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20130930

बॉलीवुड के बेशरम


जल्द ही रणबीर कपूर की फिल्म बेशरम रिलीज हो रही है. फिल्म में उन्होंने चोर उचक्का किस्म का किरदार निभाया है और रणबीर यह किरदार निभा कर बेहद खुश भी हैं. यह तो रहीफिल्म की बात. लेकिन हकीकत यह है कि बॉलीवुड हस्तियों की वास्तविक जिंदगी में भी कुछ लम्हें ऐसे रहे हैं, जब वह वास्तविक जिंदगी में भी बेशरम के रूप में नजर आये हैं. पेश है कुछ ऐसे बॉलीवुड के वास्तविक बेशरम कारनामों पर की रिपोर्ट

 बॉलीवुड हस्तियों के जीवन में भी ऐसे कई पल आये हैं, जब कभी वे जान बूझ कर बेशरम बने तो कभी कुछ परिस्थिति ऐसी रही कि उन्हें बेशरम बनना पड़ा. 

 मनोरंजन की दुनिया में ऐसी भी कुछ हस्तियां हैं, जिन्हें खुद को बेशरम कहलाने में बहुत मजा आता है और वह खुद को बिंदास होकर बेशरम मानती हैं या मानते हैं.
इन हस्तियों में वीणा मल्लिक और पूनम पांडे का नाम सबसे पहले आता है. क्योंकि आये दिन वे न्यूड होकर फोटो शूट करवाती रहती हैं और वे इसे शान की बात मानती हैं. सनी लियोन को भी पॉर्न स्टार की इमेज में रहने से कोई परेशानी नहीं. डॉली बिंद्रा बकबक करने के लिए बदनाम हैं. लेकिन उन्हें भी अपनी इस बेशरमी से कोई परेशानी नहीं. राखी सावंत, इमाम सिद्दिकी जैसे लोगों का नाम भी इस श्रेणी में शामिल किया जा सकता है. 

रणबीर कपूर-कट्रीना कैफ
कट्रीना कैफ और रणबीर कपूर की स्पेन के बीच पर बिताई गयी कुछ तसवीरें पिछले काफी दिनों से चर्चा का विषय रही. वजह यह थी कि इसमें कैट बिकनी ड्रेस में थी और रणबीर कैट काफी कूल मूड में थे. ऐसे में उनकी तसवीरें कैमरे में कैद हो गयीं और पूरे मीडिया में यह खबर फैल गयी. इसके बाद कट्रीना ने मीडिया को एक खुला पत्र लिख कर अपने गुस्से का इजहार किया कि उनकी निजी जिंदगी में किसी मीडिया को दखल नहीं देना चाहिए. अब कैट एक बात तो आपको समझनी ही चाहिए कि कैमरा आपका पीछा करेगा ही. आप सेलिब्रिटी हैं और अगर आपको पसंद नहीं कि लोग आपकी ऐसी तसवीरें उतारें तो आपको सार्वजनिक स्थल पर इस तरह घूमना ही नहीं था.
अक्षय कुमार ने जब सार्वजनिक रूप से किया ये कारनामा
अक्षय कुमार ने कुछ सालों पहले एक फैशन शो में रैंप पर वॉक करते करते अपनी पत् नी टिष्ट्वंकल खन्ना के पास पहुंच गये. टिष्ट्वंकल फर्स्ट रो में बैठी थीं और उन्होंने वहां जाकर टिष्ट्वंकल से कहा कि मेरी जींस की जीप खोले. टिष्ट्वंकल ने भी आव देखा न ताव उन्हें लगा कि वे इससे काफी लोकप्रिय हो जायेंगे. सो, उन्होंने जीप खोल भी दिया. अक्षय कुमार उस फैशन शो में किसी जींस के ब्रांड का ही प्रोमोशन कर रहे थे. आमतौर पर कूल और मजाकियां अंदाज में रहनेवाले अक्षय को यह नहीं पता था कि उनकी यह बेशरम हरकत उन्हें परेशानी में डाल देगी. बाद में इसे लेकर काफी विवाद हुआ
आमिर ने शाहरुख को कह दिया कुत्ता
आमिर खान कुछ सालों पहले पंचगिनी से एक कुत्ता लेकर आये थे और उन्हें वह शाहरुख कह कर बुलाते थे. उन्होंने कई नेटवर्किंग साइट पर यह लिख दिया कि शाहरुख मेरे पैरों के नीचे बैठा है और वह मेरे तलवे चाट रहा है. मैं अभी शाहरुख को बिस्किट खिला रहा हूं और ऐसी ही कई बातें आमिर ने कही. बाद में उन्होंने लिखा कि शाहरुख मेरे कुत्ते का नाम है. इसे लेकर काफी विवाद हुआ. शाहरुख खान ने भी इस पर काफी तीखा वार किया. लेकिन बाद में आमिर ने महसूस किया कि बात ज्यादा आगे निकल रही है और इससे उनकी इमेज खराब होगी तो उन्होंने शाहरुख के घर जाकर उनसे माफी मांगी. शाहरुख की बेटी से माफी मांगी और बात को स्पष्ट किया कि वे वह कुत्ता पंचगनी से लाये थे और वहां एक परिवार वाले ने उस कुत्ते को पाला था. और वे शाहरुख के फैन थे और वह अपने कुत्ते को बेटे सा प्यार करते थे इसलिए उन्होंने कुत्ते का नाम शाहरुख रखा था.
शाहरुख-सलमान के कारनामे
शाहरुख खान भी कई बार अपनी सुपरस्टार की इमेज से इतर बेशरमियत पर उतर आये हैं. उन्होंने कई बार पार्टियों में अपना आपा खोया. सलमान खान के साथ कैट की पार्टी में उन्होंने हाथापाई की थी. फिर एक बार उन्होंने संजय दत्त की पार्टी में गुस्से में अपना आपा खो दिया और बेशरम बन कर सबके सामने फराह खान के पति शिरीष कुुंदुर को चाटा जड़ दिया था फिर काफी बातें भी सुनाई थी. वही दूसरी तरफ सलमान खान हमेशा खबरों में बने रहते हैं, चूंकि उनके कुछ ऐसे ही कारनामें होते हैं. हाल ही में सलमान खान ने एक टीवी शो की लांचिंग पर एक गे जर्नलिस्ट का काफी मजाक उड़ाया. साथ ही वह कई बार मीडिया के लोगों से भी बदतमीजी कर चुके हैं. उन्होंने कई बार अपने फैन को भी थप्पड़ जड़ा है. लेकिन इसके बावजूद उन्हें इन बातों का मलाल नहीं.
मीडिया के साथ बदसलूकी
आमतौर पर फिल्मी हस्तियों की यह छवि बनी होती है कि वे बेहद नम्र स्वभाव के होते हैं. लेकिन कई ऐसी हस्तियां हैं, जो कई बार मीडिया के साथ काफी बदसलूकी करती है. इनमें जया बच्चन का नाम सबसे पहले आता है. जया बच्चन को मीडिया से बात करना पसंद नहीं वह इंटरव्यू नहीं देतीं और अगर कभी किसी इवेंट में शामिल भी हो जायें तो ढंग से बात नहीं करतीं. एक बार गुस्से में आकर उन्होंने एक मीडिया हाउस के माइक के बूम को ही तोड़ डाला था. उनके बेटे अभिषेक बच्चन ने भी एक बार मीडिया के व्यक्ति पर सरेआम हाथ उठा लिया था. रणबीर कपूर ने फिल्म ये जवानी है दीवानी के प्रेस लांच में एक जर्नलिस्ट को काफी खरी खोटी सुना दी थी, क्योंकि वह चैनल के प्रतिनिधि रणबीर और दीपिका की लव स्टोरी से संबंधित सवाल पूछ रहे थे. ऋतिक रोशन ने भी एक बार शिरडी यात्रा में कुछ ऐसा ही बर्ताव किया था. अमिताभ बच्चन ने भी कुछ सालों पर पहले मीडिया को बॉयकॉट किया था. ऐश्वयर्  राय बच्चन भी बच्चन बहू बनने के बाद मीडिया के उनके निजी जीवन में पूछे गये किसी भी सवाल का सही तरीके से जवाब नहीं देती हैं.शाहिद कपूर भी पहले मीडिया से अच्छी तरह से बात नहीं करते थे.
रणवीर सिंह
रणवीर सिंह पिछले काफी दिनों से दीपिका पादुकोण के पीछे पीछे घूमते नजर आ रहे हैं. हाल ही में वह एक टीवी के सेट पर भी दीपिका के पीछे पीछे पहुंच गये थे. दीपिका वहां अपने फिल्म के प्रोमोशन के लिए पहुंची थी. लेकिन रणवीर वहां भी पहुंच गये थे. बाद में जब यह खबर फैली तो वह अपना मुंह छुपा कर वहां से भाग निकले थे. उनकी इस हरकत के बारे में  मीडिया में काफी दिनों तक  चर्चा रही.

फिल्मी तिलिस्म


अमिताभ बच्चन ने हाल ही में केबीसी के एक एपिसोड में रणबीर कपूर के पूछने पर एक यादगार बात सांझा की. उन्होंने बताया कि फिल्म याराना फिल्म के गाने सारा जमाना हसीनों का दीवाना में...किस तरह उन्होंने स्टेडियम की शूटिंग में लोगों की बजाय मोमबत्तियां लगाने की राय निर्देशक को दी. ताकि ज्यादा लोगों को एकत्रित करने की जरूरत न हो. शूटिंग दिन में हुई थी. लेकिन माहौल रात का दर्शाना था. साथ ही उन्होंने बताया कि किस तरह उन्होंने अपने कॉस्टयूम को वह लुक दिया, ताकि पूरे स्टेडियम में जगमगाहट नजर आये. अमिताभ बच्चन की एक फिल्म शंहशाह के एक दृश्य में अमिताभ अदालत में कार लेकर घूस जाते हैं और अरुणा ईरानी को गवाह के रूप में पेश करते हैं. फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो में मुंबई पुलिस को निठ्ठला दिखाया गया है. दरअसल, हकीकत यही है कि यह फिल्मों का ही तिलिस्म होता है. जो हमें गलत को भी सही और स्वभाविक समझने पर मजबूर कर देता है. वरना, वर्तमान में आप जब वे पुरानी फिल्में देखें तो आप उसके साथ कई तर्क वितर्क कर सकते हैं. चूंकि अब दर्शक काफी बुद्धिमान हो चुके हैं. लेकिन जिस दौर में वे फिल्में बनी हैं. उस दौर में दर्शक हिंदी फिल्मों की इन्हीं नादानियों या यूं कहें चीट शॉट्स को देख देख कर तालियां बजाती थीं और खुश होती थीं. फिल्म अमर अकबर एंथनी में साई बाबा की आंखों से आंखें निकल कर निरुपा राय की आंखों में चली जाती हैं, इस दृश्य के बारे में अमिताभ ने रणबीर से पूछा कि क्या आज ये फिल्में बने तो युवा पीढ़ी पसंद करेंगी. हालांकि रणबीर ने कहा हां. लेकिन हकीकत यह है कि आज इस तरह की चीजें हास्यपद साबित होंगी. सो, आज के दर्शक इस तरह के दृश्यों को फिल्माने में काफी सतर्कता बरतते हैं. तमाम बातों के बावजूद एक सच कायम है कि फिल्म का यह तिलिस्म जारी रहेगा.

हिंदी फिल्मों में महिला जासूस


विद्या बालन दीया मिर्जा की फिल्म बॉबी जासूस में मुख्य किरदार निभा रही हैं. खबर है कि इस फिल्म में विद्या बालन महिला जासूस के किरदार में नजर आयेंगी. साथ ही खबर यह भी है कि विद्या बालन पहली अभिनेत्री होंगी, जिन्हें किसी जासूस के रूप में हिंदी फिल्म में दिखाया जायेगा. दरअसल, यह हकीकत भी है कि हिंदी फिल्मों में अब तक महिलाओं को जासूस के रूप में कभी बड़े कैनवास पर नहीं दर्शाया गया है. क्या महिलाएं जासूस नहीं हो सकतीं? क्या हिंदी सिनेमा के निर्देशकों का यही मानना था अब तक कि महिलाएं जासूसी वाले सीक्स सेंस नहीं रखतीं या उनमें वह खूबियां नहीं होती. चूंकि जासूस बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं. जल्द ही दिबाकर बनर्जी ब्योमकेश बक् शी पर फिल्म बनाने जा रहे हैं. रणबीर कपूर को लेकर भी जग्गा जासूस बन रही है. ऐसे में निश्चित तौर पर विद्या बालन का यह किरदार सबको चकित कर देगा. दीया मिर्जा ने एक अच्छी परिकल्पना की है. हिंदी सिनेमा के दर्शकों को पहली बार किसी महिला को जासूसी करते देखा जायेगा. हिंदी सिनेमा के निर्देशकों के लिए जरूरी है कि वे महिलाओं के लिए कुछ इस तरह के किरदारों को गढ़ें, जिसे दर्शक ने न कभी देखा हो. राकेश रोशन ने फिल्म कृष 3 में कंगना को सुपरवीमेन का किरदार देकर रास्ते खोले हैं कि अभिनेत्रियों के लिए ऐसे अजूबे किरदार भी रचे जायें. ताकि वे अपनी प्रतिभा को पूरी तरह से निखार पायें. हॉलीवुड में ऐसी फिल्में काफी बनती रही हैं, जहां महिला जासूस की भूमिका में होती हैं. लेकिन हिंदी फिल्मों में ऐसे किरदारों का अभाव है. उस लिहाज से वाकई दीया मिर्जा की फिल्म रोचक होगी. अब जरूरत यह है कि विद्या बालन की प्रतिभा और उनके किरदार को देखते हुए ऐसी कहानी गढ़ी जाये जो विद्या के साथ पूरी तरह से न्याय कर पाये. उनकी ऊर्जा और लीक से हट कर सोची गयी यह फिल्म व्यर्थ न जाये.

द शो मस्ट गो आॅन कपिल


हिंदी टेलीविजन पर इन दिनों अगर कोई सबसे ज्यादा लोकप्रिय है तो वह हैं कॉमेडी किंग कपिल शर्मा और उनका कलर्स पर प्रसारित होनेवाला शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल. यह एकमात्र शो है जिसे सबसे ज्यादा न टीआरपी मिल रही है बल्कि लगभग बॉलीवुड के सभी बड़े स्टार्स इस शो में शिरकत करते हैं. लेकिन लोगों को हंसाने वाले कपिल 25 सितंबर को बेहद दुखी नजर आये थे. वे मायूस थे. चूंकि कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के सेट पर भयंकर आग लग गयी. और पूरा का पूरा सेट जल कर राख हो गया. कपिल कल सोनू निगम के साथ शूटिंग करनेवाले थे. कपिल तुरंत तुरंत कोलकाता से अपना शो करके लौटे थे और फिर शूटिंग की तैयारियों में जुटे थे. निश्चित तौर पर जब वह विमान में रहे होंगे. उनके जेहन में कई बातें चल रही होंगी. वह सोच रहे होंगे कि क्या और नयी चीजें की जायें? लेकिन मुंबई पहुंचते ही उन्हें जब जानकारी मिली होगी तो जाहिर है वह टूट गये होंगे. चूंकि कपिल ने अपना मुकाम खुद हासिल किया है. एक आम आदमी से खास बनने की उनकी कहानी जगजाहिर है. ऐसे में जाहिर है उन्हें बेहद दुख हुआ होगा. इन दिनों हर तरफ कपिल की चर्चा है. टिष्ट्वटर पर कई लोगों ने लिखा कि कपिल के घर को नजर लग गयी...किसी ने लिखा कि नींबू मिर्च टांग देना चाहिए था...इससे साफ जाहिर है कि दर्शक किस तरह कपिल के घर को अपना घर समझने लगे थे. लेकिन यह निश्चित है कि कपिल फिर से वापसी करेंगे. चूंकि जो व्यक्ति अपना मुकाम खुद से हासिल करता है. उसे खोने का डर नहीं होता. फिलवक्त कपिल को राजकपूर की फिल्म जोकर से प्रेरणा लेनी चाहिए कि कुछ भी हो जाये... शो मस्ट गो आॅन. दरअसल, गुत्थी, नानी, बुआ दर्शकों को अपने से लगने लगे थे. वे नेक काम कर रहे हैं. लोगों को हंसा  कर. सो, यह सिलसिला जारी रहे.

