My Blog List

20150420

लैला को बेचारगी नहीं चाहिए


कल्की कोचलिन को उनकी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म मारगरिटा विथ द स्ट्रॉ के लिए काफी सराहना मिल रही है. इस फिल्म को कई पुरस्कार समारोह का हिस्सा बनने का भी मौका मिला है. 
कल्की, इस फिल्म को हां कहने के पीछे सबसे बड़ी वजह क्या रही?
मैं खुद इस तरह के विषयों में यकीन करती हूं. यह कहानी लैला नामक एक लड़की के इर्द गिर्द घूमती है. जो कि सेरेबल पाल्सी से ग्रसित है. इस फिल्म में लैला के सफर को दिखाया गया है. मैं खुद अडेप्ट( संस्थान जो ऐसे लोगों के लिए काम कर रही है) से कई सालों से जुड़ी हूं. इसके मारेथन में हिस्सा लेती हूं. वर्कशॉप का हिस्सा हूं. तो मेरे लिए तो यह खुशनसीबी की बात थी कि मुझे इस फिल्म में कास्ट किया गया. मैं पर्सनली भी मालिनी को जानती हूं, जो कि निर्देशिका शोनाली बोस की कजिन हैं, जो इस बीमारी से ग्रसित हैं. वह किस तरह अपनी जिंदगी को जीती हैं. वह हर किसी के प्रेरणा है.
क्या आपको लगता है कि ऐसी फिल्में कुछ संदेश पायेंगी?
जी मुझे लगता है कि किसी फिल्म का मकसद, खासतौर से जब ऐसे विषय पर फिल्म बन रही है तो संदेश से अधिक मकसद यह होना चाहिए कि ऐसी खबरें दर्शकों के सामने आयें कि आखिर ये लोग जिन्हें डिस्काउंट दे दिया जाता है. बेचारगी दिखाई जाती है. वह कैसे सामान्य सी जिंदगी जी सकते हैं. आपको वह समझना होगा. आपको यह भी समझना होगा कि हमारे देश में इन्हें हीन भावना से सिर्फ इसलिए देखते क्योंकि उनके किसी एक अंग में परेशानी है. हमारे देश में तो वैसी सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है. अलग तरह की लिफ्ट, ट्रेन, बस, स्कूल कुछ भी नहीं.विदेशों में ऐसे लोगों के लिए सबकुछ है. वहां सबके साथ सामान्य व्यवहार होता है और वही इस फिल्म में भी दर्शाया जायेगा.
आप मानती हैं कि ऐसे विषय के साथ जब एक सेलिब्रिटी जुड़ते हैं तो प्रभाव अधिक पड़ता है?
हां, मुझे लगता है कि हमारी फिल्म को आमिर खान ने काफी सपोर्ट किया है और इसका प्रभाव पड़ भी रहा है. मुझे इस तरह के काम में मजा आता है. यह मेरे लिए सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है. मैं थियेटर को जिस तरह एंजॉय करती हूं. इन कामों को भी करती हूं. मुझे अगर दो दिनों की छुट्टी मिल जाये तो मैं सिर्फ काम करूंगी और कुछ नहीं.
आपको हमेशा से पढ़ने लिखने का शौक रहा है, यही वजह रही कि आप थियेटर से जुड़ीं?
हां, बिल्कुल यह वजह रही. मुझे लगता है कि थियेटर में कोई दिखावा या छल कपट नहीं है. आप जो हैं सामने हैं. मैं बचपन में इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ा करती थी तो जब मैं गरमी की छुट्टियों में घर जाया करती थी. उस वक्त सारे बच्चे स्कूल में होते थे तो मैं उस वक्त पढ़ती बहुत थी. लिखती बहुत थी. मेरी मां ने अब तक वह सारी डायरियां रखी हैं और यही वजह है कि मेरा पढ़ने की तरफ झुकाव हुआ और मैंने अपने साथ अधिक से अधिक वक्त गुजारा तो मुझे अब अकेले रहने में भी कोई दिक्कत नहीं होती है.
यह फिल्म एक कलाकार के रूप में शारीरिक रूप से भी कितनी कठिन थी?
काफी कठिन थी. मुझे लगता है मेरा अब तक का सबसे कठिन किरदार है. मैं तीन महीनों तक हमेशा ज्यादा समय व्हील चेयर पर होती थी. मैंने मालिनी को देखा. किताब पढ़ी. अडाप्ट जाती थी. वहां देखती थी लोगों को. बोलने का ढंग़, रहने का ढंग मैंने इस किरदार के लिए काफी महसूस किया है. तब जी पायी इस किरदार को.मैंने लगभग छह महीनों तक इस किरदार के लिए मेहनत की है. उस वक्त मैं ये जवानी है दीवानी की शूटिंग भी कर रही थी. लेकिन मैं अपना ध्यान इस किरदार पर पूरी तरह से रखती थी. मेरी कोशिश होती थी कि मैं लैला की तरह बर्ताव करूं. मैं उसी तरह नाश्ता करूं. ब्रश साफ करूं. उसकी तरह फोन पर बातें करूं. यही वजह थी कि मैं फिल्म में अपने किरदार को बखूबी निभा पायी.
क्या आपको लगता है कि आप जितनी प्रतिभाशाली हैं. वैसे किरदार आपको आॅफर  हुए हैं अबतक?
नहीं मुझे नहीं लगता. इंडस्ट्री बहुत डबल स्टैंडर्ड हैं. मुझे तो समझ ही नहीं आता कि इंडिया में भी कितने इंडिया है. हर जगह लोग अलग तरह की बातें करते हैं और कहेंगे हम एक हैं. मुझसे भी कई लोगों ने ऐसे सवाल पूछे हैं और पूछते ही हैं कि मैं अंगरेज हूं क्या या मेरे माता पिता वहां के हैं क्या? लेकिन वही दूसरी तरफ उन्हें लीड में खूबसूरत लड़की चाहिए वह भी गोरी चिट्टी. तो मैं इन बातों पर गौर नहीं करती. हां, जो करना चाहती हूं कर रही हूं और मैं खुश हूं.
अनुराग कश्यप से संबंधित सवाल आपसे लगातार पूछे जाते हैं तो कहीं इस बात से परेशानी होती है?
हां, मुझे इस बात से बहुत परेशानी होती है कि लोग लगातार यही सवाल पूछते हैं.यहां तक कि मुझे यहां घर मिलने में भी परेशानी हो रही है. सिर्फ इस वजह से क्योंकि मैं सिंगल हो चुकी हूं. आज से छह साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी. तो मुझे लगता है कि इन छह सालों में हम अपनी सोच को पीछ ेलेकर जा रहे हैं या आगे की सोच रहे हैं. 

उर्दू दुरुस्त किया इस शो के बहाने : अहसान


जिंदगी चैनल पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक वक्त ने किया क्या हसीं सितम में सलीम की भूमिका निभा रहे  अहसान खान इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्हें भारत में दर्शकों का बेहद प्यार मिल रहा है.हाल ही में उन्होंने वीडियो कांफ्रेसिंग के माध्यम से अनुप्रिया अनंत से बातचीत की. 

अहसान, वक्त ने किया क्या हसीं सितम एक उपन्यास पर आधारित है और इस शो में भारत-पाकिस्तान विभाजन के कई मुद्दों को भी दर्शाया गया है.तो आपने सलीम के लिए किस तरह से तैयारी की?
मुझे जब निर्देशक ने इस शो के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे बानो उपन्यास दिया था. यह शो पाकिस्तान में दास्तां नाम से प्रसारित हुआ और दर्शकों ने काफी पसंद किया. मैंने उस उपन्यास को पढ़ने के बाद खुद उस दर्द को महसूस किया कि जब पाकिस्तान और भारत अलग हुए होंगे तो दोनों मुल्कों ने क्या क्या दुख दर्द झेला होगा. कितने परिवार बर्बाद हुए होंगे. मैं इस शो में एक मुसलमान हूं. लेकिन फिर भी मैं हिंदुस्तान का हिमायती हूं. सो, उस लिहाज से यह शो बहुत प्रासंगिक है कि इसमें सिर्फ किसी एक मुल्क की तरफदारी नहीं की गयी है. यह शो मेरे करियर का सबसे कठिन शो है. चूंकि पीरियड होने के साथ साथ इसमें जो इमोशन दिखाना था. टफ था. साथ  ही इसके अल्फाज़. मेरी उर्दू बहुत दुरुस्त नहीं, क्योंकि मैं पाकिस्तान में बहुत नहीं रहा. लेकिन निर्देशक की वजह से मैंने अपना उर्दू ठीक किया. और मैं खुशनसीब हूं कि मुझे इतने बेहतरीन शो में काम करने का मौका मिला.
एक पीरियड ड्रामा में काम करना कितना कठिन होता है? 
बहुत कठिन होता है. चूंकि आपको उस दौर में जाकर उस दौर के कपड़े, उस दौर के तौर तरीकों को समझना होता है. उस दौर की परेशानी. उस दौर के समाज़. उस दौर की सामाजिक संरचना सबकुछ समझना होता है. उस दौर में लोग किस तरह से बात करते थे. क्या बातें होती थीं. खासतौर से मुद्दा अगर विभाजन को लेकर है तो और ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ती है. साथ ही निर्देशक के लिए यह बेहद कठिन है कि वह आज के दौर में बीते दौर की बात करे और वह भी सीमित संसाधन में. तो कोशिश भी यही होती थी कि हम उन्हें पूरी तरह से सपोर्ट करें. मुझे इस शो में काम करने के दौरान इस बात का भी सुकून है कि इसी बहाने मैंने वह दौर जिया. जो कि बेहद खुशनुमा था. सभी मिल कर रहते थे. एक दूसरे पर जान छिड़कते थे. हिंदू या मुसलमान की भावना नहीं थी. आपसी प्रेम था. उस दौर के लोकगीत सबकुछ जीवंत तरीके से इस शो में नजर आया.
अहसान, फवाद और अली जफर बॉलीवुड में काफी लोकप्रिय हैं. क्या आपको मौका मिला तो आप भी बॉलीवुड का हिस्सा बनना चाहेंगे?
जी हां, बिल्कुल बनना चाहूंगा. यह मेरी खुशनसीबी होगी. मुझे आमिर खान का काम बहुत पसंद है. मैं चाहूंगा कि कभी अगर मुझे उनकी तरह के किरदार निभाने  के मौके मिलें तो मैं खुशी खुशी करूं. मुझे फक्र है कि फवाद और अली इन दो कलाकारों को वहां के दर्शकों ने बेशुमार प्यार दिया है. निस्संदेह बॉलीवुड काफी लोकप्रिय है. हम सभी पाकिस्तानी कलाकार फैन हैं बॉलीवुड के. कभी मौका मिले तो मैं जरूर हिस्सा बनना चाहंूगा.जिंदगी चैनल के माध्यम से हमें भारतीय दर्शकों से रूबरू होने का मौका मिल रहा है. वरना, पहले सिर्फ हम वहां का बॉलीवुड देख पाते थे. और हमारे शोज सिर्फ पाकिस्तान में ही दिख कर बंद हो जाते थे. लेकिन जिंदगी चैनल की वजह से पूरे मुल्क में फैले भारतीय दर्शक हमें पसंद करते हैं. मेरे पास कई इमेल आते हैं तो बेहद खुशी होती है कि अब हमारा दायरा बढ़ा है. एक कलाकार के लिए इससे खुशी की बात क्या होगी कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शक मिले.
इस शो में कई ऐसे संवाद व दृश्य भी हैं, जो हिंदुस्तान के पक्ष में नहीं हैं तो जब इसके प्रसारण की बात भारत में हुई थी तो कहीं से मन में भय था कि कोई विवाद हो सकते हैं?
जैसा कि मैंने आपको पहले भी कहा कि यह शो उपन्सास पर आधारित है तो जाहिर  है, इसमें मनगढंत बातें नहीं हैं. साथ ही आप शो देखेंगे तो महसूस करेंगे इसमें किसी की तरफदारी नहीं है. आप देखेंगे कि किस तरह दो हिंदू हैं. लेकिन एक के मन में पाप है. लेकिन दूसरा मदद करता है. कुछ इसी तरह एक मुसलमान गलत सोच रखता है तो दूसरा मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाता है. एक हिंदू किस तरह पाकिस्तान के मुसलिम की मदद करता है. तो मुझे नहीं लगता कि इस पर विवाद की बात है. निर्देशक ने यह प्रेम कहानी मानवता को ध्यान में रखते  हुए दिखाई है कि कैसे दो प्रेमी विभाजन की वजह से अपना प्रेम खो बैठते हैं और चाह कर भी पहले की तरह  हालात नहीं हो पाये. मैं जब यह शो कर रहा था तो कई बार सपने में बुरे ख्याल आ जाते थे तो आंखें खोलने के बाद अल्लाह का शुक्रिया बोलता था कि मेरे परिवार वालों ने यह दर्द नहीं झेला. वरना, मुझ पर क्या बीतती.

