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20141216

लकी हूं कि अच्छे निर्देशकों के साथ काम कर रही हूं : अनुष्का

 फिल्म पीके से जुड़ने की खास वजह क्या रही.
राजू हिरानी. सिर्फ और सिर्फ राजू हिरानी. मेरा मानना है कि हम राजकुमार हिरानी को परफेक् शनिष्ट इसलिए मानते हैं क्योंकि वह मीडियोकर फिल्में नहीं बनाते हैं. और मैं भी गुड सिनेमा के साथ ही अपना नाम जोड़ना चाहती हूं. तो मेरे लिए यह खास मौका था. जब मैं उनके साथ काम करूं. और इस फिल्म के साथ जुड़ने से एक बड़ी खुशी यह भी मिली जब मुझे राजकुमार हिरानी ने कहा कि वह मुझे मेरी फिल्म में कास्ट करना चाहते हैं , क्योंकि उनकी पत् नी हमेशा उनसे शिकायत करती हैं कि वह अपनी फिल्मों में महिलाओं का किरदार खास नहीं रखते. तो उन्होंने कहा कि पीके से मैं अपनी पत् नी को खुश करने की कोशिश कर रहा हूं. तो यह सुन कर तो मैं और ज्यादा ही खुश हो गयी. इससे स्पष्ट है कि इस फिल्म में निश्चित तौर पर अच्छा किरदार होगा ही. राजू हिरानी के साथ जब आप फिल्म कर रहे होते हैं तो आप सिर्फ फिल्म नहीं कर रहे होते आप बियोंड द फिल्म करते हैं.राजू हिरानी की फिल्म देख कर आपको यह नहीं लगता कि आप फिल्म देख रहे हो. आप जुड़ जाते हो उससे. लगता है कि आपके साथ घटित हो रहा है. रोना भी आता है हंसी भी आती है. और दुर्भाग्यवश राजू हिरानी जैसे निर्देशक हमारे देश में कम हैं. राजू खुद अपनी फिल्मों के ब्रांड हैं. राजू हिरानी की फिल्मों की खासियत है कि हम उसके डायलॉग, उसके सीन रिकॉल कर सकते हैं.ऐसी कितनी हिंदी फिल्में होती हैं. यही वजह है कि वह जीवंत तरीके से इसे प्रस्तुत करते हैं.
अनुष्का आपको इंडस्ट्री में आये 5 साल हुए हैं. ऐसे में जब पीके जैसी फिल्म आॅफर होती है तो नर्वस होती हैं आप?
हां, शुरू होने से पहले तो नर्वसनेस होती ही है कि कर पाऊंगी की नहीं और मुझे लगता है हर एक्टर नर्वस होता ही होगा. मन में डाउट्स होते हैं. पहली फिल्म के पहले भी आये थे और अब भी होता है. लेकिन जब फिल्म शुरू हो जाती है. रीडिंग शुरू हो जाती है तो आप अपने कैरेक्टर को समझने लग जाते हो. आप कहीं पर भी हो. आपके दिमाग में वह कैरेक्टर चलता रहता है. आप उसको प्रीपेयर करने लगते हैं. और फिर आपके लिए काम करना आसान हो जाता है.
इन पांच सालों में आपने काफी कम फिल्में की हैं. जाहिर सी बात है आपके पास आॅफर आते रहे होंगे. तो न कहना कितना मुश्किल होता है और कम फिल्में करने की वजह?
दरअसल, न कहना मेरे लिए मुश्किल नहीं होता है. क्योंकि मेरे मन में क्लैरिटी रहती है कि मैंने उन्हें न क्यों कहा. मेरे मन में लेकिन कोई रिग्रेट नहीं रहता. क्योंकि मुझे पता है कि मैं किस वजह से फिल्म को न कहा है. मैंने तय किया है कि मैं हमेशा अलग तरह की फिल्में करूंगी. ऐसी फिल्में जिसमें मेरे करने के लिए कुछ हो. तो अभी मेरे पास वक्त है. अभी मैं उस पोजिशन में हूं कि फिल्मों का चयन सोच समझ कर करूं.सो, मुझे दिक्कत नहीं होती. मैं जब भी करूंगी मैं सब्शडटानशियल काम करूंगी. जो फिल्में मैंने की हैं. सभी अलग अलग तरह की फिल्में हैं. बांबे वेल्वेट, दिल धड़कने दो जैसी फिल्में कर रही हूं और सभी बिल्कुल अलग अलग तरह के निर्देशकों के साथ. सबका सिनेमा अलग अलग तरीके का है. मैं लकी मानती हूं कि मैं ऐसी फिल्में कर पा रही हूं. लेकिन इसके लिए मुझे धैर्य रखना पड़ा है. क्योंकि कई लोग आपको कहने लगते हैं कि आप यंग हो लेकिन ज्यादा फिल्में नहीं कर रहे. एकबारगी आपको भी टेंशन होने लगती हैं. लेकिन फिर भी मैंने धैर्य से काम लिया है.
ऐसे वक्त में जब आप अपना धैर्य खोती हैं तो आपको मजबूत कौन बनाता है.
मेरे भाई से मुझे काफी सपोर्ट करता है. वह मेरा सपोर्ट सिस्टम है. वह हमेशा समझाता है कि यह रियलिटी नहीं है. सिनेमा में बहुत इल्लुयजन है. इस पर ध्यान मत दो. फिर जब वह समझाता है तो मंै भी समझने लगती हूं कि रियलिटी क्या है.साथ ही मैं खुद को स्ट्रांग मानती हूं, मैं लोगों से दूर रहती हूं. मेरी अपनी प्राइवेट लाइफ है. मैं पर्सनल लाइफ के बारे में बात नहीं कर पाती हूं. मैं ज्यादा पीआर नहीं करतीं तो इन चीजों से मैं ज्यादा परेशान नहीं होती. मैं लोगों के बातों पर ध्यान नहीं देती. मैं ज्यादा साबित करने की कोशिश नहीं करती हूं. क्योंकि मेरा मानना है कि आपका काम ही आखिरकार बोलता है. मैं किसी का इगो सैटिसफाइ करने के लिए अपना रिस्पेक्ट नहीं खो सकती.
फिल्मों के प्रोडक् शन में आने की खास वजह क्या रही?
मैं चाहती हूं कि अच्छी फिल्में बना पाऊं. मैं जिस तरह की फिल्में देखती हूं. मुझे लगता है कि ऐसी फिल्में हमारे यहां भी बनतीं. जैसे क्वीन बनीं, कहानी बनी. ऐसी कई फिल्में देख कर लगता है कि ऐसी फिल्में काश मैं बना पाऊं. और मुझे लगता है कि कोई मेरे नाम पर अच्छी फिल्म बना रहा है तो मैं उसको सपोर्ट करना चाहती हूं. वैसे मैं क्रियेटिव प्रोडयूसर बनना ही पसंद करती हूं, क्योंकि मैं मानती हूं कि मैं क्रियेटिव हूं. अभिनय तो करने के लिए ही यहां आयी थी. सो, जो मिल रहा है मौका. मैं बहुत खुश हूं कि मैं एक साथ सिनेमा के लिए अच्छे काम कर रही हूं. एनएच 10 जब आप देखेंगी तो आप देखेंगी कि ऐसी फिल्में कितनी कठिन होती हैं बनाने में. सो, आप देखें कि मैं किस तरह से काम करती हूं.

डीडीएलजे देखा तो जाना सनम...दर्शक भी दीवाने होते है ं सनम


दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे को हिंदी सिनेमा में एक रामराज्य माना जाये तो अतिश्योक्ति न होगी. यह फिल्म भले ही आज से कई सालों पहले रिलीज हुई हो. लेकिन आज भी ये सिने प्रेमियो और आम लोगों के सबसे करीब हैं. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे ने अपने किस कदर लोगों को प्रभावित किया है, इस बात का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मुंबई के मराठा मंदिर में अब तक यह फिल्म प्रदर्शित हो रही है. वह भी हाउसफुल. और 12 दिसंबर को फिल्म 1000वें हफ्ते में प्रवेश कर जायेगी. पेश है प्रेम व पारिवारिक मिसाल बन चुकी इस फिल्म से जुड़े कुछ दिलचस्प पहलुओं पर अनुप्रिया व उर्मिला की रिपोर्ट

एक दर्शक की दीवानगी किसे कहते हैं, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आप तभी लगा सकते हैं, जब आप स्वयं मुंबई के मराठा मंदिर में एक दर्शक के रूप में मौजूद हों. उस दौर में जब मल्टीप्लेक्स के सॉफिशटिकेटेडे दर्शक नहीं हुआ करते थे.उस वक्त की रिलीज हुई फिल्म  इस दौर में भी यह फिल्म जबकि मल्टीप्लेक्स वाले सॉफिशटिकेटेड दर्शकों वाले दौर में भी फं्रर्ट सीट और हर डायलॉग पर सिटियां बजाने वाले दर्शकों के बीच देखी जा रही है. आज के बुद्धिजीवी समीक्षकों व दर्शकों को भले ही दिलवाले...एक औसतन फिल्म माने. कितने बुद्धिजीवियों ने इसे प्रेमियों को उकसाने व प्रेम विवाह को बढ़ावा देने के इल्जाम लगाये हो. लेकिन हकीकत यह है कि इस फिल्म ने आम लोगों को ही नहीं सिने प्रेमियों को भी प्रभावित किया. हिंदी फिल्मों में इस फिल्म के बाद जितनी प्रेम कहानियां बनीं लगभग सभी प्रेमियों में दर्शकों ने राज और सिमर को तलाशा. कई प्रेम कहानियां इससे ही प्रेरित हुई. हर प्रेम कहानी इस फिल्म की झलक दिखी. हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया के निर्देशक शशांक खेतान यह स्वीकारते हैं कि उन्होंने दिलवाले से प्रेरित होकर ही अपनी कहानी गढ़ी. फिल्म का संवाद बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें होती रहती हैं...आम आशिकों के दिल की जुबां बनीं. फिल्म का अंतिम दृश्य जब राज और सिमरन भाग रहे हैं. वह ट्रेन वाले दृश्य सिने प्रेमियों के लिए स्थापित तसवीर बनी. न जाने कितने सिने प्रेमियो ने इस अंदाज में अपने घर में लगे फ्रेम सजाये हैं.यह इस फिल्म का ही जादू है, जिसने तुझे देखा तो ये जाना सनम गीत को लव एंथम में बदल दिया. लोग दो प्रेमियों की दुआएं लेते और कहते एकदम राज सिमरन सी जोड़ी है. कई गांवों में लोगों ने कबूतरों को दाना देना शुरू किया. मेहंदी पर सेहरा सजा के रखना गीत न हो तो दुल्हन अपनी शादी को पूरी नहीं समझती.  यह फिल्म केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि एक परिवार, एक बेटी के सरोकार, एक पिता व पुत्री के रिश्ते व पारिवारिक रिश्तों की समझ पर आधारित महत्वपूर्ण फिल्म थी और शायद यही वजह है कि आज  भी यह प्रासंगिक है और आगे भी रहेगी.
बॉक्स में
 1. गौरतलब है कि यह फिल्म सबसे पहले सैफ अली खान को आॅफर हुई थी. लेकिन सैफ अली खान ने आॅफर ठुकराया तो यह आॅफर फिर शाहरुख को दिया गया.
2. सैफ अली के अलावा आदित्य ने जब फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी तो उनके दिमाग में था कि वे किसी हॉलीवुड के एक्टर को कास्ट करेंगे. उनके जेहन में उस वक्त टॉम क्रूज का भी नाम आया था.
3. इस फिल्म के दौरान करन जौहर, काजोल और शाहरुख खान पक्के दोस्त बने और उनकी फिल्म कुछ कुछ होता है की नींव भी इसी फिल्म के दौरान पड़ी थी.
4. यह फिल्म यश चोपड़ा के बैनर यशराज बैनर के 25 साल पूरे होने के शुभ अवसर पर प्रदर्शित हुई थी. यश चोपड़ा मानते थे कि उनकी पहली फिल्म दाग से लेकर दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में उन्होंने अपने सपने को जिया. और इस सपने को जीते जीते उन्हें 25 साल हुए.
5. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे का शीर्षक आदित्य चोपड़ा को अनुपम खेरे की पत् नी व अभिनेत्री किरण खेर ने सुझाया था.
6. यश चोपड़ा को पहली बार फिल्म कभी कभी की शूटिंग के दौरान यह एहसास हुआ था कि उनके बेटे आदित्य चोपड़ा को फिल्मों में कितनी दिलचस्पी है. चूंकि फिल्म की शूटिंग के दौरान हर वक्त व्यूफाइनडर से कुछ न कुछ देखा करते थे और शशि कपूर व अमिताभ उन्हें छोटा डायरेक्टर बुलाते थे और यह भी कहा करते थे कि डायरेक्टर बनने पर हमें याद रखना. बाद में आदित्य ने एक दिन शबाना और जावेद अख्तर को 6 साल की उम्र में एक कहानी सुनायी जिसे सुन कर दोनों ने ऐलान कर दिया था कि आदित्य निर्देशक ही बनेंगे.
मेरे लिए लांचिंग पैड : शाहरुख खान
भले ही मैंने दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे से पहले कई फिल्मों में काम कर लिया था. लेकिन मेरे लिए यह फिल्म लांचिंग पैड की तरह थी. जैसे सलमान की मैंने प्यार किया और आमिर की कयामत से कयामत थी. मैंने 15 फिल्में कर ली थी उस वक्त तक़ . लेकिन जो संतुष्टि इस फिल्म से मुझे मिली थी. वह एक एक्टर की भूख को शांत करनेवाली थी. लोग आदित्य चोपड़ा को नजदीक से नहीं जानते. कई लोगों ने उन्हें देखा नहीं है. लेकिन मैं बस यही कहूंगा कि राज बिल्कुल आदित्य की तरह है. उतना ही रोमांटिक, उतना ही फनी और उतना ही अपने परिवार को प्यार करने वाला. इस फिल्म की एक और खासियत यह थी कि इससे पहले तक फिल्मंो में लड़के लड़कियों को भगाते हुए दिखाया जाता था. लेकिन इस फिल्म के बाद से वे परिवार को महत्व देने लगे. मुझे याद है शुरुआत में  इस फिल्म के बारे में सिर्फ सलमान ने कहा था कि फिल्म मैंने प्यार किया से अच्छा बिजनेस करेगी.
फेवरिट गीत : मेरे ख्वाबों में जो आये...
मैं सिमरन बिल्कुल नहीं : काजोल
मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि कैसे मैंने मजाक मजाक में सिमरन का किरदार निभा दिया. मैं लेकिन उसकी तरह बिल्कुल नहीं थी. लेकिन वह आदित्य चोपड़ा ही थे. जिन्होंने मुझे सिमरन बनाया. मुझसे ज्यादा आदि सिमरन को जानते थे. फेवरिट गीत : फिल्म का मेरा पसंदीदा गीत तुझे देखा तो जाना सनम है. मुझे लगता है कि मेरे लिए प्यार क्या है. इसे ध्यान में रख कर वह गीत लिखा गया था.
फेवरिट सीन : जब मैं अमरीश पुरी जी से अंतिम दृश्य में राज के साथ जाने की इजाजत मांगती हूं.
टिपिकल मां का किरदार नहीं था : फरीदा जलाल
इस फिल्म में मुझे मां का जो किरदार मिला था. वह आमतौर पर हीरोइन की मां वाला किरदार नहीं था. मुझे इसमें अपने बाल जबरन सफेद नहीं करने पड़े थे. मैं सिमरन की दोस्त जैसी थी. इससे पहले शायद फिल्मों में मां और बेटी के रिश्ते में प्यार को लेकर इतनी सहजता कम दिखाई गयी थी. तो यह फिल्म एक बेटी और मां के रिश्ते को भी अलग तरीके से स्थापित करती है. फिल्म में कई परत हैं. जो आपको आकर्षित करते हैं.
ँजंगली घोड़ा था वह : परमजीत
फिल्म में  जिस घोड़े पर मैं सवार था वह जंगली घोड़ा था. लेकिन वह मेरा पहला शॉट था फिल्म का तो. मैं खुद को साबित करना चाहता था. सो, मैं अपने बेस्ट देने की कोशिश करता रहा. घोड़ा चूंकि जंगली था तो डर तो लग ही रहा था. चूंकि घोड़ा एक खेत से दूसरे खेत चले जा रहा था.जब वह घोड़ा थमा तब जाकर सांस में सांस आयी.

मेरी जिंदगी का बेस्ट शॉट था वह : अनुष्का

मेरा पहला शॉट फिल्म रब ने बना दी जोड़ी का था. मुझे सुरी यानी शाहरुख के साथ एंट्री करना था. दरवाजे से. मैंने शादी का जोड़ा पहना हुआ था. वह मेरी जिंदगी का पहला शॉट था. थोड़ी थोड़ी डरी सी तो थी, क्योंकि सभी बड़े लोग थे. फिल्म में ऐसा सीन था कि मैं सुरी को जानती नहीं हूं. लेकिन उनके घर में मैं पत् नी बन कर आ गयी हूं.और मैं नर्वस थी फिल्म में भी. और रियल लाइफ में भी, क्योंकि उस दिन मैं पहली बार शाहरुख खान से मिली थी. उन्होंने बेहद प्यार से मुझसे बातें की थीं और फिर मेरी सारी नर्वसेनेस खत्म हो गयी थी. इससे पहले हमारी मुलाकात नहीं हुई थी. लेकिन मैं कहना चाहंूगी कि मैंने वह शॉट बेहद अच्छे तरीके से दिया था और मुझे खुशी है कि आज उस फिल्म की वजह से मैं यहां हूं. खुशी है कि मुझे आदित्य ने भी कहा था कि मैंने पहला शॉट ही पूरे कांफिडेंस से कहा है

