैं हैं कि इतनी भागदौड़ के बावजूद किस तरह उस प्यार की मासूमियत बरकरार रखना जरूरी है। उम्मीद है की दर्शको को फिर से वही प्यार और मासूमियत देखने को मिलेगी

20151223

मेरे पिता व मुगलएआजम को ट्रीब्यूट है बाजीराव मस्तानी : संजय लीला भंसाली


संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी दर्शकों को लुभा रही है. धीरे धीरे बॉक्स आॅफिस पर बाजीराव मस्तानी का इश्क गहरा होता जा रहा है.जाहिर है इस बात से फिल्म के निर्देशक भंसाली बहुत खुश हैं. आखिर उनका 1 2सालों का सपना साकार हुआ है. भंसाली की फिल्में देखते वक्त दर्शक अलग दुनिया की सैर कर रहे होते हैं और भंसाली की यही चाहत भी होती है. अपनी फिल्म मेकिंग की शैली, किरदारों से उनके प्रेम व कई पहलुओं पर उन्होंने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.

आपने एक सपने को 12 साल तक जिया है. 12 साल पहले देखा गया सपना बाजीराव मस्तानी के रूप में जब बड़े परदे पर साकार हुआ तो पहली बार जब आपने पूरी फिल्म परदे पर देखी तो वह अनुभूति कैसी थी?
बिल्कुल आंख भर जाती है. रुह भर जाती है.क्या क्या गुजरा इस फिल्म को बनाने में.मैंने कितना स्ट्रगल किया. 12 साल में मैंने कितनी बार शुरू की यह फिल्म. तीन बार शुरू की. तीनों बार बंद हुई.तो अंतत: जब वह साकार हुआ तो खुद पर भी भरोसा हुआ कि मेरे अंदर वह ताकत है, जो ठाना, जो सोचा वह करके दिखाया.और इससे ज्यादा खुशी है कि दर्शक इसे प्यार दे रहे हैं.मैं इस वक्त बहुत इमोशनल हूं. मेरे पिताजी का यह ड्रीम था कि मैं कभी मुगलएआजम जैसी फिल्म बनाऊं.उन्होंने मुझे कुछ 18 बार मुगलएआजम दिखायी थी.उसमें 15 बार उन्होंने खुद उठायी थी. यह फिल्म सिर्फ मुगलएआजम को ट्रीब्यूट है. यह फिल्म मेरे  पिता की ड्रीम को ट्रीब्यूट है. वह मुझे हमेशा कहते थे कि देखो फिल्में बननी चाहिए तो मेहबूब खान साहब,  के आसिफ साहब, गुरुदत्त साहब, वी शांताराम साहब, बिमल रॉय, राजकपूर साहब ये सारे फिल्मों के गुरु होते हैं और खासतौर से वी शांताराम, राज कपूर गुरुदत्त और के आसिफ के फैन थे.ये जो देख देख कर मैं बड़ा हुआ हूं. और जब मैं पहली बार बाजीराव मस्तानी को पूरी करने के बाद फिनिश्ड प्रोडक्ट बड़े परदे पर देख रहा था तो मुझे यह बात महसूस हुई कि कुछ हद तक मैं इन सारी फिल्मों का अच्छा स्टूडेंट साबित हुआ हूं. कहीं न कहीं उन्हें सही रूप में ट्रीब्यूट दे पाया हूं. उनकी लेगेसी को कायम रख पाया हूं. वह लीगेसी बॉलीवुड सिनेमा में रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि वह हमारा कल्चर है. क्लासिकल, आर्किटेक्चर यह सब हमारी फिल्मों में दिखनी ही चाहिए. हमें इन धरोहरों को भूलना नहीं चाहिए.और लोग कैसे इसे स्वीकार रहे हैं. इस बात से यह साबित होता है कि दर्शक सिर्फ कर्मशियल फिल्में और सिर्फ टाइम पास फिल्में नहीं चाहते. उन्हें भी मिनिंगफुल सिनेमा चाहिए. तो ये इन सारी बातों से मैं टच्चड हूं. जितने सालों से मैं इस फिल्म से जुड़ा था. काम कर रहा था. लगा कि सबकुछ मुझे वापस मिल गया. मैं पिछले 25 सालों से जुड़ा हूं इस इंडस्ट्री से.इतने सालों में मुझे इस फिल्म ने जितना सुकून दिया है. मैं उसे सिर्फ महसूस कर सकता. शब्द नहीं दे सकता.
आपने जैसे कि कहा कि आप वी शांताराम, गुरुदत्त जैसे फिल्ममेकर और उनकी फिल्मों के स्टूडेंट रहे हैं. लेकिन जब आप खुद फिल्म बना रहे होते हैं तो किस तरह कोशिश होती है कि उनसे प्रेरणा ली जाये. नकल न किया जाये?
यह बहुत जरूरी है. मेरा मानना है कि आप कितना भी अपने गुरुजन से सीखो. लेकिन आपकी खुद की पहचान बहुत जरूरी है.आप मेरा म्यूजिक सुनेंगे और देखेंगे तो महसूस करेंगी कि मेरे म्यूजिक में लक्ष्मीकांत जी की म्यूजिक की बहुत छाप है.और उनका म्यूजिक मुझे बहुत पसंद है. लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि मैं उनका गाना उठा कर कॉपी करूंगा.एक एशेंस लूंगा. इंस्पेरेशन लूंगा. और अगर आपको खुद कुछ कहना है किसी फिल्म में. आपके पास खुद बहुत कुछ कहने की चीजें हैं तो उसका अपना तरीका होता है. मैं कभी के आसिफ साहब को कॉपी नहीं करूंगा, मैं क्या उन्हें तो कोई भी कॉपी नहीं कर सकता.वह एक थे और एक ही रहेंगे. लेकिन 55 साल के बाद मैं एक फिल्म बनाऊं और उसमें खुद की भी पहचान न हो.तो यह दुख की बात होगी. लेकिन मुझे लगता है कि कहीं न कहीं उनकी रुह बहुत खुश होगी कि कोई फिल्म ऐसी आयी. जो उस वक्त उन्होंने सोचा होगा कि बिग सिनेमेटिक एक्सपीरियंस वह कहीं न कहीं थोड़ी ही सही लेकिन पूरी हुई है. तो इंस्पेरेशन होना एक फिल्ममेकर के लिए जरूरी है.मैं वी शांताराम जी से बहुत इंस्पायरड हूं. लेकिन मैं उनकी नकल कभी नहीं करूंगा. हां, मगर यह कोशिश होगी कि उनकी फिल्म की तकनीक क्या थी.प्रोसेस क्या था.वह एक इमोशन को कैसे प्ले करते थे. वह एक पोयेटरी गीतों में कैसे लाते थे. वह ट्रीटमेंट कैसे होती थी.तो वह बहुत जरूरी है. और वह सिग्नेचर मुझे लगता है कि सालों साल काम करने के बाद आता है. तब जाकर लोग कहते हैं कि यह इनका सिग्नेचर है क्योंकि उन्होंने आपका पिछला काम देखा होता है.25 साल से लोगों ने मेरा काम देखा है.तो लोग समझ जाते हैं कि यह भंसाली का सिग्नेचर है. और इस सिग्नेचर को पाने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी होती है.वहां तक पहुंचना पड़ता है.
आप जब फिल्मों के विषय का चुनाव करते हैं तो खुद को कनविन्स करना कितना कठिन होता है. चूंकि आप अपने विषय को लेकर भी बारीकी से सोचते हैं?
मुझे अब काम करते करते समझ आ जाता है कि मुझे कहां पहुंचना है. मेरी औकाद कहां तक है. मैं वहां तक सोचने और पहुंचने की कोशिश करता हूं अपनी क्षमता को देखते हुए.लेकिन जब तक वह न हो. मैं नहीं छोड़ता, क्योंकि वह मेरा फर्ज है. वो जो एक खुद से कमिटमेंट है कि मैं एक सेकेंड भी ऐसा दिखाऊं जो 100 सालों तक जिंदा रहेगी तो यह मेरा फर्ज है कि मैं जब फिल्म बना रहा हूं तो वह सब डिटेल, वह सब बारीकियां हों, जो एक फिल्ममेकर के रूप में होनी चाहिए.फिर उसमें पैसे  कितने बचेंगे नहीं बचेंगे, टाइम कितना बचेगा. एक्टरों के डेट का क्या होगा.वह सबकुछ नहीं सोचता.सर्चिंग फॉर एक्सेलेंस जो एक चीज है, और वत्त जो इंसान में होता है वही आपको आपके पोंटेशियल को लेकर आगे जाता है. जहां पर आपको लगता है कि वह आपका कांफीडेंस पोंटेशियल है. दरअसल, हर किसी में होता है. लेकिन हम खोलकर खुद को टैक नहीं करते.वह बहुत जरूरी है. अपने आप को स्ट्राइव करना, स्ट्रेच करना,जाना जरूरी है. मैं अपने एक्टर्स, तकनीशियन सबसे भी यही डिमांड करता हूं.परफेक् शन नहीं मिल सकता. लेकिन स्ट्राइव करना जरूरी है.
कनक्लूशन जरूरी नहीं है. सर्च जरूरी है.परफेक् शनिस्ट इल्युशन है. वह माया है. दूर से उसकी चमक सिर्फ दिखती है. आप वहांजाते हैं तो वह और दूर दिखती है. क्योंकि तलाश जरूरी है. इनरिचिंग उससे ही होती है.
आपकी फिल्मों में आंखों से भी संवाद बोले जाते हैं?
जी हां, क्योंकि मैं मानता हूं कि आंखों की भाषा एक अहम भाषा है.बाजीराव में भी आप देखें तो बहुत सारे साइलेंस मोमेंट हैं. जहां सिर्फ म्यूजिक चल रहा है और सिर्फ आंखों की भाषा है. लेकिन बाजीराव में मैंने संवाद अधिक रखे हैं, क्योंकि आपको उस ऐरा की बात इस दौर के आॅडियंस तक पहुंचानी है. और इसलिए यह जरूरी था कि मैं सही तरीके से, सही लहजे से फिल्मों के किरदार संवाद बोलें.संवादों से ही इतिहास लिखा जाता है, संवादों से ही कहानियां लिखी जाती हैं.स्पोकन वर्डस जरूरी हैं.मुझे लगता है कि लोगों को जो बात पसंद आ रही है वह किरदारों के तेवर हैं और जिस तरह से वह संवाद बोल रहा है. तो डॉयलॉग का इस फिल्म में खास महत्व रहा है. ऐसा मैं मानता हूं. और रामलीला में अधिक नहीं थी. क्योंकि रामलीला में फिजिकलैटी की अहम भूमिका थी.लेकिन यहां संवाद को ग्रेसफुल होना और पॉवरफुल होना जरूरी था इस फिल्म में. सो, इस पर विशेष काम किया है मैंने.
आप जिस इंटेंस के साथ फिल्मों का निर्माण करते हैं. आपकी फिल्मों के किरदार दर्शकों के साथ लंबे समय तक रहते हैं. लेकिन बतौर फिल्मकार जब नयी कहानी सोचते हैं तो वे किरदार आपके साथ होते हैं या फिर आप उन्हें छोड़ आगे निकलते हैं?
मेरे दिल में मेरे हर किरदार के लिए एक स्पेशल जगह है. वे मेरे साथ मेरी जिंदगी में होते हैं. लेकिन वे मुझ पर हावी नहीं होते. जब मैं कोई नयी कहानी लिख रहा होता हूं. मेरी कोशिश होती भी नहीं कि मैं उसके अंदर पुराने किरदारों को लेकर आऊं या उसकी छाप लेकर आऊं.हम दिल चुके सनम की नंदिनी देवदास की पारो कभी नहीं बन सकती. दोनों जबकि ऐश्वर्य ने ही प्ले किया था.लीला की दीपिका का बॉडी लैंग्वेज और मस्तानी का बॉडी लैंग्वेंज अप्रोच, थॉट प्रोसेस, उसका एट्टीटयूड, कॉस्टयूम सबकुछ अलग होता है. रामलीला के दो एक्टर दीपिका रणवीर के सिवा रामलीला और बाजीराव मस्तानी में आपको कुछ भी एक नहीं दिखेगा.मेरी खुद की स्टाइल अलग है.
काशीबाई का किरदार गढ़ना कितना कठिन था?. प्रियंका कम दृश्यों में आयीं. लेकिन वह प्रभावित करती हैं.
प्रियंका को इस किरदार के लिए मनाना कठिन था. प्रियंका को ऐसा लग रहा था कि कहीं मैं सपोर्र्टिंग एक्ट्रेस न लगूं.नाम भी फिल्म का बाजीराव मस्तानी है तो मेरा इसमें क्या होगा?ऐसे सवाल थे उनके मन में. लेकिन अच्छा एक्टर फिल्म में लेंथ और सीन नहीं देखता. उसके पांच सीन 50 के बराबर हैं.वह तो कमाल की एक्ट्रेस हैं ही. सो, मैंने उन्हें भरोसा दिया. उन्होंने मुझे. मझे पता था कि पांच सीन में भी वह जमावदार एक्टिंग करके जायेंगी. और प्रियंका में वह रूप भी था. फ्लेक् शबिल्टिी भी थी. वह जो रियेक् शन था काशीबाई का, उसका ग्रेस सबकुछ प्रियंका में था. काशीबाई का किरदार देखिए तो सबसे कठिन था कि वह पति को बांध भी नहीं रही. उसकी खुशी भी जानती है तो उसे मुक्त भी कर रही और नाराजगी भी दिखा रही कि तुम इस कमरे में मत आना.यह एक रिवोल्यूशनरी स्टेप था कि जो रिश्ता खत्म है. उसको बांध कर क्या रखना. लेकिन उसे कमरे में भी मत आने देती वह डिग्नीटी रखती है अपने लिये. तो यह स्ट्रांग कैरेक्टर था. आप उस दौर में सोचें और फिर काशीबाई के बारे में सोचें. उसके लिए इज्जत और बढ़ जाती है.
आपकी फिल्मों में रंग, लाइट और वक्त भी एक किरदार होता है?
मैं कभी ऐसा कुछ विचार करके तय नहीं करता. मुझे स्पोनटेनियस खयाल आता है.एक नेचुरली जो चीजें प्रो होती हैं वह नेचुरल दिखती हैं.मैं कॉस्टयूम भी एनलाइज नहीं करता. उठा कर तय कर लेता हूं. आॅन सेट, मेरे कॉस्टयूम, मेरे आर्ट डायरेक्टर सबके साथ मिल कर तय करता हूं. स्टडी करके करूंगा तो एक्सपेरिमेंट नहीं कर पाऊंगा. 

बाजीराव का क्लाइमेक्स जिंदगी का सबसे कठिन दृश्य : रणवीर

रणवीर सिंह को बाजीराव मस्तानी से एक बड़ी सफलता मिली है. वे बेहद खुश हैं. फिल्म की सफलता का श्रेय वह अपनी मेहनत को देते हैं. 