अपनी मां की वजह से इस शो से जुड़ा : गोविंदा


गोविंदा इन दिनों जीटीवी के शो डीआइडी सुमर मॉम्स में बतौर जज की भूमिका निभा रहे हैं और गोविंदा इस बात से काफी खुश हैं कि उन्हें उनके मिजाज से मेल करते हुए शो का हिस्सा बनने का मौका मिला है. 
गोविंदा, क्या आपने अचानक निर्णय लिया कि अब आप फिर से टेलीविजन की तरफ वापसी करेंगे?
नहीं, अचानक से नहीं. मैं काफी दिनों से टीवी पर कुछ करना चाहता था. लेकिन मेरे पास जैसे आॅफर आ रहे थे. मैं वैसे शोज में खुद को सहज नहीं मान रहा था. लेकिन डीआइडी एक ऐसा शो है, जो डांस शो है और डांस से जुड़ी हर बात मुझे पसंद है. सो, मैंने यह आॅफर तुरंत स्वीकार लिया. साथ ही मैं मानता हूं कि मेरी जिंदगी में मेरी मां की सबसे अहम भूमिका रही है और वैसी कोई भी चीज जिसमें मां को हुनर दिखाने का अवसर मिल रहा है. वह मेरे लिए भी खास ही होता है.
इससे पहले आपने टीवी के लिए जीतो छप्पड़ फाड़ के शो किया था. लेकिन वह खास कामयाब नहीं रहा. तो कहीं मन में कोई दुविधा है?
मुझे लगता है कि डीआइडी खुद स्थापित शो है. उन्होंने जज की भूमिका में मुझे चुना है. इसकी वजह भी वे अच्छे से जानते होंगे. चूंकि शायद उन्हें भी और दर्शकों को भी यकीन है कि गोविंदा है तो डांस में अच्छा ही करेगा. कुछ चीजें हैं, जिसमें मैं अपना क्षेत्र मानता हूं और इसलिए मुझे लगता है कि लोगों को निराश तो नहीं करूंगा. रही बात पिछली बातों की तो. ठीक है सफल नहीं हुआ शो. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि नयी शुरुआत नेगेटिविटी के साथ की जाये. अब मैं पूरी तरह से ट्रैक पर हूं और जम कर काम करूंगा.
गीता कपूर और टेरेंस के साथ काम करने का अनुभव?
वे दोनों ही मुझे बहुत इज्जत और सम्मान देते हैं. गीता तो हमेशा कहती है कि वह मेरी डांसिंग को देख देख कर इस क्षेत्र में आयी है. और मेरे डांसिंग मूव्स को काफी एडमायर करती थी. गीता के साथ एक अवार्ड शो में काम करने का मौका मिला था. लेकिन अब हम साथ साथ काम कर रहे. टेरेंस बेहतरीन डांसर हैं और उन्हें तकनीक पता है. वे प्रोफेशनल हैं तो मुझे भी उनके साथ सीखने का मौका जरूर मिलेगा.
एक जज के रूप में आप अच्छे डांसर में क्या खूबियां देखना चाहेंगे?
मुझे लगता है जो मेरी सोच रही है डांसिंग को लेकर वह यही रही है कि मैं डांस को इस तरह से देखता हूं कि मैं स्टेप्स में बातें करता हूं. जैसे मेरे सामने कोई और भी खड़ा हो. मैं डांसिंग से बातें करने की कोशिश करता हूं और मुझे लगता है कि इससे मैं अच्छा परफॉर्म कर पाता हूं. हर डांसर, हर कलाकार की अपनी खूबी होती है तो मैं हर मॉम में अलग अलग तरह की खूबियां देखना चाहूंगा. वैसे तो सबसे बड़ी बात यही है कि मां बनने के बाद वे इस मंच पर आ रही हैं और मां का मैं बहुत सम्मान करता हूं.
आपके डांसिंग स्टेप्स आज भी गोविंदा स्टेप्स के नाम से लोकप्रिय हैं. हर शादी व्याह व खुशी के समारोह में आपके गाने जरूर बजते हैं. आपकी प्रतिक्रिया?
मुझे जब मैं बहुत सक्रिय था. तो कई लोग यह भी बोलते थे कि मैं अश्लील, बेमतलब के गाने पर डांस करता हूं. जिसका कोई सिर पैर नहीं है. लेकिन मुझे अच्छा लगता है कि लोग मेरे गाने सुन कर आज भी खुश होते हैंं और उनके पैर खुद ब खुद थिरकने लगते हैं. मुझे कई लड़कियां आकर कहती हैं कि वे मेरे डांसिंग स्टेप्स दोहराती हैं तो मेरे लिए यह खुशी की बात है. खास कर छोटे शहरों से मुझे हमेशा जानकारी मिलती है कि वहां अब भी मेरे गाने लोकप्रिय हैं और एक कलाकार के लिए इससे बड़ी कामयाबी और क्या होगी.
आनेवाले समय में किस तरह के शोज का आॅफर स्वीकारेंगे?
मुझे मेरे मिजाज के जो भी शोज मिलेंगे मैं करूंगा. जीतो छप्पड़ फाड़ के जैसे शो भी मिलेगा तो खुशी खुशी करूंगा. मैंने बस अब कमर कस ली है. बहुत आराम कर लिया. अब बैठना नहीं है. अब काम मिलेगा और बस मैं करता जाऊंगा.

दर्शकों को बोर नहीं कर सकती : कृतिका कामरा


कृतिका कामरा का मानना है कि अगर आप लगातार शोज करें तो दर्शक आपसे बोर हो जाते हैं और वह दर्शकों को बोर नहीं करना चाहतीं. वे इन दिनों धारावाहिक रिपोटर्स में लीड किरदार निभा रही हैं.  

कृतिका, आपने कुछ तो लोग कहेंगे के बाद लंबा ब्रेक लिया. इसकी वजह क्या रही और इस शो को हां कहने की वजह क्या रही?
दरअसल, ऐसा नहीं था कि मुझे आॅफर नहीं मिल रहे थे. लेकिन मैंने एक निर्णय लिया है कि मैं हमेशा परदे पर नजर नहीं आऊंगी. मैं नहीं चाहती कि मेरे दर्शकों को लगे कि मैं बार बार आ जाती हूं और वह मुझसे बोर होने लगे. इसलिए मैंने कई प्रोजेक्ट्स को न कहा है. मैं सिर्फ करने के लिए कोई शो नहीं करूंगी. आप खुद यह शो देखेंगे तो महसूस करेंगे कि कैसे इस शो में मैं कुछ तो लोग कहेंगे के किरदार से अलग हूं. मैं हर बार फ्रेश रूप में आना चाहती हूं और मुझे अपने हर किरदार पसंद हैं. मैं अगर खुद ब्रेक नहीं लूंगी तो मैं खुद बोर हो जाऊंगी. शूट करते करते. फिर मुझे कुछ नया करने या सीखने का मौका ही नहीं मिलेगा.टेलीविजन का कमिटमेंट बहुत बड़ा कमिटमेंट होता है. आप हर दिन सेट ुपर 12 से 14 घंटा देते हैं. ऐसे में बाकी पढ़ने लिखने का समय नहीं मिल पाता है. साथ ही यह किरदार निभाने में मैं थोड़ा नर्वस हूं क्योंकि जर्नलिस्ट सबसे बड़े क्रिटिक होते हैं और उनका ही रोल प्ले करना कठिन है.
आप एक रिपोर्टर की भूमिका निभा रही हैं तो अब क्या आप रिपोर्टर्स के काम को समझ पायी हैं. उनकी मुश्किलों को समझ पायी हैं?
जी हां, अब मैं यह महसूस कर पाती हूं कि आपलोग किस तरह काम करते हो.किस तरह मेहनत करते हो. किस तरह अगर आप एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट हो तो यह आपका काम है कि आप सेलिब्रिटिज से जुड़ी चीजें दें. कई बार नेगेटिव खबरें देना भी आपकी डयूटी होती है. तो यह किरदार निभाते हुए आपलोग की परेशानी समझ सकती हूं कि अगर आप खबरें लेकर न जायें. हेडलाइन्स न मिलें तो किस तरह बॉस से आपको डपट मिल सकती है. कई बार खबरें मिलती नहीं. होती नहीं बनानी भी पड़ती हैं. तो वाकई इस किरदार का शुक्रिया कि मैं आपलोगों के काम को समझ पा रही हूं.
एक सेलिब्रिटिज की जिंदगी में मीडिया कितनी अहम है? आप मीडिया को वास्तविक जिंदगी में कितनी अहमियत देती हैं?
मैं तो काफी अहमियत देती हूं. मुझे लगता है कि मुझे मीडिया ने ही बनाया है, उनसे मेरा रिश्ता कभी खराब नहीं रहा है. हर कलाकार की जिंदगी में मीडिया की अहमियत है. जो हम कर रहे परदे पर दिखता है. लेकिन हम वास्तविक जिंदगी में किस तरह के हैं यह तो आपको मीडिया के माध्यम से ही पता चलता है न. मीडिया ही वह चैनल है जो आपकी बात आपके दर्शक तक पहुंचाता है. मीडिया में कई मेरे दोस्त भी बन चुके हैं. एक अच्छा रिश्ता बन गया है.
राजीव के साथ आपकी केमेस्ट्री कैसी रही?
काफी अच्छी. मैं तो उन्हें परफेक् शनिस्ट मानती ंहूं. अच्छा लगता है मुझे यह देख कर कि जितनी मैं कमिटेड हूं काम को लेकर. वह भी  हैं. वह भी सबकुछ नहीं करते. अपने हर सीन को बेस्ट देने की कोशिश करते हैं. साथ ही उन्हें फिल्मों का भी अनुभव है तो वह भी काम आता है. हम दोनों एक दूसरे के साथ काफी कंर्फटेबल है. शायद इसलिए लोगों को हमारी ये जोड़ी पसंद भी आ रही है.
आपको कई फिल्मों के आॅफर आते रहे हैं. लेकिन आप हां नहीं कहतीं. कोई खास वजह?
ंनहीं ऐसा कुछ नहीं है कि मैंने तय कर रखा है कि मुझे फिल्में करनी ही नहीं हैं.लेकिन मैं बस फिल्में करने के लिए कोई भी किरदार नहीं करूंगी. मैं जब टीवी में कोई किरदार यूं ही आॅप्ट नहीं करती तो वहां तो बात फिल्मों की है. मुझसे लगातार ये सवाल पूछे जाते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि कांसेप्ट और कांटेंट मुझे आकर्षित करेगा. तभी मैं उस फिल्म को हां कह सकती हूं. वरना टाटा बाय बाय. हेट स्टोरी 3 मुझे आॅफर हुई थी. लेकिन मैंने हां इसलिए नहीं कहा क्योंकि वहां मेरे लिए करने लायक कुछ नहीं था. और सिर्फ सेंसेशन पैदा करने के लिए मैं कुछ भी नहीं कर सकती. हां, मैं छोटे छोटे शॉर्ट फिल्मों में काम करती हूं और मुझे लगता है कि वह मेरे लिए अभ्यास की तरह है. मुझे नया करने का मौका मिलता है इस माध्यम से. तो मैं बस ये सब करके खुश हूं.

वास्तविक सीक्वल



आनंद एल राय की फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स का ट्रेलर लांच किया गया. सही मायनों में कई सालों के बाद किसी फिल्म ने सीक्वल का असल रूप प्रस्तुत किया है. कहानी वही से शुरू होती है. जहां खत्म हुई थी. अब तनु विदेश से लौटी है. और ट्रेलर के मुताबिक वह मनु के साथ खुश नहीं हैं. वह फिर से अपने पुराने प्रेमी की तरफ आकर्षित हो रही है. आनंद एल राय की इस सोच के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने सीक्वल में नयेपन को दर्शाने की पूरी कोशिश की है. इस बार दत्तो तनु पर भारी पड़ेंगी और यह निर्देशक की सोच में स्पष्ट है. वे दत्तो को फिल्म के चेहरे के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. कंगना जिस तरह लगातार खुद को साबित कर रही हैं. भविष्य में वे लंबी पारी खेलनेवाली है. दत्तो के किरदार में उन्होंने जो ताजगी दी है. वह ट्रेलर से ही दर्शकों को लुभाने में कामयाब हैं. आनंद एल राय ने इस बार भी हीरो के रूप में महिला पर ही ध्यान केंद्रित किया है. अक्सर शादी के बाद भारत की आधी आबादी की औरतों से उनके पतियों को शिकायत होती है कि उनकी पत् नी शादी के बाद किस तरह से अपना वजन बढ़ा रही हैं और उन्हें समाज के लोगों के सामने जिल्लत भी सहनी पड़ती है. लेकिन तनु वेड्स मनु की लड़की अपने पति को लताड़ती है कि जहां तहां से फैलते जा रहे हो...तनु का यह संवाद दर्शाता है कि निर्देशक की नजर में एक महिला की क्या इज्जत है. वह कहीं से पति के सामने पत् नी को कमजोर साबित नहीं करते. इशारों में सही वे आम महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पति को परमेश्वर मान कर उनकी गलतियों पर भी परदा डालती हैं. हां, बस निर्देशक से एक सवाल. अब तक ट्रेलर से जो बात नजर आ रही है, कि मनु अपनी पत् नी से खुश नहीं और अब वह दत्तो में तनु को ढूढ़ने की कोशिश कर रहा.तो कहीं सीक्वल को सार्थकता प्रदान करने की वजह से उनकी मौलिक फिल्म निरर्थक साबित न हो जाये.