अहम यह है कि आप जो सोच कर चले थे बना पाये या नहीं : राजू हिरानी



राजू हिरानी...निर्देशकों में राजकुमार हिरानी ही वह शख्स हैं, जिनसे आम दर्शक भी खुद को जोड़ पाते हैं और सुपरस्टार्स भी. आप कह सकते हैं कि राजू दोनों के बीच अपनी कहानियों के माध्यम से एक सेतु का काम करते हैं. उनकी फिल्में देख कर दर्शक रोते भी हैं और हंसते भी हैं, लेकिन साथ ही साथ उनकी फिल्मों के लेकर वह घर भी जाते हैं. मुन्नाभाई, सर्किट, फुंगसुक वांगडूं, चतुर रामलिंगम जैसे किरदार अब भी दर्शकों की जेहन में दर्ज हैं. इस बार वह दर्शकों के सामने पीके लेकर आ रहे हैं. पेश है राजू हिरानी से अनुप्रिया व उर्मिला की हुई बातचीत के मुख्य अंश
फिल्म पीके का आइडिया कैसे आया?
पीके में हम क्या दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, यह तो आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा, हां, मगर यह जरूर बताना चाहूंगा कि फिल्म का आइडिया 3 इडियट्स के खत्म होने के बाद ही मेरे और फिल्म के लेखक अभिजात के दिमाग में आयी थी. हमलोग बोरिवली पार्क में घूम रहे थे. आइडिया वही से आया. लेकिन बीच को पकते पकते वक्त लगता है. सो, इतने साल लग गये.
राजू, आपकी फिल्में कई सालों के बाद आती है. जाहिर है, उन सालों में कई बदलाव भी आ जाते हैं. लेकिन फिर भी आपकी फिल्में प्रासंगिक होती हैं. तो कैसे निर्णय लेते हैं कि इसी आइडिया पर काम होना चाहिए?
नहीं, मुझे ये नहीं लगता कि इतने सालों में बिल्कुल से दौर बदल जाता है. लेकिन लकली मेरी यह जो फिल्म है पीके. यह यूनिवर्सल फिल्म है. इस फिल्म में लिखने में ज्यादा वक्त लगा. चूंकि विषय वैसा था. मेरे साथ यह डर नहीं रहता किसी स्क्रिप्ट को चुनने में की, वह प्रासंगिक रहेगा या नहीं. चुनौती यह होती है कि आप जिस विषय को लेकर चले हैं, आप उससे बोर न हों. आप जो सोच कर चले थे.वह बना पाये हैं या नहीं. आप उससे न भटकें. क्या होता है कि एक निर्देशक जब किसी फिल्म को अधिक वक्त देता है, तो आपने जो लिखा है, आप उससे बोर होने लगते हो. जो लिखा है. उसमें कई ड्राफ्ट्स होते हैं. फिर उसको आप शूट कर रहे होते हो.आप उस एक्टर के साथ रिहर्सल होता है. मैं खुद एडिटर हूं तो फिर उसे मैं दस दस बार देखता हूं. फिर मिक्सिंग होता है, तो इस पूरे क्रम में आप फिल्म को कई बार देख चुके होते हो. फिल्म का एक एक शॉट 1000 बार देखने के बाद कभी कभी आप बोर होने लगते हैं. मैं भी कभी कभी सोचता हूं कि बहुत देर नहीं करनी चाहिए एक ही स्क्रिप्ट को लेकर. सीमित समय में बना लेनी चाहिए. लेकिन हमारी दिक्कत यह है कि हम कुंआ खोदते रहते हैं. जब तक पूरी तरह से पानी न निकल आये. खुद को संतुष्ट करना भी कठिन होता है.
आपकी फिल्मों में संदेश जरूर होता है. जबकि आमतौर पर यह अवधारणा बन चुकी है कि तीन घंटे में ज्ञान बांटने की जरूरत नहीं. तो इस पर आपकी क्या सोच है?
मेरा मानना है कि वेराइटी में ही मजा है. मुझे लगता है कि हर शुक्रवार का अपना मजा है. हर शुक्रवार अलग अलग तरह की फिल्में आये. यह वक्त तो नये फिल्मकारों और नयी कहानियों का दौर है और सबसे अच्छा दौर है. तो हर तरह की फिल्में आये. मेरे साथ भी यह जरूरी नहीं कि मैं हर बार मेसेज ही दूं. लेकिन हां, मैं वैसी फिल्में बनाने की कोशिश करता हूं जिसमें मैं खुद बहुत यकीन करता हूं. जैसे एजुकेशन सिस्टम को लेकर, जैसे हमारे देश में जिस तरह से एजुकेशन की प्रक्रिया को समझा जा रहा है. वह बहुत गलत है.हम फोर्स कर रहे हैं बच्चों को कि वे इंजीनियर ही बने, डॉक्टर ही बने, क्योंकि मैं खुद उस दौर से गुजरा था. मैं चाटर्ड अकाउंटेंट नहीं बनना चाहता था. लेकिन मुझे एग्जाम देना पड़ा. मेरे मार्क्स खराब आते थे. लेकिन जब मैं फिल्म इंस्टीटयूट गया तो मुझे अचानक से एहसास हुआ कि वहां मुझे स्कॉलरशीप मिल रही है. तब मुझे समझ आया कि मुझे ये चीजें मजा दे रही थीं. अब हो सकता है कि किसी को मेडिसीन मजा दे...तो मेरा बस 3 इडियट्स के माध्यम से यही कहना था कि वही करो जो आपको मजा दे. पढ़ने के लिए रटो मत..समझने के लिए पढ़ो. कुछ इसी तरह मुझे गांधीजी में बहुत ज्यादा विश्वास था. मैंने जब गांधी देखी थी तो मैं यही सोचता था कि ऐसा भी कोई आदमी हो सकता है क्या, जिसने तय किया कि मैं बिना लड़े, बिना हिंसा के आजादी लूंगा.उनकी सोच इतनी विचित्र थी.तो मुझे लगा कि इस पर कुछ करना चाहिए. बस तो वही बात है. हो सकता है कि कल सिर्फ हम भी केवल एंटरटेन करने के लिए ही फिल्म बनायें. हां, मगर मैं एंटरटेनमेंट के नाम पर कुछ भी नहीं परोसूंगा. यह तय है.
आपकी फिल्मों से आम दर्शक भी जुड़ते हैं और सुपरस्टार्स भी. बॉलीवुड के नये से लेकर स्थापित कलाकार हर किसी की तमन्ना है कि वह राजू हिरानी के साथ काम करें? आपकी राय में आपकी फिल्मों की ऐसी क्या खास बात है, जो उन्हें आकर्षित करती है?
मुझे लगता है, आप दिल से फिल्म बनाओगे तो दिल तक पहुंचेगी. आप क्लिनिकली फिल्म बनाओगे तो कहीं नहीं पहुंचेगी. हमारी कोशिश होती है कि जो हमारी फिल्म है, हमने जो जिंदगी में देखा है.उसी को निकालो. लोगों को दिखाओ. मेरा मानना है कि मैं सबसे पहले एक आॅडियंस हूं. अगर मुझे वह फिल्म अच्छी लगती है. तो औरों को भी लगेगी. अगर हम भी यह सोचने लगे कि चलो ये यूथ को अच्छा लगेगा, चलो ये बुजुर्गों को अच्छा लगेगा, यह बात अगर आप सोच लें. तो समझ लें कि आप अपने विषय के साथ ईमानदार नहीं हैं. दूसरी यह बात है कि मैं दूसरों को कहानी बहुत सुनाता हूं. फिर उनकी राय लेता हूं. देखता हूं कि वह कौन सा प्वाइंट है, जिस पर ज्यादा लोग प्वाइंट कर रहे हैं तो उस पर दोबारा भी काम करता हूं फिर.
आपको क्या चीजें प्रभावित करती हैं?
मुझे फिलॉसफी पढ़ना बहुत अच्छा लगता है. मैं फिक् शन नहीं पढ़ता. मैं मोटी मोटी किताबें नहीं पढ़ सकता. मुझे पुरानी चीजें पढ़ना अच्छा लगता है.हरिशंकर, रेणु पढ़ लेता हूं तो अभी भी मजा आता है. लेकिन लंबी लंबी कहानियां मैं नहीं पढ़ सकता. जिंदगी से संबंधित चीजें पसंद हैं तो उन्हें ही फिल्मों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं.

jehan में सिनेमा

 हाल ही में दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे के १००० हफ्ते पूरे हुए हैं।  और इस अवसर पर यशराज स्टूडियो में एक खास कार्यक्रम  का आयोजन किया गया था।  फिल्म में राज और सिमरन का किरदार निभा चुके शाहरुख़ खान और काजोल वहां मौजूद थे और मीडिया से अपनी पुरानी यादों को साँझा कर रहे थे।  इस दौरान शाहरुख़ ने अपने करियर की कई महत्वपूर्ण बातें भी साँझा की।  जो शाहरुख़ से मिल चुके हैं।  वे इस बात से वाकिफ होंगे कि शाहरुख़ भले ही इंटरव्यू कम देते हैं।  लेकिन जब वह बातचीत करते हैं तो अपनी यादों की दुनिया से कई लम्हों से रूबरू कराते हैं और यही उनकी खूबी है। उस दिन भी उन्होंने बताया कि वह इस फिल्म से जुड़ने से पहले कभी इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि वह किसी रोमांटिक फिल्म का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन फिल्म करण अर्जुन फिल्म की शूटिंग के दौरान एक फैन ने आकर उनसे कहा था कि अब मार  काट वाली नहीं किसी अच्छी फिल्म  में काम करो। जिस वक़्त फैन उनसे बातें कर रही थी।  वहां आदित्य चोपड़ा मौजूद थे और उसी वक़्त उन्होंने शाहरुख़ को यह फिल्म ऑफर की थी।  इसी दौरान शाहरुख़ ने एक और बात साँझा की।  आदित्य ने अपनी पहली फिल्म में किरदार का नाम राज इसलिए रखा था, क्योंकि वह राज कपूर के बहुत बड़े फैन हैं। फिल्म में शाहरुख़ जो वाद्य यंत्र बजा रहे हैं।  उसे फिल्म में शामिल करने के भी यही कारण थे, क्योंकि वह राज कपूर साहब का पसंदीदा वाधय यंत्र है और उनकी अधिकतर फिल्मों में उसी यंत्र का इस्तेमाल संगीत के लिए किया गया है।( राज कपूर साहब की १४ दिसंबर को पुण्य तिथि थी) ।  वे आज होते तो ९० वां बसंत देख रहे होते।  निस्संदेह वह कई रूपों में कई निर्देशकों की प्रेरणा रहे हैं।वह अपनी फिल्मों में  संगीत को लेकर अलग सोच रखते थे।  निश्चिततौर पर वर्तमान में कई निर्देशकों से वह स्वयं भी प्रभावित होते।  राजू हिरानी उनमे से एक हैं।  सिनेमा का तिलिस्म ऐसा ही है, जो न होकर भी जिन्दा हैं।  जेहन में।  यही सिनेमा है 

आयटम और अभिनेत्री

आमिर खान ने सत्यमेव जयते के एक एपिसोड में महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया था. फिल्मों में महिलाओं को आयटम के रूप में परोसना? कहां तक उचित है? वाकई एक महत्वपूर्ण विषय है. इन दिनों सोनी टीवी के बॉक्स क्रिकेट लीग के एक प्रोमो को देखें तो एक अभिनेत्री एक प्लेयर को रिझाती है और उसे आउट कर देती है. और फिर अपने जैकेट के जीप को ऊपर कर लेती है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म एक् शन जैक् शन में फिल्म की किरदार मरीना से जिस तरह से अंग प्रदर्शन कराया गया है. निश्चित तौर पर निर्देशक के जेहन में यही बात होगी कि इसी बहाने वे कुछ दर्शकों को आकर्षित कर सकेंगे. लगातार इस मुद्दे पर जो बातें हो रही हैं कि क्या फिल्में व टीवी पर महिलाओं को आयटम की तरह परोसना बंद किया जाना चाहिए तो वाकई जरूरत है कि मेकर्स भी सतर्क हों. और साथ ही साथ अभिनेत्रियों को भी इस बात के लिए विरोध करना चाहिए. कंगना रनौत ने कहा है कि उनकी कोशिश होगी कि अब वह अश्लील आयटम सांग नहीं करेंगी. हां, मगर इस मुद्दे से कलाकारों के किरदार को नहीं आंकना चाहिए. मसलन फिल्म में अगर कोई अभिनेत्री सिल्क का किरदार निभा रही है तो जाहिर है, वह उसी किरदार में होंगी. हां, मगर बेमतलब आयटम के रूप में प्रस्तुत होना भी उतना ही गलत है. जितना इसके मेकर्स. छोटा परदे की पहुंच आम बच्चों तक है. ऐसे में ये उत्तेजित करनेवाले वाले प्रोमोज पर भी प्रतिबंध लगना ही चाहिए. आमतौर पर आदर्श बहू के रूप में  नजर आनेवाली छोटे परदे की अभिनेत्रियां क्यों ऐसे प्रोमोज में आने से परहेज नहीं करतीं. यह एक अहम मुद्दा है. खुशी है कि आमिर जैसे सुपरस्टार ने इस पर बहस तो शुरू की है और एक पहल तो की है. वरना, अभिनेत्रियां यूं ही आयटम रूप के रूप में प्रस्तुत होती रहेंगी और इन्हें इस बात से कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा.

गुलजार का प्लूटो प्यार

 पिछले दिनों संगीत निर्देशक शांतनु मोइत्रा, स्वानंद किरकिरे और श्रेया घोषाल ने एक साहित्य महोत्सव में म्यूजिकल इवनिंग के दौरान शांतनु मोइत्रा द्वारा लिखी किताब जो उन्होंने फिल्म परिणीता को समर्पित किया है. तीनों ही कलाकार अलग अलग अंदाज व प्रतिभा के धनी हैं और तीनों को साथ में देखना सुखद अनुभव रहा. इसी दौरान शांतनु मोइत्रा ने अपनी किताब के सबसे अंतिम लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अध्याय की बातें लोगों के शेयर की कि उनका गुलजार साहब से एक अलग ही रिश्ता है.इन दोनों का रिश्ता खास इसलिए है, क्योंकि शांतनु को भी एस्ट्रोनॉमी में दिलचस्पी है और गुलजार साहब भी इस विषय पर खास जानकारी रखते हैं. शांतनु ने बताया कि एक दिन गुलजार साहब ने शांतनु को घर पर बुलाया और अपना दुख जाहिर किया. उन्हें दुख था कि नौ ग्रहों का हिस्सा माना जानेवाला प्लूटो अब प्लैनेट का हिस्सा नहीं रह जायेगा. शांतनु और गुलजार के बीच उस दिन सिर्फ प्लूटो पर ही बातें हुईं. शांतनु बताते हैं कि उस दिन जिस तरह गुलजार साहब प्लूटो के बारे में बातें कर रहे थे,ऐसा लग रहा था कि उनके परिवार का कोई बच्चा उनसे अलग होने वाला है. गुलजार साहब के बारे में मेरे लिए यह नयी जानकारी थी. लेकिन अब मैं इस बात का अनुमान लगा सकती हूं कि क्या वजह है कि गुलजार साहब शायर, कवि होते हुए भी जब किसी गीत में अपने शब्द डालते हैं तो उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी क्यों होता है. अगली बार छै छप्पा छई सुनें...चांद पर लिखे उनके तमाम गीतों को सुनें और महसूस करें कि उसमें वैज्ञानिक गहराई भी छुपी है. गुलजार साहब हमेशा कहते हैं, जहां संगीत खत्म हो वहां शब्द शुरू होते हैं और जहां शब्द वहां संगीत. गुलजार साहब के इस प्लूटो प्यार के बारे में जानने के बाद उनका एक और व्यक्तित्व सामने आया.

छोटे छोटे प्रयास

मुंबई में थियेटर, कविता, साहित्य से प्यार करने वालों की भी अलग दुनिया है. लोगों के जेहन में भले ही यह बाते हों कि मुंबई में केवल ग्लैमर बॉलीवुड का हावी है. लेकिन हकीकत यह है कि कलाप्रेमी अपने अंदाज में एक अलग दुनिया बसा लेते हैं और वे बेहद सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं. चौपाल चौपाल एक ऐसा ही समूह है,जो अतूल तिवारी, अशोल बिंदल, कुलदीप सिंह व कई ऐसे कलाप्रेमियों की वजह से पिछले कई सालों से अब तक अपने अंदाज में साहित्य की सेवा कर रहा है.इस समूह में महीने के पहले या आखिरी रविवार को कविता, कहानी या साहित्य, नाटक से जुड़े कलाकार एक जगह एकत्रित होते हैं और अलग अलग विधाओं को बढ़ावा देते हैं. कभी कबीर, कभी मुंशी प्रेमचंद्र तो कभी कुदसिया जैदी...आज भी यहां जिंदा है. इसके संचालन के लिए वे किसी पांच सितारा होटल में नहीं बल्कि सामान्य से किसी स्थान पर एकत्रित होते हैं. कुछ इसी तरह पिछले कुछ महीनों से लगातार रंगकर्मी विभा रानी व उनके कुछ मित्रगण अवितको के अंतगर्त लगातार रूम थियेटर, एकल नाटक, कविता, कहानी, एंकरिंग की कला को बढ़ावा दिया जा रहा है.  बाल दिवस पर बच्चों से संबंधित कार्यक्रम. हाल ही में उन्होंने संचालन की कला को प्रोत्साहित करने के लिए कई दिग्गजों को शामिल किया. इस कार्यक्रम में विविध भारती के सुप्रसिद्ध एंकर युनूस खान व रेडियो सखी ममता सिंह भी मौजूद थीं. खास बात यह थी कि इस कार्यक्रम में उनके छोटे से बेटे जादू ने संचालन के कई गुर सिखाये. भीड़ से दूर ऐसे प्रयास भी हो रहे हैं. यह काबिलएतारीफ है. ऐसे समूहों का सम्मान होना चाहिए. चूंकि इसी तरह के प्रयासों और माध्यम से कला व साहित्य को बढ़ावा मिलेगा. बच्चे भी जागरूक होंगे. जरूरी है कि  मुंबई के पृथ्वी थियेटर की तरह अन्य थियेटर भी सफलता की कहानी गढ़े

सीखने का दूसरा नाम दिलीप कुमार

अभिनय की पाठशाला माने जाने वाले दिलीप कुमार साहब आज 92वें बसंत में प्रवेश कर रहे हैं. वे भले ही अब परदे पर नजर न आयें. लेकिन अब भी वह किसी कार्यक्रम में शिरकत करते हैं तो उनकी आंखें और उनके चेहरे के हाव भाव ही काफी होती है, यह समझाने के लिए कि वे कौन हैं. दिलीप साहब ने कभी अभिनय की ट्रेनिंग नहीं ली थी. उन्होंने अपनी आॅटो बायोग्राफी में इस बात  का जिक्र किया है कि किस तरह जब उन्हें पहला शॉट देना था. उन्हें तेज दौड़ना था और अभिनेत्री को मरने से बचाना था. उन्हें शर्म आ रही थी और वह अभिनेत्री को छू नहीं पा रहे थे. अभिनेत्री भी उनका मजाक उड़ा रही थीं, लेकिन फिर उन्हें देविका रानी ने समझाया कि तुम अभिनेता हो और अभिनय करते वक्त इतनी बंदिशे रखोगे तो कभी ओरिजनल नहीं दे पाओगे. देविका रानी की सिखाई कई बातें दिलीप साहब के जेहन में हमेशा जिंदा रहीं. दिलीप साहब अपनी जिंदगी में अशोक कुमार, देविका रानी जैसी शख्सियत को इसलिए अहमियत देते हैं, क्योंकि इन्होंने दिलीप साहब को अभिनय से अभिनय सीखने की कला को सिखाया. दिलीप साहब ने खुद अपनी बायोग्राफी में जिक्र किया है कि किस तरह वे और अशोक कुमार अच्छे दोस्त बने. दोनों साथ साथ बैडमिंटन खेला करते थे. अशोक कुमार दिलीप साहब के उर्दू भाषा की पकड़ के कायल थे. दिलीप साहब ने देविका रानी से ही यह कला सीखी कि यह बेहद जरूरी है कि अभिनय से पहले रिहर्सल किया जाये और कई कई बार किया जाये और यही वजह है कि जब तक दिलीप साहब अभिनय में सक्रिय रहे. वे कई बार रिहर्सल किया करते थे. दिलीप साहब ने फिल्म गंगा जमुना के लिए अपने नासिक के माली दिओली से भोजपुरी भाषा सीखी. मधुबन में राधिका नाचेगी गीत के लिए उन्होंने सितार वादन सीखा. दरअसल सीखने का दूसरा नाम हैं दिलीप कुमार

औपचारिक इंडस्ट्री

सुपरस्टार रजनीकांत के पूरे परिवार ने इस वर्ष उनका जन्मदिन अलग अंदाज में मनाया. उन्होंने चेन्नई के थियेटर में जाकर आम दर्शकों के बीच रजनीकांत की फिल्म लिंगा देखी. इस दौरान गौर करने वाली बात यह थी कि वे फैन्स के बीच में ही बैठे थे. उन्होंने अपने लिए अलग से सीट रिजर्व कर नहीं रखी थी. बॉलीवुड व साउथ में फैन के अंदाज अलग हैं और उनके सेलिब्रिटी भी अलग मिजाज के हैं. बॉलीवुड में एक दशक बीत चुके हैं. लेकिन अब सेलिब्रिटीज अपनी फिल्मों की स्क्रीनिंग में आम लोगों के साथ शिरकत करना हरगिज मंजूर नहीं करते. जबकि इसी बॉलीवुड में किसी दौर में एक मुहूर्त शॉट में इंडस्ट्री के कई दिग्गज शामिल हो जाते थे. फिल्म अंदाज अपना अपना के मुहूर्त में धर्मेंद्र व सचिन जैसे कई शख्स मौजूद थे. हालांकि अब पहले की तरह फिल्मों के मुहूर्त का प्रचलन भी नहीं. अब केवल बी ग्रेड फिल्मों का ही मुहूर्त होता है. बड़ी फिल्मों के तो प्रोमो की लांचिंग होती है. और सबकुछ भव्य होता है. अब औपचारिकता पूरी करने के लिए भी कलाकार एक दूसरे के जश्न में शामिल नहीं होते. लांचिंग के दौरान केवल फिल्म के कलाकार ही मौजूद होते हैं. कई फिल्मों में तो फिल्म के पूरे कास्ट को भी निमंत्रण नहीं मिलता. पिछली बार यमला पगला दीवाना 2 के म्यूजिक लांच पर काफी कलाकार मौजूद थे.लेकिन यह अपवाद था. अब तारीफ करनी भी है तो टिष्ट्वटर पर एक दूसरे की तारीफ कर दी जाती है. मगर दक्षिण में अब भी सेलिब्रिटीज और फैन के बीच पूरी तरह औपचारिक रिश्ता नहीं रहा है. यह बात जगजाहिर है कि रजनीकांत अपने प्रशंसकों से बिल्कुल अपने अंदाज में मिलना जुलना पसंद करते हैं. पिछले दिनों तो एक फिल्म की बड़ी कामयाबी में उस फिल्म के लीड कलाकारों के सिवा फिल्म के कलाकारों को भी निमंत्रण नहीं था. रिश्ते अब सिमट रहे हैं. मौसमों की तरह.