किसी को टक्कर देने के लिए नहीं कर रहा हूं 24 : अनिल कपूर


बॉलीवुड के ‘मिस्टर इंडिया’ जल्द ही छोटे परदे पर दस्तक देने वाले हैं. कलर्स टेलीविजन पर उनका शो ‘24’ चार अक्तूबर से दिखाया जायेगा. शो में अनिल कपूर जय सिंह राठौड. के किरदार में हैं, जो एक ऑफिसर है. फिलहाल इस शो की 24 कड.ियां दिखायी जायेंगी. शो में अनिल के अलावा शबाना आजमी, अनुपम खेर, मंदिरा बेदी और टिस्का चोपड.ा भी मुख्य भूमिका में हैं.
अनिल कपूर इस बात से बेहद खुश हैं कि वे पहली बार ‘24’ से छोटे परदे पर शुरुआत कर रहे हैं. हाल ही में उन्होंने अपने शो ‘24’ को लांच किया. इस शो की शुरुआत चार अक्तूबर से होने जा रही है. अनिल कहते हैं, यह कोई छोटा शो नहीं है. छोटा परदा भी अब छोटा परदा नहीं रह गया है. उनका मानना है, कि इस शो से उन्हें बड.ा मौका मिला है. वे चाहते हैं कि दर्शकों को उनका यह शो पसंद आये.

अनिल कपूर ने कहते हैं, यह किसी सपने से कम नहीं है, कि उन्हें शबाना आजमी और अनुपम खेर के साथकाम करने का मौका मिला. शो के बारे में वह कहते हैं कि यह विदेशी शो का हिंदी वर्जन है. इसे रेंसिल डिसल्वा ने लिखा है, जबकि अभिनव देव ने निर्देशित किया है. फिलहाल इस शो की 24 कड.ियां प्रस्तुत होंगी. 24-24 घंटे की कहानी है. इस शो में मंदिरा बेदी व टिस्का चोपड.ा भी मुख्य भूमिकाओं में हैं. मंदिरा बेदी नीना मय्यर के किरदार में हैं. अनिल कपूर जय सिंह राठौड. के किरदार में हैं, जो एक ऑफिसर है. अनिल बताते हैं कि उन्होंने इस शो के लिए काफी रिसर्च किया और उसके बाद ही इसकी मेकिंग की शुरुआत की.

अनिल का मानना है कि 24 जैसे शो भारतीय टेलीविजन का चेहरा बिल्कुल बदल देंगे. अनिल ने बताया कि वह लांस एंजिल्स में जब इस शो में काम कर हे थे, तभी लगा कि भारत में भी ऐसे शो बनने चाहिए. अनिल कपूर से जब यह पूछा गया कि क्या वह अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान या सलमान खान को टक्कर देने की कोशिशकर रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं किसी से कंपीटीशन नहीं कर रहा हूं. मैं अपने अंदाज की फिल्में करता रहा हूं और टेलीविजन पर भी अपने अंदाज के शो करूंगा.

बकौल अनिल कपूर मैं फिल्मों से ज्यादा लगन से इस शो में काम कर रहा हूं. चाहता हूं कि लोग मेरी फिल्मों की तरह ही इस शो को भी पसंद करें. -अनुप्रियाबॉलीवुड के ‘मिस्टर इंडिया’ जल्द ही छोटे परदे पर दस्तक देने वाले हैं. कलर्स टेलीविजन पर उनका शो ‘24’ चार अक्तूबर से दिखाया जायेगा. शो में अनिल कपूर जय सिंह राठौड. के किरदार में हैं, जो एक ऑफिसर है. फिलहाल इस शो की 24 कड.ियां दिखायी जायेंगी. शो में अनिल के अलावा शबाना आजमी, अनुपम खेर, मंदिरा बेदी और टिस्का चोपड.ा भी मुख्य भूमिका में हैं.

हिंदी फिल्मों में हैप्पी कनेक् शन


फराह खान की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर की शूटिंग शुरू हो चुकी है. जल्द ही सैफ अली खान हैप्पी इंडिंग नामक फिल्म की शूटिंग शुरू करने जा रहे हैं. वही दूसरी तरफ प्रहलाद कक्कड़ जल्द ही ऐश और अभिषेक को लेकर फिल्म हैप्पी एनिवर्सरी का निर्माण करने जा रहे हैं और इसके साथ ही यह घोषणा हो चुकी है कि ऐश इस फिल्म से अपना कमबैक करेंगी. दरअसल, हिंदी सिनेमा में इन दिनों शायद कुछ ज्यादा ही हैप्पी है. यानी खुश है. शायद यही वजह है कि हिंदी सिनेमा में हैप्पी शब्द के शीर्षक के साथ तीन फिल्में बन रही हैं. खबर है कि और भी कई निर्देशकों ने अपनी फिल्मों के शीर्षक के साथ यह नाम जोड़ लिया है. इसकी एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि हैप्पी का मतलब खुशी होता है और हैप्पी नामक जोड़ कर निर्देशक निर्माता यह दर्शाना चाहते हों कि उनकी फिल्में देख कर दर्शक खुश होंगे. चूंकि दौर अभी हंसी ठिठोली का ही है. दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि हैप्पी के साथ किसी तरह की ज्योतिष विद्या जुड़ी हो. अंधविश्वास की वजह से ही हैप्पी नामक फिल्मों के साथ जोड़ा जा रहा है. हिंदी सिनेमा जगत में भी एक दौर चलता है. यह दौर होड़ के दौड़ में शामिल होने की होती है. आप अचानक सुनेंगे कि शेख्सपीयर के नाटकों पर एक साथ कई फिल्में बनने जा रही हैं. फिर कभी आप सुनेंगे कि एक ही विषय पर कई फिल्में बन रही हैं. फिर कभी लगातार सीक्वल और रीमेक का दौर रहता है. फिर कभी युवा कहानियां तो कभी प्रेम कहानियों पर फिल्में बनने लगती हैं. ठीक इसी तरह आनेवाला दिन बॉलीवुड के लिए हैप्पी शब्द के शीर्षक वाले दिनों में से एक रहेगा. अब देखना यह है कि ये फिल्में वाकई दर्शकों को खुशी दे पायेंगी या नहीं. अभिषेक, शाहरुख और सैफ जैसे चर्चित नाम इससे जुड़ रहे हैं तो निश्चित तौर पर कहानियों से उम्मीद की जा सकती है.

स्टारडम के बदलते स्वरूप


्नरणबीर कपूर ने अपनी बातचीत में कहा कि वे चाहते हैं कि जिस तरह राज कपूर साहब और नरगिस जब रशिया में फिल्म आवारा के प्रीमियर के दौरान गये थे और वहां के लोगों ने जिस तरह दोनों का अभिवादन किया. जिस तरह राज कपूर की गाड़ी को खुद सभी लोग उठा कर होटल तक लेकर गये थे. यह स्टारडम का अदभुत रूप था. रणबीर की इच्छा है कि वह ऐसा स्टारडम हासिल करें, जहां उन्हें इतना सम्मान मिले. रणबीर का मानना है कि स्टारडम का दौर अमिताभ, शाहरुख, सलमान, आमिर के दौर तक सीमित रह गया. उसके बाद स्टारडम के मायने बदल गये हैं. दरअसल, अब वह सम्मान कलाकारों को नहीं मिलता. हम बातचीत में भी कलाकारों का नाम इस तरह तुम ताम कह कर पुकारते हैं. जैसे वह हमारे दोस्त हों. हाल ही में दुर्गापुर में प्रियंका चोपड़ा गयी थीं. जहां, भीड़ इस तरह अनियंत्रित हो गयी कि सेक्योरिटी को वहां से प्रियंका को किसी तरह निकालना पड़ा. आज स्टारडम के मायने किसी फैन के लिए किसी कलाकार के साथ महज तसवीर खीच लेने भर की है. अपने मोबाइल कैमरे में उनकी छोटी सी झलक भी कैद हो जाये तो वह इससे तसल्ली कर लेते हैं. इसकी बड़ी वजह यह है कि हमें लगता है कि कलाकार कुछ है ही नहीं. हाल ही में जब लंचबॉक्स की अभिनेत्री निमरत कौर से बात हो रही थी उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि उन्हें लगता है कि एक्टर वे लोग होते हैं, जो दुनिया से वाकई जुदा होते हंै. कुछ तो ऐसी बात होती है जो एक्टर जानते हैं. पूरी दुनिया नहीं जानती. शायद इसलिए वह अभिनेता है.लेकिन हम इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते. इसकी बड़ी वजह यह है कि आज हर कोई अभिनेता बन जाता है. हर कोई गायक बन जाता है और उनका दिखावा दो पल में ही खत्म हो जाता है. सो, दर्शक उन्हें वह सम्मान नहीं दे पाते. 

शाहरुख को काम से मारूंगा : सलमान

बिग बॉस के प्रतिभागी तो चर्चा में रहते ही हैं, मगर सबसे अधिक लाइमलाइट में रहते हैं शो के होस्ट सलमान खान.‘दबंग खान’ का इस शो से जुड.ना भी शो की लोकप्रियता की खास वजह है. बिग बॉस सीजन सात व अपनी फिल्मों के बारे में सलमान खान ने अनुप्रिया और उर्मिला से खास बातचीत की.
बिग बॉस के प्रतिभागी तो चर्चा में रहते ही हैं, मगर सबसे अधिक लाइमलाइट में रहते हैं शो के होस्ट सलमान खान.‘दबंग खान’ का इस शो से जुड.ना भी शो की लोकप्रियता की खास वजह है. बिग बॉस सीजन सात व अपनी फिल्मों के बारे में सलमान खान ने अनुप्रिया और उर्मिला से खास बातचीत की.

सलमान, बिग बॉस से आप लगातार चार सीजन से जुडे. रहे हैं. क्या खास वजह है कि यह शो आपको पसंद आता है?

मुझे लगता है कि बिग बॉस को दर्शक काफी पसंद करते हैं. यह काफी लोकप्रिय शो है. सबसे खास बात जो मुझे इस शो की नजर आती है, वह यह है कि शो में सभी वैसे चेहरों से परदा उठता है, जो खुद को हमेशा गुडी-गुडी दिखाने की कोशिश करते हैं. 

इस बार एंजिल और डेविल जैसे कांसेप्ट क्यों रखे गये? 

यह कलर्स की क्रिएटिव टीम की सोच है. मुझे भी यह कांसेप्ट पसंद आया. मुझे लगता है कि हर किसी व्यक्ति का दो चेहरा होता है. एक जब वह अच्छा-अच्छा होता है, और दूसरा जब उसका दिल बुरा हो जाता है और किसी के लिए बुरा-बुरा करने लगता है. जहत्रुम और जत्रत दोनों इस धरती पर ही हैं.मुझे लगता है कि बिग बॉस जैसे शो से बेहतर कोई शो नहीं होगा, जिसमें किसी व्यक्ति के एक ही साथ ये दोनों रूप देख लिए जाएं. 

आपकी नजर में इस शो की लोकप्रियता की क्या वजह है?

एक वजह तो यह है कि लोगों को दूसरे के घरों के झगडे. देखने में मजा आता है. यहां तो बात सेलिब्रिटीज की हो रही होती है, तो उन्हें और ज्यादा मजा आता है. दूसरी बात यह है कि बिग बॉस एक कोचिंग क्लास की तरह है. तीन महीने का वर्कशॉप भी कह सकते हैं आप इसे. मुझे लगता है जो बिग बॉस के घर में एडजस्ट करना सीख जाये. वह कहीं भी, किसी भी हालत में एडजस्ट कर सकता है. 

आपकी जिंदगी के आउ और वाउ फैक्टर क्या-क्या हैं?

मुझे लगता है कि मेरी जिंदगी में कुछ भी आउ फैक्टर नहीं. जो कुछ बुरा भी हुआ तो वह सब समय के साथ बदल गया. सबकुछ सुधर जाता है. उसमें भी ऊपरवाले ने मेरे लिए कुछ अच्छा ही सोच रखा होगा, इसलिए उस बारे में बहुत ज्यादा नहीं सोचता. वाउ फैक्टर की बात करूं तो मेरी जिंदगी में लगभग सब वाउ-वाउ ही रहा है. अच्छे दोस्त हैं, अच्छी फैमिली है. सभी साथ में है, इससे अधिक क्या चाहिए.

अगरवास्तविक जिंदगी की बात करें, तो आप किसके बिग बॉस बनना चाहेंगे या बिग बॉस हैं?

मैं अपने दिल की ही सुन लूं न, तो बहुत है. मैं किसी के कहे पर नहीं चल सकता. मैं अपने दिल का बिग बॉस हूं. हां, मगर पापा मेरे बिग बॉस हैं और मॉम भी, क्योंकि उनकी बातों को मैं टाल नहीं सकता.

हम जानते हैं, आपको यह सवाल पसंद नहीं आयेगा. लेकिन फिर भी सभी जानना चाहते हैं, कि आप शादी कब करेंगे?

शादी मेरे हाथों की चीज नहीं है. वह ऊपरवाला ही बनाता है. कई बार ऐसी परिस्थितियां बनी, कि मेरी शादी होनेवाली है, लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते सब बदल जाता है.इस सवाल का जवाब मैं कैसे दे सकता हूं. जब शादी होगी तो पता चल ही जायेगा.

आपकी आनेवाली फिल्म का नाम क्या आजाद है?

नहीं, फिलहाल सिर्फ टेंटेटिव नाम मेंटल रखा गया है.

आपको अपना कौन-सा रूप पसंद है. डेविल या एंजिल का?

मैं हूं तो एंजिल, लेकिन आप सभी पत्रकार मुझे डेविल बना देते हैं. आपको सिर्फ मेरे अंदर का डेविल ही नजर आता है. सिर्फबुरी बातें ही लिखते हैं, तो वही सही.

आप टेलीविजन शोज देखते हैं ?

हां, मेरी मां बहुत टीवी देखती हैं और मुझे भी मजा आता है, उनके साथ टीवी देखने में. वह जो-जो देखती हैं, मैं भी देख लेता हूं. मेरी मां को ‘मधुबाला’ शो बहुत पसंद है. शो में जो एक्ट्रेस हैं द्रष्टि, उसे मां पसंद करती है. 

‘किक’ को कब किक मिलेगी?

बस, जल्द ही शूटिंग शुरू होगी.

हाल ही में आप ईद के मौके पर शाहरुख के गले लगे?

हां, वह रमजान का महीना था. अगर मैं वैसा नहीं करता, तो मैं ह्यूमन (इनसान) नहीं कहलाता. अगर मुझे यह दिखाना ही है, कि कौन नंबर वन है, तो मैं काम से दिखाऊंगा. अभी जैसे शाहरुख ने मुझे काम से मारा है, अपनी फिल्म हिट करा कर. मैं भी उसे काम से मारूंगा, न कि दुश्मनी और एक दूसरे को कोई बात कह कर. कोशिश करूंगा कि मेरी फिल्म भी अच्छी बने और उसका (शाहरुख) रिकॉर्ड तोडे..सलमान, बिग बॉस से आप लगातार चार सीजन से जुडे. रहे हैं. क्या खास वजह है कि यह शो आपको पसंद आता है?

मुझे लगता है कि बिग बॉस को दर्शक काफी पसंद करते हैं. यह काफी लोकप्रिय शो है. सबसे खास बात जो मुझे इस शो की नजर आती है, वह यह है कि शो में सभी वैसे चेहरों से परदा उठता है, जो खुद को हमेशा गुडी-गुडी दिखाने की कोशिश करते हैं. 

इस बार एंजिल और डेविल जैसे कांसेप्ट क्यों रखे गये? 

यह कलर्स की क्रिएटिव टीम की सोच है. मुझे भी यह कांसेप्ट पसंद आया. मुझे लगता है कि हर किसी व्यक्ति का दो चेहरा होता है. एक जब वह अच्छा-अच्छा होता है, और दूसरा जब उसका दिल बुरा हो जाता है और किसी के लिए बुरा-बुरा करने लगता है. जहत्रुम और जत्रत दोनों इस धरती पर ही हैं.मुझे लगता है कि बिग बॉस जैसे शो से बेहतर कोई शो नहीं होगा, जिसमें किसी व्यक्ति के एक ही साथ ये दोनों रूप देख लिए जाएं. 

आपकी नजर में इस शो की लोकप्रियता की क्या वजह है?

एक वजह तो यह है कि लोगों को दूसरे के घरों के झगडे. देखने में मजा आता है. यहां तो बात सेलिब्रिटीज की हो रही होती है, तो उन्हें और ज्यादा मजा आता है. दूसरी बात यह है कि बिग बॉस एक कोचिंग क्लास की तरह है. तीन महीने का वर्कशॉप भी कह सकते हैं आप इसे. मुझे लगता है जो बिग बॉस के घर में एडजस्ट करना सीख जाये. वह कहीं भी, किसी भी हालत में एडजस्ट कर सकता है. 