 रणवीर, सबसे पहले आपको बधाई. अब तक बेस्ट कांप्लीमेंट किससे मिला?
मुझे अब तक का बेस्ट कांप्लीमेंट अमिताभ बच्चन सर से मिला  है. हम सभी यंगस्टर्स में अब इस बात की चर्चा होती है कि किसे मिला है उनसे लिखा हुआ खत. मुझे मेरी जिंदगी में जितने भी अवार्ड मिले हैं. उनमें यह अवार्ड हमेशा खास है. अमिताभ सर ने मुझे लेटर भेजा है और मैं उसे फ्रेम करा कर घर में नहीं बल्कि एक बैंक में रखता हंूं. क्योंकि वह मेरे लिए प्रीशियस है. उससे बढ़ कर कुछ नहीं है. वह बहुत बड़ा अवार्ड है . इसलिए वह मेरे लिए बड़ा धन है. मैं उसे संजो कर रखना चाहता हूं. 
फिल्म का सबसे कठिन दृश्य कौन सा रहा आपके लिए?
मेरे लिए फिल्म का अंतिम दृश्य बहुत कठिन था. बहुत अधिक कठिन. जिसमें बाजीराव अपने प्राण छोड़ते हैं. मेरी हर फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद मेरी मां बहुत रोती हैं, क्योंकि मेरी लगातार कुछ फिल्मों में मेरा किरदार मर जाता है और मां उसे बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं. लूटेरा में भी उसे गोली लगती है और अंत में जब वह मरता है तो मैं उस दृश्य को खुद ही नहीं भूल पाता हूं. मुझे याद है. जब मैं फिल्म की शूटिंग खत्म भी कर चुका था तब भी लूटेरा का किरदार मेरे से अलग नहीं हो पाया था. मैं बहुत इंटेंस जाकर कोई भी किरदार निभाता हूं क्योंक़ि. मैं रात रात में जग कर बैठ जाता था. मैं खुद से डर जाता था. मुझे उस वक्त भी सपने आते थे कि मुझे अलग अलग तरीके से गोली लग रही है. और मैं तीन बजे पसीने पसीने हो जाता था. तो मुझ पर मेरे किरदारों का गहरा असर होता है. मैं एक ऐसा एक्टर हूं जो कनविक् शन पैदा करने के लिए एकदम किरदार में घुस जाता हूं. और इस वजह से मुझे बाद में परेशानी होती है. कुछ ऐसा ही बाजीराव के अंतिम दृश्य में भी हुआ था. मैंने पूरी फिल्म निकाल ली थी. लेकिन क्लाइमेक्स के वक्त मैं भंसाली सर को बोलता था कि सर मैं कैसे करूं. मुझे समझ नहीं आ रहा. मेरी रातों की नींद चली गयी थी. लेकिन तब मैं अपने एक पुराने गुरु जी के पास गया. शंकर वेकेंटेस्वर सर.वे आये थे मुंबई मेरी मदद करने के लिए. शंकर सर का थियेटर गुप्र है. जिसमें कल्की, ऋचा, गुलशन देविया ये लोग जुड़े हैं. उन्होंने मुझे वह सीन करने में मेरी मदद की. मैंने 11 दिन  में उस सीन को शूट किया था. और 12वें दिन मैं बिल्कुल ऐसा लगा कि अपना शरीर छोड़ चुका हूं. वह दृश्य मेरे लिए बिल्कुल यादगार दृश्य रहेगा. मैं जिंदगी में कभी नहीं भूल सकता. मैं रात को सो नहीं पाता था. मेरे लिए बहुत डरावना सीक्वेंस था. बतौर एक्टर खुशी है कि मैं कर पाया. लेकिन करने के बाद एक साल तक वह सीक्वेंस मुझे सताता रहा. मुझे पता है कि लोगों के दिल को वह सीन बहुत छू गयी है तो लग रहा है कि मेहनत पूरी हुई.
भंसाली सर के साथ काम करने का ंअनुभव कैसा रहा है?
अब मैं यह कह सकता हूं कि अगर भंसाली सर और किसी अभिनेता को लेकर फिल्म सोचेंगे या कास्ट कर लेंगे तो मैं बहुत हर्ट हो जाऊंगा. मुझे लगता है कि उन्हें जो चाहिए. उनकी जो डिमांड रही है. उसे मैंने पूरा किया है. भंसाली सर स्पानटेनियस काम कराते हैं. वे सेट पर कब मूड बदल लेंगे यह पता नहीं होता और न ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है. ऐसे में हमारी कोशिश हमेशा रही है कि मैं बेस्ट दूं. खुशी तब अधिक होती है जब भंसाली सर कहते हैं कि रणवीर उन अभिनेताओं में से हैं जिससे कुछ भी करा लो. वह कर देगा तो मैं यह सुन कर ही पागल हो जाता हूं. लगता है कि मेरी मेहनत रंग लायी है. भंसाली सर को क्या चाहिए वह समझ कर परफॉर्म कर पाना कठिन होता है. वह चौंकाते हैं अपनी सोच. अपनी कनविक् शन से. लेकिन उनके साथ बहुत कुछ सीखा है. बारीकी डिटेलिंग, थॉट प्रोसेस सबकुछ सीखा है.
आप अपने अभिनय में अपने किरदारों के लैंग्वेज पर भी अच्छा कमांड कर लेते हैं?
हां, एक्चुअली मैं इन चीजों को तवज्जो देता हंू. पहली बार मेरी फिल्म बैंड बाजा बारात में दिल्ली वाली हिंदी बोली थी. दीपिका भी कहती हैं कि मैं जब तेरे मिली एक साल के बाद तक तब तक यही सोचती थी कि तू दिल्ली का लौंडा है. तेरी हिंदी इतनी अच्छी थी. राम लीला में  खुद भंसाली सर श्योर नहीं थे. उन्होंने मुझे गुजरात भेजा फिर हम रीडिंग करेंगे. जैसे मैंने रीडिंग शुरू की. चार लाइन पढ़े. उन्होंने कहा यही है. पूरी पिक्चर में तू ऐसे ही बोलेगा. विद्या बालन जी ने मुझसे कहा कि वह राम लीला देखने के बाद मेरे किरदार को भूल नहीं पा रही हैं. उसके बोलने का तरीका नहीं भूल पा रही है. जब आपका इंटेंस इमोशन आ जाता है तो लहजा छूटने लगता है. लेकिन फिल्म में कहीं भी राम का लहजा नहीं छूटता. उन्होंने कहा कि यह कठिन होता है कि आप पूरी फिल्म में वह कंसीटेंसी बरकरार रख पायें.तो वह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी कि मेरे लहजे पर भी लोगों की तारीफ की. मेरी कोशिश होती है कि मैं बॉडी लैंग्वेज, लुक और लहजे में कंसीटेंसी रख पाऊं.भंसाली जी ने भी कहा था कि बाजीराव के वक्त कि यह तेरा स्ट्रांग पत्ता है कि तू लहजा अच्छा पकड़ता है. तो और कोई एक्टर कर नहीं पाता है. तो तू कर और फूल कमिटमेंट के साथ की. रामलीला में अब की हिंदी थी तो कठिन नहीं था.बाजीराव में उस दौर की हिंदी बोलनी थी तो कठिन था.लहजा पकड़ने में. प्रकाश कपाड़िया लिखते भी थे वैसे डायलॉग तो ऋषिकेश जी रहते थे हर संवाद को वह देखते थे कि मैं किस तरह से बोल रहा हूं.
अपने अब तक के सफर को किस तरह देखते हैं?
मैं बहुत संतुष्ट हूं. खासतौर से इस बात से कि पांच सालों में ही मुझे कितने अच्छे लोगों का साथ मिला है. मेरा जो सपना था कि मैं एक कलाकार बनना चाहता था. भगवान ने लाखों करोड़ों लोगों में से से मुझे चुना. आप सोचें कितने लोग होते हैं जो यहां आते जरूर हैं. लेकिन कामयाब नहीं हो पाते हैं. लेकिन मुझे मौका मिला. और इसलिए मैंने यह तय करके रखा है कि मैं मेहनत करता रहूंगा. हमेशा. कभी स्टारडम को अपनी मेहनत पर हावी नहीं होने दूंगा. चूंकि आदी सर ने मुझसे कहा था कि मैं मेहनत से ही आगे निकल सकता हूं तो मैं. तो मैं उसके साथ कभी भी क्रांप्रमाइज नहीं करूंगा. मेरी अगली फिल्म बेफिक्रे में भी अपने अंदर के कलाकार को नयी उड़ान देने की कोशिश करूंगा.

बच्चों की फैन फौलोइंग का मुरीद हूं : रोहित शेट्ठी


रोहित शेट्ठी की फिल्म दिलवाले हाल ही में रिलीज हुई है. बॉक्स आॅफिस पर फिल्म ने कई रिकॉर्ड तोड़े हैं. रोहित का मानना है कि वे अपनी सफलता से तब खुश होते हैं, जब बच्चे उनकी फिल्म देख कर खुश हों. रोहित की दिलवाले के साथ यह नौवीं शानदार सफलता है. 

रोहित आपकी यह नौवीं शानदार सफलता है. लगातार नौ फिल्में हिट देनेवाले निर्देशक फिलवक्त क्या महसूस कर रहे हैं?
मैं बेहद खुश हूं. यह नौवीं सफलता है. मुझे लगता है कि मेरी आॅडियंस फैमिली आॅडियंस है. और मैं उन्हें बहुत अधिक तवज्जो देता हूं. मैं मानता हूं कि यह एक बड़ी बात है कि हम फैमिली के लिए फिल्में बनाये. मैं कोई दावा नहीं करता. कोई उपदेश देने की कोशिश नहीं होती है मेरी. मैं यह भी नहीं कहता कि मेरी फिल्मों में कोई उपदेश है और मैं धमाल फिल्में बना रहा हूं. हां, मगर आॅडियंस की खुशी मायने रखती है. खास कर बच्चे मेरी फिल्मों के प्रशंसक हैं और इस बात से खुशी तो मिलती ही है. उनके लिए बहुत कम फिल्में बनती हैं. मैं ऐसा मानता हूं और मैं उन्हें ही केटर करता हूं और जब भी मेरी फिल्में आती हैं तो उन्हें पता होता है कि यह हमारे लिए फिल्म बनी होगी. और वह एक बड़ा सेगमेंट है. और मेरी ताकत भी. ऐसा मेरा मानना है. आप कभी बच्चों को लेकर जाइए फिल्म देखने और उनके रियेक् शन देखिए. वे अपनी ही दुनिया चुन लेते हैं किसी फिल्म से. उन्हें गाड़ियां उड़ाते वक्त अच्छा लगता है. वे खुश होते हैं और मुझे वही खुशी खुशी देती है.
लगातार सफलता से डर लगता है?
डर नहीं लगता है.लेकिन प्रेशर काफी बढ़ गया है. पहले इतना प्रेशर नहीं होता. अब सोशल मीडिया का प्रेशर बहुत ज्यादा है. वहां पल पल की खबर पहुंचती है. लगातार आपके बारे में लिखा जाता है. पहले फिल्म लगती थी. चल जाती थी. बात खत्म हो जाती थी.आजकल स्पेकुलेशन्स बढ़ गये हैं. रिलीज के पहले ही फिल्म तीन चार बार हिट और फ्लॉप हो जाती है. सो, वह एक प्रेशर तो बढ़ गया है.
आपका परिवार आपकी सफलता पर किस तरह प्रतिक्रिया देती है?
मेरी और मेरे परिवार के लोगों की अपब्रिंगिंग बहुत सामान्य रही है. तो घर में स्टारडम जैसी चीजें हैं ही नहीं. मैं खुद ही सफलता को हावी नहीं होने देता. चूंकि यहां कुछ भी परमानेंट नहीं हैं. सभी जानते हैं. घर वाले भी वैसे ही हैं. यह हकीकत है कि यहां दो फिल्मों की हिट के बाद ही लोगों का दिमाग खराब हो जाता है. लेकिन मैं यही कोशिश करता हूं कि अपना दिमाग खराब न करूं. फैमिली बस इतना जरूर करती है कि वह पोजिटिव रहती है. और हमेशा कहती है कि मेहनत करते रहना है.हम शायद ग्राउंडेंड हैं. इसलिए रियलिटी टच है. जो हमारी मिडिल क्लास आॅडियंस है या यूं कहें कि जो हमारी आम जनता है. वह भी रियलिटी और रियल लोगों को ही पसंद करती हैं.शायद मैं बनाता ही हूं इसलिए भी वैसी ही फिल्में. और देखने भी वही लोग आते हैं.
हमने आपके बारे में इंटरव्यू में पढ़ा था कि आप लगान जैसी फिल्में बनाना चाहते हैं. तो क्या वह सपना अब भी जिंदा है?
नहीं मैं बनाना नहीं चाहता हूं. मैंने कहा था कि मुझे लगान जैसी फिल्में पसंद हैं. मैं सिनेमा का तो प्रेमी रहा हूं. हर तरह का सिनेमा देखता हूं. सिर्फ हिंदी ही नहीं तेलुगू, तमिल आप कुछ भी पूछोगे तो मैं बता दूंगा. मैंने उनसे कहा था कि मुझे दूसरी तरह की फिल्में भी पसंद हैं और सभी दूसरी तरह की फिल्में बना भी रहे हैं. सिर्फ मैं ही एक तरह की फिल्में बना रहा हूं. और मैंने यह जरूर कहा था कि कभी वैसी स्क्रिप्ट मिली तो मैं जरूर बनाना चाहूंगा.
आपने यह भी कहा था कि आप गोविंदा के फैन हैं. लेकिन कभी गोविंदा को लेकर आपने किसी फिल्म की कल्पना नहीं की?
हां, यह हकीकत है कि मैं गोविंदा का फैन रहा हूं. कोई ऐसा विषय हो तो मैं जरूर लेकर उनको फिल्म बनाना चाहूंगा. गोविंदा हमारी कंट्री के फाइनेस्ट एक्टर हैं.मैंने कभी उन्हें आॅफर किया नहीं है. लेकिन मैं कभी न कभी करूंगा उनके साथ.
अपने कंटेमपररी निर्देशकों के बारे में क्या कहना है?
मैं हर तरह की फिल्में देखता हूं और अच्छे निर्देशकों की इज्जत भी करता हूं. मुझे तमाशा देखनी है. मैंने सुना है कि दीपिका और रणबीर ने बेहतरीन काम किया है. प्रतियोगिता जैसी कोई बात नहीं हैं. सभी काम कर रहे हैं और मुझसे अच्छी कर रहे हैं. मैं फिल्में देख देख कर ही सीखता हूं. मैं बाजीराव मस्तानी भी देखूंगा. दीपिका क्लोज फ्रेंड है और सुना है उन्होंने भी बहुत अच्छा काम किया है. 
आपके लिए फिल्मों की समीक्षा क्या मायने रखती हैं?
देखिए मुझे लगता है कि उन्हें जिन्हें मेरी फिल्में पसंद नहीं आती है. उनकी सोच अलग है. हो सकता है कि वह मेरी एक ही तरह की फिल्में देख कर तंग आ गये हैं.एक वजह यह भी है. हां, मैं यह कह सकता हूं कि मुझे जो पसंद है वह मैं करता हूं और मेरे आॅडियंस का भी सपोर्ट है. 
दिलवाले को लेकर काफी विरोध हुआ? यह सब कुछ परेशान करती है?
मैं मंडे तक का वेट करता हूं क्योंकि मंडे से सभी काम पर चले जाते हैं.उसको काउंटर करके फायदा नहीं है. मुझे लगता है कि अगर लोगों को फिल्म पसंद आ गयी तो वह फिल्म की कामयाबी है. जो भी अब तक बिजनेस हुआ है. तब हुआ है जब कई जगह फिल्म खुली नहीं है.राजस्थान में ओपन में हुई है. कई जगहों पर तो यह बिजनेस है. अब लोगों ने देखना शुरू किया है. सोशल मीडिया की दुनिया अलग है. रीयल जनता की दुनिया अलग है तो मुझे यकीन है कि लोग अब जाकर जरूर फिल्म देखेंगे हमारी. पारिवारिक आॅडियंस पर है भरोसा.
हर फिल्म से बतौर निर्देशक कितना सीखते हैं आप?
मैं मेहनत बहुत करता हूं. हम अपनी फिल्म में ही एक् शन में कॉमेडी में , कुछ न कुछ करता हंू. संजय मिश्रा, मुकेश तिवारी,पंकज त्रिपाठी को काफी पसंद किया लोगों ने. आम आदमी को यही चीजें पसंद होती हैं. कैरेक्टर्स बहुत होते हैं मेरी फिल्मों में.

20151219

परफेक्ट नहीं होता कोई भी रिश्ता : सोनाली

जिंदगी चैनल पर हाल ही में नये धारावाहिक की शुरुआत हुई है. आधे अधूरे आम टेलीविजन धारावाहिकों से हर लिहाज में अलग है. चूंकि शो में एक रिश्ते की अलग कहानी दिखाई जा रही है. जो चीजें परदे के पीछे होती आयी हैं. शो के निर्देशक अजय सिन्हा उसे सामने प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं. सोनाली निकम शो में लीड किरदार निभा रही हैं. 

