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20131024

सुपरस्टार्स और व्यस्क फिल्म


श्रीदेवी को अभिषेक कपूर ने अपनी फिल्म फितूर में एक ऐसा किरदार आॅफर किया है. अभिषेक चाहते हैं कि श्रीदेवी फिल्म में ग्रे शेड वाली भूमिका निभायें. लेकिन श्रीदेवी इस बात को लेकर असमंझस में हैं कि उन्हें यह किरदार निभाना चाहिए या नहीं. चूंकि उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा कोई भी किरदार नहीं निभाया है. गौरतलब है कि फिल्म लाडला में उन्हें ऐसा किरदार निभाने का मौका जरूर मिला था. लेकिन वह पूरी तरह से ग्रे शेड वाला किरदार नहीं था. उस फिल्म में श्रीदेवी के किरदार को काफी पसंद किया गया था. और अब दौर पूरी तरह से प्रयोगों का है. कंगना रानौट जैसी अभिनेत्रियां भी अब चाहती हैं कि उन्हें नकारात्मक किरदार निभाने का मौका मिले. जिस दौर में श्रीदेवी अभिनेत्री के रूप में पूरी तरह से सक्रिय थीं. उस दौर में अभिनेत्री को ध्यान में रख कर वैसी फिल्में भी कम ही लिखी जाती थीं. अब जबकि अभिनेत्री प्रधान फिल्मों का दौर है तो यह श्रीदेवी के लिए बेहतरीन मौका है. जब वह खुद को साबित कर पायें. चूंकि अब वही कामयाब है जो वाकई अलग है. हिंदी सिनेमा की स्थापित अभिनेत्रियों में रेखा और शबाना आजिमी ने सबसे ज्यादा ग्रे शेड की भूमिकाएं निभायी हैं और वे दोनों ही इस विधा में कामयाब रही हैं.सो, हर अभिनेत्री को अभिनय में एक कदम आगे बढ़ाना ही चाहिए. तभी वे आज फिर से एक नया आयाम स्थापित कर पाने में कामयाब रहेंगी. इस लिहाज से जूही चावला ने भी सही निर्णय लिया है. वे गुलाब गैंग में नेगेटिव किरदार में हैं. जब जूही भी सक्रिय रही होंगी तो उन्होंने भी कभी ऐसे किरदार निभाने की न तो उम्मीद जताई होगी और न ही उम्मीद होगी कि आगे चल कर उन्हें ऐसे किरदार निभाने का मौका मिलेगा. लेकिन अब जबकि श्रीदेवी के सामने यह मौका है तो उन्हें एक और श्रीदेवी के रूप में सामने आना ही चाहिए.

हास्य कलाकार पिता और बच्चे


किसी जमाने के मशहूर हास्य अभिनेता जॉनी लीवर ने हाल ही में अपनी बेटी के साथ कॉमेडी सर्कस में मंच सांझा किया. इसे दर्शकों ने बेहद पसंद भी किया. जॉनी लीवर ने एक दौर में हास्य जगत में राज किया है. उन्होंने हास्य की दुनिया में अपने दम पर खास पहचान बनायी थी. यह वह दौर था. जब स्टैड अप कॉमेडी का खास दौर नहीं था. लगभग हर फिल्म जॉनी लीवर होते थे. निश्चित तौर पर जिस तरह एक अभिनेता के पुत्र पुत्री फिल्मों में अभिनय करने के लिए प्रभावित होते हैं. जॉनी लीवर की पुत्री भी इसी क्रम में अगला नाम हंै. हिंदी फिल्मों में मुख्यधारा के अभिनय जगत में यूं तो कई सितारा पुत्रों ने एंट्री ली. लेकिन इस जगत में हास्य कलाकारों का भी अच्छा नाम है और ऐसे कई कलाकार जो अपनी पिता की हास्य विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. इनकी फेहरिस्त भी लंबी है. दरअसल, हकीकत यह है कि आपका परिवेश, आपका माहौल आपके आगे के करियर को ढालने में काफी मददगार साबित होता है. हम जिस परिवेश में बचपन से ढल जाते हैं. हमें वह जिंदगी प्यारी लगने लगती है. केस्टो मुखर्जी की बेटी सुष्मिता मुखर्जी ने शुरुआती दौर में अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की. बाद में उन्होंने नकारात्मक किरदार निभाना शुरू कर दिया. जगदीप के बेटे जावेद जाफरी ने भी अपने पिता की तरह ही कॉमेडी का रास्ता इख्तियार किया. जॉनी लीवर की बेटी भी इसी क्रम में अगला नाम है. दरअसल, कई बार ये बच्चे अपने पिता के ही सपने को  पूरा करते नजर आ रहे होते हैं. जो जिंदगी वे जी चुके हैं. कई बार वे चाहते हैं कि उनके बच्चे भी उसी जिंदगी को जियें, और कई बार बच्चे अपने शौक से उस जिंदगी को इख्तियार करने की कोशिश करते हैं.हास्य की दुनिया में ये नये नाम अपनी कितनी जगह बना पाते हैं. यह आनेवाला दौर ही बतायेगा. 