निर्माता के बेटे की हठ


वासु भगनानी बड़े निर्माता है. बड़े निर्माता इस लिहाज से कि उनके पास काफी धन राशि है. इतनी धन राशि की उन्होंने कुछ महीनों पहले अपने बेटे जैकी को एक महंगा झूनझूना गंगम सांग के राइट्स खरीद कर दिये. लेकिन अफसोस इसके बावजूद फिल्म नाकामयाब रही. जैकी व उनके पिता पिछले कई सालों से लगातार अपने बेटे के करियर को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. और वे तमाम कोशिशें कर चुके हैं. लेकिन अब तक जैकी के हाथों में एक भी हिट फिल्म नहीं आयी है. इस बार उन्होंने अरशद वारसी का सहारा लिया है. यों भी वासु के साथ कई कलाकारों  के रिश्ते बिगड़ चुके हैं. बिपाशा की फिल्म अधर में हैं. साथ ही वेलकम टू कराची से इरफान अलग हो चुके हैं. लेकिन वासु शायद यह भूल रहे हैंं कि धन से अभिनय क्षमता को खरीदना मुमकिन नहीं.अगर ऐसा होता तो कम से कम एक कोशिश में तो वे कामयाब होते. हाल ही में उनके बेटे जैकी को इसी फिल्म के एक प्रोमोशनल सांग में लगातार फुटेज खाते हुए देखा गया. अरशद ने कभी भी इस बात का गुमान नहीं किया है कि वे सुपरस्टार हैं या सोलो स्टार हैं. लेकिन इश्किया सीरिज, मुन्नाभाई सीरिज में उनके अभिनय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फिल्म जॉली एलएलबी में उन्होंने सोलो परफॉरमेंस में भी कमाल दिखाया. और यह बात अरशद अच्छी तरह जानते हैं कि उनके फैन की एक अलग लीग है. सो, वे जैकी से अधिक कामयाब है. खबर है कि भगनानी ने फिर से अरशद को ध्यान में रखते हुए पूरे गाने को दोबारा शूट किया है. चूंकि अब जाकर ही सही अगर वह अपनी हठ को छोड़ कर अपने बच्चे को यह बात समझाएं कि फिल्में सिर्फ पैसों से नहीं बनतीं तो बेहतर होगा.दरअसल, बच्चा अगर किसी गलत हठ को लेकर बैठ जाये तो उसे रास्ते पर लाने के माता पिता को ही गंभीरता से सोचना चाहिए.

प्रियंका की सूझ-बूझ


प्रियंका चोपड़ा व मधुर भंडारकर की फिल्म मैडमजी जिसे लेकर काफी चर्चा थी. अब यह फिल्म डिब्बे में बंद हो चुकी हैं. चूंकि प्रियंका और मधुर ने आपसी बातचीत व समझौते के आधार पर फिलहाल इस फिल्म पर विराम लगा दिया है. गौरतलब है कि इसी फिल्म से प्रियंका निर्माता के रूप में अपनी पारी की शुरुआत करने जा रही थीं. लेकिन चूंकि अभी वे बहुत अधिक व्यस्त हैं. उन्होंने निर्णय लिया है कि वे अब पहले अपने बाकी कार्यों को पूरा करेंगी. हालांकि यह उनके पसंदीदा प्रोजेक्ट्स में से एक था. लेकिन फिलवक्त वह एक विदेशी शो और बाजीराव मस्तानी व जोया अख्तर व रीमा की फिल्म को लेकर व्यस्त हैं. मुमकिन हो कि प्रियंका ने यह निर्णय इस लिहाज से भी लिया हो कि अभी उन्हें और परिपक् व होना चाहिए. निस्संदेह बेहद कम समय में प्रियंका ने अपनी जो पहचान विश्व स्तर पर भी बनाई है. वह अलग और अदभुत हैं. चूंकि उनकी समकालीन अभिनेत्रियां उनकी तरह एक अलग लीग पर काम नहीं कर रहीं. शायद यही वजह है कि प्रियंका की कई अभिनेत्रियों से अच्छी दोस्ती है. वे अनुष्का, कंगना और दीपिका के करीबी हैं. माधुरी भी उन्हें पसंद करती हैं. चूंकि प्रियंका ने अपना यह मुकाम आसानी से नहीं बनाया है. सो, निश्चित तौर पर कई अभिनेत्रियां उन्हें अपना  आदर्श मानती होंगी. वे एक छोटे शहर से आयीं और अपनी पहचान स्थापित करने में कामयाब हुई हैं. वे किसी हठ में नहीं हैं. न ही किसी भ्रम में जीना चाहती हैं. वे जानती हैं कि अगर वे निर्माता के रूप में प्रोडक् शन के क्षेत्र में उतरती हैं तो उन्हें अपना 100 प्रतिशत से भी अधिक समय देना होगा. न सिर्फ समय बल्कि धन भी. और शायद यही वजह है कि वे इस बात से वाकिफ होंगी कि उन्हें अभी ठहर कर काम करना चाहिए. इस लिहाज से उन्होंने एक समझदारी भरा निर्णय लिया है.

एक बिंदास कपूर का मिजाज


ऋषि कपूर ने कुछ महीने पहले टिष्ट्वटर ज्वाइन किया है. और मैंने उनके लगभग सभी टिष्ट्वटर अपडेट को गौर से पढ़ा है. मुझे लगता है कि वर्तमान दौर में भी अगर बिना किसी लाग लपेट या दिखावे के सार्वजनिक मंच पर इतनी बेबाकी से अपनी बातें कह रहे हैं तो वह ऋषि कपूर ही हैं. शायद यही वजह है कि कई लोगों ने उन्हें धमकी भी दी है. कई लोग उन्हें गालियां भी देते हैं. लेकिन वे बिंदास लिखते हैं. वे नयी प्रतिभाओं की तारीफ भी करते हैं. तो उनकी बातों में बेवजह किसी की तारीफ नहीं होती. वे सामाजिक मुद्दों पर भी बेबाकी से अपनी बातें रखते हैं. हालांकि कुछ दिनों पहले उन्होंने ंिनर्णय लिया था कि वे अब टिष्ट्ववटर का हिस्सा नहीं होंगे. लेकिन फिर से उन्होंने वापसी कर ली है.उन्होंने हाल ही में दिये अपने एक इंटरव्यू में बीफ के बैन पर अपनी बात रखी. उन्हें काफी नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली. लेकिन उन्होंने अपने संवाद नहीं बदले. अपने बेटे के बारे में भी कौन सी बड़ी शख्सियत खुल कर इतनी बातें किसी मीडिया में कह जाते हैं कि यह हकीकत है कि उनके और उनके बेटे की बीच की दूरियां बढ़ रही हैं और उन्हें खुशी होती है कि जब लोग कहते हैं कि रणबीर काफी सौम्य और अच्छा व्यवहार रखते हैं तो वे इसका पूरा श्रेय अपनी पत् नी नीतू को देते हैं. कपूर खानदान में भी शायद ही इतनी बेबाकी से किसी ने अपनी बातें रखी हों. हां, यह हकीकत है कि ऋषि अपने फैन से ढंग से बातचीत नहीं करते. वे आपे से बाहर आ जाते हैं. लेकिन ऋषि इस बात के भी प्रमाण हैं कि वे अन्य सेलिब्रिटिज की तरह दिखावे का मुखौटा नहीं पहनते. वे जो हैं सबके सामने हैं. और यह बात उन्हें अन्य सेलिब्रिटिज से जुदा करती हैं. हो सकता है कि इसकी वजह से लोग उन्हें नापसंद करें. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या कम हैं, जो खरा व सच्ची बातें करता हो. 

संगीत व पीरियड फिल्में


 अनुराग कश्यप की नयी फिल्म बांबे वेल्वेट का नया गीत आज ही लांच किया गया है. इस गाने में अनुष्का सिंगर के रूप में नजर आ रही हैं. रणबीर कपूर उनके दीवाने नजर आ रहे हैं. फिल्म का गीत आपको 60 की याद दिलायेगा. हिंदी फिल्मों में कैब्रे की अहम भूमिका रही है. कई फिल्मों में विशेष रूप से कैब्रे गीतों का इस्तेमाल किया जाता रहा है. 60 की दशक को दर्शाने के लिए संगीत का यह इस्तेमाल सबसे आसान तरीका है. चूंकि संगीत से दौर को स्थापित करना आसान और सार्थक नजर आता है. गौरतलब है कि बांबे वेल्वेट में अनुष्का शर्मा ने भी अपनी आवाज में दो गीत गाये थे. लेकिन फिल्म की लंबाई को देखते हुए उन गीतों को हटा दिया गया है. रवीना टंडन के भी गीत हटाये गये हैं. यों भी अनुराग लंबी फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इस बार उन्होंने विदेश से एडिटिंग की टीम बुलाई है और उन्होंने गीतों को कम तवज्जो दी है. यों भी अनुराग विदेशी फिल्मों व तकनीक व कहानियों से प्रेरित रहते हैं.अब चूंकि उन्होंने संपादन का दारोमदार ही लोकप्रिय विदेशी एडिटर को दिया है तो वे निश्चित तौर पर सबसे पहले संगीत की लंबाई पर कैंची चलाई है. चूंकि विदेशों में संगीत व नाच गाने की गुंजाईश फिल्मों में कम नजर आती है. और विदेशों में अधिकतर फिल्मी जानकारों को हिंदी फिल्मों के संगीत से परेशानी है. हालांकि अनुराग ने फिल्म की शूटिंग श्रीलंका में की है और उनकी कोशिश है कि वे पीरियड दिखाने में कामयाब होंगे. लेकिन  ऐसी फिल्मों को स्थापित करने के लिए गीत संगीत आवश्यक हैं. चूंकि इससे उनके पास समय व स्रोत दोनों की कमी का निदान निकल आता है. दर्शकों के कानों तक जैसे ही गीत पहुंचते हैं. वह जिस दौर से भी संबंधित हों. दर्शक अनुमान भी लगा लेते हैं और उनका विश्वास भी बढ़ता जाता है. हालांकि अंतिम निर्णय निर्देशक का ही होता है.

पुराने से प्यार


 महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म डैडी का ही धारावाहिक रूपांतर इन दिनों सोनी टीवी पर प्रसारित हो रहा है. इस धारावाहिक की कहानी भी डैडी की कहानी से ही प्रेरित है, जिसमें राम कपूर और गुरदीप कोहली मुख्य किरदार निभा रही हैं. इस बारे में जब महेश भट्ट से बात हुई तो उन्होंने कहा कि हां, यह सच है कि डैडी फिल्म मेरे दिल के बेहद करीब है और यही वजह है कि उन्होंने इसे धारावाहिक का भी रूप दिया है. दरअसल, सिर्फ महेश भट्ट ही नहीं, बल्कि कई फिल्मकार अपनी कुछ चीजों से इस कदर लगाव कर बैठते हैं कि उसका कोई न कोई अंश आपको शेष बची उनकी सारी कल्पना में या रचना में नजर आयेगा. हाल ही में कुणाल कोहली की पहली फिल्म फिर से का ट्रेलर लांच हुआ है. इस फिल्म के एक गीत में बैकग्राउंड में हम तुम का ही संगीत है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कुणाल की सुपरहिट फिल्मों में से हम तुम एक रही है और इसलिए भी वे इसका इस्तेमाल कर रहे ताकि दर्शक उससे जुड़ पायें. करन जौहर ने धर्मा प्रोडक् शन के लोगो के साथ अपना सिग्नेचर टयून भी अपनी फिल्म कुछ कुछ होता है का ही रखा है. इसकी बड़ी वजह यह हो सकती है कि उनके करियर की पहली फिल्म ही  कुछ कुछ होता है थी. यशराज बैनर ने भी फिल्म वीर जारा के संगीत का इस्तेमाल यशराज के सिग्नेचर टयून के रूप में किया है. फरहान अख्तर ने फिल्म लक्ष्य के संगीत को सिग्चेनर टयून बनाया है. लक्ष्य हालांकि बहुत कामयाब फिल्म नहीं थी. लेकिन निश्चित तौर पर वह फरहान के दिल के बेहद करीब होगी. कुछ इसी तरह अब तक शत्रुघ्न सिन्हा अपने खामोश वाले संवाद से बाहर नहीं निकल पायेंगे. हालांकि कई बार किसी चीज से बेहद लगाव होना उचित भी है. और कई बार इसकी वजह से आपकी नयी रचनाशीलता भी बासी ही नजर आने लगती है. 

