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20130204

नीरज की हर स्क्रिप्ट स्पेशल है : जिम्मी शेरगिल


जिम्मी शेरगिल पंजाबी हैं. लेकिन उनकी हिंदी भाषा पर जो कमान है, उसे सुन कर यह अनुमान लगा पाना कठिन है कि वह किस प्रांत से हैं. गोरखपुर में जन्म, फिर लखनऊ में पढ़ाई होने की वजह से जिम्मी का हिंदी उच्चारण स्पष्ट है.  यह खूबी  उन्हें बॉलीवुड के अन्य अभिनेताओं से अलग करती है. जल्द ही वे स्पेशल 26 में नजर आयेंगे 

जिम्मी अपनी पिछली फिल्म राजधानी एक्सप्रेस की नाकामयाबी से दुखी तो हैं. लेकिन वे मानते हैं कि हर बार लक आपका साथ दे ऐसा नहीं होता. बातचीत जिम्मी से...

स्पेशल26  में आपका किरदार किस तरह का है?
इस फिल्म में मेरा कैरेक्टर रणवीर सिंह का है. रणवीर सिंह.सब इंस्पेक्टर है. फिल्म की पृष्ठभूमि 80 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है. रणवीर सिंह फिल्म में अजय सिंह और शर्माजी का पहला शिकार होता है. जिसे ये लोग लूटते हैं. रणवीर सिंह काफी उतावला रहने वाला व्यक्ति है. उसने तुरंत तुरंत नौकरी ज्वाइन की है. लेकिन उसे लगता है कि वह जो कुछ जानता है. सोचता है. सब सही सोचता है. लेकिन उसे क्या पता था कि उसे नौकरी के शुरुआती दिनों में ही कोई चकमा देकर चला जायेगा. रणवीर सिंह जोशिला है, भड़कीला है. वह ओवर इंथुथियाज में वह कुछ कभी ऐसा बोल जाता है. जो उसे बोलना नहीं चाहिए. बड़े बड़े अफसर खड़े हैं. लेकिन वह अपनी धुन में रहता है. शर्माजी एंड गैंग को पकड़ने और गुत्थी सुलझाने में रणवीर भी कोशिश करता है कि वह गुत्थी को सुलझाये. लेकिन वे लोग हाथ नहीं आ पाते. तो कुछ ऐसा ही मेरा किरदार. मजेदार किरदार है. जिस तरह की हिंदी मैं फिल्म में बोल रहा हूं. वह सुन कर तो आप निश्चित तौर पर हंसेंगे.
त्र नीरज पांडे गंभीर निर्देशकों में से एक माने जाते हैं. उनकी पहली फिल्म से ही उन्होंने खुद को स्थापित कर दिया था. ऐसे में उन्होंने आपको अपनी दोनों फिल्मों में कास्ट किया. तो नीरज से कॉलब्रेशन कैसा हुआ आपका?
ये 2002-2003 की बात होगी. नीरज ने मुझे यूं ही किसी माध्यम से स्क्रिप्ट दी थी पढ़ने के लिए. उस वक्त तो हमलोग अच्छे दोस्त भी नहीं थे. लेकिन उस सिक््रप्ट को पढ़ने के बाद मैं लगातार नीरज से मिलता रहता था. हमारी बात होती थी और ऐसे ही हमारी दोस्ती हो गयी.लेकिन इसका मतलब नहीं कि उसने इसलिए मझे अपने किरदारों में चुना है क्योंकि हम अच्छे दोस्त हैं, बल्कि नीरज के साथ मैं काफी डिस्कस करता हूं. उसकी सारी स्क्रिप्ट पर. और मैंने अब तक उसने जितनी स्क्रिप्ट लिखी है. वह सारी पढ़ ली है. वह मेरे व्यवहार, मेरी खूबियां, कमियों से वाकिफ है. सो, मैं मानता हूं कि वह मुझमें से कुछ अलग निकाल कर लाता है. पहले नीरज की प्लानिंग वेडनेस डे बनाने की नहीं थी. लेकिन अचानक उन्होंने तय किया था कि वह पहले ये बनायेंगे. नीरज ने अब तक अपने पास लगभग 12 -14 स्क्रिप्ट तैयार रखी है. और उनमें से एक भी कोई ऐसी स्क्रिप्ट नहीं है. जिसे कोई भी न कहेगा. कमाल की और ऐसी ही चौंकानेवाली फिल्में बनेंगी.नीरज की स्क्रिप्ट की खासियत यह होती है कि वह जब नैरेशन देते हंै तो 40 मिनट के अंदर आप तय कर लेते हंै कि आपको फिल्म करनी है.
इस किरदार के लिए आपने कोई खास तैयारी की या कहीं से किसी संदर्भ से मदद ली?
नहीं,चूंकि नीरज के साथ तो स्क्रिप्ट ही होती है. हां, लेकिन डायलॉग को लेकर नीरज ने थोड़ी छूट दी थी मुझे. वेडनेस डे में थोड़े रेफरेंस लिये थे इसमें. लेकिन इस फिल्म के किरदार का सबकुछ ओरिजनल है.
जिम्मी, आपकी शुरुआत माचिस से हुई थी. लेकिन तीन सालों के अंतराल के बाद आपने दोबारा फिल्म मोहब्बते से बड़ी शुरुआत की. तीन सालों के अंतराल की कोई खास वजह रही थी?
दरअसल, माचिस में मेरा छोटा किरदार था. म. इसी दौरान मुझे जहां तुम ले चलो नामक एक फिल्म मिली थी. गुलजार साहब ने ही गीत लिखे थे और विशाल भारद्वाज ने संगीत दिया था. तो उस वक्त वह फिल्म हालांकि रिलीज नहीं हो पायी. फिर मैंने दोबारा मुंबई की तरफ रुख किया. फिर मोहब्बते से एक नयी शुरुआत हुई.
पंजाब में लोग आपको शाहरुख खान मानते हैं.
ये सारा कमाल मनमोहन सिंह( प्रतिष्ठित सिनेमेटोग्राफर) का था. उन्होंने यारा नाल बहारां बनई. इस फिल्म ने वहां ऐसी कमाई की थी, जैसा किसी पंजाबी फिल्म ने नहीं किया था.

जिंदगी में दोस्ती की खास अहमियत: अभिषेक



अभिषेक कपूर की पहली फिल्म थी आर्यन. लेकिन उन्हें लोकप्रियता मिली फिल्म रॉक आॅन से. अब रॉक आॅन के बाद अभिषेक कपूर अपनी नयी फिल्म काय पो छे के साथ निर्देशन के लिए तैयार हैं. काय पो छे...चेतन भगत की किताब 3 मिस्टेक्स आॅफ माइ लाइफ पर आधारित है और अभिषेक इस फिल्म को लेकर बेहद रोमांचित हैं

