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20121127

मौलिक होगी मेरी तलाश : रीमा कागती



हनीमून ट्रैवल्स की कामयाबी के बाद रीमा कागती की दूसरी फिल्म तलाश. इस फिल्म में उन्होंने मिस्टर परफेक् शनिस्ट आमिर खान को निर्देशित किया है. रीमा का मानना है कि फिल्म बिल्कुल मौलिक है. और दर्शक इसे जरूर पसंद करेंगे. बातचीत रीमा से

रीमा कागती ने इससे पहले हनीमून ट्रैवल्स निर्देशित की है. लेकिन यह फिल्म उनके लिए सबसे खास है. चूंकि वे पहली बार थ्रीलर फिल्म बना रही हैं. रीमा मानती हैं कि जोया अख्तर के लेखन से उन्हें खास सहयोग मिला है और आमिर खान ने अपने अभिनय से फिल्म को खास बना दिया है.
कैसे बनी कहानी
यह कहानी दरअसल,जोया के जेहन की कहानी है. फिल्म में कुछ ऐसी घटनाएं हैं. जो वाकई में जोया के साथ घटी हैं. उसने इस बारे में जब मुझसे चर्चा की तो हमने इस पर थोड़ा लिखना शुरू किया और धीरे धीरे कहानी बढ़ती गयी और इसने फिल्म का रूप ले लिया. इसके बाद जोया और मैंने फरहान से बात की. फरहान ने आमिर से बात की और फिर यह कहानी आगे बढ़ी. मैं यहां एक बात और स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगी कि किसी भी थ्रीलर फिल्म की अपनी जरूरतें होती हैं. कई बार ऐसा होता है कि हम किसी फिल्म के एक दृश्य को दिखाते हैं तो लोग कहने लगते हैं कि यह चोरी है. मेरी फिल्म तलाश पूरी तरह से ओरिजनल स्क्रिप्ट है. और कहीं से भी इसका संदर्भ नहीं लिया गया.
आमिर-रानी का होमवर्क
आमिर खान और रानी मुखर्जी बिल्कुल मेरी तरह हैं. वे अपने किरदारों को लेकर काफी होम वर्क करना पसंद करते हैं. काफी रिहर्सल करते हैं. खुद मैं जब भी शूट करना शुरू करती हूं तो पहले खासतौर से इस बात का ख्याल रखती हूं कि मेरी सारी तैयारियां पेपर में बिल्कुल तय हो. आमिर रानी के भी इस स्वभाव से मुझे मदद मिली. आमिर को लेकर काफी बातें हो रही थीं कि उनका मेरा विवाद चल रहा है. बल्कि सच यह है कि क्रिेयेटिव लेवल पर बातचीत को लोग झगड़े का नाम दे देते हैं , जो बिल्कुल सही नहीं है.

करीना हैं स्पॉनटेनियस
करीना कपूर को ज्यादा होम वर्क पसंद नहीं है. मुझे शुरू शुरू इस बात से डर लगा था. लेकिन करीना कमाल की एक्ट्रेस हैं. वे बिना होम वर्क किये भी जब कैमरे के सामने आती हैं तो अपना अभिनय का भाग बेहतरीन तरीके से निभाती हैं. एक सीन में जिसे लेकर मैं काफी चिंतित थी. मुझे लगा था कि काफी टेक लेने होंगे. लेकिन उन्होंने फौरन कुछ ही टेक में सीन ओके करवा दिये.सो, मैं मानती हूं कि कैमरा आॅन होते ही करीना कमाल कर जाती हैं.
खास रहा अंडरवाटर सीन
हमें एक सीन की शूटिंग अंडरवाटर करनी थी. हमने मुंबई के एक जगह पर इसे शूट किया भी. लेकिन उसमें वह एक्यूरेसी नहीं आ पा रही थी तो फिर हमने उसकी शूटिंग स्पेशली लंदन के एक स्टूडियो में की. इस शॉट के लिए हम वहां मुंबई पुलिस की वही गाड़ी लेकर गये, जो लगातार फिल्म में इस्तेमाल किये जा रहे थे. चूंकि आमिर लगातार उसी जीप में घूम रहे थे. सो, कंटीन्यूटी बरकरार रखने के लिए हम वह गाड़ी भी वहां लेकर गये. यह फिल्म का सबसे टफ शॉट है.

सिनेमाई सफ़र की सेकेंड इनिंग

श्रीदेवी खुश हैं. उत्साहित हैं. उनकी कमबैक फिल्म इंगलिश-विंगलिश को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला. उनका मनोबल बढ़ा है और अब एक बार फिर से फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ रही हैं. माधुरी दीक्षित जल्द ही डेढ़ इश्किया और गुलाब गैंग में केंद्रीय भूमिका में नजर आने जा रही हैं. रवीना भी दोबारा फिल्मों में वापसी कर रही हैं. तो मनीषा कोईराला और करिश्मा ने अपनी फिल्में भूत रिटर्न और डेंजरस इश्क से उपस्थिति दर्ज करा चुकीं हैं. स्पष्ट है कि बॉलीवुड की बालाओं की यह गैंग जो कभी बॉलीवुड में अपने अभिनय से सबको चौंकाती रही हैं. एक बार फिर से सेकेंड इनिंग कर रही हैं. 


इंगलिश विंगलिश का फर्स्ट लुक जिस दिन लांच किया गया था. और जिस तरह श्रीदेवी को सेंसर सर्टिफिकेट के साथ बात करते हुए दिखाया गया था. और जिस तरह दर्शकों ने जम कर तालियां बजाई थीं. जाहिर हो चुका था कि दर्शक आज भी श्रीदेवी का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन असल परीक्षा फिल्म की रिलीज और उसकी सफलता पर आधारित थी. और उसमें श्रीदेवी पास हुईं. लंबे समय के बाद किसी फिल्म में एक ऐसी महिला की कहानी दिखाई गयी, जो अंगरेजी सिर्फ इसलिए सीखना चाहती है ताकि वह अपने परिवार वालों को खुशियां दे सकें. श्रीदेवी ने जिस जीवंतता से शशि का किरदार निभाया. दर्शक उनकी उम्र भूल गये और श्रीदेवी को तहे दिल से स्वीकार किया. श्रीदेवी जो कभी चुलबुली सी अदाकारा होने के साथ साथ  अपनी नृत्यशैली के लिए भी जानी गयीं, उन्होंने एक हाउस ह्वाइफ की भूमिका में भी खूब रंग बिखेरे. फिल्म इंगलिश विंगलिश के आखिरी दृश्य में जिस तरह शशि अपना स्पीच देती है. थियेटर के सभी लोग रोने लगते हैं. यह एक ऐसी फिल्म थी, जिसे कई लोगों ने अपनी मां को भी डेडिकेट किया. दरअसल, यह श्रीदेवी के अभिनय का कमाल था कि 14 साल की वापसी के बावजूद दर्शकों को श्रीदेवी में वही ताजगी नजर आयी. श्रीदेवी इस फिल्म को लेकर काफी नर्वस थीं. इसकी वजह यह थी कि वह जानती हैं कि बॉलीवुड के दर्शक अभिनेत्रियों को यहां दूसरी पारी खेलनी की भलिभांति इजाजत नहीं देते. कई अभिनेत्रियों ने जब भी दूसरी शुरुआत करने की कोशिश की है. नाकामयाब रही हैं. ऐसे में श्रीदेवी का नर्वस होना स्वभाविक था. लेकिन उनकी एक सफलता ने दरअसल, उन तमाम अभिनेत्रियों का मनोबल बढ़ा दिया है. जो अपनी दूसरी पारी की शुरुआत करने जा रही हैं. माधुरी दीक्षित ने अपने परिवार के लिए फिल्मों से दूरी बना ली थी. वे अमेरिका चली गयी थीं. वे अमेरिका तो गयीं. बस भी गयी थीं. लेकिन उनकी आत्मा आज भी बॉलीवुड में थी. वे वापस लौट आयीं और फिर से गुलाब गैंग और डेढ़ इश्किया से अपनी दूसरी शुरुआत कर रही हैं. लेकिन निश्चित तौर पर वे भी नर्वस हैं. चूंकि उन्होंने भी अपनी आधी जिंदगी इंडस्ट्री में ही गुजारी है. एक अभिनेत्री की उम्र इंडस्ट्री में कितने सालों की होती हैं. यह वह भी जानती हैं. श्रीदेवी लेकिन वाकई लकी रहीं कि उनकी सेकेंड इंिनंग में उन्हें कामयाबी का स्वाद चखने का मौका मिला. वरना, कम अभिनेत्रियां ही दूसरी पारी में यह स्वाद चख पाती हैं. किसी दौर में श्रीदेवी को बराबरी की टक्कर देनेवाली माधुरी भी अपनी सेकेंड इनिंग में नाकामयाब रही थीं. खुद माधुरी मानती हैं कि यह सच है कि आज भी निर्देशक उनके साथ काम करना चाहते हैं. लेकिन जब वे अपने अभिनय के आधार पर अपना मेहनताना मांगती हैं तो निर्माता चौंक जाते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि भले ही आज लोग माधुरी की तारीफ सार्वजनिक स्थलों पर कर दें. उनके मुस्कान के कायल हो जायें. लेकिन जब वह परदे पर आती हंैं तो लोग आज भी उनसे तेजाब वाली एक दो तीन की तरह थिरकने और अदाएं दिखाने की ही उम्मीद करते हैं. माधुरी बेहतरीन अभिनेत्री हैं. लेकिन यह भूला नहीं जा सकता कि उन्होंने शादी के बाद जब आ जा नचले जैसी फिल्म की,तो दर्शकों ने उन्हें सिरे से नकार दिया. निश्चि तौर पर वह डर आज भी माधुरी के मन में कहीं न कहीं होगा. क्योंकि एक कलाकार के लिए उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसकी लोकप्रियता व उसके दर्शक ही होते हैं. हिंदी फिल्मों में पिछले 20 सालों से लगातार कुछ पुरुष सुपरस्टार्स का ही दबदबा है. लेकिन वे सारी अभिनेत्रियां जो किसी दौर में शीर्ष पर थीं. आज उन्हें दर्शकों से वह प्यार नहीं मिल पा रहा. दरअसल, हिंदी फिल्मों की यह विडंबना है कि यहां अभिनेत्रियों की खूबसूरती को हमेशा सबसे अधिक दिलचस्पी दी गयी है. अभिनेत्रियों ने जहां घर बसाया. शादी की. बच्चे हुए. वे उनके कमबैक की कल्पना भी नहीं करते और अगर वे कमबैक करें भी तो उनकी रुचि खत्म हो जाती है. और यही वजह है कि किसी दौर में राजा हिंदुस्तानी जैसी फिल्मों से अपनी खास स्थान बना चुकीं करिश्मा कपूर जब डेंजरस इश्क जैसी फिल्मों से वापसी करती हैं और फिल्में नाकामयाब हो जाती हैं तो लोग सारा दोष अभिनेत्री पर ही मढ़ देते हैं. अक्सर जो अभिनेत्रियां कम बैक कर रही भी होती हैं. वे खुद पर कमबैक का टैग लगाने से कतराती हैं. इसकी वजह यही है कि कमबैक के तमगे से लोगों की दिलचस्पी उनमें घट जाती है. हाल ही में रानी मुखर्जी की फिल्म अय्या में जब बार बार रानी से यह बात कही जा रही थी कि यह उनकी कमबैक फिल्म है तो रानी इस बात पर ऐतराज जताती हुईं कह रही थी कि पिछले साल उनकी नो वन किल्ड जेसिका फिल्म आ चुकी है तो फिर अय्या को कम बैक क्यों माना जा रहा है. रानी की झंझलाहट इस बात को दर्शाती है कि कमबैक शब्द उनके लिए कैसे बाधा बनता है. फिल्म अय्या कामयाब नहीं रही. लेकिन फिल्म में रानी ने बेहतरीन तरीके  के कई नये डांस फॉर्म दिखाये. लेकिन फिर भी चर्चा इस बात की हुई कि अब रानी का दौर खत्म हो चुका है. रानी से हाल ही में तलाश फिल्म को लेकर मुलाकात हुई तो उन्होंने अपने मन की यह बात सामने जाहिर की, कि बॉलीवुड अभिनेत्रियों को दूसरा चांस नहीं देता. यह हरदम दिखते रहना जरूरी है. फिर चाहे फिल्में बुरी ही क्यों न हो. उन्होंने यह भी माना कि असफलता किसी भी कलाकार का मनोबल तोड़ती है. फिल्म नहीं चलती है तो मतलब दर्शक फिल्म देखने नहीं गये और जो भी मेहनत एक कलाकार करता है. वह बर्बाद हो जाता है. निश्चय ही रानी ने अय्या में अपने डांसिंग हुनर को एक स्तर दिया है. लेकिन फिर भी उन्हें नाकामयाबी ही मिली है और आगे उनके लिए फिल्मी रास्ते कठिन होते जायेंगे. वही दूसरी तरफ मनीषा कोईराला ने भूत रिटर्न से रिटर्न हुईं. लेकिन गुड़िया सी दिखनेवाली इस अभिनेत्री में अब न तो दर्शकों को रुचि है. न ही मीडिया को. जिस दिन मनीषा मीडिया से बात करने वाली थीं फिल्म भूत रिटर्न्स को लेकर. उस दिन करीना कपूर और यश चोपड़ा पर आधारित भी कई इवेंट्स थे मुंबई में. मीडिया ने करीना और य श चोपड़ा दोनों ही इवेंट्स को तवज्जो दी थी. मनीषा के इंटरव्यू में काफी कम मीडिया गयी थी. यह दर्शाता है कि मीडिया भी वर्तमान में ही जीता है. जबकि मीडिया के पुराने व वरिष्ठ पत्रकारों ने बताया कि कभी मनीषा से बातचीत के लिए लोगों की कतार लगी रहती थी. कोलकाता, मुंबई, दक्षिण में वे कितनी लोकप्रिय थीं. लेकिन आज दर्शक उन्हें पसंद नहीं करते. जबकि मनीषा एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं. लेकिन चूंकि अब वह पहले की तरह आकर्षक नहीं दिखतीं. दर्शकों ने उनमें दिलचस्पी लेनी छोड़ दी है. फिलवक्त मनीषा के पास कोई फिल्म नहीं है.
फिल्म मोहरा में तू चीज बड़ी है मस्त मस्त से दर्शकों के दिलों पर राज करनेवाली रवीना ने भी लंबे समय तक खुद को बरकरार रखने की कोशिश की. लेकिन वह भी नाकामयाब रहीं. हालांकि एक बार फिर से वह भी केंद्रीय भूमिका वाली फिल्म शोभना 7 नाइट्स कर रही हैं. बॉलीवुड की बबली गर्ल प्रीति जिंटा भी इश्क इन पेरिस से अपनी दूसरी पारी की शुरुआत कर रही हैं. लेकिन वे भी अपनी सफलता को लेकर संदेह में हैं. यही वजह है कि वे बार बार फिल्म की रिलीज को आगे बढ़ा रही हैं. मशहूर अभिनेत्री वहीदा रहमान इस संदर्भ में कहती हैं कि यह हकीकत है कि हिंदी फिल्मों में उम्रदराज अभिनेत्रियों के लिए सेंटर भूमिका वाली फिल्में कम बनती हैं. फिल्में महिलाओं को वक्त से पहले बूढ़ा बना देता है. उनकी जवानी छीन लेता है और कुछ दिनों के बाद मुख्य किरदार निभानेवाली अभिनेत्रियां भाभी, दीदी के किरदार में नजर आने लगती हैं. यह किसी भी अभिनेत्री के लिए डिप्रेशन की स्थिति हो जाती है. लेकिन फिर भी वर्तमान में कुछ निर्देशक यह हिम्मत दिखा रहे हैं कि वे पुरानी अभिनेत्रियों को लेकर भी फिल्में सोच रहे हैं तो यह एक सकारात्मक पहल हैं. अभिनेत्री जूही चावला भी किसी दौर में बेहतरीन अभिनेत्री थीं. लेकिन वे इन दिनों फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में ही नजर आती हैं. इन सबसे से परे तब्बू एक अपवाद हैं. तब्बू भी नहीं मानतीं कि वह कमबैक कर रही हैं. उनका कहना है कि वे शुरू से ही कम फिल्में करती थीं. हमेशा स्क्रीन पर न दिखने का मतलब फिल्में न मिलना नहीं होता. खुद की अपनी च्वाइस से भी वह फिल्मों से दूर रही हैं. लेकिन वे जब भी आयी हैं. कामयाब रही हैं. उनकी पिछली फिल्में चीनी कम कामयाब रही हैं और आनेवाले समय में वह क फिल्म में डाकू के किरदार में नजर आनेवाली हैं. साथ ही डेविड और लाइफ आॅफ पाइ जैसी फिल्मों का भी वह हिस्सा हैं. कमबैक अभिनेत्रियों में काजोल का नाम भी उन अभिनेत्रियों में से एक हैं, जिन्हें दर्शक हमेशा परदे पर देखते रहना चाहते हैं. आज भी दर्शकों को काजोल और शाहरुख की जोड़ी साथ साथ परदे पर देखने की इच्छा रहती है. काजोल ने भी हाल ही में स्पष्ट किया है कि वह जल्द ही एक अच्छी स्क्रिप्ट के साथ फिल्मों में काम करना शुरू करेंगी. मशहूर अभिनेत्री और अमिताभ बच्चन की बहू ऐश्वर्य राय बच्चन ने प्रेगनेंसी के बाद से फिल्मों से थोड़ी दूरी बनाई है. लेकिन वे जल्द ही वापसी करेंगे. लेकिन मीडिया व लोगों ने उन्हें भी कमबैक अभिनेत्रियों की फेहरिस्त में शामिल कर दिया है. ऐश्वर्य राय चूंकि गर्भवती होने के बाद काफी मोटी हो गयी थीं. तो लोगों ने यह कयास लगाने शुरू कर दिये थे कि अब वे फिल्मों में काम नहीं करेंगी. इस संदर्भ में भी वहीदा रहमान का कहना है कि लोग अभिनेत्रियों को जबरन मजबूर कर देते हैं कि वे काम न करें. जबकि कुछ दिनों की दूरी या ब्रेक के बाद अगर वह वापसी करें तो उन्हें कमबैक नहीं कह देना चाहिए. आखिर एक अभिनेत्री की भी अपनी दुनिया होती है. उसे भी आजादी से जिंदगी जीने का हक है. हेमा मालिनी मानती हैं कि हिंदी फिल्मों में हॉलीवुड की तरह वह हिम्मत ही नहीं है कि वह किसी महिला अभिनेत्री को लेकर मेरिल स्ट्रीप की तरह द आयरन लेडी फिल्म बनाये. अगर फिल्म बनेगी भी तो शायद दर्शक उसे पसंद नहीं करेंगे. सो, यह सच है कि बॉलीवुड में अभिनेत्रियों के काम की सीमा उनकी उम्र की सीमा पर ही आधारित होता है. बहरहाल, सेकेंड इनिंग कर रहीं अभिनेत्रियों में लोगों की निगाह माधुरी दीक्षित पर सबसे अधिक टिकी है. शीर्ष अभिनेत्रियों के साथ इन दिनों नीतू कपूर भी कई फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में नजर आ रही हैं. रेखा प्राय: राकेश रौशन की फिल्मों में नजर आती रही हैं. अनीता राज जैसी अभिनेत्रियों ने भी छोटी भूमिकाओं वाली फिल्मों से शुरुआत की है. कयास लगाये जा रहे थे कि रीना रॉय फिल्मों में वापसी करेंगी. लेकिन उन्होंने इसे सिर्फ अफवाह बताया है. 