मार्गरिटा का विषय दिल के बेहद करीब : रेवती


रेवती इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्हें अब भी बेहतरीन किरदार निभाने के मौके मिल रहे हैं. फिल्म मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ में वे एक सेलेब्रल पालसी से ग्रसित लड़की की मां की भूमिका निभा रही हैं. 

 रेवती, आप हिंदी में काफी कम फिल्में करती हैं. इसकी कोई खास वजह?
नहीं, इसकी वजह बस यही है कि मेरी अपनी च्वाइसेस हैं. मैं हर तरह की फिल्में नहीं कर सकती और मैं इसके लिए किसी को दोष मढ़ना नहीं चाहती. मुझे चूनिंदा और अलग मिजाज की फिल्में करना पसंद है. कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं सलमान की को स्टार रह चुकी हूं और आज मां के किरदार निभा रही हूं, जब कि सलमान अब भी स्टार हैं और लीड भूमिकाएं करते हैं तो मेरा मानना है इस बारे में कि यह सलमान की च्वाइस थी कि वे वैसे किरदार अब भी निभायें. मेरा करियर जब बिल्कुल उफान पर था. तब भी मुझे अधिक लत नहीं थी, मेरे पास उस वक्त एक ही तरह की कई फिल्में आती रहती थीं. लेकिन मैंने न कहना शुरू किया और मैं सुकून से हूं. मैं खुश हूं जो भी काम कर रही. रही बात सलमान की तो उनको तो मैंने निर्देशित भी किया है. सो, कहीं भी मन में ऐसा कोई अफसोस नहीं कि आज वो कहां हैं मैं कहा हूं.
इस फिल्म में आपके किरदार के बारे में बताएं?
मैं इस फिल्म में लैला( जो कि सेलेबल पैरेसी ) से ग्रसित हैं. उसकी मां का किरदार निभा रही हूं. मैं जिस तरह से मुंबई में अडेप्ट संस्थान हैं, चेन्नई में भी इसके ब्रांच हैं और मैं उस संस्थान की मेंबर हूं और कई सालों से जुड़ी हूं. तो मैं अपने सामने ऐसी कई कहानियां देखती रही हूं और यही वजह है कि मेरा इस कहानी में विश्वास है. इस कहानी में मुझे दिल दिखता है तो मैं इस कहानी के साथ हूं. इसकी बस यही वजह है कि मैं इस फिल्म का हिस्सा हूं. फिल्म की निर्देशिका मुझे इसी संस्थान की वजह से जानती हैं और उन्होंने जब मुझे यह आॅफर की तो मैंने हां कह दिया.
इस फिल्म से किस तरह के आॅडियंस की जुड़ने की संभावना है?
मुझे लगता है कि इसे अरबन आॅडियहस पसंद करेंगी. इसकी वजह यह है कि हर जगह तो यह फिल्म पहुंच ही नहीं पायेगी. चूंकि फिल्म के कर्मशियल एक्सपेक्ट से भी कई फिल्में दर्शकों तक तो पहुंच ही नहीं पाती .लेकिन मुझे लगता है कि यह बहुत गर्व की बात है कि हिंदी फिल्मे भी अब ऐसे कांसेप्ट को लेकर आगे बढ़ रही है. अच्छी फिल्में बन रही हैं. इसे इंटरनेशनल स्तर पर काफी सराहा गया है तो उम्मीद करती हूं कि यहां भी अच्छे दर्शक मिले.
आपकी फिल्म अंजलि 21 भी कहीं न कहीं से इस फिल्म से मेल खाती है?
हां, मगर पूरी तरह से नहीं. फिल्म में अंजलि जिसने मेरी बेटी का किरदार निभाया है. वह डिस्बेल है. और कैसे उसके लिए रास्ते बनते जाते हैं. इस पर वह कहानी थी और मणि रत् नम ने उसे निर्देशित किया था. तो मैंने उस वक्त भी काफी रिसर्च किया था. वह मेरे लिए इस फिल्म को करते हुए भी काफी फायदेमंद हुई. साथ ही चूंकि मैं संस्थान में वॉलेनटियर हूं तो काफी कुछ पर्सनली मैंने देखा है और समझा है.सो, यह मेरे लिए नयी कहानी नहीं थी. मैंने जब कहानी सुनी तभी लगा कि मैं इस विषय पर पूरी पकड़ रखती हूं.इसलिए मुझे यह फिल्म करनी चाहिए,
रेवती, आपकी नजर में ऐसी कौन सी खास वजह है जो हिंदी सिनेमा में इन दिनों 10 में से 7 फिल्में साउथ की रीमेक बन रही हैं?
मैं इस सवाल का जवाब नहीं दे पाऊंगी. चूंकि मैं बहुत ज्यादा हिंदी फिल्में नहीं देखती. हां, वीमेन ओरियेंटेड फिल्में मुझे अधिक पसंद हैं.
सेंसर जिस तरह से इन दिनों सिनेमा पर नकेल कस रहा है. इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मुझे लगता है कि सिनेमा को सॉफ्ट टारगेट किया जाता है. सेंसर किस बात की, क्या सेंसर यूटयूब, इंटरनेट व बाकी चीजों पर सेंसर कर सकता. सेंसर तो वो चीज होती है जो छुपी हुई है. अब तो सबके सामने सबकुछ है तो आप दो दृश्य कांट कर ही क्या कर लेंगे. जिसे जो देखना है. वह देख रहा है और उसे सेंसर नहीं किया जा सकता.मुझे लगता है कि सेंसर वैसे संवाद व बातों पर होनी चाहिए जो भड़काऊ हो जिसकी वजह से देश की एकता को चोट पहुंच रही हो. ऐसी चीजों पर सेंसर करें. न कि जो हकीकत है. उस पर आप रोक लगा कर कुछ साबित नहीं कर सकते.
इन दिनों कौन सी फिल्में निर्देशित कर रही हैं.
जल्द ही घोषणा करूंगी. फिलहाल ट्रैवलिंग में और पढ़ने लिखने में ज्यादा वक्त दे रही हूं. एक निर्देशक के रूप में भी और एक्टर के रूप में भी पढ़ना लिखना जरूरी है.
आप अभिनय को अधिक एंजॉय करती हैं या फिर निर्देशन को?
एक्टिंग को...पहले मैं एक्टर हूं.

नजदीकियां बढ़ाती दूरियां


प्रियंका चोपड़ा ने निर्णय लिया है कि अब वे भी अपनी मां के घर से दूसरे घर में शिफ्ट हो जायेंगी. उन्होंने यों भी मुंबई में काफी प्रोपर्टी खरीद कर रखी है. सो, वह जब चाहें किसी भी घर में शिफ्ट हो सकती हैं.सिर्फ प्रियंका ही नहीं रणबीर कपूर भी कई दिनों पहले अपने पिता के घर से दूर आसरा बसा चुके हंै. इस बारे में ऋषि कपूर ने साफतौर पर कहा भी कि उनके परिवार में कभी भी किसी पर रोक-टोक या बंदिशें नहीं लगाई गयी हैं. सो, उन्होंने रणबीर पर भी कोई पाबंदी नहीं लगाई है और उन्हें इस बात से कोई परेशानी नहीं है. शाहिद कपूर ने भी हाल ही में अपने नये बंगले में शिफ्ट हो गये. आलिया भी अपना नया आशियाना तलाश रही हैं.सोनम ने निर्णय लिया था. लेकिन अभी उन्होंने इरादा बदल दिया है. कुछ सालों पहले ऐश्वर्य राय ने एक अंगरेजी टेलीविजन शो में स्वीकारा था कि वह लकी हैं कि वह भारतीय हैं. कम से कम अपने  माता पिता के साथ खाने पीने के लिए उन्हें अप्वाइटमेंट नहीं लेनी पड़ती. लेकिन वर्तमान दौर में देखें तो सोच बदल रही. अमिताभ बच्चन के परिवार को छोड़ दें तो लगभग हर सेलिब्रिटीज अपना अलग आशियाना बसा रहे हैं. हालांकि जीतेंद्र के बच्चे एकता व तुषार एक ही बंगले में रहते हैं. लेकिन उनके अलग अलग अपार्टमेंट हैं. सोनाक्षी भी अलग फ्लोर पर रहती हैं. विद्या बालन बताती हैं कि किस तरह लगभग महीने का एक रविवार वे अपने ससुराल में अपनी सासू मां के साथ गुजारती हैं. सोनाली ने भी यह स्वीकारा कि उनकी सासू मां मानती हैं कि एक शहर में रहते हुए भी वे बच्चों को एक साथ नहीं रखना चाहतीं. ताकि कलेश न हो. दरअसल, हकीकत यह है कि अब दूरियों से नजदीकियां बढ़ रही हैं. यही वजह है कि सिर्फ स्टार्स नहीं, वे आम परिवार भी एक शहर में रहते हुए अलग रहने को तवज्जो दे रहे,ताकि उन्हें अपनी आजादी से जीने का मौका मिला.

फैन व उनके बर्ताव


हॉलीवुड के लोकप्रिय स्टार क्लूनी ने घोषणा की है कि अगर अब कोई फैन उनसे मिलने की कोशिश करेगा या फिर वे जहां ठहरे हुए हैं, वहां जाने की भी कोशिश करेगा तो उसे 600 डॉलर जुर्माना भरना होगा. क्लूनी ने यह सतर्कता इसलिए बरती है कि उन्हें इस बात से काफी परेशानी हो रही थी कि वे जहां भी जाते थे. उनके फैन उन्हें बहुत परेशान करते हैं. इन दिनों शाहरुख खान फिल्म फैन की शूटिंग कर रहे हैं. वे लंदन से लौट आये हैं और हाल ही में उन्होंने मरीन लाइन के एक चॉल में शूटिंग की, जहां लोगों की भीड़ सिर्फ उन्हें ही देखने आये थे और शाहरुख ने केवल हाथ हिला कर सबका अभिवादन किया और भीड़ नियंत्रित  हो गयी. मुमकिन हो कि एक फैन व सुपरस्टार के रिश्ते की कहानी को फिल्म फैन में खूबसूरती से दर्शाया जाये. रणबीर कपूर भी लगातार यह दोहराते रहे हैं कि जो फैन फॉलोइंग अमिताभ बच्चन की रही है और जो आॅरा उन्होंने देखा है, वह स्टारडम शायद ही अन्य सितारों को देखने का मौका मिले. अब तो फैन फॉलोइंग का आकलन सोशल नेटवर्किंग साइट के फॉलोअर्स पर ही आधारित है. हालांकि छोटे शहरों में अब भी फैन की परिभाषा और उनका बर्ताव वैसा ही है. लेकिन बड़े शहरों में खास कर छोटे परदे के सितारे चूंकि हर मॉल व कॉफी शॉप में नजर आते हैं, सो उन्हें खास तवज्जो नहीं दी जाती. ऋषि कपूर शुरुआती दौर से ही अपने फैन्स से बातें या आॅटोग्राफ देने में चिढ़ते थे. कह सकते हैं कि अगर वे क्लूनी की तरह उस दौर में लोकप्रिय होते और उन्होंने यह बात सुनी होती तो वे भी इंडियन करेंसी के अनुसार कुछ जुर्माना ठोक ही देते. दरअसल, सुपरस्टार दर्शकों के काफिलों से गुजर कर ही सुपरस्टार बनता है. लेकिन धीरे धीरे उन्हें यह रौनक और भीड़ नहीं सुहाती औरर वे इससे कतराने लगते हैं. लेकिन अक्सर ऐसी शख्सियत अपने बुरे दौर में अकेली हो जाती हैं.

