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20121022

जीत का जश्न है चिटगांव : बेदव्रत




 
दिल्ली यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन के दौरान महसूस किया कि कई लोगों को चिट्टगांव के स्वतंत्रता सेनानी सूर्य सेन के बारे में जानकारी नहीं है. यहां तक कि केबीसी में पूछे गये सवाल पर भी किसी ने इसका जवाब नहीं दिया. उस वक्त बेदाब्राता पेन के जेहन में आया कि स्वाधीनता संग्राम की एक ऐसी कहानी जहां 50 बच्चों ने मिल कर अंगरेजों को खदेर दिया था. इनकी कहानी परदे पर कही जानी ही चाहिए और उनकी इसी कोशिश को उन्होंने फिल्म चिट्टगांव का रूप दिया. चिट्ट्रगांग को न सिर्फ दर्शकों से बल्कि क्रिटिक व कई अंतरराष्टÑीय फिल्मोत्सवों में भी काफी सराहना मिल रही है. पेश है फिल्म के निर्देशक बेदव्रत पेन से हुई बातचीत के मुख्य अंश 

बेदव्रत को शुरू से ही परफॉर्मिंग आर्ट्स में दिलचस्पी थी. लेकिन पढ़ाई में होनहार होने के कारण उन्होंने साइंस का क्षेत्र चुना और नासा गये. वहां 15 सालों के कार्यकाल के दौरान तकनीकों को बदलते और आविष्कारों को होते देखा. उस वक्त महसूस किया कि यह जरूरी है कि वे इस तकनीक का और अपने अंदर के टैलेंट्स का इस्तेमाल सही तरीके से करे. सो, वे फिल्म मेकिंग में आये और शुरुआत भी एक बेहद संवेदनशील और इतिहास की महत्वपूर्ण घटना के साथ की.

चिट्ट्रगांग की कहानी में ऐसी कौन सी खास बातें थी. जिसने आपको इस छोटे से गांव पर फिल्म बनाने की प्रेरणा दी?
मैं कोलकाता से हूं और शुरुआती दौर से ही मुझे ऐतिहासिक विषयों में रुचि रही है. मैं चिट्टगांव का इतिहास जानता था और मैं हमेशा यहां की कहानियां सुनता रहता था. सूर्य सेन जैसे आम आदमी ने किस तरह 50 बच्चों की मदद से एक आंदोलन फैलाया. और वे कामयाब भी रहे. मुझे इसी बात से प्रेरणा मिली. आप खुद गौर करें तो इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में भी चिट्टगांव पर ऐसा कुछ खास अध्याय या जानकारी या बहुत अधिक व्याख्या नहीं है. जबकि  यहां के लोगों का भी योगदान स्वाधीनता संग्राम में अहम रहा है. अब तक जब भी किसी स्वतंत्रता संग्राम की कहानी दिखाई गयी है. उनमें प्राय: सभी नायक की मौत हो जाती है. फिर चाहे वह मंगल पांडे हो, झांसी की रानी हो या फिर भगत सिंह की कहानी हो. यही कारण है कि मैंने इस विषय को चुना .चूंकि  िचट्ट्रगांग जीत की कहानी है. एक ऐसी विक्टरी की कहानी है. जहां आम लोगों ने मिल कर अपनी मेहनत से किस तरह से एकता के साथ अंगरेजों को खदेर दिया. मेरे फिल्म का किरदार झुंकू जो कि केवल पढ़ाई में होनहार था. किस तरह स्वाधीनता के लिए वह बंदूक उठाता है और लड़ता है. इसका जिक्र कहीं भी नहीं मिला करता था. यहां तक कि केबीसी में जब इस पर सवाल किया गया था. कि 1930 में आमी लीड का रिडर कौन था चिट्टगांव में. उस वक्त भी किसी ने इसका जवाब नहीं दिया था. मैं उस वक्त दिल्ली में था और मेरे हिस्ट्री के प्रोफेसर ने भी इसका जवाब नहीं दिया था. उन्हें खास जानकारी नहीं थी. मुझे लगा कि यह बेहद जरूरी है कि ऐसी किसी कहानी को दर्शकों के सामने लाया जाये और यही से मैंने फिल्म की नींव रखीं.
लेकिन कोई भी पीरियड फिल्म बनाना न सिर्फ स्क्रिप्ट के लिहाज से बल्कि बजट के लिहाज से भी बहुत कठिन होता है.
 फिर कैसे लिया निर्णय. और प्राय: ऐसी फिल्मों को निर्माता नहीं मिलते और आपकी तो यह पहली शुरुआत थी. तो आपने किस तरह संभावनाएं पैदा की.
जी हां, आपने बिल्कुल सही कहा. शुरुआती दौर में जब मैं यह फिल्म बना रहा था. तब सारे पैसे मेरे खुद के लगे. मैं उस वक्त किसी निर्माता के पास नहीं गया. बजट वाकई बहुत ज्यादा था. लेकिन सबकुछ मैंने खुद से मैनेज किया. हां, लेकिन फिल्म बनने के बाद जब अनुराग कश्यप को मैंने दिखाया तो उन्होंने मेरी फिल्म को सपोर्ट किया, और बाद में बाकी निर्माता भी जुटे. वरना, मैं हर दिन पेन ड्राइव में अपनी फिल्म लेकर घूम ही रहा था. चूंकि कोई भी इस पीरियड फिल्म में हाथ लगाने को तैयार नहीं था.