स्थापित शोज की घटती लोकप्रियता



सलमान खान ने बिग बॉस सीजन 6 का तेवर बदला. उन्होंने इस शो में अपशब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगायी. शो का समय निर्धारित किया. लेकिन अफसोस यह शो इस वर्ष उतनी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाया. अब बिग बॉस के मेकर्स इसे लोकप्रिय बनाने के लिए वे हर हथकंडे अपना रहे हैं. जिससे शो को कुछ लोकप्रियता मिल जाये. बिग बॉस के घर को पहले तो टूरिज्म के नाम पर प्रमोट किया गया. फिर इस शो में नये नये प्रतिभागियों की एंट्री करवाई जा रही है. तो शो के प्रतिभागियों को मड से बने घरों में कुछ दिन बिताने पड़े. इमाम जैसे प्रतिभागियों को लाकर शो में जबरन रुचि बढ़ाने की कोशिश की जा रही है और अब इस शो में दुनिया की सबसे छोटी महिला बिग बॉस के घर में आ चुकी हैं. मसलन, बिग बॉस वे तमाम कोशिशें कर रहा है. ताकि दर्शकों की रुचि बरकरार रहे. कुछ इसी तरह सोनी टीवी का लोकप्रिय रियलिटी शो कौन बनेगा करोड़पति भी इस वर्ष अपनी लोकप्रियता खो रहा है. हालांकि इस वर्ष भी सोनाली मुखर्जी जैसी महिलाओं को लाकर ह्मुमन टच देने की कोशिश की तो जा रही है. लेकिन आम दर्शकों में इस वर्ष केबीसी को लेकर खास उत्सुकता नहीं है. दरअसल, हकीकत यह है कि ये तमाम शो हर वर्ष अपने नये कलेवर में आने की कोशिश तो करते हैं. नये सीजन का इन्हें नाम तो मिलता है. लेकिन शो का अंदाज बहुत हद तक एक सा होता है और यही वजह होती है कि दर्शक भी इस तरह के शो से बोर हो जाते हैं. निस्संदेह पिछले कई सालों से केबीसी और बिग बॉस ने कामयाबी हासिल की. लेकिन वे सारे सीजन कुछ न कुछ नया लेकर आते थे या यह भी कहा जा सकता है कि बिग बॉस व केबीसी ने अपना सर्वश्रेष्ठ अब दे दिया है. अब ऐसे शोज पर विराम लगना चाहिए. रामायण, महाभारत के भी सीक्वल आज भी टेलीविजन पर दिखाये जा रहे हैं.कुछ महीनों पहले मेरी सिद्धार्थ काक से बात हुई थी. सिद्धार्थ काक सुरभि जैसे शो के रचयिता थे. मैंने उनसे पूछा कि वे सुरभि का सीक्वल या नया सीजन लेकर क्यों नहीं आये. उन्होंने मार्के की बात कही थी कि कुछ चीजें एक बार हो तो उसका एहसास जिंदगी भर रह जाता है. जो माइलस्टोन बन चुके होते हैं. उन पर बार बार रगड़ दी जायेगी तो वे भी आम पत्थर हो जायेंगे. सुरभि आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है, क्योंकि उसका कोई सीक्वल नहीं बना. वह स्थापित रहेगा. सिद्धार्थ की यही बात काश, टेलीविजन के मेकर्स को भी समझ आये और वे कुछ नये प्रयोग करने की सोचें. न कि पुराने शोज को दोहराते रहे.

सोशल नेटवर्किंग पर मौत का जश्न


विगत 23 नवंबर को हिंदी सिनेमा जगत के लींजेडरी अभिनेता प्राण साहब की तबियत बेहद गंभीर थी. 92 वर्षीय प्राण साहब उधर जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे और इधर खबरें आनी शुरू हो चुकी थी कि प्राण साहब नहीं रहे. कई लोगों ने धराधर अपने सोशल नेटवर्किंग साइट पर स्टेटस डालना शुरू कर दिया कि नहीं रहे शेर खान...प्राण साहब को श्रद्धांजलि और इन दिनों अंगरेजी का एक नया शब्द जो काफी प्रचलन में है. वह है आर आइ पी यानी रेस्ट इन पीस... मुझे मुंबई से बाहर के कई मित्रों व आम मित्रों के टेलीफोन आये. प्राण साहब नहीं रहे न...जब मैंने कहा कि अभी वह ठीक हैं. तो लोगों ने कहा अच्छा, ऐसा कुछ हो तो प्लीज बता दीजियेगा. आखिर स्टोरी तो बनानी पड़ेगी न. कुछ ऐसा ही अभिनेता दारा सिंह के निधन पर भी हुआ था. अभी दारा सिंह अस्पताल में थे और लोगों ने उनके मौत का प्रचार शुरू कर दिया था. कुछ दिनों पहले ही मैंने एक व्यक्ति के फेसबुक स्टेटस पर पढ़ा कि हाइ फ्रेंड्स मेरे  ब्रदर इन लॉ का निधन हो गया है. सो, मैं कुछ दिनों के लिए फेसबुक पर नहीं रहूंगा. दरअसल, यह सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी दर्शाते हैं कि वर्तमान में हमारी मानसिकता क्या है. हमारे समाज की मानसिकता. आज हम किसी की मौत का मातम नहीं, जश्न मनाते हैं. हम कितने असंवेदनशील हो चुके हैं, यह हमारे स्टेटस से ही पता चल जाता है. जरा सोच कर देखें दुनिया के किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी मौत से पहले ही उसका मातम मनाया जाना, क्या बीतती होगी उस व्यक्ति पर. ऐसे में प्राण साहब की बेटी ने मीडिया पर अपने कड़े शब्द से ऐतराज जताया तो क्या बुरा किया. उधर बेटी पिता की लंबी आयु की कामना कर रही है और दुनिया के लोग उनकी मौत का जश्न मना रहे हैं. सच्चाई यही है कि आज हम खुद को सबसे पहले और सबसे तेज बनने की होड़ में खुद को असामाजिक प्राणी बना चुके हैं.

जानवर-इंसान के बीच बोते रिश्ते



निर्देशक एंग ली की लाइफ आॅफ पाइ एक ऐसे लड़के की जिंदगी पर आधारित है. जो तूफान की वजह से अपने परिवार से बिछुड़ चुका है. लेकिन वह एक लाइफ बोट और अपनी उम्मीदों व कोशिशों के कारण जिंदा है. साथ ही उस विरान जिंदगी में उसका एक साथी है. टाइगर. जो कि उसी तरह खुद को बचाने के प्रयत् न में जुटा रहता है. पाइ जो इस फिल्म का मुख्य किरदार है. फिल्म में उसके साथ ही साथ उस टाइगर को भी मुख्य केंद्र में रख कर फिल्म की कहानी बुनी गयी है. एक इंसान के एक जानवर से डर फिर उससे प्रेम और फिर अलगाव पर विलाप करने की यह कहानी दिल को छूती है. कुछ इसी तरह निर्देशक एस एस राजोबली की फिल्म मक्खी में भी मक्खी मुख्य किरदार में है. एस एस राजोबली ने फिल्म में अपनी परिकल्पना को उड़ान देकर इतनी खूबसूरती से मक्खी को एक नायक के रूप में प्रस्तुत किया है. दरअसल, हकीकत यह है कि यह सारी फिल्में कोई एनिमेटेड या बच्चों की फिल्में नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद निर्देशक ऐसे जीव जन्तुओं के साथ भी ह्मुन स्टोरी दिखा रहे हैं.  जो लाजवाब है. किसी दौर में फिल्मों में जब जानवरों का प्रयोग होता था. तो वे केवल अपने नायक या नायिका के लिए सिर हिलाने वाले जानवर या नौकर की तरह ही दिखाये जाते थे. राजेश खन्ना की हाथी मेरे साथी, तेरी मेहरबानियां का जैकी श्राफ का कुत्ते से प्यार हो. उन फिल्मों में जानवरों की उपस्थिति मूक होती थी. लेकिन अब निर्देशकों ने अपनी परिकल्पना को इतनी ऊंचाई और नवीनता प्रदान कर दी है कि लोग मक्खी जैसी फिल्में भी सोच सकते हैं. यह दर्शाता है कि अब इस तरह की फिल्में केवल डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का विषय नहीं है. फीचर फिल्मों में भी ऐसे विषयों को रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया जाये तो भाषा कोई भी हो. हर वर्ग के दर्शक को यह फिल्म प्रभावित करती है.

जज्बाती कहानियां छूती हैं मेरे दिल को : आमिर खान




दर्शकों को आमिर का दीदार साल में एक बार ही होता है. लेकिन उनके काम का असर लंबे समय तक बरकरार रहता है. शायद यही वजह है कि आमिर की भी पूरी कोशिश रहती है कि वे जब भी परदे पर आयें. नये अवतार में आयें. नया विषय लेकर आयें. इस बार भी वे फिल्म तलाश से दर्शकों से रूबरू होने जा रहे हैं. तलाश आमिर की पहली सस्पेंस थ्रीलर होगी.

 आमिर, बॉलीवुड में आप जल्द ही अपने करियर के 25 साल पूरे  करने वाले   हैं. फिर सस्पेंस थ्रीलर की फिल्म जाकर अब क्यों की? क्या इससे पहले कोई स्क्रिप्ट पसंद नहीं आयी थी. या कोई और खास वजह रही?
हां, यह सच है कि मैं जल्द ही इंडस्ट्री में अपने 25 साल का सफर पूरा करनेवाला हूं. और इन 25 सालों में. शुरुआती दौर को छोड़ दूं तो मेरी हर बार यही कोशिश रही है कि मैं दर्शकों को कुछ नया जरूर दूं. आप मेरी शुरू से लेकर अब तक की सारी फिल्मों को देख लें. आपको हर फिल्म में मैं अलग नजर आऊंगा. कोई किसी से मैच नहीं करता. जबकि बॉलीवुड में तो अब भी आप बाकी कलाकारों को देख लें. तो उन्होंने सारे काम एक ही जॉनर के किये हैं. लेकिन मैंने हमेशा नया करने की सोची. न सिर्फ  मैंने अपने फिल्म की कहानियों को अलग तरह से दर्शाई है. बल्कि मैंने अपने लुक में भी कभी एकरसता नहीं लायी. यार, मैं तो यह बात बिल्कुल मानता हूं कि एक्टर हूं तो काम करूं न कुछ अलग अलग़ ,मुझसे एक जैसा काम हो ही नहीं सकता. रीमा ने जब मुझे यह कहानी सुनायी. तो मैं इसमें दिल से इनवॉल्व हो गया था. मुझे फिल्म में वह दिल नजर आ रहा था. और मैं स्क्रिप्ट का दिल ही देखता हूं.  मुझे तलाश के किरदार इंटरेस्टिंग लगे. रीमा और जोया ने जिस तरह डेवलपेंट किया है. वह प्लॉट अच्छा है. अलग तरह का सस्पेंस है. सस्पेंस को जिस तरह से डेवलप किया है. जितने लेयर्स हैं. वह फिल्म की कहानी को कहीं और ले जाते हैं. आमतौर पर सस्पेंस फिल्मों में बहुत ज्यादा जज्बात नहीं होता. इस फिल्म में वह जज्बात भी है. इमोशन भी है और सस्पेंस भी है. जब रीमा मुझे कहानी सुना रही थी. नैरेट कर रही थी. मैं इन्वॉल्व हो गया था उसमें.  तो. मुझे यह सस्पेंस इंगेजिंग काइंड आॅफ जर्नी लगी. यूं तो सस्पेंस की कई कहानियां आयी हैं. लेकिन वे सस्पेंस थ्रीलर होकर रह जाती है. तलाश में कुछ अलग बात होगी. जो आप देखेंगे तो खुद समझ जायेंगे.

फिल्म में आपके किरदार के बारे में थोड़ा बताएंगे?
देखिए, यह फिल्म चूंकि सस्पेंस थ्रीलर है. तो किरदार के बारे में तो बहुत नहीं बता सकता. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि हर हर वक्त अपने किसी अपने को खोने के डर से ग्रसित रहते हैं या हर किसी ने जिंदगी में किसी न किसी अपने को खोया है. यह डर हमेशा बना रहता है. लेकिन उस डर के साथ स्थिति के साथ समझौता करके आगे बढ़ना. लेकिन दिल में कहीं बुरी तरह अकेलापन महसूस करना. यह फिल्म की कहानी का अहम पहलू है.  यही हर्ट आॅफ द स्टोरी है. फिल्म में ऐसा नहीं है कि कोई मार धाड़ हो रहा है. और अचानक पता चलता है. अच्छा तो हम जैसा सोच रहे थे. वैसा नहीं है. मुझे इस फिल्म में कई लेयर्स नजर आ रहे हैं और उम्मीद करता हूं कि दर्शक उन्हें पसंद करेंगे.

अपनो को खोने का डर क्या आपको कभी ऐसा डर लगता है ? आप क्या कभी व्यक्तिगत  एहसास से गुजरे हैं.
जी हां, मैं गुजरा हूं.  और मुझे लगता है कि हर कोई गुजरा है.  मैं तो खुद ही बहुत फिक्रमंद रहता हूं. हर वक्त मुझे मेरे परिवार की फिक्र लगी रहती है. जब मैं फ्लाइट से उतरता हूं तो अचानक किरन का मेसेज आता है कि फोन करो, तो मैं बहुत डर जाता हूं कि सबकुछ ठीक ठाक तो है न. कभी मैं दब शूटिंग कर रहा होता हूं तो मेरे परिवार को पता है कि मुझे डिस्टर्बएंस पसंद नहीं. लेकिन उनका मेसेज आता है कि फोन करो. तो मैं डर जाता हंू कि खुदा न खास्ते कहीं कुछ बुरा तो नहीं हुआ है. मैं डरता हूं  इन चीजों से. तो इस किरदार में भी मुझे ऐसा लगा कि मेरा जो किरदार है वह परिवार से बेहद प्यार करता है. लेकिन उसे जब किसी अपने को खोना पड़ता है तो उसके जिंदगी में क्या मोड़ आते हैं. पड़ाव आते हैं. कुछ ऐसी ही कहानी है. और मुझे लगता है कि हर कोई इस कहानी से कनेक्ट कर पायेगा. चूंकि हर किसी की जिंदगी में ऐसे पल आते ही हैं. जोया ने तो खुद यह अपने एक पर्सनल एक्सपीरियंस पर चार लाइन की कहानी लिखी थी. तो मुझे लगता है कि एक कनेक् शन होगा फिल्म से लोगों का.

पिछले लगभग 10-12 सालों से लगातार आप जब भी कुछ लेकर आते हैं. फिर चाहे वह फिल्म हो या फिर सत्यमेव जयते जैसे शोज. लोगों को उम्मीद हो जाती है कि किसी मेसेज के साथ आ रही है फिल्म. तलाश के साथ भी ऐसा कुछ होगा क्या?
 (हंसते हुए ) देखिए, इस बारे में तो मैं बस इतना ही कहना चाहंूगा कि ऐसा नहीं है कि मेरा चुनाव  ही बेहद निराला होता है. डेली बेली भी मैंने ही चुनी थी. लेकिन उसमें कोई मेसेज नहीं था. बल्कि वह तो बिल्कुल ही अलग फिल्म थी. गजनी भी एंटरटेनर फिल्म थी. बाकी कई फिल्में मैंने भी की है. जिसमें कोई सलाह या कोई संदेश नहीं होता. हां, लेकिन आप यह जरूर कह सकती हैं कि बाकी कलाकारों की अपेक्षा मैंने जितनी फिल्मों में काम किया है. उनमें से अधिकतर में मैंने उद्देश्यपूर्ण काम किया है. फिर चाहे वह रंग दे बसंती हों. लगान हो. पीपली लाइव हो.  तो लोगों ने मान लिया है कि मैं मेसेज वाली फिल्में ही करता हूं. लेकिन मेरा मानना है कि एक्टर हूं तो हर तरह की फिल्म करूंगा. एंटरटेनर वाली भी. मस्ती वाली भी. मेसेज वाली थी. जहां तक तलाश की सवाल है. यह भी आपको इमोशनल करेगी. यह आम मेनस्ट्रीम फिल्मों की तरह नहीं है.  अलग है. और मैं चाहूंगा कि लोग कहानी का मजा लें. सस्पेंस का मजा लें.फिल्म का जो इमोशनल कोर है. वह लोगों के दिल को छुएगी.