राजू हिरानी की जरूरत


हिंदी सिनेमा के जीनियस निर्देशक राजकुमार हिरानी से हाल ही में मुलाकात हुई. उनसे बातचीत के लिए केवल 20 मिनट मिले. लेकिन उन 20 मिनटों में राजू हिरानी ने जो भी बातें की. पुख्ता कीं. यह बातचीत एक इंटरव्यू नहीं. एक अनुभव है. पिछले पांच सालों में राजू की तरह आत्मीय, जमीन से जुड़े व ज्ञानवर्धक बातें करने वाले व्यक्ति से बॉलीवुड में तो मुलाकात नहीं हुई थी. बतौर निर्देशक किस तरह उन्होंने गांधीवादी सोच को दोबारा लोगों में जगाया, क्यों 3 इडियट्स साल की सबसे कमाई करने वाली फिल्म बनी. क्यों जादू की झप्पी हर कष्ट, हर रोग का निवारण है. इन सारे सवालों का जवाब राजू हिरानी से बातचीत के बाद समझा जा सकता है. उनके हर शब्द आवश्यक शब्द थे और ज्ञानवर्धक थे. उन्होंने बताया कि इन दिनों उनकी टीम  शाम के 6 बजे से लेकर सुबह 5 बजे तक काम करती है. कई लोग उन्हें अव्यवस्थित कहते हैं. लेकिन हिरानी का मानना है कि अगर आप अपने काम को पसंद करते हैं, काम को एंजॉय करते हैं, तो आपको यह वक्त की बर्बादी नजर नहीं आयेगी. उन्होंने कहा कि कई लोग चाहते हैं कि मैं गाना गाऊंगा, स्टार बनूंगा...यह उनका पैशन होता है. लेकिन जरूरी यह है कि व्यक्ति उसको ओबशेशन बनाये. मसलन अगर वाकई स्टार बनना है तो हर दिन रियाज करें. राजू हिरानी कहते हैं कि उनके मन में डर अपनी हर फिल्म को लेकर. इसलिए वे सिर्फ काम पर ध्यान देते हैं. राजू टीम वर्क को अहमियत देते हैं और गौरतलब है कि वे विधु चोपड़ा, वीर चोपड़ा, व कुछ और साथी मिल कर एक टीम की तरह काम करते हैं. वाकई जहां बॉलीवुड के निर्देशक एक साल में दो फिल्में बनाने में विश्वास रखते हैं. वहां अब भी राजू हिरानी जैसे निर्देशक हैं, जो फिल्मों में जान फूंक रहे हैं. बेहद जरूरी है कि ऐसे निर्देशकों की फिल्में कामयाब होती रहें.सिनेमा को उनकी जरूरत है.

कलाकार व निर्देशक

 अक्षय कुमार की नयी फिल्म बेबी का ट्रेलर हाल ही में लांच हुआ. फिल्म के निर्देशक नीरज पांडे हैं. नीरज पांडे निर्देशित फिल्में अ वेडनेसडे और स्पेशल 26 अलग तेवर और अलग मिजाज की फिल्में हैं. दोनों फिल्में कामयाब रहीं. हालांकि नीरज पांडे की लिखी गयी फिल्म टोटल सियापा कामयाब नहीं रही. लेकिन इस आधार पर नीरज पांडे की शैली को कमतर नहीं आंका जा सकता है. अक्षय कुमार की पिछली फिल्म हॉलीडे में उन्होंने खुद को अपने आमतौर पर मसाला फिल्मों में दिखाये गये अवतार से अलग प्रस्तुत किया. अक्षय एक् शन फिल्मों में विश्वसनीय लगते भी हैं और स्पेशल 26 के बाद उनकी बांडिंग नीरज पांडे के साथ अच्छी हो गयी है. दरअसल, हर कलाकार की चाहत होती है कि उन्हें कोई जोहरी की तरह परख रखनेवाला निर्देशक मिले. अक्षय कॉमेडी व मसाला प्रधान फिल्मों के हितेशी रहे हैं. लेकिन साल में वह एक फिल्म ऐसी जरूर करते हैं, जो उन्हें शेष सुपरस्टार के साथ कतार में खड़े रहने के लिए काफी होती है. काश, अजय देवगन को भी नीरज पांडे की तरह ही कोई सारथी मिले, जो उनसे उनके अंदर छुपे बैठे बेहतरीन अभिनेता से कुछ अनोखा रचने के लिए बाध्य करे. वर्तमान में वे अपनी प्रतिभा को जिस तरह से व्यर्थ कर रहे. शायद ही कोई अन्य सुपरस्टार कर रहे. उनकी फिल्मों में उनका एक सा किरदार अब बोर कर रहा है. सलमान खान भी आखिरकार सूरज बड़जात्या की शरण में गये हैं. फिल्म द शौकीन्स में अक्षय कुमार ने अपने किरदार के माध्यम से दर्शाया है कि एक कलाकार को एक बेहतरीन किरदार निभाने की कितनी भूख होती है और भीड़ का हिस्सा बनने के बावजूद वे हॉलीडे और बेबी जैसी फिल्में करके खुद की मजबूती बरकरार रख पाने में कामयाब हैं. जिस तरह आमिर राजकुमार हिरानी के साथ संतुष्ट हैं. 

20141203

सोचना था कि सलमान हैं, लेकिन वह थे नहीं : सोनाक्षी


मेरे करियर का पहला शॉट फिल्म दबंग का था. फिल्म में आपने देखा होगा मैंने एक लाल रंग का घाघरा चोली पहन रखा है. और मुझे यूं ही बाजार में टहलना है. मुझे लगता है कि वहां सलमान(चुलबुल पांडे) हैं. लेकिन वहां वह होते ही नहीं हैं... मुझे कल्पना करना था कि वह वहां हैं लेकिन वह होते नहीं हैं. शुरू में मैं मन ही मन घबरा रही थी कि कल्पना करने की एक्टिंग कैसे करूं.  मैं यह सीन फिल्मा रही थीं और सेट पर सभी खूब हंसाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन मैंने वह शॉट अच्छे से दिया था. मुझे इस बात की बेहद खुशी थी कि मुझे सलमान खान के साथ काम करने का मौका मिल रहा है. मुझे याद है उस दिन सेट पर सबने मुझसे कई बार खामोश बोलवाया था. खासतौर से अरबाज ने मेरी बहुत खिंचाई की थी. लेकिन वह दिन मजेदार था और मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा. चूंकि उसी दिन के बाद से मैंने यह महसूस कर लिया था कि मुझे कैमरे से प्यार हो गया है और कैमरे ने भी मुझसे दोस्ती कर ली है. आज चार सालों में वह दिन मुझे हमेशा याद आते हैं. जब मैं सेट पर होती हूं. 

स्क्रिप्ट कंठस्थ होती है मुझे : आमिर


फिल्म पीके इस साल की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है. इसकी वजह यह है कि फिल्म में आमिर मुख्य किरदार निभा रहे हैं और राजकुमार हिरानी इसे निर्देशित कर रहे हैं. मतलब दो परफेक् शनिस्ट का एक साथ होना इस फिल्म को खास बनाता है.

आमिर आपने ऐसा क्यों कहा कि यह आपके करियर की कठिन फिल्मों में से एक है?
चूंकि इस फिल्म को निर्देशित कर रहे हैं राजू हिरानी. राजू हिरानी जैसे निर्देशक जब किसी फिल्म से जुड़ते हैं तो आप समझ सकते हैं कि उससे कितनी उम्मीदें बढ़ जाती हैं. मैंने 3 इडियट्स के वक्त राजू से कहा था कि मंै कैसे 3 इडियट्स में 19 साल के लड़के का किरदार निभा सकता हूं. लेकिन राजू ने मुझे वह बनाया. सो, मेरे लिए ऐसे निर्देशक के साथ काम करना बहुत कठिन है. उनकी सोच पर खरा उतरना कठिन है. मैं बाकी फिल्मों में अपना अप्रोच भी लगाता हूं अभिनय में. लेकिन राजू की फिल्मों में मैं खुद को राजू के हवाले कर देता हूं. इस फिल्म में न सिर्फ मेरे फेशियल एक्सप्रेशन बल्कि कई चीजें आप देखेंगे कि कठिन है. फिल्म का जो लुक है, जो कहानी है. जो किरदार है. आम से अलग है. जैसा कि आप देख रहे हैं कि पीके आम आदमी नहीं है. सो, एक कलाकार पर यह प्रेशर होता है कि आप अपने निर्देशक की सोच को सही तरीके से एग्जीक्यूट कर पाये. बस इसी बात से विचलित हूं कि मैं अच्छा कर पाया हंू कि नहीं.
अक्सर कलाकार अपने आसपास के लोगों व दुनिया से सीखने की कोशिश करते हैं. क्या आप भी ऐसा कुछ रियाज करते हैं?
जी हां, बिल्कुल करता हूं. मैं अपने आस पास के लोगों को बहुत ध्यान से देखता हूं. और अगर मेरे किरदार में उसमें से कुछ ले सकूं तो लेने की कोशिश भी करता हूं. जैसे उदाहरण के तौर पर बताऊं. फिल्म 3 इडियट्स का रैंचो आपने गौर किया होगा कि वह कभी भी एक जगह खड़ा नहीं होता. हमेशा हिलता रहता है. या कुर्सी को पकड़ कर इधर उधर करता रहता है. यह दर्शाता है कि टीनएज में जो बच्चे हैं वे हमेशा उत्साही हैं. स्थिर नहीं होते. मैंने यह अपने चाचा के बेटे को करते देखा है. वह टीनएजर है अभी. तो मुझे लगा कि फिल्म में शायद मैं अपने किरदार को ऐसा दिखा सकता हूं. जो आॅथेंटिक नजर आयेगा. तो मैं सिखता रहता हूं. मुझमें यह खूबी है कि मैं लोगों को गौर करता हूं और फिर उनकी जो चीजें याद रखने लायक है. मैं याद रखता हूं.
किसी किरदार मेंं ढलने की आपकी प्रक्रिया क्या होती है?
ैमैं किसी किरदार में ढलने के लिए किसी जल्दबाजी में नहीं होता. बिल्कुल आराम आराम से, आप कह सकते कि मैं पूरी स्क्रिप्ट कंठस्थ कर जाता हूं. लेकिन रट्टा मारने जैसा नहीं. मान लीजिए कि मुझे फिल्म का पहला सीन करना है. मुझे स्क्रिप्ट दे दी गयी है तो मैं उसे पहले अपने हाथ से अपनी डायरी में लिख लेता हूं. डायरी मेरे पास आपको हमेशा मिलेगी. खुद से लिखने से होता यह है कि मुझे वह याद हो जाती हैं. मेरे साथ प्रशांत हैं. कई सालों से. वह हर दिन आते हैं. हम साथ में दिन की शुरुआत में पहला सीन डिस्कस करते हंै. फिर उसे इनएक्ट करते हैं. और एक दिन में बस एक सीन रिहर्सल करता हूं. फिर दूसरे दिन तक मुझे वह सीन याद हो जाते हैं. फिर हम दूसरे सीन की दूसरे दिन तैयारी करता हूं. मतलब जिस दिन मैं शॉट देने जाता हूं. उस दिन तक एक एक करके मैं पूरी स्क्रिप्ट की तैयारी कर लेता हूं. फिर अगर स्क्रिप्ट में बदलाव हो तो मैं फौरन पकड़ भी लेता हूं. अब जैसे फिल्म पीके के लिए मुझे भोजपुरी में संवाद बोलने हैं तो मैं उसे अपने तरीके से कंफ्यूजिया गये हो का...इसको अपनी डायरी में लिखूंगा रोमन में तो कनफूजिआ गये हो का...ही लिखूंगा. भले यह व्याकरण के हिसाब से अशुद्ध है. लेकिन अभिनय के हिसाब से शुद्ध है. जब जैसे टेलीफोन को मुझे टेलीफून बुलाना है तो मैं टेलीफून ही लिखूंगा. यही मेरी प्रैक्टिस है. एक तरह से मैं मानता हूं कि यह अभिनय के रियाज का ही प्रोसेस है.
फिल्म पीके के पहले जारी किये गये पोस्टर पर काफी शोर मचा? इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है.
ऐसा नहीं है कि हमें यह अनुमान नहीं था कि लोगों की किस तरह की प्रतिक्रिया आयेगी और हमने रातों रात यह निर्णय नहीं लिया था कि चलो कुछ ऐसा पोस्टर जारी करते हैं. यह सोच समझ कर जरूरत के अनुसार ही जारी की गयी है. आप फिल्म देखेंगे तो खुद आपको समझ आयेगी बात कि आखिर इस पोस्टर की उपयोगिता क्या थी. वह पोस्टर फिल्म का सार क्यों है. मुझे खुशी इस बात की भी है कि कई लोगों ने यह माना कि आमिर अगर कुछ ऐसा पोस्टर लेकर आ रहे हैं. और राजकुमार हिरानी की फिल्म है तो यह महज सिर्फ पब्लिसिटी का हिस्सा नहीं होगी. फिल्म में जरूर कोई ऐसी बात  होगी. सो, मैं चाहूंगा कि दर्शक खुद फिल्म देखें और इसके बाद अपना विरोध जारी करेंगे अगर उन्हें वाकई लगता है कि हमने महज सस्ती पब्लिसिटी के लिए ऐसा किया है. यह फिल्म का थीम है.
पीके किस तरह की फिल्म है?
मेरा मानना है कि यह एक यूनिवर्सल फिल्म है. यह बड़ों के लिए है. यह बच्चों के लिए है. यह एक परिवार के लिए फिल्म है. मर्दों के लिए है. औरतों के लिए है. छोटे शहरों के लिए भी है. बड़े शहरों के लिए भी है. फिल्म की कहानी यूनिवर्सल कहानी है. जिसे मतलब आप कहीं से भी देखें आप इससे खुद को कनेक्ट कर पायेंगे. राजू की फिल्मों में ड्रामा होता है और वह अपनी फिल्मों से हर फिल्म से एक अहम चीज बोलने की कोशिश करते हैं. जो अहम चीज वह कह रहे हैं, वह बहुत संजीदा बात होती है. लेकिन वह जो वेकिल(माध्यम) यूज कर रहे हैं कहने के लिए वह बहुत ह्मुमर होता है. यह बात आपको पीके में भी देखने को मिलेगी कि जो वह बात कह रहे हैं वह अहम है. लेकिन तरीका ह्ुमर है.
आमिर अगर यह बात की जाये कि आप किस तरह के आॅडियंस हैं. मसलन आप जब आॅडियंस की कुर्सी पर बैठे हैं तो आप फिल्मों को किस नजरिये से देखते हैं?
मुझे लगता है कि मैं बहुत इमोशनल आॅडियंस हूं. बहुत ज्यादा सेंसिटिव हूं. मैं तो फिल्मों में सीन देख कर रोने लगता हूं. लेकिन कुछ लोग तो रोते ही नहीं हैं. मुझ पर छोटी छोटी चीजों का असर होता है मुझ पर. और मुझे लगता है कि बतौर एक्टर यह एक अच्छी बात है. क्योंकि मुझे लगता है कि अगर आप कुछ फील नहीं कर सकते, तो आप उसे रिक्रियेट नहीं कर सकते. मैं किताबें बहुत पढ़ता हूं. किताबों में जो किरदार लिखे जाते हैं. उनका बहुत असर होता है मुझपर. जो लेखक डिस्क्राइब करता है. तो उन चीजों को मैं एबॉर्ज्ब करता हूं और अपने अभिनय में निखारने की कोश्सि करता हूं