सोनाली, यह आपका पहला शो है?
नहीं, इससे पहले मैंने क्राइम पेट्रोल काम किया है. इसके अलावा मैंने गोदभराई नामक शो किया है. मैंने एड फिल्मों में बहुत काम किया है.स्टार प्लस के ही एक धारावाहिक काली का पुर्नवतार में भी मैंने काम किया था. फिर शकुनतलम में भी काम किया था. थोड़ा है बस थोड़ा की जरूरत है नामक शो भी किया था. तो अब तक काफी शोज किये हैं. लेकिन यह शो बिल्कुल हट के है. इसलिए नहीं कि मैं इसमें लीड किरदार निभा रही हूं, बल्कि शो का कांसेप्ट ही एकदम अलग है. जिन रिश्तों की हम बात नहीं करना चाहतें, उन्हें छुपा कर रखते हैं. उन्हें खुले तरीके से पेश किया है अजय सिन्हा सर ने. इसलिए यह शो मेरे लिए बेहद खास है.
एक्टिंग करने का सपना हमेशा से था या फिर किसी खास पल में आकर एहसास हुआ कि अभिनय करना चाहिए?
सच कहूं तो मेरी कोई फिल्मी कहानी नहीं है. मैंने कभी ऐसा सोचा भी नहीं था कि अभिनय करूंगी. हुआ यों कि एक पारिवारिक मित्र की वजह से मुझे एक एड फिल्म में काम करने का मौका मिल गया. जब मैंने उसमें काम किया तो मुझे बहुत मजा आया था. एड करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि वहां का माहौल मुझे बेहद अच्छा  लग रहा है. मैं शूटिंग के सेटअप को देख कर बहुत खुश होती थी. वहां के सारे क्रियेटिव वर्क को देखना वह सबकुछ मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था. तो उस वक्त मैंने जाना कि मुझे किताबी कीड़ा नहीं बनना है. मैं क्रियेटिव फील्ड में जा सकती हूं.तो मैंने कोशिश करना शुरू किया. मेरी दोस्त ही जो कि एड फिल्में बनाती हैं, मैं उनके साथ जुड़ गयी. और फिर बिहाइंड द कैमरा मैंने काफी काम किया तो मुझे प्रोडक् शन का पूरा काम समझ में आ गया. मैंने पूरी तकनीकी जानकारी हासिल की.और उसके बाद मैं अभिनय से जुड़ गयी.
इस शो से जुड़ना कैसे हुआ?
मुझे प्रोडक् शन हाउस से कॉल आया था. उससे पहले मुझे थोड़ी भी जानकारी नहीं थी कि शो का कांसेप्ट क्या है. बस इतना पता था कि जिंदगी चैनल के लिए शो है. तो जैसे ही मैंने यह बात सुनी तो मैं खुश हो गयी थी. चूंकि मैं जिंदगी के सारे शोज देखती हूं और मेरी मां भी इस चैनल की फैन हैं तो उन्हें भी जब पता चला कि इस चैनल के लिए शो है तो वह खुश हो गयी थी.मुझे जिंदगी चैनल के शो उसके परफॉरमर और उसके आॅरा की वजह से देखना पसंद है.तो मुझे यकीन था कि मुझे भी इस शो में वह आॅरा तो जरूर मिलेगा. आप इस शो के गाने सुनें, प्रेजेंटेशन का तरीका देखें तो आप खुद मोहित हो जायेंगे. यह आपको अलग ही दुनिया में ले जाता है. यही वजह थी कि मैंने शो को हां कह दिया था.
शो में देवर और भाभी के रिश्ते को अलग आयाम से दिखाया जा रहा है. आप इस बारे में क्या राय रखती हैं और क्या किरदार निभाते वक्त कोई हिचक थी?
हां,बिल्कुल मैं झूठ नहीं बोलूंगी. एक बार मैं भी चौंकी थी. लेकिन जिस तरह अजय सर ने पूरा नैरेशन दिया. मुझे सोचने पर मजबूर किया कि आखिर इस तरह के रिश्तों की परतें क्या होती हैं. जिस तरह से सर ने प्रेजेंट किया है. वह बिल्कुल अलग है. सो, सच कहूं तो अब मेरा भी नजरिया इस तरह के रिश्तों को लेकर बदला है. इस तरह के रिश्ते को लेकर लोगों की जो समझ है और पहुंच है. उससे मैं अब इसे अलग नजरिये से देखने लगी हूं. मैंने जब अपनी मां को भी विषय बताया तो वह भी दो मिनट के लिए सोच में पड़ गयी थीं. लेकिन फिर जब मैंने उन्हें विस्तार से समझाया तो वह भी कनविन्संड हुईं. मेरा नजरिया बदला है इस शो ने. मुझे यह काफी चैलेंजिंग किरदार लगा और मैंने  तय किया कि मैं करूंगी यह किरदार. हां, मैं भी यह मानती हूं कि कोई रिलेशनशीप परफेक्ट नहीं होता. बस हमें उसके बारे में जानकारी नहीं होती. और हम उन बातों को छुपा कर रखने की कोशिश करते हैं. बस. इस शो में उसे उजागर करके दर्शकों के सामने लाने की कोशिश है ताकि लोग इस नजरिये से भी रिश्तों को समझें. एकदम से किसी को भी बुरा कह देना या क्रिटिसाइज करना या जजमेंटल हो जाना सही नहीं होता. यह शो यह साबित करेगा.
इस शो के लिए किस तरह से तैयारी की आपने?
मेरा प्लस प्वाइंट यह है जो कि सभी कहते हैं कि मैं किसी भी तरह से महाराष्टÑीयन नहीं लगती हूं, जबकि मैं मुंबई की पली बढ़ी हूं. सभी  कहते हैं कि मेरा लुक बहुत हद तक पंजाबी लड़कियों सा है. मैं अगर बातें भी करती हूं तो उसमें वह टोन नहीं आती तो अजय सर ने जब पहली बार बातचीत की तो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं पंजाबी नहीं हूं. तो मुझे लैंगवेज पकड़ने में अधिक दिक्कत नहीं हुई. इसके अलावा हमने काफी वर्कशॉप किया.
एक्टिंग के अलावा किन चीजों में दिलचस्पी है?
मुझे सोशल सर्विस करना पसंद है. मैं चाहती हूं िक मैं एक ऐसा रेस्टोरेंट खोलूं जहां फ्री में भूखे और जरूरतमंद लोगों को एक वक्त का खाना खिला सकूं. यह मेरा सपना है. 

जो कुछ हूं डांस की वजह से हूं : हेमा मालिनी


उन्हें कभी वक्त को बर्बाद करना पसंद नहीं. वे अपने गर्भवस्था के दौरान भी काम को ही तवज्जो दे रही थीं. खास कर क्लासिकल डांस को लेकर वे हमेशा सजग रही हैं और उनकी कोशिश रही है कि भारत में इसे खास पहचान मिले. नयी प्रतिभाओं को मौके मिले. अपनी संस्था जय स्मृति के माध्यम से उन्होंने नयी प्रतिभाओं को निखारा भी है.फिल्मों में क्लासिकल डांस के उन्होंने नये मुहावरे गढ़े हैं. जी हां, हम बात कर रहे हैं मशहूर अभिनेत्री हेमा मालिनी की. 
हेमा जी, जया स्मृति को लेकर आज भी आप काफी भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई हैं. कई नये टैलेंट्स को भी मौके मिले हैं. जया से जुड़े अपने अनुभव शेयर करें.
जैसा कि सभी जानते हैं कि मेरी मां काफी बड़ी आर्टिस्ट थीं, उनके पास कला का भंडार था. और वे डांस को लेकर बहुत सजग थी. वे इसे काफी गंभीरता से लेती थी.और वे हमेशा चाहती थीं कि उनके बच्चे भी इसमें पारंगत हों और उनके बच्चे हुए भी. मेरी मां की लीजेसी को मैं आगे लेकर चलना चाहती हूं और बरकरार रखना चाहती हूं और इसी वजह से हमें जया स्मृति की शुरुआत की थी. जया स्मृति के माध्यम से हम नये टैलेंट्स को बढ़ावा देते हैं. हर साल हम इसका बड़ा आयोजन करते हैं और परफॉरमेंस करवाते हैं. पिछले 2 सालों से ब्रेक आया था.लेकिन इस बार फिर से हम इसे गंभीरता से ले रहे हैं. खास बात यह है कि इस बार मंै परफॉर्म नहीं करूंगी न ही मेरी बेटियां करेंगी. हम नये लोग को मौके देना चाहते हैं. इस बार ओड़िसा के बेहतरीन कलाकार आ रहे हैं और मैं इस बात को लेकर काफी खुश हूं. मुझे अक्सर लोग कहते हैं कि आप डांस कीजिए. आप परफॉरमेंस दीजिए. मैं उन लोगों को समझाना चाहती हूं कि मैं आखिर कब तक करती रहूं. नये लोगों को बढ़ावा क्यों नहीं देना चाहते लोग़. मेरी कोशिश प्लैटफॉर्म देना है.
हेमाजी, आपकी चर्चा जब भी लोग करते हैं. आपकी खूबसूरती की चर्चा किये बगैर नहीं रह पाते. बतौर ड्रीम गर्ल आपके लिए खूबसूरती की क्या परिभाषा है?
मैं कभी नहीं बता सकती या बता पाऊंगी कि मेरी खूबसूरती का राज क्या है. हां, बस मेरे लिए ये बातें मायने रखती हैं कि मैंने अपनी जर्नी को बहुत अच्छे तरीके से जिया है. शायद मैं हमेशा खुश रही हूं. इस वजह से मेरे चेहरे पर चमक बरकरार रहती है. दूसरी बात यह भी है कि डांस ने मुझे खूबसूरत बनाये रखा है. मुझे लगता है कि मैं स्टार और कलाकार तो बाद में बनी. मैं सबसे पहले एक डांसर हूं और अगर डांस नहीं होता तो मैं भी कुछ नहीं होती. बिना डांस के मैं कुछ नहीं. सो, मेरी खूबसूरती का सारा श्रेय मेरी माताजी को जाता है, जिन्होंने हमेशा मुझे प्रेरित किया.
हाल में आप नानी बनी हैं. बेटी को जब मां बने देखती हैं तो अपने मातृत्व जीवन की यादें ताजा होती हैं?
जी हां, बिल्कुल. आज जब बेटी को मां बनते देख रही हूं तो लगता है कि जिंदगी में सबकुछ हासिल कर लिया है. मुझे अपने दिन याद आ जाते हैं. मैं जब मां बननेवाली थी पहली बार. तो मैंने गर्भावस्था के आठ महीने तक काम किया था. चूंकि मुझे घर पर बैठना पसंद नहीं था. मैं कभी काम से डिस्ट्रैक्ट नहीं हुई. मेरे निर्देशक इस बात से बहुत खुश रहते थे कि मैं समर्पित होकर काम करती थी. फिर मैं मां बनी. दो बेटियों की मां और इससे सुखद अहसास और कुछ नहीं हो सकता. अहाना ने एक दिन मुझसे कहा कि यह नर्स उसके बच्चे के साथ इतना रहती है. कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि उनका बच्चा अहाना से दूर होकर नर्स से अधिक करीबी हो जायेगा. तब मैंने उसे समझाया कि हर मां को ऐसा लगता है. मुझे भी लगता था. लेकिन मेरी मां ने भी मुझे यही समझाया था और मैं तुम्हें भी यही समझा रही हूं कि ऐसा कुछ नहीं होता. इसलिए इनसेक्योर होने की जरूरत नहीं. मैं अहाना के एहसास को समझ सकती. आखिर मैंने भी वह दौर देखा है. अहाना का बेबी मुझसे काफी क्लोज है. हर सुबह उसे देख कर मुझे बहुत खुशी मिलती थी. अब वह मुंबई अपने घर जा चुका है. 
क्लासिकल डांस को भारत में इन दिनों अधिक प्रोमोट नहीं किया जा रहा है?
इस बारे में आपकी क्या राय है?
हां, यह हकीकत है. और मुझे इस बात की बहुत तकलीफ है. पहले फिल्मों में क्लासिकल डांस दिखाये जाते थे. तो लोगों तक बात पहुंचती थी. लेकिन अब बिल्कुल नहीं दिखाये जाते. फिल्मों में आजकल बॉलीवुड नंबर के नाम पर अलग ही चीजें हो रही हैं, पता नहीं उस डांस को क्या कहते हैं. लेकिन विदेशों में लोग बॉलीवुड डांस को ही इंडियन डांस मान लेते हैं. तो मुझे काफी तकलीफ होती है. हम जैसे लोगों को आगे आना होगा, तभी क्लासिकल डांस बचा रहेगा. मैं इसलिए क्लासिकल डांसिंग के लिए इतना काम करती हूं और आगे भी कोशिशें जारी रहेंगी.

लकीर की फखीर नहीं तमाशा


फिल्म : तमाशा
 कलाकार : रनबीर कपूर, दीपिका पादुकोण
 निर्देशक : इम्तियाज़ अली
 संगीत निर्देशन : एआर रहमान 
 रेटिंग : 3 स्टार

 इम्तियाज़ अली की फिल्म तमाशा का दर्शकों को लंबे समय से इंतज़ार था। इम्तियाज़ की यह फिल्म एक कहानी और कहानीकार की कहानी है। या यूं कहें तो कहानियों से घिरी कहानियां हैं,जिसका नायक वेद है।उसे जिंदगी में खुद की तलाश है। वह एक रोबोट बं चुका है और वही करता है जो उसे कमान मिलती है। लेकिन इसी दौरान वह कोसिका पहुंचता है। जहां वह अपने तरीके से जिंदगी जीता है। और तारा से टकराता है।दोनों तय करते हैं कि वे आपस में नाम य बोरिंग  बातें नहीं करेंगे और एक दूसरे को सच नहीं बताएंगे। वे सात दिन उनकी जिंदगी के अहम दिनों में से एक हो जाता है।तारा उसी कॉसिका वाले व्यक्ति के प्रेम में पड़ जाती है। और फिर कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन अगर आप यह सोच रहे हैं कि कहानी बस यही है तो आपका अनुमान गलत है। इम्तियाज़ की इस फिल्म के पोस्टर पर ही उन्होंने स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया है कि वाय ऑलवेज द सेम स्टोरी। तो जाहिर है कि एक सी ही लव स्टोरईस फिल्म में नजर आयी है। दरअसल इम्तियाज़ इस पंक्ति से यह साबित करने की कोशिश नहीं कर रहे कि हिन्दी फिल्मों में क्यों हमेशा एक ही प्रेम कहानी होती है, यहां वे जिंदगी की बात कर रहे हैं कि क्यों हमारी जिंदगी में एक सी मीदियोकर बनकर रह जाती है।साथ ही वे यह भी स्पष्ट करते चलते हैं कि हीर रांझा, लैला मजनू सारी कहानियां एक सी क्यों है। इम्तियाज़ की इस फिल्म का नायक भी हीर की तलाश में है। लेकिन उसे पता नहीं है कि उसे हीर की ही तलाश है।   इम्तियाज़ की फिल्म में राधा और मीरा भी जरूर होती हैं जो अपने कृष्ण के प्रेम में पागल है। यह इम्तियाज़ की खूबी है कि वे अपने किरदारों को और कहानी के ट्रीटमेंट को अलग तरीके से दर्शाते हैं। इस फिल्म के शुरआती दृश्यों में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया है। कि वह किस तरह की कहानी कहना चाहते है। इम्तियाज़ इस बात मैं माहिर हैं और उनकी फिल्मों में उनके मास्टर स्ट्रोक बखूबी नजर आते हैं। दृश्यों को देखकर। फिल्म में गाने बेवजह ठू से नहीं गए हैं वह फिल्म में किरदार की तरह चलते हैं। हम किसी कहानी की तरह इस कहानी के बचपन से लेकर जवानी तक की कहानी देखते हैं। हम देखते हैं कि एक लड़का है जिसे कहानी सुनना सुनाना पसंद है। इम्तियाज़ की फिल्मों के नायक में उनकी पिछली फिल्मों के नायक की झलक भी जरूर नजर आती है। वेद में भी जॉर्डन और लव आजकल वाले किरदार की झलक है। लेकिन उन्होंने वेद की कहानी कही अलग तरीके से है। इम्तियाज़ की फिल्मों में सूफियाना अंदाज़  गाने और कहानी दोनों में ही नजर आता है और यही उनकी फिल्मों की खूबी भी है कि उनकी फिल्में किसी से प्रभावित नजर नहीं आती। इस बार जो कमियां नजर आयीं वह यह कि वेद तारा आम होकर भी पूरी तरह से कनेक्ट नहीं कर पाते। हम वेद के साथ होते हैं लेकिन उसे साथ लेकर नहीं जा पाते थियेटर से बाहर। रणबीर कपूर और दीपिका की जोड़ी को पसंद करने वाले दर्शकों के लिए भी अफसोस यह कि दोनों साथ स्क्रीन पर कम नजर आये। जिस तरह वेद की कहानी उसके किरदार पर ध्यान दिया गया है। तारा की कहानी व किरदार मैं विस्तार नहीं है। दरअसल यह वेद की कहानी है और तारा के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाया गया है। रणबीर कपूर की यह खूबी रही है कि वह किरदारों को जीते है।हां वेद इसबार रॉकस्टार नहीं है। लेकिन उन्होंने अपना बेस्ट दिया है। दीपिका के पास दृश्य कम हैं। लेकिन वे प्रभावित करती हैं। इम्तियाज़ इस फिल्म से उनलोगों को एक राह देते हैं कि बेमर्जी के काम में  जिंदगी व्यर्थ करने से बेहतर है कि फिजूल की जिंदगी जियें और खुश रहें। और आपकी कहानी कोई नहीं लिख सकता सिर्फ आप ही उसका अंत लिखने के हकदार हैं। फिल्म का गीत संगीत कर्णप्रिय है।  हां यह भी हकीकत है कि इम्तियाज़ की यह फिल्म लकीर की फकीर नहीं है और वह अपनी फिल्म से भी यही साबित करना चाहते हैं कि ज़िन्दगी को भी लकीर का फकीर न बनाएं