आपकी जिंदगी के आउ और वाउ फैक्टर क्या-क्या हैं?

मुझे लगता है कि मेरी जिंदगी में कुछ भी आउ फैक्टर नहीं. जो कुछ बुरा भी हुआ तो वह सब समय के साथ बदल गया. सबकुछ सुधर जाता है. उसमें भी ऊपरवाले ने मेरे लिए कुछ अच्छा ही सोच रखा होगा, इसलिए उस बारे में बहुत ज्यादा नहीं सोचता. वाउ फैक्टर की बात करूं तो मेरी जिंदगी में लगभग सब वाउ-वाउ ही रहा है. अच्छे दोस्त हैं, अच्छी फैमिली है. सभी साथ में है, इससे अधिक क्या चाहिए.

अगरवास्तविक जिंदगी की बात करें, तो आप किसके बिग बॉस बनना चाहेंगे या बिग बॉस हैं?

मैं अपने दिल की ही सुन लूं न, तो बहुत है. मैं किसी के कहे पर नहीं चल सकता. मैं अपने दिल का बिग बॉस हूं. हां, मगर पापा मेरे बिग बॉस हैं और मॉम भी, क्योंकि उनकी बातों को मैं टाल नहीं सकता.

हम जानते हैं, आपको यह सवाल पसंद नहीं आयेगा. लेकिन फिर भी सभी जानना चाहते हैं, कि आप शादी कब करेंगे?

शादी मेरे हाथों की चीज नहीं है. वह ऊपरवाला ही बनाता है. कई बार ऐसी परिस्थितियां बनी, कि मेरी शादी होनेवाली है, लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते सब बदल जाता है.इस सवाल का जवाब मैं कैसे दे सकता हूं. जब शादी होगी तो पता चल ही जायेगा.

आपकी आनेवाली फिल्म का नाम क्या आजाद है?

नहीं, फिलहाल सिर्फ टेंटेटिव नाम मेंटल रखा गया है.

आपको अपना कौन-सा रूप पसंद है. डेविल या एंजिल का?

मैं हूं तो एंजिल, लेकिन आप सभी पत्रकार मुझे डेविल बना देते हैं. आपको सिर्फ मेरे अंदर का डेविल ही नजर आता है. सिर्फबुरी बातें ही लिखते हैं, तो वही सही.

आप टेलीविजन शोज देखते हैं ?

हां, मेरी मां बहुत टीवी देखती हैं और मुझे भी मजा आता है, उनके साथ टीवी देखने में. वह जो-जो देखती हैं, मैं भी देख लेता हूं. मेरी मां को ‘मधुबाला’ शो बहुत पसंद है. शो में जो एक्ट्रेस हैं द्रष्टि, उसे मां पसंद करती है. 

‘किक’ को कब किक मिलेगी?

बस, जल्द ही शूटिंग शुरू होगी.

हाल ही में आप ईद के मौके पर शाहरुख के गले लगे?

हां, वह रमजान का महीना था. अगर मैं वैसा नहीं करता, तो मैं ह्यूमन (इनसान) नहीं कहलाता. अगर मुझे यह दिखाना ही है, कि कौन नंबर वन है, तो मैं काम से दिखाऊंगा. अभी जैसे शाहरुख ने मुझे काम से मारा है, अपनी फिल्म हिट करा कर. मैं भी उसे काम से मारूंगा, न कि दुश्मनी और एक दूसरे को कोई बात कह कर. कोशिश करूंगा कि मेरी फिल्म भी अच्छी बने और उसका (शाहरुख) रिकॉर्ड तोडे.

स्टाइल के साथ पसंद है एक्सपेरिमेंट : नीरुषा

टेलीविजन की दुनिया में नीरुषा निखत ने एक छोटी शुरुआत की थी, लेकिन आज टेलीवुड की कॉस्टयूम की दुनिया में वह सबसे बड.ा नाम हैं. कैसे तय किया उन्होंने यह सफर. कॉस्टयूम स्टाइलिश नीरुषा ने अनुप्रिया से बातचीत की.
टेलीविजन की दुनिया में नीरुषा निखत ने एक छोटी शुरुआत की थी, लेकिन आज टेलीवुड की कॉस्टयूम की दुनिया में वह सबसे बड.ा नाम हैं. कैसे तय किया उन्होंने यह सफर. कॉस्टयूम स्टाइलिश नीरुषा ने अनुप्रिया से बातचीत की.\

हातिम से हातिम तक का सफर : मैं वर्ष 2000 में इस इंडस्ट्री में आयी थी. उस वक्त मेरा लक्ष्य अस्टिेंट डायरेक्टर बनना था. मैंने शुरुआत की ‘हातिम’ नामक शो से. अब यह इत्तेफाक ही है कि आगामी नवंबर में हातिम नामक शो फिर से शुरू हो रहा है और मैं इस शो का भी हिस्सा हूं. मेरे लिए ये 13 साल की जर्नी हातिम से हातिम तक का सफर है. मैं जब हातिम में काम कर रही थी, तो वहां मैंने कॉस्टयूम पर काफी काम किया था. मैंने देखा कि टेलीवुड में कॉस्टयूम को ले कर वह सजगता नहीं है, जबकि स्टाइलिंग की यहां भी जरूरत है. धीरे-धीरे मैंने अपना फ्रीलांस का काम शुरू किया. कई छोटे कोर्स किये. पैशन था. सो, काम करती गयी. पहली बार मुझे आशुतोष राणा के कपडे. डिजाइन करने का मौका मिला.लोगों को काम पसंद आया. फिर तो सिलसिला ही शुरू हो गया. 

टीवी के साथ परेशानी :टीवी में स्टाइलिंग करना एक कठिन काम इसलिए है, कि यहां टाइम की पाबंदी होती है. आपको अच्छे-से-अच्छा काम कम समय में करके देना होता है. दूसरी बात यह है कि यहां की अभिनेत्री को अगर कहो कि तुम चॉल में रहनेवाली महिला के किरदार में हो और वैसे ही कपडे. पहनो, तो वह कई बार नखरें दिखाती हैं. फिल्मों में ऐसा नहीं होता. फिल्मों में लुक को महत्व देते हैं, लेकिन टीवी में ऐसा नहीं होता. स्टाइल का मतलब सिर्फ कपडे. पहनना नहीं. कपडे. किस मटेरियल से बने हैं, उन्हें किसको पहनना है. कितनी बारीकी है. यह सब मायने रखता है.

सबसे आकर्षक पर्सनैलिटी :मुझे अनिल कपूर और सोनाक्षी स्टाइलिश लगते हैं. सोनम कपूर बहुत सारे एक्सपेरिमेंट करती हैं, इसलिए वह भी मुझे बेहद पसंद है. मैं भी स्टाइलिंग के साथ एक्सपेरिमेंट करना पसंद करती हूं.

भारतीय संस्कृति है पसंद :मुझे भारतीय संस्कृति बहुत पसंद है. पूरी दुनिया हमें कॉपी करती है. फिर हम उन्हें कॉपी क्यों करें, इसलिए आप देखेंगे कि मेरे कपड.ों में कॉस्टयूम में इंडियन टच सबसे ज्यादा होता है

हो सकता है आॅडियंस फिल्म देख कर मुझे चाटा मारे : रणबीर कपूर


रणबीर कभी बर्फी तो कभी बदतमीज तो कभी बेशरम बन जाते हैं. हिंदी सिनेमा के वे फिलवक्त सबसे लोकप्रिय सितारा हैं, जिन्हें लगभग हर वर्ग के दर्शक पसंद कर रहे हैं. इस बार वे कॉमेडी लेकर दर्शकों से रूबरू हो रहे हैं. फिल्म बेशरम व अपने जिंदगी के कई पहलुओं पर उन्होंने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की

रणबीर कभी बदतमीज तो कभी बेशरम...क्या कोई स्ट्रेजी तैयार की है. इस साल के लिए ऐसे शीर्षक वाली फिल्में करनी हैं?
नहीं, नहीं. ये तो बिल्कुल इत्तेफाक की बात है. कि ये जवानी है दीवानी में बदतमीज गाना इतना पॉपुलर हो गया. अभी जो फिल्म आ रही है बेशरम. इसमें ऐसा नहीं है कि हम कपड़े उतार कर दिखाना चाहते हैं कि देखो ये बेशरम बल्कि इस फिल्म में हम दिखा रहे हैं. वो पुरानी कहावत है न...कुछ तो लोग कहेंगे, हम इतनी चिंता करते हैं कि अरे ये करेंगे तो क्या कहेंगे लोग़. तो हम फिल्म में दिखा रहे हैं कि बेशरम बनो. सुनो सबकी करो अपने मन की.आपके अंदर क्या सही है क्या गलत है. यह सिर्फ आपको पता होना चाहिए की फिलॉसफी सिर्फ यही है कि कोई भी गलत काम करने का कोई सही तरीका नहीं होता. पर्सनली मुझे इस तरह के टाइटिल बहुत पसंद हैं,क्योंकि कुछ 15 साल के बाद लोग एक्टर को तो भूल जाते हैं. लेकिन उन्हें टाइटिल याद रहते हैं. जैसे अभी भी जब अमिताभ बच्चन शंहशाह के रूप में जाने जाते हैं. शाहरुख खान बादशाह माने जाते हैं. सलमान खान दबंग करते हैं तो एसे टाइटिल उनके साथ भी छप जाते हैं. तो लोग कहते हैं दबंग सलमान खान, बाजीगर शाहरुख खान तो आइ डोंट माइंड अगर लोग मुझे बेशरम रणबीर कपूर कहें. बेशरम से जुड़ने की वजह यही रही कि अभिनव मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आये थे तो उन्होंने साफ किया कि वह कोई प्रवचन नहीं देना चाहते. इस फिल्म से. हल्की फुल्की एंटरटेनमेंट फिल्म है. सिंपल और फन लविंग स्क्रिप्ट लगी तो मैंने चुन लिया. मैंने अब तक जितने कैरेक्टर किये हैं. उससे यह अलग था. बेशरम का कैरेक्टर लाउड है, वल्गर है.मैंने एक्सपेरिमेंट किया है. जैसे मैंने बर्फी में किया अपनी बाकी फिल्मों में किया. हो सकता है कि आॅडियंस इस फिल्म को देख कर मुझे चांटे भी लगाये. लेकिन मैं अगर ट्राइ नहीं करूंगा.तो मुझे नहीं पता चल पायेगा कि ऐसी फिल्मों में मेरा कनविक् शन है कि नहीं. फिल्म में मेैं कार चोर हूं.
लेकिन क्या रणबीर रियल लाइफ में भी बेशरम हैं. जैसा कि आपने कहा कि आपके लिए बेशरम का मतलब बिंदासपन है?
रियल लाइफ में तो मुझे बहुत शर्म आती है. तो मुझे कैमरे के सामने मौका मिलता है कि मैं कुछ बेशर्मी कर पाऊं. मैंने अपनी पहली फिल्म में ही अपना टॉवल गिरा दिया था.उससे बड़ा कोई बेशरम हो ही नहीं सकता. मेरे ख्याल से एक एक्टर का बेशरम होना बेहद जरूरी है क्योंकि एक आॅडियंस के सामने आप अपने रियल इमोशन को पेश करें. पेन है. दर्द है. खुशी है दुखी है. तो यह बहुत जरूरी है कि आप बेशरम बन कर सबकुछ भूल कर एक्ट करो कैमरे के सामने. वरना वह कैमरा सबकुछ पकड़ता है. तो मेरा मानना है कि मैं रियल लाइफ में रिजर्व रहता हूं ताकि कैमरे के सामने उसे निकाल सकूं.
बचपन में कभी चोरी की है आपने?
जब मैं छोटा था तो मैंने चॉकलेट चोरी की थी. एक बार तो बहुत डांट पड़ी थी. उसके बाद कभी चोरी नहीं की.
आपकी वास्तविक जिंदगी में कभी किसी ने आपको बेशरम की उपाधि दी है?
हां, दी है न मेरी टीचर ने और मेरी मॉम ने. मैं जब बहुत छोटा था. तो मेरी क्लास टीचर स्कर्ट पहनती थी. तो मां बताती है कि मैं उनकी स्कर्ट के नीचे देखता था. अब मुझे पता नहीं क्यों देखता था. लेकिन मुझे उनके पैर शायद अच्छे लगते होंगे. तो मेरी मैम ने मेरी मां से मेरी शिकायत की थी कि आपका बेटा बहुत बेशर्म है और वह मेरी स्कर्ट के नीचे झांकता है. उस वक्त मां से डांट पड़ी थी. मां ने गुस्से में कहा था बेशरम ऐसी हरकत फिर मत करना.
इस फिल्म में आपने अपने माता पिता के साथ अभिनय किया है. कैसा रहा अनुभव क्या ऋषि या नीतू आपसे अपने दौर की शूटिंग की यादें शेयर करते थे?
बहुत अच्छा अभिनय रहा. पापा मेरे सबसे फेवरिट कलाकार हैं. मैं तो हमेशा उन्हें कॉपी करता आया हूं, कभी उनके गाने तो कभी कपड़े. इस फिल्म में तो मैंने उन्हें बतौर एक्टर गालियां दी है. मोटू कहा है. लेकिन मेरे माता पिता की आदत है. वह काम को घर और घर को काम पर हावी नहीं होने देते. सेट पर हम प्रोफेशनल तरीके से काम करते थे. हां, पापा यह जरूर बताते थे कि कैसे सेट पर लोग पहले काम किया करते थे. क्या माहौल था. गाने कैसे होते थे. मेलॉडी कैसे होती थी. सभी एक्टर्स कैसे दोस्त होते थे. उन्होंने फिल्म अमर अकबर एंथनी के बारे में इस फिल्म की शूटिंग में काफी बात की क्योंकि ये भी अमर अकबर एंथनी के जॉनर की ही फिल्म है कि क्लाइमेक्स जो अमर अकबर एंथनी विलेन को ढूंढ रहे हैं. खुद तीनों उधर गा रहे हैं अमर अकबर एंथनी...
इस फिल्म की क्या यादें हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगी?
एक रिश्ता जो अभिनव के साथ बना.  पहली फिल्म जिसमें ऋषि कपूर के साथ एक्ट करने का मौका मिला. दस साल बाद जब शायद मेरे बच्चे होंगे तो इस फिल्म को लेकर मैं उन्हें गर्व से दिखाऊंगा. क्योंकि वे अपने पापा और दादा दादी को साथ में फिल्म में देखेंगे.
आप लोगों के लिए सुपरस्टार बन चुके हैं. लेकिन आप खुद को सुपरस्टार नहीं मानते हैं तो आपके लिए आखिर सुपरस्टार की क्या परिभाषा है.आप खुद को किस मुकाम पर देखना चाहते हैं?
मेरी दादी मुझे बताती हैं कि जब दादाजी यानी राज कपूर और नरगिस आंटी की फिल्म आवारा को रशिया में लोगों ने उनकी फिल्म आवारा देखी और वो लोग बाहर आये थियेटर से. उन्होंने सभी फैन से खूब बातें की. हाथ हिलाया. और फिर जब वह गाड़ी में बैठे. तो ये मेरी दादी ने मुझे बताया था कि रशियन ने गाड़ी को उठाया और वे चल कर गाड़ी को लेकर होटल तक गये. तो स्टारडम वो होता है. वो रिस्पेक्ट कमाना चाहता हूं और एक बार जब मैं कॉफी शॉप में बैठा था, उस वक्त एक्टर नहीं था. कॉफी शॉप में काफी लोग थे और वहां से लता मंगेशकर जी गुजर रही थीं. तो मैंन देखा कि  वहां बैठे सभी लोग खड़े हो गये. कुछ कहा नहीं वह रिस्पेक्ट के नाते सिर झुकाया. मेरे ख्याल से वह स्टारडम होता है. वह मुकाम हासिल करना चाहता हूं.
क्या आपको लगता है कि आज के दौर में वह स्टारडम का दौर मुमकिन है?
हां, मैं मानता हूं कि जो लास्ट स्टारडम का दौर देखा है. वह खानों ने देखा है. अमिताभ बच्चन ने देखा है. जब अमिताभ यंग थे तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि इस उम्र में भी उन्हें वह स्ट
ारडम मिलेगा. तो हम सब मेहनत से काम करेंगे. तो देखें क्या होता है. हां, यह जरूर है कि उस वक्त का स्टारडम अलग तरह का स्टारडम होगा.
ऐसे कुछ किरदार जिसे करने की अब भी आपकी इच्छा बाकी है?
हां, मैं नेगेटिव किरदार निभाना चाहता हूं. मुझे अच्छा लगता है कि मैं नेगेटिव किरदार में भी नजर आऊं.
खाली समय में क्या करना पसंद है?
मुझे फुटबॉल खेलना पसंद है. मुझे फिल्में देखना पसंद करता हूं. मैं वीडियोगेम खेलता हूं. लेकिन सबसे ज्यादा अच्छा लगता है. जब फिल्म सेट पर होता हूं. अच्छे डायरेक्टर्स के साथ काम कर रहा होता हूं तो. बहुत मजे लेकर काम करते हैं.