 प्राय: किसी भी फिल्म की स्क्रिप्ट उसके कलाकार को चुनती है तो इस फिल्म में आपने स्क्रिप्ट को चुना या स्क्रिप्ट ने आपको. 
 मेरा मानना है कि कोई भी स्क्रिप्ट जिस हिसाब से लिखी जाती है. एक लेखक की, निर्देशक की सोच और विजन और साथ साथ प्रोडयूसर की डिमांड होती है कि उन्हें किस एक्टर के पास जाना है. लिखते वक्त ही उन्हें आइडिया मिल जाता  है कि आप किस एक्टर के पास आप जायें. तो मेरा मानना है कि स्क्रिप्ट ही एक्टर को चुनता है.जहां तक इस फिल्म का सवाल है. मैंने पहले भी कहा कि मुझे स्क्रिप्ट पसंद आयी थी. मैं किसी भी फिल्म की स्क्रिप्ट काफी केयरफुली चुनता हूं तो इस फिल्म ने तो मेरा दिल जीत लिया था. तो मैंने हां कहीं. लगान के वक्त भी मुझे स्क्रिप्ट पसंद आयी थी. लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया था शुरुआत में. सरफरोश के लिए फौरन हां कह दी थी मैंने.

लेकिन हमने सुना कि रीमा से आपके काफी मतभेद रहे. रीमा ही क्यों. प्राय: आपके सारे निर्देशकों के साथ आपकी मतभेद की बातें आती हैं. आरोप लगते हैं कि आप निर्देशकों के निर्देशन में काफी दखल देते हैं.
ये सारी बातों को मैं डिनाये करता हूं.  रीमा के साथ कोई अनबन नहीं हुई है. देखिए एक तो मैं किसी भी फिल्म को हां नहीं कहता. फिर जब मैं नैरेशन सुनने के बाद ही उससे संतुष्ट हो जाता हूं. तो फिर मेरे दखल की बात ही कहां से होती है. मैं संतुष्ट होता हूं तो अपनी हामी भरता हूं न. मैं तो नैरेशन सुनने के बाद ही अपनी पूरी बात कह दी होती है. तो फिर मैं क्यों चेंज करूंगा. दूसरी बात यह भी है कि आप बाकी कलाकारों के काम देख लें. कैरेक्टर एक से लगेंगे आपको. मेरी फिल्म में ऐसा नहीं है. अगर मैं अपनी हर फिल्म में अपने ही इनपुट्स देता तो सारी एक जैसी नहीं होती. मैं तो डायरेक्टर विजन को फॉलो करता हूं. हर डायरेक्टर अपनी जान देता है फिल्म में. तो निश्चित तौर पर मैं उनकी सोच को परदे पर दर्शाता हूं. जहां तक रीमा की बात है तो वह लेखक भी हैं और मुझे लगता है कि इसकी वजह से वे पेपर पर ही फिल्म खड़ी कर लेती हैं. उन्हें पता है कि उन्हें क्या चाहिए. कब चाहिए. इन 20 सालों में मैं भी लगातार काम कर रहा हूं. लेकिन रीमा ने इस फिल्म के दौरान जिस तरह से मुझे कुछ सीन सुनाये. उनके लेयर्स बताये.  मैं हैरत में पड़ जाता था. नयी चीज लेकर आती थीं वह हर बार. मुझे भी ताज्जुब होा था कि काफी बारीकी से काम करती है. मुझे लगता है कि रीमा जो बनाने चली थी. फिल्म उसके काफी करीब पहुंच पायी है. मुझे उसके साथ काम करके बहुत मजा आया. तो फिर मुझे संदेह क्यों होगा. तलाश की शूटिंग आराम से चल रही है तो लोग लिखेंगे नहीं इसके बारे में . तो लोग बात बनाते हैं कि कंनवर्शेशन इंटरेस्टिंग करने के लिए.
 लेकिन आपकी  फिल्मों को  आने में काफी वक्त लग जाता है. इतना वक्त क्यों लेते  हैं आप?
मैं वक्त लगाता हूं तो आप सभी ऐसा न सोच लें कि हम रजाई ओढ़ कर घर पर सो जाते हैं. दरअसल, मैं हड़बड़ी में काम बर्बाद नहीं कर सकता. मैं खुद जी लगाकर काम करता हूं और मेरे साथ जितने निर्देशक काम करते हैं फिर चाहे वह राजू हो, आशु हों, फरहान हो. सभी मेरी तरह ही अपने काम को परफेक्ट बनाने की कोशिश करते हैं. फिल्म का मतलब हमारे लिए सिर्फ करोड़ों की कमाई नहीं है. शिद्दत से बनाते हैं तो लोगों को पसंद भी आती है. मैंं यह नहीं चाहता कि हड़बड़ी में कुछ बना दूं और पता चला कि रिलीज के बाद खुद ही लगे कि अरे कुछ कमी रह गयी. बस यही वजह है.
तलाश कई एक्टरों को आॅफर हुई थी?
हां, यह सच है. हर फिल्म कई कलाकारों को आॅफर तो होती ही है. लेकिन बाकियों को पसंद नहीं आयी. वैसे भी मैं जो फिल्में करता हूं वे बाकियों को ुपसंद नहीं ही आती हैं. लोग मुझे भी सलाह देते हैं कि मैं वह न करूं. लेकिन मैं तो हमेशा अलग ही करता हूं.सो, मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे फिल्में कितने लोगों को आॅफर हुईं. मेरे हां कहने के बाद वह मेरी फिल्म हो जाती है और मैं शिद्दत से उस में जी लगा कर काम करता हूं.
हमने यह भी सुना कि आप पर तलाश का किरदार इतना हावी हो गया था कि आप वास्तविक जीवन में काफी संदिग्ध हो गये हैं. यह सच है या सिर्फ मार्केटिंग के लिए अफवाह 
(हंसते हुए) अच्छा?? ऐसी भी खबरें आ रही हैं. वैसे आपने अच्छा बताया कि मार्केटिंग के लिए ऐसी भी बातें इस्तेमाल की जा सकती हैं. हाहाहा, नहीं नहीं. ऐसा नहीं है. किरदारों को वास्तविक जीवन पर हावी नहीं होने देता मैं. वरना, आज भी लगान का भुवन ही रह जाता. वह मेरा पसंदीदा किरदार था और सबसे अधिक मुझे उसी फिल्म में वक्त लगा था.
सत्यमेव जयते का सीक्वल भी आयेगा?
हां, अगले साल तक़ . शो को कामयाबी मिली है तो मेरा भी हौसला बढ़ा है.

20121122

ऑटो मीटर : क्या खूब बदले तुमने भी अपने तेवर



ऑटो मीटर 
क्या खूब  बदले तुमने भी अपने तेवर 
न चाहते हुए भी अकसर तुम्हारी बक बक सुना करती थी,

कलिना से अँधेरी तक सिग्नल पर 
जब तुम फंस जाते थे 
टप टप पसीने बहते थे
मैं भी तो थक के चूर हुआ करती थी 

तुमने ब्रेकर्स पे मुझे कितने ब्रेक दिये
मेरे क्रोकरी  के  कितने बर्तन क्रैक  किये 

"ओवर नाईट" काम मैं करती लेकिन 
"नाईट चार्ज" कमाते तुम थे 

तुमने कई बार " Don't Touch Me "कहकर धमकाया 
फिर भी हमें कभी गुस्सा न  आया।

मेरी जेब ( ऑटो का किराया देकर ) हो रही है खाली 
और तुम खरीद रहे हो नवी मुंबई में फ़्लैट 2 रूम किचन वाली 

लगातार तुम करते रहे मनमानी 
हमने फिर भी तुम्हारी हर जिद्द मानी 

लेकिन हर हठ( जिद्द )  की भी होती है हद 
मेरे दिल में हाँ मेरे दिल में घट चुका  है  तुम्हारा कद 


जाओ अब सच में नहीं आता है तुम पर प्यार 
तुम्हें देख कर आता है रेड बुखार 


अगर तेरा है ये इमोशनल अत्याचार 
तो जाओ मैं भी करुँगी अबसे प्रोफेशनल रूप इखितियार। 

सस्पेंस पर सस्पेंस बरकरार


 
आमिर की सस्पेंस थ्रीलर फिल्म तलाश जल्द ही रिलीज होनेवाली है. दर्शकों की उत्सुकता को बरकरार रखने के लिए आमिर खान की टीम व कलाकार फिल्म के न तो किरदार के बारे में बात कर रहे हैं और न ही कहानी के बारे में. यह आमिर खान के प्रमोशन का ही एक हिस्सा है. चूंकि फिल्म सस्पेंस थ्रीलर है तो इस पर सस्पेंस बरकरार रखा जाये. ृफिल्मों की रिलीज के दौरान फिल्म पर लगातार बातें करना फिल्मी प्रमोशन का हिस्सा होता है और आमिर ने तलाश पर अधिक बातचीत न करना. चुप्पी साधे रखना भी प्रमोशन का ही एक माध्यम माना है. यही नहीं आमिर ने यह भी तय किया है कि फिल्म की रिलीज के बाद वे कुछ 11-12 अफवाहें उड़ा देंगे. फिल्म की कहानी को लेकर. ताकि दर्शक कंफ्यूज रहें कि कौन सी बात सच है और वह फिल्म देखने जायें. कुछ इसी तरह शैतान जैसी फिल्म के निर्देशक रह चुके विजय नांबियार डेविड नामक सस्पेंस थ्रीलर फिल्म लेकर आ रहे हैं. वे तो आमिर खान से एक और कदम आगे हैं. उन्होंने तो अपनी फिल्म की पूरी कहानी भी फिल्म के कलाकारों से सांझा नहीं की है. वे टुकड़ों में शूटिंग कर रहे हैं और कलाकारों के केवल उनके अभिनय वाले हिस्से के बारे में ही बता रहे हैं. दरअसल, वर्तमान में थ्रीलर फिल्मों के निर्देशकों के लिए दर्शकों को ओपनिंग के बाद भी फिल्मों से जोड़े रखना और टिकट खिड़की तक लाना एक चुनौती बन चुकी है. चूंकि वर्तमान में सस्पेंस थ्रीलर फिल्में ज्यादातर हॉलीवुड के तर्ज पर बनती हैं और आज के दर्शक वे सारी चीजें हॉलीवुड फिल्मों में देख चुके होते हैं. ऐसे में दर्शकों की रुचि बरकरार रख पाना और उन्हें कम से कम एक हफ्तों तक थियेटर तक खींच के लाना एक चुनौती हो जाती है और शायद यही वजह है कि निर्देशकों न केवल अपनी सोच में बल्कि अपने प्रमोशन में भी कुछ अलग अंदाज इख्तियार करना पड़ता है. किसी दौर में हिंदी फिल्मों में सस्पेंस थ्रीलर फिल्में बनीं, जिन्हें आज भी दर्शक बार बार देखना चाहते हैं. कहानी जानने के बाद भी दर्शक फिल्म बार बार देखते थे.चूंकि रोमांच बरकरार रहता था. लेकिन वर्तमान में दर्शक अधिक समझदार हैं. हालांकि इसके बावजूद सुजोय घोष की कहानी ने कामयाबी हासिल की. फिल्म ने पहले ही अपने टैगलाइन में स्पष्ट कर दिया था कि इट्स अ मदर आॅफ अ स्टोरी. लेकिन दर्शक समझते रहे कि यह एक मां की कहानी है और यही वजह रही कि दर्शक को कुछ अलग मिला. फिल्म कामयाब रही. वर्तमान में कुछ ऐसे ही अंदाज के ट्रीटमेंटवाले थ्रीलर फिल्मों की जरूरत है.

20121121

अनर्थ में अर्थ की तलाश


 
अभी हाल में मशहूर समीक्षक जयप्रकाश चौकसे की  एक किताब जो गांधी और सिनेमा पर आधारित है. उसका लोकार्पण मुंबई में हुआ. इस मौके पर मशहूर लेखक सलीम खान का पूरा परिवार उपस्थित था. सलीम खान प्राय: मीडिया से सार्वजनिक स्थानों पर मुखातिब नहीं होते. लेकिन उस दिन उन्होंने खुल कर बातचीत भी की और अपने कई अनुभव भी शेयर किये. सलीम खान ने बातों बातों में इस बात का जिक्र किया कि अक्सर लोग उनसे पूछते हैं कि सलीम जावेद में लिखता कौन था. इस पर उन्होंने कहा कि दरअसल, हम दोनों तो सोचते थे. लिखते तो खलिश लखनवी थे. उनके इस वक्तव्य को एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार ने अपने फेसबुक स्टेटस पर डाला और इस स्टेटस पर लगातार बाढ़ की तरह लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं. कुछ ने कहा कि यह बड़ा खुलासा है. कुछ ने कहा कि सलीम साहब ने चलो, अब जाकर तो अपनी चोरी मान ली. कई लोगों ने अपनी विशेषज्ञों वाली टिप्पणी भी की. लेकिन हकीकत में जो सलीम खान कहना चाहते थे और उनका जो तात्पर्य था वह किसी ने समझा ही नहीं और आगे बढ़ कर अपनी प्रतिक्रियाओं का अंबार लगाते चले गये. लोगों को लगा कि सलीम खान खलिश लखनवी की चोरी की गयी स्क्रिप्ट पर अपना नाम देते थे और अपनी चोरी को वह अब स्वीकार रहे हैं.जबकि सलीम खान के कहने का तात्पर्य था कि उस दौर में खलिश उनकी स्क्रिप्ट को पन्नों पर उतारते थे या टाइप करते थे. न कि खलिश स्क्रिप्ट लिखा करते थे. दरअसल, यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा बन चुका है. विशेष कर फिल्मों के जानकार तो आज हर जगह हैं. फिल्में समाज का वह विषय हो चुकी है. जिस पर हर कोई लिख सकता है. जबकि हकीकत यह है कि जल्दबाजी में हम अक्सर अर्थ का अनर्थ बना देते हैं. अनुराग बसु ने अपनी फिल्म बर्फी में इस बात का अच्छा जिक्र किया है कि आज का प्यार कैसा दो मिनट नूडल्स जैसा...हकीकत भी यही है कि आज केवल प्यार ही नहीं, हर काम नूडल्स की तरह फास्ट फूड की तरह हो चुका है.  विशेष कर फिल्मों व अभिनेताओं को लेकर सबसे अधिक प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं. किसी स्टार की दो फिल्में न चलें तो लोग उनके करियर का अंत ही बता देते हैं. प्राय: मीडिया भी स्टार कुछ कहते हैं और उनकी बातों को तोड़ मड़ोड़ कर कुछ इस तरह पेश करते हैं कि सामने वाले अगर किसी की बुराई न भी की हो तो उन्हें यही महसूस होगा कि उनके बारे में बुरी बातें कही गयी है. या कमेंट किया गया है. यह हर तरह से घातक है.

पीआर की कठपुतलियां स्टार्स



 माधुरी दीक्षित ने अमेरिका से वापसी करने के बाद बेहद सलीके से फिर से अपने करियर की शुरुआत की है. अपनी इस सेकेंड इनिंग में न केवल उन्होंने अपने काम करने का अंदाज बदला है. बल्कि बदलते दौर के साथ उन्हें यह एहसास हो चुका है कि शायद कि आज मीडिया की कितनी जरूरत है. और अगर मीडिया की जरूरत है तो उन तक बकायदा खबरें पहुंचाने व मीडिया से संपर्क बनाये रखने के माध्यम की भी कितनी जरूरत है. शायद यही वजह है कि वह समय के साथ साथ इतनी प्रोफेशनल हो गयीं कि उन्होंने अपने 27 साल पुराने सेकट्री रिकु राकेश नाथ को भी बाय बाय कह कर, अपना पब्लिक रिलेशन का सारा कार्यभार सलमान खान की पर्सनल सेकट्री रेश्मा को सौंप दिया है. रिकु ने जब माधुरी से कहा कि वह अब भी उनके साथ काम करना चाहते हैं, तो उन्होंने उन्हें रेश्मा शेट्ठी के अंडर में काम करने की सलाह दी. जबकि रिकु पिछले 27 साल से माधुरी के सारे काम को संभालते आ रहे थे. मधुर भंडारकर ने अपनी फिल्म हीरोइन में दरअसल, हीरोइन की जिंदगी को भले ही सतही तौर पर दिखाया हो. लेकिन वर्तमान दौर में एक सेलिब्रिटी की जिंदगी में उसके पीआर की क्या अहमियत होती है. इसका अच्छा चित्रण किया है. आज हर सेलिब्रिटी को अपना नाम चाहिए. वह चाहती हैं कि उनके पी आर वर्तमान में चल रहे वक्त के साथ चले. और वे ज्यादा से ज्यादा उनकी लोकप्रियता के लिए काम करें. खुद माधुरी ने माना है कि पहले जिस तरह का वर्क कल्चर बॉलीवुड में था. अब नहीं है. जाहिर है, उन्हें भी यह एहसास हुआ होगा कि शायद रिकु आज के वक्त के साथ चल पाने में फिट नहीं बैठ रहे. सो, उन्होंने यह रिश्ता तोड़ दिया. दरअसल, हकीकत यही है कि यहां बॉलीवुड में कुछ भी स्थाई नहीं है. यहां वक्त के साथ नीयत और सीरत दोनों बदलती है. वर्तमान में बॉलीवुड में सेलिब्रिटीज से अधिक नखरे उनके पीआर के होते हैं. एक बड़े सुपरस्टार की पीआर ने खुद स्वीकारा है कि क्या स्टोरीज जानी है. यह वह तय करते हैं न कि स्टार्स. खुद आमिर खान ने हाल ही में जब एक पीआर स्टोरी पर मैंने सवाल पूछा कि क्या वह वाकई संदिग्ध हो गये हैं...वे चौंके. फिर जब मैंने उन्हें बताया कि आपकी पीआर की तरफ से यह खबर आयी है तो उन्होंने तुरंत पीआर की बात को सही कह दिया. यह दर्शाता है कि आज सेलिब्रिटिज किस तरह पीआर की कठपुतलियां हैं. और जो पीआर इसमें नाकामयाब हैं. उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है.