रंग भेद और अभिनेत्री

अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता बच्चन ने हाल ही में एक आलेख के माध्यम से अपनी बेटी नाव्या की जिंदगी के अहम पड़ाव पर कुछ खास बातें सांझा किया। उन्होंने बताया कि किस तरह उनकी बेटी भी इस बात को लेकर चिंतित हो गई थी कि अब वह बड़ी हो रही है और उसके शारीरिक बनावट को लेकर उसके मन में कई तरह के सवाल हैं। और उसे भी कई सवालों का सामना करना पड़ा है। इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर काफी शोर हुआ कि एक इतने बड़ी हस्ती और हाइ प्रोफाइल जिंदगी जीने वालों की दुनिया में भी क्या इस तरह के सवाल होते हैं।  लोग जब सेलिब्रिटी के मुख से ऐसी बातें सुनते हैं तो चौकते हैं और कुछ लोग खुश भी होते हैं कि उच्च वर्ग में भी लोग इस तरह की ही सोचते हैं। दरअसल हकीकत यह कि बेटियों के जन्म के साथ ही उसके नैन नक्श की बातें शुरू हो जाती हैं। चूंकि वह लड़की है उसे हमेशा ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है। हाल ही में एक परिचित की नवजात बिटिया से मिलने का मौका मिला। वहां जो भी उस बच्ची से मिलने आ रहे थे। वे बच्ची के नैन नक्श के बारे में ही चर्चा कर रहे थे कि बच्ची जन्म के वक़्त कितनी गोरी थी। लेकिन धीरे धीरे कैसे उसका रंग गहराता जा रहा है। इन बातों से उस बच्ची की मां को कितनी तकलीफ और चिंताएं हो रही थी। यह उनकी माथे की शिकन साफ बता रही थी। चूंकि हकीकत ही यही है कि उस मां को भी पता है कि उस बच्ची को आने वाले दौर में किस तरह के तंज़ का सामना करना पड़ेगा। खुद नंदिता दास ने स्वीकारा है कि बचपन में उन्हें भी उनके रंग के कारण कई तरह की बातें सुनने को मिलती थी। लेकिन अब उन्हें फर्क नहीं पड़ता। शुरुआती दौर में भी उन्हें फिल्मों की दुनिया में उस तरह के किरदारों से दूर कर दिया था जहां गैलमर की डिमांड होती थी। चूंकि हमने रंगों की जिंदगी में इस कदर अहमियत दे दी कि रंगीन फिल्मों के प्रचलन के साथ ही श्वेत श्याम फिल्मों की खूबसूरती कहीं धूमिल हो जाती है।

साला खड़ूस और राजू हिरानी


राजकुमार हिरानी और आर माधवन साथ साथ आये हैं और एक खास फिल्म लेकर आये हैं. यह फिल्म बॉक्सिंग पर है. फिल्म का नाम साला खड़ूस है. राजू ने स्वीकारा है कि यह फिल्म उनके लिए बेहद खास इसलिए है, क्योंकि वे माधवन के साथ यह फिल्म कर रहे हैं. राजू और माधवन एक दूसरे को कई सालों से जानते हैं. भले ही 3 इडियट्स में दोनों के काम करने का संयोग बना हो. लेकिन राजू माधवन के साथ मुन्नाभाई की टीवी सीरिज बनाने वाले थे. यह बात खुद राजू ने बतायी. लेकिन संयोग नहीं बन पाया था. राजू हिरानी की पहली फिल्म मुन्नाभाई के संवाद व उसकी भाषा दर्शकों को बेहद अच्छी लगी थी. राजू हिरानी को देख कर कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि वे इस टपोरी अंदाज में माहिर होंगे. लेकिन उन्होंने जादू की झप्पी और मुन्नाभाई की टपोरीगिरी जिस तरह से दर्शकों को प्रभावित किया था.यह किसी निर्देशक की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि वे फिल्म की भाषा से एकदम आम हो जाते हैं. इस बार फिल्म का नाम भी साला खड़ूस रखा गया है. साला और खड़ूस राजू की उसी डिक् शनरी का हिस्सा हैं. फिल्म का ट्रेलर एक लड़की की बॉक्सर बनने की कहानी दर्शा रहा है. माधवन ने इस फिल्म के लिए खास तैयारी की है. उन्होंने शारीरिक रूप से भी खुद को तैयार किया है. सो, पूरी उम्मीद है कि यह फिल्म एक अलग अंदाज और मिजाज की फिल्म होगी. आर माधवन कम शब्दों व संवादों के अभाव में भी अपनी आंखों से अभिनय कर जाते हैं. इस बार भी वे पूरी तैयारी से आये हैं. ट्रेलर देख कर यह साफ व्यतीत हो रहा है. टेलीविजन की दुनिया में जब इमोशनल धारावाहिक अधिक बन रहे थे. उस दौरान माधवन की लोकप्रियता की वजह यही थी कि वे आम दर्शकों के कलाकार लगते हैं. तनु वेडस मनु में भी आप उनकी अदाकारी को नजरअंदाज नहीं कर सकते.

फिल्म : बाजीराव मस्तानी


कलाकार : रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा
निर्देशक : संजय लीला भंसाली
रेटिंग : 3 स्टार

संजय लीला भंसाली की फिल्मों की अपनी परिभाषा होती है. उनकी फिल्म में आप पूर्ण रूप से उनकी दुनिया में होते हैं. संजय लीला भंसाली की फिल्में किसी चित्रकार की दुनिया सी ही होती है, जो एकांत में दुनिया से बेफिक्र और गुमशुदा होकर बस एक नयी सोच को आकार दे रहा होता है. जिसकी चित्रकारी में आपको पूरी दुनिया नजर आयेगी.लेकिन उस कल्पना में कोई और शामिल नहीं होता. कुछ इसी रूप में भंसाली ने बाजीराव मस्तानी को भी गढ़ा है. भंसाली की यह खासियत है कि वह खुद को किसी भी स्तर पर सीमित नहीं करते. वे दर्शकों को विजुअल एक्सपीरियंस दिलाने में पूरी जद्दोजहद करते हैं. उनके किरदार आंखों की बोली भी बोलते हैं और जब जुबां की भाषा बोलते हैं, तब भी उनमें एक लय अवश्य होता है. भंसाली दिखाते तो प्रेम कहानियां हैं. लेकिन वे बिखरी या बेतरतीब नहीं होती अपनी भाषा में, अपने हाव भाव में. भंसाली की एक और प्रेम गाथा है बाजीराव मस्तानी.बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है अय्याशी नहीं...इस संवाद से संजय ने फिल्म का उद्देश्य दर्शकों के सामने स्पष्ट कर दिया है. और इसे ही उन्होंने बड़े लैंडस्केप पर दर्शाया भी है. बाजीराव शस्त्र और शास्त्र में दक्ष थे. यह इतिहास बताता है. लेकिन संजय लीला ने बाजीराव की शास्त्र कला के साथ अहमियत उनकी प्रेम कहानी को दिया है. यह प्रेम कहानी बाजीराव और मस्तानी के बीच है. प्रेम कहानियां भंसाली की फैंटेसी रही है. हम दिल दे चुके सनम, देवदास, रामलीला के बाद यह प्रेम कहानी भी अलग दुनिया में लेकर जाती है. जहां, उस दौर में पेशवा के राज शास्त्र की परिस्थिति. एक योद्धा की सोच, उसकी शौर्य कुशलता से हम रूबरू होते हैं. लेकिन उस योद्धा के एक दूसरे पहलू को दर्शकों के सामने लाते हंै. फिल्म की कहानी में कई परतें हैं, जो एक एक कर दर्शकों के सामने आती जाती हैं तो दर्शक चौंकते हैं. फिल्म क ेपहले दृश्य में ही रणवीर सिंह बाजीराव के रूप में जब एंट्री करते हैं तो वे स्थापित कर देते हैं कि वे अपने अभिनय से मोहित करेंगे. उन्होंने पेशवा की कदकाठी, चाल ढाल अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. अपनी संवाद अदायगी में संजय लीला भंसाली ने जो तुगबंदी की है. वह संवाद लेखकों के लिए एक लर्निंग मेटेरियल है. संवाद लेखनी के लिए कम शब्दों में अपनी बात को स्थापित करते हुए लय में रहने की कहानी संजय से सीखनी चाहिए. संजय इस लिहाज से भी पूरी फिल्म की जिम्मेदारी शायद खुद पर रखते हंैं क्योंकि वे जानते हैं कि  ऐसी फिल्मों में कई लोगों के विजन पर चलने से उन्हें परेशानी हो सकती है. सो, वे अपनी कूची से निकले रंगों से हुए सृजन की पूरी जिम्मेदारी खुद ही संभालते हैं. यही वजह है कि भंसाली का विजन हमें उ्यकी फिल्मों में साफ नजर आता है. वे फिल्मों के भव्य सेट, भव्य कॉस्टयूम, को रॉयल तरीके से दर्शाने में गुरेज नहीं करते हैं. बाजीराव के साथ भी इन सारे पहलुओं में उनकी शिद्दत नजर आती है. कहानी पुणे के पेशवा बाजीराव की है, जो योद्धा है और उसे कभी हारना नहीं आया. उनकी पत् नी हैं काशीबाई, जिनसे वे बेइतहां प्यार भी करते हैं. लेकिन इसी बीच उनकी दुनिया में मस्तानी आती हैं और उनकी दुनिया बदल जाती है. मस्तानी बुंदलेखंड के राजा की नाजायज औलाद है, और वह राव के धर्म की नहीं है. बाजीराव मस्तानी को दिल दे बैठते हैं. और वे इस इश्क का नाम देते हैं. अय्याशी का नहीं. वे मस्तानी को मराठा खानदान में नाम व पत् नी का दर्जा दिलाना चाहते हैं. लेकिन उन्हें अपने परिवार व प्रजा का साथ नहीं मिलता. अंतिम दृश्यों में रणवीर सिंह को बाजीराव के रूप में एक नदी में अंर्तरात्मा से लड़ते दिखाया गया है. हकीकत यह है कि यह किरदार निभाने में उन्होंने वाकई सारी सीमाओं को पार कर, सारे बंधनों को तोड़ कर नईया ही पार की है. लेकिन बेहतर होता अगर भंसाली अपनी पिछली फिल्मों के स्पर्श  से पूरी तरह से इस फिल्म को बाहर निकाल पाते. लेकिन वह संभव नहीं हो सका है. फिल्म के संवादों, दृश्यों में रामलीला और देवदास की झलक बहुत हद तक नजर आयी है. फिल्म इतिहास के एक महत्वपूर्ण शख्सियत के नाम पर आधारित है. सो, जाहिर है विशेषज्ञों की नजर पूरी तरह से इस बात पर होगी कि उन्होंने हकीकत से कितना न्याय किया है. चूंकि यह फिल्म है. सो, उन्होंने सिनेमेटिक लीबर्टी का भरपूर इस्तेमाल किया है. निस्संदेह रणवीर सिंह के लिए एक कलाकार के रूप में यह बड़ी चुनौती है. उन्होंने उसे बखूबी निभाया भी है. लेकिन कुछ दृश्यों में उनका अति उत्साह रास नहीं आता. देवदास के देव की छाप उनके किरदार में झलकने लगती है. भंसाली ने अपनी खुशी के लिए ही प्रियंका और दीपिका के बीच गाना फिल्माया है. ऐसा महसूस होता है. चूंकि इसके पहलेऔर बाद के दृश्यों में स्पष्ट है कि काशीबाई को मस्तानी पसंद नहीं. लेकिन इसके बावजूद वह फिल्म में झूम झूम कर नाचती दिखाई देती हैं. यह तर्कसंगत नजर नहीं आया है. दीपिका पादुकोण अपनी अदाकारी में दक्ष हो गयी हैं. वे हर फिल्म में खुद को निर्देशक की चाहत के अनुसार ढाल लेती हैं. इस फिल्म में भी उन्होंने मस्तानी का वह ग्रेस बरकरार रखा है. फिल्म में चौंकाती हैं प्रियंका चोपड़ा. फिल्म के ट्रेलर या फिल्म के नाम से भी इस बात का अनुमान लगा पाना कठिन था कि प्रियंका फिल्म में इतने बेहतरीन किरदार में हैं. उन्होंने मराठी भाषा, किरदार, वेशभूषा, बॉडी लैंग्वेज को जिस तरह से अपनाया है. अनुमान लगा पाना कठिन है कि वह प्रियंका हैं. फिल्म बर्फी में झिलमिल जैसे किरदार निभाने के बाद एक बार प्रियंका ने सीमित दृश्यों में अपनी उपस्थिति से चौंका दिया है. भंसाली की कूची से निकली बाजीराव मस्तानी भी एक और अमर गाथा है. भंसाली से उम्मीदें और अधिक थीं. अगर वे वाकई अपनी पिछली फिल्मों के स्पर्श से मुक्त होते तो यह फिल्म क्लासिक फिल्म साबित हो सकती थी. फिल्म में कुछ गाने तर्क्रसंगत नहीं लगे हैं. मगर फिल्म एक बार अवश्य देखी जानी चाहिए. लेकिन दिमाग में इन बातों को भी स्पष्ट रख कर कि भविष्य में अगर बाजीराव और मस्तानी के बारे में जानकारी हासिल करनी हो तो इस फिल्म को पूरी तरह आधार न माना जाये. इसे सिनेमेटिक एक्सपीरियंस के रूप में ही देखा जाये. किसी दस्तावेज के रूप में नहीं. वरना, इतिहास के साथ यह छल होगा. शेष साल के अंत होते होते दर्शकों के लिए यह विजुअल ट्रीट तो है ही. 

फिल्म : दिलवाले


कलाकार : शाहरुख खान, काजोल, वरुण धवन, कृति सनोन, मुकेश तिवारी, पंकज त्रिपाठी, वरुण शर्मा, जॉनी लिवर
निर्देशक : रोहित शेट्ठी
रेटिंग : 3 स्टार

रोहित शेट्ठी ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपना सिग्नेचर अंदाज गढ़ लिया है. उनकी फिल्में देख कर आप फिल्म का शीर्षक देखे बिना भी अनुमान लगा सकते हैं कि यह रोहित शेट्ठी की फिल्म है. रोहित स्टाइलिश फिल्में बनाते हैं और अच्छी बात यह है कि वह यह दावा नहीं करते कि वह कोई मेसेज देने केक लिए या इउपदेश देने के लिए फिल्म बना रहे हैं. दिलवाले को भी उन्होंने बहुत स्टाइलिश तरीके से पेश किया है. फिल्म स्टाइलिश अधिक इसलिए भी बन गयी है क्योंकि फिल्म में शाहरुख खान और काजोल हैं.जाहिर है कि पांच सालों के बाद शाहरुख और काजोल की जोड़ी परदे पर है तो उन पर यह दबाव जरूर रहा होगा कि दोनों की जोड़ी के साथ न्याय कर सकें. और उन्होंने न्याय किया भी है. यह फिल्म शाहरुख काजोल की ही फिल्म है. नये दौर के कलाकारों को इन सितारों से सीखना चाहिए कि पांच सालों के बाद भी जब यह जोड़ी साथ आयी है तो वे किस तरह अपने अभिनय में दक्ष नजर आ रहे हैं. इस फिल्म में रोहित ने काजोल को भरपूर मौके दिये हैं. चूंकि शायद वह इस हकीकत से वाकिफ रहे होंगे कि काजोल को यूं ही किसी किरदार के लिए फिल्म से जोड़ना सही नहीं होगा. सो, उन्होंने काजोल के किरदार पर खूब ध्यान दिया है. काजोल जब जब इस फिल्म में दृश्यों में नजर आ रही हैं. वह चौंका रही हैं. वह साबित करती हैं कि खूबसूरती, छरहरापन ही अभिनय का मापदंड नहीं हैं. काजोल उन सारी भ्रांतियों को तोड़ती हैं. निजी जिंदगी में भी वह अपने स्वभाव में बहुत सहज हैं. इसलिए परदे पर भी उनकीसहजता नजर आती हैं. यह कहानी काली और मीरा की ही प्रेम कहानी है. रोहित शेट्ठी ने इसे अपने अंदाज के एक् शन से सजाया है. रोहित हैं तो गाड़ियां भी होंगी ही. इस बार रोहित की गाड़ियों को लेकर फैंटेंसी का हम और एक्सटेंशन देखते हैं. फिल्म के दोनों पुरुष किरदार ही गैरेज मेकनिक हैं, लेकिन वे रोहित की तरह ही स्टाइलिश अंदाज में खुद को मॉर्डन मेकेनिक और डिजाइनर मानते हैं. फिल्म की कहानी बुल्गारिया से शुरू होते हुए गोवा तक पहुंचती है. फिल्म में पास्ट और प्रेजेंट के बीच की कहानी है. प्यार और नफरत की कहानी है. काजोल शाहरुख की जोड़ी का जो जादू है. वह इस बार भी नजर आयेगा चूंकि फिल्म में कई रोमांटिक गाने भी हैं. इस फिल्म के सबसे बेहतरीन दृश्यों की बात करें तो उनमें शाहरुख और वरुण के बीच के भाई प्रेम के दृश्य हैं. शाहरुख ने इसी फिल्म में एक साथ दो शेड निभाये हैं, जिसमें एक में वह सीधे सादे हैं तो दूसरे में वह मारपीट करने वाले माफिया भी हैं. दोनों में वे सहज लगे हैं. खासतौर से पहले दृश्य में जहां दर्शकों को एहसास होता है कि राज काली है. वहां उन्होंने जिस तरह से पल में एक्सप्रेशन बदले हैं, यह दर्शाता है कि वह मंझे कलाकार है. फिल्म को इस लिहाज से देखने में मजा आयेगा अगर आप किसी तरह से इसके बारे में दिमाग से न सोचें. वरुण धवन और कृति फिल्म में फीलर के रूप में ही हैं. वरुण के शाहरुख के साथ वाले दृश्य फिर भी पसंद किये जायेंगे. लेकिन वरुण कृति की जोड़ी परदे पर खास नजर नहीं आयी है. उनकी केमेस्ट्री को देख कर मजा नहीं आया. रोहित इस मामले में माहिर हैं कि वे अपने सहयोगी कलाकारों को फिळ्म में पूरे मौके देते हैं. इस फिल्म में मुकेश तिवारी, पंकज त्रिपाठी ने जम कर दर्शकों का मनोरंजन किया है. शायद यही वजह है कि वह शाहरुख के साथ हर दृश्य में रखे गये थे. दोनों के साथ के दृश्य और उनके वन लाइनर काफी मडजेदार हैंखासतौर से संजयमिश्रा के डॉयलॉग पर दर्शक हंस हंस कर लोट पोट होंगे. फिल्म के क्लाइमेक्स से थोड़ी निराशा  होती है. रोहित इस फिल्म को और मनोरंजक बना सकते थे. लेकिन उन्होंने फिल्म के विजुअल्स ट्रीटमेंट पर अधिक ध्यान दिया है. कृति को दूसरी अभिनेत्री की नकल से बचना होगा. उनकी संवाद अदायगी खास नहीं लुभाती. बहरहाल फिल्म मनोरंजक है और दर्शक इसे जरूर पसंद करेंगे.