अ भिषेक कपूर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत अभिनय से की थी. लेकिन वे इसमें संतुष्ट नहीं रहे और उन्होंने अपनी राह बदली. राह बदलने का यह फायदा हुआ कि वे बतौर निर्देशक युवाओं के पसंदीदा निर्देशकों में से एक बन गये हैं. जल्द ही उनकी फिल्म काय पोछे रिलीज हो रही है और दर्शकों को इस फिल्म का इंतजार है.
त्र काय पो छे बनाने का ख्याल कैसे आया?
मैंने कई सालों पहले ही चेतन भगत का उपन्यास पढ़ा था. 3 मिस्टेक्स आॅफ माइ लाइफ़ . उस वक्त मैंने 2 स्टेट्स भी पढ़ी थी और चेतन की इच्छा थी कि मैं इस पर फिल्म बनाऊं. लेकिन मेरी इच्छा हमेशा से 3 मिस्टेक्स को लेकर ही थी. क्योंकि इस कहानी में प्यार दोस्ती मोहब्बत, लड़ाई. युवा लोगों के सपने सबकुछ है. सो, मुझे लगा कि मैं इस पर अच्छे तरीके से फिल्म बना सकता हूं. चूंकि मेरी जिंदगी में भी दोस्ती की खास अहमियत है और मुझे युवाओं पर फिल्में बनाने में अच्छा लगता है.
त्रआपकी फिल्म रॉक आॅन काफी कामयाब रही थी. लेकिन इसके बाद आपने एक लंबी चुप्पी साध ली. फिर लंबे अंतराल के बाद आ रही है आपकी फिल्म. इसकी कोई खास वजह?
नहीं कोई खास वजह नहीं है. इस फिल्म पर भी मैंने काफी पहले से काम शुरू कर दिया. अब जबकि यह थोड़ी अलग तरह की फिल्म है तो निश्चित तौर पर फिल्म बनाने में वक्त तो लगता है. इस फिल्म की स्क्रिप्ट पर मैंने काफी काम किया है. काफी समय दिया है. कई ड्राफ्ट लिखे. कई पसंद आये कई नहीं.
त्र इस बार आपने सारे नये चेहरों को लिया है?
हां, जिस वक्त फिल्म की कास्टिंग हो रही थी उस वक्त राजकुमार की कोई फिल्म नहीं आयी थी. राजकुमार यादव भी नये थे, सुशांत सिंह भी नये थे. पहले मुझे लगा था कि नये चेहरे हैं. पता नहीं कैसा काम करेंगे. लेकिन मेरे कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने यकीन के साथ कहा था कि मेरी कहानी के लिए यही सारे किरदार ही महत्वपूर्ण है और यही फिट बैठेंगे. मुझे खुशी है कि मैं नये चेहरों को मौके दे रहा हूं.
त्र इन दिनों बॉलीवुड में नये चेहरों को लगातार मौके मिल रहे हैं. इस पर आपका नजरिया?
क्या वाकई? मैं नहीं मानता. मुझे तो लगता है कि और भी फिल्में बननी चाहिए और नये चेहरों को मौके मिलने चाहिए. लेकिन बॉलीवुड में अभी भी केवल कुछ स्टार्स ही हैं. सारी फिल्में उनपर ही घूम फिर कर आती हैं. जबकि नये चेहरों की इंडस्ट्री को जरूरत है. नयी कहानियों की जरूरत है. मुझे नये लोगों के साथ काम करके बेहद मजा आया और मैं मानता हूं कि नये चेहरे ज्यादा अच्छी तरह से काम करते हैं. और इस बात से स्पष्ट है कि मेरा काम बेहतरीन तरीके से हुआ है.
त्र फिल्म की शूटिंग आपने गुजरात में की है?
हां. मेरी कहानी का अहम हिस्सा है गुजरात. सो, मैं नहीं चाहता था कि मैं सेट तैयार करवाऊं. मैं चाहता था कि मैं रियल फ्लेवर दूं. सो, मैंने वहां शूटिंग की है. जैसा कि आप देख रहे हैं कि फिल्म का शीर्षक ही वहां से है. इसका सीधा मतलब है कि फिल्म में गुजरात का टच तो होगा ही.
त्र फिल्म स्पोर्ट्स को अधिक तवज्जो दे रही है?
नहीं, यह सिर्फ स्पोर्ट्स की कहानी है. स्पोर्ट्स तो बहाना है. फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गयी है कैसे रिश्तों के बीच दोस्ती और सपनों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की गयी है.
त्र फिल्म का शीर्षक कैसे जेहन में आया.
काय पो छे का मतलब है जब हम पतंग उड़ाते हैं तो कैसे किसी की पेंच काटने पर हम चिल्लाते हैं...काय पो छे. फिल्म में इस शीर्षक की सार्थकता इस लिहाज से है कि तीन दोस्तों की जिंदगी किस तरह बदलती है. वे आपको फिल्म देखने के बाद स्पष्ट हो जायेगा.
त्र आप अभिनय को मिस नहीं करते
ंनहीं, अब तो बिल्कुल नहीं करता. क्योंकि मुझे लगता है कि निर्देशन ही मेरे लिए परफेक्ट फील्ड था. जरूरी नहीं कि हर इंसान सबकुछ करे. वैस ेएक्टिंग से अधिक निर्देशन का क्षेत्र दिलचस्प है. मजा आ रहा है. नये लोगों से सीखने का मौका मिलता है. सिखाने का मौका मिलता है. तो खुश हूं कि मैंने फील्ड चेंज की.

फिल्मों से इतर भी एक हसीन दुनिया है मेरी : अनुपम खेर





अनुपम खेर को जितना फिल्मों से प्यार है उतना ही थियेटर से भी. वे सामाजिक मुद्दों में भी अपनी न सिर्फ रुचि रखते हैं, बल्कि जरूरत हो तो अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं और गतिविधियों में भी शामिल होते हैं. बॉलीवुड में ऐसे अभिनेता शायद ही हों जो एक साथ कई गतिविधियों में शामिल हों. अभिनेता होते हुए भी वह अपने एक्टिंग स्कूल के माध्यम से नये एक्टर भी तैयार कर रहे हैं. जल्द ही अनुपम खेर स्पेशल 26 में महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आनेवाले हैं. फिल्म के संदर्भ में व कई मुद्दों पर अनुपम खेर ने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.

 अनुपम खेर के एक्टिंग इंस्टीटयूट एक्ट्स प्रीपेयर्स की ही खोज है दीपिका पादुकोण. दीपिका पादुकोण के अलावा रणबीर कपूर जैसे कलाकार भी उनके एक्टिंग स्कूल में प्राय: छात्रों से मिलने आते हैं.