20121117

खोते ख्वाब


अक्सर एक ख्वाब देखती हूँ 
कुछ अच्छे कुछ बुरे 
बंद आँखों में वे कहीं खो जाते हैं
किसी कोने में 
लुका छिपी  खेलते ख्वाब 

जानकर भी बनती हूँ अनजान 
खुली आँखों से उन ख्वाबों के खोज में लग जाती हूँ 
कोने कोने में, जर्रे जर्रे में। 

20121116

बैनर से झलकता स्वभाव



आर बाल्की ने अपने प्रोडक् शन हाउस का नाम होप यू एंजॉय सिनेमा रखा है. अनुराग कश्यप ने अपने प्रोडक् शन हाउस का नाम एकेपीएल रखा है. अनुराग ने अपने प्रोडक् शन बैनर के लोगो में एक पालतू कुत्ते का नाम संकेत के रूप में इस्तेमाल किया है. आमिर खान ने अपने प्रोडक् शन बैनर के लोगो में केवल ए से अपने प्रोडक् शन की पहचान स्थापित की है. इरोज इंटरनेशनल. है तो इंटरनेशनल लेकिन इरॉज के लोगो के साथ हमेशा गायत्री मंत्र नजर आता है. यशराज ने ह्वाइ से प्रोडक् शन बैनर की पहचान स्थापित की है और साथ ही बैकग्राउंड म्यूजिक में वीर जारा के स्कोर हैं. यूटीवी स्पॉट ब्वॉय ने एक स्पॉट ब्वॉय को लोगो में दर्शाया है. ये सारे हिंदी सिनेमा के बड़े प्रोडक् शन हाउस हैं. और सभी फिल्मों का निर्माण लगातार कर रहे हैं. सफल फिल्मों का निर्माण. ये प्रोडक् शन हाउस ही इनकी असल पहचान है. शायद यही वजह है कि वे अपने प्रोडक् श्न के बैनर को लेकर भी काफी सचेत रहते हैं. दरअसल, सृजनशीलता के इस जगत में प्रोडक् शन बैनर व लोगो का भी खास महत्व है. और सभी निर्माता ने अपने व्यवहार व स्वभाव से मेल खाता हुआ लोगो को ही अपने बैनर की पहचान बनाई है. अनुराग कश्यप के लोगो में पालतू गली के कुत्ते का इस्तेमाल किया गया है. लोगो से ही एक बात समझ आ जाती है कि निर्देशक लीक से हट कर करनेवाले निर्देशकों में से एक है. वही आर बाल्की हमेशा फील गुड फिल्में बनाते हैं. जज्बातों और इमोशन को लेकर. ह्मुमन रिलेशनशीप को लेकर. और उन्हें विश्वास होता है कि दर्शक उनकी फिल्मों को पसंद करेंगे ही. इसलिए उन्होंने प्रोडक् शन बैनर का नाम ही होप यू एंजॉय सिनेमा रख दिया है. अजय देवगन फिल्म्स जिस तरह की हल्की फुल्की फिल्में बनाते हैं. उनके बैनर का अंदाज नजर आता है. वर्तमान में हिंदी सिनेमा जगत में यह एक महत्वपूर्ण  हिस्सा है कि आप अपने बैनर की पब्लिसिटी किस तरह करें. आप किस तरह कुछ अलग करके लोगों के जहन तक पहुंचे और यही वजह है कि निर्माता न सिर्फ अपने प्रोडक् शन को लेकर बल्कि लोगो को लेकर भी सचेत रहते हैं. पहले किसी दौर में जितने भी निर्माता रहे. उन्होंने या तो अपने प्रोडक् शन का नाम सीधे तौर पर खुद के नाम पर रखा या किसी ईश्वर के नाम पर और वे लोगो को लेकर उतने सचेत भी नहीं थे. लेकिन अब वह दौर बदल चुका है और क्रियेटिविटी दिखाने का एक भी मौका निर्माता नहीं छोड़ते. यहां अपने बैनर को भी लीक से हट कर बनाने की प्रतियोगिता है.

किंग खान की वापसी



यश चोपड़ा की फिल्म जब तक है जान रिलीज हो चुकी है. इस फिल्म को लेकर काफी दिनों से चर्चा हो रही थी और अंतत: फिल्म रिलीज हो चुकी है और दर्शकों को पसंद भी आ रही है. यह फिल्म बॉक्स आॅफिस पर कितनी कामयाब हो पाती है.यह तो आनेवाले हफ्ते में ही पता चल पायेगा. लेकिन इस फिल्म से शाहरुख खान ने एक बार से साबित कर दिया है कि वह किंग आॅफ रोमांस हैं. और यश चोपड़ा की फिल्मों से अधिक खूबसूरत और बेहतरीन अभिनय वे किसी अन्य फिल्मों में नहीं कर सकते. इस फिल्म ने न सिर्फ दर्शकों को उनका शाहरुख खान लौटाया है. बल्कि कट्रीना जो प्राय: अपने अभिनय क्षमता को लेकर आलोचनाओं का शिकार होती रहती हैं. उन्होंने भी अपने अभिनय में संजीदगी लाकर साबित किया है कि बेहतरीन निर्देशक मिले तो वे बेहतरीन अभिनय कर सकती हैं. दरअसल, इस फिल्म में पहली बार कट्रीना को यश चोपड़ा ने खुल कर अभिनय करने के लिए सक्षम किया है. अन्य फिल्मों की तूलना में वे इस फिल्म में स्पष्ट संवाद बोलती नजर आ रही हैं. किंग खान के साथ उनकी जोड़ी खूब जंची है. इससे साफतौर पर यह स्पष्ट होता है कि अगर निर्देशक चाहे तो हर कलाकार अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता है. यश चोपड़ा की जब तक है जान को देखने के बाद निश्चित तौर पर यह प्रतिक्रिया आयेगी कि इसमें यश चोपड़ा के मिजाज का प्यार का वर्णन नहीं है या रूपरेखा प्रस्तुत नहीं की गयी है. लेकिन हकीकत यह है कि यश चोपड़ा ने आज के जेनरेशन को ध्यान में रखते हुए कहानी कहने की कोशिश की है. प्यार की एक नयी परिभाषा को दर्शाया है. फिल्म के गाने बेहतरीन हैं और वे परिघटनाओं के मुताबिक ही हैं. शाहरुख खान के करियर के लिए इस अदद फिल्म की खास जरूरत इसलिए थी, क्योंकि काफी दिनों से उन्होंने भले ही बॉक्स आॅफिस पर धन एकत्रित कर लिया हो. लेकिन दर्शक उन्हें काफी मिस कर रहे  थे. इस बार वे फिर से दर्शकों को प्रभावित करने में कामयाब रहे. दरअसल, शाहरुख जब डॉन के संवाद बोलने की कोशिश करते हैं. तो वह बनावटी लगते हैं. लेकिन रुमानी संवाद बोलते हुए वे किसी सपने के राजकुमार की तरह ही लगते. जिस राजकुमार का सपना हर लड़की दिखती है. मोहब्बते के बाद शाहरुख ने अपने इस किरदार को बखूबी निभाया है. और निश्चित तौर फिर से शाहरुख को कामयाबी मिलेगी. कई सालों बाद उनका अपना अंदाज देख कर दर्शकों को फिर से दिलवाले दुल्हनिया का राज याद आ जायेगा.

दिल से हमेशा जवां रहे यशजी : अनुष्का


 बॉलीवुड में अनुष्का शर्मा एकमात्र ऐसी अभिनेत्री हैं, जिन्हें यश चोपड़ा व उनके बेटे आदित्य चोपड़ा दोनों के साथ फिल्में करने का मौका मिला. अनुष्का यशराज की ही खोज हैं और इसी बैनर की फिल्म जब तक है जान में वे एक नये अवतार में नजर आ रही हैं. जब तक हैं जान में उनके उम्दा अभिनय की काफी तारीफ हो रही है है. महज 24 साल की उम्र में वे बॉलीवुड के दिग्गज निर्देशकों के साथ काम कर रही हैं.



बकौल अनुष्का मैं खुशनसीब हूं कि मुझे यशजी जैसे निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिला. मुझे पहले ब्रेक भी इसी बैनर ने दिया. तब नहीं सोचा था कि आदित्य के साथ काम करने के बाद यशजी के साथ काम करने का मौका  मिलेगा. जिस दिन मुझे यशराज से इस फिल्म के लिए कॉल आया था. मैं नर्वस थी. मैं खुद पर यकीन नहीं कर पा रही थी कि क्या वाकई मैं यशजी की हीरोइन बनूंगी. हां, यह मेरे लिए सपने के पूरे होने जैसा ही है. क्योंकि मैं जानती हूं और अब तो काम करने के बाद यह मानती भी हूं कि यशजी की हीरोइनें ओरनामेंटल या बनावटी नहीं होतीं. वे उनके शारीरिक सौंदर्य को नहीं, बल्कि उन्हें अंदर से फील कराते थे कि वे स्पेशल हैं फिल्म के लिए.

अकिरा की सराहना
 फिल्म की रिलीज के बाद काफी लोगों ने मुझे फोन किया. लगातार बधाईयां मिल रही हैं कि मेरे किरदार को दर्शकों ने पसंद किया. फिल्म की रिलीज से पहले मेरे सामने कई बार यह सवाल खड़े किये गये थे कि मुझे दो अभिनेत्रियोंवाली फिल्म नहीं करनी चाहिए थी. लेकिन मैं अब भी ये मानती हूं कि फिल्म हीरो हीरोइन से नहीं, उनके किरदार से चलता है. और वही हुआ भी

दिग्गजों की पसंद
हां,यह सच है कि मैं  राजकुमार हिरानी, अनुराग कश्यप, की फिल्में करने जा रही हूं. विशाल की फिल्म मटरू...में तो आप मुझे देख ही रहे हैं. काफी लोग मुझसे यह सवाल पूछते हैं कि आखिर वह कौन सी खूबी है कि बेहतरीन ंिनर्देशक मुझे अपनी फिल्म में ले रहे हैं. मुझे लगता है कि उन सभी ने मेरा पहले का काम देखा है. मैं अपनी हर फिल्म में उस किरदार के मुताबिक ढलने की कोशिश करती हूं. मुझे होमवर्क करना अच्छा लगता है. और मैं हर किरदार को वर्सेटाइल तरीके से निभाना चाहती हूं. मैं किरदार मिलने के बाद खुद से प्रीपरेशन करती हूं कि मुझे क्या क्या इनपुट्स अपने तरीके से देने हैं. उस किरदार के बोलने, उठने बैठने के सारे ढंग सबकुछ को मद्देनजर रखते हुए. मुझे खुशी है कि कम समय में मेरी ये मेहनत निर्देशकों को नजर आने लगी है.

यशजी से जुड़ी यादें
यश जी मेरे लिए किसी फादर फिगर से कम नहीं थे. लेकिन इससे कहीं अधिक वह दोस्त थे. मैंने जब फिल्म नहीं की थी उनके साथ. तो मैं सोचती थी. काफी गंभीर व्यक्ति हैं वो. लेकिन एक दिन सेट पर कुछ उन्होंने ऐसी बच्चों जैसी शरारतें की, कि मैं दंग रह गयीं. उस दिन शूटिंग हो रही थी. और मैं एक सीन को लेकर परेशान थी. तभी बार बार कोई मुझे पीछे से कंधे पर पोक कर रहा था. मैं पीछे देखती तो वह व्यक्ति छूप जाता. बाद में मैंने देखा कि ये तो यशजी हैं. यशजी आज भी बच्चों की तरह ही मुस्कारते थे. और मस्ती करते थे. मैं तो जब मां बनूंगी तो यशजी वह व्यक्ति होंगे जिनके बारे में मैं बच्चों को जरूर बताना चाहंूगी कि कितने हैप्नींग व्यक्ति थे वे. आप अगर कभी उन्हें उनकी पत् नी पामेला से भी बातें करते सुनते तो आप मंत्रमुग्ध हो जाते. वे इतने प्यार से और इस तरह से बात करते थे जैसे कोई नयी उम्र का कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से बात करता है. वे कभी भी बहुत सीरियस होकर कोई सीन शूट नहीं करते. साथ ही इस बात का भी ख्याल रखते थे कि आपकी हर जरूरत पूरी हो. वे औरतों की न सिर्फ फिल्म में बल्कि असल में भी बहुत इज्जत करते थे. मैं आती तो सीनियर होने के बावजूद वे खड़े होकर मुझे कुर्सी देते कि बैठो. इस फिल्म में दर्शकों को मेरा काम पसंद आया. मेरी तरफ से यही मेरी तरफ से यशजी को ट्रीब्यूट है.

जब यशजी ने रोक दी थी शूटिंग
एक दिन मैं कश्मीर में शूट कर रही थी. उस दिन मेरी तबियत ठीक नहीं थी. वे आये मेरे पास. पूछा ठीक तो हो. मैंने कहां हां सर. उन्होंने कहा देखो काम हो न हो लेकिन स्वस्थ रहना चाहिए. बाद में उन्हें पता चला कि मेरी तबियत ठीक नहीं है. तो उन्होंने कहा नहीं करते हैं आज शूटिंग़ . फिर एक दिन मुझे फूड प्वाइजनिंग हो गयी थी. उस दिन भी उन्होंने चार बार आकर मुझसे होटल में मुलाकात की. शूटिंग रोक दी थी उन्होंने. फिर एक सीन में आपने देखा होगा कि मैं फ्रीजिंग वाटर लेक में नजर आयी हूं फिल्म में. उस सीन के वक्त भी मैं बीमार थी. उस दिन भी उन्होंने शूटिंग की परवाह न करके मेरी तबियत की परवाह की थी.

शाहरुख के साथ फिर से जोड़ी
शाहरुख के साथ मैंने अपने करियर की शुरुआत की थी. रब ने बना दी जोड़ी से. ऐसे में फिर से उनके साथ इस फिल्म में काम करने का मौका मिला. मैं कहूंगी कि सीखने का मौका मिला. पहली फिल्म में भी वे मेरी बहुत मदद करते थे. हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्होंने जब कहा कि उन्हें मेरा अभिनय अच्छा लगता है और यह भी अच्छा लगता है कि मैं बहुत जल्द किरदार को इंटरपरेट कर लेती हूं तो मुझे लगा कि उनका यह कांप्लीमेंट मेरे लिए किसी टीचर के कांप्लीमेंट से कम नहीं था. शाहरुख के साथ काम करके मैं   खुद को समृद्ध मानती हूं. मुझे लगता है कि कोई भी अगर शाहरुख के साथ अभिनय करेगा तो उसे अभिनय और हार्ड वर्क से प्यार हो जायेगा. मैं तो वाकई शॉक्ड रहती हूं कि जिस तरह वे आज से चार साल पहले एनर्जेटिक थे. आज भी उसी तरह फुर्तीले हैं.

नये घर की खुशी
आजमेरे लिए यह दोहरी खुशी है कि जब तक है जान के मेरे अभिनय को लोगों ने पसंद किया है और साथ ही मैं फरवरी में वर्सोवा में अपने नये घर में शिफ्ट हो रही हूं. अब बहुत जल्द मेरे परिवार के सदस्य भी मेरे साथ यहां मेरे साथ रहेंगे.

इमोशनल कॉमेडी है सन आॅफ सरदार:


 
अजय देवगन के होम प्रोडक् शन की फिल्म सन आॅफ सरदार काफी विवादों से घिरने के बाद अब दर्शकों के सामने है. बॉलीवुड में यूं तो कई बार पंजाब दिखाये जाते रहे हैं. लेकिन सन आॅफ सरदार का पंजाब व वहां के लोगों के व्यवहार को एक अलग ही अंदाज में नजर आ रहा है. अजय बता रहे हैं कि अगर सरदार न होते तो दुनिया में क्या न होता



अजय खुद पंजाबी हैं. लेकिन उनका बचपन मुंबई में ही बीता है. इसके बावजूद वे पंजाब से जुड़े रहे हैं. फिल्म भगत सिंह के बाद यह दूसरी बार है, जब वे किसी फिल्म में सरदार की भूमिका निभा रहे हैं.
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अजय पहले किसी दौर में फिल्में बनती थीं. सन आॅफ हिंदुस्तान. अब बनती हैं सिंह इज किंग, सन आॅफ सरदार. आपको नहीं लगता कि ये किसी खास कम्युनिटी को ग्लैमराइज करती है?