फिल्मों के साथ भेदभाव


 डीप फोकस : अ वेडनेसडे एक बेहतरीन फिल्म होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पे कामयाब नहीं हो पाई
इस शुक्रवार जेड प्लस रिलीज हुई है।  फिल्म आम आदमी की कहानी है।  एक आम आदमी को किस तरह वीआईपी  बना दिया जाता है।  और उसकी जिंदगी में क्या तब्दीलियां आ जाती हैं।  फिल्म वेडनेसडे में भी एक आम आदमी को अलग अंदाज़ में पेश किया गया है। इसी हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ऊँगली में भी आम आदमी की कहानी बयां की गई है।  हिंदी सिनेमा के लिए आम आदमी हमेशा अहम मुद्दा रहा है।  लेकिन उन्हें दर्शाने के अंदाज़ अलग अलग रहे हैं।  दरअसल एक आम आदमी की कहानी को ख़ास तरीके से दर्शाना भी एक कला है।  बॉलीवुड में भी फिल्मों में दिखाए  गए आम आदमी के साथ भेदभाव किये जाते हैं।  यह गौर किया जाता है कि उसे गढ़ने वाला कौन है।  बॉलीवुड में अगर एक आम आदमी खुद को चुलबुल पाण्डेय के रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत  किया जाए।  एक सुपरस्टार अगर बार बार यह कहे कि वह आम आदमी है तो दर्शक उससे देखना और सुनना दोनों पसंद करते हैं।  लेकिन अगर कोई आम चेहरा वही  किरदार निभाए तो वे खास नहीं बन पाते।  फ़िल्मी पत्रकार और समीक्षक भी आम स्टार की आम आदमी वाली कहानी देखना पसंद नहीं करते।  वे दोहरा व्यवहार करते हैं. नतीजन एक सुपरस्टार की  बुरी फिल्में भी हिट होती हैं।  एक   अच्छे कलाकार की अच्छी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल नहीं कर पाती। दोष हमारी आँखों का भी है। हिंदी फिल्मों में कहानी प्रधान फिल्में लाने की आवेश्यता है।  लेकिन हम इसपर गंभीरता से बातें नहीं करते।  ऐसी फिल्मों को बुद्धिजीवी फिल्मों की श्रेणी में लाकर सीमित कर दिया जाता है।  और जो इन्हे सपोर्ट करें उन्हें भी बुद्धिजीवी का तमगा दे दिया जाता है। हमें जरूररत है कि हम जेड प्लस , फिल्मिस्तान , जॉली एल एल बी व इस श्रेणी की फिल्मों को बेझिझक सपोर्ट करें। ऐसी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर कामयाब होना भी जरुरी है वरना , हम मसाला फिल्मों की चपेट से बाहर नहीं आ पायेंगे 
हिंदी सिनेमा में शायद पहली बार कोई पंचरवाला नायक है: डॉ द्विवेद्वी
 डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के नाम का जिक्र होते ही हिंदी सिनेमा व टेलीविजन के कुछ वैसे पुख्ता व महत्वपूर्ण धारावाहिकों व फिल्मों के नाम जेहन में आते हैं, जिन्हें दर्शाने की चेष्टा कोई ऐसे निर्देशक ही कर सकते हैं, जो खुद उन विषयों पर पारखी समझ रखते हों. शायद यही वजह है कि पिंजर, चाणक्य व उपनिषद गंगा जैसी फिल्में व धारावाहिक लोगों को मनोरंजन ही नहीं ज्ञान भी देते हैं. इसी क्रम में डॉ द्विवेद्वी इस बार फिल्म जेड प्लस लेकर आये हैं. फिल्म में व्यंग्यात्मक व चुटीले अंदाज में एक रोचक कहानी कहने की कोशिश की गयी है. पेश है अनुप्रिया से हुई बातचीत के मुख्य अंश
ेरोचक प्लॉट
आप कल्पना करें कि देश के प्रधानमंत्री को पीपल वाले पीर के दरगाह पर जाने की सलाह दी जाती है. वह वहां चादर चढ़ाते हैं ताकि उनकी सरकार सत्ता में कायम रहे. और इसी दौरान उनकी एक असलम नामक व्यक्ति से मुलाकात होती है, जो कि पंचरवाला है. फिर दोनों में बातचीत होती है. जिसके आधार पर उस पंचर वाले को जेड प्लस की सेक्योरिटी दी जाती है. आखिर उस सेक्योरिटी की क्या वजह है. क्यों एक आम आदमी को जेड प्लस की सेक्योरिटी मिलती है. और कैसे उसकी आम जिंदगी में खलल पड़ जाती है. यह इस फिल्म की केंद्र कहानी है. इस फिल्म में शुरुआत हल्के फुल्के व्यंग्य से की गयी है. लेकिन जैसे कहानी आगे बढ़ेगी, दर्शकों को देश, समाज व आम लोगों की कहानी देखने को मिलेगी. यह राजनीति पर आधारित फिल्म नहीं है. लेकिन राजनीति का समाज व आम व्यक्ति पर पड़े प्रभाव की कहानी है.
असलम पंचरवाला
हिंदी सिनेमा में शायद पहली बार ऐसा होगा, जहां किसी कहानी में किसी देश के प्रधानमंत्री से देश का बिल्कुल आम व्यक्ति यानी पंचर की दुकान चलाने वाली की मुलाकात हुई हो और फिर दोनों की बातचीत के आधार पर उसे जेड प्लस की सेक्योरिटी मिल गयी हो. यह अपने आप में रोचक और उत्साहित कर देने वाला किरदार है. मुझे नहीं लगता कि पानवाला, पंचरवाले या किसी चाय वाले को मुख्य किरदार में रख कर आम आदमी की कहानी कहने की कोशिश इससे पहले कही गयी होगी. इसलिए मैंने ऐसे किरदार चुने हैं और उनके माध्यम से ही कहानी कहने की कोशिश की है.
रामकुमार लिख रहे थे उपन्यास
.रामकुमार इससे पहले राजस्थानी फिल्म लिख चुके थे. मुझे इस बारे में जानकारी थी. साथ ही मुझे यह भी जानकारी थी कि वह सिनेमा में काफी दिलचस्पी लेते हैं. इस फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह ने मुझे ये कहानी मजाक मजाक में सुनाई थी.वह इसे उपन्यास का रूप देना चाहते थे. लेकिन उन्होंने जब मुझे यह कहानी सुनानी शुरू की, उसी वक्त मैं उन्हें कहा कि अब वह रुक जायें. चूंकि कहानी इतनी रोचक थी कि मैंने तुरंत निर्णय लिया कि मैं इस पर फिल्म बनाऊंगा. मैंने रामकुमार को ही कहा कि वे इसको स्क्रिप्ट का रूप दें और मुझे ड्राफ्ट भेजें. रामकुमार खुद राजस्थान से हैं. वह शेखावटी प्रांत से सबंध रखते हैं. सो, उन्हें वहां की भाषा, संस्कृति की अच्छी समझ है. सो, मैंने वह फ्लेवर बरकरार रखने के लिए उन्हें ही कहा कि वे कहानी को फिल्म का रूप दें. रामकुमार के साथ साथ मुझे लेखन में तुषार उपरेती का साथ मिला. तुषार उपरेती भी जर्नलिस्टिक बैकग्राउंड से हैं. और निर्देशन टीम के एन के त्रिपाठी. सभी ने साथ ने मिल कर कहानी को एक आकार दिया. इतने सालों के अनुभव के बाद मैंने महसूस किया कि स्क्रिप्ट राइटिंग का मतलब है राइटिंग और री राइटिंग़. मेरा मानना है कि आप जितना रि राइट करोगे स्क्रिप्ट उतनी अच्छी  होगी. और यही वजह है कि जब स्क्रिप्च 23 ड्राफ्ट के बाद तैयार होती है तो जेड प्लस जैसी फिल्म बन कर आती है.
चाणक्य से जेड प्लस तक
मैं चाणक्य से जेड प्लस तक अपने करियर को देखता हूं तो इसमे मैं एक कॉमन थ्रेड पाता हूं. चाणक्य एक एपिक स्टोरी थी. पिंजर एक देश के ट्रेजिक विभाजन को दर्शाती है. मोहल्ला अस्सी देश में बदल रहे सोशल वैल्यूज को दिखाती है और जेड प्लस भारत के कॉमन व्यक्ति की कहानी को दर्शाती है.

फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह बताते हैं कि उनके जेहन में सबसे पहले जेड प्लस की कहानी क्यों आयी. बकौल रामकुमार हम पत्रकार हैं, जब किसी बड़े फाइव स्टार होटल में जाते हैं तो खुद को खास मानने लगते हैं. लेकिन वहां से निकलते ही आम हो जाते हैं. रोड पर आते हैं तो कोई वीआइपी रोड से जा रहा हो तो आपको रोक दिया जाता है कि पहले स्पेशल लोग जायें. बस उसी दुविधा से कि आखिर हम आम आदमी हैं कि खास हैं. जेड प्लस की नींव पड़ी. लगा कि सरकार ही किसी एक ऐसे आम आदमी को जेड प्लस दे कि लोग हैरत में पड़ जायें. जेड प्लस का असलम आम फिल्मों के आम आदमी से अलग इस लिहाज से है कि हमारी फिल्मों में आमतौर पर आम आदमी के साथ चमत्कार होते दिखाया जाता है. हमने असलम के साथ कोई चमत्कार नहीं किया है. उसको रियल बनाये रखा है. जैसा कि आप देखें कि मोदी जी की पत् नी जशोदाबहन कैसे परेशान हैं कि उन्हें सेक्योरिटी मिली है. हम आम आदमी जिंदगी में छोटे छोटे धोखे करते हैं, छोटी छोटी चालाकियां करते हैं लेकिन वह किसी चमत्कार का हिस्सा नहीं होते. असलम हम सबके के बीच से वही वह आदमी है. 

बदल रहा है डबल रोल का अंदाज


हिंदी सिनेमा में एक बार फिर से फिल्मों में अभिनेता व अभिनेत्री एक साथ डबल रोल वाले किरदारों में नजर आ रहे हैं.
 किसी दौर में डबल रोल वाली फिल्में हिंदी फिल्मों की खासियत मानी जाती थी. लेकिन पिछले कुछ समय से हिंदी फिल्मों में ऐसी कहानियां कम देखने को मिल रही थी. मगर, एक बार फिर से बॉलीवुड की बड़े नाम डबल रोल के माध्यम से कहानियां कहने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि वे इसे ट्रीटमेंट के माध्यम से पहले की फिल्मों से अलग करने की भी कोशिश कर रहे हैं. डबल रोल की शुरुआत हिंदी फिल्मों में अशोक कुमार ने फिल्म किस्मत से की थी.
 नंदू व विक्की
फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में अभिषेक बच्चन डबल रोल में नजर आये. उनका एक किरदार नंदू मुंबई के चॉल में रहनेवाला व्यक्ति रहता है और दूसरा खलनायक के बेटे विक्की के रूप में. दर्शकों ने फिल्म में अभिषेक बच्चन के डबल रोल की वजह से अभिषेक को काफी पसंद किया.
आमिर की धूम 3
फिल्म धूम 3 में आमिर ने पहली बार डबल रोल वाली भूमिका निभायी. फिल्म के कई दृश्यों में उनके डबल किरदारों को लेकर दर्शकों को भी कंफ्यूजन होते रहे.  लेकिन दर्शकों को यह फिल्म इसी खासियत की वजह से पसंद आयी. फिल्म का पूरा प्लॉट ही आमिर के डबल रोल को ध्यान में रख कर तैयार किया गया था.
तनु वेड्स मनु2 में कंगना
तनु वेड्स मनु के सीक्वल में कंगना भी डबल रोल में नजर आयेंगी. वह इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हैं, क्योंकि उन्हें भी पहली बार डबल रोल करने का मौका मिल रहा है. हालांकि उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया है कि उनकी फिल्म सीता और गीता या चालबाज के तर्ज पर होगी.
ेसैफ की हैप्पी एंडिंग
सैफ अली खान ने फिल्म हैप्पी एंडिंग में एक अलग अंदाज में अपना डबल रोल प्रस्तुत किया है. फिल्म में उनका हमशक्ल दरअसल उनकी अंर्तरात्मा है, जिससे वह बातचीत करते रहते हैं. हालांकि इस फिल्म के निर्देशक राज का मानना है कि एक निर्देशक के लिए एक ही कैरेक्टर को डबल रोल में एक फ्रेम में दिखाना एक टफ काम है. लेकिन यह एक कलाकार के लिए शानदार मौका होता है, जब वह खुद की क्षमता को एक ही फ्रेम में दर्शा दें.
अजय देवगन एक् शन जैक् सन में
अजय देवगन भी कई अरसे बाद फिल्म एक् शन जैक्सन में डबल रोल में नजर आयेंगे. अजय इस बात को लेकर बेहद उत्साहित हैं कि उन्हें काफी समय के बाद कुछ ऐसे किरदार निभाने के मौके मिलेंगे.
खबर है कि सलमान खान सूरज बड़जात्या की फिल्म में डबल रोल में  नजर आयेंगे.

एक दिन भी नहीं होता था जब सितारा का रियाज नहीं होता था :बिरजू महाराज

बिरजू महराज
 एक दिन भी नहीं होता था जब सितारा का रियाज नहीं होता था :बिरजू महाराज
सितारा देवी ने कथक की ताउम्र पूजा की. मैंने अपनी जिंदगी में उसके जैसी शिष्या नहीं देखा. सितारा इस बात से शुरुआती दौर से ही वाकिफ थी कि बिना रियाज के वह इसे हासिल नहीं कर पायेगी. सो, मेरी याद में एक भी ऐसा दिन नहीं रहा होगा जिस दिन उसने रियाज नहीं किया हो. सितारा को इस बात का अफसोस हमेशा रहा कि मैंने कभी उसके साथ स्टेज शेयर नहीं किया. सितारा कथक को लेकर इस कदर समर्पित थी कि वह सिर्फ खुद नहीं, बल्कि किसी भी परफॉरमेंस से पहले अपनी पूरी टीम, अपने म्यूजिशियन सभी को पूरी पूरी प्रैक्टिस कराती थी और अगर कुछ भी गलतियां हो जाये तो वह बहुत नाराज होती थी. उसके चेहरे पर जो तेज था. और उसकी आंखें इतनी बड़ी बड़ी थीं कि जब वह गुस्से से लाल होती थीं. कोई उसके करीब जाने की कोशिश नहीं करता था. वह हमेशा मुझसे यह कहती थी कि गुरुजी इस बात की चिंता है कि हमारे बाद इस परंपरा को जीवित कौन रखेगा. उसके मन में यह चिंता हमेशा होती थी. लेकिन जब वह देखती थी कि कई शिष्य कथक सीखने में दिलचस्पी ले रहे हैं तो उसके चेहरे का तेज वापस आ जाता था. यह दर्शाता था कि उसे कितनी ललक है कि कथक का मान बरकरार रहे. सितारा ने अपनी अगली पीढ़ी को अपनी कला दी. और इसे बढ़ाने की कोशिश की है. मुझे सितारा की यह बात भी हमेशा प्रेरित करती रही कि सितारा ने शुरुआती दौर में कभी कथक की फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली. जो सिखा अपने पिता से सिखा और क्या खूब सिखा. सितारा की यह भी खूबी थी कि वह सिर्फ मंच पर ही नहीं, जब मंच पर नहीं भी होती थी तब भी इस बात का मान रखती थीं कि वह एक कथक डांसर हैं, सो उन्हें हमेशा प्रेजेंटेबल होना चाहिए. वह अपने परिधान, अपने आभूषण का पूरा ख्याल रखती थीं कि वह उसके व्यक्तित्व से मेल खा रहा या नहीं. यह उसका दिखावा नहीं, बल्कि एक कलाकार का अपनी कला को सम्मान देना है. जिसे हर वक्त सिर्फ अपनी कला की ही फिक्र है और वह उसके इर्द गिर्द ही अपनी दुनिया बसा लेता है. यही एक कलाकार का अहम योगदान है कि वह अपने परिवार से ही कला को जीवित रखने की कोशिश करे और मुझे पूरी उम्मीद है कि कथक का सम्मान करने वाले लोग उसे व उसके योगदान को जाया नहीं होने देंगे.

सेकेंड स्टोरी
ओझिल हुआ कथक का सितारा
तो कथक का द एंड होना तय है : सितारा देवी
कुछ काम नहीं देता. वह कला ही है जो तुम्हें ताउम्र इज्जत दिलाती है और इसे ही बरकरार रखना. उन्होंने कथक को अपनी जिंदगी दी और कथक ने उन्हें सम्मान दिलाया. किसी दौर में कथक को जब सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था. उस वक्त भी सितारा देवी ने कथक को ही अपनी जिंदगी का सितारा माना और कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 1920 में कोलकाता में जन्मी सितारा देवी को कई सम्मानित पुरस्कारों से नवाजा गया. पद्दम श्री, संगीत नाटक अकादमी व कालिदास सम्मान से सम्मानित सितारा देवी आज हमारे बीच नहीं. कुछ वर्ष पहले सितारा देवी से एक मुलाकात हुई थी. उम्र भले ही उनके कैलेंडर का हिस्सा बना हो. लेकिन उनके चेहरे का तेज आज भी आपको उत्साहित व चकित करने वाला था. कथक उनके पैरों में नहीं, उनकी जुबां पर कायम थी. उनकी आंखें नृत्य करती हैं. उनके हाथ बात करते वक्त उठ भी रहे थे तो उसमें एक लय नजर आ रही थी. पेश है उस पुरानी बातचीत के मुख्य अंश. पिछले कुछ सालों से उन्हें यह बात सालती रही कि वे कथक के रियाज को जारी नहीं रख पायीं. चूंकि उनके पैरों में परेशानी आ गयी थी. उन्हें इस बात का भी अफसोस रहा कि उन्होंने कला को जो समर्पण दिया, उसे भारत में उस फक्र की नजर से नहीं देखा गया. जिस तरह से उसे देखा जाता है. उनका मानना था कि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए था.

 दिलीप कुमार की फैन हूं मैं
बातचीत की शुरुआत उन्होंने जिंदगी के अहम शख्सियत दिलीप कुमार से शुरू की. बकौल सितारा देवी(मजाकिया अंदाज में )मैं दिलीप कुमार साहब को हमेशा से बेहद प्यार करती थी. और यह मेरा विश्वास है कि उनसे मिलने वाली हर लड़की उनकी भक्त हो जायेगी. तो प्यार तो मैं भी करती थी. यह बात मैंने सायरा से भी कहा था. लेकिन मुझे लगा कि प्यार ऐसा करो कि ताउम्र बरकरार रहे. अब सायरा को छोड़ कर वह मेरे पास तो आ नहीं जाते. सो, उन्हें राखी की ही बांध दी कि चलो झंझट ही खत्म. अब तो जिंदगी भर का रिश्ता जुड़ गया. जब तक जिंदगी है रिश्ता बरकरार रहेगा.
शादी कर ली कथक से ही
मेरी पहली शादी 8 साल की उम्र में हो गयी थी. लेकिन ससुराल वालों ने शादी तोड़ दी क्योंकि मैंने कहा था कि मैं स्कूल जाऊंगी. लेकिन मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं. मेरा मानना है कि शादी का मतलब है कमिटमेंट. और मुझे लगता है कि मैं कथक से ही शादी कर ली है. चूंकि इस कला के अलावा मुझे जिंदगी में कुछ और नजर ही नहीं आता था. सो, मुझे इस बात का अफसोस नहीं कि मैंने कथित तौर पर कही जाने वाली शादी में सफलता हासिल नहीं की. हालांकि मुझे इस बात का अफसोस है कि भारत में कथक को उतना सम्मान नहीं दिया गया. जितना उसे मिलना चाहिए था. लेकिन इस बात की खुशी है कि रवींद्रनाथ टैगोर ने मुझे नृत्य साम्राज्ञी माना और वह मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है. रवींद्रनाथ टैगोर के सामने मैंने 11 साल की उम्र में नृत्य पेश किया था. वे मेरे नृत्य के कद्रदान बने और उन्होंने इनाम के रूप में शॉल और 50 रुपये दिये. मैंने उनसे कहा इनाम नहीं आपका आशीर्वाद चाहिए.
राजकपूर ने दी इज्जत
मैं खुशनसीब हूं कि राजकपूर साहब ने हमेशा सम्मान दिया मुझे. आरके स्टूडियो में जब तक होली मनायी गयी. सितारा देवी वहां आमंत्रित की जाती रहीं. और मैंने हमेशा उनका मान रखा. उफ्फ क्या होली होती थी वह आरके स्टूडियो में. राज कपूर स्वयं रंग में सराबोर हो जाते थे. डूब कर मस्ती क्या होती है.कोई उनसे सीखे. उनकी होली में नाच गाना सबकुछ होता था. लोक संगीत नृत्य को वह तवज्जो देते थे.
पीटी डांस है
मुझे इस बात की खोफ्त होती है कि लोग इन दिनों हिंदी फिल्म के  हर गाने पर किये गये नृत्य को कथक का नाम दे देते हैं. कथक किसी को यूं ही बिना समर्पण और रियाज के हासिल नहीं हो सकता. इन दिनों तो हिंदी फिल्मों में पीटी डांस होता है. और कुछ नहीं. सब यूं यूं हिलेंगे... और कहेंगे भईया ये है कथक़. भला डांस कोई खेल है. स्पोर्ट्स है क्या जो कमर हिला ली और हो गयी कथक़.
तबायफ के घूंघरू
मेरे पिताजी ने कथक को अपनी जिंदगी समर्पित की और इसलिए आज कथक जिंदा है. मेरे पिताजी को जब आस पड़ोस के लोग कहा करते थे कि आपकी बेटी तबायफ बनेंगी तो वह साफ कहते थे कि वे कथक ही करेंगी. जिसे जो कहना है कहें.मेरे पिताजी को उनके पिता ने यानी मेरे दादाजी ने लोहे की छड़ से मार लगा कर घर से निकाल दिया था. घर से तो उन्होंने निकाल दिया. लेकिन पिताजी के जेहन से न तो कथक निकली. न ही पैरों से घूंघरू.
कथक का पतन
मैं मानती हूं कि कथक का पतन हो रहा है. मैं मानती हूं कि अगर मैं नहीं रही और खुदा द खास्ता बिरजू महाराज नहीं रहे तो कथक का फिल्मी अंदाज में कहूं तो द एंड होना तय है. चूंकि कथक को अब तक घराने के रूप में और उस शिद्दत से जिस शिद्दत से हमने जीवंत करने की कोशिश की. अब वह नजर नहीं आता. फिल्मों में भी अब वैसे गाने नहीं बनते. जिनका पिक्चराइजेशन कथक को ध्यान में रख कर बनाये जाये. अब कथक को लेकर वह दिलचस्पी. वह उत्साह नजर नहीं आता.
बॉक्स में
1.