हिंदी फिल्मों की नयी


मां पदमीणी कोल्हापुरी ने लंबे अरसे के बाद फिल्मी परदे पर वापसी की है. वे फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो में शाहिद कपूर की मां के किरदार में है. हालांकि उन्होंने फिल्म माइ में छोटी सी भूमिका निभायी. लेकिन फटा पोस्टर में  उन्हें अच्छी भूमिका निभानेa का मौका मिला है. वे इस फिल्म में आॅटो रिक् शा चालिका की भूमिका में हैं. पदमीणी की उपस्थिति परदे पर निखर कर आती है. वे जिस तरह अपने हाव भाव और बॉडी जेश्चर का इस्तेमाल करती हैं. वह बहुत स्वभाविक नजर आती हैं. वे आज भी पहले की तरह ही सहज अभिनय करती हंै. पदमीणी कोल्हापुरी ने अपने करियर की शुरुआत बाल कलाकार के रूप में ही कर दी थी. वे लंबे अरसे से इस जगत का हिस्सा रही हैं और शायद यही वजह है कि लंबे ब्रेक के बाद भी जब वह परदे पर नजर आती हैं तो सशक्त रूप में नजर आती हैं. हिंदी सिनेमा में जिस तरह पहले केवल मां के रूप में गिने चुने चेहरे नजर आते थे. लेकिन अब हिंदी फिल्मों में पुराने दौर की लोकप्रिय अभिनेत्रियों को भी शामिल किया जा रहा है. निस्संदेह उन्हें देखना परदे पर अच्छा लगता है. और इस तरह अन्य निर्देशकों को भी उन अभिनेत्रियों को परदे पर लाना चाहिए. लेकिन केवल नाम के दृश्यों के लिए नहीं. उन्हें सशक्त भूमिकाएं दी जायें. राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्मों से वहीदा रहमान को बार बार अलग अलग रूपों में दर्शाया है. कुछ इसी तरह पुराने जमाने की अच्छी अभिनेत्रियों को केवल नामात्र के लिए नहीं बल्कि अच्छी भूमिकाओं के साथ मौके दिये जाने चाहिए.फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस में कामिनी कौशल जैसी सशक्त अभिनेत्री को केवल दो दृश्यों में शामिल किया गया है. जबकि उन्हें और भी दृश्य मिलते तो फिल्म में जान आती. आशा पारेख, जीनत अमान जैसी अभिनेत्रियों को दर्शक बार बार परदे पर देखना चाहते हैं.

अभिनय किसी पढ.ाई से कम नहीं : निमरत कौर

कैडबरी के विज्ञापन में गुडी-गुडी नजर आनेवाली निमरत कौर पहली बार लीड रोल निभाया है. जिन्होंने भी फिल्म ‘लंचबॉक्स’ देखी है, वह उनका मुरीद हो गया है. बॉलीवुड में अपनी शुरुआत के बारे में निमरत ने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.
कैडबरी के विज्ञापन में गुडी-गुडी नजर आनेवाली निमरत कौर पहली बार लीड रोल निभाया है. जिन्होंने भी फिल्म ‘लंचबॉक्स’ देखी है, वह उनका मुरीद हो गया है. बॉलीवुड में अपनी शुरुआत के बारे में निमरत ने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.
     फिल्मी बैकग्राउंड नहीं रहा

मैं किसी फैमिली बैकग्राउंड से नहीं हूं. मेरे पिताजी आर्मी में थे. ऐसे में मुझे भारत के कई इलाकों में घूम-घूम कर पढ.ने का मौका मिला है. मेरे परिवारवालों ने हमेशा मुझे फिल्मों में आने के लिए सपोर्ट किया. बस उनकी शर्त थी कि मैं पढ.ाई पूरी कर लूं. मैं अरुणाचल प्रदेश, पटियाला, पुणे, कश्मीर सभी जगह रही हूं. मुझे पटियाला बेहद पसंद है. पापा 1994 में हुए टेररिज्म वार में शहीद हुए थे. वह वक्त काफी बुरा था.इसके बाद हम नोएडा चले गये. फिर मैंने वहां पढ.ाई पूरी की. बीकॉम करने के बाद मुंबई आ गयी. 

अभिनय में आना ही था

अभिनय और मॉडलिंग मुझे हमेशा से बेहद पसंद था. मैंने स्टेज से शुरुआत की. मैं मुंबई इसके लिए ही आयी. विद्या बालन को यूफोरिया के एलबम में देखा करती थी. उस वक्त से ही इसमें दिलचस्पी हो गयी थी. मुझे लगा कि वीडियो एलबम से ही शुरुआत करती हूं. मैंने फोटोशूट करवाया. मुझे अभिनय करना था लेकिन फिल्म की वोकेबलरी तक नहीं पता थी. मुझे पहला ब्रेक ‘तेरा मेरा प्यार वाला’ एलबम से मिला.
थियेटर से जुड.ना

मुझे लगा कि अभिनय को समझने के लिए थियेटर से जुड.ना ही होगा, तो मैं उससे जुड. गयी.थियेटर किया. फिर पैसे कमाने के लिए मैं विज्ञापन से भी जुड.ी. मैं चाहती थी कि ग्लैमर की दुनिया में जाने से पहले मैं उसे बारीकी से समझूं. मेरा मानना है कि हर अभिनेता में कुछ न कुछ ऐसी बात होती है, जो उसे सबसे अलग करती है. कुछ एक बात जो सिर्फ वह जानते हैं और कोई नहीं और मुझे वही चीजें, वही बारीकी जाननी और सीखनी थी. मैंने छह सालों में 7-8 प्ले किये.

लंचबॉक्स से बड.ा ब्रेक

मैं किसी बडे. ब्रेक के लिए इंतजार नहीं कर रही थी. मैं प्रोसेस का हिस्सा बनना चाहती थी. मैं बनी भी. मुझे ‘लंचबॉक्स’ से पहले ‘पेडलर’ में काम करने का मौका मिला. वही से ‘लंचबॉक्स’ का रास्ता मिला. मुझे जब रितेश ने फिल्म की कहानी सुनाई, तो मैं खुशी से कूदने लगी थी. कुछ दिनों के बाद रितेश बिल्कुल शांत हो गये तो फिर मुझे लगा कि कहीं मैं बाहर तो नहीं हो गयी.मैंने रितेश से पूछा कि क्या मैं फिल्म में हूं?रितेश ने कहा हां. फिल्म प्यारी सी लव स्टोरी है. लोगों को जरूर पसंद आयेगी. ऐसी लव स्टोरी बहुत कम बनती है. मैंने जैसा किरदार निभाया है, वह कठिन था. लेकिन दिलचस्प था. मुझे ग्लैर्मस रोल नहीं चाहिए.

कलाकार और उनके संस्कार


माधुरी दीक्षित ने हाल ही में अपने पिता को अंतिम विदाई दी. उनके पिता शंकर आर दीक्षित 95 वर्ष के थे. उन्होंने अपनी जिंदगी में समृद्धि देखी. अपने पूरे परिवार को तरक्की करते देखा. माधुरी इस बात से दुखी थी. स्वभाविक है. हर बेटी होती है. लेकिन वह इस बात से संतुष्ट थी कि उनके पिता ने एक समृद्ध जिंदगी जी. उन्होंने अपने पिता के लिए प्रेयर मीटिंग मुंबई के इस्कॉन टेंपल में रखा. जहां उनके चूनिंदा दोस्त आये और शांति से उन्होंने इसका समापन किया. अनुपम खेर ने भी अपने पिता की मृत्यु पर बिना किसी शोर शराबे और दिखावे के शांति से इस्कॉन टैंपल में प्रेयर मीटिंग रखी. स्पष्ट है कि ये कलाकार अपनी जिंदगी की इतनी बड़ी क्षति के दुख का कोई दिखावा नहीं करना चाहते थे. वरना, बॉलीवुड में मातम भी फाइव स्टार होटल में मनाने का प्रचलन है. हिंदी सिनेमा में चूंकि मातम भी किसी छलावे और दिखावे से कम नहीं होता. दरअसल, माधुरी या अनुपम खेर या अमिताभ जैसे कलाकारों ने  अपने माता पिता को केवल शारीरिक रूप से जिंदगी शामिल नहीं कर रखा था. अनुपम बताते हैं कि जब वह फेल हुए थे तो किस तरह उनके पिता ने जश्न मनाया था. क्योंकि वे मानते थे कि असफलता सफलता की पहली सीढ़ी है. माधुरी को उनके पिता ने हमेशा प्रेरित किया कि वे संगीत के क्षेत्र में भी आगे बढ़ें. माधुरी आज भी भारतीय परिवार के हर वर्ग के दर्शक के लिए प्रेरणा है. चूंकि उन्हें वह मान सम्मान मिलता है. सबको लगता है कि वह काफी सांस्कारिक हैं. अमिताभ बच्चन हमेशा अपने पिता की कविताओं को और उनके मूल्यों को जिंदगी में शामिल करते रहे हैं. एक विज्ञापन में उन्होंने बिल्कुल सही बात दर्शाने की कोशिश की है कि मां बाप कहीं नहीं जाते. वे आपके साथ होते हैं. अगर आप उन्हें अपने साथ रखना चाहें तो. फिर चाहे वह किसी भी रूप में हों

हिंदी सिनेमा के दर्शक


चेन्नई एक्सप्रेस समीक्षकों की उम्मीद पर खरी नहीं उतरी. लेकिन दर्शकों ने उसे भारत में हिंदी की सबसे बड़ी फिल्म बना दिया. फिल्म ग्रैंड मस्ती को भी समीक्षकों ने जम कर लथाड़ा. कई समीक्षकों ने तो यहां तक लिख दिया कि फिल्म की समीक्षा होनी भी नहीं चाहिए. िफल्म इतनी बुरी है. लेकिन फिल्म को जबरदस्त ओपनिंग मिली है. स्पष्ट है कि हिंदी सिनेमा के दर्शक को आप प्रीडिट नहीं कर सकते. आप सिर्फ अनुमान के आधार पर किसी फिल्म की सफलता या असफलता की घोषणा नहीं कर सकते. पहले हिंदी सिनेमा जगत में ज्योतिष विद्या और ट्रेड पंडितों द्वारा भविष्यवाणी करने का ट्रें्ड काफी लोकप्रिय था. लेकिन अब वह दौर नहीं. अब दर्शकों को समझना, उनकी मानसिकता को समझना और फिर अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है. दरअसल, हकीकत यही है कि फिल्में हर किसी की निजी दुनिया है. आपके साथ आपकी बगल की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को जो फिल्म पसंद आयेगी. मुमकिन हो कि आपको वह पसंद न आये. जब हम थियेटर में सीमित आबादी में यह अनुमान नहीं लगा पाते कि फिल्म किसको पसंद आयी. किसे नहीं तो फिर हम सभी दर्शकों के दिलों को कैसे भांप सकते हैं. आज भी हिंदी सिनेमा में फिल्में फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का चलन है. आज भी दर्शक अपने स्टार्स की फिल्में देखते हैं. ग्रैंड मस्ती में एडल्ट कॉमेडी है. फिल्म ने सारी हदें पार कर दी है. लेकिन फिर भी फिल्म को लोकप्रियता मिल रही हैं. जिस दिन रागिनी एमएमएस2 का ट्रेलर लांच हुआ. उसी दिन अगली का ट्रेलर भी लांच हुआ. लेकिन रागिनी एमएमएस 2 तो इंटरनेट पर भी हिट है. तो, फिर ऐसे में किसी फिल्म मेकर पर दोष मढ़ना कहां तक उचित है कि फिल्म मेकर  अच्छी फिल्में नहीं बना रहे. सच तो यह है कि दर्शक भी बुरी फिल्में देखना पसंद करते हैं और उन्हें सपोर्ट करते हैं.

स्टार्स व उनके होम प्रोडक् शन


 ऋतिक रोशन की फिल्म कृष 3 रिलीज हो रही है और वह इन दिनों मीडिया से खूब बातें कर रहे हैं. शाहरुख खान ने अपने होम प्रोडक् शन की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस को जम कर प्रोेमोट किया. सलमान खान दबंग की रिलीज के वक्त मीडिया से खूब रूबरू हो रहे थे. अमिताभ बच्चन ने पा फिल्म की रिलीज के वक्त प्रत्येक मीडिया हाउस के प्रतिनिधि को बकायदा घर पर आमंत्रित किया था और बातचीत की थी. बाद में सभी को उन्होंने थैंक्स का पत्र भी भेजा.अजय देवगन भी पहले मीडिया से खास बातचीत नहीं करते थे. लेकिन सन आॅफ सरदार के वक्त उन्होंने मीडिया से खूब बातें करनी सीखी और अब वह खुल कर अपनी फिल्मों पर बातें करने लगे हैं. हाल ही में सत्याग्रह के दौरान वे प्रकाश झा के साथ पूरी तरह से साथ खड़े नजर आये और मीडिया के सारे वार को उन्होंने साथ साथ झेला. दरअसल, हकीकत यह है कि बॉलीवुड में यह ट्रेंड है कि बॉलीवुड के स्टार्स अपनी होम प्रोडक् शन की फिल्म को खास तवज्जो देते हैं. वे मानते हैं कि अपनी फिल्मों की रिलीज के दौरान वे जिस कदर मीडिया से बर्ताव करेंगे. उसका उनकी फिल्म पर सीधा असर होगा. मीडिया वालों के लिए स्टार्स की होम प्रोडक् शन फिल्म की रिलीज खुशियों की सौगात लाती है. चूंकि उन्हें स्टास से बातचीत के कई मौके मिल जाते हैं. वरना, शेष वक्त वे मीडिया से सिर्फ औपचारिकता से ही बात करते हैं. स्पष्ट है कि वे भी मीडिया को प्रचार के माध्यम के रूप में ही इस्तेमाल करते हैं और मीडिया भी पुरानी फिल्मों में किये गये उनके बुरे बर्ताव को भूल जाती है. और फिर से उनसे बात करने लगती है.स्टार्स भी पत्रकारों के इस स्वभाव के बारे में जानते हैं और इसलिए वे जरूरत के मुताबिक ही उनका इस्तेमाल करते हैं. यह सिलसिला बरकरार जारी है और आनेवाले समय में और बढ़ेगा.

फिल्म ऐसी हो जो थियेटर से आपके साथ बाहर आये


इरफान खान जब भी परदे पर आते हैं, वे अपनी दमदार भूमिका से सबका दिल जीत लेते हैं. हिंदी सिनेमा में चंद कलाकार ही ऐसे हैं, जो अपनी आंखों से भी अभिनय करते हैं. बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान स्थापित कर चुके इरफान इस बार एक ढलती उम्र के रोमांटिक किरदार में आप सबके लिए 'लंचबॉक्स' लेकर आ रहे हैं. इरफान इस फिल्म के अभिनेता होने के साथ सह निर्माता भी हैं. पेश है अनुप्रिया से हुई बातचीत के मुख्य अंश :
इरफान खान
इरफान खान जब भी परदे पर आते हैं, वे अपनी दमदार भूमिका से सबका दिल जीत लेते हैं. हिंदी सिनेमा में चंद कलाकार ही ऐसे हैं, जो अपनी आंखों से भी अभिनय करते हैं. बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान स्थापित कर चुके इरफान इस बार एक ढलती उम्र के रोमांटिक किरदार में आप सबके लिए "लंचबॉक्स" लेकर आ रहे हैं. इरफान इस फिल्म के अभिनेता होने के साथ सह निर्माता भी हैं. पेश है अनुप्रिया से हुई बातचीत के मुख्य अंश :लंचबॉक्स में एक बार फिर आपका रूमानी अंदाज लोगों के सामने आ रहा है.

मैं खुशनसीब हूं कि लंबे अरसे के बाद मुझे फिर से परदे पर रोमांटिक किरदार निभाने का मौका मिला है. मैं दिल से रुमानी हूं, इसलिए मुझे ऐसे किरदारों को निभाने में काफी मजा आता है.