पुराना दौर नया कलेवर


 फिल्म बॉस में अक्षय कुमार ने पुराने दौर के  गीत हर किसी को नहीं मिलता...को यह कह कर अपनी फिल्म में  इसका इस्तेमाल किया है कि वह इस गाने से फिरोज खान को ट्रीब्यूट दे रहे हैं. अभिनव कश्यप ने फिल्म बेशरम में फिल्म के किरदार बबली को अमिताभ बच्चन का फैन दिखाया है. इसी फिल्म के अंत में ऋषि कपूर और नीतू कपूर की पुरानी फिल्मों की तसवीर का भी इस्तेमाल किया गया है. इससे पहले प्रियंका चोपड़ा ने शूटआउट एट वडाला में बबली बदमाश में जो कॉस्टयूम पहना था. उन्होंने यह कह कर गाने को प्रोमोट किया था कि वह गीत अमिताभ बच्चन के गाने सारा जमाना हसीनों का दीवाना...को ट्रीब्यूट है. प्रश्न यह उठता है कि क्या वाकई नये जमाने में इस्तेमाल किये जा रहे यह गीत या फिल्मों के दृश्य या तसवीरें वाकई पुराने दौर के कलाकारों को ट्रीब्यूट होती हैं? क्या वाकई फिल्मकार या कलाकार तहे दिल से उन्हें इसे माध्यम से सम्मान देने की कोशिश करते हैं. हाल ही में फिल्म जंजीर के रीमेक के दौरान  अमिताभ बच्चन ने गाने में इस्तेमाल किये जा रहे अपशब्द पर आपत्ति जतायी थी. बाद में इसे हटाया गया और अमिताभ को इस माध्यम से ट्रीब्यूट देने की कोशिश की गयी. दरअसल, हकीकत यह है कि नये जमाने के फिल्मकार और कलाकार सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए पुराने गानों का इस्तेमाल करते हैं. इससे कई फायदे होते हैं. एक तो उन्हें नये गानों की मेकिंग में खास मेहनत नहीं करनी पड़ती. फिर पुराने गानों को नया रूप देने में उन्हें खास खर्च भी नहीं करना पड़ता. दूसरी बात यह भी स्पष्ट है कि आज भी पुराने दौर के गीतों, कलाकारों का जादू बरकरार है. और लोग उससे सीधे तौर पर खुद को कनेक्ट कर पाते हैं. और यही वजह है कि नये जमाने के कलाकार उस कनेक् शन का फायदा अपने मुनाफे के लिए कमाने की कोशिश करते हैं.