ीवी से छोटा सा ब्रेक लिया है : मोना सिंह

 छोटे परदे की जस्सी यानी मोना सिंह इन दिनों अपनी आनेवाली फिल्म जेड प्लस को लेकर उत्साहित हैं. पेश है
 मोना, जेड प्लस को हां कहने की क्या वजह रही?
मुझे फिल्म के निर्देशक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी ने जब कहानी सुनायी. और यह बताया कि वह फिल्म के अंत के बारे में किसी को नहीं बतायेंगे. वही मेरे लिए इस फिल्म को हां कहने की सबसे बड़ी वजह थी. साथ ही द्विवेद्वी सर ने जिस तरह फिल्में आज तक बनाई है. वह बेहद अलग हट के है. यह फिल्म कॉमेडी फिल्म थी और मुझे कॉमेडी अच्छी लगती है.  फिल्म का नैरेशन काफी दिलचस्प तरीके से मुझे सुनाया गया था. और मुझे सुनने में ही इतना मजा आया कि मैंने तय कर लिया कि मैं यह फिल्म जरूर करूंगी.
जेड प्लस कैसे अन्य फिल्मों से अलग है?
इस फिल्म की खासियत यह है कि यह रोमांटिक फिल्मों की केटेगरी में नहीं आयेगी. अलग तरह का कांसेप्ट है. एक कॉमन मैन की कहानी है. लेकिन अलग अंदाज दिया गया है. मुझे ऐसी फिल्में करने में मजा आता है. मैं रोमांटिक फिल्मों की विरोधी नहीं हूं. लेकिन इंटेलिजेंट सिनेमा को मैं तवज्जो देती हूं. मैं क्वीन जैसी फिल्में कई बार देख सकती हूं. आंखों देखी एक महत्वपूर्ण फिल्म है. मुझे ऐसी ही फिल्में करने में मजा आता है. मेरा मानना है कि ऐसी फिल्में कम बनती हैं, क्योंकि ऐसी फिल्में बनने में वक्त लगता है. अच्छी स्क्रिप्ट को वक्त तो देना ही होता है. बतौर एक्टर जेड प्लस जैसी फिल्मों से जुड़ना आपको संतुष्टि देता है. चूंकि इस तरह की फिल्म में इमोशन, ड्रामा और साथ ही साथ राजनीतिक दृष्टिकोण भी नजर आता है. जेड प्लस एक पॉलिटिकल सटायर है और काफी हुमरस है.
आप टेलीविजन पर भी डेली सोप में नजर नहीं आ रहीं. कोई खास वजह?
मुझे डेली सोप करना थोड़ा अब बोरिंग सा लगने लगा है. 50-60 एपिसोड तक तो ऊर्जा और उत्साह बनी रहती है. बाद में वह ड्रैग हो जाता है. एंकरिंग व शो होस्टिंग में ऐसा नहीं होता. एक तो वक्त बहुत ज्यादा नहीं देना पड़ता. फिर हर दिन आप एक सा काम नहीं करते. आपको अपनी एंकरिंग में नयापन लाना पड़ता है. तो वह चीजें मुझे अच्छी लगती हैं. यही वजह है कि मैंने छोटा ब्रेक लेने के लिए भी फिल्म की है. लेकिन हां, मैं फिल्में और टीवी दोनों ही करती रहूंगी. न टीवी के लिए फिल्म को और न ही फिल्म के लिए टीवी को छोड़ूंगी. टीवी में भी अगर नयी चीजें हों , नये तरह के कांसेप्ट होंगे तो मैं वहां भी कोई भी प्रोजेक्ट्स कर सकती हूं. हां, मगर यह जरूर है कि मैं डेली सोप से ज्यादा खुद को रिलेट नहीं कर पाती हूं. जिस तरह के किरदार मैं निभाना चाहती. वे इन दिनों लिखे नहीं जा रहे. इसलिए मैं एंकरिंग करती हूं ज्यादा से ज्यादा.
टेलीविजन से फिल्मों की दुनिया में कितना अंतर है. दोनों जगह काम करने के तरीके में कितना अंतर महसूस करती हैं आप?
मुझे लगता है कि एक एक्टर को मीडियम कांसस नहीं होना चाहिए. हां, बस यह जरूर है कि इन बातों का ख्याल रखें कि जिस मीडियम में हैं, उसकी क्या डिमांड है और फिर उसके मुताबिक आप प्लानिंग कर लें. और उसी अनुसार परफॉर्म करने की कोशिश करें. इस फिल्म में एक सीन जो कि मेरा ड्रीम सीन था. शायद टीवी में किसी धारावाहिक में चूंकि जरूरत नहीं पड़ी तो कभी कर नहीं पायी. लेकिन फिल्म में करने का मौका मिला. मुझे बचपन से हीरोइन के चेहरे पर जब पानी डाला जाता है और उसे स्लो मोशन में दिखाया जाता था. वह सीन मैंने 1942 लव स्टोरी में देखा था. उस वक्त से मेरी इच्छा थी. जेड प्लस में वह करने का मौका मिला. तो आपको यह पता नहीं होता कि कब कहां किस तरह से मौके मिलेंगे. जेड प्लस उस लिहाज से भी मेरे लिए स्पेशल फिल्म है.
झलक दिखला जा जैसे रियलिटी शो की आप विनर रही हैं. क्या कभी डांसिंग स्कील्स को और आगे बढ़ाने की इच्छा नहीं हुई?
मुझे लगता है कि मैं कॉमेडी में ज्यादा कंफर्टेबल हूं. जस्सी जैसी कोई नहीं जैसे किरदार मिलें या कॉमेडी किरदार मिले तो उसे सहजता से निभा पाऊंगी. डांस भी पसंद है. लेकिन फिलहाल कॉमेडी करने में ज्यादा दिलचस्पी लूंगी. 

लौटना दूरदर्शन का



डीप फोकस : दूरदर्शन का धारावाहिक रामायण अबतक के सबसे हिट धारावाहिकों में से एक है 
निस्संदेह जिंदगी चैनल ने भारतीय टेलीविजन की दुनिया में एक बड़ी चुनौती खड़ी की है।  इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनदिनों दूरदर्शन को दोबारा से १९८० के दशक की तरह चमकाने की तयारी हो रही है. हालांकि इसमें कितनी सफलता मिलती है।  यह तो वक़्त आने पर ही पता चलेगा।  लेकिन शुरुआत तो हुई है।  सरकार ने निर्देश दिया है कि क्रिएटिव आधार पर बदलाव किये जाएं।  छोटे परदे ने निस्संदेह एक बड़ी इंडस्ट्री का रूप लिया है।  लोगों को आदत लगाई गयी और अब दर्शक वैसी ही शोज को देखने के आदि हुए।  मगर आज भी दूरदर्शन की जब भी बात।   लोग हमलोग , ब्योमकेश बक्शी और उस दौर के अन्य धारावाहिकों को देखना चाहते हैं।  स्पष्ट है कि अब भी दर्शकों का जुड़ाव है।  प्राइवेट चैनलों ने कुछ नयापन नहीं दिया।  ऐसी बात नहीं।  हाँ मगर अब एक स्थिरता  आ गई है और एक चैनल के लिए यह सही नहीं। इन दिनों एक नये चैनल ईपिक चैनल की भी शुरुआत हुई है।  एपिक चैनल का प्रोमो प्रस्तुतीकरण सबकुछ भव्य है।  लेकिन हिंदुस्तानी चैनल यही चूक कर बैठते हैं कि वे कंटेंट पर विशेष काम नहीं कर पाते।  जबकि पाकिस्तानी धारावाहिकों ने अपने कंटेंट को ही अपनी यूएसपी बना रखी है।  हिंदुस्तानी मनोरंजन चैनल पर इनदिनों एक धारावाहिक पूरी तरह से जिंदगी की नक़ल कर रहा है।  लेकिन अफ़सोस नक़ल कभी खूबसूरत नजर नहीं आता।  इस शो में जिस तरह से उर्दू शब्दों का इस्तेमाल हो रहा।  वह स्वाभाविक सा नजर नहीं आता।  और यही वजह है कि उसका बनावटीपन आकर्षित नहीं करता।  जबकि जिंदगी के शोज स्वाभाविक हैं।  इसलिए लोकप्रिय हैं।  हम किसी भी मुल्क में हो।  दिल हमारा वही देखना और सुनना चाहता है जो उसे अच्छा लगे।  उस पर कोई बंदिश नहीं।  सो सरकार अगर वाकई दूरदर्शन को दोबारा लोगों के दिलों में जिन्दा करना चाहती है तो कंटेंट पर काम  अहम होगा।  तभी दर्शक इससे जुड़ पाएंगे।  वरना रेस्त्रां का स्वाद चख चुके दर्शकों को दाल रोटी खिलाना मुश्किल काम है।  हाँ मगर दाल रोटी में स्वाद हो तो वे उसे ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार लेंगे 

अंगरेजी में गाने का मौका मिले तो गाऊंगी : इलियाना डिक्रूज


 हैप्पी एंडिंग है मजेदार फिल्म
मैंने पिछली जो भी फिल्में की हैं. बर्फी के बाद सारी कॉमेडी फिल्में ही हैं. चूंकि मैं कॉमेडी फिल्में करने में खुद को सहज महसूस करती हूं. वास्तविक जिंदगी में भी मैं बहुत फनी हूं. फन लविंग हूं. मैं बोरिंग जिंदगी नहीं जी सकती और शायद यही वजह है कि मुझे ऐसी ही फिल्में मिलती आ रही हैं. जहां तक बात है हैप्पी एंडिंग की तो मैं फिल्म में राइटर की भूमिका में हूं. लेकिन काफी मजेदार तरीके से फिल्म में मेरा किरदार नजर आयेगा.
सैफ व गोविंदा के साथ टयूनिंग
सैफ और गोविंदा दोनों की ही टयूनिंग काफी अच्छी है. दोनों का सेंस आॅफ हुमर मुझे बेहद पसंद आया और यही वजह है कि फिल्म मजेदार बनी है. मुझे याद है हम जी फाड़ के शूटिंग कर रहे थे. गोविंदा के डांसिंग स्टेप्स देख कर हम भूल गये थे कि हम शूट कर रहे हैं. हम सभी उन्हें ही देखने लगे थे. हम सभी उन्हें देख कर चौक रहे थे कि उनके क्या स्टेप्स थे. मैं तो मेसमराइज हो गयी थी. काश मैं भी वैसे ही डांसिंग स्टेप्स करूं तो मुझे बहुत मजा आयेगा. फिल्म में फिल्म इंडस्ट्री की ही कुछ प्यारी प्यारी नोंक झोक देखने का मौका मिलेगा आपको. जो हमारी इंडस्ट्री में होता रहता है.
मैं भी गा सकती हूं
अक्सर मुझसे ये प्रश्न पूछे जाते हैं कि क्या मैं भी बाकी अभिनेत्रियों की तरह गाना गाना चाहूंगी अगर मौका मिले तो मैं इसका जवाब यही दे सकती हूं कि मेरी हिंदी उतनी अच्छी नहीं है. लेकिन अगर मुझे मौका मिले तो मैं अंगरेजी में सहजता से गा सकती हूं और मैं म्यूजिक को काफी एंजॉय करती हूं. तो मुझे लगता है कि मैं अच्छा गाना गा सकती हूं.
ऐसे जीवनसाथी की तलाश
मैं अपनी जिंदगी में ऐसे जीवनसाथी का साथ चाहती हूं जो सबसे पहले मेरी इज्जत करे. फिर हम दोनों के बीच विश्वास का रिश्ता हो. और इसके बाद मुझे लगता है कि ये दोनों चीजें अगर हो तो प्यार खुद ब खुद को ही जाता है.
फिल्मों को लेकर सजग
मुझे लगता है कि मैंने दक्षिण फिल्मों में 16 फिल्में कर ली है और अब मुझे सोच समझ कर फिल्में करनी चाहिए. मैं किसी जल्दबाजी में नहीं हूं. आराम से काम कर रही हूं. मैंने 18 साल की उम्र से काम शुरू कर दिया था.सो मुझे लगता है कि मैंने काफी काम कर लिया है. अब थोड़ा थम थम कर रुक रुक कर काम करूंगी.

कम से कम प्रयोग तो करता हूं किरदारों के साथ : सैफ अली खान


ेसैफ अली खान की पिछली कुछ  फिल्में लगातार बॉक्स आॅफिस पर विफल रही हैं. लेकिन इस बार हैप्पी एंडिंग से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं. फिल्म के ट्रेलर और गीतों को बेहद पसंद भी किया जा रहा है. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई बातचीत के मुख्य अंश
हैप्पी एंडिंग रोम कोम है. क्या आप रोमांटिक-कॉमेडी वाली फिल्में करने में सहज महसूस करते हैं?
हां, कंफर्ट जोन है. वजह यह है कि ऐसे किरदार में मुझे दर्शकों ने पसंद किया है. लेकिन मेरी कोशिश है कि मैं अपनी हर फिल्म एक दूसरे से अलग करूं. फिर चाहे फिल्म सफल हो या नहीं. मुझे रिस्क लेना पसंद है. आप देखें मेरी फिल्में एजेंट विनोद, बुलेट राजा, गो गोवा गॉन किसी भी फिल्म में मैं एक से किरदार में नहीं हूं. शुरुआती दिनों में मैंने एक से कई किरदार निभाये हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि एक कलाकार को एक से किरदार बार बार निभाने चाहिए. आप मेरी फिल्में परिणीता देखें. मुझे हर तरह की फिल्में पसंद हैं. कम से कम मैं अपने किरदारों के साथ प्रयोग तो करता हूं.
हैप्पी एंडिंग से गोविंदा को जोड़ने की क्या वजहें रहीं और उन्हें कैसे तैयार किया इस प्रोजेक्ट के लिए?
फिल्म की कहानी की यह डिमांड थी. मुझे लगता है कि गोविंदा किंग आॅफ कॉमेडी हैं. उनकी तरह बॉलीवुड में कोई कॉमेडी नहीं कर सकता. फिल्म में वैसी ही कहानी है. वह कैमरे के सामने जितने सहज हैं. और जिस तरह सहजता से वे कॉमडी करते हैं. यही वजह थी कि हमें गोविंदा ही चाहिए थे. उन्हें जब मैंने कहानी सुनायी तो उन्होंने यही कहा कि वे इसी तरह की स्क्रिप्ट पर काम करने के लिए इन दोनों बेचैन हैं. तो बस बन गयी बात. मेरा अनुभव उनके साथ बहुत अच्छा रहा.
आपकी पिछली कुछ फिल्में बॉक्स आॅफिस पर असफल रही हैं. फिर आपने अपने दोस्त दिनेश से भी अपनी पार्टनरशीप खत्म की है. क्या आप मानते हैं कि असफलता कई पैमाने बदलती हैं?
हां, यह सही है कि मेरी पिछली कुछ फिल्में सफल नहीं हुई हैं और फिल्में असफल होने पर कई चीजें बदलती हैं. डायरेक्टर के साथ आपके इक्वेशन बदल जाते हैं. निर्माता के साथ बदल जाते हैं. आपको खुद में भी महसूस होता है कि आपने कहां कमियां छोड़ी थीं. कई चीजें एक साथ दिमाग में चलने लगती हैं. लेकिन हम जिस इंडस्ट्री का हिस्सा हैं. वह हमें दूसरे मौके देती है और यही खुशनसीबी की बात है. तो थम कर बैठने से अच्छा है. आगे देखें. जहां तक बात है पार्टनरशीप की तो हमने यह तो तय नहीं किया था कि हम ताउम्र साथ काम करेंगे. हर व्यक्ति की अपनी क्रियेटिव सोच होती है और कोई भी एक दूसरे के अधीन होकर नहीं सोच सकता. सो, हर किसी को आजाद होने का हक है. बात बस इतनी सी है. वरना, दिनेश के साथ अब भी मेरे रिश्ते वैसे ही है और अच्छे ही रहेंगे.
हाल ही में आपने साजिद से पैच अप किया. तो क्या आपने यह महसूस किया कि फिल्म की असफलता का पूरा दोष सिर्फ निर्देशक पर नहीं मढ़ा जा सकता?
जी हां, बिल्कुल वह मेरी गलती थी कि मैंने साजिद के बारे में जो भी बातें कही. वह मेरे भाई की तरह हैं. मुझे करीना ने साजिद से बात करके सारी बातों को सुलझाने के लिए कहा. फिल्म की सफलता व असफलता के कारण आप प्रीडिक्ट नहीं कर सकते. चूंकि आप दर्शकों को प्रीडिक्ट नहीं कर सकते. कई बार अच्छी फिल्में फ्लॉप और बुरी फिल्में हिट हो जाती हैं. तो शायद यह सोचना मेरा गलत था कि निर्देशक का दोष होता है.
बतौर निर्माता आप किन बातों का ख्याल रखते हैं, जब किसी प्रोजेक्ट के निर्माण की योजना बनती है.
मेरे लिए अच्छी फिल्म बनाने का मतलब है. अच्छे लोगों के साथ काम करना. मेरा मानना है कि कुशल लोग होंगे. जो फिल्म को अपने घर की फिल्म की तरह देखें और काम करें. वही अच्छा काम कर सकते. वही ईमानदारी से काम कर सकते. मैं प्रोफेशनल चीजों को लेकर सख्त हूं. मुझे लगता है कि प्रोफेशन में पर्सनल चीजें इनवॉल्व नहीं होने चाहिए. यह नहीं कि वह मेरे परिवार के हैं और अच्छा काम नहीं भी कर रहा तो मैं जबरन उसे टीम में मिला लूंगा. मैं यह नहीं करता. एक निर्माता के रूप में आपको बड़े एक्सपैक्ट पर काम करना पड़ता है और मुझे लगता है कि इसमें कोई बुराई नहीं है.
शुरुआती दिन
 डॉक्टर बनूंगी सब यह सोचते थे : कट्रीना कैफ
ुपहले मैं अच्छी डांसर नहीं थी. तो उस वक्त जब मैं ज्यादातर फिल्में करती थी तो अक्षय के साथ ही करती थी. और उस वक्त वे मेरे डांसिंग स्टेप्स का बहुत मजाक उड़ाते थे. ( हंसते हुए) वह तो खुद इतने लंबे हैं और मैं उनके सामने बिल्कुल अच्छी डांसर नहीं थी. लेकिन आज मैं फक्र से कहती हूं कि मैंने अपनी डांसिंग स्कील्स को बहुत इंप्रूव किया है. शुरुआती दिनों में मुझे डेविड धवन से बहुत सपोर्ट मिला. वह मुझे आज भी सपोर्ट करते हैं और मैं अपने शुरुआती दिनों में साथ दिये लोगों को नहीं भूलती. पहले मैं लोगों का मजाक नहीं समझ पाती थी. लेकिन अब मैं समझदार हो गयी हूं. अब मैं अच्छी डांसर भी हो गयी हूं. शुरुआती दौर मे मैं बहुत इंट्रोवर्ट थी.यही वजह थी कि मेरे परिवार में सभी को लगता था कि मैं डॉक्टर बनूंगी. मैं स्कूल में बिल्कुल शांत रहनेवाली लड़कियों में थी.  कोई लड़का मुझे फूल भी लाकर देता था तो मैं शांत रह जाती थी.लेकिन जब मैंने निर्णय लिया कि मैं मॉडलिंग में जाऊंगी. उस वक्त से मैंने बातें करना शुरू किया.मैं फिल्मों के बारे में बिल्कुल नहीं जानती थी और यही वजह थी कि मैंने बूम जैसी फिल्में कर ली. लेकिन मुझे अब इसका कोई पछतावा नहीं है. अब जो मैं हूं उससे मुझे संतुष्टि है.