रिपोर्टर से रिपोटर्स तक


 जल्द ही रिपोर्ट्स नामक धारावाहिक की शुरुआत हो रही है. इस धारावाहिक से राजीव खंडेलवाल अपनी वापसी भी कर रहे हैं छोटे परदे पर. फिलवक्त शो के प्रोमो दिखाये जा रहे हैं, जिसमें  राजीव अपनी नायिका को समझाते हैं कि खबरें कैसे बनती है. वह अभिनेत्री की चुंबन लेते हैं और फिर जब अभिनेत्री उन्हें थप्पड़ जड़ती हैं तो वे दर्शाते हैं कि कुछ ऐसा ही जवाब होना चाहिए लड़कियों का. रिपोर्ट्स की रूप और रंगत ग्लैमर से लबरेज नजर आ रही है. जब तक शो का प्रसारण शुरू नहीं होता. यह अनुमान लगा पाना कठिन है कि शो का मिजाज क्या होगा. लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं उससे स्पष्ट है कि मीडिया ने अपने तेवर किस तरह बदले हैं. शो में वह स्पष्ट रूप से नजर आयेगा. कई वर्ष पूर्व शेखर सुमन रिपोर्टर नामक एक धारावाहिक लेकर आते थे. उस दौर में वे अधिकतर क्राइम रिपोर्टिंग से संबंधित खबरों को दर्शाते थे. और खोजी पत्रकारिता किसे कहते हैं. उस शो में देख कर मोटे तौर पर अनुमान लगाया जा सकता था. उस दौर में रिपोर्टर में गंभीरता इसलिए थी कि उस दौर में पत्रकारिता भी सिर्फ गंभीरता का ही नाम था. खोजी पत्रकारिता व गंभीर पत्रकारिता को ही अहमियत दी जाती थी. लेकिन अब दौर बदल चुका है. मीडिया के भी कलेवर तेवर बदल चुके हैं. खबरें अब बनाई जाती हैं. यह दौर सोशल मीडिया का भी है. हालांकि हाल ही में पत्रकारिता में एक विशिष्ट स्थान रखनेवाली शख्सियत का मानना है कि सोशल मीडिया पर हर दिन नये लोग लिखते हैं और वह स्तरीय नहीं लिखते. वे मीडिया के लायक नहीं. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सोशल मीडिया ने कई बदलाव किये हैं. ऐसे में रिपोर्टर धारावाहिक की सोच और रिपोटर्स शो की सोच तक पहुंचने में एक लंबा फासला तय हो चुका है. रंग कैसा निखरता है. यह तो आनेवाला वक्त ही बतायेगा.

पीढ़ी दर पीढ़ी बदलती परिभाषाएं


मल्लिकाएतरन्नुम नूरजहां की नगमें कौन भूल सकता है भला. नूरजहां दिलीप कुमार की चुनिंदा व खास दोस्तों में से एक रहीं. उन्होंने शुरुआत बाल कलाकार के रूप में की थी. नूरजहां ही पाकिस्तान की पहली निर्देशिका बनीं, जिन्होंने छनवे नामक फिल्म का निर्माण किया. उनका लगाव फिल्मों से कभी कम नहीं हुआ. आज भी दर्शक यूटयूब पर दिलीप कुमार और नूरजहां की एक बेहतरीन बातचीत देख सकते हैं, जहां नूरजहां ने दिलीप साहब से अपनी जिंदगी के कई रोचक पहलुओं पर बातचीत की है. उनका शायद फिल्मों से लगाव ही रहा, जो उनकी अगली पीढ़ी के नब्ज में जा पहुंची है. उनके नाती सिकंदर रिजवी जल्द ही फिल्मी दुनिया में कदम रख रहे हैं और हाल ही में उन्होंने इसकी घोषणा की है. सिकंदर ने नूरजहां के साथ बिताये अपने पलों को  सांझा करते हुए बताया कि किस तरह नूरजहां अपने परिवार के लिए हमेशा अच्छे अच्छे पकवान बनाया करती थी. हर रात डिनर के बाद के किस तरह वे अपना तबला लेकर बैठ जातीं और फिर महफिल जमती. सिकंदर जानते हैं कि चूंकि वह एक महान शख्सियत वाले खानदार से संबंध रखते हैं. निश्चित तौर पर लोग कई मायनों में तुलना करेंगे. वे जो फिल्म करने जा रहे है. वह रोमकोम है. शायद नूरजहां इस दौर में होतीं तो ऐसी फिल्में करने में दिलचस्पी लेतीं. चूंकि वे काफी खुशमिजाज और बेफिक्र रहनेवाली शख्सियत में से एक थी. दरअसल, यह हकीकत है कि बदलते दौर के साथ सिनेमा भी अपनी सोच बदलती है. यह मुमकिन है कि उस दौर में जो फिल्में बनती थीं. उनमें से कुछ फिल्में रोमकोम की श्रेणी में जरूर फिट बैठती होंगी. लेकिन उस दौर में उन्हें उन श्रेणियों में बांटा नहीं जाता था. पीढ़ी दर पीढ़ी परिभाषाएं भी अपना आकार और वेष बदलती है. सो, यह देखना दिलचस्प होगा कि महान शख्सियत अगली पीढ़ी क्या कमाल दिखाती है

लोकप्रिय सितारों की अगली पीढ़ी


खबर है कि शाहरुख खान बहुत जल्द अपने बेटे आर्यन खान को लांच करने जा रहे हैं. साथ ही साथ यह भी खबर है कि सनी देओल भी अपने बेटे की बड़ी लांचिंग की तैयारी में हैं. अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म की तैयारी में जुट चुके हैं. मसलन, आने वाले समय में तीन लोकप्रिय सितारों की अगली पीढ़ी की जंग शुरू होगी. ज्ञात हो कि अनिल कपूर और शाहरुख खान में अपने दौर में काफी अनबन रहीं. चूंकि अनिल कपूर उस दौर में कहते फिरते थे कि अगर उन्होंने बाजीगर को न नहीं कहा होता तो शाहरुख शाहरुख न बना होता. वही स्थिति सनी देओल और शाहरुख के साथ भी थी. दोनों में फिल्म डर को लेकर लंबा विवाद रहा और आज भी सनी शाहरुख से खास बातचीत नहीं करते. बॉलीवुड में एक का चढ़ना, दूसरा का उतरना लगा रहता है. लाइफ ओके के शो ड्रीम गर्ल में भी इस बात को बखूबी दिखाया जा रहा है कि किस तरह एक सुपरसितारा हैसियत रखनेवाली अभिनेत्री दूसरी नयी अभिनेत्री से डर रही है. यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि एक दौर में प्रतिद्वंदी रहे कलाकारों की अगली पीढ़ी किस तरह अपनी फिल्मों से कमाल करती है. निस्संदेह हर कलाकार अपने पुत्र की लांचिंग बड़े पैमाने पर करने की कोशिश करेंगे. हालांकि अनिल कपूर अपने बेटे को लांच नहीं कर रहे.लेकिन वे बेटे के करियर को उड़ान देने में कोई कसर भी नहीं छोड़ेंगे. शाहरुख बादशाह हैं और उनके पास धन की कमी नहीं. सो, वह अपने बेटे पर पानी की तरह पैसे बहाने से भी नहीं चूकेंगे. धर्मेंद्र ने सनी और बॉबी की लांचिंग भव्य तरीके से की थी और सनी भी अपने बेटे की लांचिंग भव्य तरीके से ही कर रहे हैं. चंूकि हर पिता चाहता है कि उनके बच्चों को उनसे अधिक सुविधाएं मिलें. उस दौर में जिस तरह की प्रतियोगिता होती थी. वही प्रतियोगिता इनके बीच भी होती है या नहीं. देखना दिलचसप् होगा.

अक्षय व शिव

अक्षय कुमार ने इच्छा जाहिर की है कि अगर उन्हें कभी मौका मिले तो वह चाहेंगे कि उन्हें किसी फिल्म में शिव की भूमिका निभाने का मौका मिले. संभव हो कि उन्होंने करन जौहर को संकेत दिया हो जो पिछले कई महीनों से लगातार इस सोच में डूबे थे कि ऋतिक रोशन ने जब फिल्म शुद्धि से अपना नाम अलग कर लिया तो आखिरकार वह किसे फिल्म में लें. इसके बाद इस फिल्म के लिए सारे सुपरस्टार्स का नाम सामने आया. सिवाय अक्षय के. अक्षय जबकि अमिष जिन्होंने शिव पर एक बेहतरीन किताब लिखी है और उम्मीदन करन जौहर की शुद्धि इसी पर आधारित है के एक और किताब ( शिव पर ही आधारित) की लांचिंग में भी शामिल हुए. कहीं न कहीं इन सारी बातों का यह संयोग जरूर बनता है कि अक्षय की इच्छा रही होगी कि वे शुद्धि में मुख्य किरदार निभायें. लेकिन करन ने उनसे इस किरदार के लिए कभी बात ही नहीं की. अक्षय बताते हैं कि उनके घर में हमेशा धार्मिक माहौल रहा. जब लोग शोले देखते थे तो उस वक्त उनकी नानी उन्हें जय संतोषी मां दिखाया करती थीं.और यही वजह है कि अक्षय शिव व धार्मिक किरदारों को पसंद करने लगे. यह भी मुमकिन है कि शिव की भूमिका में अक्षय बखूबी मेल भी खाते. चूंकि उनकी शारीरिक बनावट सुदृढ़ है. और वे एक् शन व स्टंट करते हुए शेष सभी सुपरस्टार्स से ज्यादा स्वाभाविक और दुरुस्त नजर आते हैं. शुद्धि एक् शन फिल्म है. करन फिल्म की स्क्रिप्ट से ज्यादा अब भी फिल्म के लीड पर अधिक काम करते हैं. चूंकि वे जानते हैं कि निर्माता के रूप में उन्हें किन बातों पर अधिक ध्यान देना चाहिए. अगर वे वाकई स्क्रिप्ट की सोच के साथ चलते तो एक बार वे अक्षय से बात कर सकते थे. हो सकता था कि उन्हें जिस तरह के किरदार की जरूरत थी उसमें अक्षय ही सर्वश्रेष्ठ होते.लार्जर देन लाइफ भूमिकाएं उन पर जंचती हैं

सामाजिक कैंपेन व अभिनेत्री


विद्या बालन के शौच अभियान का एक बेहतरीन असर नजर आया. वाराणसी के भेलापुर इलाके में रहनेवाली एक महिला ने अपने पति का घर  इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि उस घर में शौच की सुविधा उपलब्ध नहीं थी. विद्या बालन इस बात से खुश हैं कि उनका यह कैंपेन रंग ला रहा है. विद्या मानती हैं कि यह महिलाओं की प्राथमिक जरूरत है, जिसका ख्याल रखा जाना ही चाहिए. वे खुश हैं कि इस पर महिलाओं ने सोचना तो शुरू किया. कंगना रनौट एसिड से पीड़ित महिलाओं के लिए कार्यरत हैं. और उन्होंने अपनी तरफ से कई सेवाएं उपलब्ध कराई हैं. हाल ही में दीपिका पादुकोण ने अपने साथी होमी अदजानिया के साथ मिल कर एक वीडियो का निर्माण किया है. इस वीडियो में महिलाओं की आजादी को लेकर बात की गयी है. यह एक बेहतरीन सोच है कि महिला सेलिब्रिटिज अपने फिल्मों से इतर किसी कैंपेन का हिस्सा बन रही हैं. और इसकी सबसे खास बात यह है कि लोग जागरूक हो रहे हैं. वरना, महिला सेलिब्रिटिज अधिकतर अपनी फिल्मी प्रोमोशन के दौरान ही सिर्फ ऐसे कैं पेन से जुड़ती हैं. लेकिन दीपिका पादुकोण लगातार इस तरह के मुद्दों का हिस्सा बन रही हैं. इस सब के पीछे भले ही उनकी सोच मीडिया को और अधिक प्रभावित करने की हो. लेकिन फिर भी वे ऐसी चीजों में हिस्सा लेकर कई लड़कियों की प्रेरणा बन रही हैं. चूंकि ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर लड़कियां बोल नहीं पातीं. उनके मन में एक डर होता है कि उन्हें कौन सहयोग देगा. कौन उनकी बातें सुनेगा. लेकिन जब सेलिब्रिटीज का साथ मिलता है तो उनके मन में संभावना की किरण जगती है कि वे अपनी बात अगर उन तक पहुंचायें तो बात बन सकती है. विद्या बालन, कंगना, दीपिका, प्रियंका चोपड़ा ऐसी सोच में कदमताल कर रही हैं. बेहतर हो कि अन्य अभिनेत्री भी ब्रांड एंडॉरसमेंट के साथ इस तरफ भी सोचें.