सेलिब्रिटी और मेडिकल साइंस


 ऐश्वर्य राय बच्चन ने हाल ही में घोषणा की है कि वे अपनी बेटी आराध्या के स्टेम सेल को संरक्षित( प्रीजर्व) करवायेंगी. ऐश्वर्य राय बच्चन ने हाल ही में एक कार्यक्रम में यह सूचना दी कि वे यह कदम इसलिए उठा रही हैं क्योंकि यह उनके बेटी के भविष्य के सेहत के लिए लाभदायक साबित होगा. और उन्हें हमेशा से सेहत से संबंधित विषयों, तकनीक और विज्ञान की नयी चीजों के बारे में जानकारी हासिल करने में दिलचस्पी रही है. ऐश्वर्य राय से पहले मंदिरा बेदी ने भी इसी तरह अपने बच्चों के स्टेम सेल को संरक्षित किया. निश्चित तौर पर आम लोग इस प्रक्रिया से कम अवगत हैं. लेकिन अब चूंकि सेलिब्रिटी दुनिया की एक बड़ी हस्ती इससे जुड़ रही है. तो निश्चित तौर पर लोगों की जानकारी बढ़ेगी. इससे पहले सरोगेसी को लेकर आम लोग उतने जागरूक नहीं थे. जितने अब हैं. चूंकि आमिर खान और शाहरुख खान जैसी हस्तियों ने सरोगेसी का माध्यम चुना तो मीडिया ने भी इसे पूरा तवज्जो दिया. वरना, यह हमारी विडंबना है कि हमारे भारत में सेहत व स्वास्थ्य व विज्ञान व तकनीक को लेकर लोगों में वह जागरूकता नहीं. हम हर दिन आये नये फैशन ट्रेंड पर नजर रखते हैं. लेकिन विज्ञान या मेडिकल साइंस में हुए नयी खोज, प्रयोग के बारे में न तो जानकारी रखते हैं और न ही दिलचस्पी. हां, मगर जैसे ही किसी सेलिब्रिटी का नाम इससे जुड़ता है. लोगों को दरअसल, यह जानने में मजा आता है कि आखिर यह तकनीक क्या है और उस सेलिब्रिटी ने इसका सहारा क्यों लिया. ऐश कभी नेत्रदान को लेकर लोगों को जागरूक करती नजर आती थीं. उनकी वजह से उस दौर में कई लोगों ने नेत्रदान करना शुरू किया था. लेकिन जरूरत यह ैह कि हम अपनी जिम्मेदारी समझ कर इस ओर जागरूक हों न कि किसी सेलिब्रिटी तकी वजह से. चूंकि विषय अपनी सेहत का है.

नैमो नम:


 नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक एंथम बनवाया है. और यह एंथम रैप म्यूजिक के रूप में है. जिसमें नरेंद्र मोदी को नैमो कह कर संबोधित किया जा रहा है. इस पूरे म्यूजिक में नरेंद्र मोदी की गाथा गायी जा रही है और खासतौर से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. जो नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं और जो नहीं हैं. दोनों ही इसे शेयर कर रहे हैं. स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी जैसे राजनेताओं को भी इस बात की समझ है कि वर्तमान में युवाओं को लुभाने का सर्वश्रेष्ठ जरिया है. जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अपने कैंपेन में मनोरंजन की दुनिया का सहारा लिया है. इससे उनकी सोच स्पष्ट नजर आती है कि वे मानते हैं कि मनोरंजन एक अहम हिस्सा है. ज्यादा से ज्यादा लोगों को आकर्षित करने का. पिछले कई दिनों से यह भी चर्चा है कि जल्द ही नरेंद्र मोदी पर फिल्म भी बनेगी. और फिल्म में परेश रावल मुख्य किरदार निभायेंगे. हाल ही में परेश ने मोदी से मुलाकात भी की. आमतौर पर भी मोदी गुजरात में फिल्मों को बढ़ावा देते हैं. न सिर्फ कलेक् शन के रूप में गुजरात प्रमुख केंद्र है. बल्कि फिल्मों की शूटिंग में भी गुजरात के स्थलों का इस्तेमाल जम कर किया जाता है. चूंकि वे इसे प्रोमोट करते हैं. टेलीविजन में गुजराती समुदाय और गुजराती समुदाय पर आधारित धारावाहिकों की बरसात है. इससे स्पष्ट है कि मोदी मनोरंजन को अहम हिस्सा मानते हैं और वे इसे भी व्यवसाय के रूप में देखते हैं. वे औरों की तरह इसे केवल मनोरंजन का माध्यम समझ कर दर किनार नहीं करते. यही वजह है कि अपनी चुनावी हलचल के लिए उन्होंने इस माध्यम का इस्तेमाल किया है और आगे भी करते रहेंगे. दरअसल, वे इस माध्यम की लोकप्रियता को समझ रहे हैं. साथ ही इसके प्रभाव से भी वे वाकिफ हैं और इसका सीधा असर उन्हें नजर भी आ रहा है. 