गोविंदा का फैन हूं मैं : रणवीर सिंह


रणवीर बॉलीवुड के सबसे ऊर्जावान कलाकारों में से एक हैं. अगर कहा जाये कि रणवीर में एक स्पार्क है तो गलत नहीं होगा. रणवीर लगातार कामयाबी हासिल कर रहे हैं और इस बार वह किल दिल से दर्शकों का दिल जीतने की कोशिश करेंगे.
 रणवीर इन दिनों वाकई में  कुछ अलग हट कर गतिविधियों की बात की जाये तो सबसे पहले आपका ही नाम आता है. ऋतिक रोशन का डेयर, कंडोम के विज्ञापन बतौर एक्टर कभी इमेज खराब होने का डर नहीं लगता?
नहीं, मुझे लगता है कि मैं इसी के लिए इस धरती पर आया हूं. मुझे किसी बात से खौफ नहीं. मैं वाकई लोगों की परवाह नहीं करता. मेरी मर्जी है. मैं वही करता हूं. लोगों को यह दिख रहा है कि मैं कंडोम का एड कर रहा . लेकिन वह यह नहीं देख रहे कि एक सेलिब्रिटी को इससे जुड़ने की जरूरत है. ताकि हम सोशल तरीके से एचआइवी एड्स को रोक पायें. इसमें बुराई क्या है. मुझे जब इसके लिए अप्रोच किया गया तो मुझे तो शर्म नहीं आयी.
आप हमेशा चार्ज नजर आते हैं. यह स्पार्क कहां से ला पाते हैं 24 घंटे.
यह सब मेरे खुश होने का नतीजा है. मैं एक्टिंग से इतना खुश हूं और मेरी फिल्में लगातार कामयाब हो रही हैं. मेरी मेहनत रंग ला रही है तो मैं आखिर इस बात की खुशी क्यों न मनाऊं और मुझे बोरिंग रहना पसंद नहीं. कई बार लोगों को मेरा यह बर्ताव बुरा लग जाता है. उन्हें लगने लगता है कि मैं कैरेक्टर से अच्छा नहीं. लेकिन मैं जानता हूं कि ये जब पोजिटिविटी को बरकरार रखने के लिए जरूरी हैं.
फिल्म किल दिल के बारे में बताएं?
किल दिल में मैं अपने सारे पसंदीदा कलाकारों के साथ काम कर रहा हूं. खासतौर से गोविंदा जी के साथ, जिनके डांस का मैं हमेशा से फैन रहा हूं. उनसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला. समझ आ रहा है कि आखिर वह डांसिंग सुपरस्टार क्यों हैं. फिल्म में मैं यतीम लड़का हूं और किस्मत उसे कहां लेकर जाती है और फिर किस तरह लव स्टोरी बनती है. यही है कहानी का मूल. गोविंदा जी की एनर्जी का मैं कायल हूं. वह जिस तरह का अभिनय करते हैं. वह भी अलग ही अनुभव है. गौर करें तो वह बनावटी करने की कोशिश नहीं करते. उन्हें देख कर आपको खुद हंसी आ जायेगी. इस फिल्म में उन्हें हंसते हंसते खलनायकी की है और बहुत मजा आया है. आप भी फिल्म को एंजॉय करेंगे.
आपको लगातार कामयाबी मिल रही है तो कभी इस दौरान ऐसा भी महसूस करते हैं कि असफल हो गये तो?
जी हां, यह डर बना रहे तो तभी अच्छा. यहां तो हर शुक्रवार जिंदगी बदल जाती है. मैंने भी असफलता देखी है. लूटेरा में सभी लोगों ने मेरी तारीफ की. लेकिन इसके बावजूद फिल्म बॉक्स आॅफिस पर नहीं चली. उस फिल्म में मैंने जितनी मेहनत की थी. हर तरह से, शायद ही किसी में किसी थी. तो बहुत दुख होता है. कि आपकी मेहनत रंग नहीं लाती है तो. और ऐसा फिर से हो सकता है. हम जिस इंडस्ट्री का हिस्सा है. कुछ प्रीडिक्ट नहीं कर सकते और कुछ  स्थायी नहीं हो सकता.
सफलता के साथ लोगों से इक्वेशन कैसे बदले और बिगड़े हैं?
बिगड़े तो कम ही हैं. मैंने इंडस्ट्री में कई दोस्त बनाये हैं. मैं कई लोगों का चहेता बन गया हूं. जो लोग करीब से जानते हैं. वह मेरी खूबियों से वाकिफ हैं. कई लोग मुझे एंटरटेनमेंट पैकेज मानते हैं. मुझे खुशी है कि अब वैसे लोग भी मेरी कद्र कर रहे हैं, जो मुझे पहले टेकेन फॉर ग्रांटेड लेते थे.
दीपिका को लेकर हमेशा खबरें आती रहती हैं. कितनी सच्चाई है?
दीपिका मेरी जिंदगी में बेहद अहम हैं. वह मुझे समझती हैं और हम दोनों की अच्छी जमती है. वह बहुत अच्छी को स्टार हैं और दोस्त के रूप में बहुत ख्याल रखने वालों में से हैं. मैं लकी हूं कि वह मेरी जिंदगी में हैं. लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं कि हम इसे अफेयर का नाम दे दें.
बाजीराव मस्तानी के लिए आपने खुद के बाल मुड़वा लिये हैं?
इस बात का पता नहीं इश्यू क्यों बनता है. किरदार की जरूरत है तो करूंगा ही. मैं एक्टर हूं. मुझे एक्टिंग के लिए फीस मिलती है और संजय सर के लिए तो मैं कुछ भी करूंगा. मेरी कोशिश है कि इस फिल्म में भी दर्शक मुझे रामलीला की तरह प्यार दें.
आपकी आनेवाली फिल्में
बाजीराव मस्तानी और दिल धड़कने दो पर अभी पूरा ध्यान दे रहा हूं.

राजू ने दी थी जादू की झप्पी : बोमन

पहला शॉट

मेरा पहला शॉट मुन्नाभाई एमबीबीएस फिल्म का था. पहले दिन ही मुझे सुनील दत्त साहब के साथ काम करना था. सुनील दत्त साहब को यह नहीं पता था कि यह मेरी पहली फिल्म है. वह मुझे डॉक्टर साहब कह कर ही बुलाते थे. उस दिन जब वह शॉट देकर आये तो मेरे ही वैनिटी में थे. तो मुझसे कहा और डॉक्टर साहब क्या हाल. आपको मेरा शॉट कैसा लगा? मुझे तो लगा मैं किस जन्नत से मिल रहा हूं. सुनील दत्त साहब जो खुद लीजेंड हैं. वह मुझसे पूछ रहे. सुनील दत्त साहब ने उस दिन मुझसे कहा यार आज भी नर्वस हूं. पता नहीं कैसा शॉट दूंगा. उस दिन मुझे एहसास हुआ कि एक एक्टर का नर्वस होना कितना जरूरी है. तभी वह अच्छा शॉट दे सकता है. सुनील दत्त साहब को काफी वक्त के बात पता चला कि मैं नया हूं. मैं इस फिल्म के पहले शॉट के बाद से ही नर्वस हो गया था. मैंने राजू को कह भी दिया था कि शायद मैं नहीं कर पाऊंगा. राजू ने मुझे कहा कि उठो और उसने मुझे जादू की झप्पी दी और उसके बाद मैं वह किरदार निभा पाया. 

आज भी पढ़ने की आदत बदस्तूर जारी है

 बोमन ईरानी भले ही मल्टी स्टारर फिल्मों में नजर आयें. लेकिन अपने अभिनय में विभिन्नता से वे अपनी अलग पहचान स्थापित कर ही लेते हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में भी उनके किरदार को बेहद सराहा गया.
बोमन आप जब भी फिल्म में होते हैं. आप एक अलग जगह बना ही लेते हैं.तो ऐसी क्या खास बात का आप ध्यान रखते हैं, जब आप अभिनय कर रहे होते हंै तो?
ईमानदारी से बताऊं कि मैं कभी कुछ अलग हट कर करने की कोशिश नहीं करता. न ही कोशिश होती है कि फिल्म के जो लीड किरदार हैं, उनके सामने खुद को बिल्कुल कुछ अलग करके प्रूव करूं. मैं फिल्म के धारा प्रवाह के साथ ही आगे बढ़ता हूं. मेरी कोशिश होती है कि यह जान पाऊं कि फिल्म क्या है, किस बारे में हैं. क्या डायरेक्टर का वीजन है और उसके अनुसार ही मैं अपना कैरेक्टर डिजाइन करता हूं. मैं फिल्म के टोन पर काम करता हूं. यह नहीं कि चल यार कुछ अलग दिखा दूं इस बार. फिल्म अगर आर्ट है तो जाहिर है, वैसा ही काम करूंगा. कर्मशियल है तो मुझे समझना होगा कि वह कर्मशियल है और उसके क्या डिमांड हैं. तो उसके अनुसार ही काम कर सकता.
फराह के आप दोस्त भी  रहे हैं. लेकिन हैप्पी न्यू ईयर के दौरान उन्होंने आपको निर्देशित किया तो कितना अलग होता है एक दोस्त के अंडर में काम करना?
फराह मेरी बहुत अच्छी दोस्त है. इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं था कि मैं सेट भी उससे एक दोस्त की तरह पेश आऊं. मैं सेट पर उसे मैम कह कर ही बुलाता था. वजह यह थी कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो बाकी लोग भी उसके  साथ ऐसे ही बर्ताव करने लगेंगे. और यह तो हकीकत है न कि वह फिल्म की निर्देशिका हैं तो कैप्टन वही है. तो वह जैसा कहती है मैं कर देता था. इसके अलावा कहूं तो फराह और मेरी दोस्ती शिरीन फरहाद की वजह से काफी गहरी हो गयी है. हम फोन पर भी लंबी बातचीत करते हैं. हां, मगर मैं उसके काम में दखल देने की हरगिज कोशिश नहीं करता.

बोमन आप कभी किसी अभिनय इंस्टीटयूट नहीं गये. लेकिन इसके बावजूद आपके किरदार में बारीकी नजर आती है. तो कहां से ला पाते हैं आप वह बारीकी?
मैं न कभी एक्टर नहीं बनना चाहता था. लेकिन मैं ये सारे एक्सरसाइज करता था. मैं किताबें बहुत पढ़ता था. ग्रेट एक्टर्स की स्टोरी. क्या क्या उनकी तैयारियां होती है. कैरेक्टर क्या होता. बिहेवियर क्या होता है. मैं बहुत फिल्में देखता था. जिन फिल्मों को आॅस्कर मिलता था. उन्हें देख कर सोचा करता था कि आखिर क्यों उसे आॅस्कर मिल रहा है. क्या खास बात है उसमें. मैंने कलाकारों के काम को देख कर स्टडी किया है. फिल्में देख कर ही सिखा है मैंने कि सिर्फ रोना धोना एक्टिंग नहीं है. एक्टिंग का मतलब है कि आप अपने आॅडियंस को विश्वास दिला दो कि जो आप निभा रहे हो वह आप हो. 3 इडियट्स देखने पर आपको लगे कि हां, मेरा प्रोफेसर भी ऐसा ही था. हर तरह के लोग देखें लेकिन हर किसी को लगे कि अरे कुछ तो मिलता है इस किरदार से,तो उस बारीकी से मैंने अभिनय सीखी.
राजकुमार हिरानी के आप पसंदीदा कलाकार हैं. राजकुमार फिल्ममेकिंग के जीनियस माने जाते हैं तो आप दोनों की बांडिंग के बारे में बताएं ?
मैं मानता हूं कि राजकुमार हिरानी को राजकुमार हिरानी उसकी काबिलियत बनाती है. मैं उन्हें जीनियस नहीं मानता. जीनियस होता तो हर दिन फिल्में बना लेता न. दरअसल, वह मेहनती बहुत है. वह हड़बड़ी में स्क्रिप्ट नहीं लिखता. तीन तीन साल पांच साल स्क्रिप्ट पर देता है. उसकी खासियत है कि जब वह पहला ड्राफ्ट बना लेता है तो फिर वह अपने सबसे अच्छे और आलोचना करने वाले दोनों दोस्तों को बुलाता है. उन्हें कहानी सुनाता है. और अगर एक ने भी कह दिया कि क्या बकवास लिखा है. वह दोबारा सोचता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ. क्यों उसे स्क्रिप्ट कनेक्ट नहीं कर पा रही. तो यह तरीका है उसका. इसलिए उसकी फिल्में जब आती हैं तो कमाल करती हैं. हम दोनों जब मिलते हैं. हमारी लंबी लंबी बातें होती हैं. हम एक दूसरे के साथ काफी वॉक करते हैं और सिनेमा, खान पान, हर तरह की बातें होती हैं. वह अब भी आम लोगों से जुड़ा हुआ है. इसलिए वैसी फिल्में बना पाता है. मुझे लगता है कि मुझे अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला है और इस वजह से मैंने यह मुकाम हासिल किया है.
आपकी इच्छा नहीं है कभी निर्देशन में आने की?
मुझे लिखना अच्छा लगता है. काफी अच्छा लगता है. लेकिन मैं फेम के लिए नहीं लिखता. खुद के लिए लिखता हूं. आगे का फिलहाल पता नहीं. अभी तो अच्छे अच्छे किरदार निभा लूं पहले. 

मेरी जिंदगी का पहला शॉट


गोविंदा
हाथ कांपने लगने थे मेरे
मेरी जिंदगी का पहला शॉट तन बदन फिल्म का गाना था. पहला ही दिन था और पहले ही दिन गाने की शूटिंग हो रही थी. अभिनेत्री खुशबू के साथ किया था. और खास बात यह थी कि मेरे लिए यह नया अनुभव था. मैंने तो इससे पहले कभी यह सब किया नहीं था. मुझे उस गाने में डांस करते हुए खुशबू को हाथ लगाना था. मेरे तो हांथ कापने लगे थे कि अरे मैं कैसे किसी लड़की को हाथ लगा सकता हूं. तभी सरोज जी( कोरियोग्राफर) वे आयीं और पूछीं कि तुम क्यों इतने नर्वस हो. कभी इससे पहले लड़की को हाथ नहीं लगाया. मैंने कहा नहीं तो हंसने लगी कहा अल्लाह देखो  कह भी रहा है कि  लड़की को हाथ भी नहीं लगाया. कैसे एक्टर बनोगे. फिर वह ठहाके लगा कर हंसने लगीं. तो फिर एक राजलक्ष्मी थी सरोज जी ने उन्हें कहा कि इसे लेकर बीच पर जाओ. और जाकर वहां रिहर्सल करो. तब जाकर यह लड़का सिखेगा कि फिल्म में गाने में कैसे किसी का हाथ पकड़ते हैं तो मैं राजलक्ष्मी के साथ वहां गया और वहां जाकर हमने रिहर्सल किया और सीखा. तो सुखद था वह फिल्म का पहला दिन.

ऐश की कामयाबी से खुश होता हूं : अभिषेक बच्चन


अभिषेक बच्चन इन दिनों हैप्पी न्यू ईयर और अपनी कबड्डी लीग की वजह से चर्चा में बने हुए हैं.
 आराध्या का साथ खास है
मेरे लिए आराध्या का साथ होना मेरी जिंदगी का सबसे सुखद अनुभव है. वह जब भी पास होती है तो ऐसा लगता है कि मेरी जिंदगी में कोई नेगेटिविटी नहीं है. मैं बहुत खुश होता हूं. खास बात यह है कि अब वह मुझसे बातें करने लगी है. और मेरे फोन से बहुत खेलती है. मेरी बातों को अब वह समझती भी है. परिवार के सभी सदस्यों को अब वह पहचानने लगी है.
सिक्स या एट पैक्स में दिलचस्पी नहीं
मैं हमेशा से स्पोर्ट्स प्रेमी रहा हूं तो मैं हमेशा से फिट रहा हूं. मैं जल्दी वेट पुट आॅन भी नहीं करता. यह मेरी खूबी है. और यही वजह है कि मुझे किसी तरह के पैक्स बनाने में दिलचस्पी नहीं. हां, मगर अगर किरदार की जरूरत होगी तो मैं वह भी कर लूंगा. लेकिन अब तक मुझे वैसे कोई किरदार मिले ही नहीं हैं, जिनके लिए मुझे इसकी जरूरत पड़े. मैं खुद को हमेशा फिट रखना चाहता हूं और वह मेरे लिए सबसे ज्यादा जरूरी है.
ऐश के साथ फिल्म
हम दोनों की इच्छा है कि हम दोनों दोबारा साथ साथ काम करें. लेकिन फिलहाल ऐश्वर्य जज्बा फिल्म में व्यस्त हैं और मैं उसे डिस्टर्ब नहीं कर सकता. इस फिल्म में एक् शन करती नजर आयेंगी तो उन्हें काफी मेहनत करनी है. हमारी कोशिश है कि दोनों साथ काम करें और अब तो हमारी बेटी भी वह फिल्म देख सकेगी. लेकिन अभी से कुछ कह नहीं सकता.
नेगेटिव नहीं सोचता
मुझे इंडस्ट्री में इतने साल हो गये हैं. लेकिन अब भी लोग मुझे मेरे पिता  से ही तूलना करते हैं. लेकिन अब इन बातों का फर्क नहीं पड़ता. मेरे पिता मुझसे ज्यादा लोकप्रिय हैं और वह सदी के महानायक हैं. और यह मेरी खुशनसीबी है कि वह मेरे पापा हैं. लेकिन अब मैं इन बातों को लेकर नेगेटिव नहीं सोचता क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं अपना काम मेहनत से कर रहा हूं. बाकी सब ऊपर वाले के हाथ में हैं. लोगों को यह भी लगता है कि ऐश मुझसे ज्यादा लोकप्रिय हैं तो मुझे यह बुरा लगता होगा तो मैं कहना चाहूंगा कि मुझे खुशी होती है कि मेरी पत् नी की लोग तारीफ करते हैं और मैं उसकी हौंसलाअफजाई के लिए हमेशा उसके साथ था और हमेशा रहूंगा. और मुझे लगता है कि हर पति को उसकी पत् नी की कामयाबी से खुश ही होना चाहिए.
पापा से सीखा अनुशासन
मुझे मेरे माता पिता ने बचपन से ही कई चीजें सिखाई हैं. उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उनका कहना है कि मैं कुछ बनूं न बनूं मैं एक अच्छ ाइंसान बन सकूं और मुझे विश्वास है कि मैं उनकी कोशिश पर खरा उतरा हूं. मेरी एक कोशिश और होती है कि जिस तरह पिताजी अनुशासन को गंभीरता से लेते हैं. मैं भी लिया करूं क्योंकि हमारी जिंदगी में अनुशासन बहुत अहम है उसी से कामयाबी मिलती है.
आनेवाली फिल्में
फिलवक्त उमेश शुक्ला की फिल्म आॅल इज वेल कर रहा हूं.
स्पोर्ट्स को लेकर जागरूक
मुझे खुशी है कि धीरे धीरे लोग स्पोर्ट्स को लेकर सजग होते जा रहे हैं. कबड्डी की वजह से काफी लोग देसी स्पोर्ट्स को पसंद करने लगे हैं और यह अच्छी बात है कि सेलिब्रिटीज के जुड़ने से इस गेम को बढ़ावा मिल रहा 