 अनुपम, आप मीडिया से काफी कम बातचीत करते हैं. खासतौर से फिल्मों को लेकर. कोई खास वजह.
जी नहीं, ऐसा नहीं है. आपने अगर गौर किया होगा तो मैं हमेशा अन्ना आंदोलन का अगुवाही रहा हूं और उस वक्त भी मैंने खुल कर आम लोगों से बातचीत की है. हां, फिल्मों के संबंध में बातें करने में. मेरा मतलब फिल्मों के प्रोमोशन को लेकर है. मैं फिल्मों के प्रोमोशन में थोड़ा कंजूस हूं. मुझे लगता है कि लोग सीधे तौर पर फिल्म देखें. फिल्म अच्छी होगी तो लोग पसंद करेंगे ही. मैं प्रोमोशन को अहम हिस्सा नहीं मानता. इसके साथ ही साथ मैं कई गतिविधियों में व्यस्त रहता हूं. अब भी फिल्मों से अधिक मेरे लिए मेरा इंस्टीटयूट, मेरा देश और थियेटर अहम है.
स्पेशल 26 में आपके किरदार के बारे में बताएं. नीरज पांडे के साथ यह आपकी दूसरी फिल्म है?
स्पेशल 26 मेरे लिए वाकई स्पेशल है. चूंकि मैं कई सालों से इंडस्ट्री में हूं. लेकिन ऐसी कहानियों की कमी देखता हूं मैं. जैसी नीरज ने बनाई है. और इस बार जो उसने मुझे किरदार दिया है. इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि मेरा किरदार मुख्य किरदार के बिल्कुल पैरेलल है. हिंदी फिल्मों में अब भी सुपरसितारों को ही तो अहमियत मिलती है. फिर हमें तो लोगों ने कैरेक्टर आर्टिस्ट ही बना दिया है. लेकिन नीरज पांडे जैसे निर्देशक जब आपको ध्यान में रख कर किरदार लिखते हैं तो लगता है कि चलो किसी निर्देशक ने तो आपकी क्षमता का भरपूर इस्तेमाल किया है. स्पेशळ 26 में मेरा किरदार एक ठग का ही किरदार है, जो दूसरे ठग के साथ मिल कर सारी साजिश रचता है और जीतता जाता है. लेकिन एक टर्न ऐसा आता है कि वह फंस जाता है. इस फिल्म में मेरा किरदार कॉमिक भी है, जो कि मेरा पसंदीदा जॉनर है. नीरज पांडे के साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है. पहली फिल्म वेडनेस डे में भी उसने जो संजीदगी भरा किरदार दिया था. वह काबिलेतारीफ था. लोगों नें उसे पसंद किया था. इस लिहाज से नीरज पांडे मेरे पसंदीदा निर्देशकों में से एक हो गये हैं.
लेकिन ठग पर आधारित और भी फिल्में आती रही हैं, स्पेशल 26 में अनोखा क्या है?
ये हमारी आपकी सबकी प्रॉब्लम है. हम फिल्म देखे बिना कैसे अनुमान लगा लेते हैं कि अरे ये तो वैसी फिल्म है. सिर्फ किसी फिल्म के कुछ सीन मिल जायें या कोई एक ही अंदाज मिल जायें तो आप पूरी फिल्म को नकल बोल देते हैं. स्पेशल 26 उन सबसे अलग है. यह सिस्टम के अंदर बाहर चल रहे तमाशे को लोगों के सामने लाती है. साथ ही दर्शाती है कि हम तमाशबीन लोग कैसे मुर्ख बनते जाते हैं. काले धन की सच्चाई क्या होती है. क्यों ठगे जाने पर भी लोग शिकायत दर्ज नहीं करते. कोई बनावटी बातें नहीं कह रहा मैं. ऐसा होता है.
नीरज पांडे बतौर निर्देशक अपनी दूसरी पारी की शुरुआत कर रहे हैं इस फिल्म से. अब तक उनमें आपको क्या क्या विशेषताएं नजर आयीं?
सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि वह किसी की नहीं सुनता. वह अपनी सोच. अपनी अप्रोच में बिल्कुल स्पष्ट है. फिर चाहे अक्षय कुमार जैसा सुपरस्टार ही क्यों न हो. वह स्पॉनटेनिस चेंजेज के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता. यह दर्शाता है कि आपका होमवर्क कितना तगड़ा है. मुझे ऐसे निर्देशकों के साथ काम करने में मजा आता है जो पहले पेपरवर्क पर सबसे ज्यादा समय देते हैं और शूटिंग में बिल्कुल कम. इससे स्पष्ट होता है कि उनका विजन कितना दूरदर्शी है.
अनुपम आप कई दशकों से हिंदी सिने जगत के अहम हिस्से रहे हैं. क्या क्या बदलाव नजर आये हैं इस दौरान बॉलीवुड में. क्या कमियां या खूबियां देखते हैं.
खूबियां तो काफी हैं कि नये लोगों को मौके मिल रहे हैं. जब हम फिल्मों में आये थे या हम सक्रिय रहे तो उस वक्त घिसी पीटी कहानियों पर ही काम होता था. केवल सुपरस्टार के बच्चों की लांचिंग पैड के रूप में आती थीं फिल्में. लेकिन अब दौर बदला है. देखिए नीरज ने केवल एक ही फिल्म से पहचान बना ली. हमारे वक्त संघर्ष ज्यादा थे. आॅप्शन कम थे. हां, लेकिन जो कमी अब भी है वह यही कि फिल्मों के पोस्टर में हम अधिक नजर आते हैं. लेकिन फिल्मों में तो मेहनताना हमें मिलना चाहिए वह मिलता नहीं, उस पर हर दिन नये कानून सामने होते हैं कि एक्टर्स को इतना टैक्स भरना पड़ेगा. उतना टैक्स भरना पड़ेगा. तो ये सारी परेशानियां तो है हीं. एक बीच की खाई है जो तब भी थी अब भी है. अब फिल्मों में काम के लिए नहीं, मेहनताना के लिए संघर्ष करना पड़ता है. जैसा कि आप लोगों को पता ही है कि हाल ही में एक फिल्म के निर्देशक व निर्माता ने मेरे मेहनताना नहीं दिया था. उन्हें बार बार फोन किया. फोन पिक ही नहीं किया. अंतत: मुझे कोर्ट के माध्यम  से उन तक पहुंचना पड़ा और यह सिलसिला जारी है. लोगों को लगता है कि बस फोकट में काम करा लो.
एक बार आपके एक इंटरव्यू में मैंने पढ़ा था कि शिमला में जब आप अपने पूरे परिवार के साथ रहते थे. एक कमरे के मकान में. वहां एक पार्क में एक बेंच थी. जिस पर आपने कई बार अनुपम खेर लिखा था. सिर्फ इसलिए ताकि जब आप बहुत बड़े आदमी बन जायें और दोबारा वहां आयें और उसे देखें तो आपको याद रहे कि आपकी जमीन क्या है? आप मानते हंैं कि आज भी आप अपनी जमीन से जुड़े हैं.
निस्संदेह. इसमें कोई शक नहीं. मैंने जो भी हासिल किया है. मेहनत से किया है. परिवार का साथ मिला और जानता हूं कि मैं कहां से आया हूं. तो बिल्कुल जमीन पर ही रहता हूं. मेरा मानना है कि जड़ से कटना इंसान को खुद से काट देता है. पिछले साल जब मेरे पिता की मृत्यु हुई तो हमने इसका जश्न इसलिए मनाया कि पापा खुद ही कहते थे जिंदगी जश्न का नाम है. जो जिंदगी मुझे जीनी थी. वह मैंने जी. अब मेरे जाने के बाद तुम लोग मातम में न बैठ कर अपने काम में लगो. क्योंकि निरंतर चलते रहना जरूरी है. यही सारी बातें हैं जो मुझे जड़ से जोड़े रखती हैं. खासतौर से पापा की बातें. ये सारी चीजें जिंदा हैं तभी तो थियेटर को भी अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा बनाये रख पाने में अब भी कामयाब हूं.
एक्टर्स प्रीपेयर्स का अनुभव कैसा रहा है आपका. नये बच्चों से क्या सीखने की कोशिश करते हैं? और नये बच्चे जब कई उम्मीदें लेकर आते हैं तो आप कैसा महसूस करते हैं. क्या वाकई अभिनय का हुनर किसी इंस्टीटयूट से मिल सकता है.
हम यह कतई दावा नहीं करते कि हम बच्चों को कैंपस सेलेक् शन के रूप में काम दिलवा देंगे. और ऐसा इस क्षेत्र में है भी नहीं. मैं यह भी मानता हूं कि अभिनय का हुनर आपको ईश्वर से ही मिलता है. लेकिन हमारा संस्थान उससे मांझता है और कुछ नहीं. जिनमें कोई बात नहीं होती फिर भी वह एक्टिंग में आना चाहते हैं तो हम उन्हें समझाते हैं कि यह करियर उनके लिए नहीं. जहां तक बात मेरे अनुभव की है तो मैं जब भी नये बच्चों से मिलता हूं मुझे लगता है कि मैं अपने भूतकाल में चला गया हूं. हर दिन कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है. हाल ही में रणबीर आये थे मेरे इंस्टीटयूट में. उन्होंने बच्चों से न सिर्फ बातें की. बल्कि कई एक्ट करके भी दिखाये. उन्हें देख कर मैं फिर से अपनी जवानी में खो गया. मैं भी इतना ही ऊर्जा से भरपूर अभिनेता था.
कभी ऐसा नहीं लगा कि अब बहुत हो गया. रिटायर हो जाना चाहिए?
मैं किसी सरकारी नौकरी में तो हूं नहीं. उम्र से काम नहीं करता मैं. मैं दिल से काम करता हूं. जब दिल और शरीर दोनों थक जायेंगे तो आराम कर लूंगा.
अनुपम, आपने अब तक कई फिल्मों में काम किया है. लेकिन आपके दिल के करीब अब तक की आपकी सबसे पसंदीदा फिल्म और पसंदीदा किरदार कौन है.
मैं हम आपके हैं कौन को आज भी जब भी देखता हूं तो खुशी होती है कि मैं इस फिल्म का हिस्सा हूं. चूंकि जिस संस्कार को, फैमिली बांडिंग में मैं रहा हूं. यह फिल्म उन सारी चीजों को दर्शाती है. इसके अलावा मुझे अपना वेडनेस डे का किरदार, अभी जो स्पेशल 26 में किरदार है वह, दिल फिल्म का किरदार सब काफी पसंद है.
इन दिनों खलनायकों की भूमिका में कम नजर आ रहे हैं आप?
दरअसल, आपका प्रश्न यह होना चाहिए था कि मैं फिल्मों में ही इन दिनों कम नजर आ रहा हूं. अब वह दौर नहीं कि मुझे जो पसंद न हो. वह भी काम करूं. सो, मैं चूजी हो चुका हूं, वैसे भी फिल्मों से इतर मेरी एक दुनिया है. जिसमें मैं बेहद खुश हूं.
आप खुद को पारिवारिक व्यक्ति मानते हैं. इतने व्यस्त होने के बावजूद परिवार के लिए कितना वक्त निकाल पाते हैं?
यह तो आपको किरन ने पूछना चाहिए.
किरन खेर फिल्मों से अधिक टीवी में सक्रिय हैं. तो बतौर अभिनेता या गाइड आप उन्हें भी कुछ गाइड करते हैं?
अरे वह मेरी स्टूडेंट नहीं मेरी बीवी है. हां, यह जरूर है कि जब वह मुझसे कुछ डिस्कस करती है. तो मैं अपनी राय देता हूं. वैसे वह जो भी निर्णय लेती हैं सही ही लेती हैं. काम को एंजॉय करना बेहद जरूरी है. और कम समय में उन्होंने अपने जितने फैन बना लिये हैं. इतने सालों में तो मेरे भी नहीं हुए.
आप जिस फिल्म ( सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक) का हिस्सा है, वह आॅस्कर में मनोनित हुई है. कैसा महसूस कर रहे हैं आप?
मेरे दोस्त अनिल कपूर स्लमडॉग के वक्त आॅस्कर का हिस्सा बने थे. अब मेरी बारी है. मैं बेहद खुश हूं कि इस फिल्म से जुड़ने का मौका मिला. मैं बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहा हं. फिलहाल कुछ खास तैयारी नहीं है. नर्वस हूं मैं.
आपकी आनेवाली फिल्में?
चश्मे बद्दूर.