हंसने हंसाने की कला



किकू शर्मा की सब टीवी के शो एफआइआर में वापसी हो रही है. यह वापसी उन्हें एफआइआर की लोकप्रियता की वजह से नहीं, बल्कि कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के शो में पलक के रूप में मिली लोकप्रियता की वजह से मिली है. पलक उर्फ किकू कॉमेडी नाइट्स विद कपल में गुत्थी उर्फ सुनील ग्रोवर के साथ जिस तरह से दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं, वे हर घर में लोकप्रिय हो चुके हैं. इस लिहाज से कपिल और उनकी पूरी टीम को बधाई कि उन्होंने एक बेहतरीन तैयारी की. आम किरदार होकर भी, आम हरकतें करके भी अगर आप दर्शकों के दिलों में जगह बना लेते हैं तो आप सही मायने में कलाकार हैं. किसी जमाने में किशोर कुमार अपने चेहरे के तरह-तरह के भाव, अलग-अलग तरह की आवाजें और फिजूल की हरकतों द्वारा अपने अभिनय में वह रंग भरते थे कि उनकी शरारतें भी दर्शकों को बांधे रख पाने में कामयाब होती थीं और यही वजह है कि आज भी हास्य का महागुरु लोग उन्हें ही मानते हैं. सब टीवी के शो एफआइआर में चंद्रमुखी चौटाला का किरदार निभा रही कविता कौशिक की जगह चित्रासी रावत को शामिल किया गया. लेकिन दर्शकों ने उन्हें सिरे से नकार दिया. चूंकि हंसाना हर किसी के वश की बात नहीं. गौर करें तो टेलीविजन में एक कलाकार की जगह दूसरे कलाकार को लिये जाने का यह सिलसिला लगातार बरकरार है. गौर करें तो नये चेहरे स्थापित हो भी जाते हैं और दर्शक उन्हें पसंद भी करने लगते हैं. जिस तरह गोपी बहू और बालिका वधू में नये चेहरे अब स्थापित हो चुके हैं. लेकिन हास्य की विधा की तुलना किसी और विधा से करना सही नहीं होगा. चूंकि वाकई यह अलग विधा है. इसे लोग जितनी गंभीरता से नहीं लेते, यह उतना ही गंभीर व्यवसाय है. कपिल का शो कामयाब है. चूंकि उनके पास अच्छी टीम है, अगर यह टीम बिखरती है तो शो की लोकप्रियता पर भी असर पड.ना तय है

20131004

लुमिनियर ब्रदर्स का प्रयोग


हाल ही में मुंबई में आयोजित एक फिल्मोत्सव में लुमिनियर ब्रदर्स के परिवार के सदस्य लुमिनियर ब्रदर्स की फिल्में लेकर आये थे. ये वही फिल्में थीं, जिन्हें सबसे पहले लुमिनियर ब्रदर ने बनाया था. मूविंग कैमरे को लेकर उन्होंने जो फिल्में बनायी थी. विश्व में सिनेमा की दुनिया में प्रवेश उसी वक्त हुआ था. इसी से सिनेमा का शंकनाद हुआ और आज भारतीय सिनेमा भी अपने 100वें साल में प्रवेश कर चुकी हैं. लुमिनियर ब्रदर्स ने जो प्रयोग किया था. शायद उन्होंने भी यह नहीं सोचा होगा कि उनका यह प्रयोग इस कदर पहले क्रियेटिविटी और फिर एक व्यवसाय का रूप ले लेगा. हालांकि लुमिनियर ब्रदर्स के परिवार के सदस्य मैक्स लुमिनियर ने बताया कि अब उनका परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी रूप में फिल्म के व्यवसाय से नहीं जुड़ा है. यह रोचक जानकारी ही है कि सिनेमा के सपने को साकार करनेवाले राजकुमार का परिवार ही अपने इस सपने से सरोकार नहीं रखता. लुमिनियर ब्रदर्स की उन फिल्मों में परिवार के ही सदस्यों के वीडियो लिये गये हैं. मैक्स वीडियो देखते हुए जानकारी देते हैं कि किस तरह कैमरा आॅन होते ही उनके परिवार के सदस्य वाकई थोड़ा अभिनय करने की कोशिश करने लगते थे. दरअसल, यह स्वभाविक क्रिया भी है, आपके सामने जब कैमरा आॅन होता है तो आप भी आमतौर पर अभिनय ही करते हैं. हिंदी सिनेमा के कई कलाकारों के बारे में यह खबर सुनी जाती रही है कि वे कैमरा आॅन होते ही अपने किरदार में ढल जाता है. श्रीदेवी, गोविंदा उनमें से एक हैं. दरअसल, यही हकीकत भी है कि वह अभिनेता हैं और कैमरा आॅन होते ही उन्हें अभिनय करना है. यह सीख शायद लुमिनियर ब्रदर्स ने शुरुआती दौर में ही दे दी थी. अभिनय का श्रीगणेश भी  तो उन्होंने ही किया था. अरसे बाद उनके संस्मरण सुनना अनोखा अनुभव रहा. 