सेकंड चांस से पहले पायदान तक


टेलीविजन की दुनिया में कब किसके भाग्य बदल जायें, कोई नहीं जानता. खासतौर से कुछ निर्माता अपनी पैनी नजर रखते हैं. वे अपने शो में सेकेंड लीड करनवाले कलाकारों में भी अगर क्षमता देखते हैं तो उन्हें वे अगले प्रोजेक्ट में लीड बनने का मौका देते हैं. एकता कपूर, शशि सुमित मित्तल उनमें से एक हैं.  टेलीविजन के कुछ ऐसे ही सितारें जिन्होंने शुरुआत सेकेंड लीड से की थी. लेकिन आज वे या तो टेलीजगत के सुपरस्टार हैं या फिर किसी शो के लीड.

ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़नेवाले हर कलाकार की इच्छा होती है कि वह किसी शो का चेहरा बनें. वे इसी के लिए इतनी मशक्कत करते हैं. हर कोई इसी ख्वाब के साथ इस दुनिया में कदम रखता है. लेकिन हर किसी को वे मौके नहीं मिलते. तो ऐसे में कुछ हताश हो जाते हैं और कुछ सफर की शुरुआत में थोड़ा टिवस्ट दे देते हैं. वे कैरेक्टर आर्टिस्ट या सेकेंड लीड किरदार निभाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं. नतीजन उनकी प्रतिभा दर्शकों को नजर आती है और साथ ही साथ निर्माता भी उन्हें पसंद करने लगते हैं और फिर अगले प्रोजेक्ट में वे लीड किरदारों में नजर आने लगते हैं. टेलीविजन की दुनिया में कई कलाकारों ने पहले सेकेंड पारी की शुरुआत कर खुद को लीड के काबिल बनाया है.
रवि दुबे -टीवी के सुपरहिट जमाईराजा
धारावाहिक जमाई राजा में इन दिनों अभिनेता रवि दुबे की जम कर तारीफ हो रही है. लेकिन शायद कम लोग ही यह जानते होंगे कि रवि दुबे ने कभी एक्सट्रा के रूप में शुरुआत की थी, जब वह शुरुआती दौर में मुंबई आये थे. लेकिन उन्होंने मेहनत से पहचान बनायी. उन्होंने सबसे पहले करोलबाग 12-24 में सेकेंड लीड किरदार निभाने का निर्णय लिया. और उस शो में वह अपनी पत् नी सरगुन मेहता के अपोजिट ही एक मेंटली चैलेंज्ड की भूमिका में थे. इस शो में सेकेंड लीड होने के बावजूद उन्हें बहुत ख्याति मिली और उन्हें इसके बाद लीड किरदार निभाने के मौके मिलने लगे. धारावाहिक सास बिना ससुराल में भी वे लीड किरदार में थे और अब जीटीवी के शो जमाई राजा से वे टेलीविजन के सितारें बन चुके हैं. रवि मानते हैं कि  उन्होंने हमेशा अपने काम को गंभीरता से लिया है, चूंकि वे जानते हैं कि काम की अहमियत क्या है. एक दौर में वह काम न मिल पाने के कारण काफी डिप्रेशन में भी थे. लेकिन फिर उन्होंने खुद को संभाला और आज वह खुश हैं कि उन्हें दर्शकों से इस कदर प्यार मिल रहा है.
श्रीतमा मुखर्जी
श्रीतामा मुखर्जी ने अपने करियर की शुरुआत कई विज्ञापन से की थी. बाद में उन्हें कुछ धारावाहिकों में नेगेटिव किरदार निभाने का भी मौका मिला. फिर वे कलश में सेकेंड लीड बनीं. उसी दौरान उन पर एकता कपूर की नजर गयीं और उन्हें उन्होंने अपने नये शो कुछ तो है तेरे मेरे दरमियां में लीड किरदार निभाने का मौका दिया.श्रीतमा भी काफी प्रतिभाशाली हैं. हालांकि अब वह कुछ कारणों से इस शो का हिस्सा नहीं हैं. लेकिन यह उनके लिए बड़ी कामयाबी थी कि उन्हें सेकेंड लीड से लीड किरदार निभाने का मौका मिला.
अली गोनी
अली गोनी ने अपने करियर की पहली बड़ी शुरुआत बालाजी टेलीफिल्म्स के शो ये हैं मोहब्बते से की थी. उन्होंने लंबे समय तक शो में रोमी भल्ला का किरदार निभाया है और उन्होंने बेहतरीन एक्टिंग की है. शायद यही वजह है कि अली गोनी जल्द ही शो की निर्माता एकता कपूर की नजर में आ गये और उन्हें उन्होंने बड़ा मौका दे दिया है. इन दिनों वह बालाजी के ही शो कुछ तो है तेरे मेरे दरमियां में लीड किरदार निभा रहे हैं और वे अपनी इस कामयाबी का श्रेय एकता कपूर को ही देते हैं.
शक्ति अरोड़ा
ेशक्ति अरोड़ा इन दिनों धारावाहिक मेरी आशिकी तुमसे ही...से दर्शकों  के काफी चहेते बन चुके हैं. आपको जान कर आश्चर्य होगा कि उन्होंने शुरुआत कैमियो किरदारों से की थी. वह सबसे पहले फिर कोई है...में छोटी भूमिकाओं में नजर आये. फिर उन्होंने लेफ्ट राइट लेफ्ट, दिल मिल गये, बा बहू और बेबी, तेरे लिये, अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो जैसे शोज में सहयोगी भूमिकाएं ही निभायी. लेकिन शक्ति ने तेरे लिये से साबित कर दिया था कि वे लीड किरदार निभाने की क्षमता रखते हैं. उन्होंने ये है आशिकी, वेब्ड, प्यार तुने क्या किया जैसे एपिसोडिक शो को भी हां कहा और काम करते रहे. चूंकि शायद वह जानते थे कि उन्हें बड़ा ब्रेक मिलने ही वाला है. अंतत: उन्हें मेरी आशिकी तुमसे ही में लीड किरदार निभाने का मौका मिल गया और उन्होंने छोटे परदे के लोकप्रिय सितारों में अपनी जगह भी बना ली है.
ेॅसुशांत सिंह राजपूत
सुशांत सिंह राजपूत अब बॉलीवुड के लोकप्रिय चेहरे बन गये हैं. उन्होंने शुरुआत छोटे परदे से ही की थी. उनकी शुरुआत भी सेकेंड लीड के रूप में ही हुई थी. उन्होंने धारावाहिक किस देश में है मेरा दिल में प्रीत ललित जुनेजा का किरदार निभाया था, जो कि सेकेंड लीड किरदार था. यह बालाजी का ही शो था. उसी दौरान एकता कपूर की नजर में सुशांत बस गये थे. एकता ने फिर उन्हें पवित्र रिश्ता में बड़ा मौका दे दिया. इसके  बाद उन्होंने बॉलीवुड की तरफ रुख कर लिया.
सरगुन  मेहता
सरगुन मेहता ने भी शुरुआत सेकेंड लीड से की थी. उन्होंने धारावाहिक 12-24 करोल बाग से ही करियर की शुरुआत की थी. लेकिन धीरे धीरे उन्हें अपने गंभीर किरदारों की वजह से फुलवा जैसे शो में एक बेहतरीन किरदार निभाने का मौका मिला. इसके बाद उन्होंने लगातार कई प्रोजेक्ट्स किये. फिर बालिका बधू में भी उन्हें एक अहम किरदार निभाने के मौके मिले. इन दिनों सरगुन पंजाबी फिल्में भी कर रही हैं. नच बलिये में भी उनकी और रवि की जोड़ी काफी पसंद की गयी थी.
शिल्पा शिंदे
शिल्पा शिंदे इन दिनों धारावाहिक भाभीजी घर पर हैं से काफी सुर्खियां बटोर रही हैं. ुउन्होंने भी कई धारावाहिकों में पहले सेकेंड लीड ही निभाये थे, जिनमें संजीवनी, कभी आये न जुदाई, मेहर जैसे शोज थे. बाद में उन्हें बड़े ब्रेक मिले.
द्रष्टि धामी
द्रष्टि धामी ने संजीवनी में सेकेंड लीड भूमिका निभाई थी. इससे पहले कई म्यूजिक एलबम में भी साथ काम किया था. फिर उन्हें गीत हुई सबसे पराई और मधुबाला जैसे शोज में लीड किरदार निभाने का मौका मिला. फिलवक्त वह एक था राजा एक थी रानी में लीड किरदार में हैं. 

20151216

मोनोलॉग से बनी सिग्नेचर पहचान : कार्तिक आर्यन


फिल्म प्यार का पंचनामा 2 जिन्होंने भी देखी है, वे कार्तिक आर्यन के मोनोलोग की तारीफ करते नहीं थकते. इस फिल्म से ट्रेड पंडितों व समीक्षकों को खास उम्मीदें नहीं थी. लेकिन फिल्म की रिलीज के बाद इस फिल्म ने सारे मिथकों को तोड़ दिया. प्यार का पंचनामा 2 सुपरहिट साबित हुई है. हाल ही में फिल्म ने थियेटर में 50 दिन पूरे किये. किसी स्टारविहीन फिल्म के लिए यह बड़ी उपलब्धि है. इसी सिलसिले में फिल्म के मुख्य कलाकार कार्तिक आर्यन ने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.
कार्तिक, प्यार का पंचनामा 2 को इस कदर प्यार मिलेगा. यह उम्मीद थी?
जी नहीं, बिल्कुल इतनी उम्मीद नहीं थी. लेकिन विषय पर पूरा विश्वास था. खासतौर से फिल्म की भाषा को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं लोग दे रहे हैं. वह कमाल का है. मैं खुश हूं कि प्यार का पंचनामा के पहले संस्करण से भी अधिक यह फिल्म हिट हुई है. अब राहें तो थोड़ी आसान हो जायेंगी.
आप जैसे नवोदित कलाकार इतनी बड़ी सफलता को किस तरह देखते हैं. आगे की क्या योजना है?
जाहिर है, हर कलाकार इसी प्रशंसा का भूखा होता है. आपकी फिल्में जब बॉक्स आॅफिस पर सफल हो जाती हैं तो हर निर्देशक आपको रिपीट करने का रिस्क उठाता है. यहां हर फ्राइडे तकदीर बदलती है.तो मैं किसी गफलत में नहीं हूं. मैं लगातार मेहनत कर रहा हूं और खुद को साबित करने की कोशिश कर रहा हूं. खुशी इस बात की है कि अब मेरे पास ऐसी फिल्में आने लगी हैं, जैसे मैं करना चाहता था.
किस तरह की फिल्में आप करना चाहते हैं?
मेरी बेहद इच्छा है कि मैं एंटी हीरो किरदार निभाऊं, या फिर कोई ऐसे किरदार जिसमें बहुत सारे शेड्स हो. रॉकस्टार जैसी फिल्म करने का मौका मिले तो वह मेरी खुशनसीबी होगी. मैं परतों वाली फिल्में करना चाहता हूं. जहां एक किरदार को कई तरह के किरदार करने के मौके मिले. मैं टाइपकास्ट नहीं होना चाहता हूं. साथ ही अभी कुछ ऐसी प्लानिंग नहीं की है, अभी बहुत चूजी नहीं हो सकता. फिलहाल तो कोशिश है कि सिर्फ काम करना है.
आपके मोनोलॉग की काफी चर्चा हुई. 
जी हां, सबसे आश्चर्य की बात यह है मेरे लिए कि लड़कियां इसकी फैन हैं. मैं हाल ही में एक कॉलेज में गया था तो वहां लड़कियों की डिमांड थी कि मैं वह मोनोलॉग सुनाऊं. तो खुशी होती है कि लोगों ने इसे फन के रूप में लिया है. पुरुषवादी सोच वाली बात नहीं कही है. हर कलाकार का जब कुछ संवाद सिग्नेचर बन जाता है तो उसे खुशी मिलती ही है, जिससे कि लोग आपको याद रखते हैं. तो आपको खुशी मिलती ही है. जैसे अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कलाकार...तो मुझे यकीन है कि लोग मुझे मेरे इस मोनोलॉग से याद रखेंगे. यह एक खास उपलब्धि है मेरे लिए.जहां भी यह बातें दोहरायी जायेंगी मेरा जिक्र होगा. 
आपकी फिल्म ने 50 दिन पूरे कर लिये हैं. हाल के दौर में जहां फिल्में जल्द ही परदे से उतर जाती है. यह भी एक बड़ी कामयाबी है?
जी हां, बिल्कुल मुझे बहुत खुशी मिली थी. जब मैं दो हफ्ते बाद अपने पेरेंट्स के साथ सिनेमाघर में गया था और वहां मेरी फिल्म हाउसफुल चल रही थी. टिकट्स नहीं मिले तो बहुत खुशी हुई थी. फिर मैं कई सिनेमाघरों में दर्शकों के बीच जाकर फिल्म देख रहा था और लोग हंस कर लोट पोट हो रहे थे. तालियां और सीटियां बना रहे थे. तो बहुत खुशी मिली थी. मुझे याद है डीडीएलजे जैसी फिल्में 50 दिन चलती थी तो बड़ी कामयाबी हुई थी. बाद में वह कई सालों तक चलीं. तो प्यार का पंचनामा 2 के लिए यह छोटी कामयाबी भी बड़ा कीर्तिमान है. आगे भी उम्मीद करता हूं कि मुझे दर्शक यूं ही पसंद करें. 

रंगोली की यादें

दूरदर्शन चैनल पर किसी दौर में रविवार की रौनक रहती थी। वजह यह थी कि रविवार को कई तरह के कार्यक्रम आते थे जिनमें रंगोली खास लोकप्रिय कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में उस दौर के कई सदाबहार गाने दिखाए जाते थे। वह दौर एफ एम का दौर नहीं था न ही इतने म्यूजिक चैनल थे। दर्शकों के लिए चित्रहार और रंगोली ही दो कार्यक्रम थे जिनमें फिल्मी गीत सुनाई देते थे। लेकिन वक़्त क साथ रंगोली का औचित्य खत्म हो गया। आप 24 घण्टे गाने   सुन और देख सकते हैं। लेकिन दूरदर्शन ने इन कार्यक्रमों का प्रसारण बंद नहीं किया। यह एक बड़ी कामयाबी रही। इन दिनों यह कार्यक्रम फिर से एक नए कलेवर में दर्शकों के सामने हैं जिनका संचालन स्वरा भास्कर कर रही हैं। दरअसल उस दौर में रविवार छुट्टियों का दिन था। और पूरे हफ्ते काम काज छुट्टी पाकर पूरे परिवार के साथ यह शो देख जाता था। रंगोली की कई यादें कई जेनेरेशन के जेहन में जिंदा होगी। लेकिन अब रविवार की छुट्टियां काफी हाउस मैं बीतने लगी है। लोग सुबह सुबह कोफ हाउस के चक्कर लगाने में यकीन करने लगे हैं। अब रविवार का इंतज़ार नहीं रहता। लेकिन ऐसे दौर में भी रंगोली नए रंग रूप में आ रही है तो यह सराहनीय प्रयास है। पुरानी यादों कप संजोने के लिए। हाल ही में सतीश कौशिक से बात हुई थी उन्होंने भी इस बात को स्वीकारा कि उस दौर में इस तरह के धारावाहिकों के लिए लेखन करना अधिक कठिन था। उस दौर मैं सतीश कौशिक और पंकज कपूर एक हिट शो लेकर आते थे। जहां वे मौज मस्ती के अंदाज़ में बातें करते थे और बातचीत के अंतराल में गाने दिखाए जाते थे। सतीश मानते हैं कि उनकी कोशिश होती थी कि वे अपनी बातचीत में किसी का मजाक न बनाएं वे खुद का मजाक बनाते थे। वह दौर स्टैंड आप कॉमेडी का दौर भी नहीं था। एंटरटेनमेंट के मायने भी वह नहीं थे। सो उस दौर में दर्शकों का उन्हें प्यार मिला। तमाम बातों के बावजूद एक बार फिर से रंगोली प्रतियोगिता के लिए तैयार है तो इस कार्यक्रम और सोच का स्वागत किया जाना चाहिए।

निर्देशक व नयी तलाश


निखिल आडवाणी ने तय किया है कि वे अपने साथ काम कर रहे नये लोगों को मौके देंगे और वे मौके दे भी रहे हैं. फिल्म एयरलिफ्ट के निर्देशक राज भी निखिल के साथ काम कर चुके हैं और निखिल अपने एक और अस्टिेंट को नया मौका दे रहे हैं. निखिल खुद करन जौहर और आदित्य चोपड़ा के अस्टिेंट रह चुके हैं और करन ने ही उन्हें पहला मौका दिया था. संजय लीला भंसाली ने अपने साथ काम कर रहे ओंमग कुमार जो संजय की फिल्मों का सेट निर्माण करते आये हैं, उन्हें पहला मौका फिल्म मैरी कॉम से दिया. संजय ने ही पहला मौका इस्माइल दरबार को दिया था. बाद में वे नामी गीतकार बने. संजय के साथ काम कर रहे प्रशांत गोलेचा को पहले फिल्म मैरी कॉम के गाने लिखने के मौके मिले और बाजीराव मस्तानी में भी उन्होंने गाने लिखे हैं. अनुराग कश्यप अपने साथ काम कर रहे सभी अस्टिेंट निर्देशकों को मौके देते रहे हैं. आदित्य चोपड़ा के ही अस्टिेंट थे करन जौहर और करन ने अपने साथ काम कर रहे कई नये लोगों को मौके दिये हैं, जिनमें शकुन बत्रा, तरुण मनसुखानी, पुनीत मल्होत्रा जैसे नाम शामिल हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि एक अच्छे निर्देशक व लीडर की ही यह खूबी भी होती है कि वह अपने साथ साथ एक नयी लीग तैयार करते चले. रामगोपाल वर्मा की फिल्में लिख कर अनुराग कश्यप ने शुरुआत की थी. बाद में दोनों में भले ही अनबन होती रही.लेकिन आप गौर करें तो अनुराग की फिल्मों में रामगोपाल की झलक दिखती है.यह हकीकत है कि आपको पहला मौका मिलना अंत्यंत आवश्यक है, तभी आप अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं. कुछ निर्देशक सिर्फ अपनी धुन में रहते हैं. उन्हें नया निर्देशक बनाने में न तो दिलचस्पी होती है और न ही क्षमता. तो ऐसे निर्देशक सिर्फ मैं के साथ ही जीते हैं. जबकि संजय, करन जैसे निर्देशक मेंटर भी बनते हैं.