ऐसे विषयों पर गंभीर शोध और समझ की जरूरत होती है. आपने किस किस माध्यम से शोध किये? साथ ही लोकेशन को तलाशने में कितनी मुश्किलें आयीं. 
 पीरियड फिल्म बनानी थी और वह भी फिल्म में 1930 का चिट्टगांव नजर आना चाहिए,लेकिन अब चिट्टगांव पूरी तरह बदल चुका है. ऐसे में अगर हम वर्तमान के चिट्टगांव को दर्शाने लगते तो कहानी में कोई वास्तविकता नहीं रहती. सो, हमारे सामने एक बड़ी जिम्मेदारी यह थी कि हमें कोई ऐसा स्थान चाहिए था. जो भूगोल के दृष्टिकोण और कलाकृति में चिट्टगांव की तरह ही दिखे. इस लिहाज से हमें लाटागुड़ी नामक जगह मिली. वही एक गांव दिखा. उस गांव का नाम भी चिट्टगांव था. और वह मेरी कहानी की मुताबिक बिल्कुल फिट बैठ रहे थे. सो, हमने तय किया कि हम यही शूट करेंगे. आपको विश्वास नहीं होगा. फिल्म की कहानी में जिस तरह का आर्किटेक्चर है. वह हूबहू वास्तविक चिट्टगांव से मेल खाता है. यहां तक कि हमने जिस तरह के पेड़ पौधे दिखाये हैं. वह भी उस दौर के हैं. हमने फिल्म की शूटिंग भी 1910 में बने स्कूल में किया है. और इससे उस दौर का माहौल अच्छे तरीके से तैयार हुआ है. हालांकि उस दौर में इतना फाइन कॉटन के कपड़े नहीं मिलते थे. लेकिन हमने अपने किरदारों को फाइन कॉटन कपड़ों में दिखाया है. उस दौर के जो जहाज हुआ करते थे. वैसे जहाज आज मिल पाना संभव नहीं है. सो, वहां भी थोड़ी कमी रह गयी है. साथ ही   हमने जो यूरोपियन क्लब फिल्म में दिखाया है. वह जितना बड़ा है. उतना विशाल क्लब नहीं है. लेकिन उसे दिखाना जरूरी इसलिए था, क्योंकि परदे पर फिर वह खास नजर नहीं आ पाता. पीरियड फिल्में बनाने में ये सारी परेशानी आती है कि आप हर छोटी से छोटी चीज को भी उस दौर के अनुसार तैयार करना पड़ता है. िक्रयेट करना पड़ता है. किरदारों के हेयर स्टाइल को लेकर भी हमने काफी बारीकी बरतने की कोशिश की है. उस दौर में किस तरह के हथियार इस्तेमाल होते थे. बाजार में किस तरह के सामान मिलते थे. इन सभी चीजों का ख्याल  रखा है.  लेकिन माहौल और आर्किटेक्चर के दृष्टिकोण से 1930 का चिट्टगांव ने हमने पूरी तरह दिखाया है. न सिर्फ आर्ट के रूप से बल्कि उस दौर में जो जो घटनाएं हुई हैं. किस तरह हुई हैं. सब दिखाने की कोशिश की गयी है. जहां तक बात है शोध कि तो...चिट्टगांव के आंदोलन के बारे में इतिहास के किताबों में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं दी गयी है. वहां आंदोलन का तो जिक्र है. लेकिन किरदारों के बारे में जिक्र नहीं है कि किरदार किस तरह के थे. किस तरह वे बोलते थे. व्यवहार कैसा था. चूंकि मेरी फिल्म डॉक्यूमेंट्री नहीं थी. सो, यह मेरे लिए बेहद जरूरी था कि मैं किरदारों को दिलचस्प बनाऊं. सो, उस लिहाज से मुझे मुख्य काम अपनी स्क्रिप्टिंग में सारे किरदारों की कहानी व उनके कैरेक्टर स्केच को गढ़ने में हुई. साथ ही हमने फिल्म में सारे बच्चों को नाटागुड़ी से ही चुना है. ताकि हम 1930 का फील दे पायें. मैंने अपनी इस स्क्रिप्ट के लगभग 36 ड्राफ्ट्स बनाये. ताकि मैं अपनी पूरी कहानी के साथ न्यायसंगत कर पाऊं.
चिट्टगांव जैसी फिल्में आज के दौर में कितनी प्रासंगिक हैं?
मुझे लगता है कि ऐसी फिल्में हिंदी में कम बनती हैं. लेकिन इसके दर्शक हैं. हमें अपने इतिहास को जानने में बेहद दिलचस्पी शुरू से रही है. लेकिन िफल्में कम बनती हैं. चूंकि पीरियड फिल्में बनाने में न सिर्फ स्क्रिप्ट बल्कि बजट भी बहुत ज्यादा होना चाहिए. सो, निर्माता ऐसी फिल्मों पर खर्च नहीं करते. दूसरी बात है कि हिंदी सिनेमा में केवळ गिने चुने स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की कहानी बार बार दोहरायी जाती है. ऐसा नहीं होना चाहिए. फिल्में ही मेरे ख्याल से सबसे अच्छा हिस्ट्री लेशन बन सकती है. फिल्मों के माध्यम से ही ऐसे अनकहे नायकों की कहानी भी परदे पर आनी चाहिए.

आशुतोष ग्वारिकर की फिल्म खेले हम जी जान से की कहानी भी चिट्टगांव की कहानी से बहुत मेल खाती थी. विषय भी एक था. लेकिन इसके बावजूद आपकी फिल्म को खेले हम जी जान से अधिक पसंद किया गया. क्या कारण हो सकते हैं इसके? क्या क्या खूबियां रहीं चिट्टगांव की?
सबसे खास यह कि हमने जो किरदार में कलाकारों का चयन किया. वह फिल्म की कहानी के साथ न्याय करता है. हम चाहते तो हम भी विज्ञापन से कुछ लड़कों को ले लेते. लेकिन फिर किरदार के साथ न्याय नहीं हो पाता. नवाजुद्दीन सिद्दिकी, मनोज बाजपेयी मेरी फिल्मों की रीढ़ हैं. नवाज से जब मैं एनएसडी में मिला था तो उनसे मिलते ही कहा था कि वे मेरी फिल्म का हिस्सा होंगे. मनोज को जब मैंने एक फिल्म के सेट पर जाकर कहानी सुनायी तो उन्होंने तुरंत हां, कह दी थी. इससे स्पष्ट था कि कहानी में कुछ तो बात है. दूसरी बात हमने फिल्म में उस दौर की कहानी को पूरी तन्मयता और वास्तविकता से परोसने की कोशिश की है. शायद यही वजह रही कि कई वाक्या जो वाकई हुए हैं उन्हें सतही तौर पर न दिखा कर उसे हमने गंभीरता से दिखाया है. सपाट न दिखा कर उसे खास बनाने की कोशिश की. शायद यही वजह रही कि दर्शकों को फिल्म ने अपील किया है. हालांकि आशुतोष जब इस विषय पर फिल्म बना रहे थे. मैंने उनसे आग्रह किया था कि वह इस पर फिल्म न बनाये, क्योंकि उनके पास तो कई विकल्प हैं. लेकिन मैं इस कहानी को लेकर बहुत ज्यादा पैशिनेट था. लेकिन जवाब में मुझे आशुतोष ने कहा कि इसमें कोई परेशानी नहीं कि एक विषय पर दो फिल्में बने. और बाद में फिर उन्होंने फिल्म बनायी. मेरी ख्वाहिश थी कि मेरी फिल्म खेले हम जी जान से पहले रिलीज हो. सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरा इस विषय पर टेक भी बिल्कुल अलग था. मैं अपने महत्वपूर्ण किरदार झूनकू रॉय और उसके स्वतंत्रता के लिए उठाये गये कदम. एक आम लड़के से स्वतंत्रता सेनानी में तब्दील होना और फिर किस तरह देश के लिए आंदोलन का हिस्सा बनना , झूनकू रॉय के किरदार को भी मैं उसी अहमियत से दर्शाना चाहता था. जबकि खेले हम जी जान की कहानी मास्टर दा के देहांत पर ही खत्म हो जाती है. लेकिन मुझे अपनी कहानी में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की जीत को दिखाना था.

एक्टिंग की लर्निंग पीरियड की स्टूडेंट हूं : आलिया भट्ट


 
पापा की अपनी प्रोडक् शन कंपनी है. स्थापित भी सफल भी. फिर भी इन्होंने पापा की उंगली पकड़ कर नहीं बल्कि अपने हुनर के बलबूते आगे बढ़ने की कोशिश की. जानकारी मिली कि करन जौहर स्कूल गोइंग टीनएज पर फिल्म बनाने जा रहे हैं. और पहुंच गयीं आॅडिशन के लिए. आॅडिशन में करन ने हरी झंडी दिखायी. लेकिन एक शर्त रखी. शर्त थी कि वजन कम करना होगा. कुछ महीनों बाद जब वह करन के सामने अपने नये अवतार में हाजिर हुईं. करन आश्चर्यचकित थे. लेकिन अब उन्हें देख कर दर्शक भी चकित हैं. बात हो रही है महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट की, जो अपने अभिनय करियर की पहली शुरुआत फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर से कर रही हैं. प्रोमोज और फिल्मों के गाने में आलिया का आत्मविश्वास साफ झलक रहा है. कैसे भट्ट कैंप की बेटी बिना भट्ट कैंप के सहारे अपनी नयी शुरुआत कर रही हैं. आलिया भट्ट से जानने की कोशिश की

आलिया फिलवक्त  महज19 साल की हैं. लेकिन फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर में वे न अभिनय में केवल आत्मविश्वासी नजर आ रही हैं. बल्कि वे डांस भी बेहतरीन कर रही हैं. करन जौहर के आॅफिस में परदे के पीछे वाली आलिया से मुलाकात हुईं. बेहद ही सौम्य सी मासूम सी दिखनेवाली आलिया अपनी फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हैं. उन्हें विश्वास है कि दर्शकों को उनकी यह फिल्म पसंद आयेगी. बातचीत आलिया से.