गांधी की नजर से सिनेमा


हिंदी सिनेमा पर आधारित एक महत्वपूर्ण उपयोगी ब्लॉग चवन्नीचैप पर गांधी और सिनेमा पर एक महत्वपूर्ण आलेख है. जिसमें गांधी की नजर में सिनेमा के दृष्टिकोण को दर्शाने की कोशिश की गयी है. इस आलेख में ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा गांधीजी को लिखे पत्र की व्याख्या है, जिसमें ख्वाजा अहमद अब्बास ने गांधीजी को समझाने की कोशिश की है कि सिनेमा उतनी बुरी और अनुपयोगी चीज नहीं. जितनी दिखाई देती है. उन्होंने आग्रह किया है कि वे सिनेमा को लेकर अपने नजरिये को बदलें. लेकिन गांधीजी ने अपना नजरिया नहीं बदला. यह अलग बात है कि बाद में हिंदी सिनेमा ने गांधीजी पर कई फिल्में बनायी. गांधी के विचारों पर गांधी के कार्यों पर कई फिल्में बनी.दरअसल, स्वयं गांधीजी इसकी महत्ता को समझ नहीं पाये होंगे कि एक दौर में जब वह वह नहीं रहेंगे तो यह वीडियो व चलचित्र ही वह माध्यम होगा, जिससे उनके कार्यों का लेखा जोखा लोगों तक पहुंचेगा. आज भी  मेरी अपनी राय है. हो सकता है कि इस बात से कई लोग असहमत होंगे. लेकिन मुझे देखी गयी चीजें ज्यादा याद रहती हैं, बनिस्पत पढ़ी हुई चीजें. मिल्खा सिंह पर आधारित मैंने किताबें पढ़ी हैं. लेकिन उनकी जिंदगी से जितनी वाकिफ फिल्म भाग मिल्खा भाग के माध्यम से हुई. शायद किताबें पढ़ कर उससे वंचित रह जातीं. गांधीजी ने बाद के दौर में राजकुमार हिरानी जैसे निर्देशकों को इस तरह प्रभावित किया कि उन्होंने अपनी फिल्म से गांधीगिरी को लोकप्रिय कर दिया. लेकिन शायद खुद गांधीजी रहते तो उन्हें इस शब्द पर आपत्ति होती. यह सिर्फ गांधीवादी विचारधारा नहीं, बल्कि सिनेमा को जुआ और सट्टा समझने की चूक आज भी कई लोग करते हैं. दरअसल, सिनेमा जितना विस्तृत और समृद्ध होता जायेगा. उसे लेकर उतने ही अलग अलग नजरिये बनते रहेंगे. 