आप ऐसा कैसा कह सकती हैं. मैंने हमेशा वे किरदार निभाये हैं. जो आम लोगों से कनेक्ट हो पायें. मैंने आज तक लार्जर देन लाइफ किरदार नहीं निभाया है. इससे पहले मैंने सिंघम की थी. उसमें मैं महाराष्टÑ का था. फिर बोल बच्चन में हरियानवी थी. मुझे लगता है कि फिल्म का नाम कुछ भी हो. फिल्म का कंटेट प्रमुख है और आप देख रहे होंगे कि फिल्म में पंजाब को और पंजाबियों की खूबियों को कितनी खूबसूरती से दर्शाया है. मैं यह नहीं कहता कि इससे पहले आपने बॉलीवुड में पंजाब नहीं देखा है. लेकिन सन आॅफ सरदार में पंजाब सिर्फ सरसो के खेत वाला नहीं, गलियारों वाला है. पंजाबी लड़की का एक अलग अंदाज दिखेगा आपको इसमें. यहां के लोगों के जीने का आम अंदाज़ . साथ ही पंजाबियों के मूल्यों को लेकर भी खास बातें हैं फिल्म में
त्न लेकिन फिल्म के प्रोमोज जिस वक्त आये थे. उस वक्त पंजाब के लोगों ने काफी नाराजगी दिखाई थी.
हां, क्योंकि उन्हें लगा था कि हम उनका मजाक उड़ा रहे हैं. लेकिन जब हमने उन्हें फिल्म दिखाई थी, तो उन्हें भी लगा कि फिल्म में सरदार की खासियत को दिखाई गयी है. इस फिल्म में कॉमेडी के साथ साथ इमोशन भी हैं. वहीं इस फिल्म की खासियत है.

आपने कभी दो बाइक पर खड़े होकर स्टंट किया था. फिर बाइक से सीधे घोड़े कैसे आ गये?
(हंसते हुए)क्योंकि अब घोड़े बाइक से तेज हो गये हैं...दरअसल, मेरे टीम मेंबर्स और मेरे निर्देशक की सोच थी कि कुछ अलग करते हैं. मैं खुद नर्वस तो था. लेकिन आइडिया सबमें बातचीत करने के दौरान ही अचानक आया कि बहुत हुआ बाइक वाइक पर स्टंट. अब कुछ अलग करते हैं. शुरू में मुझे डर लगा और लगा भी कि लोग कहेंगे कि अलग करने के लिए क्या बेवकूफी दिखा रहा है. लेकिन सच बताऊं. तो मुझे परेशानी नहीं हुई. सबने साथ दिया तो कर लिया. अच्छा एक्सपीरियंस रहा.

इतने विवादों के बाद अंतत: आपकी फिल्म रिलीज हुई. आपको नहीं लगता कि अब इंडस्ट्री पूरी तरह प्रोफेशनल हो गयी है.
हां, मैं यह बिल्कुल मानता हूं. लेकिन मैं अपने हक की लड़ाई लड़ रहा था. जो गलत है वह गलत है. मुझे कम थियेटर मिले थे. बॉलीवुड में ये किसी को भी हक नहीं है कि आप अपने पॉवर का गलत इस्तेमाल करें. हर किसी का पैसा लगा होता है. फिल्म पर. मुझसे कहा गया  कि मैं आगे बढ़ा लूं तारीख़. मैं लोगों से दुश्मनी कर रहा हूं. दरअसल, मैं तो एक निर्माता के तौर पर अपना काम कर रहा हूं. वैसे भी मैं मानता हूं कि अब इंडस्ट्री में सभी सिर्फ मुनाफे के बारे में ही सोचते हैं. अब अपनत्व खत्म हो चुका है. अब सिर्फ इगो है और सबको सिर्फ पैसे चाहिए. मैं मिस करता हूं उस माहौल को. जब पहले हम दोस्त की तरह इंडस्ट्री में काम करते थे. यही वजह है कि मेरे इंडस्ट्री में दोस्ती की लिस्ट बहुत लंबी नहीं है. लेकिन जो दोस्त हैं पक्के हैं. सलमान, संजू...

और दोनों हर बार अपनी दोस्ती भी निभाते हैं.
हां, दे आर लाइक फैमिली. सलमान को मंैने बस कहा था कि ऐसा कुछ एक गाना करना चाहते हैं. वे खुद आगे आये. और सपोर्ट किया. संजू ने तो फिल्म में बेहतरीन काम किया है. अश्विनी धीर ने इस फिल्म को इतनी खूबसूरती से लिखा था कि हमने फिल्म की शूटिंग ेके दौरान खूब एंजॉय किया. मैंने देखा कि संजू जो प्राय: फिल्म के संवाद याद करने में दिलचस्पी नहीं लेते. वे भी मजे से काम कर रहे हैं. तो, ये तो फिल्म का कमाल है ही. वैसे मैं मानता हूं कि जो किरदार संजू ने निभाया है. वे वही निभा सकते थे. वरना, हमारी इंडस्ट्री में वैसे कलाकार कम हैं, जो सरदार का किरदार बखूबी निभा पायें. हां, संजू के अलावा इस किरदार में सनी देओल फिट बैठते. लेकिन ये जाहिर है कि वे मेरी फिल्म में सेकेंड लीड नहीं ही करते.

इस फिल्म में आपने अपने पगड़ी बांधने के स्टाइल पर खास ध्यान दिया है.
जी हां, बिल्कुल. इससे पहले जब मैं भगत सिंह की थी. उस वक्त रेडिमेड पगड़ी पहना था. मैं खुद पंजाबी हूं तो जानता हूं कि इसका महत्व क्या है. ऐसे में इस बार मैंने तय किया था कि मैं ज्यों त्यों नहीं कायदे से पगड़ी पहनूंगा. सो, मैंने पंजाब के ही एक पगड़ी बांधनेवाले एक्सपर्ट को बुलाकर हर बार पगड़ी बंधवायी. ताकि मैं सही तरीके से पगड़ी की अहमियत को दर्शा सकूं.

अजय, आप हमेशा सेट पर अपने को स्टार्स के साथ प्रैंक के लिए जाने जाते हैं. इस बार क्या नया किया.
इस बार मैंने और संजू ने मिल कर सोनाक्षी को कई सारी मिर्च खिला दी थी. वे भी खाई जा रही थी. उन्हें लगा कि फिल्म का कोई सीन है.   हालांकि बाद में जब सच सामने आया तो उसने फिर चैलेंज लेकर भी 10 लाल मिर्च एक के बाद एक खाकर दिखाया. वैसे टीम सन आॅफ सरदार के साथ काफी मजा आया हमें.

20121111

नाज होता है कि कोई आपसे बेइतहां प्यार करता है : शाहरुख खान


  यश चोपड़ा ने शाहरुख खान को किंग आॅफ रोमांस बनाया, और उनकी आखिरी फिल्म जब तक है जान भी रोमांटिक फिल्म रही. शाहरुख मानते हैं कि ये फिल्म उनके लिए हमेशा खास रहेगी. जब तक है जान में अपने किरदार और उनसे जुड़े खास पहलुओं पर शाहरुख खान से अनुप्रिया अनंंत से विशेष बातचीत की.

शाहरुख हमेशा यश चोपड़ा के करीबी रहे. वे हम उम्र न रहते हुए भी अच्छे दोस्त रहे. क्योंकि दोनों की जिंदगी में प्रेम की खास जगह थी.

शाहरुख, ऐसी क्या बातें थीं, जिसने आपको और यशजी को एक दोस्त भी बनाया. आप दोनों में एक अलग सा रिश्ता था?
 हां, यह सच है कि हम दोनों में ऐसी कुछ बात तो थी जिसने हमें एक अच्छा दोस्त बना दिया. मुझे लगता है कि हम दोनों जिंदगी को एक ही नजरिये से देखते थे. हम हमउम्र नहीं थे. लेकिन सोच में हम दोनों ही जवां थे. यशजी भी जिंदगी को सेलिब्रेशन मानते थे. मैं भी मानता था. हम दोनों मानते थे कि काम को मजे लेकर करो. अच्छी नहीं बनी. और नहीं चली तो यह तो बाद की बात है. लेकिन जब काम करो तो माहौल को खास रखो. खुशमिजाज रखो. शायद यही वजह थी कि हम दोनों में पहली फिल्म से ही दोस्ती हो गयी थी. मुझे याद है. जब फिल्म डर रिलीज हो रही थी. उस वक्त कहीं न कहीं मन में यह बात थी कि फिल्म का नायक नेगेटिव किरदार का है. पता नहीं लोग उसे पसंद करेंगे कि नहीं. मैं तो उस वक्त नया था. लोगों से बात नहीं करता था. राज कमल थियेटर में जब हम गये थे और हमने फिल्म देखी और वहां के लोगों का रिस्पांस देखा था तो वह तो कमाल का था. उस वक्त से लेकर आज तक यश जी कहते थे हमेशा अपनी रिलीज के बाद. अगर दर्शकों को फिल्म पसंद आ गयी तो. लगता यार ऊपरवाले ने कुछ अच्छा कर दिया. मजा आ गया यार. लोगों को काम पसंद आ गयी. तो मुझे लगता कि काम को तनाव न लेकर बिजनेस न समझ कर हम दिल से करते थे. क्योंकि यशजी टेक्नीकल डायरेक्टर नहीं थे और मंै टेक्नीकल एक्टर नहीं था. दोनों ही इमोशन को महत्व देते हैं. निजी जिंदगी में भी और परदे पर भी.

तो आप मानते हैं कि यही वजह रही है कि अब तक यशजी के साथ बनी आपकी सारी फिल्में इसलिए सफल रहीं.
हां, मुझे लगता है कि ऊपरवाला भी जब कोई अच्छी चीज करने जाता है. तो ये चीजें मेल खाती हैं. मैंने यशजी के साथ डर के बाद लगातार काम किया है और सभी लोगों को पसंद आयी क्योंकि हम दोनों का जो अप्रोच था फिल्म को लेकर वह काफी भावनात्मक होता था. हुमन टच होता था. यशजी हमेशा कहा करते थे. डर के बाद से ही वे मुझसे कहते कि शाहरुख देख मैं लव स्टोरी नहीं बनाता. मैं ह्मुन रिलेशनशिप पर फिल्में बनाता हूं. और इस रिलेशनशीप में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्यार निभाता है. इसलिए शायद प्यार पर आधारित फिल्में लोगों को पसंद आती हैं.

आप काफी लंबे अरसे के बाद रोमांटिक फिल्म कर रहे हैं. क्या फर्क आया है. इन कुछ सालों में प्यार के मायने बदले हैं क्या ? आपका नजरिया.
मुझे लगता है कि प्यार की इंटेनसिटी नहीं बदलती. एक्सप्रेशन बदल जाता है. हां, यह जरूर है कि अब प्यार करने के तरीके में बदलाव आया है. अब जैसे प्रेम कहानी में कोई देवदास नहीं बनना चाहेगा न लड़का, न लड़की. अब प्यार में थोड़ा समर्पण जैसा भाव नहीं रह गया है. अपनी अपनी सोच और शर्त के अनुसार प्यार करने लगे हैं. लेकिन इससे प्यार के मायने नहीं बदले हैं. तब भी प्यार दो लोगों के मन की बात कहता था. अब भी वैसी ही बातें हैं.

क्या आपको टीएज उम्र के प्यार और मैच्योर प्यार में कोई अंतर नजर आता है? किस उम्र का प्यार अधिक परिपक्व होता है.
सबसे पहले तो मैं कहना चाहंूगा कि प्यार कि कोई उम्र नहीं होती. टीनएज में जो प्यार करेगा उसके दिखाने और जताने का तरीका अलग होगा. जो टीनएज का प्यार है. हो सकता है कि उसमें लड़का या लड़की प्रपोज करे तो गुलाब देकर या प्रेमपत्र देकर इजहार करे. वही मैच्योर प्रेम कहानी में भी प्यार है. लेकिन तरीका बदल जाता है. मुझे ये लगता है कि प्यार के एक्सप्रेशन बदल जाते हैं. जो व्यक्ति उठ कर आॅफिस जाता है. वह भी तो प्यार करता ही है अपनी पत् नी से. लेकिन रिस्पांसिबिलिटी के साथ वह अपने प्यार को कम वक्त दे पाता है. तो बस फर्क इतना सा है.
हर प्रेम कहानी में बाधाएं होती ही हैं. कम से कम हिंदी फिल्मों में तो हमने यही देखा है? तो जब तक है जान की कहानी किस तरह की है. किस तरह की बाधाओं से इस फिल्म के किरदार समर और मीरा रूबरू होते हैं.
बिल्कुल, इस प्रेम कहानी में भी आॅबस्टकल हैं. जिस तरह आपने कहा कि हर कहानी में कोई न कोई बाधा होती ही है. कभी पापा डॉन जैसा होता है. कभी अमीरी गरीबी. तो कभी कुछ. इस फिल्म की यूएसपी यही है कि इस फिल्म में प्यार का जो आॅबस्टकल है. वह बिल्कुल अलग सा है. अब तक शायद ही किसी फिल्म में ऐसा आॅबस्टकल दिखाया गया हो. तो, आप देखेंगे कि प्यार का यह भी एक नया स्वरूप दर्शकों के सामने आयेगा.यहां समर और मीरा की भी अपनी समझ है.

आपकी समझ से किसी प्रेम कहानी में वास्तविक जिंदगी में भी वे कौन कौन सी बातें हैं जो एक प्यार को पूरा बनाते हैं.
मुझे लगता है कि यह खुद पर नाज की बात होती है कि आपसे कोई बेइतहां प्यार करता है या आप किसी को बेइतहां प्यार करते हैं. इस विश्वास और इसी भावना की वजह   से प्रेम कहानी खास प्रेम कहानियां बनती हैं. प्यार के लिए यह भावना बहुत जरूरी है कि आप किसी के लिए खास हैं. आपके लिए कोई खास है.
यशजी को फिल्म की शूटिंग के दौरान सबसे ज्यादा किन बातों को एंजॉय करते थे.
पैकअप और खाना. वे हमेशा कहते कि अरे फटा फट काम कर ओये और खाना खाते थे. खाने के शौकीन थे. उन्हें हर वे दृश्य जो काफी इमोशनल हो. उन्हें फिल्माना बहुत अच्छा लगता था.

शाहरुख लोग आपको किंग आॅफ रोमांस मानते हैं. आपको क्या लगता है क्या वजह रही होगी कि आप लोगों से उस रूप में कनेक्ट कर पाते हैं. चूंकि हर कोई मानता है कि रोमांस सबसे कठिन जोनर है.
मेरा जिंदगी का जो एक्सपीरियंस रहा है. मुझे लगता है कि उसकी वजह से मैं काफी भावनात्मक रहा हूं. मेरी जिंदगी में हमेशा औरतों का महत्व रहा है. मैं अपनी नानी के घर में इकलौता लड़का था. न मेरी मासी को न मेरे किसी भी परिवार के किसी भी सदस्य को लड़का था. सो, मुझे घर की महिलाओं से बेहद प्यार मिलता था. साथ ही मेरे पिता की जल्दी मौत हो जाने के बाद मैं मां के साथ रहा. मैं घर की जिम्मेदारी समझ गया. एक रिस्पांसिबल लड़का रहा. इमोशनल लड़का रहा. मैं कभी लड़कों के साथ ज्यादा नहीं रहा. दिल्ली के लड़कों के साथ सड़कों पर नहीं घूमा.कभी अड्डेबाजी नहीं की. माचो मैन नहीं रहा मैं. तो वह सॉफ्टनेस मेरे अंदर रही है हमेशा, पहले मां, फिर बहन के साथ वक्त गुजारा. फिर पत् नी आयी. फिर मेरी बेटी. मुझे मेरी बेटी बहुत प्यारी है. मैं बेटे को भले ही तू कह दूं बेटी को आप ही कहता हूं. क्योंकि मैं महिलाओं की तहे दिल से इज्जत करता हूं. तो मुझे लगता है कि महिलाओं के साथ रहने की वजह मुझमें ममता का भाव बहुत ज्यादा रहा है. और यही बात लोगों को मेरे किरदार करते वक्त नजर आती है. और वे मुझे पसंद करते हैं. मैं खुद जब रोमांटिक फिल्में करता  हूं तो लगता है कि जिंदगी का हिस्सा जी रहा हूं. सो, मैं भी इसमें अपना परफेक्ट दे पाता हूंू.

तो फिर आपने रोमांटिक फिल्मों से दूरी क्यों बना ली थी.
नहीं ऐसा नहीं है. दरअसल, मैं एक साल में दो फिल्मों से ज्यादा नहीं कर सकता. दो या तीन फिल्मों से. हां, यह जरूर था कि मैं जब रोमांटिक फिल्में करना चाहता हूं तो यश चोपड़ा के साथ, करन जौहर के साथ. आदित्य के साथ करना चाहता हूं. क्योंकि ये उनका जॉनर है. वे इसमें वे अपना अलग प्रोसपेक्ट दिखा पाते हैं. कह सकते हैं कि वे इसके महारथी हैं. इम्तियाज अली की लव स्टोरीज मुझे पसंद आती है.वे प्रेम का एक अलग ही नजरिया स्थापित करते हैं फिल्मों को लेकर. तो सोचता हूं कि अब ये फिल्म करना है तो इनके साथ करूं. माइ नेम इज खान भी लव स्टोरी थी. वो कर चुका था. तो फिर थोड़ा ब्रेक दिया. इस बीच यश जी ने कह रखा था कि वे फिल्म लिख रहे हैं. उस वक्त मैं विशाल की एक फिल्म सुन रहा था. तो यशजी को लगा कि मैं लव स्टोरी कर रहा हूं तो उन्होंने मुझसे कहा कि शाहरुख मैं भी लिख रहा हूं. तो मैंने उनसे कहा कि हां, हां, यश जी मैं आपके साथ करूंगा. हालांकि विशाल की फिल्म लव स्टोरी थी भी नहीं. इस बीच यशजी ने मुझे एक कहानी सुनाई भी थी. उसमें भी आर्मी आॅफिसर का किरदार था. लेकिन वो फिल्म बन नहीं पायी, शायद वहां से ही यशजी ने वह किरदार आर्मी आॅफिसर वाला इधर शिफ्ट किया. मैं वैसे हर तरह की फिल्में करना चाहता हूं.  डॉन, रा.वन जैसी फिल्मों में भी एंजॉय करता हूं अपने किरदार को. वैसे भी मैं जॉनर से अधिक किरदार और अभिनय को अहम मानता हूं.