भट्ट कैंप की बेटी करन जौहर की फिल्म से शुरुआत कर रही हैं?
मुझे पता था कि मेरे सामने सबसे पहले यही सवाल आनेवाले हैं. जी हां, मैं हमेशा से चाहती थी कि मैं हीरोइन बनूं और आप कह सकते हैं कि इसकी सबसे खास वजह मेरा फिल्मी परिवार ही है. मैं फिल्में बनते देख कर ही बड़ी हुई हूं. लेकिन एक बात मैंने भी तय कर रखी थी कि पापा की फिल्मों से लांचिंग नहीं करूंगी, चूंकि मुझे लगता है कि जितना मुझे करन सर के साथ सीखने का मौका मिला है. उतना मैं पापा के साथ जुड़ कर नहीं सीख पाती. दूसरी बात है शायद मुझे मेरे होम प्रोडक् शन में इतना पैंपरड किया जाता कि मैं कुछ खास कर ही नहीं पाती. सो, मैंने भट्ट कैंप से बाहर से शुरुआत की.

कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि महेश भट्ट जिस स्टाइल की फिल्में बनाते हैं. आप उसमें सहज नहीं.
अभी फिलवक्त मैं बहुतछोटी हूं और ये सब तय कर पाना मेरे लिए बेहद मुश्किल है कि क्या स्टाइल की फिल्में होती हैं. हां, लेकिन मैंने यह तो सोच रखी थी कि मैं अपनी उम्रवाला ही कोई किरदार करूंगी.
करन ने पहला मौका दिया.

कैसे मिला ये मौका. भट्ट साहब की बेटी होने के नाते निश्चित तौर पर आपको 
परेशानियां कम झेलनी पड़ी होगी?
आपको ऐसा लगता है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. मैंने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की है. बाकियों की तरह ही मुझे भी आॅडिशन देने पड़े. करन सर फिल्म बनानेवाले हैं. यह जानकारी मिली मुझे तो मैं स्कूल से ही सीधे वहां आॅडिशन के लिए पहुंच गयी थी. इसके बाद करन सर ने मुझसे कहा कि मैं अपना वजन घटाऊं. फिर उन्होंने ही मुझे डायटीशियन दिया. मैं मानती हूं कि करन सर मेरे मेंटर हैं. दूसरी बात यह है कि मैं बचपन से इस इंडस्ट्री को देखती आ रही हूं. मैं जानती हूं कि यहां आपको भट्ट सरनेम की वजह से मौके मिल सकते हैं. लेकिन टैलेंट तो खुद ही साबित करना होता है. आज इंडस्ट्री में सरनेम मैटर ही नहीं करता. मेरे को स्टार सिद्धार्थ तो फिल्मी खानदान से है ही नहीं. लेकिन उनमें टैलेंट है तो उन्हें भी मौका मिला न. तो मैं नहीं मानती कि भट्ट सरनेम ही मेरे लिए जैकपॉट है.

तो आलिया फिर ये भी बताएं कि एक इंडस्ट्री के स्थापित निर्देशक निर्माता की बेटी होने के नुकसान क्या क्या है?
मुझे तो लगता है कि नुकसान ही ज्यादा है. चूंकि आप हमेशा मेरी काबिलियत पर शक करोगे. लोगों को यही लगेगा कि अरे उसने काम नहीं किया. भट्ट साहब की बेटी है तो काम मिल रहा है. जबकि सच यह है कि हमें भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है. क्योंकि हम पर तो जिम्मेदारियां भी हैं. अगर कोई गलत स्टेप लिया तो बस जगहंसाई शुरू.

आलिया अभी बॉलीवुड में नयी हैं तो किस तरह का बर्ताव है इंडस्ट्री के बाकी लोगों का आपसे.
मुझे बेहद खुशी है कि लोग मुझे नोटिस कर रहे हैं. एक दिन मैं कार में थी. ट्रैफिक में. सामने होर्डिंग में मेरे पोस्टर लगे थे. और कोई दूसरे कार में दो लड़कियां आपस में बातचीत कर रही थीं कि आलिया बेहद क्यूट है. और फ्रेश चेहरा लग रहा है. लगता है चलेगी. बतौर नयी अभिनेत्री मुझे पहली बार बेहद खुशी हुई कि अब लोग मेरी भी चर्चा कर रहे हैं. तो लोगों को मुझमें गुंजाईश नजर आ रही है. रही बात इंडस्ट्री के लोगों की तो सभी सीनियर का बेहद सपोर्ट मिल रहा है. सलमान खान, शाहरुख खान, काजोल सभी जिन्हें मैंअपना आइडिल मानती थी. सभी को मुझसे उम्मीदें हैं. हाल ही में अमित अंकल के बर्थ डे पार्टी में गयी थी. वहां भी जिन्होंने मुझसे मुलाकात की. सभी ने मुझे शुभकामनाएं दीं.माधुरी जी से मिल कर मुझे खासतौर से अच्छा लगा क्योंकि उन्हें मुझे कई चीजें समझायी. एक बड़ी बहन की तरह. उन्होंने मेरा डांस पसंद किया.
डांस की बात छिड़ी है तो हम जानना चाहेंगे कि फिल्म में आप बहुत कांफिडेंट लग रही हैं डांस को लेकर. आपने

डांस की कोई खास ट्रेनिंग ली   है?
जी हां, मुझे हमेशा से डांसिंग का शौक रहा है और मैंने क्लासिकल डांस की ट्रेनिंग ली है. मैं डांस को बेहद एंजॉय करती हूं.
पापा महेश भट्ट से किस तरह के टिप्स मिले हैं? 
उन्होंने बस मुझे इतनी ही राय दी है कि फिल्म एक बिजनेस है और तुम्हें हर तरीके से इस रेस का घोड़ा बनना होगा. वैसे मैं उत्साहित हूं कि फिल्म रिलीज के बाद उनके क्या कमेंट्स आते हैं.

आपके को स्टार वरुण धवन और सिद्धार्थ के बारे में बताएं
इन दिनों को मैं अपना सीनियर मानती हूं क्योंकि वरुण और सिद्धार्थ ने पहले करन सर के साथ माइ नेम इज खान में अस्टिट किया है तो वे फिल्म मेकिंग से बेहद वाकिफ थे. दोनों ने ही मेरा बहुत ख्याल भी रखा. दोनों बेहतरीन एक्टर हैं.
फिल्म में आपका किरदार क्या है. और कहानी किस तरह की है. आप खुद कितना किरदार से जुड़ाव महसूस कर पायी हैं. क्या आपके स्कूल डेज की कुछ यादें इस फिल्म के माध्यम से तरोताजा हुईं.
स्टूडेंट आॅफ द ईयर तीन दोस्तों की कहानी है. तीनों अच्छे दोस्त हैं. लेकिन उनकी जिंदगी में जब एक प्रतियोगिता होती है और सबकुछ बदल जाता है. ये फिल्म युवाओं को बेहद पसंद आयेगी. मैं इसमें सान्या सिंघानिया का किरदार निभा रही हूं. और जहां तक बात है यादों की तो बिल्कुल. अभी भी मैं स्कूल में ही हूं और स्कूल में हम जिस तरह की मस्ती करते हैं. फिल्म में वैसी मस्तियां हैं तो मैं बहुत हद तक रिलेट कर पायी हूं.
कॉलेज व स्कूल पर पहले भी फिल्में बनती रही हैं. आपकी पसंदीदा फिल्में?
मुझे आज भी कुछ कुछ होता है बेहद पसंद है. मैंने इसे कम से कम 60 बार देखी होगी. यही वजह थी कि जब मुझे करन सर के साथ काम करने का मौका मिला तो मैं बेहद खुश थी. मुझे लगता है कि अब तक की वह बेस्ट फिल्म है दोस्ती पर. इसके अलावा मुझे खिलाड़ी फिल्म भी बेहद पसंद है.

आपकी पहली फिल्म है तो रेफरेंस  के तौर पर करन ने क्या क्या टिप्स दिये थे. 
उन्होंने बस यही कहा था कि जिस तरह तुम वास्तविक जिंदगी में कूल रहती हो और मासूम हो. वैसे ही रहना. कोई एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं.

फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनने से पहले और अब हिस्सा बनने के बाद कितना अंतर महसूस कर रही हैं. 
पहले सिर्फ शूटिंग देखा करती थी और अब जब काम कर रही हूं तो लगता है कि वाकई कितनी मेहनत करनी पड़ती है. एक एक शॉट को ओके करने के लिए निर्देशक कलाकार सभी कितनी मेहनत करते हैं. यह सब बिल्कुल नया है. साथ ही कभी बहुत ग्लैमरस तरीके से नहीं रही मैं और अभी प्रोमोशनल इवेंट्स का हिस्सा बनना. मीडिया के सामने आकर उनसे बातचीत करना. उनके हर सवालों का जवाब देना टफ तो है. लेकिन अच्छा फेज है. लर्निंग पीरियड है मेरा. लंबा सफर तय करना है.
आपको कभी स्टूडेंट आॅफ द ईयर बनने का मौका मिला है? वास्तविक जिंदगी में
नहीं, हां, लेकिन मैं कल्चर एक्टिविटिज में हमेशा भाग जरूर लेती रहती हूं. वैसे मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी नहीं.

हमने सुना आप फिल्म टू स्टेट्स में भी मुख्य भूमिका में होंगी?
नो कमेंट्स.
आपकी नजर में स्टूडेंट आॅफ द ईयर बनने के लिए किसी स्टूडेंट में क्या क्या क्वालिटी होनी चाहिए.
मेरी समझ से सबसे पहले एक अच्छा स्टूडेंट वही होता है जो ईमानदार हो और अनुशासित हो और खुद प्रतियोगिता जीतने के लिए दूसरों को हराने की कोशिश न करे.

आप खुद को किस तरह का स्टूडेंट मानती हैं.
फिलवक्त मैं एक्टिंग की लर्निंग क्लास की अमैच्योर स्टूडेंट हूं.

एक्स्ट्रा शॉट
आलिया की पहली शुरुआत फिल्म संघर्ष से हुई थी. इस फिल्म में आलिया ने बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी. उन्होंने  प्रीति जिंटा का बचपन का किरदार निभाया था.
आलिया ने स्टूडेंट आॅफ द ईयर में मुख्य भूमिका निभाने के लिए उन्होंने लगभग तीन महीने में 16 किलो वजन घटाया. आलिया को रणबीर कपूर बेहद पसंद हैं और वे रणबीर के साथ काम करना चाहती हैं
आलिया ने भरतनाटयम के साथ साथ शामक डाबर से डांस सीखा है.
फिल्म के एक गीत राधा...में आलिया के बेहतरीन लुक को देख कर उन्हें इंटरनेशनल ग्लैमर मैग्जीन के कवर पर आने का मौका मिला है.
लगभग 500 लड़कियों के आॅडिशन में आलिया का चुनाव हुआ.
अभिनेत्रियों में उन्हें करीना, दीपिका और काजोल बेहतरीन एक्ट्रेस लगती हैं. माधुरी उनकी आदर्श हैं

केकवॉक नहीं है बॉलीवुड : वरुण धवन


 
वरुण ने फिल्म माइ नेम इज खान में करन जौहर को अस्टिट करने का फैसला सिर्फ इसलिए लिया था क्योंकि वह देखना चाहते थे कि शाहरुख किस तरह काम करते हैं. वह क्या बातें हैं जो उन्हें सुपरस्टार बनाती है. पिता डेविड धवन और भाई रोहित धवन के निर्देशन में बन रही फिल्मों के बावजूद उन्होंने करन के साथ ही अस्टिट किया. ताकि वे अभिनय से पहले निर्देशन की बारीकियां भी सीख लें. स्टूडेंट आॅफ द ईयर में वे चार्मिंग स्कूल ब्वॉय का किरदार निभा रहे हैं. अभिनय के पहले अनुभव के बारे में बातचीत की.

पापा डेविड धवन भी निर्देशन के क्षेत्र में हैं. भाई रोहित धवन भी निर्देशन में हैं. लेकिन वरुण ने अलग राह चुनी है. करन जौहर के प्रोडक् शन से वे अपनी पहली शुरुआत कर रहे हैं.
बड़ी कठिन है बॉलीवुड की डगर
मुझसे अक्सर यह बात कही जाती है कि मुझे मौका मिला है क्योंकि मेरे पिता बड़े निर्देशक हैं. स्थापित हैं. लोग उन्हें जानते हैं. लेकिन सच्चाई यह बोलूं तो यह सच है कि पापा की वजह से मैं जिससे भी मिलने जाता था. वे मुझे बुला कर कॉफी पिलाते थे. प्यार से बात करते थे. लेकिन आॅडिशन के बाद कोई सरनेम काम नहीं आता, सिर्फ टैलेंट ही काम आता है. और मैं तो यह महसूस करता हूं कि न्यू कमर के लिए इंडस्ट्री अधिक सख्त है. हमारी एक भी गलती इंडस्ट्री में सहन नहीं की जाती. हमें बेहद अलर्ट रहना पड़ता है. दूसरी बात है. मैंने इस इंडस्ट्री को देखा है. करीब से. मुझे पता है कि कोई भी निर्माता अगर आपमें कुछ भी नहीं तो रिस्क नहीं लेना चाहता. ऐसे में हमें भी खुद को साबित करना पड़ता है.

पापा डेविड के मास्टर क्लासेज
मैं अपने पापा का शुक्रगुजार हूं कि मुझे एक अच्छा इंस्टीटयूशन मिला घर पर ही. मैंने निर्देशन और फिल्मों को घर पर बनते देखा है. सो, मैं खुद चाहता था कि मैं बाहर जाकर काम देखूं. नयी चीजें सीखूं और पापा ने मेरा बहुत सपोर्ट किया. मुझे याद है. जितने दिनों तक शूटिंग चली है. उतने दिनों तक रात में रे लगातार हर दिन मुझे एक एसएमएस करते थे. जिसमें वे मुझे बताते थे कि इंडस्ट्री में उन्हें किस तरह काम करना है. मेरे लिए वे पापा के मास्टर क्लासेज थे. पापा का एक मेसेज मेरे लिए काफी टची था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर एक बार गलती कर दो तो बॉलीवुड उसे सुधारने का मौका नहीं देता. सो, सोच समझ कर हर कदम बढ़ाना. मेरे लिए यह एक पिता से अधिक इस इंडस्ट्री के सीनियर की तरफ से एक खास सीख थी.

शाहरुख सलमान हैं आदर्श
सलमान सर के साथ मैंने काम किया है. पापा की कई फिल्मों में सलमान सर ने काम किया है तो मैंने उनका वर्किंग स्टाइल देखा है. और यही वजह थी कि मैं एक बार शाहरुख सर का भी वर्किंग कल्चर देखना चाहता था. मैं देखना चाहता था कि वह कौन सा करिश्मा है उनमें जिससे वे लोगों को प्रभावित करते हैं. अब जब हमारी फिल्म पूरी हो गयी है और हम उनसे मिलते हैं तो वे बिल्कुल भाई की तरह बातें करते हैं. माइ नेम इज खान के सेट पर मुझे याद है. जिस दिन फिल्म का पैकअप था. आखिरी दिन था. वह बकायदा क्रू के हर मेंबर, हर स्पॉट ब्वॉय को गले लगा कर कहते थे कि इंशा अल्लाह आप सभी अच्छे से काम करें. खूब तरक्की करें. शाहरुख अपने स्पॉट ब्वॉय के साथ भी दोस्ताना व्यवहार रखते हैं. यह देख कर मैं समझ पाया कि वे कैसे आम दर्शकों से कनेक्ट कर पाते हैं और उनसे मंै यही कला सीखने की कोशिश कर रहा हूं. शाहरुख सर के अलावा काजोल के साथ काम करके भी बहुत मजा आया. अब जब काजोल से हमारी मुलाकात होती है तो कहती हैं कि तुम सेट पर अस्टिेंट थे. और अब हीरो बन गये. लंबी रेस के घोड़े हो तुम सब. तो सीनियर से इस तरह के कमेंटस मिलते हैं तो खुशी मिलती है. साथ ही मुझे उस वक्त भी बेहद खुशी हुई जब सलमान भाई ने मेरी फिल्म का ट्रेलर देख कर कहा कि गुड वर्क अच्छे से काम करो और बिल्कुल न बुरा करो और न सोचो. मुझे इससे एनर्जी मिल रही है कि इंडस्ट्री के अच्छे लोग हमें सपोर्ट कर रहे हैं.

सेल्फ क्रिटिक
चूंकि मैं निर्देशकों के परिवार से हूं तो मैं अपने अभिनय को भी टेक्नीकल प्वाइंट आॅफ व्यू से देखता रहता हूं. मेरे लिए अभिनय से अधिक फिल्ममेकर किस तरह शॉट को कनसिव कर रहा है और उसका थॉट प्रोसेस क्या है. यह जानने की भी कोशिश रहती है.

पापा ने कभी किसी को लांच नहीं किया
पापा ने कभी किसी भी सितारों को लांच नहीं किया. ये उनका वर्किंग स्टाइल है. वे लांच करने में खुद को कंफर्टेबल नहीं समझते.हां, लेकिन जब मैंने पापा से कहा कि मैं एक्टर बनना चाहता हूं तो उन्होंने बस यही कहा कि जब खुद पर भरोसा हो तभी इस फील्ड में आना क्योंकि एक्टिंग डायरेक् शन से भी टफ काम है. क्योंकि आप ही चेहरा होते हैं फिल्म के. सो, सारी जिम्मेदारी आपकी. हिट हुई तो प्रशंसा भी आपकी. फ्लॉप हुई तो आलोचना भी आपकी.

धार्मिक बंधनों से मुक्त सफारी



निखिल आडवाणी ने हाल ही में फिल्म दिल्ली सफारी का निर्माण किया है. यह फिल्म उन्होंने विशेष कर अपनी बेटी के लिए बनाया है. लेकिन काफी लंबे समय के बाद हिंदी फिल्मों में किसी एनिमेशन फिल्म में क संभावना नजर आयी है. चूंकि इस फिल्म ने तो पौराणिक कथाओं का और न ही किसी धार्मिक विषयों का इस्तेमाल किया है. पिछले कई सालों से हिंदी फिल्मों में दर्शक राम-सीता, कृष्ण, हनुमान, गणेश की एनिमेटेड कहानियां देख कर बोर हो चुके हैं. इस लिहाज से निखिल ने क नयी पहल की है. दरअसल, हिंदी फिल्मों की यह विडंबना रही है कि यहां एक दूसरे की नकल या एक ही ढर्रे पर चलने की बुरी लत है. हिंदी फिल्म के निर्देशकों को लगता है कि अगर एक फिल्म हिट हो गयी तो वे दूसरी फिल्म भी उसी तर्ज पर बनाते हैं. लेकिन दिल्ली सफारी एनिमेशन के उस सफर में एक सुखद अनुभव कराती है. दरअसल, पिछले कई सालों से हिंदी फिल्मों के एनिमेशन फिल्मों के विषयों में पौराणिक कथाओं का चलन भी इसलिए बढ़ता रहा है कि निर्माता इसी बहाने न सिर्फ बच्चों को बल्कि बच्चे के पूरे परिवार को भी फिल्म से जोड़ना चाहते हैं. ताकि इसका सीधा फायदा उनके व्यवसाय पर हो. यही वजह है कि वे भावनाओं को धार्मिक किरदारों से जोड़ कर दिखाते रहे हैं.दिल्ली सफारी में जानवरों के किरदारों में आम जिंदगी की कहानी कहने की कोशिश की गयी है. बच्चों को एक बार फिर से जंगलबुक के मोगली की याद आ जायेगी लेकिन हिंदी फिल्मों में दिल्ली सफारी जैसी एनिमेशन फिल्म नयी सोच को दर्शाती है. अक्षय कुमार द्वारा निर्मित फिल्म ओह माइ गॉड भी इस लिहाज से एक बेहतरीन पहल है कि कम से कम अब भगवान के नाम पर हो रहे ढोंग से कुछ हद तक लोगों की आंखें खुल रही हैं. फिल्में माध्यम बन रही हैं. लोगों को बेफिजूल के अंधविश्वास से दूर रखने के लिए. हालांकि अब भी हिंदी सिनेमा जगत में अंधविश्वास का पलरा भारी है. लेकिन फिर भी इस पहल से सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं. दरअसल, हिंदी सिनेमा को अभी वाकई इससे उबरने की जरूरत है और नये विषयों पर सोचने की जरूरत है. एनिमेशन के क्षेत्र में भी हम अभी भी बहुत बेहतरीन काम नहीं कर पाये हैं. इस लिहाज से जरूरत है कि निर्देशक नयी सोच के साथ एनिमेशन फिल्मों पर भी सोचें. वे नये विषयों के साथ फिल्मों का निर्माण करे. तभी हिंदी सिनेमा भी तकनीकी रूप से विश्व सिनेमा में कहीं कोई स्थान बना पायेगी. और एनिमेशन फिल्में बच्चों के वर्ग से निकल कर बुजुर्गों को भी प्रभावित कर पायेगी

विचारों के आदान-प्रदान का मंच



श्रीदेवी की कमबैक फिल्म इंगलिश-विंगलिश को सफलता मिली. और इस बात से श्रीदेवी बेहद खुश हैं. यही वजह रही कि श्रीदेवी ने मीडिया से फिल्म की रिलीज और इसकी सफलता के बाद भी बातचीत की. उन्होंने फिल्म पर चर्चा करने के लिए मीडिया के लोगों को बुलाया. कुछ इसी तरह फिल्म ओह माइ गॉड की रिलीज से पहले ही अक्षय कुमार ने कहा था कि वे चाहते हैं कि यह फिल्म देखने के बाद हम दोबारा बातचीत करें. अक्षय ने भी वह वादा निभाया. उन्होंने फिल्म की रिलीज के कुछ दिनों बाद मीडिया की बैठक बुलायी और फिल्म पर चर्चा की. अनुराग कश्यप ने इम्तियाज अली की फिल्म रॉकस्टार की रिलीज के बाद कुछ युवाओं जिन्हें फिल्मों में दिलचस्पी है उन्हें और कुछ पत्रकारों के साथ इम्तियाज और युवाओं के बीच चर्चा का सेशन रखा. इसमें युवा दर्शकों ने जिन्होंने फिल्म देखी थी और उन्हें कोई कंफ्यूजन था. वे सारी बातें इम्तियाज अली से उन्होंने स्पष्ट की. पान सिंह तोमर की रिलीज के बाद भी अनुराग कश्यप ने फिल्म के निर्देशक  तिग्मांशु धूलिया व लेखक संजय चौहान के साथ पैनल डिस्कशन का आयोजन किया, जिसमें वे सारी चीजें जो फिल्म में स्पष्ट नहीं हो पायी थी. दर्शकों ने निर्देशकों से पूछ कर स्पष्ट की. दरअसल, हिंदी सिनेमा जगत में यह एक बेहतरीन पहल है. चूंकि प्राय: फिल्मी कलाकार केवल फिल्म के प्रमोशन के लिए फिल्म की रिलीज से पहले बातचीत करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. ऐसे में इन दिनों लगातार कुछ ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं. जिनमें कलाकार अपनी रिलीज के बाद फिल्म पर चर्चा करना पसंद कर रहे हैं. किसी दौर में यह एक परंपरा थी. चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी बताते हैं कि कैसे पहले फिल्मों की रिलीज से पहले और बाद में पत्रकार, निर्देशक, संगीतकार और कलाकार सभी लोगों की बैठक होती थी और कैसे सभी मिल कर चर्चा करते थे. इससे फिल्मों की कमियां और खूबियां दोनों का पता चलता था. लेकिन नये दौर में फिल्मी कलाकार अपनी खामियां सुनना पसंद नहीं करते. वे तो अखबारों के नकारात्मक रिव्यू से भी परहेज करते हैं. ऐसे में वे कभी ऐसी चर्चाओं का हिस्सा नहीं बनना चाहते. फिल्म की रिलीज के बाद वे बाइट देने से भी कतराते हैं. इसके बावजूद कुछ कलाकारों व निर्देशकों की पहल से यह परंपरा शुरू हुई है तो इसे और आगे बढ़ाना चाहिए. चूंकि फिल्मों में कई ऐसी चीजें भी होती हैं जो दर्शक समझ नहीं पाते. ऐसे में निर्देशक से बात करने पर वे शंकाएं दूर होती हैं. ऐसी चर्चाओं से नये आइडिया भी मिलते हैं. सो, इस परंपरा को बढ़ते रहना ाटचहिए

कपूर बहुओं का संगम



सैफ अली खान और करीना कपूर की शादी मंगलवार को संपन्न हुई.निश्चित तौर पर दोनों के लिए यह खास अवसर है. लेकिन यह शादी इस लिहाज से भी बेहद खास है. क्योंकि इसी शादी की वजह से वर्षों से चल रही कपूर बहुओं की अनबन भी खत्म हो गयी. बबीता ने नीतू कपूर को बेटी करीना की शादी में निमंत्रण दिया और नीतू ने भी खुशी खुशी इसे स्वीकारा और परिवार की तरह शादी में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. इससे साफतौर पर स्पष्ट होता है कि खुद नीतू या बबीता भी इन दूरियों से खुश नहीं थी. लेकिन चूंकि दोनों ही कामयाब अभिनेत्रियां हैं. सो, उन्होंने अहं के कारण कभी पहल नहीं की. जबकि इंटरनेट पर  ऋषि कपूर व नीतू कपूर की शादी की तसवीरें भी दर्शाती हैं कि बबीता और नीतू में कितना स्रेह था. ऋषि की शादी में बबीता वाकई घर की बड़ी बहू नजर आ रही हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हम अपने प्रोफेशनल रिश्तों व ओहदे को प्राय: अपने व्यक्तिगत जीवन पर भी हावी कर लेते हैं. और यही कारण होता है कि रिश्तों में दरार आ जाती है. बबीता और नीतू कपूर पिछले कई सालों से एक दूसरे से बातचीत नहीं करती थीं. दोनों में तनाव इस कदर था, कि नीतू कपूर को करिश्मा की शादी के लिए निमंत्रण नहीं दिया गया और रिद्धिमा की शादी में बबीता नहीं आयी थीं. यही नहीं नीतू कपूर की मां के देहांत पर भी बबीता नीतू को सहानुभूति देने नहीं गयी थीं. इससे नीतू के दिल को गहरी चोट पहुंची थी, जो कि स्वभाविक भी है.हालांकि कपूर भाईयों ने कभी बहुओं की लड़ाई की वजह से आपसी प्रेम को खत्म नहीं होने दिया. ऋषि कपूर और रंधीर कपूर के संबंध हमेशा गहरे रहे. शायद ही पृथ्वीराज कपूर ने कभी यह कल्पना भी की होगी कि जिस कपूर खानदान की वे नींव रख रहे हैं और भविष्य में जो कपूर खानदान हिंदी सिनेमा के लिए मिसाल होगी. उसकी घर की खुद की नींव कुछ सालों बाद कमजोर हो जायेगी. लेकिन यह पृथ्वीराज की ही परवरिश थी कि तीनों भाईयों में प्यार बरकरार रहा. हालांकि छोटी मोटी अनबन होती रही. लेकिन इनकी अगली पीढ़ी ने भी अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भाई बहन में प्रेम रखा. हाल ही में रणबीर कपूर, करिश्मा और करीना कपूर ने मिल कर ऋषि कपूर जन्मदिन भव्य तरीके से मनाया.किसी दौर में बबीता व नीतू कपूर खानदान के हर त्योहार में साथ होती थीं और जश्न होता है. राज कपूर पर आधारित डॉक्यूमेंट्री में भी इसकी झलक देखी जा सकती है. उम्मीदन दोनों फिर से रिश्तें कायम रखने में कामयाब हों.

विशाल के मनडोला पंकज



सोच कर भी आश्चर्य होता है न कि किसी व्यक्ति का नाम मटरू या मनडोला हो सकता है. लेकिन विशाल भारद्वाज की नयी फिल्म मटरू की बिजली का मनडोला में किरदारों के नाम कुछ ऐसे ही है. फिल्म के प्रोमो बेहद पसंद किये जा रहे हैं. हालांकि फिल्म में मुख्य कलाकार तो इमरान खान और अनुष्का है. लेकिन मनडोला पंकज कपूर ध्यान आकर्षित करते हैं. एक बार फिर से पंकज अपने पूरे अलग अंदाज में नजर आ रहे हैं. पंकज कपूर ने हमेशा ही विशाल की फिल्मों में उल्लेखनीय अभिनय किया है. फिर चाहे वह फिल्म मकबूल हो, ब्लू अंबै्रला हो या फिर मटरू की बिजली का मनडोला. दरअसल, विशाल जिस तरह की फिल्में बनाते  रहे हैं. ऐसे निर्देशकों को कुछ खास कलाकारों का साथ मिलना बेहद जरूरी है.चूंकि विशाल हमेशा लीक से हट कर फिल्में बनाने में माहिर हंै. उनके फिल्मों के विषयों में सुपरस्टार्स मेल नहीं खाते. ऐसे में जब उन्हें पंकज कपूर जैसे मंझे अभिनेता का साथ मिलता है तो वाकई एक अलग ही कहानी उभर कर सामने आती है. फिल्म ब्लू अंब्रैला में पंकज कपूर ने जिस अंदाज में अभिनय किया. फिल्म को देख कर आप यही सोच सकते हैं कि यह किरदार उनके लिए ही गढ़ा गया था. विशाल और पंकज की जोड़ी हमेशा कामयाब रही है. यह विशाल के निर्देशन का जादू है जो पंकज की प्रतिभा को जिस बारीकी और सधे अंदाज में वे प्रस्तुत कर पाते हैं. उतना प्रभावित किरदार शायद ही कोई निर्देशक उनमें से निकाल पाये. पंकज मनडोला में जिस अंदाज में नजर आ रहे हैं. इससे पहले दर्शकों ने शायद ही उन्हें इस रूप में देखा होगा.साफतौर पर स्पष्ट है कि पंकज भी विशाल जैसे निर्देशकों के साथ बेहतरीन काम करते हैं. शायद यही वजह है कि विशाल अपने इस हीरे को बार बार अपनी कॉर्मिशियल फिल्मों में इस्तेमाल नहीं करते. एक सरप्राइज की तरह ही वे अपनी खास फिल्मों में पंकज को लेकर आते हैं और दर्शकों को चौंकाते हैं. हिंदी फिल्म जगत में ऐसे निर्देशक व अभिनेता की जोड़ी विरले ही बन पाती है. ऐसे में ये जोड़ी मिसाल है. विशाल खुद मानते हैं कि शुरुआती दौर में क्रियेटिविटी के दृष्टिकोण से उन्होंने पंकज से बहुत सीख ली थी. वे पंकज को ही अपना गुरु मानते हैं. शायद यही वजह है कि ये दोनों जब भी एक साथ आते हैं. वाकई दर्शकों का मन डोल जाता है.निश्चित तौर पर दोनों स्क्रिप्ट पर खुल कर बातचीत करते होंगे और यह भी संभव है कि पंकज को विशाल के साथ अभिनेता होने के बावजूद अपने इनपुट्स देने का मौका मिलता होगा.

20121015

मीनाक्षी की तरह ही हूं मैं : रानी


 
रानी मुखर्जी फिल्म अय्या से लंबे समय के बाद अलग अंदाज में नजर आ रही हैं.

रानी मुखर्जी का मानना है कि अय्या की मीनाक्षी उनकी तरह ही है. चूंकि रानी मुखर्जी भी वास्तविक जिंदगी में बहुत चुलबुली हैं.

फिल्म का किरदार
फिल्म बंटी बबली के बाद फिल्म अय्या में रानी मुखर्जी एक बार फिर शरारती छवि में दिख रही हैं. रानी का मानना है कि वह हास्य फिल्मों में स्वभाविक दिखती हैं. उनके आॅन स्क्रीन चरित्र सीमाक्षी देशपांडे और  उनमें बेहद समानता है. जो अपने माता पिता की पसंद के लड़के और अपने प्यार के लड़के और अपने प्यार के बीच फंस जाती है. मीनाक्षी जिससे प्यार करती है. वह एक दक्षिण भारतीय लड़का है. जबकि उसके माता पिता की पसंद का लड़का एक मराठी लड़का है. मैं दिल से रोमांटिक हूं और हास्य फिल्में पसंद करती हूं. इस फिल्म में मैं अपने नाटकीय व्यवहार को दिखा पायीं क्योंकि मीनाक्षी सपनों में जीनेवाली लड़की है. मुझे लगता है कि दर्शक मुझे शरारती भूमिकाओं में पसंद करते हैं.
फिल्म में डांस की खास तैयारी
बकौल रानी मुझे इस फिल्म में अपने अंदर छुपी डांसर को दिखाने का मौका मिला. मैंने इस फिल्म में वैभवी की मदद से कई नये नये तरीके के डांस किया है. खासतौर से मैंने बेली डांस के लिए बहुत मेहनत की है. मैं कहना चाहंूगी कि वैभवी ने मुझे बेहतरीन तरीके से डांस के स्टेप्स सिखाये हैं. और यही वजह है कि डीमम वेकपमम भी बेहतरीन डांस हैं.
खुशबू से प्यार
इस फिल्म का कांसेप्ट इस लिहाज से थोड़ा अलग है कि क्योंकि इस फिल्म में एक लड़की को किसी लड़के का दीवाना बनते दिखाया गया है और लड़की को लड़के के खुशबू से प्यार हो जाता है. और वह उसकी खुशबू से मग्न हो जाता है. इस फिल्म का कांसेप्ट जब सचिन मेरे पास लेकर आये थे तो मैं भी आश्चर्य में पड़ गयी थी कि यह कैसा कांसेप्ट है. लेकिन फिर भी मुझे लगा कि वाकई किस तरह कोई ऐसी कहानी भी बनाई जा सकती है.
मेरिल स्ट्रीप है मेरी आदर्श
मुझे लगता है कि बॉलीवुड में इन दिनों नये नये कांसेप्ट सामने आ रहे हैं और बॉलीवुड में सबकुछ नया हो रहा है. मैं अपना आदर्श मेरिल स्ट्रीप को मानती हैं और मंै चाहती हूं कि भविष्य में कभी उनकी तरह काम कर पाऊंगी और मुझे लगता है कि अब बॉलीवुड में ऐसे विषयों पर फिल्म बननी शुरू हो जायेगी.
महिला प्रधान फिल्में
मुझे लगता है कि अगर भारत की महिलाएं टिकट लेकर फिल्में देखने हॉल में जायें तो निश्चित तौर पर हिंदी फिल्मों में महिला प्रधान फिल्में बनेंगी. वैसे मैं बेहद खुश हूं कि अभी लगातार महिला प्रधान फिल्में आ रही हैं. यह दर्शा रहा है कि हिंदी सिनेमा में अब महिलाओं को लेकर कई विषयें सोचे जा रहे हैं.
शादी की प्लानिंग
यह प्रश्न मुझसे हमेशा पूछे जाते हैं तो मैं यह बता दूं कि हां मैं शादी करूंगी और अपने माता पिता की मर्जी से करूंगी. हां लेकिन कब करूंगी. यह बता नहीं सकती. वैसे मैं बस इतना चाहती हूं कि मेरे सपनों का राजकुमार जो भी हो वह अच्छा इंसान हो बस.
ख्वाहिशे
ख्वाहिश थी कि मां पापा के लिए एक घर बनाऊं. वो बना चुकी हूं अब चाहती हूं कि अपने पति के लिए घर संभालूं.देखती हूं यह कब तक पूरा होता है.
आदित्य से अफेयर
लोगों का काम है कहना. वे कहते रहें. मैं इस बारे में बस यही कहूंगी कि यह मेरा पर्सनल मैटर है. आदित्य ने निश्चित तौर पर मेरे करियर में एक गाइड की भूमिका निभायी है. सिर्फ आदि ही नहीं यश अंकल, शाहरुख़, आमिर से मैं हमेशा गाइडेंस लेती रही हूं. लेकिन हर दोस्त अपनी दोस्त की मदद करता है तो  इसे अफेयर का नाम देना उचित नहीं है.
खान से इक्वेशन
मैं लकी हूं कि बॉलीवुड में मेरे लगभग हर किसी से अच्छे संबंध हैं. शाहरुख खान मेरे अच्छे दोस्त हैं. सलमान ने भी मेरा सपोर्ट हमेशा किया है और आमिर की मैं हमेशा फैन रही हूं.उसके काम करने का अंदाज मुझे बेहद पसंद है और खुश हूं कि सभी आज अच्छा काम कर रहे हैं.
महिला दोस्तों पर
प्रीति की भी फिल्म आ रही है. उन्हें मेरी तरफ से आॅल द बेस्टÞ. मैं खुश हूं कि सभी काबिल अभिनेत्रियों को लगातार काम मिल रहे हैं और अब यह नहीं कहा जा सकता कि  अभिनेत्रियों के लिए काम करने के अवसर कम हो गये हैं.
करन जौहर क ीफिल्में
यह सच है कि करन जौहर ने ही मुझे बड़ा ब्रेक दिया. वह आज भी अच्छे दोस्त हैं. लेकिन दोस्ती का मतलब नहीं कि मैं जाकर उनसे काम मांगू.वे जो सम्मान मुझे देते हैं. उससे मैं खुश हूं. इंडस्ट्री में कम ही अच्छे और सच्चे दोस्त मिलते हैं. करन उनमें से एक हैं. सो, मैं लकी हूं. उनका साथ पाकर.
तलाश का इंतजार
आमिर खान के साथ काफी दिनों के बाद मैंने तलाश में काम किया है. फिल्म में एकदम चौंकानेवाला किरदार है. अब देखना यह है कि दर्शक मुझे इस फिल्म में कितना पसंद करते हैं