डायलॉगबाजी फिर से


शाहिद कपूर की नयी फिल्म आर राजकुमार का संवाद है.साइलेंट हो जा वरना मैं वॉयलेंट हो जाऊंगा. इससे पहले शाहिद कपूर ने फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो में भी जम कर डॉयलॉगबाजी की है. फिल्म वन्स अपन अ टाइम इन मुंबई दोबारा के असफल होने की बड़ी वजह यही रही कि फिल्म में जरूरत से ज्यादा संवाद अदायगी है. दरअसल, एक बार फिर से हिंदी सिनेमा में डायलॉग बाजी का दौर लौट आया है. किसी दौर में फिल्म की कहानी पर नहीं फिल्म के संवादों पर ही दर्शकों की तालियां बजती थी. 80 से 90 के दशक में ऐसी फिल्में बहुत बनी. हां, यह सच है कि कुछ ऐसे संवाद भी रहे जो हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय संवाद बन गये. लेकिन आज के दौर में उन संवादों को सुनो तो वे न तो प्रासंगिक लगते हैं और न ही बेहद कर्णप्रिय. लेकिन फिर भी उन संवादों पर कॉमेडी शोज में सबसे ज्यादा पैरोडी बनायी जाती है. चूंकि एक बार जो लोकप्रिय हो चुका है. वही लोकप्रिय है. फिलवक्त हिंदी सिनेमा के कुछ निर्देशक इसी का सहारा ले रहे हैं. कहानी कैसी भी हो. वे चाहते हैं कि फिल्मों के संवाद लोकप्रिय हो जायेंगे. राउडी राठौड़ फिल्म की तो पूरी पब्लिसिटी ही संवाद के बलबुते की गयी. लेकिन अफसोस की बात यह है कि परदे पर ऐसे संवाद जब अभिनेता या अभिनेत्री इन दिनों बोलते नजर आते हैं. उनमें कोई नयापन नहीं होता. आर राजकुमार के पोस्टर को देखें तो आप गौर करेंगे कि एक बार फिर से लार्जर देन लाइफ किरदार निभाने वाले किरदार का दौर लौट आया है. दरअसल, शाहिद कपूर सरीके कलाकारों की यही कोशिश है कि वह चॉकलेटी इमेज से बाहर निकल कर ऐसे किरदार निभायें ताकि वे भी उन श्रेणी में शामिल हो पायें. और ऐसे में उन्हें मदद डायलॉगबाजी से ही मिलती है और यही वजह है कि अब कहानी नहीं फिर से डायलॉगबाजी का दौर लौट रहा है

कपूर खानदान कल आज कल


रणबीर कपूर की फिल्म बेशरम तमाम बातों के बावजूद एक बुरी फिल्म है. रणबीर कपूर फिल्म की जान थे. और लोगों का यही मानना था कि फिल्म में चूंकि ऋषि कपूर और रणबीर कपूर ने पहली बार साथ साथ काम किया. फिल्म अच्छी ही बनी होगी. लेकिन लोगों की उम्मीदों पर यह फिल्म खरी नहीं उतरती. ऋषि कपूर ने फिल्म से पहले केबीसी में बातचीत के दौरान कहा कि उनकी इच्छा है कि ये फिल्म जब उनके परपोते देखें तो उन्हें खुशी होगी कि दादाजी और बेटे ने साथ काम किया है. इसी मकसद से उन्होंने यह फिल्म बनायी है. राजकपूर ने भी इसी उद्देश्य से शायद फिल्म कल आज और कल का निर्माण किया था. जिसमें उन्होंने तीन पीढ़ियों को साथ फिल्माया है. हां, यह सच है कि भले ही वह फिल्म सफल नहीं हुई. लेकिन राजकपूर ने फिल्म के माध्यम से तीन पीढ़ियों की सोच को दर्शाने की बेहतरीन कोशिश की थी. लेकिन आज अगर फिल्म बेशरम सफल भी हो जाये तो वह हर लिहाज से उस फिल्म से कम ही होगी. चूंकि कपूर खानदान की दो पीढ़ियों ने जिस तरह से बेशरम में बेशरमियत की हदें पार की हैं. वह कपूर खानदान के नाम पर एक तमाचा है. रणबीर कपूर वर्तमान दौर के सबसे बेहतरीन कलाकार हैं. और उनसे दर्शकों की उम्मीद कई गुना बढ़ चुकी है.ऐसे में बेशरम जैसी फिल्मों का चुनाव और साथ ही साथ ऋषि कपूर जैसे अभिनेता का फिल्म के लिए हां कहा जाना बेहद चौंकानेवाला निर्णय लगता है. क्या हिंदी सिनेमा में इससे पहले किसी निर्देशक ने इन कलाकारों को साथ लेकर फिल्म बनाने की परिकल्पना ही नहीं की थी? क्या ऋषि कुछ और दिन इंतजार नहीं कर सकते थे. ऋषि कपूर के उतावलेपन की वजह फिल्म में साफ नजर आ रही है. वाकई निर्देशक अभिनव कश्यप ने बेहतरीन स्टार कास्ट को बुरी तरह बर्बाद किया है. 