दर्शक व शख्सियत


एक पाकिस्तानी धारावाहिक डाइजेस्ट राइटर में लेखकों के साथ होनेवाली जादद्ती को बखूबी परदे पर उकेरा गया है, कि किस तरह इस शो बिजनेस में बड़े नाम मजबूर लेकिन होनहार और हुनरमंद लोगों का इस्तेमाल करते हैं. वे किस तरह उनकी मजबूरियों का फायदा उठा कर उनका हुनर खरीदते हैं और बदले में उन्हें न तो नाम मिलती है और न ही उनके हिस्से की शोहरत. साथ ही लेखक की जिंदगी का एक और अहम हिस्सा भी शो में खूबसूरती से नजर आता है, कि कई बार कल्पना की दुनिया वास्तविकता पर इस कदर हावी हो जाता है कि आम आदमी उसी काल्पनिक दुनिया को सच मान बैठता है और उसका मुरीद हो जाता है. जैसे इस शो में  लेखिका से उनका फैन प्रेम कर बैठता है. लेकिन दरअसल, उसे प्यार उस लेखिका के लेखन शैली से है, जिसमें वे अपनी वास्तविक जिंदगी की नहीं, सपनों की कहानियां बुनती हैं. दरअसल, सिनेमा, लेखन, साहित्य की दुनिया इस कदर काल्पनिक होने के बावजूद अपना जादू बिखेरती है कि उस तिलिस्म में डूबा रहनेवाला दर्शक ही उसकी लोकप्रियता बढ़ा सकता है. चूंकि वह हकीकत से कोसो दूर है. इसलिए खुश है. संतुष्ट है. बॉलीवुड की ग्लैमर की दुनिया इसी झूठ पर ही आधारित है या यूं कह लें दर्शकों के उस झूठे विश्वास पर ही आधारित है जो वे स्टार्स पर करते हैं. जिस तरह स्टार्स उन्हें आकर्षित करते हैं और आमतौर पर मोहने की कोशिश करते हैं. वास्तविक जिंदगी में स्टार्स के लिए वे दर्शक खास मायने नहीं रखते. यही वजह है कि आज भी फैन और शख्सियत में हमेशा एक दीवार बना कर रखी जाती रही है. चूंकि जिस दिन दर्शकों के सामने हकीकत आयी. वे धराशायी हो जायेंगे. वह तिलिस्म समाप्त  हो जायेगा और शायद तब सिनेमा खत्म हो जाये. इसलिए उस तिलिस्म का बरकरार रहना भी जरूरी है.

शहर व व्यवहार


स्टार प्लस पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक तेरे शहर में अन्नया पेरिस की फैन्सी और साफसुथरी स्ट्रीट से घूमती हुई बनारस की गलियों तक आ पहुंची है. वह पेरिस में एक लड़के की तरह अपने घर का ख्याल रखती है. यहां भी उसे जब महसूस हुआ कि उसकी मां को चाय की जरूरत है तो वह फौरन उसके इंतजाम के लिए निकल गयी. वापसी में उसे अपने घर का रास्ता याद न रहा. रास्ते में एक अनजान से व्यक्ति से उसकी मदद की और वह घर आ पहुंची. फिलवक्त बिहार की छवि धुमिल करने के लिए और एक मुहिम जारी हुई है. लगातार बिहार में किस तरह मेट्रिक की परीक्षा पास की जाती है. यह बताया जा रहा है और चपेट में पूरा बिहार है. यों भी बड़े शहरी लोगों के लिए पूरा बिहार, पूरा उत्तर प्रदेश गांव ही है. लेकिन कमियां निकालने वाले कभी इन छोटे शहरों की महीन और खूबसूरत बातों पर ध्यान नहीं देते. मैंने कहीं भी किसी आलेख में बिहार व यूपी की तारीफ करते हुए नहीं पढ़ा है, जहां उस शहर की मासूमियत को भी दर्शाया जाता हो. आप वहां की सड़कों पर चल रहे हैं और पीछे से अचानक आपको आवाज आती है, दीदी आपका दुपट्टा गाड़ी में फंस जायेगा. उसे संभाल लें. दीदी आपको कहां जाना हम रास्ता बता देते हैं. किस तरह वहां अब भी दोस्त दूसरे दोस्त को स्टेशन तक छोड़ने आता है और उसके हाथों में समोसे का पैकेट होता है. तेरे शहर की अन्नया जिस तरह रास्ता पूछती हैं, अनजान व्यक्ति उसकी मदद करता है.लेकिन इस बात को शायद ही उतनी महत्ता दी जाती है, जितनी महत्ता इस बात को दी जाती कि उस व्यक्ति ने अगर छेड़खानी की होती. रांची से मुंबई तक के सफर में पिछले पांच सालों में हमेशा मेरे नये दोस्त बने हैं. वे आत्मीयता के साथ मिलते हैं. लेकिन यह बातें चूंकि सकारात्मक हैं, सो किसी अखबार या मीडिया के लिए मायने नहीं रखतीं.

खतरों की खिलाड़ी बनतीं अभिनेत्रियां


हाल ही में ऐश्वर्य राय ने मुंबई के एक ऐसे जंकयार्ड में जाकर शूटिंग की, जहां पर शूटिंग के सारे संसाधन मौजूद नहीं थे. हाल के दौर में अभिनेत्री व अभिनेता वास्तविक लोकेशन को स्टूडियो लोकेशन की बजाय अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं. अब वे सिर्फ स्वीटजरलैंड व विदेशी लोकेशन की खूबसूरत वादियों में ही नहीं बल्कि वास्तविक व कठिन लोकेशन पर भी शूटिंग करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. 
जज्बा
हाल ही में ऐश्वर्य राय ने अंधेरी के  डोंगर इलाके में फिल्म जज्बा की शूटिंग की. खास बात यह थी कि फिल्म के निर्देशक चाहते थे कि फिल्म की शूटिंग वास्तविक लोकेशन में हो. लेकिन संजय गुप्ता यह भी जानते थे कि वह जगह शूटिंग के लिहाज से बहुत उपयुक्त नहीं है. साथ ही शूटिंग स्पॉट पर जाने के लिए ऐश को लगभग चार किलोमीटर तक पैदल ही चल कर जाना था. लेकिन ऐश ने कोई भी नखरे न दिखाते हुए निर्णय लिया कि वह शूटिंग करेंगी.  उन्होंने किरदार की डिमांड के मुताबिक  स्टूडियो शूट को नहीं, बल्कि वास्तविक शॉट को ही प्राथमिकता दी.
बॉबी जासूस
विद्या बालन हमेशा से वास्तविक लोकेशन के शूट को तवज्जो देती आयी हैं. उन्होंने फिल्म नो वन किल्ड जेसिका में भी कोलकाता व दिल्ली में भीड़भाड़ वाले इलाके में ही शूटिंग को तवज्जो दी है. हाल ही में उन्होंने बॉबी जासूस के लिए हैदराबाद के रेलवे स्टेशन पर वास्तविक भिखारियों के साथ बैठ कर शूटिंग की. वे मानती हैं कि ऐसे सीन फिल्म को और खास बनाते हैं.
एनएच 10
एनएच 10 फिल्म की यह खूबी है कि इस फिल्म के अधिकतर दृश्य अंधेरे में शूट हुए हैं. अंधेरे में वास्तविक लोकेशन पर जाकर शूटिंग करना अनुष्का के लिए काफी कठिन था. लेकिन अनुष्का ने तय किया था कि जिस तरह कहानी है. उसमें लोकेशन का रियल होना जरूरी है. इसलिए उन्होंने किसी बात की फिक्र नहीं की. नतीजन फिल्म को काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है. अनुष्का शर्मा ने जब तक है जान में भी कई डेंजरर्स लोकेशन पर शूटिंग की थी.
रिवॉल्वर रानी
फिल्म रिवॉल्वर रानी में कंगना रनौट ने वास्तविक लोकेशन में ही शूट किया था. उन्हें वहां कुछ परेशानियों का सामना भी करना पड़ा था. कुछ नक्सलवादियों ने उनकी कार को रोक कर उन्हें बाहर आकर उनके साथ फोटो खिंचवाने की धमकी भी दे रहे थे. निर्देशक व निर्माता उनकी सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित थे. यहां तक कि कंगना की बहन रंगोली ने उन्हें इस फिल्म को सिर्फ इस वजह से न करने की बात कही थी. लेकिन कंगना ने यह बात नहीं मानी और उन्होंने वास्तविक लोकेशन पर शूट किया. वह भी पूरी निडरता के साथ.
जग्गा जासूस
फिल्म जग्गा जासूस में खबर है कि कट्रीना कई वास्तविक लोकेशन पर शूट करती नजर आयेंगी. साथ ही इस फिल्म के लिए उन्होंने कई स्टंट्स भी सीखे हैं और वे उसे खुद ही परदे पर दर्शायेंगी.
मर्दानी
फिल्म मर्दानी में रानी मुखर्जी ने कई वास्तविक लोकेशन पर जाकर, भीड़भाड़ के बीच शूटिंग की है. फिल्म में रानी ने कार्व मागा का काफी अच्छा प्रदर्शन भी किया है और वे इस बात से खुश हैं कि उन्हें इस तरह का रफ एंड टफ किरदार निभाने का मौका मिला इस फिल्म में. इसलिए वे इस फिल्म को अपने दिल के बेहद करीब मानती हैं. 

इरफान व फिल्म निर्माण


इरफान खान ने कुछ महीनों पहले ही घोषणा की थी कि वे फिल्म निर्माण में भी कदम रखेंगे. अब उन्होंने इसे वक्त देना शुरू कर दिया है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे फिल्मों की स्क्रिप्ट पर विशेष ध्यान देंगे. वे आमतौर पर बनने वाली फिल्में नहीं बनायेंगे. चूंकि उनका मानना है कि वे फिल्मों के निर्माण में सिर्फ मुनाफा कमाने के दृष्टिकोण से नहीं आये हैं. इरफान ने फैसला लिया है कि वे खुद सभी फिल्मों की स्क्रिप्ट को गंभीरता से पढ़ेंगे और उसके बाद ही वे कोई निर्णय लेंगे. वे चाहते हैं कि अपनी फिल्मों के माध्यम से वे दर्शकों को नयी तरह की फिल्में दें. न कि आम फिल्में. फिलवक्त इरफान यह मानते हैं कि अब भी बॉलीवुड में खासकर कर्मशियल फिल्मों में स्क्रिप्ट को महत्ता नहीं दी जाती है और यही वजह है कि जल्दबाजी में बनी फिल्में लगातार धराशायी हो जाती हैं. वही दूसरी तरफ गौर करें कि दम लगाके हईसा जैसी फिल्में, जिसमें एक एक किरदार बखूबी गढ़ा गया है और वे जब संवाद बोलते हैं तो दर्शक उनसे खुद को रिलेट कर पाते हैं. यही वजह है कि यह फिल्म कामयाब हुई. चूंकि इस फिल्म की स्क्रिप्ट पर काफी काम किया गया है. दरअसल, हकीकत भी यही है कि स्क्रिप्ट अगर दुरुस्त होगी. तभी वह आम दर्शकों को लुभा पायेगी. आप गौर करें तो चूंकि दम लगाके हईसा के संवाद, दृश्य फिल्मी नहीं थे. उसके किरदार आम बोली बोलते थे. नायिका नायक ने कुछ भी लार्जर देन लाइफ नहीं किया है. फर्ज कीजिए कि फिल्म का नायक अपनी नायिका के लिए गुंडों से लड़ रहा. और साउथ से उधार लिये संवाद बोल रहा होता तो क्या यह फिल्म दर्शकों को उस लिहाज से प्रभावित कर पातीं. शायद नहीं. इसलिए यह बेहद जरूरी है कि इरफान जैसे कलाकार अन्य कलाकार भी निर्माण के क्षेत्र में आयें तो स्क्रिप्ट को अहमियत दें.