मेघा जैसी नहीं मैं : आंकाक्षा सिंह



कलर्स पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक ना बोले तुम न मैंने कुछ कहा का दूसरा सीजन शुरू हो चुका है. और दर्शकों को यह बेहद पसंद भी आ रहा है. शो में मेघा का लीड किरदार निभा रहीं आंकाक्षा सिंह अपनी दूसरी पारी की शुरुआत से काफी खुश हैं. पेश है अनुुिप्रया से हुई उनकी बातचीत के मुख्य अंश
 आंकाक्षा सिंह इस बात से बेहद खुश हैं कि उनके शो को इतनी लोकप्रियता मिली कि शो का दूसरा सीजन शुरू किया गया. और इस शो में उनके किरदार को भी बेहद पसंद किया जा रहा है. बातचीत आंकाक्षा से
आंकाक्षा, यह तो अच्छी बात है कि आपको दोबारा इस शो में लीड किरदार मिला है. लेकिन अपनी उम्र से बड़ा किरदार निभाने में कोई परेशानी नहीं हुई?
नहीं, बिल्कुल नहीं. मैं मानती हूं कि मैं एक्ट्रेस हूं. जो किरदार मिलेगा करूंगी. पहले तो मैं एक्टिंग की फील्ड में आना ही नहीं चाहती थी. लेकिन अब जब यह कर रही हूं तो जो भी किरदार मिलेगा निभाऊंगी. चूंकि मेरे किरदार को दर्शकों ने पसंद किया है. दूसरी बात है कि इस बार मेरे किरदार में कोई उम्रदराज किरदार तो दिखाया नहीं जा रहा है. कई टिष्ट्वस्ट आयेंगे किरदार में. जिसे देख कर मैं काफी खुश हूं. मजा आ रहा है कि दोबारा फिर से काम कर रही हूं.
शो से मिले ब्रेक का इस्तेमाल कैसे किया आपने?
मैंने इस ब्रेक में पूरा समय मां पापा के साथ बिताया. साथ ही कलर्स पर कई शो प्रसारित हो रहे थे. उसमें अपीयरेंस और साथ में गोल्डेन पेटेल्स अवार्ड में डांस करने का मौका मिला और वह भी अनिल कपूर के साथ.बहुत मजा आया. यह मेरे लिए सपने को सच करने जैसा था. मुझे खुशी है कि मैंने ब्रेक का मजा भारत के कई हिस्सों में घूम कर भी लिया.
क्या आपको लगता है कि किसी शो के दूसरे सीजन को भी दर्शकों का वही प्यार मिलता है. जो पहले को मिलता है.
बेशक , तभी तो यह शो दोबारा शुरू हुआ है. प6ोडयूर्स और चैनल ने सोच समझ कर ही तो निर्णय लिया होगा न. सो, मैं खुश हूं और दर्शकों को भी शो पसंद आ रहा है.
आपको कौन सी मेघा पसंद है. पहली वाली या अभी जो वर्तमान में मेघा है.
मैं दोनों को ही पसंद करती हूं. लेकिन अभी वाली मेघा को थोड़ा अधिक मेकअप में दिखाते हैं. लेकिन मुझे रियल लाइफ में मेकअप करना खास पसंद नहीं. इसलिए पुरानी मेघा के ज्यादा करीब हूं. लेकिन रीयल लाइफ में मैं मेघा जितनी शांत स्वभाव की नहीं हूं. और न ही मुझमें इतना धैर्य है. जितना मेघा में है. सच कहूं तो मैं मेघा जैसी हूं ही नहीं.
अपने शोज के अलावा रियलिटी शोज के आॅफर नहीं आये
एक डांसिंग शो का आॅफर मिला था और मुझे डांस बेहद पसंद भी है. लेकिन वक्त ही नहीं मिल पाता कि किसी और कामके बारे में फिलहाल सोचूं. वैसे मुझे डांस करना और कूकिंग बेहद पसंद है. तो एसे किसी शोज के आॅफर आयेंगे तो उसका हिस्सा जरूर बनूंगी.
अपने करियर से खुश हैं?
हां, बिल्कुल. कम समय में काफी कुछ मिल गया और अभी और मेहनत करना बाकी है.