पॉजिटिव सोच से मिलता है सुपर पावर

सुपर स्टार रितिक रोशन सिर्फ बाहर से ही रफ एंड टफ नहीं हैं, बल्कि अंदर से भी काफी मजबूत हैं. उनका सकारात्मक सोच हमेशा उन्हें सुपर पावर देता है. तभी तो हेल्थ से जुड.ी कई परेशानियों से न केवल वह उबर कर सामने आये हैं, बल्कि ज्यादा मैच्योर भी हुए हैं. उनके सकारात्मक सोच की चमक चेहरे पर साफ नजर आती है. उनके अनुसार हर शख्स में एक सुपर हीरो होता है. जरूरत बस उसे पहचानने की है. जिंदगी में मुसीबतों से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे लड.ना चाहिए. रितिक ने कृष 3 और अपनी जिंदगी से जुडे


आपकी नजर में सुपरहीरो की असली परिभाषा क्या है? सुपर हीरो को पावर कहां से मिलती है?

मेरी नजर में हर किसी में सुपर पावर है. बस उसे जानने-समझने की जरूरत है. सुपर हीरो की पावर उसकी सोच है. सुपर हीरो बनने में सिर्फ तीन सेकेंड बनने का समय लगता है. आपके सामने जो भी चैलेंज, जो भी सिचुएशन है, आप सोच लें कि इसको मैं सुपरहीरो की तरह हैंडल करूंगा. मतलब बहादुरी से. एक, दो, तीन..लेट्स डू इट. जैसे कि मेरे साथ हुआ ब्रेन सर्जरी के समय.डॉक्टर ने कहा कि ब्रेन में ब्लड जमा है. होल करके ब्लड निकालना होगा. ऐसे में पहला रिएक्शन होता है, अरे बाप रे.., लेकिन मैंने तीन सेकेंड में तय कर लिया कि गिव अप नहीं करूंगा. तय किया कि मैं सुपरहीरो की तरह इस परेशानी से उबरूंगा. ऑपरेशन टेबुल पर भी मैं गा रहा था. मैंने कहा कि मैं होश में रह कर ऑपरेशन कराऊंगा. डॉक्टर मेरे सिर से जमा ब्लड निकाल रहे थे और मैं देख रहा था.

इन सब के लिए आपको प्रेरणा कहां से मिलती है? 

प्रेरणा तो जिंदगी ही है. लाइफ इज अ गेम. जिस वक्त आपने यह स्वीकार कर लिया कि इस गेम को पूरी एबिलिटी के साथ खेलना है, तो बस फिर आपके लिए कोईभी काम मुश्किल नहीं. अब जो भी हो रहा है. जब परेशानी आती है, तो मैं ऊपर देखकर भगवान से कहता हूं, बस इतना ही. बस यही से मुझे ऊर्जा और शक्ति मिल जाती है. मैंने महसूस किया है, कि जैस-जैसे मेरी जिंदगी में मुश्किलें बढ.ीं, मेरे सामना करने की क्षमता भी बढ.ती गयी. जिंदगी में प्रॉब्लम कभी खत्म नहीं होती. आज भी मेरे घुटनों में परेशानी है, शोल्डर ठीक नहीं. अब तो ब्रेन में भी होल है. मैं निराश नहीं होता. सोचता हूं, सब अच्छा होगा. मैं एक्सीपिरियंस से जल्दी सीख लेता हूं.

क्या आपने गुजारिश या अन्य फिल्मों में अपनी इसी अवस्था को परदे पर उतारा है?

हां, मैंने अपने हर किरदार से कुछ-न-कुछ सीखा है. जब भी मैं किसी किरदार का चयन करता हूं, तो मैं देखता हूं कि उस किरदार में क्या-क्या खूबियां हैं? अगर उस किरदार में खूबियां मुझसे ज्यादा हैं, तो मैं वह कैरेक्टर करना चाहता हूं, क्योंकि मैं महसूस करता हूं कि कहीं-न-कहीं मैं उस कैरेक्टर से कम हूं. अपने आप को उस कैरक्टर में रख कर मैं ग्रो करने की कोशिश करता हूं.

इस फिल्म का नाम कृष 3 क्यों है? कृष 2 क्यों नहीं? कोई मिल गया व कृष के बाद यह तो अगली कड.ी थी?

ये सीरीज की तीसरी फिल्म है. सबसे पहले कोई मिल गया में जादू ने पावर दिया था. इसके बाद कृष और अब तीसरी फिल्म कृष 3 है.

कोई मिल गया से अब तक बतौर एक्टर क्या चीजें रहीं, जो आपको सबसे कठिन लगी? 