टीम की मेहनत रंग लायी : शाहरुख़



शाहरुख़ खान की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर को दर्शकों ने काफी प्यार दिया है।  फिल्म ने इस साल के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।  १५ अगस्त को रिलीज हुई फिल्म सिंघम के रिकॉर्ड को भी हैप्पी न्यू ईयर ने पछाड़ दिया है।  फिल्म ने पहले दिन ही ४४ करोड़ की कमाई कर ली है।  निश्चित तौर पर फिल्म  क्लब में भी शामिल होगी।  

शाहरुख़ , सबसे पहले आपको बहुत बहुत बधाई कि फिल्म को इतनी बड़ी कामयाबी मिली।  साथ ही हमें बताएं कि आप इंडस्ट्री में माइलस्टोन हैं।  बावजूद इसके  आपकी फिल्म रिलीज होती है तो मन में क्या बात होती है ?
नर्वस रहता हूँ आज भी.  खासतौर से जब फिल्म मेरे अपने प्रोडक्शन हाउस की हो तो।  हमने काफी मेहनत और प्यार से फिल्म बनायीं है।  मुझे  कि हाल के वर्षों में हैप्पी न्यू ईयर जैसी कोई फिल्म नहीं आई होगी।  चूँकि इस फिल्म में हम सब इतने सारे स्टार्स थे और ये फिल्म सिर्फ एक की  वजह  से नहीं  सबकी मेहनत से बनी।  सबका अपना योगदान है।  मैं सिर्फ खुद इसका पूरा क्रेडिट नहीं ले सकता।  फिल्म के कलाकार, सारे तकनीशियन मेरे रेड चिलीज की वीएफएक्स टीम सभी की मेहनत है। 

इस फिल्म ने इस साल के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए हैं।  तो ये कितना मायने रखती है आपके लिए 
 मैंने कभी नंबरों के लिए काम नहीं किया है।  बॉक्स ऑफिस पर जब कलेक्शन अच्छे होते हैं तो यही लगता है कि सारे लोग फिल्म देख रहे और उन्हें फिल्म अच्छी लगी तभी ये नंबर आये हैं। बॉक्स ऑफिस  पर तो नंबर को लेकर कॉम्पटीशन जारी  रहेगी।  पर मैं इसमें विश्वास नहीं रखता।  मैं बस चाहता हूँ कि लोग मुझसे जो एंटरटेनमेंट की उम्मीद करते हैं।  मैं उसे पूरा कर पाऊं।  बाकी हमारे हाथ में तो कुछ नहीं होता।  हाँ मगर इस दिवाली हमें बड़ी ख़ुशी मिली है।  लोग जब आपकी फिल्मों को कामयाब बनाते हैं तो लगता है कि लोगों का विश्वास आप पर अब भी बना हुआ है और इससे आगे काम के लिए ऊर्जा मिलती है 

शाहरुख़ यह आपकी और फराह की तीसरी हिट फिल्म है।  यानि हैट्रिक हुई है तो इस बारे में बताएं\
फराह नाम की महिला हैं।  बाकी उनमे सारे गुण लड़कों वाले ही हैं।  उसे अपनी फिल्म पर बहुत विश्वास रहा है।  शुरू से लेकर अबतक।  वह जानती हैं कि किस एक्टर से उन्हें क्या चाहिए।  एक  स्टारर और बैलेंस्ड फिल्म बनाना आसान काम नहीं था।  कई लोगों ने कहा था कि फिल्म लम्बी हो जाएगी।  लेकिन वह स्पष्ट थी कि उसे क्या चाहिए और मैं उस कॉन्फिडेंस को सलाम करता हूँ।  फराह का सपना था यह फिल्म. क्यूंकि मैं हूँ ना के बाद से ही वह इस फिल्म का सपना देखने लगी थी।  मुझे लगता है कि मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे डायरेक्टर्स अपनी फिल्मों में दोहराते हैं. फराह उन तमाम निर्देशकों में से हैं जिसके साथ मैं कम्फर्ट होकर काम कर सकता हूँ और करता हूँ।  फराह में पैशन है. वह काम करते रहना चाहती है और वह डांसिंग में ही नहीं निर्देशन में भी माहिर हैं। 

फिल्म को इतनी बड़ी कामयाबी मिली है और फिर आपका जन्मदिन भी जल्द ही आने वाला है तो क्या प्लानिंग है। आप काम को  लेकर काफी सजग  रहते हैं।  कभी ,थोड़ा ब्रेक का नहीं सोचा।  
फिलहाल अब दूसरे प्रोजेक्ट पर जुड़ गया हू. फैन का काम खत्म करना है फिर रईस।  अगर मैं ब्रेक लेने लगा तो आपको मेरी फिल्में देखने का मौका कहाँ मिलेगा।  अभी तो काफी काम है।  और काम  पसंद है।  उम्मीद करता हूँ की इसी तरह लोगों का मनोरंजन करता रहूँ। 
दीपिका के साथ ये आपकी तीसरी हिट फिल्म है।  अब आप दोनों की जोड़ी भी  कमाल कर रही है।   आगे भी कोई योजना?
अभी से कह नहीं सकता।  लेकिन दीपिका बहुत कामयाब अभिनेत्री हैं और जब भी  मौका मिलेगा।  मैं  बार बार फिल्में करना चाहूंगा 
 इस मुकाम पर पहुँचने के बाद भी क्या चीजें हैं जो आपको फिल्म करने के लिए इंस्पायर करती हैं 
लोग ज्यादातर कहते हैं कि उन्हें ये फिल्म चैलेंजिंग लगती है इसलिए वह यह फिल्म करना चाहते हैं।  मैं वैसी  फिल्में करना पसंद करता हूँ जो मुझे हैप्पी करें।  मतलब मुझे ख़ुशी दें।  ये नहीं कि मैं खुद को किसी के सामने मुझे प्रूफ करना है।  मुझे खुद पर विश्वास है और मैं खुद को अपनी नजर में तो बेस्ट ही मानता हूँ।  इसलिए मुझे किसी को कुछ साबित नहीं  करना।  मुझे असफलता से अब डर नहीं लगता क्यूंकि मैं जनता हूँ कि मैंने जो किया है अपने मन के कहने पे किया तो ख़ुशी मिलती है कि अपने दिल से तो धोखा नहीं किया और वही सबसे अहम लिए।  कई लोग कहता हैं कि मुझे हटके फिल्म करनी चाहिए।  लेकिन मैंने अपनी जिंदगी में हमेशा इस बात का ध्यान रखा है कि सुनी सबकी  की है अपने मन की ही. 
इस साल आप ५० वे बसंत में एंट्री ले लेंगे। कोई सपना जिसे आप पूरा करना चाहते हों 
मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी कम्पनी  को और अछा और बेस्ट बना सकूँ और फिल्मों से लोगों का मनोरंजन कर सकूँ 

कमाल कर पायेंगी ये जोड़ी ??


 बॉलीवुड में इन दिनों एक बार फिर से वैसे कलाकारों की जोड़ी बन रही है, जो स्क्रीन पर न सिर्फ पहली बार नजर आयेंगे, बल्कि वे बिल्कुल अंदाज में नजर आयेंगे.

 कट्रीना कैफ व सिद्धार्थ मल्होत्रा
कट्रीना कैफ ने हालांकि इससे पहले भी इमरान खान और अली जफर की पिल्म में काम किया है और उनकी अलग तरह की जोड़ी नजर आयी है. इस बार फिर से कट्रीना कैफ सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ फिल्म में नजर आयेंगी. कट्रीना सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ फरहान व रितेश सिधवानी द्वारा निर्मित फिल्म में नजर आयेंगी. यह फिल्म अगले साल फ्लोर पर जा रही है.
आदित्य रॉय व कट्रीना
आदित्य रॉय कपूर अब तक अपनी हम उम्र कलाकारों के साथ रोमांस करते नजर आये हैं. लेकिन फिल्म फितूर में वह कट्रीना कैफ के साथ काम करते नजर आयेंगे.यह फिल्म भी अगले साल फ्लोर पर जायेगी. इस फिल्म को लेकर कट्रीना बहुत उत्साहित हैं. चूंकि इस फिल्म में उन्हें अलग सा किरदार निभाने का मौका मिला है.
श्रूति हसन व अक्षय
अक्षय कुमार व श्रूति हसन पहली बार फिल्म गब्बर में साथ साथ नजर आयेंगे. इस फिल्म को लेकर भी अक्षय बहुत उत्साहित हैं. चूंकि इस फिल्म में वह जिस तरह का किरदार निभा रहे हैं. इससे पहले उन्होंने नहीं निभाया है. इसके अलावा अक्षय कुमार तापसी पन्नू के साथ फिल्म बेबी में नजर आयेंगे. यह जोड़ी भी पहले नहीं देखी गयी है.
सैफ व इलियाना
सैफ अली खान अपनी फिल्मों की अभिनेत्री को लेकर चूजी रहे हैं और इस बार वह हैप्पी इंडिग में इलियाना डिक्रूज के साथ नजर आयेंगे. इलियाना इससे पहले शाहिद, रणबीर और वरुण धवन के साथ नजर आयी हैं.
फिल्म शौकीन
फिल्म शौकीन में अन्नु कपूर, पियूष मिश्रा व अनुपम खेर तीनों ही अलग अलग अंदाज में नजर आ रहे हैं. इन तीनों की यह एक साथ पहली फिल्म है. खास बात यह है कि इस फिल्म में लीड किरदार निभा रहीं लीजा हडसन ने भी इससे पहले ऐसी कास्टिंग वाली फिल्म नहीं की है. सो, इस फिल्म की कास्टिंग भी फिल्म को अलग लुक दे रही है.
अर्जुन कपूर व सोनाक्षी
सोनाक्षी सिन्हा अब तक ज्यादातर फिल्में अक्षय कुमार, अजय देवगन और सलमान खान के साथ करती आयी हैं. यह पहली बार है जब वह अर्जुन कपूर के साथ नजर आयेंगी फिल्म तेवर में. खबर है कि इस फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा ने काफी एक् शन भी किया है. हालांकि अब तक इस बारे में कोई भी खबर पक्की नहीं है.
शाहिद व आलिया
शाहिद कपूर व आलिया कपूर अब तक साथ साथ किसी फिल्म में नजर नहीं आये थे. वे पहली बार फिल्म शानदार में साथ नजर आयेंगे. इस फिल्म की कहानी पंजाब पर आधारित है. खास बात यह है कि इस फिल्म में पंकज कपूर भी हैं. लेकिन वह आलिया के पिता की भूमिका में होंगे.
अमिताभ व धनुष
अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के सुपरस्टार हैं और धनुष दक्षिण फिल्मों के. उनकी आनेवाली फिल्म शमिताभ में वे दोनों साथ साथ पहली बार नजर आ रहे हैं. फिल्म का नाम शमिताभ ही इसी वजह से रखा गया है. फिल्म में धनुष का श लिया गया है व अमिताभ का अमिताभ. यह आर बाल्की की फिल्म है तो उम्मीद की जा रही है कि अलग मिजाज की फिल्म होगी.
शिमला मिर्च
खबर है कि हेमा मालिनी की फिल्म शिमला मिर्च में राजकुमार राव हेमा मालिनी से रोमांस करते आयेंगे. हालांकि अब तक निर्देशक की तरफ से इस खबर की पुष्टि नहीं की गयी है. अगर ऐसा होता है तो यह भी अलग हट कर बन रही जोड़ियों में से एक होगी.
अजय देवगन व यामी गौतम
अजय देवगन और यामी गौतम फिल्म एक् शन जैक् सन में साथ नजर आ रहे हैं. यह जोड़ी भी पहली बार साथ साथ काम कर रही हैं

स्क्रिप्ट दीजिए, फिर सोचूंगा : गोविंदा

गोविंदा जब डांस करते हैं, तो उनके साथ उनके प्रशंसक भी थिरकने लगते हैं. बॉलीवुड में वे हास्य किरदार निभाने में हमेशा शीर्ष कलाकारों में रहे. इस बार वे पहली बार नेगेटिव किरदार निभा रहे हैं. 
यशराज फिल्मस के साथ आपकी यह पहली फिल्म है. क्या वजह रही कि इतने सालों में पहली बार फिल्म कर रहे.
नहीं, ऐसा नहीं है कि इससे पहले यशराज फिल्मस की फिल्में मुझे आॅफर नहीं हुई थीं. लेकिन उस वक्त इतनी ज्यादा फिल्में कर रहा था कि वक्त नहीं था. उस वक्त मैंने यश अंकल से कहा है कि मैं  नहीं कर पाऊंगा अभी आपकी फिल्म. लेकिन कभी न कभी जरूर करूंगा.हालांकि फिर बाद में जब मेरी फिल्में फ्लॉप होने लगी थी तो मैं उनके पास गया था. तब वे चांदनी बना रहे थे. तो देखें तो एक संयोग नहीं बन पा रहा था साथ काम करने का. मैं जब यशराज स्टूडियो जाया करता था.तो वहां के वॉल पर सारे आर्टिस्ट की तसवीरें देखता था. तो सोचा करता था कि सारे आर्टिस्ट की तसवीर है. सिर्फ मेरी ही नहीं है. तो हमेशा से इच्छा थी कि उनके साथ काम करूं. अब ये बहुत साल बाद हो पाया. और अब जब साथ काम कर रहा हूं तो समझ में आता है कि क्या चीजें हैं जो यशराज बैनर को यशराज बनाती हैं. वहां जितना आर्टिस्ट को सम्मान देता है. उतना कोई नहीं देता है. बाकी जगहों पर सिर्फ हीरो हीरोइन का सम्मान होता है. लेकिन यशराज हर किसी को बराबर नजर से देखते हैं. पढ़े लिखे अच्छे लोग हैं.
गोविंदा अचानक आप काफी समय तक कैमरे से दूर रहे. फिर वापस आने का निर्णय कैसे लिया. क्या कैमरे, सेट इन चीजों को मिस करते थे?
हां, बिल्कुल मिस करता था. आप सोचें कि जो व्यक्ति 24-7 काम कर रहा. अचानक कैमरे से दूर हो जाता है तो वह मिस तो करेगा ही. लेकिन कुछ चीजें थी जिसकी वजह से मैं दूर था. पहले मेरी मां का कहा मानता था. अब अपनी पत् नी का कहा मानता हूं. पत् नी सुनिता के कहने पर  ही दोबारा काम शुरू किया है. सुनिता का कहना है कि आप काम करेंगे तो बच्चों के लिए भी अच्छा रहेगा. लेकिन मुझे एक बात इन दिनों जो सालती है, लोग फिल्मों की मुझसे सिर्प चर्चा भर करते हैं और अखबारों में खबर आ जाती है कि मैं उसमें काम कर रहा. उसके पिता का रोल कर रहा. मुझे बुरा लगा था विकास को मैं बार बार कह रहा कि स्क्रिप्ट सुनाओ सुनाओ. वह कहता था हम संभाल लेंगे. आप बस हां कह दो. तो मैंने इनकार कर दिया. ऐसा नहीं था कि मुझे बाप का किरदार निभाने से प्रॉब्लम है. लेकिन स्क्रिप्ट तो सुनाओ. बिना सुनाये. खबरें फैला रहे. फिर मुझे चिढ़ होती है. अपना साफ फंडा है स्क्रिप्ट सुनाओ, फिर सोचूंगा.
आप अपने स्टारडम का सबसे अच्छा फेज किस दौर को मानते हैं? और किस बात की सबसे ज्यादा तसल्ली है.
मैं मानता हूं कि एक ऐसा व्यक्ति जो विरार से 9 घंटे पैदल चल कर आकर स्ट्रगल करता था और फिर मेहनत से वह मुकाम हासिल कर लेता है. मुझे याद है मेरा मोची कहता था मुझसे क्या तुम अपना जूता बार बार बनवाते हो. फेंको उसे. तो मैं कहता था कि पैसे नहीं हैं नये जूतों के लिए. वह लड़का बॉलीवुड में आकर जब जगह बनाता है तो उसके लिए हर पल स्टारडम से कम नहीं था. जहां तक बात है तसल्ली की तो मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने माता पिता की सेवा कर पाया. बहुत कम लोगों को यह सौभाग्य मिलता है. वरना, हम जिस मुफलिसी में जिये थे. ये सब सपने जैसा ही था. मैं जब स्टार बन गया था तो उस मोची को मैंने बहुत सारे पैसे दिये थे. खुशी से. चूंकि वह भी मेरे इस सफर में मेरा साथी ही था. वही जूते मरमम्त करता तो मैं आगे जाता था.
आप कॉमेडी फिल्में करते रहे हैं. ऐसे में जब गंभीर फिल्में करते हैं तो क्या तैयारियां करनी पड़ती है बतौर एक्टर?
सच्चाई आपको बताऊं तो मैंने कभी कोई ट्रेजेडी वाली फिल्म नहीं देखी है. मुझे रामलीला बहुत पसंद आयी. लेकिन अंत मैंने नहीं देखा. चूंकि वास्तविक जिंदगी में भी मैं हास्य करना और कॉमेडी देखना ही पसंद करता हूं. तो वैसे रोल करते वक्त मैं जब कैमरे के सामने होता हूं तो जैसा डायरेक्टर कहते हैं कर देता हूं. लेकिन मजे की बात यह है कि मैं अपनी ही वे सारे फिल्में नहीं देखता जो गंभीर हो. वैसे भी मुझे अपनी पूरी पूरी फिल्में देखना पसंद नहीं हैं. मैं पोर्शन में फिल्में देखना पसंद करता हूं.
नये कलाकारों में आपके पसंदीदा कलाकार?
रणवीर सिंह बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. मुझे लगता है आगे बहुत अच्छा करेंगे वे.