नयी पीढ़ी की जिम्मेदारी


किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने अपनी बेटी मुकतिका के साथ बाबा मेरे नामक एक वीडियो एलबम बनाया है. यह एलबम उन्होंने अपने पिता को समर्पित किया है, जिसमें उनकी बेटी अपने पापा से सवाल करती हैं कि दादाजी कैसे थे. मैं कैसे उनसे जुड़ सकती हूं. कैसे उन्हें देख सकती हूं. कैसे उनके बारे में जान सकती हूं. यह एक पोती की जिज्ञासा है अपने दादाजी के लिए. अमित उन्हें किशोर कुमार के अंदाज में वेश बदल बदल अपने दादाजी की झलक उनकी पोती को दिखाते हैं. भले  ही यह वीडियो एलबम व्यवसायिक रूप से अधिक लोकप्रिय न हो. लेकिन एक मशहूर दादा के लिए उनकी पोती की तरफ से एक उपहार जरूर है. यह हकीकत है कि किशोर कुमार ने हिंदी सिनेमा के लिए जो योगदान दिये हैं. वह अदभुत है. वह जीनियस थे और उन सा मल्टी टास्क करने वाली शख्सियत इंडस्ट्री में कम हैं. सो, इस लिहाज से उनकी पोती को भी पूरा हक है कि वह अपने दादाजी की दुनिया से इस कदर रूबरू हो. यह अमित कुमार की भी खूबी है कि वे अपने पिताजी की लीजेसी को अपनी बेटी तक पहुंचा रहे हैं. टी सीरिज के भी 50 साल पूरे होने के अवसर पर उनकी बेटियों ने अपने पापा गुलशन कुमार को गीतों के रूप में एक श्रद्धांजलि देने की कोशिश की थी और उसी दौरान उन्होंने घोषणा भी की थी कि वे एक ऐसी अकादमी की शुरुआत करने जा रहे हैं, जहां टैलेंट को आगे बढ़ाया जायेगा. दरअसल, हकीकत यह है कि यह बेहद जरूरी है कि हर जेनरेशन अपने आनेवाले जेनरेशन को उनके पुराने जेनरेशन से रूबरू कराये. राजिंदर सिंह बेदी की पोती इला ने भी अपनी तरफ से अपने दादाजी को श्रद्धांजलि दी है, लाजवंती का टीवी रूपांतरण निर्माण कर एक बेहतरीन उपहार दिये हैं. इस तरह ही पुरानी यादों और पुराने लोगों को संजोया जा सकता है.

गायक-गायिकाएं व रॉयल्टी


अलीशा चिनॉय ने इस बात का खुलासा किया कि उन्हें फिल्म बंटी बबली के गीत कजरारे के लिए केवल 15 हजार रुपये फीस के रूप में मिले थे. उन्होंने  गुस्से में आकर यशराज को वह चेक लौटा भी दिया था. लेकिन यशराज ने उन्हें फिर से वह चेक वापस कर दिया था.अलीशा बताती हैं कि उन्हें इससे अधिक अफसोस इस बात का हुआ था कि वे जब भी इन गीतों को  किसी समारोह में गाती हैं. आॅरगनाइजर उनसे कहते हैं कि वे इस गीत को न गाएं, क्योंकि यशराज वाले बाद में उनसे काफी रॉयल्टी फीस वसूलते हैं. सिर्फ यशराज ही नहीं, बल्कि एक बड़ी म्यूजिक कंपनी के बारे में भी यह खबर लोकप्रिय है कि वह छोटे छोटे गांवों और शहरों के होटलों पर भी पैनी नजर रखती है, और इस बात का रिकॉर्ड रखती है कि क्या वहां उस कंपनी के गाने बज रहे हैं. और अगर उन्हें जानकारी मिले तो वह रॉयल्टी फीस लेने से नहीं चूकती. सोनू निगम ने कई अरसे तक रॉयल्टी के लिए अपनी लड़ाई लड़ी है. लेकिन अब भी गायक-गायिकाओं को उनकी फिल्मों के गीतों की रॉयल्टी नहीं मिलती. अलीशा जिस दौर में कजरारे गीत को अपनी आवाज देने के लिए तैयार हुई थीं. उस दौर में वे लोकप्रिय गायिकाओं में से एक थीं. उस दौर में म्यूजिक वीडियो एलबम इस तरह के बेहतरीन गायक गायिकाओं का एक खास माध्यम था, आमदनी का. लेकिन उस दौर में भी उन्हें मामूली सी फीस देना उनका अनादर ही था. लता मंगेशकर शायद इस बात से वाकिफ होंगी सो उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ी भी और जीती भी. उन्हें उनके गीतों की रॉयल्टी मिलने भी लगी. लेकिन एक बड़ा वर्ग है गायक-गायिकाओं का. उन्हें आज भी रॉयल्टी नहीं मिलती. जबकि म्यूजिक कंपनियां उनके नाम पर कमाई कर रही है. इस सिस्टम में बदलाव होने ही चाहिए. लेकिन आने वाले समय में तो खास बदलाव की गुंजाईश नहीं दिखती.

टीवी और हॉरर शो


सारिका से हाल में एक टीवी शो की लॉन्चिंग के दौरान मुलाकात हुई। मुलाकात के दौरान उन्होंने पुराने दौर की कई यादें संझा किया। उन्होंने बताया कि जिस दौर मैं उन्होंने हॉरर फिल्मों में काम शुरू किया था। उस दौर में रामसे ब्रदर्स ही इस तरह की फिल्में बनाते थे। वे जिस तरह की कहानियां उस दौर में दिखाते थे। भले ही आज लोग उनका मजाक बनाये।लेकिन उस दौर में वही दौर हिट था। और उस वक़्त लोगों के पास उस तरह के साधन उपलब्ध नहीं थे। उनकी चाहत है कि आज के दौर जब साधन की कमी नहीं है। ऐसे में अवश्य नई कहानियों के बारे में सोचना चाहिए। दरअसल एंटरटेनमेंट की दुनिया में डर का भी एक बाद दर्शक समूह रहा है। और इस दर्शक समूह को तैयार रामसे ब्रदर्स ने ही किया था। सो उनकी उपलब्धि को भूला जाना नहीं चाहिए। उन्होंने ही एंटरटेनमेंट का यह जॉनर खास बनाया। इन दिनों एंड टीवी के शो डर सबको लगता है युवाओं को बेहद पसंद आ रहा है,क्योंकि इस शो में फिक्शन और रियलिटी का मिश्रण है। सो युवा इसमें काफी दिलचस्पी भी ले रहे हैं। यह हकीकत है कि इनदिनों हमारी फिल्मों की दुनिया में इस जॉनर को लेकर बहुत सारे प्रयोग नहीं हुए हैं। जबकि विदेशों में यह एक लोकप्रिय जोनर है और यह काफी पसंद भी किया जाता है। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि हिंदी फिल्मों के निर्देशकों को इस तरह की कहानियों में खास रुचि नहीं है। तभी तो अबतक किसी भी बड़े सुपरस्टार को हमने हॉरर फिल्मों में नहीं देखा है। और शायद भविष्य में भी उम्मीद कम है। बहुत हद तक विक्रम भट्ट ने कोशिशें की लेकिन खास कामयाब नहीं हुए। मेरी समझ से अगर बड़े निर्देशक इस तरफ रुचि लें तो अच्छी कहानियां लोगों के सामने आएगी। एंड टीवी के शो डर सबको लगता है में कई फिल्मों के निर्देशकों को मौके मिल रहे हैं। सो मेकिंग के आधार पर यह शो बड़े कैनवास पर नजर आता है। अगर स्टोरी डेवलपमेंट पर भी कोशिशें की जाये तो टीवी के स्तर पर भी बड़े प्रयोग किये जा सकते हैं।

अनुष्का के स्वतंत्र विचार


अनुष्का शर्मा ने हाल ही में एक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक से बातचीत के दौरान कई बातें बेबाकी से रखी हैं. उन्होंने कई हकीकत से रूबरू कराया है. अनुष्का अपनी बातचीत में बताती हैं कि किस तरह फिल्म इंडस्ट्री में स्त्री पुरुष को लेकर लोगों की अलग सोच है. अभिनेत्री व अभिनेता में किस तरह से भेदभाव किये जाते हैं. अनुष्का ने इंडस्ट्री में अपने सात  साल पूरे किये हैं और जो अनुष्का से मिलते रहे हैं वे इस बात से वाकिफ होंगे कि अनुष्का पर ग्लैमर दुनिया का प्रभाव बहुत हद तक हावी नहीं हैं. वे संवेदनशील बातें करती हैं और वे अपनी जमीन को नहीं भूली हैं. वे बताती हैं कि किस तरह आउटडोर शूटिंग के दौरान भी अभिनेत्रियों से बड़े रूम अभिनेताओं को दिये जाते हैं. इस छोटी सी बात से ही इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि पुरुषवादी सोच किस तरह इंडस्ट्री पर हावी है. अनुष्का की इस बात के लिए सराहना होनी चाहिए कि किस तरह उन्होंने बेबाकी से इस बारे में बातचीत की है कि मेहनताना देते वक्त भी पहले अभिनेता के मेहनताना को क्लीयर किया जाता है. बाद में अभिनेत्रियों की बारी आती है. हाल ही में अनुष्का अनुराग कश्यप और उनकी टीम से नाराज हुई थीं, चूंकि उन्हें बांबे वेल्वेट का मेहनताना अब तक नहीं मिला है. अनुष्का पर उनके अंतरंग मित्र विराट कोहली को लेकर कई बार कटाक्ष किये गये हैं, कि उनकी वजह से उनका परफॉरमेंस खराब हुआ है. लेकिन अनुष्का ने इसका बार बार विरोध कर अपना मुंह खाली नहीं किया. अब जब उन्हें मौका मिला है तो वे अपनी बात रख रही हैं और बेहद संजीदगी से रख रही हैं. उन्होंने यह भी जाहिर किया है कि अगर कोई अभिनेत्री अपनी बात निर्देशक के सामने रखती हैं तो निर्देशक उन्हें बेवकूफ समझते हैं. अनुष्का की यह सारी बात गौरतलब हैं

सिया के राम व शांता


स्टार प्लस के धारावाहिक सिया के राम में फिलवक्त राम की बहन शांता की कहानी विस्तार से दिखाई जा रही है. निखिल सिन्हा इस लिहाज से बधाई के पात्र हैं, कि उन्होंने रामायण के अनछुए पहलुओं को दर्शकों के सामने रखने की ंिहम्मत की है.चूंकि फिलवक्त जो दौर चल रहा. हर मुद्दे को लेकर विवाद हो रहे. मुमकिन यह भी है कि इस विषय पर भी काफी विवाद हो सकते हैं. कई बुद्धिजीवी अपने तर्क रख सकते. चूंकि शो में कहानी में आगे दिखाया जा रहा है कि किस तरह दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यत् न किये. यह भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है कि दशरथ जैसे ज्ञानी भी इस तरह की बातों पर सोचते थे. उन्हें भी पुत्र रत् न चाहिए था. सिया के राम दरअसल, पुरुष अंहकार की मृथ्याओं को पूरी तरह से धाराशायी कर रहा है. एक दृश्य में सीता गौतम ऋषि से पूछती है कि ज्ञान का क्या लाभ. गौतम ऋषि कहते हैं कि ज्ञान होने से व्यक्ति अपने गुस्से और अहंकार पर नियंत्रण कर लेता है. तो सीता के सवाल होते हैं कि तो फिर आपने अपनी पत् नी अहिल्या को श्राप क्यों दिया. वर्षों से चली आ रही मृथ्या और पुरुषों को परम पूजनीय समझने वाले समाज के लिए यह सटीक जवाब है. पहली बार किसी पौराणिक कथा पर आधारित धारावाहिक दरअसल, धार्मिक नजर नहीं आ रहा. उसके किरदार पूजनीय नहीं, बल्कि तर्कसंगत लगते हैं. किसी दौर में कैकयी, सुर्पनखा जैसे किरदारों को खलनायिका समझने वाले रामायण में दशरथ और गौतम ऋषि के जीवन के भी क्या ग्रे शेड रहे हैं. यह धारावाहिक उसे भलिभांति दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर रहा है. वह पुरुष को परमात्मा बना कर पेश नहीं कर रहा. शांता की कहानी अब से पहले किसी ने न सुनी न ही कही. जबकि शांता के पहलुओं पर भी नजर डालना आवश्यक था. इस लिहाज से वर्तमान दौर के महत्वपूर्ण धारावाहिकों में से एक है यह शो.