लंचबॉक्स से जुड़ने की क्या खास वजहें रहीं?

मैं चाहता हूं कि मैं वैसी फिल्में करूं, जो आपके साथ थियेटर से बाहर आये, वहीं न रह जाये. वह आपके दिलो-दिमाग पर छाये. आपके साथ रहे. लंचबॉक्स एक ऐसी ही प्यारी-सी कहानी है. कई बार हम जो फिल्म देखते हैं, उसके किरदार हमेशा याद रहते हैं. हमारे साथ चलते रहते हैं. कहानी याद आती है. इमोशन याद आते हैं. लंचबॉक्स के साथ भी ऐसा ही है, और यही बात मुझे प्रभावित कर गयी. मैं चाहता हूं कि लोगों का मेरी कहानियों से रिश्ता बन जाये. जैसे, जब तिग्मांशु ने लाइफ ऑफ पाइ देखी तो कहा कि यार, ये फिल्म बाद में भी मुझसे बात करती है. यही तो इफेक्ट है न फिल्म का.

कान फिल्मोत्सव में लंचबॉक्स को काफी सराहना मिली. इस पर आपकी प्रतिक्रिया?

हां, हम सभी इस बात से काफी खुश हैं. सबसे इंटरेस्टिंग बात यह रही कि कान में जब लंचबॉक्स की पहली स्क्रीनिंग रखी गयी थी, तो लोग उठ कर जाने लगे थे. इस पर फिल्म के निर्देशक रितेश बत्रा काफी अपसेट हो गये कि शायद लोगों को फिल्म पसंद नहीं आ रही है. मगर हमारे फिल्म के फ्रेंच प्रोड्यूसर ने बताया कि वे सभी फिल्म छोड़ कर नहीं जा रहे. वे इसलिए बाहर जा रहे हैं ताकि फिल्म की डीवीडी खरीद लें. कहीं ये खत्म न हो जाये. आपको खुश होना चाहिए कि सभी को फिल्म काफी पसंद आयी है. कान में किसी हिंदी फिल्म के साथ ऐसा पहली बार ऐसा हुआ है, जब उसकी डीवीडी रातों-रात बिक गयी. पिक्चर ऑल ओवर द वर्ल्ड बिकी है. हमारे साथ सबसे बड़ी ट्रेजडी यह थी कि अमेरिका में फिल्म को कौन खरीदेगा? लेकिन खुशी की बात है कि सोनी क्लासिक ने इसे देखा और सराहा. उन्होंने फिल्म के बारे में इतना कुछ सुना था कि हमें ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ा. यह फिल्म ऐसी है, जिसकी यूनिवर्सल लैंग्वेज है, कहीं की भी ऑडियंस इसे देख सकती है. अब हमारी कोशिश यही है कि यह भारत से ऑस्कर के लिए चुनी जाये.

फिल्म की कहानी मुंबई की डब्बा संस्कृति के माध्यम से पहुंची है. लेकिन फिर भी यह पूरे विश्व को अपील कर रही है?

डब्बा तो फिल्म का केवल डिवाइस है. इसकी जगह पर कुछ भी हो सकता था. यह यूनिक सर्विस है, इसलिए चुनी गयी. जैसे मुंबई में डब्बा कल्चर काफी अनुशासन के साथ काम करता है. पुराने जमाने में जैसा था, आज भी ऐसा ही होता है. इसी तरह हमारी कहानी भी आज के रोमांस से थोड़ी अलग रोमांटिक फिल्म है.

जब आपके पास यह कहानी आयी थी. क्या उसी वक्त आपने तय कर लिया था कि आप फिल्म के निर्माता भी बनंेगे?

नहीं, शुरू से नहीं. मैं ऐसी फिल्में प्रोड्यूस करना चाहता हूं जिसकी कहानियों पर आपको भरोसा हो. साथ ही जिन पर आपका कंट्रोल हो. मतलब आप जानते हो कि रिलीज कब होगी. कैसे होगी. लंचबॉक्स के साथ मुझे यह सबकुछ नजर आया. इसकी कहानी, इमोशन, किरदार व कहने का ढंग सभी पसंद आया. तभी फिल्म से जुड़ गया.

क्या हिंदी फिल्म इंडस्ट्री या भारत में ऐसी फिल्मों का मार्केट है?

इस फिल्म का मार्केट पूरी दुनिया है. इस फिल्म की सफलता भारत के बॉक्स ऑफिस की कमायी पर आधारित नहीं होगी. जिस क्वालिटी की यह फिल्म है, इसकी रिकवरी तो पहले ही हो गयी है. इतनी जगहों पर दिखायी गयी है फिल्म. अब तो जो भी आयेगा वह मुनाफा ही होगा. जितने ज्यादा लोगों तक पहुंच जाये, वही सक्सेस होगा. अगर इस फिल्म का सक्सेस आंकना हो, तो पूरे वर्ल्ड का जो बिजनेस होगा, उस आधार पर आंकें. यहां तो दो दिनों की कमाई पर तय करने लगते हैं, कि फिल्म अच्छी है या नहीं

गोरी तेरे गांव में

 करीना कपूर इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्हें पहली बार फिल्म गोरी तेरे प्यार में के बहाने किसी गांव में रहने का मौका मिला.उन्हें गांव की कई बातें बेहद अच्छी लगी कि वहां के लोग काफी सहयोगी मिजाज के होते हैं और वातावरण में काफी ताजगी थी. इससे पहले करीना ने फिल्म रिफ्यूजी में गांव की लड़की का किरदार निभाया था. लेकिन उस वक्त करीना बिल्कुल नयी थीं और शायद उस वक्त उन्हें ये सब खास पसंद न आया हो. चूंकि वे शुरू से ही शहरों में पली बढ़ी हैं. तो निश्चित तौर पर उन्हें शहर के ऐशो आराम से निकल कर कभी किसी गांव में जाने का मौका नहीं मिला होगा. लेकिन इसी फिल्म के बहाने उन्होंने गांव की जिंदगी को जिया है. रणबीर कपूर ने फिल्म रॉकस्टार के दौरान कई वैसी चीजें की, जो उन्होंने पहले कभी नहीं की थी. हालांकि फिल्म में वह दृश्य रखा नहीं गया. लेकिन उन्होंने इम्तियाज अली की इस फिल्म के एक दृश्य के लिए वे ग्वाला भी बने थे. दरअसल, हिंदी सिनेमा में इन दिनों कलाकारों को गांव की जिंदगी जीने का मौका भी इसलिए नहीं मिल पाता. चूंकि या तो गांव की संस्कृति पर फिल्में नहीं बनतीं. या फिर जो बनती हैं उनके सेट मुंबई के स्टूडियो में ही तैयार कर लिये जाते हैं. किसी दौर में मदर इंडिया जैसी फिल्मों में अभिनय करने के बाद सुनील दत्त इस कदर  बड़ौदा के एक  गांव में लोकप्रिय हो गये थे कि बाद में भी सुनील दत्त उन गांवों में जाकर समय बिताया करते थे. जब संजय के बारे में यह खबर आयी थी कि उन्हें जेल होने वाली है. उस पूरे गांव ने दुख जताया था. इन दिनों मुंबई का गांव मुंबई के निकट स्थित वाई है. वही गांव के सेट बनाये जाते हैं और शूटिंग होती है. हिंदी सिनेमा में नया दौर, तीसरी कसम, दो बीघा जमीन जैसे वास्तविक गांव अरसे से नजर नहीं आये. हालांकि पीपली गांव जैसी कुछेक फिल्मों में वास्तविक गांव दिखे हैं. 

साथ का एक रूप ऐसा भी


राकेश रोशन किसी दौर में किराये के घर में रहे थे. उनके पास चूंकि किराये का मकान देने के लिए भी पैसे नहीं थे तो उन्हें उस किराये के मकान से भी निकाल दिया गया था. उस वक्त राकेश रोशन ने तय किया था कि अपनी पहचान खुद बनायेंगे. उन्होंने अपनी पत् नी और ऋतिक-सुनैना को उनके नाना के घर भेज दिया था, लेकिन वे खुद वहां नहीं गये. वे अपने भाई राजेश रोशन के घर गये. इसके बाद उन्होंने अपनी जर्नी शुरू की. और फिर एक मुकाम हासिल किया. इस पूरे क्रम में राकेश को उनकी पत् नी का साथ हमेशा मिला. खुद ऋतिक मानते हैं कि उनके पिता का साथ उनकी मां ने नहीं दिया होता तो शायद आज वे सभी इतने कामयाब नहीं होते. चूंकि उन्होंने बुरे दौर में भी पापा का साथ नहीं छोड़ा था. राखी आज गुलजार के साथ नहीं रहतीं,दोनों में तलाक नहीं हुआ. लेकिन फिर भी दोनों अलग रहते हैं. लेकिन अलग रहते हुए भी दोनों आज भी साथ हैं. आज भी दोनों घंटों फोन पर बातें करते हैं और अपनी जिंदगी की महत्वपूर्ण बातें शेयर करते हैं. अमिताभ बच्चन आज भी किसी हिंदी भाषा को छोड़ कर किसी अन्य भाषा की फिल्म को साइन करने से पहले जया बच्चन से जरूर पूछते हैं. चूंकि अमिताभ जानते हैं कि जया उनसे ज्यादा बुद्धिमान हैं और उन्होंने उनसे ज्यादा फिल्में देख रखी हैं तो उन्हें फिल्मों की काफी समझ है. दरअसल, हिंदी सिने जगत में जहां टूटते रिश्तों की भी कई दास्तां लिखी गयी है. आज भी ऐसे कई उदाहरण हैं, जो तमाम बातों के बावजूद. तमाम मतभेदों के बावजूद सफल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं. जैकी श्राफ कभी भी चॉल से बांद्रा के बड़े से फ्लैट में शिफ्ट नहीं होते. अगर उनकी पत् नी आयशा ने उनसे जिद्द न की होती तो. हिंदी सिनेमा में कई हस्तियां हैं जो अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी पत् नी को देते हैं. और उनका पूरा सम्मान भी करते हैं.

सितारों की छुपी छुपाई


रणबीर कपूर ने इस बारे में स्पष्ट होकर अपनी राय दे दी है कि वे फिलहाल शादी नहीं करने जा रहे हैं. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी औप कट्रीना की निजी तसवीरों का फिल्म के प्रोमोशन से कोई लेना देना नहीं है. लेकिन उन्होंने बातों ही बातों में एक बात दोहरायी कि वे कट्रीना के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं और वह उनकी जिंदगी में काफी स्पेशल हैं.रणबीर की बातों से यह बात साफ झलक रही थी कि वे कट्रीना से मोहब्बत करते हैं और वे रिलेशनशीप में हैं. लेकिन वे इसे स्वीकारना नहीं चाहते. रणबीर पहले अभिनेता नहीं जो ऐसा कर रहे हैं. लगभग हर अभिनेता व अभिनेत्रियों की यही इच्छा होती है कि वे अपना नाम लींकिंग स्टोरी में तो आने दें. लेकिन कमिटेड होना उन्हें पसंद नहीं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म शुद्ध देसी रोमांस देखें तो फिल्म में जो स्थिति रघु गाइड और गायित्री की है. दरअसल, यह फिल्म हिंदी सिनेमा जगत के सच को बयां करती है. फिल्म में जिस तरह रघु या गायत्री किसी बंधन में बंधना नहीं चाहते. कमिटेड नहीं दिखाना चाहते. कुछ इसी तरह हिंदी सिने जगत के सितारे अपने रिलेशनशीप को लेकर हमेशा छुपी छुपाई का खेल खेलते रहते हैं. हालांकि सुशांत सिंह राजपुत व कुछ अभिनेता इन बातों को लेकर हमेशा से स्पष्ट रहे हैं. उनका नाम किसी ने न जुड़े, इसलिए उन्होंने फिल्म की रिलीज के साथ ही यह भी घोषणा की कि वे शादी अंकिता से ही करेंगे. दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी सिनेमा जगत में अब भी स्टार्स यह बात भलिभांति जानते हैं कि उनके लींक अप के चर्चे और अफेयर के चर्चों से उन्हें लोकप्रियता मिलती है. वे हमेशा अखबारों की सुर्खियां बने रहते हैं. और जब यह घोषणा हो जाती है कि वे किसी से प्रेम संबंध में कमिटेड हैं. फिर उनमें लोगों की दिलचस्पी कम हो जाती है. सो, यह छुप्पम छुपाई का खेल जारी रहेगा.

टीवी बनाम फिल्म


एक जानी मानी चर्चित कॉस्टयूम डिजाइनर से हाल ही में मुलाकात हुई. उन्होंने अपनी बातचीत में बताया कि फिल्मो ं में जब अभिनेत्री के लुक की बात आती है और उन्हें कोई ऐसा किरदार निभाना होता है, जिसमें उन्हें सामान्य दिखना है तो वे अभिनेत्रियां सस्ते कपड़े पहने के लिए भी तैयार हो जाती हैं. लेकिन टीवी में अभिनेत्रियां अपने लुक से अधिक कपड़े को महत्व देती हैं. जैसे सोनाक्षी सिन्हा ने फिल्म लुटेरा में जिस तरह के कपड़े पहने हैं उन्हें फिल्म के मुताबिक सामान्य सा दिखना है तो उन्होंने महंगे कपड़े नहीं पहने. लेकिन टेलीविजन में अभिनेत्रियां कपड़ों को लेकर नखरे दिखाती हैं. एक अवधारणा तो यहां बदली कि फिल्मों की अभिनेत्रियां केवल कॉस्टयूम को महत्व देती हैं. किरदार को नहीं. हाल ही में खबर आयी थी कि अर्जुन रामपाल ने अपने फिल्म डी डे में अपने लुक को बिल्कुल वास्तविक दिखाने के लिए अंधेरी के स्ट्रीट के कपड़े पहने थे. विद्या बालन ने भी मुंबई के स्ट्रीट बाजार से फिल्म द डर्टी पिक्चर्स के लिए शॉपिंग की थी. लेकिन अब भी टीवी में इन बातों को कम अहमियत दिया जाता है. स्पष्ट है कि अब भी जिस तरह फिल्मों को रियलिस्टिक अप्रोच देने की कोशिश की जा रही है. धारावाहिक में वह मुकाम नहीं आ पा रहा. खुद सुशांत मानते हैं कि टीवी में सीखने के कम विकल्प हैं, क्योंकि टीवी की सीमाएं हैं. टीवी पुराने ढर्रे और बने बनाये फार्मूले पर ही चलने की कोशिश करता है. दरअसल, हकीकत यही है और यही वजह है कि ऐसे कई धारावाहिक उसी ढर्रे पर चले आ रहे हैं. अब कामयाबी का स्तर खो चुके हैं. लेकिन जबरन वे केवल मुनाफे के लिए शो चला रहे हैं. निस्संदेह कुछ धारावाहिकों में प्रयोग शुरू हुए हैं. लेकिन अब भी सिनेमा से अधिक छोटा परदा ड्रामा को ही प्रमुखता देता है. शायद लंबे समय तक टिक पाने की उनकी यही यूएसपी है. 

मां कहती है रिहर्सल अच्छी होनी चाहिए : रुशलान


फिल्मों में करियर आजमाने के बाद इन दिनों रुशलान छोटे परदे पर धमाल मचा रहे हैं. वे सोनी टीवी के शो कहता है दिल से दर्शकों का दिल जीत रहे हैं.