 मेरी जिंदगी का पहला शॉट
हेमा जी ने सिखायी अभिनय की एबीसी शाहरुख खान
मेरी जिंदगी का पहला शॉट ही हेमा मालिनी जी के साथ था. फिल्म दिल आशिना है के लिए शूटिंग थी. और आप अनुमान लगा सकती हैं कि किसी न्यू कमर को हेमा मालिनी जी की तरह सुपरस्टार के साथ काम करने का मौका मिल रहा है. मैं तो बहुत नर्वस था. और जो शॉट मुझे देना था. वह मैं ठीक से दे नहीं पा रहा था. लेकिन हेमा जी ने खुद वह शॉट मुझे करके दिखाया. कॉनवेंट विला में मैंने शूट किया था. मैं उन्हें देख कर हैरान था कि शॉट एक एक्टर बेस्ड था और उन्होंने उस सीन को मुझे करके दिखाया कि देखो शाहरुख ऐसे करना है. तुम घबराओ मत. तुम अच्छे से कर लोगे. उन्होंने जब मुझे वह करके दिखाया और कहा कि ऐसा करो. तो मैंने कहा कि हेमा जी आप बहुत खूबसूरत हैं. इसलिए आप जब एक्टिंग कर रही हैं तो वह बुरा नहीं लग रहा. मैं करूंगा तो जोकर लगूंगा. इस पर हेमा जी बहुत हंसी और कहा कि जब तुम बड़े स्टार बन जाओगे तब तुमसे ये बात पूछूंगी. ेमेरे लिए वह जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा इसलिए है, क्योंकि वह करियर का पहला शॉट था और मुझे हेमा और दिव्या दोनों के साथ काम करने का मौका मिला.

sanjay dutt ki biography

\रणबीर कपूर ने संजय दत्त पर बनने वाली जीवनी  किरदार निभाने के लिए हामी भर दी है।  गौरतलब है कि रणबीर के दादाजी राज कपूर और संजय दत्त की माँ नर्गिस के प्रेम प्रसंग जग जाहिर हैं।  और दोनों ही खानदानों ने कभी भी एक दूसरे पर कीचड़ नहीं उछला और  सम्मान किया।  खुद राज कपूर की पत्नी कृष्णा  राज कपूर स्वयं नर्गिस को पसंद करती थीं और  छोटे बेटे के व्याह में उन्होंने नर्गिस को  आमंत्रित किया था। दोनों के  मन में कभी कोई क्लेश नहीं रहा।  यह दर्शाता  कि कृष्णा किस तरह सम्मान करती हैं लोगों का।  खबरें बननी शुरू हो गई हैं।  चूँकि हिंदी सिनेमा का  इतिहास इस तरह समृद्ध है  और कई ऐसी कहानियां हैं जो आज भी रोचक हैं।  और एक चिंगारी भी आग की तरह काम करती है।  जाहिर है रणबीर कपूर ने जब इस बायोपिक के लिए  होगी  अपनी दादी से  संदर्भ में जरूर बात की होगी।  लेकिन जिस तरह कृष्णा राज कपूर अपनी मर्यादा को आज बरक़रार  रख पाने में कामयाब हैं।  उन्होंने इसके लिए रणबीर को रोका नहीं होगा।  यो भी कपूर खानदान की यह  ख़ासियत रही है कि वे अपने  बच्चे को कभी भी किरदारों  चुनने और न चुनने को लेकर पाबन्दी नहीं लगाते।   यह बात खुद ऋषि  कपूर ने भी स्वीकारी थी।  सो  रणबीर ने आत्मनिर्भरता से  निर्णय लिया होगा , हालांकि  हिंदी सिनेमा जगत में कम लोगों में ही इतनी हिम्मत है कि वे अपने प्रेम प्रसंग को भी जाहिर करते हो।  सलमान खान का परिवार भी मिसाल है कि उन्होंने हेलेन को अपने  परिवार का हिस्सा बनाया। न कि समाज के सामने इसे लेकर कोई हंगामा किया।  रणबीर कपूर द्वारा  संजय दत्त की जीवनी निभाना न सिर्फ ये  साबित करता है कि  कपूर खानदान आज भी दत्त परिवार के  नजदीक हैं।  बल्कि यह भी साबित करता है कि सिनेमा उनके लिए पहली पूजा है और वह इसका सम्मान सबसे  हैं।  इस बायोपिक के माध्यम से शायद कई अनछुए पहलू भी सामने आएं

खुद को नहीं मानता दीवाली का बादशाह : शाहरुख खान


शाहरुख खान की फिल्में दीवाली पर हमेशा सफल रही हैं. रा.वन के अलावा उनकी लगभग हर फिल्म दीवाली पर ही रिलीज हुई है. हालांकि शाहरुख खुद को दीवाली का बादशाह नहीं मानते. इस बार उनकी फिल्म हैप्पी न्यू ईयर दीवाली के मौके पर ही रिलीज हो रही है.

शाहरुख, जब अन्य प्रोडक् शन की फिल्में कर रहे होते हैं और फिर अपने होम प्रोडक् शन की फिल्म कर रहे होते हैं तो क्या फर्क महसूस करते हैं?
दरअसल, ऐसा नहीं है कि बाकी की जो फिल्में करता हूं. उनसे मोहब्बत नहीं हैं. वे भी दोस्तों की ही फिल्में होती हैं. लेकिन रेड चिलीज में जो फिल्में हम बनाते हैं. हम परिवार की तरह फिल्में बनाते हैं. अब जैसे रोहित ने पहले भी फिल्में बनाई हैं. लेकिन आप उनसे पूछें चेन्नई बनाने में उन्हें कितना मजा आया. होम प्रोडक् शन होती हैं फिल्में तो ऐसी कई चीजें होती हैं, जो आप खुद का भी इनपुट दे सकते हैं. और वह मानी भी जाती है. कई बार वह फिल्म की बेहतरी के लिए ही होती है तो ऐसे में थोड़ा लगाव हो जाता है अधिक़.
लोगों का मानना है कि आप अपनी होम प्रोडक् शन की फिल्मों का प्रोमोशन ज्यादा करते हैं?
देखिए इसके बारे में मेरा स्पष्ट नजरिया है. मेरी फिल्में बड़ी और कर्मशियल फिल्में होती हैं. हम सिर्फ फिल्में किसी क्लास के लिए नहीं बनाते. हम हर तबके के लिए फिल्में बनाते हैं और मेरा मानना है कि हमें दर्शकों को बुलावा देना ही होगा. ताकि वह आयें फिल्म देखने.लेकिन यह फिल्म के विषय पर भी निर्भर करती है. जैसे उदाहरण के तौर पर अगर मैं चक दे इंडिया बनाता हूं तो उसके लिए मैं कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के सेट पर नहीं जाऊंगा. चूंकि फिल्म का सब्जेक्ट सीरियस है. लेकिन हैप्पी न्यू ईयर मस्ती मजाक वाली फिल्म है तो इसका प्रोमोशन भी उसी अंदाज में होना चाहिए. फिल्म में डांस गुप्र की कहानी है तो इसलिए मैंने तय किया था कि हम पूरे प्रोमोशन में सभी साथ होंगे. ताकि लोगों को स्पष्ट हो जाये कि वह देखने क्या जा रहे हैं. चूंकि फिल्म की टिकट एक बार खरीदने के बाद आप उसे लौटा नहीं सकते. तो प्रोमोशन से ही दर्शकों को पता चल जाये कि वह क्या देखने जा रहें. दीवाली का अवसर है. लोग होड़ में आयेंगे देखने.तो उन्हें कहीं से यह न लगे कि वह ठगे गये हैं कि अरे प्रोमोशन में तो कुछ और दिखा रहा था. फिल्म तो कुछ और है. सो, चार पांच सालों से मैंने अपनी मार्केटिंग टीम को ये बातें स्पष्ट रखी हैं कि डांस गुप्र पर फिल्म है तो हमें डांसिंग शोज, कॉमेडी शोज में जाना ही चाहिए. इसलिए हमने जीटीवी का दिल से नाचे इंडियावाले शो भी तैयार किया. प्रोमोशन के पीछे मेरे स्पष्ट लॉजिक हैं. मैं उन प्रोडयूर्स में नहीं हूं जो कुछ छुपा कर रखूं फिल्म के बारे में.
दीवाली में अब तक आपकी जितनी फिल्में रिलीज हुई हैं. कामयाब रही हैं. तो क्या दीवाली पर फिल्में रिलीज करने का निर्णय आप सोच समझ कर करते हैं?
नहीं, बिल्कुल नहीं मैं खुद को दीवाली का बादशाह नहीं मानता. लोगों ने मान लिया है, क्योंकि मेरी ज्यादातर फिल्में रिलीज हुई हैं दीवाली में और हिट भी रही हैं. लगभग 11 फिल्में सफल रही हैं तो लोग ऐसी अवधारणा मान लेते हैं. लेकिन मैं अपनी फिल्मों की रिलीज तारीख तब तक घोषित नहीं कर सकता. फराह तो चाहती थी कि फिल्म ईद पर रिलीज करे. लेकिन मैंने उसे समझाया कि हड़बड़ी मत करो. जब तक शूटिंग खत्म न हो जाये. जब और फिल्म पोस्ट प्रोडक् शन में न चली जाये. मैं घोषणा कर दूं और पता चले कि फिल्म बनी ही नहीं है तो मुसीबत हमें ही होगी. हां, यह जरूर है कि दीवाली पर रिलीज होने वाली फिल्में दर्शक देखना पसंद करते हैं, क्योंकि परिवार के लोग साथ होते हैं तो मस्ती का माहौल होता है.
आप पिछले कुछ सालों से एक साल में एक ही फिल्म कर रहे हैं. तो अचानक ऐसा निर्णय क्यों लिया?
यह कोई सोचा समझा निर्णय नहीं हैं. मैंने ऐसा नहीं कहा है कि मैं एक साल में एक फिल्म करूंगा. मैंने कहा है कि एक वक्त पर एक फिल्म करूंगा. जो सभी करूंगा, क्योंकि एक साथ दो फिल्में करना बहुत टाइरिंग होता है.यह फिल्म पर डिपेंड करता है. अब जैसे फैन के लिए 170 दिनों की शूटिंग करनी है तो ऐसे में रईस की शूटिंग मुश्किल होती. मुझे लगा कि अभी पहले इसकी पूरी कर लूं तो इसलिए रईस की डेट्स को थोड़ा आगे बढ़ाया है. फिर शूटिंग, डबिंग और सारे प्रोसेस होते होते एक साल निकल ही जाते हैं. इसलिए लोगों को लगता है कि मैंने ऐसा कुछ सोच कर किया है. लेकिन यह हकीकत नहीं है. फैन लंबी फिल्म है. उसमें मैं दोहरी भूमिका निभा रहा हूं तो उसमें वक्त लगेगा.
आप अपने होम प्रोडक् शन में किन आधार पर फिल्मों को प्रोडयूस करना पसंद करते हैं?
मैं उन फिल्मों को प्रोडयूस करने में दिलचस्पी लेता हूं, जो फिल्में वाकई प्रोडयूस करने में टफ होती हैं. जैसे अशोका आॅफबीट फिल्में थी,बिल्लू, पहेली सारी आॅफबीट फिल्में थीं और मैंने इन्हें प्रोडयूस किया. अगर मुझे 200 करोड़ की लालसा होती तो मैं ऐसी फिल्मों को प्रोडयूस नहीं करता, जहां कहानी है. बॉक्स आॅफिस कलेक् शन नहीं.हां, मगर कोशिश यह भी होती है कि इसके साथ ही साथ ऐसी फिल्में भी बनाऊं जो कर्मशियल वाइवल हो क्योंकि हमें मेरी कंपनी में काम कर रहे 280 लोगों की जीविका को भी ध्यान में रखना है.कोशिश होती है कि हर तरह की फिल्मों में बैलेंस बना रहे. साथ ही इस बात का ख्याल रखता हूं कि अब जैसे हैप्पी न्यू ईयर जैसी लंबी फिल्म के लिए काम किया है तो अगली जो फिल्म करूं थोड़ी कोजी वाली फिल्म हो. जिसमें थोड़ा रिलेक्स हो सकूं. सो, इस आधार पर फिल्मों का चुनाव करता हूं.

दीवाली की यादें


 परिणीति चोपड़ा : क्रियेटिविटी दिखाने का होता था मौका
मैं मुंबई में रहती हूं और वह भी अकेले तो मुझे दीवाली के दौरान तो अपने घर की बहुत ज्यादा याद आती है. मैं दीवाली को इसलिए भी ज्यादा मिस करती हूं क्योंकि यह मेरे फेवरिट पर्व होता था. मेरा अंबाला में काफी बड़ा सा घर है और दीवाली में पूरे घर में ट्यूनिंग बल्ब लगाने का काम मेरा ही होता था. मैं ही पूरे घर को अलग अलग तरह के चाइनिज बल्ब से सजाती थी. मां लड्डू बनाने में व्यस्त रहती थी और मैं और पापा घर को सजाने में. जब मैं बाहर पढ़ने भी गयी थी तो मेरी यही कोशिश होती थी मैं इस दिन घर पर ही रहूं. मैं दोपहर में ही सारे कैंडल लगा दिया करती थी. फिर शाम होने के साथ उसे जलाती और हमारा पूरा घर जगमगा उठता था और मुझे वह देखना बहुत अच्छा लगता था. मैं बाहर जाकर अपने पूरे घर को निहारती थी. मुझे अलग ही अनुभूति होती थी. बचपन में मां मुझे कहती रहती कि खाना खा लो खा लो. लेकिन मजाल है कि दीवाली की रंगोली बनाये बगैर मैं कोई और काम कर लूं. मेरा पूरा ध्यान इसी बात पर होता था कि किस तरह मैं अपना घर बेस्ट से बेस्ट सजाऊं. इस दिन मैं अपने अंदर के क्रियेटिव पर्सन को जगा लेती थी और कई इनोवेटिव आइडियाज से घर को डेकोरेट करती थी. वे सारे दिन अब बहुत मिस करती हूं.
अर्जुन कपूर : दादी मां के हाथों का खाना
मैं जब छोटा था तो इस दिन का बेसब्री से इंतजार इसलिए करता था, क्योंकि मेरी दादी बहुत ही अच्छा खाना बनाती थी इस दिन और मेरे दिमाग में हमेशा यह बात होती थी. मैं अपना पेट सुबह से ही खाली रखता था.ताकि शाम में ज्यादा से ज्यादा खा पाऊं.  और फिर मैं दादी और मां के साथ मिठाईयां बनाने में उनका साथ भी देता था. और उनके साथ पूजा पर भी बैठता था. मेरे दादाजी घर की पूजा करते थे. इस दिन पापा घर में पूजा में जरूर शामिल होते थे और पूरा परिवार एक साथ होता था. हम सारे कजिन्स मिल कर बहुत एंजॉय करते थे. पटाखे मैं बचपन में बहुत जलाता था. लेकिन अब नहीं जलाता. लेकिन मेरे लिए दीवाली दादी मां के हाथों के खाने की वजह से खास रही. सारी बहने मिल कर रंगोली बनाती थी. तो उन्हें मैं बहुत तंग भी करता था. लेकिन वे सारी यादें बेहद खास हैं और उन्हें आज भी याद करके खुशी मिलती है.
सेकेंड  स्टोरी
दृश्यों के दिल में दीवाली
हिंदी सिनेमा में निर्देशकों ने दीवाली को अलग अलग रूपों में प्रस्तुत किया है. कभी फिल्म में इस पर गाने फिल्माये गये हैं तो कभी कुछ दृश्य. दीवाली के दृश्य आम दृश्यों की तूलना में अलग तरीके से कैसे फिल्माये जाते रहे हैं और उन दृश्यों से जुड़ी कुछ यादें निर्देशकों ने सांझा की अनुप्रिया के साथ.
बिंदू जी के विग में लगी थी आग : सूरज बड़जात्या
फिल्म : हम आपके हैं कौन
यूं तो परदे पर दीवाली के दृश्य देखने में बेहद सुंदर लगते हैं, क्योंकि जगमगाहट किसे पसंद नहीं हैं. लेकिन दीवाली के सीन फिल्माने में काफी दिक्कतें भी आती हैं. पहली दिक्कत तो यह आती है कि अगर टेक ढंग से न मिला हो तो आपको दोबारा से शूटिंग करनी पड़ती है. इसमें बहुत पटाखे जल जाते हैं. दूसरा आपको सावधानी का ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं कोई दुर्घटना न हो जाये. चूंकि मेरे साथ यह हो चुका है. फिल्म हम आपके हैं कौन की शूटिंग के दौरान फिल्म में धिक ताना गाने के दृश्य में दीवाली दिखाना था. फिल्म में बिंदू जी ने विग पहना है. हम लोग सभी शूट कर रहे थे. उस सीन में मोहनिश आते हैं और पूरा  परिवार उनके आवभगत में है. उस दौरान बहुत पटाखे जल रहे हैं. इसी दौरान एक रॉकेट उड़ कर बिंदूजी के विग में लग गया था. शोर था. सो, हम लोग ध्यान नहीं दे पाये थे. फिर किसी क्रू के लोगों ने देखा और फौरन आग बुझायी. बाद में सभी उस दृश्य को सोच कर हंसते हैं. लेकिन उस वक्त मैं डर गया था कि कहीं कोई घटना न घट जाये. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि दीवाली हमारे परंपरा का हिस्सा है और किसी फिल्म में इसकी शोभा और बढ़ जाती है.
मेरा पसंदीदा दृश्य है फिल्म में : करन जौहर
फिल्म : कभी खुशी कभी गम
 फिल्म कभी खुशी कभी गम में दीवाली का दृश्य फिल्म का सबसे अहम दृश्य है, चूंकि उसी वक्त हीरो की एंट्री होती है. हमारे यहां दीवाली की मान्यता भी है कि यह परिवार को एक करने की पूजा है. जब मैं फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहा था. उस वक्त मेरे दिमाग में यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी कि हीरो की एंट्री कैसे होगी और मैं इसे बड़े पैमाने पर शूट भी करना चाहता था.जिस तरह इस दिन लोग लक्ष्मी जी के आगमन की तैयारी करते हैं. फिल्म में मां राहुल के आगमन की तैयारी कर रही है. इस फिल्म में मैंने जितनी ग्रैंड दीवाली फिल्माई है. शायद ही किसी अन्य फिल्म में फिल्मायी हो. दूसरी वजह यह भी थी कि दीवाली मेरे पिता का पसंदीदा त्योहार था और इस दौरान हमने घर में जो जो देखा था. बस उसे ही फिल्म में दिखाने की कोशिश की है और दर्शकों ने इसे बेहद पसंद भी किया. मैंने फिल्म का टाइटिल ट्रैक भी दीवाली पर ही फिल्माया.यह सीन मेरे लिए इसलिए भी खास थी क्योंकि इसमें पहले वहीदा जी भी थीं. लेकिन बाद में उन्होंने फिल्म से खुद को अलग कर लिया था. लेकिन फिर भी मेरे पास उनकी शूटिंग की क्लीपिंग हैं जो मेरे लिए बेहद खास है.
मोहब्बत की मोहब्बत वाली दीवाली
फिल्म मोहब्बते में दीवाली को खास तरीके से फिल्माया गया है. फिल्म के गीत पैरों में बंधन हैं...दीवाली के अवसर पर ही फिल्माया गया गीत है. इस गाने के दृश्य में हर तरफ रोशनी है और ढोल के साथ गाना बजाना हो रहा है. फिल्म के निर्देशक आदित्य का यह पसंदीदा गीत रहा है. खासतौर से नदी में तैर रहे दीये को सजाने के लिए आदित्य ने खास तैयारी करवाई थी और कई हजार दीये नदी में तैराये गये थे. आदित्य का मानना है कि फिल्म में इस गीत का खास महत्व इसलिए भी था कि जिस तरह दीवाली में सभी परिवार का एक होना और त्योहार साथ साथ मनाना परंपरा है. ठीक उसी तरह फिल्म में इस गाने में फिल्म के सभी कपल इस गाने में एक हो जाते हैं. सभी एक दूसरे से प्यार का इजहार करते हैं. और दीवाली का त्योहार एक साथ मनाते हैं.
वास्तव की मिलन वाली दीवाली
फिल्म वास्तव में संजय दत्त की दीवाली के दौरान ही अपने घर पर वापसी होती है.और वह तोहफे के रूप में अपनी मां को सोने के गहने देते हैं. वास्तविक जिंदगी में भी दीवाली को हम अपने परिवार के लोगों के वापस आने और साथ में मिल कर खुशियां बांटने वाला त्योहार ही मानते हैं. सो, दीवाली को फिल्म का यह दृश्य भी सार्थक करता है.
दोस्तों वाली दीवाली (जो जीता वही सिकंदर)
फिल्म जो जीता वही सिकंदर में एक गीत दीवाली के बैकड्रॉप पर फिल्माया गया है, जहां मोहल्ले के सभी लड़के लड़कियां मिल कर आपस में गाना बजाना करते हैं. यह दीवाली का ही त्योहार होता है, जिसमें लड़के व लड़की की टीम बनती है और सभी मस्ती करते हैं. दीवाली दोस्तों से मिलने जुलने का ही त्योहार मानी जाती है, सो उस लिहाज से भी फिल्म में यह गीत एक सार्थक गीत है.