यशजी के लिए यह फिल्म क्या मायने रखती थी. क्या वाकई उन्होंने तय कर लिया था कि वे फिल्म नहीं बनायेंगे. 
यश जी के लिए उनकी हरर फिल्म अहम थी. हां, जब इस फिल्म की शूटिंग खत्म हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि यार तुम तो कल से दूसरी फिल्म में व्यस्त हो जाओगे. यार मुझे लगता है कि मुझे अब फिल्म नहीं बनानी चाहिए. क्योंकि अब वक्त मुझसे बहुत आगे निकल गया है. तो मुझे लगा मजाक कर रहे हैं. क्योंकि यशजी ने वीर जारा के वक्त भी कहा था. तो मैंने सोचा उन्हें मना लूंगा. वैसे भी उ्यकी आदत थी. वे तीन साल में एक फिल्म बनाते थे. पहले एक फिल्म सोची. लिखी. बनाई. रिलीज की. फिर 6 महीने तक आराम. ये नहीं कि एक के साथ दूसरी पर भी काम कर रहे थे. लेकिन मेरे लिए भी शॉकिंग था कि उन्होंने अपने जन्मदिन पर कह दिया कि वे नहीं बनायेंगे फिल्म. उनके लिए यह फिल्म हमेशा यादगार इसलिए रहती, जो उन्होंने मुझसे कहा था कि एक बार फिर से एक नयी लव स्टोरी लोगों को दिखा पायेंगे. जो लोग उनसे उम्मीद भी करते थे. उन्होंने वर्षोँ पहले मार धाड़ वाली फिल्में बनानी बंद कर दी थी. वे हमेशा चाहते थे कि जो इमोशन है वो लोगों में जिंदा रह सके. लेकिन उन्हें लगता था कि शायद अब लव स्टोरीज के भी मायने बदले हैं , लेकिन बात तो माननी होगी वे इस उम्र में भी जवां सोच रखते थे. वे सोचते थे कि जिस उम्र का समर का किरदार है. किस तरह सोचता होगा. क्या करता होगा. और वक्त के साथ उन्होंने फिल्म जब तक है जान की स्क्रिप्ट भी सोची है. आपको लगेगा कि आज की कहानी है. यह एक खास बात थी उनमें.

कोई खास योजना थी फिल्म के प्रमोशन को लेकर उनकी.
मैंने पहले भी कहा वे प्रमोशन जैसी चीजों पर नहीं, बल्कि बस संडे तक का इंतजार करते थे. फिल्म हिट होती तो फोन करके कहते हैं. हमने कुछ अच्छा   किया है यार. लोगों को पसंद आ गयी है चीजें.
शाहरुख क्या आपको लगता है कि अगर यशजी होते तो जो सन आॅफ सरदार के साथ इस फिल्म के विवाद हो रहे हैं. वे होने देते.
बिल्कुल नहीं., क्योंकि वे पूरी इंडसट््री को अपना बच्चा मानते हैं. वे चाहते थे कि सबकी फिल्म चले. सब काम करें.
शाहरुख आपकी फिल्मों में आप जब भी रुमानी हीरो बन कर आये. लोग आपकी उम्र भूल जाते हैं. सिर्फ अभिनय को ध्यान में रखते हैं.
मुझे लगता है कि यह निर्देशक की सोच का कमाल है. निर्देशक यह मानकर चलते हैं कि पहला प्यार जवानी के दिनों में ही होगा और प्यार जब भी हो जवां रहेगा. शायद इसलिए वे उस उम्र में ही दिखाते हैं मुझे. दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता है में, लगभग मेरी सभी फिल्मों में मेरे वास्तविक उम्र को नहीं दिखाया गया है. इस फिल्म में भी मैं 30-32 साल का हूं. मुझे लगता है कि प्रेम कहानियां बनानेवाले निर्देशकों की दिल भी जवां रहता है और वो उसी तरह से सोच पाते हैं.

जब तक है जान वे कौन सी चीजें हैं जो आप करना चाहेंगे?
मैं एक्टिंग करते रहना चाहंूगा और अपने परिवार के साथ ताउम्र बिताना चाहूंगा. जब तक है जान अपने परिवार का ख्याल रखूंगा.
आपकी आनेवाली फिल्में
चेन्नई एक्सप्रेस है. वह रोमकोम फिल्म है. फिर फराह की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर. हैप्पी न्यू ईयर हमने बहुत पहले लिख ली थी. लेकिन उस वक्त मैं उतना मैच्योर नहीं था. तो मैं चाहता था कुछ सालों बाद बनाऊं. अब लगता है कि सही वक्त आ चुका है तो उस फिल्म पर काम कर रहा हूं.


20121110

दो अभिनेत्रियों का अभिनय




कट्रीना और अनुष्का ने स्वीकारा है कि यश चोपड़ा ने अपनी फिल्म में दोनों ही अभिनेत्रियों को समान महत्व दिया है. लेकिन इसके साथ ही कट्रीना ने यह बात भी कही है कि उन्हें लगता है कि दो अभिनेत्रियों को एक फिल्म में काम नहीं करना चाहिए. अगर दोनों के लिए ही खास किरदार न हो. चूंकि ऐसे भी हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियों के लिए काम करने के विकल्प कम होते हैं. लंबे अरसे के बाद दो प्रमुख अभिनेत्रियां एक साथ एक फिल्म में नजर आनेवाली हैं. चूंकि पिछले कई सालों से शीर्ष अभिनेत्रियों ने किसी भी फिल्म में एक साथ दो अभिनेत्रियोंवाली फिल्मों में काम करने से इनकार कर दिया था.अनुराग बसु ने फिल्म बर्फी के लिए इलियाना के किरदार के लिए पहले कट्रीना से ही बात की थी. लेकिन वे तैयार नहीं हुईं. हिंदी सिनेमा के पिछले अध्याय को उलट कर भी देखें तो वे सभी शीर्ष अभिनेत्रियों जिन्होंने साथ काम किया है. वे फिल्में कामयाब जरूर रही हैं. लेकिन उन अभिनेत्रियों में कभी नहीं बनीं. जब तक है जान के बाद करीना और रानी अभिनीत फिल्म भी दो अभिनेत्रियोंवाली फिल्म है. इससे पहले करीना-रानी ने मुझसे दोस्ती करोगे में साथ काम किया था. और उनमें अच्छी दोस्ती थी. प्रीति-रानी भी अच्छी दोस्त थीं. माधुरी-करिश्मा की फिल्म दिल तो पागल है सुपरहिट रही.लेकिन करिश्मा इस बात से नाराज थीं कि उन्हें फिल्म में अधिक महत्व नहीं दिया गया. लेकिन उस दौर में और अब के दौर में यह फर्क जरूर है कि पहले अभिनेत्रियां काम तक सीमित न रह कर आपस में अच्छी दोस्त भी थीं. आज भी वहीदा, आशा पारेख, हेमा मालिनी अच्छी दोस्त हैं. उनमें भी प्रतियोगिता थी. लेकिन सभी एक दूसरे के करीबी थीं. लेकिन आज के माहौल में यह शायद ही संभव हो. चूंकि आज वक्त एक दूसरे पर कटाक्ष कर आगे बढ़ने का है.

बढ़ती दूरियां, खोते रिश्तें


  हाल ही में फिल्म सन आॅफ सरदार के सिलसिले में अजय देवगन से बात हुई. अजय देवगन और यशराज बैनर को लेकर उठा विवाद अब जगजाहिर है. लेकिन बातचीत के दौरान अजय ने एक बात दोहरायी कि उन्हें अब इंडस्ट्री में केवल प्रोफेशनलिज्म नजर आता है. उनका मानना है कि पहले के जमाने में जिस तरह से फिल्मी हस्तियों के बीच दोस्ती थी. अपनत्व था. अब वह नहीं है. अब केवल सभी मुनाफे लगाने में जुटे हैं. इस बात पर मेरा उनसे यह सवाल था कि क्या आप उस माहौल को मिस करते हैं. अजय ने कहा यकीनन. इससे साफ स्पष्ट है कि आज की हस्तियां भी उस माहौल को मिस करती हैं. प्रतियोगिता, प्रतिद्वंद्विता तो उस वक्त भी थी. उस वक्त भी स्टार्स में तनाव था. लेकिन इसके बावजूद लोगों में अपनापन था. श्रीदेवी-माधुरी एक दूसरे को पसंद नहीं करती थीं. लेकिन जब माधुरी की शादी हुई तो वे आयीं. लेकिन क्या आज संभव है. शायद नहीं. दिलीप कुमार और सायरा बानो की शादी हिंदी सिनेमा जगत की सबसे खास शादी थी. इस शादी में न केवल हिंदी सिने जगत के लगभग सभी दिग्गज शामिल हुए थे. बल्कि खूब मस्ती भी हुई थी. जहां एक तरफ राज कपूर सायरा की तरफ से बारातियों की तैयारियों में जुटे थे. तो देव आनंद बारातियों के साथ डांस करते हुए बारात लेकर पहुंचे थे. प्राण ने दूसरे व्यक्ति की टिकट पर ट्रेन का सफर पूरा किया था, ताकि वे वक्त पर शादी में पहुंच पायें. अभिनेता रंजीत बताते हैं कि किस तरह सुनील दत्त के घर पर जाने पर न सिर्फ सुनील बल्कि उनकी पत् नी नरगिस भी आवभगत में लग जाती थीं. खाने खिलाने का दौर चलता रहता था. चूंकि अब पैसा, प्रोफेशनलिज्म हावी है. स्टार्स स्टार्स के बीच पीआर ने नफरत के बीज बो दिये.वे अपना मुनाफा कमा रहे हैं. लेकिन बॉलीवुड अब सिर्फ तमाशबीन हो चुका है.

रोमांटिक फिल्में करना सबसे मुश्किल : कैट



यश चोपड़ा की फिल्म वीर जारा के प्रीमियर में वह शामिल थीं और उसी वक्त उन्होंने यह सपना देखा था कि काश, उन्हें यश चोपड़ा की फिल्म में काम करने का मौका मिले. सिर्फ इसलिए नहीं कि यश चोपड़ा अपनी फिल्मों को बेहतरीन से बेहतरीन लोकेशन पर फिल्माते थे. बल्कि इसलिए क्योंकि यश चोपड़ा उन निर्देशकों में से एक थे, जिनकी फिल्मों की अभिनेत्रियां हमेशा खास होती हैं. कुछ ऐसा ही मानती हैं कट्रीना कैफ़. 

कट्रीना न सिर्फ प्रोफेशनली बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी यश जी के बेहद करीब थीं. वे उन्हें पिता की तरह मानती थीं. बकौल कट्रीना यश जी ने हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया है. वे हमेशा कहते कि मुझे बहुत खुशी होती है कि आउटसाइडर होने के बावजूद तुमने जो मेहनत से अपनी जगह बनाई है. अपनी मेहनत को हमेशा बरकरार रखना...

कट्रीना, यश चोपड़ा की नायिकाएं हमेशा बॉलीवुड के लिए खास रही हैं. जब तक हैं जान से आप भी उस फेहरिस्त में शामिल हो चुकी हैं. तो क्या अब तक आपने जितनी फिल्में की हैं. उनमें जब तक है जान को अपने करियर की माइलस्टोन फिल्म मानती हैं.और वे क्या खास बातें हैं यश चोपड़ा के निर्देशन की जो उनकी अभिनेत्रियों को खास बनाते हैं?
हां, यह सच है कि यह फिल्म मेरे लिए खास रहेगी. इसलिए क्योंकि मुझे इसमें यश जी के साथ काम करने का मौका मिला. मुझे लगता है कि बॉलीवुड की हर अभिनेत्री उनके साथ काम करना चाहेगी.चूंकि यश जी अपनी अभिनेत्रियों को खास बनाते थे. न सिर्फ उनके फिजिकल अपीयरेंस से और न ही कॉस्टयूम से, बल्कि वे दर्शाते थे कि उनकी अभिनेत्री खास है. बॉलीवुड में ऐसे कम निर्देशक हैं जो अभिनेत्रियों को आयटम नंबर से ऊपर आंकें. लोग उनके लोकेशन के चुनाव की बातें करते थे.मुझे भी लगता था कि उनकी फिल्मों के दृश्य खूबसूरत होते हैं. लेकिन यशजी के साथ काम करके यह समझ आया कि दरअसल, वह प्रकृति के बाद सबसे सुंदर औरत को मानते थे और वे बहुत इज्जत देते थे. यहां तक कि जब मैं कमरे में आऊं तो इतने सीनियर होने के बावजूद वे उठ कर खड़े हो जाते...मुझे उनका यह व्यवहार बहुत अच्छा लगता है. मुझे दुख है कि मुझे उनके साथ पहला और आखिरी मौका मिला. लेकिन मुझे इस बात की खुशी है कि मैं उनके साथ यशराज की अपनी पहली फिल्म न्यूयॉर्क से जुड़ी हुई हूं. वे उस फिल्म के बाद से ही मुझसे काफी बातचीत किया करते थे. मेरा मानना है कि यशजी अपनी अभिनेत्रियों के प्रति जो अप्रोच रखते थे वह बेहद अलग होता था.

यशजी आपके साथ एक खास गाना शूट करनेवाले थे.
मुझे हमेशा इस बात का अफसोस रहेगा कि हम अपना आखिरी गाना शूट नहीं कर पाये. यशजी उस गाने को लेकर काफी उत्साहित थे. मनीष मल्होत्रा के साथ उन्होंने काफी वक्त देकर लगभग 12 साड़ियां भी बनवाई थी. मैंने सारी साड़ियों में रिहर्सल भी किया था. मैंने यशजी की सारी फिल्में तो नहीं लेकिन उनकी फिल्मों की अभिनेत्रियों के खास सिफोन साड़ियों में गाने देखे थे. तो मैं भी काफी उत्साहित थी.
शाहरुख के साथ आपकी पहली फिल्म है. उन्हें किंग आॅफ रोमांस माना जाता है. तो आपकी नजर में उनमें ऐसी क्या खासियत है, जो उन्हें किंग आॅफ रोमांस बनाती है. आपने भी अपने करियर में कम रोमांटिक फिल्में की हैं. तो क्या यह अनुभव रहे आपके.
यह सच है कि शाहरुख की मैंने कई फिल्में देखी हैं खासतौर से मुझे वीर जारा बेहद पसंद आयी थी.मुझे लगता है कि शाहरुख में भी वे ही क्वालिटी है कि वे औरतों का बहुत सम्मान करते हैैं. मुझे याद है...जब भी मैं कोई रुमानी दृश्य फिल्माने जाती. वे हमेशा कहते लुक एट इन माइ आइज़...और फिर डायलॉग बोलो. शाहरुख इस इंडस्ट्री में काफी सालों से हैं. और सबके चहेते हैं. मुझे लगता है कि वे वास्तविक जिंदगी में भी काफी मिलनसार, हंसमुख और अपने साथ काम कर रहे को स्टार्स के प्रति सजग हैं. वे अपने साथ साथ उनके काम के परफेक् शन पर भी ध्यान देते हैं. जिसकी वजह से को स्टार्स भी अपना बेस्ट देने की कोशिश करते हैं. एक टीम की तरह काम करने की कला, उन्हें खास बनाती है. जहां तक बात है... रोमांटिक फिल्मों में मेरे अनुभव के तो. मैं वाकई मानती हूं कि रोमांटिक फिल्में करना सबसे कठिन जॉनर है, चूंकि ऐसी फिल्म में आप सीन को एक् शन दृश्यों से फील नहीं कर सकते. आपको अपनी भावनाओं से अभिनय करना होता है. कई बार खामोश होकर भी आपको अभिनय करना पड़ता है. ऐसे में मेरे लिए वाकई जब तक है जान हमेशा खास रहेगी. चूंकि मैंने इसमें जिस तरह से अभिनय किया है. वह काफी टफ था.

यश जी के साथ आपकी प्रोफेशनल और पर्सनल यादें.
एक सबसे खास बात यश जी में यह थी कि वे बाकी निर्देशकों की तरह कभी आकर आपको सीन समझाते समय यह नहीं कहते कि तुम्हें यही करना है. वे जब दिन में पहली बार आपसे मिलते. आप चेहरा पढ़ते. मुझे याद है. फिल्म की शूटिंग के सारे दिन जब भी वे मुझसे मिलते. कहते कट्रीना आज तुम्हारा मूड आॅफ है. मैं सोचती यह कैसे समझ जाते हैं. जिस दिन मूड फ्रेश रहता. वे कहते. आज काम करने में मजा आयेगा. यश जी यही खासियत थी कि वे कभी प्रोफेशनल बिहेव नहीं करते. हमेशा हंसाते रहते. ख्याल   रखते. अपने परिवार की तरह. उन्हें मेरी फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन बेहद पसंद आयी थी. वे हमेशा कहते कि कैट मुझे डिंपल चाहिए. मतलब हमेशा खुश रहनेवाली चुलबुली सी कैट, उनसे आजतक मुझे जितना अपनत्व मिला है. कहीं नहीं मिला. हमारी बहुत बातें होती थीं. वे मेरी फिल्में हमेशा देखते थे और फिर डिस्कस भी करते थे. वे कहते थे कि मैं सही ट्रैक पर हंू. जिस तरह की फिल्में कर रही हूं.

इस फिल्म में आप और अनुष्का दोनों हैं. कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि दो अभिनेत्रियों को एक फिल्में नहीं करनी चाहिए.
मैं सच कहूं तो मैं प्रोफेशनली मानती हूं कि दो अभिनेत्रियां अगर एक फिल्म में होती हैं तो उनके लिए काम करने की गुंजाईश कम हो जाती है क्योंकि ऐसे भी बॉलीवुड में अभिनेत्रियों के लिए कम सीन होते हैं. लेकिन इस फिल्म की बात है जहां तक़.तो मैं यही कहूंगी कि यशजी ने यह महसूस होने ही नहीं दिया. क्योंकि उनकी फिल्मों में अभिनेत्रियां ही हावी होती हैं एक्टर पर. उनके लिए पूरी गुंजाईश होती है. सो हम दोनों को अपने अपने हिस्से का काम करने का मौका मिला.

फिल्म में आपका नाम मीरा है तो मीरा के किरदार के बारे में थोड़ा बतायें?
मेरा नाम मीरा है फिल्म में. मैं लंदन में रहती हूं. प्यार को लेकर और जिंदगी को लेकर मेरे अपने मायने हैं. ऐसे में जिंदगी में समर आते हैं और दुनिया बदल जाती है. प्यार के मायने बदल जाते हैं.
कैट, अभी मीडिया में लगातार खबरें आती हैं कि खान्स के साथ काम करना ही किसी अभिनेत्री के लिए  

सफलता का मापदंड है. आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मैं इस पर बिल्कुल बिलिव नहीं करती. खान्स के साथ काम करती रहूं लेकिन बेकार परफॉरमेंस दूंगी तो कभी टिक नहीं पाऊंगी. सब आपकी मेहनत और फिल्मों के चयन पर निर्भर करता है.

आपकी आनेवाली फिल्में
ऋतिक रोशन के साथ एक फिल्म कर रही हूं. अगले साल आप मुझे धूम में देखेंगे.
आपकी जिंदगी में वे कौन सी चीजें होंगी जो आप जब तक हैं जान कर लेना चाहेंगी.
मैं चाहूंगी कि जब तक हैं जान मैं अभिनय करती रहूं.

20121106

शशि का पृथ्वी थियेटर


 
कुछ दिनों पहले लीजेंड अभिनेता शशि कपूर के बेटे व पृथ्वी थियेटर के प्रमुख कुणाल कपूर ने बताया कि शशि कपूर अमूमन कम बातें करते हैं. लेकिन हाल ही में जब उन्होंने अपने पोते रणबीर कपूर की फिल्म रॉकस्टार देखी तो उन्होंने कहा कि दिस ब्वॉय इज रियली गुड, फिल्म देखते वक्त वह यह नहीं समझ पाये थे कि वे जिसकी तारीफ कर रहे हैं. वे उनके ही खानदान का चिराग है. कुणाल बताते हैं कि रणबीर हर क्रिसमस पर शशि से मिलने जरूर आते हैं. लेकिन अब शशि की याददाश्त बहुत नहीं. इसलिए वे चीजों को बहुत ज्यादा याद नहीं रख पाते. इसके बावजूद शशि आज भी पृथ्वी थियेटर में हर शाम आते हैं. शशि किसी दौर में चार्मिंग हीरो के रूप में लोकप्रिय थे. दीवार में अगर विजय को शशि के रूप में रवि वर्मा का साथ न मिला होता तो शायद ही दीवार हिंदी सिनेमा में मील की दीवार मानी गयी होती. शशि एक जमाने में अपने अभिनय के लिए विशेष वर्ग में खासतौर से लोकप्रिय थे. लेकिन बाद में जाकर जब वे जेनिफर के संपर्क में आये. तब से उनकी रुचि थियेटर में और बढ़ गयी और आज आलम यह है कि पृथ्वी थियेटर से इस तरह भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं कि वे फिल्मी जगत के लोगों के संपर्क में भले न रहें. लेकिन हर शाम उन्हें पृथ्वी थियेटर जाकर सुकून मिलता है. वे वहां एक कोने में बैठ कर पृथ्वी थियेटर आनेवाले लोगों को सिर्फ निहारते हैं. लेकिन उनकी खामोश आंखों में आज भी एक बात की तसल्ली है कि पृथ्वी आज भी लोगों में प्रासंगिक है. दो तीन दिनों पहले पृथ्वी थियेटर फेस्टिवल की शुरुआत हुई और इस मौके पर थियेटर से जुड़े कई लोकप्रिय सितारें आये. जो फिल्मों में भी सक्रिय हैं. लेकिन लोग चौंके तब जब अचानक कपूर खानदान की बेटी करीना अपने पति सैफ के साथ वहां पहुंचीं.अपने दादा शशि के साथ काफी वक्त भी बिताया. यह शशि के समर्पण का ही नतीजा है कि आज भी सुपरसितारें भी जब पृथ्वी की गलियारों में प्रवेश करते हैं. वे आम लोगोंं की तरह बर्ताव करते हैं. वे वहां स्थित कैफेटेरिया में बैठ कर रगड़ा पैटिज, कोक व कई खाने का लुत्फ उठाते हैं. एक दूसरे के साथ बैठ कर वहीं छोटी छोटी कुर्सियों में बैठ कर कुछ देर सुकून के बिताते हैं. अनिल कपूर को प्राय: यहां देखा जा सकता है. आज भी पृथ्वी थियेटर के नियम किसी के लिए नहीं बदले. आज भी यहां शो शुरुआत होने के बाद किसी को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं होती. एक सुपरस्टार अभिनेता के लिए उसके बुढ़ापे में यह समृद्धि मिलना भी उसे संपूर्ण व संतुष्ट बनाता है.

एक सुपरस्टार बेटे के मन की टिस



कुछ दिनों पहले शाहरुख खान ने अपने पिता के जन्मदिन पर उनकी एक तसवीर टिष्ट्वटर पर अपलोड की थी. और साथ ही लिखा था. कि जन्नत में आप जहां भी हैं. खुश रहें. सलामत रहें. शाहरुख भी अपने पिता के काफी करीबी थे, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें अपने पिता का साथ लंबी उम्र तक नहीं मिला था. जब वे 14 साल के थे. तभी उन्होंने अपने पिता को खो दिया था. शाहरुख की अपलोड की गयी उस तसवीर और उसमें लिखे शब्द ही बयां करते हैं कि शाहरुख आज अपने पिता को कितना मिस करते होंगे. इस बार जन्मदिन पर जब उनसे उनके घर मन्नत में मुलाकात हुई तो उनसे मैंने यह सवाल पूछा कि क्या उनके पिता ने उन्हें कभी किसी जन्मदिन पर ऐसी कोई चिट्ठी तोहफे के रूप में दी थी. जो उनके लिए काफी इमोशनल रही हो. यह प्रश्न सुन कर शाहरुख भावुक हो उठे थे. उन्होंने बताया कि उस दौर में वे या उनके पिता कभी इस तरह की चीजों पर ध्यान नहीं देते थे. खुद उनके पास केवल अपने पिता की दो तसवीरें हैं और कुछेक तो उन्होंने खुद इंटरनेट से इकट्ठी की है. साथ ही शाहरुख ने ये बताया कि जब उनके पिता कैंसर से पीड़ित थे. वे बात नहीं कर पाते थे. तो वे एक डायरी रखते थे और उसमें सारी बातें लिखते थे. जैसे कैसे हो...शाहरुख और उनकी बहन शहनाज दोनों को ही. वे दो किताबें आज भी शाहरुख के पास हैं. शाहरुख के चेहरे पर स्पष्ट रूप से यह बात झलक रही थी कि उन्हें कितना अफसोस है कि वे अपने पिता की किसी चीज को धरोहर के रूप में सहेज नहीं पाये हैं. यहां तक कि तसवीरें भी नहीं. दरअसल, हकीकत यही है कि जिस वक्त शाहरुख से उनके पिता का साथ छीना वे शायद ही इस बात से वाकिफ होंगे कि वे खुद इतने बड़े सुपरस्टार बनेंगे और दुनिया उनकी चीजें सहेजेगीं. खुद शाहरुख आम परिवार से थे और प्राय: हम आम मध्यवर्गीय परिवार में ऐसी चीजों को खास तवज्जो नहीं दी जाती है. हम रुटीन वर्क में ही खुद को इतने व्यस्त रखते हैं कि बाकी चीजों का ख्याल नहीं कर पाते. हमारा ध्यान कभी इस ओर नहीं जाता कि हमारे परिवार के सदस्य बड़े बुुजुर्ग भी दरअसल, हमारे धरोहर हैं और उनसे जुड़ी चीजें हमें सहेज कर रखने के लिए उनका डॉक्यूमेंटेशन करना ही चाहिए. फिर चाहे वह वीडियो के रूप में या तसवीरों के रूप में. जरूरी नहीं कि केवल खास शख्सियतों को ही यह हक है. अमिताभ बच्चन ने अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की किताबों और उनसे जुड़ी तसवीरों को यादों में संजों रखा है.

गूंगे फाल्के का बोलता सिनेमा

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अगर उस वक्त दादा साहेब फाल्के ने लंदन फिल्म उद्योग के फिल्मकारों की बात सुन कर लंदन में रह कर ही फिल्में बनाना शुरू कर देते तो शायद ही भारतीय सिनेमा जगत का जन्म संभव हो पाता. अगर उस वक्त दादा साहेब ने अपने दोस्तों की बात मान ली होती और फिल्में बनाने की धून छोड़ दी होती तो शायद ही भारत में सिनेमा का विगुल बजता. दोस्त उन्हें पागल बुलाते थे और यही नहीं उनके दोस्तों ने तो उन्हें थाणे के पागलखाने में भर्ती भी करवा दिया था. लेकिन अगर वे उसी वक्त अपने पागलपन को छोड़ देते. तो शायद आज हिंदी सिनेमा अपने 100 साल में प्रवेश नहीं कर पाता. अगर उस वक्त दादा साहेब फाल्के ने भी अपनी जमापूंजी को यह सोच कर फिल्मों के लिए निवेश न किया होता कि उन्हें अपने परिवार का निर्वाह करना है तो वे भारतीय सिनेमा के जनक नहीं कहलाते. दादा साहेब फाल्के ने कदम कदम पर चुनौतियां लीं तो भारतीय सिनेमा के ताकत बने. वरना, शायद ही भारत में मूविंग फिल्मों की शुरुआत हो पाती. दरअसल, दादा साहेब फाल्के जैसे जुनूनी व्यक्ति में ही एक फिल्मकार का जन्म हो सकता था. सिनेमा की सोच रखनेवाले ही किसी व्यक्ति को चाय की प्याली के हैंडल में भी कैमरा एंगल नजर आ सकता है. सिनेमा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही मटर के पौधे के विकास को भी सिनेमा का रूप दे सकता है. दादा साहेब फाल्के को भले ही मूल प्रेरणा लंदन में देखी गयी फिल्म द लाइफ आॅफ क्राइस्ट से मिली हो. लेकिन उन्होंने उस प्रेरणा में अपनी मौलिकता और सोच से एक समझ दी और भारत में फिल्मों की शुरुआत की. फिल्म उस वक्त मूलत: विदेशी उपक्रम था. साथ ही न तो किसी के पास फिल्म बनाने के अनिवार्य तकनीक उपलब्ध थे न ही उपकरण. लेकिन इसके बावजूद फाल्के ने अपनी सूझबूझ से वह कर दिखाया, जो आज एक बड़ी इंडस्ट्री का रूप है.  दादा साहेब फाल्के  उर्फ धुंधीराज गोविंद फाल्के को बचपन से ही कला से लगाव हो चुका था. यही वजह ती कि उन्होंने शिक्षा के लिए जेजे आटर््स स्कूल से कला का प्रशिक्षएण हासिल किया. फोटोग्राफी के शौक ने यही जन्म लिया. एक मंझे फोटोग्राफर की तरह न सिर्फ उन्हें शिक्षा ली. बल्कि उन्होंने अपना स्टूडियो भी शुरू किया. दरअसल, दादा साहेब फाल्के के व्यक्तित्व की एक खासियत रही. उन्होंने हमेशा जो भी चीजें सीखीं. उसका प्रयोगात्मक रूप से इस्तेमाल करना भी शुरू किया. केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि वे अपनी शिक्षा को व्यवहारिक रूप से भी प्रयोग करने लगे थे. यही वजह थी वे सन 1909 में जर्मनी भी गये. रहां उन्होंने आधुनिक मशीनों की तकनीक और संचालन के बारे में जाना. वही उनकी मुलाकात मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा से हुई थी. रवि भारतीय देवताओं की पेंटिंग बनाया करते थे. और उसी वक्त से फाल्के को भी देवी देवताओं की पेंटिंग में रुचि हो गयी थी. फिर कुछ दिनों बाद लाइफ आॅफ क्राइस्ट देखने का मौका मिला. और फाल्के के अंदर का फिल्मकार जाग उठा. उन्होंने तय किया कि वे भारत जाकर वैसी ही फिल्म बनायेंगे. लेकिन सिनेमा की समझ उतनी नहीं थी.  जुनून इस कदर सवार था कि घर परिवार सबकुछ भूल कर अपनी जमाराशि, इंश्योरेंस सबकुछ गिरवी रख कर सिनेमा सीखने गये. तो, पहले लंदन जाकर वहां फिल्में बनाने का तरीका देखा. सीखा. समझा. फिर भारत लौटे. लेकिन संघर्ष यहां समाप्त नहीं हुई थी. किसी भी काम की पहली नींव रखना कितना मुश्किल था. यह अनुमान था. फाल्के को. लेकिन वे लगे रहे. दोस्त संपाक सेसिल हेपवोर्थ ने थोड़ी मदद की और भारत में आ गया कैमरा. तय किया कि राजा हरिशचंद्र पर ही फिल्म बनायेंगे. लेकिन सिर्फ कैमरे से तो फिल्म बनना संभव नहीं था. पूरी टीम चाहिए थे. लेकिन सिनेमा की पढ़ाई तो केवल फाल्के ने की थी. बाकी लोगों ने तो नहीं. वे तो जानते भी नहीं थे. क्या है सिनेमा. फिर कैसे समझायें. लेकिन फाल्के ने भी हिम्मत नहीं हारी. एक विज्ञापन निकाला. कलाकारों की खोज के लिए. लेकिन मुसीबत खत्म कहां होनेवाली थी. लोग अभिनय का मतलब सिर्फ थियेटर समझते थे. सिनेमा में अभिनय व थियेटर में अभिनय में अंतर भला वे कैसे समझ सकते थे. बमुश्किल थियेटर  के कलाकारों को ही फिल्म के लिए राजी किया. लेकिन उस समय महिलाएं और अभिनय दूर दूर तक ताल्लुक नहीं था. महिलाओं के किरदार भी पुरुष किया करते थे. लेकिन फाल्के की इच्छा थी कि वे महिला से ही अभिनय करायें. उन्होंने खोज जारी रखी. लेकिन नाकामयाब रहे. तो मजबूरन उन्होंने सांलुके नामक पुरुष से रानी तारामती का किरदार निभवाया. लेकिन संघर्ष का साथ अभी छूटा नहीं था. लगातार काम व शोध करने की वजह से फाल्के की आंखें कमजोर हो गयी थीं. अपना घर गिरवी रख कर उन्हें दूसरे छोटे से मकान में जाना पड़ा. लेकिन इन पूरे संघर्ष में उन्हें उनकी पत् नी का साथ मिला. जिन्होंने फाल्के का हौंसला बरकरार रखा. फाल्के अपनी फिल्म में स्वयं ही कला निर्देशक, दृश्यकार, कैमरामैन, संपादक, कॉस्टयूम डिजाइनर, मेकअप आर्टिस्ट, पेंटर और डिस्ट्रीब्यूटर बने. अंतत: पहली फिल्म बनी 3 मई 1913 में फाल्के व पूरे भारत का सपना पूरा हुआ. राजा हरिश्चंद्र भारत की पहली फिल्म बन कर तैयार हुई. लेकिन फाल्के ने अपनी यात्रा यही समाप्त नहीं की. वे लगातार फिल्में बनाते रहे.  लंका दहन, श्री कृष्ण जन्म, कालिया मरदान, सेदु बंधन, गंगावर्तनमोहनी भस्मासुर और सत्यवान   सावित्री का भी निर्माण करते रहे. दरअसल, दादा साहेब फाल्के का योगदान न केवल फिल्मों के जनक के रूप में ही नहीं बल्कि कई पौराणिक व धार्मिक कथाओं जिन्हें आम दर्शक वाकिफ भी नहीं थे. उन्हें सिनेमा के माध्यम से आमजन तक पहुंचाने के लिए याद किया जाता रहेगा. उन्होंने फिल्में बनाने की परंपरा केवल सोच तक सीमित नहीं रखी. उन्होंने तकनीकी रूप से भी इस बात को समझा कि फिल्मों के लिए स्टूडियो की जरूरत होगी. उन्होंने फिल्म स्टूडियो भी स्थापित करने का फैसला लिया. उस वक्त नासिक स्टूडियो  में भवन, पुस्तकालय,चिड़ियाखाना के साथ कलाकारों व तकनीशियनो के लिए विश्रामघर की भी व्यवस्था की थी. उन्होंने खुद एडिटिंग का पूरा सेटअप भी लगवाया. उन दिनों यहां वे रात दिन फिल्मों की शूटिंग करते थे. यह फाल्के की ही पहल का नतीजा था कि धीरे धीरे बुद्धिजीवी,शिक्षित व्यक्ति और आम लोगों ने भी फिल्मों में भविष्य को खोचा. रोजगार के अवसर तलाश्े. फाल्के की सफलता से प्रभावित होकर कई लोग इस इंडस्ट्री का हिस्सा बनने लगे. भले ही सिनेमा में बाद के दौर में कई आविष्कार हुए, आज भी हर दिन नये आविष्कार हो रहे हैं. लेकिन फाल्के ने उस वक्त पहल की, जब सिनेमा को उदासीनता और निंदा की दृष्टि से देखा जाता था. उस वक्त फाल्के ने अपना पूरा जीवन इसे समर्पित कर दिया. लेकिन वक्त की विडंबना रही कि जब धीरे धीरे सिनेमा को आवाज मिली तो उस वक्त फाल्के गूंगे हो गये. मसलन वर्ष 1913 से 1920 तक तो फाल्के ने अपने तरीके की कई प्रयोगात्मक फिल्में बनायी. लेकिन 1920 में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ. इस नयी तकनीक से फाल्के ने खुद को अपरिचित समझा और उन्होंने फिल्मों के निर्माण से अलविदा कर दिया. वाकई, कैसा रहा होगा वह लम्हा फाल्के के लिए. जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन सिनेमा को समर्पित कर दिया. उसी सिनेमा ने आवाज मिलते ही सिनेमा के जनक से ही उसकी आवाज छीन ली. गंगावतरण नामक पहली बोलती फिल्म बनाने का प्रयास फाल्के ने किया. लेकिन वे असफल रहे. संघर्षशील फाल्क के अंतिम दिन नासिक में बीते.
अनुप्रिया अनंत

धर्मसंकट में फंसी एक पत् नी एक दोस्त



इन दिनों यश चोपड़ा की फिल्म जब तक है जान का प्रमोशन जोरों से हो रहा है. इस फिल्म के प्रीमियर के लिए बकायदा एक खास थियेटर भी बनाया जा रहा है यशराज में. पामेला की इच्छा है कि वे अपने पति की आखिरी फिल्म को एक सेलिब्रेशन का रूप दें. तैयारियों जोरों पर है. लेकिन इसी बीच अजय देवगन की फिल्म सन आॅफ सरदार और यशराज के बीच हो रहे विवाद की वजह से तनाव का आलम है. अजय देवगन फिल्म्स ने जहां अपनी तरफ से यशराज को कंप्टीशन एक्ट के तहत नोटिस भेजने का दावा किया है, वही यशराज ने साफ इनकार किया है कि हमें कोई नोटिस नहीं आया है. अजय देवगन फिल्म्स के वक्ता का कहना है कि नोटिस यश चोपड़ा के निधन से पहले भेजा गया था और अजय का किसी को व्यक्तिगत रूप से चोट पहुंचाने का कोई ईरादा नहीं. इन तमाम झंझावातों के बीच फंसी हैं काजोल. चूंकि काजोल एक तरफ अजय की पत् नी हैं तो दूसरी तरफ यशराज और शाहरुख से हमेशा काजोल के करीबी रिश्ते रहे हैं. यहां तक कि यश चोपड़ा के जूहू बंगले से काजोल का घर भी बिल्कुल सटा ही स्थित है.दरअसल, काजोल ने अजय से शादी करने के बाद से ही अपने रिश्तों को बहुत अलग तरीके से निभाया है. शायद ही हिंदी सिनेमा में ऐसी कोई अभिनेत्री होगी जो इतने सही तरीके से अपने रिश्तों को संजो कर चल पायी हो. काजोल अपने रिश्ते बखूबी निभाना जानती हैं. वे जानती हैं कि रिश्तों बनाना आसान है लेकिन उन्हें निभाना पानी से पानी पर पानी लिखना है. शुरुआती दौर से ही अजय अंर्तमुखी रहे हैं.वे इंडस्ट्री में कम लोगों से घूलते मिलते हैं. शाहरुख से उनकी कभी नहीं बनी. लेकिन दूसरी तरफ काजोल पर उन्होंने कभी रोक नहीं लगायी या शायद काजोल ने भी अपनी सूझ बूझ से अपने पति के ठीक विपरीत इंडस्ट्री में सबसे रिश्ते बरकरार रखे हैं. वे आज भी शाहरुख को अपना बेस्ट फ्रेंड मानती हैं. लेकिन इस बार काजोल के लिए अग्निपरीक्षा का समय है. चूंकि अब से पहले ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आयी थी.इस बार यशराज भी अपनी फिल्म को अपने पिता की आखिरी फिल्म मान कर काफी भावनात्मक है और अजय भी अपनी फिल्म सन आॅफ सरदार को लेकर काफी गंभीर. हालांकि अजय की फिल्म कॉमेडी फिल्म है और यशराज की रोमांटिक है. लेकिन दोनों ही फिल्में तनाव की वजह से अपना फ्लेवर खो कर सिर्फ तनाव और विवादस्पद फिल्में बनती जा रही हैं. ऐसे में काजोल इस धर्मसंकट से कैसे पार लगाती है. यह उनके लिए कठिन निर्णय होगा.

किंग आॅफ रोमांस का 47वां बसंत



आज के दौर के किंग आॅफ रोमांस शाहरुख खान आज 47 वें बसंत में प्रवेश कर रहे हैं.  वास्तविकता में शाहरुख खान के जन्मदिन में बसंत शब्द का इस्तेमाल न सिर्फ प्रासंगिक है. बल्कि उचित भी है. चूंकि शाहरुख ही किंग आॅफ रोमांस हैं और रुमानी जीवन में, रुमानी लोगों की जिंदगी में बसंत महीने का खास महत्व है. इस लिहाज से शाहरुख के साथ बसंत की उपाधि फिट बैठती है.  इसी महीने उनकी बहुचर्चित व बहुप्रतिक्षित फिल्म जब तक हैं जान रिलीज हो रही है. यह फिल्म उसी निर्देशक की फिल्म है, जिन्होंने शाहरुख खान को किंग आॅफ रोमांस की उपाधि दिलायी. यश चोपड़ा. हाल ही में जब तक हैं जान फिल्म से संबंधित एक कार्यक्रम में जब शाहरुख से पूछा गया कि वे आज भी हिंदी सिनेमा के किंग आॅफ रोमांस माने जाते हैं और वे किसी तरह सिनेमा में रोमांस को जिंदा रखना चाहेंगे तो उनका जवाब था कि वे हिंदी सिनेमा के किंग आॅफ रोमांस शम्मी कपूर, राजेश खन्ना को मानते हैं. खुद को नहीं. दरअसल, हकीकत भी यही है कि पिछले कई सालों से हिंदी सिनेमा में रोमांस पर लगातार फिल्में बनती तो आ रही हैं. लेकिन जो रुमानियत, प्रेम को परदे पर उतारने और निभाने में शम्मी कपूर, राजेश खन्ना या देव आनंद साहब माहिर थे. वे रुमानियत आज खो चुकी है. शाहरुख खान भी लंबे अरसे के बाद रोमांटिक फिल्म में नजर आ रहे हैं. जबकि शाहरुख यह अच्छी तरह जानते हैं कि वे प्रेम की परिभाषाओं को परदे पर उतारने में माहिर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद वे धाराप्रवाह में बह कर वे फिल्में करने लगे. जिसमें वे फिट हैं ही नहीं. वे रा. वन में बड़ी बड़ी बिल्डिंग में सुपरमैन की तरह करतब दिखाने लगे. जबकि दर्शक आज भी उन्हें सरसो के खेत में या स्वीजरलैंड की गलियों में प्रेम गीत गाते देखना चाहते हैं. वे डॉन बन कर अपनी प्रेमिका को जंगली बिल्ली कह कर पुकारने लगे. जबकि लोग उन्हें आज भी क...क किरण और आइ लव यू सिमरन कहते हुए सुनना चाहते हैं. वे डॉन की परिभाषा देने में व्यस्त हो गये थे. जबकि लोग आज भी उनसे दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता के राहुल की तरह प्यार और दोस्ती की परिभाषा देते हुए सुनना चाहते हैं. यह सच है कि हर एक्टर को हर तरह की फिल्में करनी चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि शाहरुख ने प्रेम विधा में भी विभिन्नता दी है तो फिर उन्हें वैसी ही फिल्में करती रहनी चाहिए. आज भी शाहरुख को जेम्स बांड बनने इच्छा है. जबकि लोग उन्हें राज के रूप में ही देखना चाहते हैं. संभवत: शाहरुख इस बात को समझ पायें.

बेटी, बहू, मां -ऐश्वर्य



आज ऐश्वर्य राय बच्चन का जन्मदिन है. मां बनने के बाद यह ऐश्वर्य का पहला जन्मदिन है. ऐश्वर्य उन शीर्ष अभिनेत्रियों में से एक हैं, जिनके साथ आज भी अच्छे निर्देशक काम करना चाहते हैं. हालांकि पिछले एक साल से उन्होंने अपना पूरा समय अपनी बेटी आराध्या की परवरिश को दिया. और अब भी उनकी वापसी कब होगी. यह तय नहीं. ऐश्वर्य पिछले लंबे समय से सिल्वर स्क्रीन से दूर हैं. लेकिन इसके बावजूद उन्हें इस बात से कोई मलाल नहीं. उनके चेहरे से स्पष्ट रूप से यह बात झलकती है कि वे अपने मातृत्व जीवन को कितना एंजॉय कर रही हैं. खुद जया बच्चन यह स्वीकारती हैं कि कई बार विदेशों में टूर के दौरान जब वे ऐश से कहती हैं कि वे बेबी को उनके पास छोड़ कर अपना काम पूरा कर लें. लेकिन ऐश एक पल के लिए भी बेटी आराध्या को खुद से दूर नहीं करतीं. प्रेगनेंसी के बाद बढ़े वजन को लेकर बार बार मीडिया में उनका मजाक बनाया जाता रहा. लेकिन यह ऐश्वर्य का आत्मविश्वास ही था कि वे सारी आलोचनाओं को सहते हुए भी अपनी मां की ममता के सागर में डूबी रहीं. यही नहीं वे गर्व से बताती आयीं कि वह एक औरत भी हैं और अगर ये सारी चीजें उनके साथ हो रही हैं. यह एक औरत के जीवन का हिस्सा है. दरअसल, ऐश्वर्य एक अच्छी मां बन पायी हैं, क्योंकि वह एक अच्छी बेटी भी हैं. शुरुआती दौर से लेकर अब तक वे अपने मां और पापा का खास ख्याल रखती आयी हैं. उनके अपने पेरेंट्स के प्रति इसी प्यार और अपनत्व के भाव को देख कर ही सलमान खान भी कभी ऐश्वर्य से बेइतहां प्यार कर बैठे थे. चूंकि सलमान भी अपने माता पिता को बेहद प्यार करते हैं. तो उन्हें लगा कि ऐश उनके परिवार का ख्याल उसी तरह रखेगी. जैसे वह अपने माता पिता का रखती है. यह हकीकत भी है कि बच्चन परिवार की बहू बनने के बाद ऐश्वर्य ने एक बहू के रूप में घर की सारी जिम्मेदारियां निभाई हैं. खुद अमिताभ बताते हैं कि वे घर में पूजा पाठ से लेकर प्रत्येक व्यक्ति की हर जरूरतों का ख्याल रखती हैं.  अभिषेक ऐश के इस बात के मुरीद हैं कि वे घर पर उनके माता पिता का सबसे अधिक ख्याल रखती हैं. ऐश्वर्य वर्तमान में काम न करते हुए भी मोस्ट डिजायरबल अभिनेत्रियों में से एक है. और घर पर भी वे सबको समृद्ध मनाती हैं. एक महिला के लिए इससे अधिक उपलब्धि और क्या होगी कि वह जहां भी है शीर्ष पर है. बहू के रूप में. बेटी के रूप में. मां के रूप में. और साथ ही साथ लोकप्रिय अभिनेत्री व सफल अभिनेत्री के रूप में भी.

मामी फिल्मोत्सव में क्लासिक फिल्में


  इस बार मामी फिल्मोत्सव ने एक अनोखी पहल की थी. देश विदेश की तमाम भाषाओं की बेहतरीन फिल्मों के साथ साथ भारतीय वे फिल्में भी शामिल की गयीं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की नींव रखी थी. जिस दौर में वे फिल्में बनी थी. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर मुंबई फिल्मोत्सव की तरफ से यह बेहतरीन श्रद्धांजलि था. जाहिर सी बात है कि आज के जेनरेशन के लोगों ने सिर्फ उनके बारे में सुन रखा है. ऐसे में मामी फिल्मोत्सव जो कि युवाओं में सबसे अधिक लोकप्रिय है. फिल्म के विद्यार्थियों में सबसे अधिक लोकप्रिय है. यह एक बेहतरीन माध्यम बना, उन तक उस दौर की फिल्में पहुंचाने के लिए, जिन्हें हमने सिर्फ किताबों में पढ़ा है. भारत की पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र. दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्देशित-निर्मित. वाकई भारत की पहली फीचर फिल्म बनाने का क्या जुनून क्या जोश रहा होगा फाल्के में. आज जब इस फिल्म को बने और भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं. आज से 100 साल बनी यह फिल्म देखने का अदभुत रोमांच रहा. तकनीक की कमी होने के बावजूद , सिर्फ अपनी सोच से कैसे बन सकती है फिल्म. फाल्के की यह सोच प्रेरणा देती है. और उनकी यह प्रेरणा हमेशा प्रासंगिक रहेगी. भले ही 100 साल बाद आज जब हम फाल्के की फिल्में देखें तो हमें उसमें वह बातें नजर न आयें. वह ग्रामर नजर न आये. लेकिन इसके बावजूद फाल्के की सोच हमेशा प्रासंगिक रहेगी.  फाल्के किस तरह अपनी एडिटिंग को लेकर काफी चर्चित रहे. किस तरह उन्होंने पूरे भारत में प्रोजेक्ट्र से घूम घूम कर दर्शकों तक फिल्में पहुंचायी. लोगों को फिल्में दिखाने की कला सिखायी. फाल्के के पथ पर चलते हुए बाबुराव पेंटर, हिमांशु राय, सेव दादा जैसी शख्सियत ने किन मुसीबतों का सामना करते हुए फिल्मों का निर्माण किया होगा और फिर किस तरह लोगों तक पहुंचाया होगा. यह सब बेहद रोचक सफर की तरह रहा होगा. न सिर्फ राजा हरिशचंद्र, उस दौर की लगभग सारी क्लासिक फिल्में मामी में शामिल हुई थीं और वर्तमान के दर्शकों में उन्हें लेकर अलग ही रुचि-रोमांच था. इसके साथ ही इस बार भारतीय फिल्मों में शाहिद, फिल्मीस्तान, मुंबईचा राजा, शिप आॅफ थेसस, कल्पना, मिस लवली, जहानु बरुआ द्वारा निर्देशित बांधो जैसी बेहतरीन फिल्में दिखाई गयी. जिनमें मिस लवली और कल्पना को कई अंतरराष्टÑीय फिल्मोत्सव में भी सराहा जा चुका है. इससे स्पष्ट है कि इन 10 सालंो में भारत में भी कई श्रेष्ठतम फिल्में बनी हैं.

पेंटिंग से निकले बोलते किरदार



जब हम किसी कला प्रदर्शनी में जाते हैं तो वहां स्थित पेंटिंग की खूबसूरती और उसे रचनेवाले चित्रकार की तारीफों के पूल बांधते हैं. लेकिन शायद ही हम में से किसी ने भी कभी यह कल्पना भी की होगी कि चित्रकार जिन पेंटिंग को किसी प्रदर्शनी का हिस्सा बनाता है. दरअसल, वह कई बुरी पेंटिंग के बाद बार बार अभ्यास के बाद उभर कर सामने आती है. लेकिन उस बुरी पेंटिंग को जिसे कागज का टुकड़ा समझ कर बार बार चित्रकार फेंक देते हैं. उनमें भी जान होती होगी. वे भी सोचते होंगे कि आखिर उनका क्या दोष है. जो उन्हें यूं अधूरा या बुरा कह कर हटा दिया गया. ये सारी बातें वाकई किसी काल्पनिक दुनिया की सैर कराती हैं. लेकिन इसी काल्पनिक दुनिया से बिल्कुल अलग एक दुनिया की कल्पना करना और फिर उसे एक फिल्म का रूप देना अदभुत है.इस बार मामी फिल्मोत्सव में शामिल हुई फिल्म द पेंटिंग हर तरह से एक अदभुत और अनोखी फिल्म थी. यह एक ऐनिमेशन फिल्म है. लेकिन इस फिल्म के सारे किरदार एक पेंटिंग के किरदार हैं, जो अपने चित्रकार की खोज में निकले हैं कि आखिर उन्होंने उन्हें क्यों अधूरा छोड़ दिया. अंत में जब पेंटिंग से ही निकली एक किरदार चित्रकार से मिलती है और फिर एक खोज पर निकलती है. चित्रकार उससे पूछता है कि अब तुम कहां जा रही हो तो वह बताती है कि अब वह यह तलाशने जा रही है कि आखिर इस चित्रकार को किसने बनाया. जिस तरह किसी लेखक के शब्द अगर प्रभावशाली हो तो उन्हें भी आवाज आ जाती है. ठीक इसी तरह इस फिल्म में दर्शाने की कोशिश की गयी है, जब एक चित्रकार किसी भी पेंटिंग की परिकल्पना कर अपनी कूची से किसी कैनवॉस पर किसी भी रंग से कुछ भी रचने की कोशिश करता है. उसी वक्त वे जीवंत हो जाते हैं. उनमें जान आ जाती है. वाकई फ्रेंच के निर्देशक जीन फ्रांसिस ने इस फिल्म के विषय से ही साबित कर दिया है कि सोच को व्यक्ति चाहे तो किसी भी सीमा तक ले जा सकता है. हिंदी फिल्मों में शायद ही एनिमेशन फिल्में बनाते वक्त निर्देशक इस तरह के थीम सोच पायें. हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को ऐसी फिल्मों से सीख लेनी चाहिए. ये फिल्में अपने थीम में ही इतनी प्रबल होती है कि दर्शक ऐसी फिल्में देख कर वाहवाही ही देते हैं. वाकई, यह हकीकत है कि अच्छी फिल्म का प्रभाव दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी व्यक्ति पर हो सकता है. द पेंटिंग जैसी फिल्में प्रेरणा है. निर्देशकों के लिए. उनकी कल्पना की सोच के लिए. ऐसी फिल्में नयी सोच और नयी दिशा दिखाती है.