हॉलीवुड व परिवार


हॉलीवुड के अभिनेता रिचर्ड गेरे ने सिनेमा में अपने सफल 40 साल पूरे कर लिये हैं. उनकी पहली फिल्म रिपोर्ट टू द कमिशनर थी. इसके अलावा अमेरिका जिगालो, प्रीटी वूमन और रनवे राइड काफी लोकप्रिय फिल्में रहीं. .  लेकिन खास बात यह है कि इतने लोकप्रिय व व्यस्त कलाकार होने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार को हमेशा प्राथमिकता दी है. वे अब भी किसी फिल्म को हां कहने से पहले अपने बेटे की रजामंदी लेते हैं.  रिचर्ड का मानना है कि जब वह अकेले होते हैं और काफी दिनों तक अपने परिवार से दूर होते हैं, तो उन्हें परेशानी होने लगती है और वह तनावग्रस्त हो जाते हैं. वर्तमान दौर में हालांकि जो जीवनशैली है, रिचर्ड उससे विपरीत हैं. वर्तमान दौर में खासतौर से फिल्मी दुनिया से जुड़े कलाकार अपने परिवार को खास अहमियत नहीं देते. खुद आलिया ने स्वीकारा है कि वे अपनी मां की बातों का काफी जल्दी बुरा मान जाती हैं और वे कई बार उन्हें कई बातें भी कह जाती हैं. हाल ही में सोनाक्षी सिन्हा फराह की दावत में अपनी मां पूनम के साथ नजर आयीं. हालांकि आमतौर पर ये दोनों मां बेटी एक दूसरे के साथ मीडिया में खुशी खुशी ही पेश आती हैं. लेकिन उस दिन पहली बार सोनाक्षी सिन्हा को अपनी मां पूनम से थोड़ी लड़ाई करते हुए भी देखा गया. अनुराग कश्यप स्वीकारते हैं कि  उनकी दोनों शादियां इसी वजह से टूट गयीं, क्योंकि वह परिवार को समय नहीं दे पाते थे. यह हकीकत भी है कि बॉलीवुड में जिस अंदाज की कार्यशैली है. परिवार का नजरअंदाज होना स्वाभाविक है. लेकिन आश्चर्य उस वक्त अधिक होता है. जब हम हॉलीवुड की शेष बातों में कॉपी करने की कोशिश करते हैं.लेकिन ये बातें हम तक पहुंच ही नहीं पातीं कि हॉलीवुड के भी कुछ कलाकार परिवार में विश्वास रखते हैं. हम हॉलीवुड के अन्य ट्रेंड को फॉलो करते हैं. लेकिन यह ट्रेंड फॉलो करने में शायद हमें परेशानी हो

रात और अनुराग कश्यप


अनुराग कश्यप की बहुचर्चित और बहुप्रतिक्षित फिल्म बांबे वेल्वेट का ट्रेलर जारी किया गया है. गौर करें तो इस फिल्म के अधिकतर दृश्य रात में शूट किये गये हैं. फिल्म में रात भी एक किरदार के रूप में हैं. यो भी अनुराग की फिल्मों में रात व अंधकार की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं. चूंकि वे हिंदी सिनेमा में उस कॉकरोज की तरह बर्ताव करते हैं, जो दिन में अदृश्य होकर किसी कोने में ही कुछ रचता रहता है. कुछ गढ़ता रहता है. लेकिन रात होते ही, अंधकार होते ही वह सब बाहर आते हैं और उत्पात मचाते हैं. अनुराग की फिल्मों को डार्क फिल्में कहते हैं. यहां भी रात है किसी न किसी संदर्भ में. उनकी फिल्म ब्लैक फ्राइडे काफी पसंद की गयी. इस फिल्म में भी रात के कई महत्वपूर्ण दृश्य हैं. फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर की शुुरुआत ही रात से होती है. फिल्म अगली का अगली सच भी रात में भी दर्शकों के सामने आता है. दरअसल, हकीकत यही है कि अनुराग रात के राजा हैं. वे रात में वे हकीकत दिखला जाते हैं, जिस रात की दूसरी सुबह होने की दर्शक कामना ही नहीं करते. चूंकि वह इतना भयानक होता है. उनकी फिल्मों में रात आशिकी या आशिकों की प्रेमकहानी बयां करने का जरिया नहीं, बल्कि कई परदे लगे किरदारों का पर्दाफाश करना है. बांबे वेल्वेट में भी उनकी वह सोच स्पष्ट रूप से नजर आ रही है. मुंबई यों भी रात की रानी है. और अनुराग राजा तो उम्मीद है कि इस रात की रानी को रात का राजा बखूबी दर्शा पायेगा. फिलवक्त ट्रेलर से रणबीर कपूर और अनुष्का के किरदारों की थोड़ी झलक मिल रही है. निस्संदेह इस फिल्म में अनुराग ने ऊर्जा से अधिक धन निवेश किये हैं. वे कर्मशियल स्तर पर बहुत कामयाब नहीं रहे हैं. लेकिन उन्हें इस बार कामयाबी की उम्मीद है. वे दृश्यों को वास्तविकता से दर्शाने में माहिर रहे हैं तो उम्मीद है कि हमें रात की एक और हकीकत देखने का मौका मिले

ड्रीम गर्ल के सपने


लाइफ ओके पर एक नये शो की शुरुआत हुई है. ड्रीम गर्ल. इस शो में एक छोटे शहर की लड़की लक्ष्मी माथुर मुंबई आकर एक सुपरस्टार बनना चाहती है. वह आयशा सुपरस्टार की हर बात फॉलो करती है. यहां तक कि उसने कपड़े भी आयशा की तरह भाड़े पर लिये. लेकिन उसका प्राइस टैग हटाना भूल गयी, जिस पर आयशा उस पर फब्तियां कसते हुए कहती हैं कि छोटे शहर की लड़कियों की वश की बात नहीं है यह एक्टिंग और ग्लैमर की दुनिया. दरअसल, लक्ष्मी उन तमाम छोटे शहरों की लड़कियों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, या उन तमाम युवाओं का, जो फिल्मी दुनिया व ग्लैमर की दुनिया में किसी को फॉलो करते हुए आते हैं और अपनी पहचान बनाना चाहते हैं. जबकि वे भी मेहनती और कम प्रतिभाशाली नहीं. छोटे शहर का टैग उन पर से कभी नहीं हट पाता. वे ग्लैमर की दुनिया में हमेशा दोहरी नजर से ही देखे जाते. दरअसल, यह इसलिए होता कि सपने देखने में बुराई नहीं, लेकिन किसी दूसरे की अंध भक्ति गलत है. हम किसी को भी अपना आदर्श मान बैठते हैं और फिर शाहरुख, सलमान, ऐश, माधुरी बनने की कोशिश करते हैं. जबकि इतिहास गवाह है जिन्होंने खुद को अपने दमखम पर साबित किया है वे कामयाब रहे हैं. जिन्होंने किसी की नकल नहीं की. हां, एक दौर था. जब आप अपने आदर्श शख्सियत की नकल कर भी पहचान स्थापित कर सकते थे. लेकिन अब दौर इरफान खान और नवाजुद्दीन जैसे शुद्ध कलाकारों का है. ड्रीम गर्ल में फिल्मी दुनिया के परिवारवाद की भी कहानी दिखाई जा रही है. साथ ही किस तरह एक स्थापित कलाकार दूसरे कलाकार के आने के संकेत मात्र से भयभीत हो जाता है. वह किस तरह अंधविश्वासी सलाहकारों व चाटुकारों से जुड़ा रहता है. ऐसे कई महत्वपूर्ण पहलुओ ं को भी दर्शा रहा. आगे के एपिसोड दिलचस्प होंगे. उम्मीद है.य

शूटिंग व व्यक्तिगत रिश्ते


 रांझणा व तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों से लोकप्रिय हुईं अभिनेत्री स्वरा भाष्कर इन दिनों सूरज बड़जात्या की फिल्म प्रेम रतन धन दीयो में सलमान खान की बहन का किरदार निभा रही हैं. हाल ही में उन्हें एक अजीबोगरीब परेशानी का सामना करना पड़ा. कई सालों से उनके साथ दे रहे उनके कूक ने अचानक स्वरा के साथ काम करने से मना कर दिया. इसकी वजह यह है कि वे स्वरा पर बार बार दबाव बना रहे थे कि वे उन्हें सलमान खान से मिलवाएं. स्वाभाविक है, स्वरा के लिए यह अजीब स्थिति हो जाती कि वे बार बार सलमान से अपने स्टाफ्स के साथ तसवीरों के लिए पोज देने को कहतीं. दरअसल, यह पहला वाक्या नहीं है. बॉलीवुड की हस्तियां कई बार ऐसी परेशानी झेलती रही हैं. आम लोग बॉलीवुड से इस कदर प्रभावित हैं कि वे महज अपने स्टार्स के स्पर्श मात्र से प्रफुल्लित हो उठते हैं. स्वरा के कूक ने अपनी नौकरी को  बेतूकी बात पर दावं पर लगा दिया. जबकि अगर वह वाकई किसी प्रोफेशनल तरीके को समझते तो उन्हें यह बात समझ आती कि स्वरा वहां ठीक उसी तरह कार्य कर रही हैं, जैसे वह किसी दफ्तर की कर्मचारी हों और एक कर्मचारी के लिए दफ्तर के सीइओ से मिलना मिलवाना कठिन है. दरअसल, कमी हमारी सोच में हैं. हम बॉलीवुड की हस्तियों को बहुत हल्के में लेते हैं. हमें लगता है कि शूटिंग बिल्कुल आम सी बात है. जबकि वहां भी एक छोटी सी चूक लाखों करोड़ों का नुकसान करा  सकती है. यही वजह है कि सेट पर अत्यधिक लोगों को एकत्रित नहीं किया जाता. इससे शूटिंग में परेशानी आती है. ऐसे में इस तरह अपने व्यक्तिगत रिश्तों को कर्मस्थल पर लाना एक बड़ी परेशानी का सबब भी बन सकता है. फिल्म इंडस्ट्री भी ठीक उसी आॅफिस व अन्य इंडस्ट्री की तरह काम करती है, जहां के कुछ नियम कानून होते हैं और इसे समझना जरूरी है

दोस्ताना मौसम आ गया


बॉलीवुड में एक बार फिर से दोस्ताना माहौल नजर आ रहा. आमतौर पर यह होली के महोत्सव में होता है कि दुश्मन भी गले लग जाते हैं. लेकिन इसे आफ्टर होली इफेक्ट भी माना जा सकता है. 

 अनुष्का व दीपिका की दोस्ती
पिछले कई वर्षों से अनुष्का और दीपिका में लगातार दूरियां आ गयी थीं. दोनों एक दूसरे की बातें सुनना भी पसंद नहीं करती थीं और दोनों एक दूसरे पर कटाक्ष भी करती रहती थीं. इसकी वजह यह थी कि रणवीर सिंह के साथ कभी अनुष्का के करीबी रिश्ते थे और रणवीर ने बाद में दीपिका पादुकोण से नजदीकियां बढ़ा ली थीं. अनुष्का व दीपिका अप्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे पर कटाक्ष करने का एक मौका नहीं खोती थीं. लेकिन हाल ही में दोनों सेंसर बोर्ड की मीटिंग में पहुंचीं तो मीडिया के सामने उनका अलग ही रूप नजर आया. दोनों ने न केवल एक दूसरे को हंसते हुए गले लगाया, बल्कि दोनों ने एक दूसरे को किस भी किया और घंटों एक दूसरे से बातें की. कुछ दिनों पहले ही दीपिका व सोनम ने भी एक दूसरे को हाय हल्लो कहा था.
अक्षय कुमार- शिल्पा
यह बात जगजाहिर है कि शिल्पा व अक्षय कुमार के अंतरंग रिश्ते थे. लेकिन बाद में दोनों के रिश्ते मधुर हो गये थे. लेकिन हाल ही में दोनों का एक अलग ही रूप सामने आया. जब अक्षय कुमार के साथ शिल्पा शेट्ठी ने एक आॅनलाइन शॉपिंग चैनल की शुरुआत की. खास बात यह थी कि अक्षय कुमार से बातचीत करने शिल्पा शेट्ठी के पति राज कुंद्रा स्वयं गये थे. शिल्पा ने स्वयं स्वीकारा है कि अब उनके रिश्ते मधुर हो चुके हैं.
वरुण-आलिया
वरुण धवन और आलिया पिछले काफी दिनों से बातचीत नहीं कर रहे थे. उन दोनों में किसी बड़ी बात को लेकर परेशानी हुई थी. जबकि दोनों ने साथ साथ दो फिल्में की हैं और दोनों ही लोकप्रिय रहीं. लेकिन अब खबर है कि दोनों फिर से एक दूसरे से बातें करने लगे हैं और अपनी अगली फिल्म की तैयारियों में साथ साथ जुट चुके हैं.
आदित्य रॉय-श्रद्धा कपूर
श्रद्धा कपूर पिछले काफी दिनों से आदित्य रॉय कपूर से नाराज थीं. इसकी वजह आदित्य और परिणीति चोपड़ा की बढ़ती नजदीकियां थीं. लेकिन अब नयी खबर आ रही है कि दोनों के रिश्ते फिर से मधुर हो गये हैं और दोनों को साथ साथ कई स्थानों पर देखा जा रहा है. खबर है कि अब दोनों फिर से डेट करने लगे हैं.
आमिर खान-करन जौहर
हाल ही में आमिर खान ने करन जौहर के एआइबी रोस्ट में शामिल होने को लेकर काफी बातें सुनाई थी. खबर थी कि इस बात से करन जौहर काफी नाराज थे. चूंकि आमिर ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की थी. लेकिन हाल ही में आमिर खान के जन्मदिन पर करन जौहर सबसे पहले पहुंचने वाले अतिथियों में से एक थे और दोनों एक दूसरे के साथ बेहद सहज भी नजर आये.