हंगामा बरपाने की फितरत



कमल हसन की फिल्म विश्वरूप को लेकर काफी विवाद हुआ. विवाद शुरू करनेवाले व इसके पक्षदारों का मानना था कि फिल्म एक धर्म की भावन को आहत पहुंचाती है. सिनेमा जगत में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा. यहां जब जब सच्चाई बयां करने की कोशिश की गयी है. वे फिल्में विवादित रही ही है. कई बार मामला पब्लिसिटी का होता है. लेकिन इस बार बेफिजूल विवाद को खड़ा किया गया. कमल हसन पर आरोप था कि उन्होंने अपनी फिल्म में मुसलिम प्रांत की गलत छवि प्रस्तुत की है. जबकि फिल्म के नायक खुद मुसलिम समुदाय के हैं. यह पहली बार नहीं हो रहा. इससे पहले शाहरुख खान की फिल्म माइ नेम इज खान को लेकर भी ऐसे ही मुद्दे उठाये गये थे. कुछ दिनों पहले शाहरुख खान के एक पत्रिका को दिये गये इंटरव्यू की वजह से भी काफी हंगामा बरपा. जबकि इस पत्रिका में प्रकाशित इंटरव्यू को किसी ने ध्यान से नहीं पढ़ा. दरअसल, हंगामा करना हमारी फितरत में शामिल हो चुका है. हमें लगता है कि शोर शराबा करने से हम कुछ हासिल कर लेंगे. लेकिन हकीकत यह है कि हमारा अत्यधिक उतावलापन हमारे लिए ही घातक साबित हो रहा है. ऐसा क्यों होता है कि हमेशा फिल्मों पर व किताबों पर ही प्रतिबंध लगाया जाता है. क्या इसकी वजह यह है कि कई बार ये दोनों ही माध्यम बेबाकी से अपनी बात कह जाते हैं. कमल हसन की फिल्म को जिस तरह एक बड़ा मुद्दा बनाया गया. अगर आप फिल्म देख कर इस पर बात करेंगे तो बेहतर होगा. एक फिल्म सेंसर से पास कर दी जाती है. जो फिल्में सेंसर की परीक्षा में पास है. वह अन्य लोगों की नजर में फेल कैसे? ऐसे में तो प्रश्नचिन्ह केवल कमल हसन पर नहीं, बल्कि पूरी सेंसर बोर्ड की टीम पर भी है न. दरअसल, सच्चाई यह भी है कि हम भारत में अब भी सिनेमा को सबसे पहले मनोरंजन का माध्यम मानते हैं. बाद में कुछ और. हमारी आदत फिल्मों में मसाला फिल्में देखने की हो चुकी है. सो, जब भी कोई ऐसी मुद्दे के साथ फिल्म आती है तो दर्शक उसे देखना या दिखाना पसंद नहीं करते. लेकिन विश्वरूप जैसी फिल्मों का आगाज भारतीय सिनेमा में होना ही चाहिए. यह फिल्म न सिर्फ तकनीकी रूप से बल्कि अभिनय क्षमता के रूप में भी हॉलीवुड की फिल्मों को टक्कर देती है. हमें उस पहलू से भी इस फिल्म को देखना चाहिए. कमल हसन बेहतरीन अभिनेता हैं और संवेदनशील भी. ऐसे में अगर वे कोई ऐसी फिल्म बना रहे हैं तो निश्चित तौर पर उसमें कोई तो बात होगी. बेवजह हंगामा करने की फितरत हमें बदलनी होगी.

जन्मदिन के बहाने



हाल ही में रमेश सिप्पी का जन्मदिन उनके बेटे रोहन सिप्पी ने धूमधाम से मनाया. 23 जनवरी को उन्होंने अपने पिता के जन्म दिन पर ही अपनी आगामी फिल्म नौटंकी साला के पोस्टर्स व फर्स्ट ट्रेलर जारी किया. यह पहली बार था जब रमेश सिप्पी के बेटे ने उन्हें यह तोहफा दिया. इससे पहले सुनील आनंद ने अपने पिता देव आनंद के जन्मदिन के अवसर पर अपनी नयी फिल्म की घोषणा की थी. दरअसल, बॉलीवुड में इन दिनों जन्मदिन के बहाने भी कई फिल्मों का प्रोमोशन किया जा रहा है. राजेश खन्ना ने भी कुछ सालों पहले अपने जन्मदिन पर एक फिल्म की घोषणा की थी जो पूरी नहीं हो पायी, लेकिन यह हकीकत है कि बॉलीवुड की हस्तियों के लिए उनके जन्मदिन उनके फिल्मों के प्रोमोशन करने का खास बहाना होता है. आमतौर पर बॉलीवुड की हस्तियां जन्मदिन पर बर्थ डे पार्टी करती हैं. लेकिन अगर जन्मदिन के दौरान उनकी कोई फिल्म रिलीज होनेवाली होती है तो वह अपने बर्थ डे को भी प्रोमोशन का जरिया बना देते हैं. निश्चित तौर पर ये सभी हस्तियां जब छोटे रहे होंगे. बच्चे रहे होंगे. उनके लिए उनका जन्मदिन अपने दोस्तों से गिफ्ट हासिल करने का होता होगा. खुद अमिंताभ बच्चन ने यह बात बताई थी कि वह जब छोटे थे तो अपने जन्मदिन का बेसब्री से इंतजार करते थे ताकि उन्हें गिफ्ट्स मिले. लेकिन आज बॉलीवुड की हस्तियां इतनी प्रोफेशनल हो चुकी हैं कि अब उनके लिए उनका जन्मदिन भी किसी न किसी मकसद के तहत ही मनाया जाता है. कुछ महीनों पहले आदित्य चोपड़ा के बेटे ने भी अपने पिता यश चोपड़ा का 80वां जन्मदिन मनाया था. उस इस बहाने कई सालों के बाद यशजी ने मीडिया के सामने बात की थी. लेकिन उस वक्त भी मौका उनकी फिल्म की रिलीज का ही था. अमिताभ बच्चन का 70वां जन्मदिन कई दिनों तक चर्चे में रहा. चूंकि इस मौके पर उनकी पत् नी ने उन्हें खास गिफ्ट दिया था और खास आयोजन किया था. आमतौर पर जब भी आप सेलिब्रिटिज से पूछो कि वह अपने जन्मदिन पर क्या खास करना चाहते हैं. तो उनका जवाब होता है कि यह दिन उनके लिए कोई खास अहमियत नहीं रखता. लेकिन जब जश्न या फिल्मों के प्रोमोशन की बारी आती है. वे पीछे नहीं हटते. इससे स्पष्ट है कि बॉलीवुड की हस्तियां कोई मौका नहीं छोड़ते. किसी दौर में फिल्मी हस्तियां अपना जन्मदिन केवळ अपने लोगों के साथ शेयर करना पसंद करती थीं. लेकिन फिल्मों के बहाने अपने प्रोमोशन का इसे जरिया बनाना एक नया ट्रेंड है.

जंजीर बनाम जंजीर



फिल्म जंजीर के रीमेक में पुराने जमाने की क्लासिक फिल्म जंजीर का सुपरहिट गाना यारी है ईमान मेरा...शामिल नहीं होगा. चूंकि नये जंजीर के मेकर्स का मानना है कि यह गाना फिल्माने में काफी खर्च होगा और वे स्थिति में नहीं कि वे इसे फिल्माने पायें. क्लासिक जंजीर का जान था यह गीत. प्राण साहब पर फिल्माया यह गीत आज भी सदाबहार है और दर्शक उसे उतना ही पसंद करते हैं. आप इसी बात से अनुमान लगा लें कि फिल्म का रीमेक कैसा होगा. जिस फिल्म से उसका दिल ही छीन लिया गया हो. वह फिल्म कैसा आकार लेगा. यह तो वक्त ही बतायेगा. जंजीर के रीमेक को लेकर लंबे अरसे से चर्चा चल रही थी. पहले फिल्म में शेरखान की भूमिका के लिए अर्जुन को लिया जा रहा है. बाद में संजय दत्त आये. संजय दत्त को फिलहाल जो भूमिका दी गयी है व जो लुक दिया गया है. खबर मिली थी कि प्रियंका वह लुक देख कर डर गयी थीं. दरअसल, प्राण साहब वाली जंजीर में प्राण ने जो भूमिका निभाई थी. वह अपने आप में एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसे पार कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं. अगर जंजीर के नये मेकर्स इस सोच में हैं कि वे यारी है ईमान मेरा की जगह कोई आयटम नंबर का इस्तेमाल करेंगे और ऐसा होगा भी तो...तो निश्चित तौर पर वे हिट हो जाये. लेकिन जो सम्मान पुरानी जंजीर को मिला है. वह कभी हासिल नहीं हो पाये. इन दिनों निर्देशकों की नजर में रीमेक बनाना बेहद आसान काम हो चुका है. वे पुरानी फिल्मों के किरदारों को बस अपने मनमुताबिक नये लुक में तब्दील करते हैं और उन्हें रीमेक का नाम दे देते हैं. जबकि हकीकत यह है कि जंजीर जैसी कुछ फिल्में ऐसी हैं और हमेशा रहेंगी जिनके रीमेक बना कर वे पुरानी फिल्म की तौहीन कर रहे हैं. बल्कि यह एक गुस्ताखी ही होगी. प्राण साहब ने अपनी बायोग्राफी में जिक्र किया है कि किस तरह प्राण साहब को शेर खान के किरदार के लिए लगभग कई घंटों तक उसी मेकअप में रहना होता था. क्योंकि वे अगर बार बार मेकअप करते तो परफेक् शन नहीं आता, साथ ही उस मेकअप में काफी वक्त लगता था. किस तरह खुद निर्देशक प्रकाश मेहरा के साथ बैठ कर उन्होंने फिल्म की एडिटिंग पर भी काम किया था. क्या आज के दौर में किसी अभिनेता के पास उतना समय है. आज तो आलम यह है कि कौन किस फिल्म में क्या किरदार निभा रहे हैं. उन्हें वे भी पता नहीं होता. ऐसे में जंजीर को दोबारा से दर्शकों के सामने खड़ा करना कहां तक कारगर साबित होता है. यह तो आनेवाले दौर में ही पता चलेगा.

हंसल ke शाहिद



हंसल मेहता की फिल्म शाहिद इस वर्ष मामी फिल्मोत्सव की चर्चित फिल्मों में से एक रही थी. फिल्म की कहानी एक ऐसे वकील की कहानी थी, जो आतंकवाद के खिलाफ उन मासूम लोगों के हक की लड़ाई लड़ता था, जिन्हें केवल शक के आधार पर आतंकवादी मान लिया जाता है.फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे राजकुमार यादव शाहिद की भूमिका में हैं और फिल्म में वे खुद इसके भुक्तभोगी होते हैं. किसी के बहकावे में आकर सिर्फ एक बार जेहादी संगठन से जुड़ने के बाद फिर वहां से भाग आने के बाद, सिर्फ इसलिए उन्हें कई सालों तक जेल में रखा जाता है, क्योंकि उन पर आतंकवादी होने के आरोप लग जाते हैं. शाहिद जब जेल में पहुंचता है तो वह देखता है कि उसकी तरह कई ऐसे निर्दोष लोग हैं, तब वह तय करता है कि वह वकील बनेगा और ऐसे लोगों की मदद करेगा. जेल में ही उन्हें प्रोफेसरों का साथ मिलता है और वह अपनी पढ़ाई पूरी करता है. लगातार संघर्ष के बाद उसकी पढ़ाई पूरी होती है और फिर वह एक वकील बन जाता है. लेकिन वकील बनने के बाद जब भी वह किसी मासूमों की तरफ से केस लड़ता है. उसका बीता कल उसका साथ नहीं छोड़ता. लोग आज भी उस पर छींटाकशी करते हैं कि वे खुद भी आतंकवादी संगठन के हिस्से रहे थे. दरअसल, हंसल मेहता की यह फिल्म आतंकवाद के मसले को बिल्कुल अलग तरह से दर्शाती है. यह फिल्म उन मासूम लोगों के जीवन की कहानी बयां करती है, जो सिर्फ इसलिए मुजरिम हैं, क्योंकि वे शक के गिरोह में हैं. शाहिद हर लिहाज से एक महत्वपूर्ण फिल्म है. चूंकि इस फिल्म में ऐसे मुद्दों को उजागर करने की कोशिश की गयी है. जो आमतौर पर आतंकवाद पर आधारित फिल्मों में नहीं देखे जाते. जल्द ही रामगोपाल वर्मा की फिल्म 26-11 मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों पर ही आधारित है. लेकिन हंसल मेहता अब तक जितनी भी फिल्में ऐसे विषयों को लेकर बनाई गयी हैं, उन सब से ऊपर और गहराई से जाकर उन आम लोगों के मर्म को दर्शाती है जो आमतौर पर फिल्मों में नजर नहीं आता. न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व में कितने मासूम हैं, जो सिर्फ इस वजह से परेशानियां झेल रहे हैं. दर्द झेल रहे हैं कि वह मुसलिम हैं. गुअतनामो जेल इस बात का गवाह रहा है कि उसने कितने मासूमों को अपनी दीवारों में कैद कर रखा था. ऐसे सिस्टम के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं ऐसी फिल्में. हंसल बधाई के पात्र हैं. और हिंदी सिनेमा में ऐसी और भी फिल्में बननी चाहिए.

सम्मान की हकदार



इन दिनों बॉलीवुड में अवार्ड समारोह की भरमार है. लगातार समारोह हो रहे हैं. इस समारोह के सबसे अहम अवार्ड जिस पर सबकी निगाह रहती है. वह है बेस्ट एक्टर व बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार.वर्ष 2012 में निस्संदेह कई महिला प्रधान फिल्में आयीं और दर्शकों ने इन्हें पसंद किया. वर्ष 2012 में हर साल की तूलना में अधिक बेहतरीन फिल्में आयीं. इसमें कोई संदेह नहीं. शायद यही वजह रही कि इस बार हर अवार्ड समारोह में जूरी के लिए यह तय करना काफी कठिन था कि बेस्ट कौन है. इस वर्ष लगभग सभी महत्वपूर्ण अवार्ड समारोह में बेस्ट एक्ट्रेस का खिताब हर बार की तरह विद्या बालन को फिल्म कहानी के लिए मिला. और बेस्ट एक्टर के रूप ेमें सारे अवार्ड रणबीर कपूर को फिल्म बर्फी के लिए और इरफान खान को पान सिंह तोमर के लिए मिले. निस्संदेह दोनों ही बेस्ट भी थे. लेकिन जिस तरह अभिनेताओं में बेस्ट एक्टर का अवार्ड दो एक्टर्स में शेयर किया गया. उस तरह अभिनेत्रियों में भी यह अवार्ड शेयर किये जाने चाहिए थे. चूंकि पिछला साल 2012 इस बात का गवाह है कि यह साल पूरी तरह महिलाओं का रहा. अभिनेत्रियों ने जितनी मजबूत भूमिकाएं इस वर्ष निभायीं. शायद ही किसी वर्ष निभाई होंगी. फिर चाहे वह श्रीदेवी की फिल्म इंगलिश विंगलिश हो या रानी मुखर्जी की अय्या. प्रियंका चोपड़ा ने अपने करियर का बेस्ट बर्फी में दिया है. बर्फी में जितना बेहतरीन काम रणबीर कपूर ने किया. प्रियंका ने भी किया. लेकिन उन्हें किसी भी अवार्ड समारोह में यह सम्मान नहीं मिला. जबकि रणबीर कपूर पर फिल्माये गये कई सीन तो नकल के थे. अगर किसी ने फिल्म में मौलिकता से अपने किरदार को निभाया तो वह प्रियंका थीं. लेकिन इसके बावजूद वे वंचित रहीं. ऐसा क्यो? कि अभिनेताओं को उनके हिस्से का सम्मान मिले और अभिनेत्रियां वंचित रहे. पुरस्कार समारोह में अभिनेत्रियों को भी अवार्ड शेयर करने का मौका मिलना चाहिए था. दरअसल, हकीकत यही है कि अब भी हिंदी सिनेमा में महिलाएं  पुरुषों से पीछे ही हैं. उनके साथ किसी न किसी रूप में पक्षपात होता ही है. जबकि लगातार अभिनेत्रियां अपने किरदारों से साबित कर रही हैं. हिंदी सिनेमा में आज से नहीं शुरुआती दौर से ही पुरस्कारों में पक्षपात किया जाता रहा है. लेकिन आज के दौर में अभिनेत्रियां पुरस्कारों का खंडन  नहीं कर पातीं. दिल में भले ही उन्हें अफसोस होता होगा. मलाल होता होगा. लेकिन वह इसे कभी जाहिर नहीं होने देतीं. जबकि उन्हें सम्मान मिलना ही चाहिए.

किरदारों से वंचित कलाकार



 मनोज बाजपेयी को हाल ही में एक अंतरराष्टÑीय फिल्म के आॅफर मिले हैं. खुद मनोज इस बात से काफी खुश हैं. अनिल कपूर, इरफान खान, अनुपम खेर जैसे कलाकारों के बाद अब  मनोज बाजपेयी को भी विदेशी फिल्मों के आॅफर मिल रहे हैं. मनोज को यह आॅफर उनकी फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर की वजह से मिल रही है. चूंकि गैंग्स का प्रीमियर कान महोत्सव में किया गया था और फिल्म में उनके सरदार खान वाली दमदार भूमिका को दर्शकों ने काफी पसंद किया है. यही वजह है कि अब उन्हें नये आॅफर भी मिल रहे हैं. यह िहंदी सिने जगत के लिए अच्छी बात है कि यहां के कलाकारों को न सिर्फ बाहरी निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है, बल्कि वे सारी फिल्में आॅस्कर व कई पुरस्कार समारोह में नामांकित हो रही हैं. अनुपम खेर की फिल्म सिल्वर लिविंग प्लेबुक को आॅस्कर में आठ नॉमिनेशन मिले हैं. इससे पहले इरफान खान की फिल्म स्लमडॉग को भी अवार्ड मिले थे. इरफान की हालिया रिलीज फिल्म लाइ आॅफ पाइ को भी नॉमिनेशन मिले हैं. लेकिन इसके बावजूद हिंदी फिल्मों में अब भी इन कलाकारों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया है. आज भी ये कलाकार सुपरस्टार की पंक्ति में शामिल नहीं होते.मनोज बाजपेयी, इरफान खान कई अरसे से फिल्मी दुनिया में सक्रिय हैं. नवाजुद्दीन सिद्दकी जिन्हें इस वर्ष के लगभग सभी अवार्ड मिल रहे हैं. वे भी लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे. लेकिन उन्हें पहचान अब जाकर मिली है. इससे स्पष्ट है कि अब भी हिंदी सिनेमा में प्रतिभाओं की पहचान सही तरीके से नहीं की जा रही है. जबकि हिंदी सिने जगत में बेहतरीन कलाकारों की भरमार है. पंकज कपूर को हाल ही में उनके किरदार मंडोला के लिए काफी सराहना मिली. इससे पहले उन्होंने विशाल की ही फिल्म ब्लू अंब्रैला में केंद्र भूमिका निभाई थी. पंकज कपूर भी लंबे समय से हिंदी सिने जगत में हैं. लेकिन अब भी उन्हें वह पहचान नहीं मिली. वे किरदार नहीं मिले, जिसमें वे अपनी प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल करें. फिल्म सत्या के बाद ही मनोज ने खुद को साबित कर दिया था. लेकिन इसके बाद उन्हें लंबे अरसे के बाद सरदार खान जैसा किरदार मिला. दरअसल, हकीकत यह है कि हिंदी फिल्मों में ऐसी कहानियां ही कम बनती हैं जो कलाकारों को प्राथमिकता देकर बनाई जाये. बॉलीवुड में अब भी सुपरस्टार्स का ही जलवा है और आगे भी यह बरकरार ही रहेगा. जबकि ऐसी फिल्मों की भी जरूरत है जो कलाकारों को प्राथमिकता दे.

यह कैसा विज्ञापन ?



सिनेमा थियेटर में इन दिनों धूम्रपान निषेद को लेकर कई तरह के विज्ञापन दिखाये जा रहे हैं. हर फिल्म निर्माता से यह बात साफ कर दी गयी है कि वे अपनी फिल्मों से पहले इस विज्ञापन का प्रेजेंटेशन जरूर करेंगे. सरकार की तरफ से यह निर्देश तो दे दिया गया है. लेकिन उन्होंने धूम्रपान पर जो विशेष विज्ञापन जारी किया है. वह किसी खौफनाक फिल्म से कम नहीं लगता. हर फिल्म के पहले हिंदी व अंगरेजी में जो तंबाकू निषेद पर फीचर प्रेजेंटेशन दिखाये जा रहे हैं. वह हद से अधिक डरावने है. डरावने इस लिहाज से कि हर प्रेजेंटेशन में कई कैंसर पीड़ित मरीजों के उन हिस्सों को दिखाया जाता है जो कैंसर से ग्रसित भाग हैं. साथ ही कई कैसंर पीड़ित मरीजों को भी दिखाया जाता है. क्या इस तरह तंबाकू पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? आमतौर पर हम बच्चों को अस्पतालों से दूर रखते हैं. लेकिन इस लंबे अंतराल के लिए चलनेवाले फीचर प्रेजेंटेशन का क्या बुरा प्रभाव बच्चों पर नहीं होगा. सरकार की सोच है कि तंबाकू और धूम्रपान पर निषेद हो. तो वे उस तरह के विज्ञापन बनाएं. आखिर सिनेमा थियेटरों में केवल बड़े बुजुर्ग नहीं जाते. बच्चे भी जाते. हाल ही में इंकार फिल्म देखते हुए मैंने यह महसूस किया कि इस विषय पर सरकार का ध्यान खींचना जरूरी है. चूंकि मेरी ही बगल में एक बच्चा बैठा था. जो यह विज्ञापन देख कर बार बार रोने लगा. उसकी मां उसकी आंखें बंद करके  उसे अपने गले में लगा रही थी. ऐसा पहली बार नहीं हुआ. कई बार ऐसी स्थिति मैंने महसूस की है. आखिर आपका मुख्य उद्देश्य क्या है. विज्ञापन के माध्यम से संदेश पहुंचाना न. तो एक अच्छे विज्ञापन से भी यह तो संभव है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला में विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्म से पहले ऐसे विज्ञापनों की शुरुआत करने से मनाही कर दी थी. उन्होंने खुद गुलजार से गीत लिखवाये और फिर उस पर विज्ञापन बनवाया. हिंदी सिने जगत में क्रियेटिव लोगों की कमी नहीं है. और सरकार चाहे तो कई खूबसूरत और प्रभावशाली विज्ञापन बनाये जा सकते हैं. विशाल की तरह बाकी निर्देशकों को भी इसकी पहल करनी ही चाहिए. चूंकि यह नजरअंदाज करनेवाला मुद्दा नहीं है. हम थियेटर मनोरंजन के लिए जाते हैं. ऐसे में कई व्यक्ति सिर्फ इस विज्ञापन की वजह से उलटियां करने लगें या फिर तबियत खराब कर लें. बच्चे डर जायें तो यह कैसा मनोरंजन होगा. अच्छी फिल्मों को देखने की इच्छा भी मर जायेगी. सो जरूरी है कि यह तरीका बदला जाये.

टिकट टू हॉलीवुड



विधु विनोद चोपड़ा को पहली बार हॉलीवुड की किसी फीचर फिल्म को निर्देशित करने का मौका मिला है. विधु ब्रोकेन हॉरसेस नामक एक फिल्म का निर्देश्न कर रहे हैं. विधु ने दरअसल अपनी फिल्ममेकिंग की पढ़ाई लांस एंजिल्स से पूरी की थी. उस वक्त उन्होंने 20 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी और वह आॅस्कर के लिए मनोनित हुई थी.  इससे पहले शेखर कपूर ने हॉलीवुड के लिए फिल्म क्वीन एलिजाबेथ बनाई थी और फिल्म काफी सफल रही थी. आॅस्कर में भी इस फिल्म को बेस्ट कॉस्टयूम डिजाइनर के लिए अवार्ड मिला था. विधु की यह पारी हिंदी सिनेमा के निर्देशकों के लिए एक दूसरी पारी की शुरुआत है. चूंकि हिंदी सिनेमा की यह विडंबना है कि यहां दर्जनभर अच्छे निर्देशक हैं. लेकिन उन्हें ऐसे मौके नहीं मिलते. ऐसे में अगर उन्हें ऐसे मौके मिल रहे हैं या फिर वे ऐसे मौकों को स्वीकार रहे हैं तो यह एक बेहतरीन शुरुआत है. हालांकि कई सालों पहले जब दादा साहेब फाल्के को विदेश में वहां के फिल्मी निर्माताओं ने यही कहा था कि वह यही रह कर फिल्में बनायें तो उन्होंने यही कहा था कि अगर वे वहां रह जायेंगे तो फिर भारत में फिल्म की फैक्ट्री शुरू कैसे होगी. उस वक्त दादा फाल्के अपनी सोच में बिल्कुल सही थे. लेकिन आज जब हिंदी सिनेमा ने 100 साल पूरे कर लिये हैं और कई कीर्तिमान स्थापित कर लिया है तो इस राह में भी अब निर्देशकों को आगे बढ़ना चाहिए. क्यों केवल अंगरेजी व हॉलीवुड फिल्मों की नकल में हिंदी सिने जगत सारा वक्त बर्बाद कर रहा है. जरूरत तो है कि विधु और शेखर की तरह ही उस तरह की सोच की फिल्में बनाने की, जो हॉलीवुड में बनती हैं और वही जाकर बनाई जाये. निश्चित तौर पर इससे हॉलीवुड का बॉलीवुड के प्रति बर्ताव व नजरिया तो बदलेगा ही. साथ ही वे भारत को केवल अपनी फिल्मों के प्रोमोशन व आय के लिए महज बाजार मात्र नहीं समझेंगे. सो, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि विधु के इस पहल को सराहना मिले.  अगह हिंदी सिने जगत के निर्देशक हॉलीवुड के लिए फिल्में बनाते हैं तो निश्चित तौर पर वे वहां की सिनेमा की संस्कृति, वहां होने वाले प्रयोग, वहां के ट्रेंड, माहौल, कमियां, खूबियां तकनीक से भी अवगत होंगे. फिर उस लिहाज से वे हिंदी फिल्मों में भी नये प्रयोग कर सकते हैं. हिंदी सिनेमा अपनी क्रियेटिविटी में हॉलीवुड से आगे हैं. फिलवक्त उसे जरूरत है तो खुद की तकनीक सुधारने की. और यह तभी संभव है जब हॉलीवुड और बॉलीवुड के बीच फिल्मी संस्कृति का विकास हो.

लोकप्रियता के चेतन



चेतन भगत के सबसे चर्चित उपन्यास 3 मिसटेक्स आॅफ माइ लाइफ पर निर्देशक अभिषेक कपूर ने फिल्म काइ पो छे का निर्देशन किया है. इस फिल्म में राजकुमार यादव और सुशांत सिंह राजपुत मुख्य किरदार निभा रहे हैं.चेतन भगत के ही उपन्यास 2 स्टेटस पर करन जौहर फिल्म का निर्माण कर रहे हैं. और इस फिल्म में आलिया भट्ट मुख्य किरदार निभा रही हैं. चेतन भगत के उपन्यास वन नाइट एट ए कॉल सेंटर पर भी फिल्म का निर्माण किया जा चुका है. सोहेल खान ने हेलो नामक फिल्म का निर्देशन किया था. चेतन भगत वर्तमान में सबसे चर्चित लेखकों में से एक हैं, जिनकी लगभग हर कहानी पर फिल्में बन रही हैं. राजकुमार हिरानी की फिल्म 3 इडियट्स के भी कुछ हिस्से उनके उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन से लिये गये हैं.स्पष्ट है कि चेतन भगत की किताबों व कहानियों में ऐसे कई तत्व होते हैं जो निर्देशकों को फिल्में बनाने के लिए प्रेरित करते हैं. चेतन भगत न सिर्फ मेट्रो में बल्कि आम भारतीय युवाओं में भी काफी लोकप्रिय हैं. गर्ल्स हॉस्टल में मैंने जितना लोकप्रिय चेतन को देखा है. शायद ही किसी अन्य लेखक को देखा है. रांची के हॉस्टल में अपने 6 साल के लंबे समय में मैंने जितनी चर्चा चेतन की किताबों को लेकर होते देखा है. अन्य लेखकों को लेकर वह सोच या वह दिलचस्पी नहीं देखी है. बीआइ मेसरा के विद्यार्थियों से लेकर संत जेवियर्स में पढ़नेवाली लड़कियां सबमें चेतन लोकप्रिय हैं. इसकी खास वजह यह रही है कि चेतन ने अपनी किताबों में अपने सपने, अपनी सोच को दर्शाया है. चेतन जानते हैं कि आम लोग उनसे किस तरह जुड़े हैं. सो, उन्होंने वाकई फिल्मी दुनिया गढ़ी है अपनी कहानियों में. आम युवा इसलिए उनसे हमेशा प्रभावित रहे कि उनकी कहानियों में एक साथ सपने, प्यार, युवा जिंदगी की चर्चा होती है और आम युवाओं के लिए यही खास बातें हैं. सबसे खास सपने. जो सपने चेतन की किताबों में नजर आते हैं. वे सपनें ही आम युवाओं को इन कहानियों से जोड़ते हैं. दूसरी बात यह भी है कि चेतन को माउथ पब्लिसिटी का खास फायदा हुआ. ऐसा नहीं था कि निर्देशकों का ध्यान काफी दिनों पहले से उनकी कहानियों पर था. लेकिन अचानक निर्देशकों ने भी देखा कि उनकी लोकप्रियता कितनी है. जबकि चेतन से भी बेहतरीन कहानियां और बेहतरीन लेखक हैं, जिनकी कहानियां कही जानी चाहिए. लेकिन उन्हें वे मौके नहीं मिल पा रहे हैं. चेतन इस लिहाज  से भाग्यशाली रहे हैं. लेकिन चेतन की तरह ही अन्य नये लेखकों को भी मौके मिलने चाहिए.