रुशलान, आप बॉलीवुड का हिस्सा रहे. फिर टीवी पर क्यों ?
मुझे लगता है कि मैं एक्टर हूं और छोटा परदा कोई छोटा तो है नहीं. वह काफी बड़ा है. इसका कैनवास बड़ा है. तो क्यों न मैं यहां भी खुद को एक्सप्लोर करूं. कहता है दिल को लेकर मैं बेहद खुश हूं कि इतने अच्छे प्रोजेक्ट पर मुझे काम करने का मौका मिला है. मैं इसके लेकर बेहद उत्साहित हूं. मुझे छोटे परदे पर शुरुआत के लिए एक अच्छा प्रोडक् शन हाउस मिला है, अच्छे स्टार कास्ट मिले हैं और ऐसे लोकप्रिय चैनल के साथ काम करने क ेबाद मैं यह नहीं समझता कि मुझे इससे कोई और अच्छा मौका मिलता. मैं अच्छा काम करता चाहता हूं और इसके लिए माध्यम को लेकर बिल्कुल भी नहीं सोचता. ऐसा नहीं है कि मैंने फिल्मों को छोड़ जिया है. मैं टीवी में काम कर रहा हूं. वापस फिल्मों में आऊंगा. विज्ञापन में काम कर ही रहा हूं. शो की मेजबानी भी करूंगा. टीवी में बहुत कुछ है मेरे लिए. लेकिन फिलहाल इस शो पर ध्यान दे रहा हूं.
शो को जिस तरह से टीआरपी मिल रही है. इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
धीरे धीरे दर्शकों को यह शो और पसंद आयेगा. किसी भी शो को पूरी तरह से शेप लेने में वक्त लगता है. मैं इस शो में जैसा किरदार निभा रहा हूं. लोगों को स्वीकारने में वक्त लगेगा. वैसे मुझे लग रहा है कि लोगों को मुझे छोटे परदे पर देख कर थोड़ा आश्चर्य हो रहा है. लेकिन मुझसे पहले रॉनित रॉय और भी कलाकार आये हैं तो दर्शकों को मैं भी पसंद आऊंगा.
शो के किरदार से आप वास्तविक जिंदगी में कितने मेल खाते हैं?
बहुत मैं खुद धु्रव की तरह ही मस्ती खोर हूं. फन लविंग हूं.  मैं जिंदगी को पॉजिटिविटी के साथ जीने में विश्वास रखता हूं. मेरे लिए जिंदगी का मतलब ही खुशी है. और जिस तरह के रिलेशनशीप को इस शो में दर्शाया जा रहा है.रियल लाइफ में ऐसा होता भी है. इसलिए मुझे ये किरदार बेहद पसंद है. हां, लेकिन मैं काम करते वक्त गंभीर हो जाता हूं. बस यही एक फर्क है रुसलान और धु्रव में.
 संगीता के साथ केमेस्ट्री कैसी है आपकी?
टीवी की बड़ी अभिनेत्री हैं संगीता. काफी एक्सपीरियंस हैं उन्हें. लेकिन फिर भी उन्हें देख कर ऐसा नहीं लगता. क्योंकि वह काफी सॉफ्ट हरटेड हैं. सबसे काफी अच्छे से बात करती हैं सेट पर. खास बात यह है कि उनकी आवाज काफी सॉफ्ट हैं और जब वह बांग्ला में बात करती हैं तो मुझे और अच्छा लगता है. मैंने उनके बाकी के भी शोज देखे हैं और वह उनमें भी मुझे बेहद अच्छी लगती हंै.
आपकी मां ( अंजना मुमताज)भी अभिनेत्री हैं. तो क्या उनसे टिप्स मिलते हैं आपको?
हां, मां हमेशा समझाती है मुझे कि मुझे अपने एक्ट से पहले रिहर्सल बहुत ज्यादा करना चाहिए. चूंकि यह बेहद जरूरी है कि आप रिहर्सल करो ताकि अपनी लाइनें न भूलो. तभी आप आगे अच्छा काम कर सकते हो, और अपने किये हुए काम का फाइनल आउटपुट तो जरूर देखो.फिर अपनी कमी को तलाशो और उन्हें दूर करने की कोशिश करो. तभी अच्छे एक्टर कहलाओगे. 

सहज कलाकार


 फिल्म शुद्ध देसी रोमांस देखने के बाद जो सबसे पहली बात जेहन में आती है वह यही है कि फिल्म के सारे किरदार अपने किरदारों में बहुत सहज हैं. उन्हें देख कर लगता नहीं कि उनकी यह पहली या दूसरी फिल्म है. दूसरी खास बात यह भी है कि हिंदी फिल्मों ने एक नयी शुरुआत की है. फिल्मों के किरदार लार्जर देन लाइफ के नहीं, बल्कि हमारे बीच से ही तलाशे जा रहे हैं. गाने, मेकअप और उनके डायलॉग उनके किरदार के मुताबिक लिखे जा रहे हैं. हां, यह सच है कि अब भी सुपरस्टार्स इन सबसे बाहर नहीं आ पा रहे. शाहरुख खान चेन्नई में एक मिठाईवाले का किरदार निभा तो रहे हैं, लेकिन वह उसमें स्वभाविक नहीं लग रहे.जब वह मिठाई बेच रहे होते हैं तो ऐसा लगता है कि वह खुद ग्राहक हैं. फिल्म में वह भले ही कॉमन मैन का राग अलाप रहे हों. लेकिन हकीकत यही है कि यह राहुल लोगों को आम नहीं लगता.  शायद इसकी वजह यही है कि शुरुआती दिनों के बाद उन्होंने इस तरह के आम किरदार निभाये ही नहीं और दर्शक भी अब उन्हें उस रूप में देखें तो उन्हें वह पूरी तरह से बनावटी ही लगे. लेकिन सुशांत,वाणी परिणिती जो कि फिलवक्त एक या दो फिल्म ही पुराने हैं. ये शुरू से ही ऐसे किरदार निभा रहे हैं, जो बिल्कुल हमारे बीच के किरदार हैं. और शायद यही कारण है कि रघु गाइड से या गायत्री से दर्शक जुड़ पा रहे हैं. फिल्म लंचबॉक्स की इला और मिस्टर फर्नांडीस जैसे किरदार भी हमारे बीच है. इरफान अब सुपरस्टार हैं. लेकिन उन्होंने जिस सहजता से इस आम किरदार को निभाया है. वह बेहद खास है. काय पो चे का ईशान, शुद्ध देसी का रघु ये किरदार दर्शा रहे हैं कि हिंदी फिल्मों के नायक भी अब लार्जर देन लाइफ की इमेज से निकल कर बाहर आने के लिए बेकरार हैं और वे आम किरदार निभाते हुए भी कितने स्वभाविक लग रहे हैं. 

उसकी टोपी इसके सर, इसकी टोपी उसके सर


अभी कुछ दिनों पहले कहानी के सीक्वल को लेकर सुजोय घोष और जयंतीलाल में वार छिड़ी थी. अब नयी खबर है कि राजकुमार संतोषी अंदाज अपना अपना सीक्वल को लेकर परेशान हैं. चूंकि उनका कहना है कि इसके सीक्वल के राइट्स उनके पास हैं. लेकिन एक प्रोडक् शन हाउस उन्हें झूठा करार दे रहा है. दरअसल, फिलवक्त रीमेक का जिस कदर दौर चल रहा है. उतने ही विवाद इसके मेकिंग राइट्स को लेकर हो रहे हैं.

 फिल्म जंजीर की रीमेक को लेकर सलीम जावेद ने कोर्ट तक का रास्ता इख्तियार किया. लेकिन फिल्म रिलीज हुई. अंतत: वह 3 करोड़ रुपये में राजी हो गये. सलीम जावेद ने जंजीर के रीमेक के राइट्स को लेकर काफी विवाद खड़ा किया. उनका कहना था कि जंजीर के हिंदी के अलावा किसी भी संस्करण में अगर उसका रीमेक बनता है तो उन्हें उसकी रॉयलिटी मिलनी चाहिए. क्योंकि उनके पास उसके रीमेक की मेकिंग के राइट्स हैं. आखिर कार उन्होंने जीत हासिल की. इन दिनों जिस तरह बॉलीवुड में चारों तरफ रीमेक और सीक्वल का दौर चल रहा है. हर निर्माता और निर्देशक की कोशिश यही है कि वह ज्यादा से ज्यादा रीमेक व सीक्वल बना कर अपनी झोली भर ले. जहां एक तरफ सलीम जावेद को तो अपना हक मिल गया. लेकिन बॉलीवुड में ऐसी कई फिल्में हैं, जिनके बारे में हर दिन नयी खबर आ रही है और लोग यह समझ ही नहीं पा रहे कि आखिर उस फिल्म की मेकिंग के राइट्स किसके पास हैं और कौन झूठ बोल रहा है. कौन सोच.
निर्माताओं की मनमानी
दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी सिनेमा में आज भी निर्देशक से अधिक निर्माता ही शक्तिशाली और प्रभावशाली है. और यह सिलसिला आज से नहीं वर्षों से चला आ रहा है. मंटो की किताब मीना बाजार को ध्यान से पढ़ें तो वे सारी कहानियां निकल कर सामने आती हैं, जब हिंदी सिनेमा के कई निर्देशकों को निर्माता की मर्जी के सामने समझौते करने पड़े हैं. किसी दौर में निर्माता और निर्देशक की अच्छी बन रही होती है तो वह साथ साथ फिल्म का निर्माण कर लेते हैं. शुरुआती दौर में जब दौर स्वतंत्र निर्माताओं का होता था. उस दौर में निर्माता अपनी मनमर्जी और मनमानी काफी अधिक करते थे. उस दौर में निर्देशकों के पास उतने पैसे नहीं होते थे. न ही उतना बजट कि वे अपनी फिल्मों को खुद प्रोडयूस कर पायें और इसी का फायदा निर्माता उठाते आये हैं. अब जबकि दौर पूरी तरह से मार्केटिंग का है. निर्माता चाहते हैं कि वे मनमाने ढंग से किसी भी निर्देशक की क्रियेटिवीटी अपने हक के लिए इस्तेमाल करें. आज के दौर में वैसे कम ही निर्देशक और निर्माता की जोड़ी की दोस्ती बरकरार रह पायी है, जो पहले भी थी. फिरोज नाडियावाला इसमें अपवाद हैं. वर्षों बाद भी जब वह फिल्म वेलकम बैक का सीक्वल लेकर आ रहे हैं  तो उन्होंने फिल्म का निर्देशक नहीं बदला है. वरना, हर दिन बॉलीवुड में सीक्वल के निर्देशकों को बदला जा रहा है.फिल्म धूम  सीरिज की शुरुआत में संजय गाडवी ने निर्देशित किया. बाद में यशराज ने धूम 3 की जिम्मेदारी विजय कृष्णा को दे दिया. गौरतलब है कि अभिनव कश्यप ने अपनी मर्जी से फिल्म दबंग के सीक्वल को निर्देशित करने से इनकार किया है.
कमाई का बेहतरीन जरिया
बॉलीवुड भले ही यह दिखावा करे कि यहां वे प्रोफेशनल तरीके से काम करते हैं. लेकिन हकीकत यही है कि हिंदी फिल्म जगत में आपसी रिश्ते खराब होते ही प्रोफेशनल रिश्ते भी खराब हो जाते हैं. इन दिनों जिस तरह से सीक्वल और रीमेक का दौर है. निर्माताओं की यही कोशिश होती है कि वे बिना कुछ काम किये या क्रियेटिवीटी दिखाये बनी बनाई कहानी पर अपना उल्लू सीधा करें और वे वही कर रहे हैं. वे किसी दूसरे के आइडिया को अपना सिर्फ इस आधार पर कहते हैं, क्योंकि उन्होंने उस फिल्म पर पैसे लगाये होते हैं. और वे अपने मर्जी से अपने निर्देशक लाते हैं और फिर किसी दूसरे की बनी बनाई विजन पर अपना मुनाफा कमा रहे हैं. खासतौर से वे निर्माता जो कि शुरुआती दौर में काफी प्रभावशाली थे. लेकिन अब नहीं. वे अब केवल पैसों की लालच में ऐसा कर रहे हैं. और अब तक ऐसा कोई कानून नहीं बना जिसके आधार पर निर्माता की इस करतूत और हरकत पर निर्देशक कोई आवाज उठा सके.

सुजोय-जयंती लाल की कहानी 
सुजोय घोष ने फिल्म कहानी का निर्देशन किया था. साथ ही वे फिल्म के को प्रोडयूसर भी रहे. वही जयंतीलाल फिल्म के प्रमुख निर्माता थे और उनका कहना है कि उन्हें ही कहानी के सीक्वल बनाने के राइट्स हैं. जबकि  सुजोय का कहना है कि केवल वे ही कहानी के सीक्वल को बना सकते हैं. चूंकि कहानी उनकी थी. दोनों में विवाद तब खड़ा हुआ जब सुजोय ने कहानी के सीक्वल बनाने के लिए जयंतीलाल से 35 करोड़ रुपये की डिमांड की थी. इसके बाद जयंतीलाल ने कहानी के सीक्वल को अपने तरीके से बनाने का निर्णय लिया. लेकिन सुजोय किसी भी हाल में कहानी फिल्म के सीक्वल बनाने की इजाजत नहीं दे रहे. और इसे लेकर लगातार दोनों के बीच वार चल रहा है.
राजकुमार संतोषी और अंदाज अपना अपना
राजकुमार संतोषी वर्षों से चाह रहे हैं कि वह अपनी फिल्म अंदाज अपना अपना का सीक्वल बनायें. लेकिन वह अपनी इस कोशिश में नाकामयाब हो जा रहे हैं. राजकुमार संतोषी ने कहा कि वे चाहते हैं कि वे रणबीर कपूर और शाहिद कपूर को लेकर अंदाज अपना अपना का सीक्वल बनायें. लेकिन निर्माता विनय सिन्हा उन्हें यह इजाजत नहीं दे रहे. स्पष्ट है कि फिल्म के आइडियेशन से लेकर फिल्म की मेकिंग और फिल्म की सफलता का पूरा श्रेय राजकुमार संतोषी को जाता है. लेकिन चूंकि वह फिल्म के निर्माता नहीं थे इसलिए वे चाहकर भी इसके सीक्वल की शुरुआत नहीं कर पा रहे हैं. वही दूसरी तरफ विनय सिन्हा किसी और निर्देशक को लेकर यह फिल्म बनाने जा रहे हैं.

सुजोय घोष
मैं इस बात से कतई राजी नहीं होंउंगा कि कोई मेरे काम, मेरी क्रियेटिविटी का गलत फायदा उठाये. मैं वह सबकुछ करूंगा, जो कहानी को बचाने के लिए मुझे करना चाहिए. कहानी मेरी सोच है. वह मेरा बच्चा है और मैं ही केवल उसके साथ सही न्याय करूंगा. मैं आगे भी इसके लिए लड़ता रहूंगा. अपने हक के लिए लड़ता रहंूगा. 

ँछोटे शहर का प्यार रघु है या रांझणा?


 कुछ महीनों पहले रिलीज हुई फिल्म रांझणा में निर्देशक आनंद एल राय ने प्यार के रांझणा अवतार को दिखाया. बनारस की गलियों के कुंदन के लिए प्यार नवाज की तरह है. वही दूसरी तरफ फिल्म शुद्ध देसी रोमांस का रघु बिंदास जरूरत बनने पर प्रेमिका को बहन भी बता देता है. तो आखिर छोटे शहरों में आज भी क्या है प्यार की परिभाषा. किस तरह हिंदी फिल्मों में छोटे शहरों और गांव की प्रेम कहानियों को दर्शाया जाता रहा है. पेश है रघु के बिंदास प्रेम बनाम रांझणा के समर्पित प्रेम पर  की रिपोर्ट

 फिल्म रांझणा में कुंदन जोया से बेइतहां प्यार करता है. वह उसके प्यार में रांझणा है.वह फिल्म में अंत तक एक रांझणा की तरह ही जोया से प्यार करता रह जाता है. उसका प्यार समर्पित प्रेम है. वह बनारस की गलियों का कुंदन है, जिसके लिए प्यार नमाज की तरह है. वही दूसरी तरफ फिल्म शुद्ध देसी रोमांस का रघु प्यार को लेकर बिंदास है. वह प्यार को लेकर बिंदास सोच रखता है और इस प्यार को वह बंधन नहीं बनाना चाहता. हिंदी सिनेमा में हर बार अपनी फिल्मों के माध्यम प्यार के कई रूपों को प्रस्तुत किया जाता रहा है. मेट्रो पोलिटियन शहरों में जहां प्यार फेसबुक या किसी कॉफी शॉप से शुरू होती है और लिव इन रिलेशनशीप पर आकर खत्म होती है. वही छोटे शहरों में प्यार की परिभाषाओं को फिल्मों में अलग अलग दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया है. जहां एक तरफ हाल ही बनारस की पृष्ठभूमि में आधारित फिल्म रांझणा का कुंदन एक लड़की से बचपन से प्यार करता है और ताउम्र उसके प्यार में ही जीता है. वह प्यार में पश्चाताप भी करता है. लेकिन दूसरी तरफ शुद्ध देसी का रघु प्यार के बिदांसपन में प्रेमिका को बहन कह कर बुला देता है. पंकज कपूर ने फिल्म मौसम में भी छोटे शहर की प्रेम कहानी को दर्शाने की कोशिश की है. वही दूसरी तरफ फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर में फैजल और मोहसिना के वासेपुर इलाके में पनपे बोल्ड रूप को भी प्रस्तुत किया गया है. कभी प्यार का लिव इन रिलेशनशीप रूप व अवतार केवल बड़े शहरों में देखा जाता था. लेकिन फिल्म के मुताबिक वह छोटे शहरों का भी हिस्सा बन चुका है. फिल्मकारों का मानना है कि लोगों के जेहन में यह बात हमेशा रहती है कि छोटे शहरों में बिंदास या बेबाक प्यार नहीं पनपता, वे छुप छुप कर ही प्यार करने में विश्वास करते हैं और छोटे शहरों की प्रेम कहानियां भी कम ही पूरी होती है. लेकिन हकीकत इससे परे है. हिंदुस्तान के हर छोटे शहर में एक और छोटा शहर बसता है. जहां कुंदन जैसे रांझणा भी हैं और रघु भी.

परिणीति चोपड़ा, अभिनेत्री  : लोगों को लगता है कि लिव इन केवल बड़े शहरों में होते हैं. जबकि हकीकत यह है कि छोटे शहरों में भी दो लोग आसानी से लिव इन में रहते हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं. मुझसे अगर पूछा जाये कि छोटे शहर में  प्यार रांझणा या रघु तो मैं कहूंगी कि दोनों ही रूप होते हैं. छोटे शहर को हमेशा अंडरइस्मेट किया जाता है. उन्हें लगता है कि छोटे शहरों को नयी चीजों के बारे में पता नहीं. वे पुराने ढर्रे पर ही चलते हैं. जबकि हकीकत यह है कि छोटे शहर में भी लोग बिंदास प्रेम करते हैं. यह अलग बात है कि लोगों तक इस बारे में खबरें ज्यादा नहीं आती, क्योंकि वहां के पास पड़ोस के लोग ही मीडिया का काम करते हैं और आपस में उन बातों का डिस्कशन कर लेते हैं.
पंकज कपूर , अभिनेता
आज भी छोटे शहरों में प्यार को समझने और प्यार के इमोशन को समझने वालों की संख्या अधिक है. वहां प्यार को मजाक में नहीं लेते और मैगी वाला प्यार आज भी वहां नहीं पनपता. कि आज मिले. कल बाय बाय. सच्चे प्यार करनेवाले आज भी छोटे शहरों में ही मिलते हैं. छोटे शहर में मुझे नहीं लगता कि आज भी बहुत बिंदासपन आया है. आज भी वहां इंटरनेट जमाना आने के बाद भी लोग चिट्ठियों के माध्यम से बातें करना. अपनी प्रेमिका या प्रेमी को तोहफे देते हैं और प्यार का इजहार करने में आज भी हिचकते हैं. दरअसल, आज भी वहां प्यार में वह नजाकत जिंदा है.


यशराज फिल्मस ने भारत में प्यार व रिलेशनशीप को लेकर एक रिसर्च करवाया. रिसर्च के निष्कर्ष इस प्रकार है
71 प्रतिशत भारतीय युवा लव मैरेज करना पसंद करते हैं.  न कि अरेंज मैरेज़.
79 प्रतिशत भारतीय पेरेंटेस अपने बच्चों की अरेंज मैरेज करवाना चाहते हैं.
75 प्रतिशत भारतीय पेरेंट्स अपने बच्चों को इंटर कास्ट मैरेज करवाना पसंद नहीं करते.
51 प्रतिशत युवा इंटर रिलीजन को लेकर खुले विचार रखता है. और लाइफ पार्टनर चुनते वक्त वह अपने लाइफ पार्टनर का धर्म नहीं पूछते.
64 प्रतिशत युवाओं की सोच है कि जो कपल डेटिंग कर रहे होते हैं वह सेक्सुअल रिलेशनशीप में भी होंगे.
80 प्रतिश्त पेरेंट्स आज भी अपने बच्चों के अफेयर या प्रेम संबंध के बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना या बच्चों के प्रेम संबंध का सार्वजनिक होना पसंद नहीं करते.
77 प्रतिशत युवा महिला मानती हैं कि अपने पहले या दूसरे डेट पर ही अपने पार्टनर के साथ बहुत ज्यादा खुलना नहीं चाहिए.
जबकिक 40 प्रतिशत लड़कों की सोच है कि लड़कियों को अपने पार्टनर पर भरोसा करना चाहिए.
89 प्रतिशत भारतीय पेरेंटस शादी से पहले लड़के लड़की का साथ रहना पसंद नहीं करते.
55 प्रतिशत युवा उनके इस विचार से सहमत नहीं.
73 प्रतिशत पुरुषों का मानना है कि जो महिलाएं या लड़की स्मोकिंग करती हैं. उनका चरित्रहीन होती हैं.
62 प्रतिशत महिलाएं पुरुषों के बारे में भी ऐसा ही सोचती हैं.
75 प्रतिशत पुरुषों की नजर में जो महिलाएं शॉर्ट स्कर्ट पहनती हैं वे ही इव टिजिंग के लिए निमंत्रण देती हैं.
72 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि लिव इन रिलेशनशीप करना गलत है.
80 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि लिव इन रिलेशनशीप में रहनेवाले चरित्रहीन होते हैं.

फिल्मी बच्चे व स्वतंत्रता


 सोहा अली खान जब फिल्मों में आयी थीं.उस वक्त उन्हें फिल्मों में आने की इजाजत नहीं थी. उनके परिवार वाले नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में आयें. और अब आलम यह है कि उन्हें न सिर्फ फिल्मों में आने की छूट मिली है. बल्कि वह अपने ब्वॉयफ्रेंड कुणाल खेमू के साथ मुंबई में लीव इन रिलेशनशीप में रह रही हैं. सैफ अली खान और करीना कपूर भी लंबे अरसे तक लीव इन में रहे. उसके बाद दोनों ने शादी की. करीना अब मानती हैं कि यह निर्णय उनका बिल्कुल सही था कि उन्होंने और सैफ ने साथ में रह कर एक दूसरे को जानने की कोशिश की और फिर उन्होंने अपनी जिंदगी आगे बढ़ायी. करीना को भी पहले फिल्मों में आने की आजादी नहीं थी. वजय यह थी कि कपूर खानदान की बेटियां फिल्मों में जायें. राज कपूर ऐसा नहीं चाहते थे. लेकिन करीना ने तो नहीं, करिश्मा ने बगावत की और वह आगे बढ़ी. ठीक उसी तरह सोहा ने भी अपने घर के निर्णय के विरुद्ध कदम बढ़ाया. दरअसल, हिंदी सिनेमा में यह परंपरा रही है कि जिस परिवार के लड़कों को इसकी आजादी है कि वह अपने अनुसार फिल्मों का या करियर का चुनाव करें. उस लिहाज से बेटियों को मौके नहीं मिले. इस संदर्भ में देखा जाये तो मुंबई के बाहर से आयी लड़कियों को उनके माता पिता का अधिक सपोर्ट मिला है. फिर चाहे वह प्रियंका चोपड़ा हों या दीपिका पादुकोण या अनुष्का शर्मा. आमतौर पर यह अवधारणा है कि मुंबई के बाहर रहनेवाले लोगों की मानसिकता संकीर्ण है. लेकिन अगर हिंदी फिल्मी परिवार को देखा जाये तो शायद वहां रुढ़िवादी सोच अधिक नजर आती है. शत्रुघ्न ने आज भी सोनाक्षी को बहुत आजादी नहीं दी. सोनम भी पिता के बंदिशों के बीच ही अपने काम पूरे करते हैं. स्पष्ट है कि फिल्मी परिवार के माता पिता अपने बच्चों को लेकर ओवर प्रोटेक्टीव हैं.

छोटे परदे का नया कैनवास


 जल्द ही लाइफ ओके पर एक नये धारावाहिक की शुरुआत हो रही है. एक बूंद इश्क नामक इस धारावाहिक में एक अलग तरह की कहानी दिखाने की कोशिश की गयी है. इसमें किन्नर को भी मुख्य भूमिका में दर्शाया जा रहा है. जीटीवी पर बुद्धा नामक धारावाहिक की शुरुआत हो रही है. टेलीविजन पर पहली बार  बुद्ध की कहानियों को दर्शाने की कोशिश है. स्टार प्लस बड़े कैनवास पर महाभारत ला रहा है. सोनीटीवी के केबीसी में इस बार इनाम की राशि 7 करोड़ कर दी गयी है. स्पष्ट है कि  टेलीविजन अब बड़े कैनवास के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार है. जिस तरह की कहानियां और भव्य लोकेशन में धारावाहिक शूट हो रहे हैं. अनुमान लगाया जा सकता है कि धारावाहिक अब इस बातों पर ध्यान दे रहा है कि उन्हें किस तरह के कार्यक्रम का चुनाव करना है. किस तरह के नहीं. खबर है कि  महाभारत स्टार प्लस का अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है. इस धारावाहिक में लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं. स्पष्ट है कि अब किसी भी रूप में धारावाहिक के मेकर्स समझौता नहीं करना चाहते. इन दिनों छोटे परदे पर बड़े परदे के लोगों की आवाजाही बढ़ी है. चूंकि वे भी इस बात से वाकिफ हैं कि टीवी मुख्य माध्यम है, जिससे कि लोगों तक आसानी से पहुंचा जा सकता है. इन दिनों धारावाहिक में काम कर रहे कॉस्टयूम डिजाइनर्स भी इन बातों का खास ख्याल रख रहे हैं कि उनके कलाकारों को पूरी तरह से मौलिकता बरती जाये. नये नये प्रयोग हो रहे हैं. कहानियों को लेकर भी नयापन है. हां, अभी भी उन्हें और कुशल होने की जरूरत है. लेकिन अगर ऐसी शुरुआत हो रही है तो यह छोटे परदे के कलाकारों व तकनीशियन के लिए खुशी की बात है. उम्मीदन अब छोटे परदे पर काम कर रहे और जुड़े लोगों को मेहनताना भी बड़े कैनवास पर मिले.

कलाकार का सम्मान

 इरफान खान ने फिल्म मासूम के रीमेक से इनकार कर दिया है. उनका साफ कहना है कि जिस तरह नसीरुद्दीन शाह ने इस फिल्म में भूमिका निभाई थी. वे नहीं निभा पायेंगे. इरफान खान वर्तमान के सबसे लोकप्रिय और बेहतरीन कलाकारों में से एक हैं. उनका मानना है कि वे किसी भी फिल्म को आसानी से न भी कह सकते हैं और उतनी ही आसानी से हां भी कह देते हैं. अगर कहानी पसंद आयी तो. हाल ही में उनकी फिल्म लंचबॉक्स देखने का मौका मिला. लंचबॉक्स में उनके संवाद अधिक नहीं हैं. लेकिन उनके एक्सप्रेशन उनके पूरे अभिनय के बोल हैं. वे जिस तरह होंठों को टेड़ी कर शरारत वाली मुस्कान देते हैं. जिस उम्र का उन्होंने किरदार निभाया है. उस उम्र में भी वे किस तरह रुमानी है और किस तरह उन्होंने उस किरदार को जीवंत किया है. फिल्म देखने के बाद आप इस बात का अनुमान आसानी से लगा सकते हैं कि वह कलाकार कितना सुलझा हुआ है. वह पान सिंह तोमर बनता है. तब भी दर्शकों को लुभाता है और वह जब अपनी उम्र से कोई बड़ा किरदार निभाता है. तब भी वह किस तरह उन किरदारों को सार्थक बनाता है. इरफान का मानना है कि दर्शकों को इंगेज करना जरूरी है. अगर दर्शक इंगेज होंगे तभी वह आपके साथ साथ चल पायेंगे. दरअसल, हकीकत यही है कि इरफान इतनी सफलता के बावजूद अब भी अभिनय के लिए अपनी भूख को बरकरार रखना चाहते हैं. जो उन्हें इस तरह के किरदारों को निभाने के लिए प्रभावित करे. हिंदी सिनेमा में ऐसे कलाकारों की संख्या कम है. सो, जरूरत है हिंदी सिनेमा को वे ऐसे कलाकारों का मान करें और उन्हें सम्मानजनक किरदार ही नहीं मेहनताना भी दे. आज भी इरफान, मनोज, नसीरुद्दीन शाह की यह शिकायत है कि उन्हें कमतर आंका जाता है. वक्त आ गया है कि इन्हें अच्छी फिल्में मिले.

हिंदी फिल्मों का हीरो


 नवाजुद्दीन सिद्दिकी इस बार लैक्मे फैशन वीक में शो स्टॉपर बने. पिछली बार जब वह कान फिल्मोत्सव में जा रहे थे तो डिजाइनर्स ने उनके लिए कपड़े डिजाइन करने से इनकार कर दिया था. चूंकि उनका मानना था कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी डिजाइनर्स स्टाइल अपनाकर अच्छे नहीं दिखेंगे. लेकिन आज वह शो स्टॉपर बन रहे हैं. स्पष्ट है कि यहां उगते सूरज को ही सलाम करते हैं. नवाजुद्दीन की कद काठी की वजह से ही उन्हें हिंदी फिल्मों में लंबा संघर्ष करना पड़ा. 14-15 सालों तक उन्होंने मेहनत की. धक्के खाये. तब जाकर उन्हें फिल्म मिली. आज वह जिस फिल्म का भी हिस्सा होते हैं. वे उस फिल्म के भी शो स्टॉपर बन जाते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि बॉलीवुड में टैलेेंट की डिमांड तो होती है और उन्हें पहचान भी मिलती है. लेकिन उन्हें लंबी पारी खेलनी पड़ती है. वे तपते हैं और फिर निखरते हैं. हां, यह सच है कि इसी हिंदी सिनेमा ने ओम पुरी और पंकज कपूर जैसे सामान्य चेहरे लेकिन अदभुत अभिनय वाले कलाकारों को भी जगह दी है. लेकिन आज भी ग्लैमर दुनिया में स्टारडम ही हावी है. आज भी दर्शकों की नजर में नवाजुद्दीन कैरेक्टर आर्टिस्ट ही हैं. वे लीड किरदार निभाने के बावजूद वह कैरेक्टर आर्टिस्ट ही कहलाते हैं. इसकी बड़ी वजह नस्लवाद है. हां, यह सच है कि हिंदी सिनेमा जगत में जातिवाद हावी नहीं और न ही नस्लवाद. लेकिन दर्शकों की नजर में आज भी नस्लवाद हावी है. उनके लिए हीरो हमेशा सुंदर, बाइक पर बैठ कर आनेवाला ही होना चाहिए, उसकी बॉडी होनी चाहिए. लोग इरफान के अभिनय को प्यार करते हैं. लेकिन कितने दर्शक होंगे जिन्हें उनके चेहरे से भी प्यार हो. नवाजुद्दीन आने वाले समय में हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में से एक हैं और होंगे. इसके बावजूद क्या वह हीरो की केटेगरी में फिट हो पायेंगे या दर्शक उन्हें फिट करेंगे.

पैसे कमाने के लिए फिल्मों में नहीं आया : सुशांत सिंह राजपुत


काय पो चे में वे अपने अभिनय का हुनर दिखा चुके हैं. महज एक फिल्म से ही उन्हें अच्छी लोकप्रियता मिली है. अब शुद्ध देसी रोमांस में वह रोमांटिक छोरे का किरदार निभा रहे हैं. सुशांत सिंह राजपूत के लिए क्या है शुद्ध देसी रोमांस के मायने और क्यों वह बन गये हैं युवाओं के नये सुपरस्टार. अनुप्रिया अनंत ने सुशांत से जानने की कोशिश की...

 क्या है शुद्ध देसी रोमांस
जेनरली हमलोग फिल्म में जो रोमांस दिखाते हैं. वह काफी फैंटेसी होता है. उसमें एक हीरो होता है. एक हीरोइन होती है. और उसमें प्यार हो जाता है. फिर उन दोनों में प्यार होता है. फिर विलेन आता है. विलेन मर जाता है और फिर दोनों रहते हैं खुशी खुशी. लेकिन यह सच्चा रोमांस नहीं होता. शुद्ध देसी रोमांस उस रोमांस के बारे में बातचीत है,जिसमें दो लोगों के बीच कंफ्लीक्ट है. दो लोगों के बीच इमोशन है. दो लोगों के बीच कंफ्यूजन है. लेकिन फिर भी दोनों साथ रहना चाहते हैं. क्यों? क्योंकि उनमें प्यार है. शुद्ध इसलिए क्योंकि इस रोमांस में जो जैसा है. वैसा दिखा रहे हैं. कुछ भी बनावटी नहीं.छुपा नहीं रहे कुछ भी. देसी इसलिए क्योंकि इंडियन मेनेटेलिटी के साथ ही यह रोमांस चलता है. लोग हजार गालियां दे दे कि क्या कर रहे हैं ये लोग़. तमाम आॅथोडॉग्स नॉर्म्स के साथ हम चलते हैं. रोमांस इसलिए क्योंकि इसमें रोमांस है.
क्या छोटे शहरों में होते हैं लिव इन रिलेशनशीप
होते हैं और बिल्कुल होते हैं. ये अलग बात है कि मीडिया में आ नहीं पाती. बस वहां की मीडिया यानी आस पड़ोस में ही रह जाती हैं बातें. छुप छुप कर रहते ही लोग़. हम उसके बारे में बताते नहीं हैं.पिक्चर देखें कि हमने जो दिखाया है. वह सच कैसे है. कैसे लोग दूसरों को दिखाते हैं कि हम नहीं हैं ऐसे. लेकिन होता यही है कि दो लोग रह रहे होते हैं. मेरा मानना है कि लिव इन रिलेशनशीप इस लिहाज से एक अच्छी रिलेशनशीप है कि आपको एक दूसरे को जानने का मौका मिल जाता है. किसी एफेडेबीट रिश्ते में बंधने से पहले.
जब जुड़े यशराज से
मुझे आॅडिशन के लिए बुलाया गया था. उन्हें लगा कि मैं यह किरदार निभा सकता हूं. और यशराज जैसे बैनर को न कौन कहेगा.
जब लगा सुपरस्टार का टैग
मैं सीरियसली इस टैग को गंभीरता से नहीं ले रहा, क्योंकि लोगों को ऊपर चढ़ाने में बड़ा मजा आता है. और उतना ही मजा गिराने में भी आता है. मेरा यहां आने का एक अलग मकसद है. मैं यहां पैसे कमाने के लिए नहीं आया हूं. मैं जहां था वहां भी अच्छे खासे पैसे कमा रहा था. वहां भी रह सकता था. लेकिन मुझे कुछ अलग करना है. मैं अभिनय में यूं ही नहीं आया. मैं परफॉर्मिंग आर्ट्स किये हैं. शामक ने भी ललक देख कर ही मुझे कहा था कि मुझे अभिनय में जाना चाहिए. मैं बारीकी को समझते हुए काम करना चाहता हूं. तो मुझे किसी टैग के साथ नहीं बढ़ना. मेरी तुलना शाहरुख से हमेशा होती रहती है. लेकिन वह जहां आज हैं. उन्होंने लंबा सफर तय किया है. मैं आसानी से कैसे पहुंच जाऊंगा. फिलहाल मैं भी सफर का हिस्सा बनना चाहता हूं. मेरे पास फिलवक्त वे सारे निर्देशकों की फिल्म है, जिनके बारे में सुन कर कोई भी एक्टर पागल हो जायेगा. लेकिन मुझे तो रात में नींद नहीं आती कि मुझे इनके एक्सपेक्टेशन पर खरे उतरना है. मुझे खुद के एक्सपेक्टेशन पर खरा उतरना है.
जब लोगों से मिली वाहवाही
मैं जब परफॉर्मिंग आर्ट का हिस्सा बना तो मैंने देखा कि मैं लोगों को हंसा पा रहा हूं. रुला पा रहा हूं. लोगों को इंगेज कर पा रहा हूं. तब जान पाया था कि अभिनय कर सकता हूं. मुझमें अभिनय का, चीजों को अलग और बारीकी से करने का एडिक् शन है. उस एडिक् शन को कायम रख पाऊं. तो वही बहुत है. मुझे याद है मेरे दोस्त मेरे साथ फिल्म काय पो चे देख रहे हैं. लेकिन ईशान जब मरता है तो वह फुट फुट कर रोते हैं. जबकि मैं बगल में बैठा हूं. तो मैं उस तरह का अभिनय करना चाहता हूं. यह तो मैजिक ही है न कि आपके सामने वह व्यक्ति बैठा है. लेकिन आप परदे पर उसे देख कर रो रहे हो. मैं कैमरा के साथ कैसे खेल सकता हूं. किस तरह अलग कर सकता हूं. फिलहाल यही कोशिश है.
जब छोड़ा छोटा परदा
छोटे परदे से दूर होने की सबसे बड़ी वजह थी कि वहां लोग मुझे नहीं मानव को याद रख रहे थे. मुझे जितना वहां सीखना था. मैं सीख चुका था. छोटे परदे की अपनी सीमाएं हैं, एक वक्त के बाद आप वहां सीख नहीं पाते. सिर्फ  पैसे बनाने लगते हैं. मुझे वह नहीं करना. चूंकि मुझे प्रोसेस में मजा आता है. मुझे अच्छा लगता है. जब मैं बारीकी से एक एक चीज, एक एक स्टेप को पार करके आगे बढ़ता हूं. सो, मैंने अपनी सीमाओं को तोड़ना ही जरूरी समझा. मैं अभी जितने भी किरदार निभा रहा हूं.वहां मैं परदे के पीछे बहुत कुछ सीखने की कोशिश करता रहता हूं. वहां क ेटेक्नीकल के लोगों से पूछता रहता हूं.

20130916

फिल्मी फीवर आॅन आॅटो मीटर -1



मुंबई में दो चीजों से अटूट रिश्ता है. जिनके बिना मेरी दुनिया या या यूं कहें पूरा दिन पूरा नहीं होता.  फिल्मी दुनिया और आॅटो रिक् शा. बाय गॉड, गॉड प्रॉमिस खाकर कह रही हूं कि हम फिल्मी दुनिया के कितने करीब और कितने दूर हैं. यह तय करनेवाला यहां ऊपरवाला ( ईश्वर) नहीं होता...बल्कि आॅटो रिक् शावाला होता है. चूंकि हम किसी इवेंट या इंटरव्यू में वक्त पर पहुंचेंगे या नहीं या वक्त से पहले पहुंच जायेंगे. यह सब  आॅटो रिक् शा चालक के हाथों में होता है. प्राय: फिल्मी इवेंट या इंटरव्यूज जूहू, बांद्रा, अंधेरी के इलाके में होते हैं और मुंबई की ट्रैफिक में केवल रिक् शावाले ही आपको आपकी मंजिल तक पहुंचा सकते हैं. अपने चार सालों के मुंबई निवास के दौरान गिनती तो नहीं...लेकिन न जाने कितने आॅटो चालकों से छोटी लेकिन दिलचस्प बातें हो जाती हैं. कभी उनकी बातें तो कभी उनकी अलग सी हरकतें प्रभावित कर जाती हैं. कभी मीटर का बढ़ता पारामिटर देख कर गुस्सा आ जाये तो आॅटो चालक की बातें मुस्कुराने का मौका दे देती हैं. गौर करें, तो आॅटो रिक् शा भी मुंबई की सड़कों की लाइफलाइन है और उनकी दुनिया भी किसी फिल्मी दुनिया से कम नहीं और उनकी दुनिया में भी फिल्मों की दुनिया कम नहीं. 4 सालों के दौरान कई फिल्मी दुनिया के फैन मिले तो कई समीक्षक भी. कुछ रजनीकांत की माफिक एक् शन दिखाने में माहिर फैन भी.

"हमारे क्षेत्र के ही वरिष्ठ पत्रकार पन्नू सर ने बताया था एक दिन कि पहले कैसे फिल्में जब कम प्रिंट में रिलीज हुआ करती थी और एक शो के बाद रील को दूसरे थियेटर में भेजना होता था. तो उस वक्त आॅटो रिक् शा की अहम भूमिका होती थी. पन्नू सर ने बताया कि कैसे हम उन आॅटो वालों को पहचान लिया करते थे और जब उसे आते देखते तो चिल्लाते चलो चलो आ गयी फिल्म थियेटर में और किस तरह उस दौर में आॅटो रिक् शा चालक तैनात रहते थे थियेटर के बाहर फिल्मों को एक थियेटर से दूसरे थियेटर पहुंचाने में...उस वक्त मैंने महसूस किया कि आॅटो रिक् शा का फिल्मी दुनिया से एक अलग सा कनेक् शन है. फिर मामला  चाहेफिल्मी पोस्टरों को चिपकाने को लेकर हो या  फिल्मी प्रोमोशन को लेकर . सो, बस यूं ही अपने लिये अपने ब्लॉग अनुख्यान में आॅटो रिक् शा व सिनेमा : फिल्मी फीवर आॅन आॅटो मीटर के माध्यम से उन अनुभव और उनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातों को किस्तों में शेयर करूंगी. "
बस यूं ही 

आज दो सुपरस्टार से बातचीत हुई. एक सुपरस्टार जिसे पूरी दुनिया सुपरस्टार मानती है और दूसरे सुपरस्टार वह. जो खुद को सुपरस्टार मानता है. वह आम आदमी है. भीड़ से अलग नहीं है उसका चेहरा. लेकिन फिर भी वह अपनी जिंदगी में खुश है. संतुष्ट है और कहता है कि हम कोई सुपरस्टार की जिंदगी से कम अच्छी जिंदगी थोड़ी न जी रहे हैं. ..  अपनी जिंदगी में खुद को सुपरस्टार माननेवाले मुंबई में आमतौर पर कई आॅटो रिक् शा वाले मिल ही जाते हैं. उनकी दुनिया और उनके आॅटो चलाने का अंदाज आपको किसी फिल्मी सीक्वेंस से कम नजर नहीं आयेगा.  मुंबई में घर खरीद लियाहै. पढ़े लिखे ग्रेजुएट हैं. अपना काम कर रहे हैं. किसी से भीख तो नहीं मांग रहे. क्या हुआ जो आॅटो ही चला रहे हैं.
विकास( आॅटो रिक् शा वाला) से बातचीत का सिलसिला आगे इसलिए बढ़ा. चूंकि वह भी फिल्मों में रुचि रखते हैं और मैं भी. यूं तो मुंबई में कई आॅटोचालक से फिल्मों पर बातचीत हुई है. लेकिन जितनी दिलचस्प बातें आज विकास से हुई. अब तक नहीं हुई थी. विकास फिल्मों के शौकीन हैं और हिंदी समेत हॉलीवुड फिल्में भी देखते हैं. और फिल्मों को लेकर अपनी बेबाक राय रखते हैं.  वे आॅटो ज्यादातर बॉलीवुड के मक्का कहनेजानेवाले इलाके बांद्रा में चलाते हैं. ेलकिन उन्हें किसी स्टार का डर नहीं. खुद ही कहते हैं कि कौन सा हमको जानता है... कि हमारा कुछ बिगाड़ेगा. फिल्म आम लोगों के लिए बनाता है तो अच्छा बुरा सब सुनना होगा. इस साल रिलीज हुई फिल्मों पर उसी सोच और समझ पर उनकी बातों ने मुझे आकर्षित किया...

विकास का पहला सवाल था मेहबूब स्टूडियो में क्यूं गयी थीं. मैंने कहा इंटरव्यू था.
उसने पूछा किसका इंटरव्यू था मैंने बोला रणबीर का. आमतौर पर कोई आॅटोचालक से यह कहते नहीं सुना था कि रणबीर अच्छा बोलता है, क्योंकि अच्छे घर से है. अपने परिवार का मान करना जानता है. बातचीत का सिलसिला जारी है...

विकास : रणबीर का क्यों करने गयी थी. बेशरम के लिए. जो 2 अक्तूबर को आ रही है. उसमें लड़की नयी है न...विकास की इतनी ही बातें काफी थी इस संकेत के लिए कि वे फिल्में देखने में माहिर हैं और पूरी खोज खबर रखते हैं.उसकी इन बातों को सुन कर लगा. बात अपने मोबाइल रिकॉर्डर में रिकॉर्ड कर लूं. बिना उसकी इजाजत. हमारी बातों का सिलसिला जारी रहता है और विकास एक एक कर फिल्मों का रिव्यू कर रहे हैं...बेबाकी से...
 मैं : लास्ट कौन सी फिल्म देखी
 विकास : ग्रैंड मस्ती ...
कैसी लगी...
विकास :बकवास...
 मैं : क्यों...
विकास :क्या दिखाया है उसमें खाली चीप फिल्म है.
फिर भी तो हिट हो जा रही है...
विकास :कहां हिट हो रही है...
 मैं : हां, अच्छी ओपनिंग मिली है उसको.
आपको कौन सी लास्ट फिल्म अच्छी लगी
विकास :रांझणा
गुड वेरी गुड
मैं : रणबीर कैसे लगते हैं?
विकास :रणबीर को तो मैं डेली देखता हूं
कैसे
विकास :पाली हिल में रहता है न...
मैं : जब जब रिलीज होती है फिल्म तब तब देखते हैं?
विकास :हां
 चेन्नई एक्सप्रेस bhi dekhe
उससे घटिया पिक्चर आज तक कोई बनी है. पूरी पिक्चर ट्रेन में खत्म हो गयी. क्या पिक्चर है.
खाली ट्रेन में. उसके बाद क्या बोलते हैं समझ में भी नहीं आता...
 मैं : :भाग मिल्खा भाग नहीं देखी?
विकास : बहुत अच्छी फिल्म है.

मैं : आपने कहां तक पढ़ाई की है?
विकास: ग्रेजुएशन

मैं : तो ग्रेजुएशन करके आॅटो क्यों चला रहे हैं?
विकास: तो क्या हुआ...
मैं : क्यों अच्छा है पैसा?
विकास: किसी की गुलामी करने से तो अच्छा है.
मैं : आपका अपना आॅटो है.
विकास: हां,
मैं : फिर अच्छा है. अपना घर है.
अपना घर है? कहां पे लिया है?
विकास: सांताक्रूज में है, विरार में है. वाह.
संतुष्ट हैं. अपने सुपरस्टार हैं हम तो...
है कहां के
विकास: यूपी के ...
मैं : उत्तर प्रदेश में कहां
विकास: इलाहाबाद
मैं : कब आये थे यहां
विकास: ाीन साल पहले
मैं : वाह तीन साल में अपना घर
तो
वेरी गुड
विकास: तो वहां कौन कौन था
मैं : रणबीर
विकास: बेशरम की हीरोइन को पहचानते हैं?
विकास: ंनयी है न नाम नहीं जानते
मैं : पल्लवी
विकास: अच्छा...
आपको कौन अच्छा लगता है सबसे. हीरो में
विकास: आमिर खान
मैं : क्या??
विकास: आमिर खान
मैं : क्यों?

विकास: उससे हम मिला हूं न...
मैं : अच्छा, मिले थे तो क्या बात हुई...

विकास: बात क्या हाय हल्लो हुआ. वो आये थे न...उसकी फिल्म रिलीज हुई थी न पीपली लाइव. तो यूनियन पार्क में एक शो था. ठीक है.वही आया था. वो और सलमान अच्छा है...
अच्छा सलमान भी अच्छा है. क्यों अच्छा है??
विकास: क्योंकि वो बहुत अच्छा है. उसके जैसा तो कोई नहीं है
लेकिन क्यों अच्छा है. कुछ रीजन तो होगा...?

विकास: वो दूसरों की मदद करता है. पहली बात. दूसरी बात. मेरे भाई के बच्चे भर्ती था. भाभा हॉस्पीटल है न ये...वहां वो आया था. देखने के लिए. वो वहां हर हफ्ते आता है. बच्चा लोग को देखने. एक्चुअल में जो वहां बच्चों का बनाया गया है न...वो यही देता है.मतलब खर्चा सलमान ही देता है. कभी जाओ देखो. क्या बनवाया है. बहुत भीआइपी बनाया है.
मैं :  वाह...
विकास : वो सलमान वहां रहता है न बैंड स्टैंड में...वहां जाकर देखिए कितना का हेल्प कर देता है. ऐसे ही.
हां, सोशल वर्क तो काफी होता है उनका...
हां, अच्छा है वो...
विकास: रणबीर से पूछे कि नहीं कि कट्रीना के घर काहे घूमता रहता है हमेशा?
मैं :  हाहाहा
विकास: मैं अक्सर उसी के बिल्डिंग के पास देखता हूं. वो वाटरफील्ड रोड के पास रहता है. वो है न क्या बोलते हैं उसके बोरा बोरा उसी के सामनेवाले बिल्डिंग के पास उसको देखता हूं.
मैं :  अच्छा...
लेकिन जवाब अच्छे देते हैं?
विकास: हां, तो अच्छे घर से है. तो अच्छा ही जवाब देगा.
विकास: ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्म को हिट नहीं कराना चाहिए. लेकिन करा देते हैं लोग...मैडम. हमको तो अच्छा नहीं लगा...
विकास: अच्छा  लेफ्ट लूं कि राइट

राइट ले लीजिए...
और आ गया कलीना