हालांकि जहां कुछ रिश्तों में नजदीकियां बढ़ रही हैं तो कई रिश्तों में दूरियां भी आ रही हैं. खबर है कि आलिया भट्ट और अर्जुन कपूर, जो फिल्म टू स्टेट्स के दौरान कपल माने जा रहे थे. इन दिनों आपस में बातचीत भी नहीं करते.वे दोनों हमेशा एक दूसरे को नजरअंदाज करते ही नजर आते हैं. 

बानो उर्फ दास्तां


जिंदगी चैनल पर बहुत जल्द वक्त ने किया क्या हसीं सितम नामक शो की शुरुआत हो रही है. पाकिस्तान में यह शो दास्तान नाम से प्रसारित किया गया था.यह धारावाहिक बानो उपन्यास पर आधारित है. इस धाराराहिक की खासियत यह है कि इसमें 1947 से 1956 के दौर को दर्शाया गया है. किस तरह विभाजन से पहले दो परिवार साथ साथ रह रहे थे और किस तरह विभाजन के बाद परिवार के परिवार खत्म होते गये. बानो और हसन की प्रेम कहानी पर किस तरह इसका असर हुआ. यह धारावाहिक उस दौर के राजनैतिक माहौल को बखूबी दर्शाती है. इस धारावाहिक का नायक हसन  आॅल इंडिया मुसलीम लीग का समर्थक है. जबकि सुरैया का पति सलीम इंडियन नेशनल कांग्रेस का. और उसकी यह सच है कि पाकिस्तान के बनने से मुसलिमों का भला नहीं होगा, बल्कि मुसलीम को भारत में रह कर ही अपना अस्तित्व बनाये रखना होगा.दरअसल, यह उस दौर के मुद्दे को लेकर एक गंभीर धारावाहिक है, जिसे हसन और बानो की प्रेम कहानी के बैकड्रॉप पर गढ़ा गया है. उस दौर में जैसे हालात रहे थे. कितने परिवार उजड़ गये थे. कितनी जिंदगी तबाह हो गयी थी. इसकी गाथा गढ़ी गयी है. निश्चित तौर पर जिस बड़े व भव्य पैमाने पर यह पीरियड ड्रामा तैयार किया गया है. भारत में ऐसे विषयों पर धारावाहिक तो क्या फिल्में बनाने का रिस्क भी शायद ही लिया जाता है. चूंकि यहां फिल्म मेकर्स व सीरियल मेकर्स यह हवाला देते हैं कि उन्हें यहां पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं, जिससे कि वे ऐसे शोज तैयार कर पायें. हालांकि यह भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है कि इस धारावाहिक को भारत में किस तरीके से स्वीकारा जाता है. चूंकि ऐसे कई संवाद व दृश्य हैं, जो दिल दहलाने वाले भी हैं. लेकिन इस सोच की  सराहना होनी चाहिए कि ऐसे विषयों का चुनाव किया जा रहा है. 

बेफिजूल के किरदार हरगिज नहीं कर सकता : नीरज काबी


डिटेक्टीव ब्योमकेश बक् शी जिन्होंने भी देखी है. वह डॉ गुहा का किरदार नहीं भूल सकते. उनकी संवाद अदायगी, भाव भंगिमाएं  दर्शकों को दशकों तक याद रहेंगी. अभिनय में यह दक्षता उन्हें यूं ही नहीं मिली. उन्होंने कई साल तपस्या की है. उन्हें 300 करोड़ क्लब का लालच नहीं. अधिक फिल्मों की लालसा भी नहीं. उन्हें बस अच्छे किरदार चाहिए और यही वजह है कि वे पुख्ता किरदारों में ही नजर आते हैं. स्याम बेनेगल, विशाल, दिबाकर, आनंद गांधी जैसे बुद्धिजीवी निर्देशक उनके मुरीद हैं. बात हो रही है नीरज काबी की, जिन्होंने शिप आॅफ थिशियस के बाद ब्योमकेश में डॉ गुहा का किरदार निभा कर सबको चौंका दिया है.

बचपन
मेरा बचपन जमशेदपुर में बीता.मैंने 12वीं तक की पढ़ाई वहीं से पूरी की है. लॉयला स्कूल से.  मैंने कभी भी ऐसा सोच नहीं रखा था कि मैं एक्टर ही बनूंगा. मेरे पिता फार्मिंग बिजनेस में हैं. मां स्कूल में टीचर हैं. मेरे दादाजी वहां के मशहूर डॉक्टर थे. उनके नाम पर वहां की एक सड़क का नाम भी रखा गया है. चूंकि वे वहां गरीबों की बहुत मदद करते थे. नि:शुल्क चिकित्सा करते थे. तो लोग उन्हें काफी मानते थे. सो, जमशेदपुर से हमेशा खास नाता रहा है और रहेगा. मेरे जिंदगी के हसीन वक्त वही बीते. आप अगर गौर करेंगी तो महसूस करेंगी कि जमशेदपुर में जिस तरह की हिंदी बोली जाती है. मैंने ब्योमकेश बक् शी में उस तरह हिंदी बोलने का प्रयत्न किया है. वहां की भाषा अब भी मेरे लिए खास है और रहेगी. जिस संस्कार, जिस सोच के साथ आपकी परवरिश होती है. वह शहर हमेशा आपके साथ साथ चलता है.
अभिनय की तरफ झुकाव
मैं लॉयला स्कूल में जब था. नाटक किया करता था. उसके बाद मैं पुणे चला आया. वहां इंस्टीटयूट में दाखिला लिया. उस वक्त तो सोच कर आया था कि एमबीए करना है. लेकिन उस दौरान नाटक खूब किया करता था.  हमलोग अपना गुप्र लेकर आइआइटी पवई हर  साल आते थे. 1989की बात है.हर साल करता था तो अभिनय से लगाव बढ़ा. इसके अलावा उस वक्त मैं गेट क्रशर बन कर एफटीआइ आइ चला जाता था फिल्में देखने के लिए. वहां से लगाव शुरू हुआ.वहां का माहौल था. काफी लोग जानने भी लगे थे. उस दौरान नाटक को कुछ अवार्ड मिले थे तो फिल्म इंस्टीटयूट में भी सबको लगता था कि इस बंदे में कोई बात है. तो बस ऐसे ही रुझान बढ़ा और फिर पढ़ाई खत्म करने के बाद मैं मुंबई आ गया. मुंबई आने के बाद यह तो तय कर लिया था कि बेफालतू काम नहीं करूंगा. यह बात मैंने शुरू में ही ठान ली थी और आज तक डटा हुआ हूं. लेकिन इसका मुझे अफसोस नहीं. मेरे लिए अभिनय साधना है और इसे मैं बेवजह जाया तो नहीं कर सकता. हालांकि मैंने थर्ड अस्टिेंट रूप में खूब काम किया. कई जॉब्स किये. कई एड फिल्मों में काम किया. इसी दौरान मुझे सुमित्रा भावे के साथ सीरियल में काम करने का मौका मिला. छोटा सा ही किरदार था. और इसके बाद मुझे पता चला कि एक के धीर ओड़िया फिल्म बना रहे हैं, जिसमें उन्हें 29 साल के लड़के की खोज थी.मेरे पिता उ िड़या हैं तो मुझे भाषा की समझ थी. मैंने आॅडिशन दिया तो फिर सेलेक्ट हुआ. साथ ही इस फिल्म की जरूरत छऊ डांस थी और मुझे वह आती थी. चूंकि मैंने वह देखा था. सीखा था.  इस फिल्म का अंगरेजी नाम था द लास्ट वीजन जिसे नेशनल अवार्ड मिल चुका है. और यही से फिल्मों का सफर शुरू हुआ और मैंने निर्णय लिया कि अब यों ही कहीं भी अभिनय नहीं करूंगा. सो, इस दौरान मैंने अपनी तैयारी जारी रखी. उस तैयारी में यह नहीं था कि मैं जिम जाता और बॉडी बनाता था. बल्कि अभिनय शैली को निखारने की प्रैक्ट्सि शुरू की. रियाज किया. कई नाटक किये. हैमलेट तो कई बार प्ले किया. 1999 की बात है. जगह जगह जाता था. फिर अपना गुप्र बनाया और नये लोगों को, कलाकारों के साथ रियाज शुरू किया. प्रवाह नामक थियेटर गुप्र को पहचान मिली.
शिफ आॅफ थिशियस
इसी दौरान आनंद गांधी का 2009 में मेरे पास फोन आया कि मैं शिप आॅफ थिशियस बना रहा हूं. तो मैंने जब सुना कि वह सीरियल लिखते हैं तो मैंने मना कर दिया. मुझे लगा कि नहीं मैं आपकी फिल्म में काम नहीं करूंगा. लेकिन फिर उन्होंने बुलाया. मुझे मेरा किरदार समझाया. और यह फिल्म जब मुझे मिली मैं 42 साल का था. डॉक्टर का कहना था 18 किलो तो हरगिज मत घटाना. ब्लड प्रेशर की समस्या होगी. लेकिन मैंने भी सोचा मैं अब तक ऐसे किरदारों के लिए ही इंतजार कर रहा था न. मैंने वह सब किया. और वाकई में जब इस फिल्म को राष्टÑीय अंतरराष्टÑीय स्तर पर पहचान मिली तो मैंने महसूस किया कि मैं तो इसी तरह के किरदार के लिए अब तक साधना कर रहा था.
ब्योमकेश बक् शी के डॉ गुहा
दिबाकर उन निर्देशकों में से एक हैं, जिनके साथ मैं काम करना चाहता था. उनकी पहले की सारी फिल्में मैंने देखी हैं और उन्होंने जब मुझे फोन किया कि मुझे डॉ गुहा का किरदार निभाना है तो मैंने पूरी स्क्रिप्ट पढ़ी. फिल्म में डॉ गुहा के ही किरदार में जितने वेरीयेशन हैं. जितना रेंज है. मेरे जैसे कलाकार के लिए इससे अच्छा मौका एक ही फिल्म में अपनी अभिनय क्षमता को दिखाने का नहीं हो सकता था. जैसे आप गौर करें फिल्म का अंतिम दृश्य. जहां गुहा खुद से बातें कर रहा है. वह 15 मिनट मैंने यों ही नहीं निभाया वह मेरे लिए इतने सालों की मेहनत थी.वहां जो मेरी आंखें अभिनय कर रही हैं. दरअसल, वह स्रेक का मूवमेंट है. जो मुझे छऊ डांस की वजह से सीखने का मौका मिला.जब गुहा हंसता है...वह एक सांप की हस्सी है हिस्ससस वाली हंसी...यह सब अभ्यास मैंने सिर्फ एक् शन के लिए नहीं बल्कि अपने अभिनय शैली को दुरुस्त बनाने के लिए की है. मार्शल आर्ट, योग, छऊ डांस जैसी चीजों से आपको अभिनय के विभिन्न रूप, भाव भंगिमाएं सीखने का मौका मिलता है. और मुझे खुशी है कि दिबाकर ने काफी शोध के बाद यह फिल्म बनाई है. मुझे विशाल भारद्वाज, जोया अख्तर, इम्तियाज अली व श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक पसंद हैं. दिबाकर जैसे निर्देशक के साथ आप काम कर रहे होते हैं तो आपको पता होता है कि यह भी आपकी तरह ही डेडिकेटेड हैं. मैंने लंबा इंतजार किया. लेकिन खुशी है कि मुझे जो करना था मैंने किया. कंप्रमाइज नहीं किया और लोग अब पसंद कर रहे हैं. जल्द ही मेघना गुलजार की फिल्म न्योयडा में खास किरदार में नजर आऊंगा.

श्याम बेनेगल की भूमिका
मुझे याद है मेरे करियर के शुरुआती दिनों में मैं श्याम बेनेगल के आॅफिस गया था और तीन चार घंटे इंतजार के बाद जब श्याम साहब आये. मैं वहां से नर्वस होकर भाग गया और फिर घर आकर फूट फूट कर रोया कि मैं तो मिलना चाहता था फिर क्यों नहीं मिला. फिर कुछ सालों बाद श्याम बेनेगल का फोन आया कि संविधान में मुझे वे गांधी की भूमिका दे रहे थे. मैं उनके आॅफिस गया और उसी कुर्सी पर उसी कोने में बैठा और पुराने दिनों को याद किया कि मैं कभी यही से डर कर भाग गया था कि मुझे तो कुछ नहीं आता, आज वही मुझे बुलाया गया है. बेनेगल साहब के साथ काम करके मैं खुद को इनरिच कर पाया. उनके पास हर फील्ड की पुख्ता जानकारी होती है और वे कितनी ज्ञान की बातें करते हैं कि आप बस बटोरते जाइए तो मुझे लगता है कि मैं जो इतने साल दिये मैं काफी कुछ अर्ज भी किया है और मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं.