20130108

एक अभिनेता की ऐसी भी कहानी



अनुराग कश्यप ने हाल ही में द लास्ट एक्ट नामक एक फिल्म रिलीज की. अनुराग की इस फिल्म के 12 निर्देशक हैं. और 12 शहर की कहानी है. लेकिन विषय एक है. फिल्म की शुरुआत और जिस आधार पर फिल्म की रफ्तार बढ़ रही थी यह फिल्म किसी सस्पेंस थ्रीलर जॉनर की ही फिल्म है. ऐसा अनुमान था. लेकिन फिल्म के अंत ने किसी सस्पेंस थ्रीलर फिल्म की तरह ही राज खोला और सामने थी एक अभिनेता की कहानी. किसी थियेटर से जुड़े एक ऐसे स्पॉट ब्वॉय की ये कहानी एक थियेटर से जुड़े, मन में एक्टर बनने का ख्वाब पालनेवाले एक ऐसे शख्स की कहानी. जो हर हाल में अभिनेता बनना चाहता है. लेकिन उसे मौके नहीं मिलते. तो वह खुद अपने लिए अपने तरीके से एक्टिंग की पाठशाला खोल लेता है और जिंदगी की वास्तविकता को खुद से अनुभव करता है. यह फिल्म एक थियेटर आर्टिस्ट के मर्म को भी खूबसूरती से बयां करती है. हिंदी फिल्मों में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जहां थियेटर या नाटक से जुड़े व्यक्ति की पीड़ा या उसके अंर्तद्वंद्व की कहानी प्रस्तुत हो सके. पुलिस का आम लोगों के प्रति नजरिया. चीजों को देखने का तरीका और फिर किसी की मौत पर शोर शराबा और उसकी तहकीकात करने के तरीके पर भी प्रकाश डाला गया है.  फिल्म की एक खासियत यह भी रही कि फिल्म में 12 शहरों के व्यवहार, उस शहर के मिजाज और विशेषत: उस शहर के पुलिस प्रशासन के मिजाज की स्थिति को खूबसूरती से दर्शाया गया है. फिल्म की कहानी आपको पूरी तरह इंगेज और इनवॉल्व करती है. एक अभिनेता की जिंदगी पर इससे पहले भी कई कहानियां बनी हैं. लेकिन द लास्ट एक्ट एक अलग ही रूप दिखाती है. भेड़चाड़ से दूर अनुराग ने एक अच्छी सोच को हरी झंडी दिखाई है. हिंदी सिनेमा को ऐसी स्वतंत्र और मौलिक फिल्मों की सख्त जरूरत है.

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