निर्देशक व दर्शक

इम्तियाज अली की यह खूबी है कि वह फिल्मों के प्रदर्शन के बाद भी आम लोगोंं से खूब मिलते हैं और उनसे अपनी फिल्म के बारे में राय लेते हैं. यह सिलसिला पिछले कई  सालों से चला आ रहा है. अनुराग कश्यप व अन्य निर्देशकों ने भी यह संस्कृति शुरू की थी.लेकिन धीरे धीरे वे इससे कट रहे हैं. लेकिन इम्तियाज ने अब भी यह सिलसिला जारी रखा है. उनकी हाल ही में प्रदर्शित फिल्म तमाशा को लेकर भी उन्होंने मुलाकात की. दर्शकों के मन में कई सवाल थे और इम्तियाज ने बारी बारी से सारे सवालों के जवाब भी दिये. यह फिल्म लड़कियों को बेहद पसंद आ रही है. दरअसल, यह सिलसिला बादस्तूर जारी रहना इसलिए जरूरी है क्योंकि निर्देशक और दर्शक का रिश्ता इससे मजबूत होता है. दर्शक भी इस बात को समझते हैं कि निर्देशक को उनकी फिक्र है. और उनकी राय की परवाह है. फिल्म लूटेरा की रिलीज के बाद विक्रमादित्य मोटवाणे ने भी मेल के माध्यम से दर्शकों के सारे सवालों के जवाब दिये थे. चूंकि इम्तियाज, विक्रमादित्य उन निर्देशकों में से एक हैं, जिनकी फिल्मों में कई परत होते हैं. उनकी फिल्म से हर दर्शक अलग अलग नजरिया बनाता है. इनकी फिल्मों में कई सवालों के जवाब फिल्म में स्पष्ट नहीं होेते. लेकिन चूंकि इनके किरदार जीवंत होते हैं, दर्शक उन्हें साथ लेकर निकलते हैं थियेटर से. सो, उनके मन ेमें कई तरह की जिज्ञासाएं होती हैं और वे उनके जवाब तलाशना चाहते हैं. इम्तियाज की फिल्म तमाशा में ही उन्होंने अपने पोस्टर पर लिखा है कि व्हाय द सेम स्टोरी... इस वाक्य को कई लोगों ने कई नजरियों से देखा है. एक नजरिया फिल्म का यह भी था कि इम्तियाज सवाल पूछ नहीं रहे, बल्कि सवाल का जवाब दे रहे हैं कि हमेशा कहानियों के एक होने की वजह क्या है. तो दूसरी तरफ किसी दर्शक के मन में सवाल बन कर भी खड़े हों. सो, यह जरूरी है कि निर्देशक उनकी प्यास बुझाए.

angry indian godess

ऐंग्री इंडियन गॉडेस महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण फिल्म है। फिल्म की कहानी 6 महिलाओं की जिंदगी से शुरू होती है जिनके पास धन की कमी नहीं है। लेकिन सभी जिंदगी से खुश नहीं है। इसी दौरान एक दोस्त की शादी में सभी एकत्रित होते हैं। और उनकी जिंदगी के गम दर्शकों के सामने एक एक कर जाहिर होने लगते हैं।एक लक्ष्मी का किरदार भी है। लक्ष्मी फ्रीडा की देख रेख करती है। उसके भाई की मौत उसकी आंखों के सामने होती है और वह तय करती है कि वह भाई के खूनी से बदला लेकर रहेगी। इस फिल्म जिस तरह से महिलाओं की जिंदगी के अहम पहलुओं को सामने प्रस्तुत करती है।वह दिल को छूती है। एक महिला कितनी भी बड़ी कामयाबी हासिल क्यों न कर ले। इसके बावजूद उसके किस तरह तंज़ सहने पड़ते हैं। क्यों लोग उन्हें भोग की नजर से ही देखते हैं। और वह किस हद तक उन्हें चोट पहुंचाता है।वह किस तरह टूटती हैं और खुद को निहत्था महसूस करती हैं।इस फिल्म में इसे बखूबी और बारीकी से दर्शाया गया है। गोवा में आये दिन सागर किनारे होने वाली बलात्कार के बाद हत्याओं के मुद्दे पर भी प्रकाश डालती है। और उसपर पुलिस प्रशासन का महिलाओं के प्रति गलत और बेबुनियाद कटाक्ष की दास्तां को भी दर्शाता है।इन दिनों किसी भी बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए भी महिलाओं के कपड़े और उनके देर रात तक घूमने फिरने को लेकर साधू संतों की बयानबाजी होती है। इस मसले को भी गहराई से फिल्म में दर्शाया गया है। और सारी परेशानियों से जूझते हुए , किस तरह महिला हथियार उठाने पर विवश होती है। यह भी इस फिल्म का एहम हिस्सा है। इस लिहाज से फिल्म में ऐसी कई घटनाएं हैं जो आपको आपके आस पास की लगती है। समलैंगिक के मुद्दे लेकर भी लोगों की क्या दोहरी राय है और किस तरह लोगों के मन में उन्हें लेकर दुर्व्यवहार है।इस मुद्दे पर भी निर्देशक अपनी पैनी नजर रखती हैं। एक बड़ी कामयाबी इस फिल्म की यह है कि सभी कलाकारों के चेहरे मुख्यधारा में दिखने वाले चेहरे नहीं हैं। संध्या मृदुल स्वाभिमान जो उनका पहला शो था उस दौर से लेकर अबतक खुद को बेहतरीन तरीके से साबित कर रही हैं और उन्हें अपनी सारी कलाकार का सहयोग भी बखूबी मिला है। इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस से अधिक महिलाओं के दिलों में दस्तक देना जरूरी है। ऐसी फिल्मों का निर्माण होते रहना आवश्यक है।

जावेद साहब की महत्वपूर्ण बातें


हाल ही में एक समारोह के दौरान जावेद अख्तर ने असहिष्णुता के विषय पर कई महत्वपूर्ण बातें रखी हैं. उन्होंने कहा है कि हम भी तालिबानी बन रहे हैं. हम हर बात पर प्रतिक्रिया दे रहे. लोग लड़ने को आतुर हो जा रहे. उन्होंने बेहद सटीक उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी कि फिल्म शोले के एक दृश्य में बसंती और वीरू के बीच के दृश्य मंदिर में फिल्माये गये हैं. लेकिन जावेद यह स्वीकारते हैं कि आज के दौर में मंदिर वाले सीन फिल्माना मुश्किल है. चूंकि उस दौर में इनटॉलरेंस जैसे मुद्दे नहीं थे. फिल्म संयोग में फिल्म के गीत में कृष्ण सुदामा की दोस्ती का पूरा विवरण है. एक फिल्म में दिलीप कुमार जो कि हकीकत में युसूफ खान है. वह मंदिर में भगवान की मूर्ति उठा कर बोलता है कि नहीं मानता मैं ऐसे भगवान को और उसे नाले में फेंक देता है. उस दौर में वह सिनेमा था. आज वह असहिष्णुता हो चुका है. आज के दौर में लोग राजू हिरानी से पूछते हैं कि उन्हें क्या हक है कि वह पीके में हिंदू भगवान की फिरकी ले रहे हैं. लेकिन मुसलिम के साथ ऐेसा कर पाते क्या. दरअसल, जावेद अख्तर की कई बातें पिछले लंबे समय से चली आ रही बहस पर कही गयी ठोस बातें ंहैं और महत्वपूर्ण भी है. हाल ही में मुंबई के एक सिनेमाघर से राष्टÑीय गान के दौरान खड़े न होने की वजह से एक मुसलिम परिवार को थियेटर से खदेड़ा गया. क्या यह उचित है. जावेद साहब ने हकीकत बयां की है कि हिंदू धर्म में खुले दिल से सबकुछ स्वीकार करने देने की अनुमति है. यह इसकी खूबसूरती है. लेकिन हम इसे ही खोते जा रहे हैं और यही हकीकत भी है. हम अपनी संस्कृति सभ्यता को भूल कर केवल जबरदस्ती करने में यकीन कर रहे हैं और बिल्कुल अनुचित है. यह जानना समझना बेहद जरूरी है कि आप किसी से न जबरदस्ती सम्मान हासिल कर सकते न उन्हें बाध्य करें. गंभीरता से इस बारे में सोचना बहुत जरूरी है.

मैं खुद से कभी खुश नहीं होना चाहती : कृति


कृति सनोन की दूसरी फिल्म है दिलवाले. और उन्हें ही दूसरी पारी में एक बड़ी पारी खेलने का मौका मिला है. इस बात को वह खुद भी स्वीकारती हैं. उनका मानना है कि वे अभी किसी भी हड़बड़ी में नहीं हैं. वे सोच समझ कर फिल्में कर रही हैं.
 दिलवाले का संयोग कैसे बना?
मुझे रोहित शेट्ठी सर के आॅफिस में बुलाया गया था. हमारी छोटी बातचीत हुई और फिर उन्होंने दूसरे दिन ही यह बात कह दी कि मैं यह फिल्म कर रही हूं. मेरे लिए यह सोच पाना काफी इमेजनरी ही था कि मुझे इस फिल्म में काम करने का मौका मिल रहा है और मैं शाहरुख सर के साथ काम कर रही हूं. लेकिन सबकुछ बहुत जल्दी जल्दी हुआ.
शाहरुख खान के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
इससे पहले मैं शाहरुख सर से कभी मिली नहीं थी तो मुझे यह भी पता नहीं था कि वे कैसे होंगे. मैं लेकिन जब उनसे पहली बार मिली मुझे लगा कि नहीं कि मैं उनसे पहली बार मिली हूं. मैं उनकी फिल्में देखते हुए बड़ी हुई हूं और वे मेरे फेवरिट एक्टर में से एक रहे हैं. मैंने जैसे जैसे उन्हें करीब से जाना महसूस किया कि वे जो रियलिटी में हैं. वह बहुत आम इंसान हैं. उन पर स्टारडम हावी नहीं है, उन्होंने कभी यह जताने की कोशिश नहीं की है कि वह सुपरस्टार हैं और हमें उनसे कम होकर रहना है. बात करते हैं तो लगता है कि उनके मन का दिल्ली वाला लड़का बाहर आ गया है. मैं खुद भी दिल्ली से हूं इसलिए काफी कनेक्ट कर पाती हूं. कंफर्टेबल महसूस कराते हैं. पहले पांच सेकेंड में ही आपको महसूस करा देंगे कि आप उनके साथ फ्रेंडली हो सकते हैं. वह काफी चार्मिंग हैं. लोगों को इज्जत देते हैं. लड़कियों की इज्जत करते हैं. अपने स्टाफ की इज्जत करते हैं. फिर चाहे वह उनके स्पॉट ब्वॉय ही क्यों न हो. वह जितना प्यार देते हैं. इसलिए उन्हें प्यार मिलता है.
काजोल के साथ कैसा रहा अनुभव?
मैं शाहरुख सर से तो काफी फ्रेंडली हो गयी थीं. लेकिन उस वक्त तक काजोल मैम के सीन शुरू नहीं हुए थे. तो मैं उनके साथ काम करने को लेकर ज्यादा नर्वस थी. वह जब पहली बार मिली थीं. तो एकदम से हमारी बातें शुरू नहीं हुई थीं. क्योंकि काजोल मैम खुलने में वक्त लेती हैं. लेकिन धीरे धीरे जब साथ काम करने लगे तो हम में अच्छी जमने लगी. काजोल मैम काफी समझाती थी कि इस डॉयलॉग को ऐसे बोलो तो अच्छा रहेगा. तो काफी सीखती थी मैं. काजोल मैम की खास बात यह है कि वह जितनी भी मस्ती करें. कैमरा आॅन हो जाने पर वह कुछ और ही हो जाती हैं. उनके साथ मेरा पहला दृश्य काफी इमोशनल सीन था. तो काफी टफ था पहला दिन. लेकिन काफी अच्छे से वह सीन आया. तो हमारी केमेस्ट्री की शुरुआत वही से हुई.
कृति आप इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं. फिर यह क्षेत्र चुना, तो कहीं से महसूस करती हैं कि इस प्रोफेशन में वह पढ़ाई काम आयी है?
इंजीनियरिंग की पढ़ाई में काफी याद करना पड़ता था क्योंकि एग्जाम बहुत ज्यादा होते थे. तो एक चीज अच्छी हुई  है कि मुझे अब काफी याद रहने लगी हैं चीजें. मेमोरी शार्प हो जाती है तो आप अपने सीन भी अच्छे से और जल्दी याद कर लेते हो.
आपने मॉडलिंग भी की थी?
मैंने मॉडलिंग काफी की थी. मैंने  टीवी कमर्शियल काफी किये थे और मुझे करने में मजा भी बहुत आता था. रैंप करने में मुझे इतना मजा नहीं आता था. और मेरा कभी गोल भी नहीं था कि मुझे एक्टिंग ही करना है. हां, मगर मैंने यह जरूर महसूस किया कि मेरी बॉडी है हाइट है तो मुझे एकबार ट्राइ जरूर करना चाहिए. तो मैं एक्सपीरियंस के लिए आयी थी. मुझे उस वक्त ये बात समझ आयी कि मैं कैमरे के सामने कांसस नहीं हूं और उस वक्त ही मैंने इस बारे में सोचा कि अभिनय कर सकती हूं.
आपकी फैन फॉलोइंग धीरे धीरे बढ़ रही है? तो किस तरह से प्लान कर रही हैं अपनी करियर की?
मैं प्लानिंग में बहुत बुरी हूं इसलिए बहुत प्लानिंग से नहीं चल रही. लेकिन हां, मैं खुद को प्रूव जरूर करना चाहती हूं कि जो भी करूंगी मैं बेस्ट करूंगी और बेस्ट कर सकती हूं. मैं खुद से कभी खुश नहीं होना चाहती हूं. क्योंकि मुझे  लगता है कि आप जब अपने से बहुत खुश हो जाते हो तो आप मेहनत करना बंद कर देते हो. और मैं वह नहीं करना चाहती. मुझे लगता है कि फायर होना जरूरी है.  वह हमेशा रहना चाहिए.
एक्टिंग को लेकर आपका थॉट प्रोसेस क्या है?
मुझे लगता है कि मैं मेथेड एक्ट्रेस नहीं हूं. मैं ज्यादा स्पॉनटेनियस हूं और स्पोनटेनियस में ज्यादा अच्छा कर पाती हूं. मैं ज्यादा इंटेंस हूं. मैं दूसरे एक्टर की एनर्जी से भी काफी अफेक्ट होती हूं. तो मेरी कोशिश होती है कि एक सीन में जो कैरेक्टर है वह कैसे करेगा. हर कैरेक्टर का रियेक् शन अलग होता है. तो वह सबकुछ सोचती हूं. मैं कैरेक्टर का रिलेशन क्या है. उस पर सोचती हूं.
वरुण के साथ कैसा एक्सपीरियंस रहा?
मुझे टॉकेटिव लोग पसंद हैं. वरुण काफी टॉकेटिव हैं. वरुण की एनर्जी बहुत पोजिटिव है.और जिस एनर्जी के साथ सेट पर आता है वह आपको भी एनर्जी से भरपूर कर देगा. लेकिन उसके दिमाग में यह बात है कि वह अपने सीन को बेस्ट कैसे देगा. वह काफी मेहनती है. वह अपनी कमियों को भी पोजिटिव वे में लेता है. उसकी फिल्में लगातार हिट हो रही हैं. लेकिन उसने दिमाग में स्टारडम को हावी नहीं किया है. यह बहुत अच्छी बात है.
आपकी अगली फिल्म कौन सी है.
दिनेश विजयन की फिल्म है सुशांत सिंह राजपूत के साथ कर रही हूं. मुझे जिस तरह की कहानी पसंद है. यह फिल्म भी उनमें से एक होगी. 

मेरे लिए दोस्ती का रिश्ता अहम है : फरहान


फरहान अख्तर फिल्म वजीर से पहली बार एक् शन करते नजर आयेंगे. वे फिल्म रॉक आॅन की शूटिंग में भी व्यस्त हैं. वजीर को वह अलग मिजाज की फिल्म मान रहे हैं.
फरहान, यूं तो आप कई विधाओं में माहिर रहे हैं. लेकिन बात जब अभिनय की आती है तो आप फिल्मों के चयन को लेकर काफी सजग हो जाते हंै. तो वजीर को हां कहने की क्या वजह रही?
दरअसल, मुझे लगता है कि बात जब निर्देशन की आती है तो मैं अधिक चूजी हो जाता हूं. मैं वैसी ही फिल्में निर्देशित करता हूं जिनके विषय मुझे एक्साइट करते हैं. वजीर को हां कहने की वजह यह थी कि फिल्म की स्क्रिप्ट को खूबसूरत तरीके से लिखा गया है. विधु दोस्त हैं. अभिजात ने बेहतरीन तरीके से कहानी लिखी है. इस फिल्म की खूबी यह है कि फिल्म के किरदार आपको आकर्षित करेंगे.इस किरदार के साथ मैं इसलिए जुड़ा कि लगा कि वह आम है. मेरे साथ भी ऐसा सिचुएशन हो सकता है और मैं जब इस सिचुएशन में रहूंगा तो किस तरह बर्ताव करता. यह सोचने पर मजबूर करती है कहानी.
आपकी फिल्मों में दोस्ती का एक खास एंगल जरूर होता है. वजीर में भी क्या वह एंगल है?जी हां, बिल्कुल है. दोस्ती का अहम हिस्सा है. इसमें दोस्ती एक एटीएस आॅफिसर और शतरंज मास्टर के बीच होती है और जैसा कि सभी जानते हैं कि मेरी फिल्म में दोस्ती महत्वपूर्ण होती है. विधु खुद कम दोस्त बनाते हैं. लेकिन दोस्ती निभाते हैं. तो इस फिल्म में भी वह एंगल है.
वास्तविक जिंदगी में आपके लिए दोस्ती क्या मायने रखती है?
मुझे लगता है कि  मैं इस मामले में लकी रहा हूं कि मेरे जितने भी दोस्त बने हैं इंडस्ट्री से भी. वे आज भी मेरे साथ हैं. मेरे लिए खास हैं. मैं उनके लिए खास हूं.फिर वह अभिषेक हो, ऋतिक हों, प्रीति जिंटा, उदय सभी मेरे क्लोज दोस्त हैं. मुझे याद है प्रीति मेरे घर आयी थीं. क्या कहना का स्क्रीन टेस्ट देने के लिए उस वक्त मैं दिल चाहता है लिख रहा था. और उस वक्त हमारी मुलाकात हुई थी. मैंने स्क्रीन टेस्ट देखा था और काफी पसंद आयी थी मुझे उनकी एक्टिंग़,. उस वक्त ही मैंने उन्हें दिमाग में रख कर कहानी लिखनी शुरू की थी.  और प्रीति ने मुझसे कहा कि मैं यह फिल्म करूंगी. तुम जब भी बोलोगे. फिर कहानी पूरी हुई और मैंने प्रीति को कॉल किया और वह हमारे साथ जुड़ी. आज भी प्रीति से मेरी दोस्ती वैसी ही है जैसे कई सालों पहले थी. शाहरुख मेरे बहुत खास दोस्तों में से एक हैं. शाहरुख से भी मेरी दोस्ती सिर्फ फिल्मों की वजह से नहीं है. मुझे लगता है कि जब भी कभी जरूरत होगी शाहरुख खड़े होंगे. सो, मैं लकी हूं कि मेरे पास अच्छे दोस्तों की लिस्ट है. और मुझे लगता है कि मेरे दोस्त मेरी इस क्वालिटी को पसंद करते हैं कि वे मुझ पर विश्वास कर सकते हैं और वे जानते हैं कि मैं उनका और वे मेरी इज्जत करते हैं. किसी भी रिश्ते में यही दो खास बातें होती हैं.
रईस का पोस्टर काफी रोचक नजर आ रहा है?
दरअसल, यह फिल्म 80 के दशक पर सेट है. और उस दौर में इस तरह का ही मिजाज होता था. लोगों का. तो वे सारी बातों को ध्यान में रख कर हमने फिल्म का पोस्टर जारी किया है. मुझे लगता है कि दर्शकों को भी फिल्म पसंद आनी चाहिए. लेकिन कोई दावा नहीं कर सकता अभी से.
हाल ही में आपने आइ कैन दू डैट का सफर टीवी पर तय किया. कैसा रहा अनुभव?
मुझे टीवी हमेशा इंस्पायर करता है. खासतौर से आइ कैन दू डैट बिल्कुल अलग शो रहा. इसमें दुनिया की कई नयी चीजें देखने को मिली. सीखने को मिली. यह शो देख कर कितनी प्रेरणा मिली है कि कोई इंसान जिसे बिल्कुल पता नहीं है उस विधा के बारे में. लेकिन वह किस तरह सीखता है.फिर उसको परफॉर्म करते हैं. आसान काम नहीं है. टीवी पर आकर करना बहुत कठिन है. मैं शॉक्ड था, लोगों के परफॉरमेंस को देख कर.
मर्द को लेकर किस तरह और काम किये जा रहे हैं?
और भी कई इनिशियेटिव लिये जा रहे हैं. हम दिसंबर तक एक ऐसा डियोडेरेंट लांच कर रहे हैं, जिसमें लड़कों को लड़कियों के रिस्पेक्ट की बात समझायेंगे. और उसकी कमाई से चैरिटी होगी और इस तरह के और भी कई इनिशियेटिव ले रहे हैं.
अमिताभ बच्चन से क्या क्या सीखने का मौका मिला?
लक्ष्य के वक्त भी अमितजी के साथ जुड़ा था. उस दौर से लेकर अबतक मैंने देखा है कि अमितजी की एक चीज नहीं बदली वह यह है कि वह आज भी अनुशासित हैं और उनमें सीखने की भूख अब भी जारी है. काफी कुछ सीखने का मौका मिलता है. उनसे. मेरे पिताजी और उनके दौर की कई सारी कहानियां भी वे शेयर करते हैं. लेकिन मैं उन्हें यहां शेयर नहीं कर सकता.