‘कोई मिल गया’ में मैंने जो रोहित का किरदार निभाया था, उसे फिर से 10 सालों के बाद दोबारा कृष 3 में निभा रहा हूं. कोई मिल गया में जो बच्चा था, वहीं इस फिल्म में बाप का रोल कर रहा है. बच्चे की हरकतों के साथ एक बाप की जो डिगनिटी है, जो सपोर्ट है, वहीं बतौर एक्टर मुझे मुश्किल लगा.मैंने इसके लिए काफी मेहनत भी की है. दरअसल, कृष और रोहित मेरे अंदर के ही दो हिस्से हैं. जब शूटिंग के दौरान मैं कृष का सूट पहनता हूं तो मैं वाकई सुपरहीरो की तरह महसूस करने लगता हूं.भारी सूट पहनकर लगातार शूटिंग करना और इसके तुरंत बाद रोहित का किरदार निभाना भी थोड.ा मुश्किल था.

भारत में रह कर कृष 3 जैसी फिल्में बनाना कितना कठिन है? 

हां, ये बात सही कही आपने. थोड.ा टफ तो है. शुरुआत में जैसे-जैसे फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी. पापा मेरे पास आते और कहते कि नहीं बना पायेंगे. पापा ने कहा कि चलो कोई छोटी फिल्म बनाते हैं और उसी को बना कर एंज्वॉय करेंगे. मैंने पापा से बस इतना ही कहा कि यह अब आपकी जिम्मेवारी है, कि आप इस स्क्रिप्ट को दर्शकों तक कैसे पहुंचाते हैं.ऐसी स्क्रिप्ट बहुत कम बनती है. अगर हम दोनों मिल कर नहीं करेंगे, तो कौन करेगा भारत में. उसके बाद हमने निर्णय लिया कि इस फिल्म में हम किसी भी हॉलीवुड आर्टिस्ट से काम नहीं लेंगे. यह पूरी तरह से भारत की पहली हाइ बजट वीएफएक्स सुपरहीरो फिल्म है, जिसका पूरा काम भारत में हुआ है. इसमें एक शॉट भी नहीं है..कहीं भी बाहर से. यह कंप्लीट इंडियन फिल्म है, जिसमें इमोशन भी है. फैमिली ड्रामा भी है और वीएफएक्स सुपरहीरो भी.

इस फिल्म की शूटिंग के दौरान भी आप पूरी तरह से स्वस्थ नहीं थे?

हां, मेरे डॉक्टर्स ने मुझे एक्शन करने से मना किया था और पापा इस बात को लेकर टेंशन में रहते थे. मेरे लाइफ का एक्सपीरियंस रहा है, कि जब भी डॉक्टरों ने कहा कि मैं ये नहीं कर सकता, मैंने करके दिखाया है. मैंने कभी भी अपने करेज के सामने किसी की बात नहीं सुनी. मैंने देखा है कि बहुत सारे लोग हैं, जिनके लाइफ में मिरैकल होते हैं.मैं हमेशा सोचता हूं कि ये मिरैकल मेरे साथक्यों नहीं हो सकता. मुझे तो बस ढूंढ.ना है. साइंस ने तो बोल दिया कि आप अब नहीं कर पायेंगे, लेकिन मैंने ऑल्टेरेनेटिव ढूंढ.ना शुरू किया. कृष के दौरान भी मुझे डॉक्टर ने कहा तो मैंने बात नहीं मानी. मैंने कृष के किरदार से पॉवर लिया और सारे एक्शन किये. आपको आश्‍चर्य होगा कि मैंने अपनी लाइफ में इतना एक्शन कभी नहीं किया, जितना इस फिल्म में किया है. 80 दिनों तक लगातार बिना किसी ब्रेक के. मैं मानता हूं कि अगर आप किसी चीज को पाना चाहते हो और उसे पाने के लिए हरसंभव प्रयास करते हो, तो आपको वह चीज मिल ही जाती है. यह यूनिवर्स का इक्वेशन है. मैंने भी वही किया.

कई लोग कहते हैं कि आप ग्रीक गॉड की तरह दिखते हैं?

नहीं, मैं ग्रीक गॉड नहीं हूं. झूठी बात है. अभी-अभी मैं ग्रीक गया था और वहां मुझे किसी ने पहचाना तक नहीं.इससे साबित होता है कि मैं ग्रीक गॉड नहीं हूं