खुश हूं अपने करियर से : अदिति शर्मा


अदिति शर्मा ने ज़ी सिने स्टार की खोज से अभिनय की दुनिया में दस्तक दी थी और एक बार फिर से वह ज़ी के ही चैनल एंड टीवी के शो गंगा में बड़ी गंगा का किरदार निभाने जा रही हैं। हाल ही में शो की शूटिंग वाराणसी के घाट पर हुई। 
अदिति आपने शुरुआत ज़ी से ही की थी। अब एक बार फिर से ज़ी से जुड़ने का मौका मिला है।इस संयोग को किस तरह देखती हैं आप?
मैं बेहद खुश हूं कि मुझे इस इस शो से ज़ी के माध्यम से ही जुड़ने का मौका मिला है।क्योंकि मैंने अपने करियर की शुरुआत इसी चैनल के साथ शुरू किया था। तब से लेकर अबतक में लगातार काम कर रही हूं और मुझे हर तरह के जॉनर में काम करने का मौका मिला है। सिने स्टार ही पहला जरिया बना. आज फिर से शो के। साथ जुड़ी हूं और वह भी इतने बेहतरीन शो से जुड़ने का मौका मिला है। तो मैं बहुत खुश हूं।
इस शो में गंगा के किरदार पहले से ही एक स्थापित किरदार है। छोटी गंगा ने दर्शकों का पूरी तरह दिल जीता है। तो ऐसे में एक चुनौती नजर आ रही?
जी हां चुनौती तो है ही। बच्चे ऐसे भी जो किरदार निभाते हैं। उनके किरदारों में इतनी सच्चाई और मासूमियत होती है कि वे दर्शकों के दिलों को छूते भी हैं।सो चुनौती है मेरे लिए। लेकिन मुझे यह भी लगता है कि जिस तरह शो के निर्देशक ने इसे बनाया है और कहानी में नए नए एंगल दिखाए जाएंगे। उनके लिए मैं पूरी तरह से तैयार हूं।जिंदगी में एक पड़ाव आता ही है जब आगे की कहानी भी दिखाई जानी जरूरी है।सो बिल्कुल सही वक़्त पर एक नयी शुरुआत हो रही है।
इस किरदार में ढलने के लिए किस तरह की तैयारी की है आपने?
मेरी कोशिश होगी कि गंगा की जो अपनी मासूमियत है वह बरकरार रहे। ऐसा न हो कि दर्शक बोर हो जाएं तो मैं अपने एक्सप्रेशन को लेकर इन बातों का ख्याल रखूंगी। इसके अलावा कोशिश होगी कि स्वाभाविक नजर आऊं।
बनारस से गंगा का नत खास रहा है। आप अभी वाराणसी के घाट पर ही शूटिंग कर रही हैं।यह अनुभव कैसा है?
बनारस मैं पहले भी आती रही हूं। मेरे दादा दादी यही रहते थे और बचपन की कई यादें जुड़ी हैं।लेकिन घाट पर जाकर शूटिंग करने का एक्सपीरियंस बिल्कुल अलग है। यहां एक ही घाट पर कई चीजें होती रहती हैं। तो जिंदगी के कई पहलुओं से रूबरू होने का मौका मिलता है। आप एक झटके में जिंदगी की कई चेहरे से आमना सामना करते हैं। एक तरफ आरती है तो दूसरी तरफ मसान है। आप जिंदगी की कई हकीकत से आमना सामना करते हैं।बनारस उस लिहाज से भी काफी खास है।
आपने जिस तरह शुरुआत की और आपको जिस तरह की लॉन्चिंग मिली थी आपको लगता है उस तरह से काम करने का मौका आपको नहीं मिला ?
नहीं मुझे किसी बात का दुख नहीं है। ऐसा नहीं है कि मुझे अच्छे मौके नहीं मिले हैं। मैंने भी लगातार काम किया है। अच्छे निर्देशकों के साथ काम किया है।और फिर मैंने हमेशा किरदारों को एहमियत दी है।और उन किरदारों में भी दर्शकों ने मुझे याद रखा है। यही मेरे लिए खास बात है।
किसी टीवी शो में यह आपकी पहली शुरुआत है। कैसा लग रहा अनुभव?
काफी अलग अनुभव है। अब जब पहली बार डेली सोप में काम कर रही तो समझ आ रहा की किस तरह यहां फिल्मों से अधिक मेहनत है। हर दिन एपिसोड्स को पूरा करने और बैंक बनाने की कितनी जरूरत होती है। मेरे को स्टार विशाल जोकि शो में सागर की भूमिका में हैं। उनसे मैंने सीखा कि किस तरह भीड़ की बीच भी आपको काम करना होता है।किस तरह भीड़ को नियंत्रित करना होता है और किस तरह अगर फैन आपसे बातचीत करना चाहते हैं तो उन्हें भी अटेंशन देना होता है। फिल्मों का सेट अप अलग तरीके का होता है। वहां सारा काम प्रोडक्शन कन्ट्रोलर करते। आपको सिर्फ एक्ट करना होता है।लेकिन यहां चूंकि आप हर दिन लोगों से मिलते हो तो आपको आम आदमी से कनेक्ट होना पड़ता है। इसलिए आम लोगों को आप इग्नोर नहीं कर सकते। यह सारी बातें मैं विशाल से सीख रही हूं। अब धीरे धीरे इस दुनिया को भी समझने की कोशिश कर रही हूं
एक नयी चुनौती है सागर:विशाल
सागर का किरदार काफी चुनौती भरा हुआ है। चूंकि स्थापित किरदार हैं।मुझे खुशी है कि वीरा के बाद मैंने छोटा सा ब्रेक लिया और फिर से मुझे एक अच्छा सा किरदार निभाने का मौका मिल गया। सागर का बच्च्पन काफी शरारती रहा है। मेरी भी शरारतें जारी रहेंगी। हर बार नए लोगों के साथ काम करने का Pअनुभव नया होता है। अदिति का भी साथ मिला है। हमारी कोशिश होगी कि विधवाओं को लेकर जिस तरह की सोच है। उस सोच को नई दिशा देने में यह शो किस हद तक सहायक हो सकती यही मोटिव होगा ।साथ ही एक प्रेम कहानी भी दिखाने की कोशिश होगी। मुझे उम्मीद है कि जिस तरह बलदेव को दर्शकों का प्यार मिला है। आगे वह प्यार सागर को भी मिलेगा। सागर और गंगा के बीच भी किस तरह का प्यार संभव है। यह शो दर्शायेगा।

अभिनय जिंदगी से हमेशा जुड़ा रहेगा


मशहूर अभिनेत्री सारिका अब भी मानती हैं कि अभी ऐसे कई किरदार हैं जिन्हें उन्होंने नहीं निभाया है। वे हर तरह के जॉनर में काम करना चाहती हैं। और वे स्पष्ट रूप से कहती हैं कि उनके लिए टीवी या फिल्म कोई भी माध्यम हो सकता। तभी तो वह तवज्जो परफॉरमेंस को देती हैं। धारावाहिक युद्ध के बाद वे हाल ही में डर सबको लगता है का हिस्सा भी बनी। 

हाल में आप डर सबको लगता है का हिस्सा बनी। इससे पहले आपने टीवी के लिए युद्ध शो किया था। तो इन धारावाहिकों में ऐसी क्या खास बात नजर आयी?
दरअसल ऐसा नहीं है कि मैंने खुद को सीमित कर रखा है कि मुझे टीवी में नहीं सिर्फ फिल्मों में काम करना है।मैंने कभी माध्यम नहीं बांटा। जब जैसे अवसर मिले मैंने काम किया।और आगे भी करती रहूंगी। युद्ध का कॉन्सेप्ट मुझे बहुत अच्छा और अलग लगा था। और इसी वजह से मैंने शो को हां भी कहा था। जितनी मेहनत करते मैंने वहां लोगों को देखा। मैं इस बात से हताश हुई कि दर्शकों कप वह शो पसंद नहीं आया।लेकिन वह एक बेहतरीन शो था। इसी तरह जब मुझे दर सबको लगता है का ऑफर आया तो मैंने तुरंत हां कहा। साथ ही एक वजह यह भी थी कि मेरे लिए मेरे निर्देशक मैटर करते हैं। सौमिक जिन्होंने दर सबको लगता है का वह एपिसोड निर्देशित किया था। उन्हें में काफी सालों से जानती हूं और मैं जानती हूं कि वह अच्छा काम करते हैं तो ऐसे लोगों से सीखने का बहुत मौका मिलता है।
आपने खुद भी कई हॉरर फिल्मों में काम किया है। उस दौर में और अबके दौर में इस जॉनर में बनने वाली फिल्मों या धारावाहिकों में क्या बदलाव देखती हैं?
मुझे लगता है कि हर स्तर पर बदलाव आये हैं।उस दौर में सारी फिल्मों की कहानी एक सी होती थी। लेकिन मुझे लगता है कि उस दौर में वही सब कुछ चलता था।उस दौर में रामसे ब्रदर्स वैसी फिल्में भी बना पाएं यह बड़ी बात थी।चूंकि उस वक़्त तकनीक इतनी तरक्की नहीं कर पायी थी। उस दौर में रामसे ब्रदर्स की फिल्मों से लोग डरे यह बड़ी बात है।मुझे याद है हम काफी मस्ती भी किया करते थे। उस वक़्त अधिक मेहनत नहीं करनी होती थी। हम सिफोन साड़ियां पहनकर दौड़ते रहते थे और काम हो जाता था। मजेदार खाना मिलता था अयर बड़ा मज़ा आता था। मैंने तीन फिल्मों में काम किया जो हॉरर जोनर की थी। उस वक़्त लोग उसे बी ग्रेड की फिल्में मानते थे। लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसे बी ग्रेड फिल्मों की तरह देखा जाना चाहिए। चूंकि उस वक़्त साधन सीमित थे।और फिर भी लोगों ने फिल्में बनायी भी और लोगों को डराया भी। आज के दौर में लोग स्मार्ट हो गए हैं। एक्सपोजर उनका बढ़ा है। जाहिर है आज हॉरर जॉनर के मेकर्स के लिए बड़ी चुनौती है कि वे किस तरह कुछ नयी चीजें दिखाई जाये।कुछ नयी कहानी  कहनी जरूरी है। साथ ही यह भी आज ध्यान रखना जरूरी है कि हॉरर फिल्म कहीं कॉमेडी न बन जाये, क्योंकि आजकल दर्शक कई चीजें देखते हैं और वे सारी हकीकत और तकनीक से वाकिफ होते हैं। आप उन्हें चीट नहीं कर सकते।तो आपको हर तरह से अलर्ट रहना होगा। वैसी स्तरीय चीजें परसोनी होगी।
आपकी छोटी बेटी अक्षरा ने हाल ही में अपने करियर की शुरुआत की है। उनके काम से कितनी संतुष्ट हैं आप?
मैं अपने बच्चों के काम में बिल्कुल दखल नहीं देती और न ही मैं कभी उन्हें कोई सलाह देती हूं। मुझे खुशी है कि वह अपनी राह खुद तैयार कर रहे हैं। उन्हें किसी तरह की सलाह की जरूरत नहीं होती।साथ ही वे बहुत स्मार्ट होते और खुद दुनिया को मुठ्ठी में लेकर चलते हैं। मुझे खुशी है कि छोटी उम्र से ही अक्षरा ने खुद को पैरों पर खड़ा करना सीख लिया है। उसे पहली ही फिल्म में  बेहतरीन कलाकारों अमिताभ बच्चन और धनुष के साथ काम किया। उसकी शुरुआत बहुत अच्छी हुई है और पूरी उम्मीद है कि आगे भी वह अच्छा काम करेगी।  मैं उन्हें किसी बजि तरह से गाइड नहीं करती। और मैं उन्हें बस एक ही सलाह देती हूं कि उन्हें बस काम करने की जरूरत है। लेकिन उनके मन लायक काम।
आपने हाल ही में हॉरर शो में काम किया वास्तविक जिंदगी में कभी किसी हॉन्टेड जगह में वह डर महसूस किया?
सच कहूं तो मैंने कई हॉरर फिल्मों में काम भी किया है लेकिन मुझे कभी उन चीजों से डर नहीं लगा। लेकिन मैं मानती हूं कि कोई शक्ति होती है।अगर ईश्वर है वो भी है।लेकिन ये इन सारी बातों पर निर्भर करता है कि आप उस नेगेटिव एनर्जी को कितना अपने पास बुलाते हैं। आप जितना डरेंगे वह एनर्जी आपको उतनी ही परेशान करेगी। इन सारी बातों को कहने का यह मतलब नहीं कि मैं अंधविश्वासी हूं। हॉन्टेड जगहों पर मुझे ये बात जरूर महसूस होती है कि वहां नेगेटिव एनर्जी होती है और आप कभी कभी वहां असहज भी महसूस करने लगते हैं। कोई कारण हो या न हो।
क्योंकि यह हकीकत है कि दर सबको लगता है।
आपकी पसंदीदा हॉरर फिल्में कौन कौन सी रही हैं
मुझे हेलेन और मेहमूद साहब की गुमनाम पसंद है। इसके अलावा वो कौन थी की कहानी बेहद पसंद है।इन सारी फिल्मों में बहुत अच्छी कहानियां रही हैं। अधिकतर हिंदी फिल्मों में जहां तक में समझती हूं कहानियों में हॉरर के साथ साथ थ्रिलर का भी अंगले अवश्य रहा है इसलिए हम हर फिल्म को हॉरर नहीं बोल पाते। लेकिन फिल्म अंतिम तक हॉरर फिल्मों के रूप में रहती है तो दर्शक काफी डरते भी हैं लेकिन बाद में फिल्म थ्रिलर बन जाती है। इसलिए लोग अब तक हॉरर और थ्रिलर को कैतेग्राईज़ नहीं कर पाये हैं।
टीवी पर किसी हिंदी शो को फॉलो करती थीं आप?
नहीं मैं ईमानदारी से कहूंगी कि हिंदी टीवी मैं नहीं देखती। हां मगर में अंगरेजी शो बहुत फॉलो करती हूं।टू डिटेक्टिव मेरा पसंदीदा शो है।में चाहती हूं कि कुछ वैसा काम हमारे टीवी में भी हो तो मैं जरूर करना चाहूंगी।
एक्टिंग के अलावा kin चीजों में दिलचस्पी रही है।
मुझे पेरफोरमंस वाली सारी विधाएं पसंद हैं और मुझे मौका मिले। अच्छे काम मिलें तो मैं इस दुनिया से कभी दूर नहीं हो सकती हूं। मेरे लिए परफॉर्मेंस का माध्यम महत्वपूर्ण है।