रॉनबो रणबीर :हिंदी सिनेमा का अगला सुपरस्टार




मां उन्हें प्यार से रॉनबो बुलाती हैं. दादा राजकपूर ने उन्हें यह नाम दिया था. दादा राजकपूर के लिए रॉनबो का मतलब आॅल राउंडर था तो मां नीतू रॉनबो मतलब रेमंड मानती हैं. यानी हीरा. दरअसल, रणबीर कपूर की शख्सियत पर यह दोनों ही उपाधि सटीक बैठती है. चूंकि कम वर्षों में ही जिस तरह उन्होंने अपने दादा की विरासत और कपूर खानदान की परंपरा को आगे बढ़ाया है. वह उल्लेखनीय है. लगातार बेहतरीन कहानियों के साथ रणबीर हिंदी सिनेमा के अगले और लंबे समय तक स्थापित रहनेवाले सुपरस्टार के रूप में उभर रहे हैं.वर्तमान में शायद ही किसी अभिनेता में अपनी लगभग हर फिल्म में एक दूसरे से जुदा किरदार निभाया होगा. लेकिन रणबीर लगातार रिस्क ले रहे हैं और कामयाब हो रहे हैं. सांवरिया से बर्फी तक के इस सफर में उन्होंने अगर किसी बात को अहमियत दी है तो वह है फिल्म की कहानी व निर्देशक. और शायद यही वजह है कि वे लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं. 

फिल्म बर्फी ने 100 करोड़ के क्लब में एंट्री कर ली है. बॉक्स आॅफिस पर. और इसी फिल्म से रणबीर कपूर ने भी 100 करोड़ क्लब में पहली एंट्री कर ली है. लेकिन उन्हें इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. चूंकि 100 करोड़ क्लब और पैसे उनका लक्ष्य है ही नहीं. रणबीर शुरुआती दौर से ही कहते आये हैं कि वे कपूर खानदान से हैं और वे लकी रहेंगे हमेशा कि उन्हें कभी पैसों के लिए काम करने की जरूरत नहीं. शायद यह आर्थिक सुरक्षा और कपूर खानदान में हुई उनकी परवरिश की वजह से ही रणबीर का पूरा फोकस फिल्मों के चुनाव पर हैं. पांच सालों में  अब तक उन्होंने 11 फिल्मों में काम किया है. और 11 अलग अलग तरह के किरदार निभाये हैं. फिल्म सांवरिया से लेकर बर्फी तक के किसी भी किरदार में कोई समानता नहीं है. अपनी पहली फिल्म सांवरिया में उन्होंने जब से तेरे नैना गाने के माध्यम से दर्शा दिया था कि वे किरदारों को जीने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं.

30 की उम्र 60 की समझ
रणबीर कपूर को हमेशा यह फक्र रहा कि वह कपूर खानदान से हैं लेकिन वे इस आधार पर केवल कोई भी फिल्म करने को तैयार नहीं. हाल में 28 सितंबर को उन्होंने अपना 30 वां जन्मदिन मनाया. लेकिन वे 30 के होते हुए भी बेहद परिपक्व हैं. रणबीर हमेशा ही अपने इंटरव्यू में इस बात को दोहराते नजर आते हैं कि वे हमेशा उन फिल्मों में काम करेंगे, जिन फिल्मों में निर्देशक अपनी फिल्म के माध्यम से कुछ अलग सी बात कहना चाहता हो. वह कहानी को ही 100 करोड़ क्लब मानते हैं और वे बेझिझक कहते हैं कि पूरे भारत में अगर कहीं भी कोई भी बेहतरीन कहानी लेकर मेरे पास आयेगा तो वह अगर नया निर्देशक भी होगा तो मैं उनके साथ फिल्में करूंगा. क्योंकि मैं अपने स्टारडम को हमेशा अपनी कहानी से पीछे रखूंगा. शायद यही वजह है कि उन्होंने अब तक जितने निर्देशकों के साथ काम किया है, वे सभी अलग अलग सोच की कहानियों के साथ फिल्में लेकर आये हैं. फिर चाहे वह सांवरिया हो, बचना  ऐ हसीनो हो या फिर वेक अप सीड. रॉकस्टार या फिर बर्फी. उनकी फिल्में असफल भी रही हैं. लेकिन रणबीर हर फिल्म में एक नये रणबीर के रूप में ही उभरे हैं.

आमलोगों से जुड़ाव
 किसी भी सुपरस्टार की पूरी संरचना केवल उनकी परदे की दुनिया के इर्द-गिर्द ही सिमटी नहीं रहती है. लोगों में लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम सिनेमा ही होता है. लेकिन उस व्यक्ति  का व्यक्तित्व भी उसकी लोकप्रियता में अहम भूमिका निभाता है. रणबीर इस लिहाज से भी बेहद सचेत रहते हैं. वे जानते हैं कि उन्हें किस तरह आमलोगों के बीच आना है. कैसे उन्हें अपना बनाना है. वे इस कला में माहिर हैं. रणबीर किसी नेटवर्किंग साइट्स पर नहीं हैं. चूंकि वे अपना पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपने अभिनय पर देना चाहते हैं. लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि रणबीर काफी गंभीर हैं और कपूर खानदान के  टैग की वजह से वे लोगों से मिलते जुलते न हों. जो रणबीर को करीब से जानते हैं. वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि रणबीर को पार्टियों में कितनी दिलचस्पी है. वे किसी भी पार्टी में सबसे पहले पहुंचते हैं और डांस फ्लोर पर सबसे अधिक देर तक कमर लचकाने और सिर पर शैंपेन की बोतल लेकर नाचनेवाले भी वही हैं. वे जब पब्लिक अपीयरेंस के लिए आते हैं तो लोगों के बीच होकर रह जाते हैं. शायद यही वजह है कि उनकी लोकप्रियता धीरे धीरे न सिर्फ युवा लड़कियों के बीच बल्कि बड़े बुजुर्ग भी उन्हें उतना ही प्यार और सम्मान देने लगे हैं. एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद यह स्वीकारा था कि किसी दौर में जब उनके पिता ऋषि कपूर बेहद लोकप्रिय सितारा थे और उनके घर के बाहर उनके प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी. और ऋषि कपूर कई बार भीड़ को निराश कर देते थे. आॅटोग्राफ नहीं देते थे. तो उस वक्त ही रणबीर ने तय कर लिया था कि वे ऐसा कभी नहीं करेंगे. क्योंकि उस वक्त उन्हें लोगों के चेहरे पर मायूसी नजर आयी थी. उन्होंने उस वक्त ही सोच लिया था कि वे कभी अपने किसी फैन को कभी नाराज नहीं करेंगे. और यही वजह है कि आज भी जब उनके फैन उनके साथ तसवीर लेने और आॅटोग्राफ की गुजारिश करते   हैं तो वह फौरन तैयार हो जाते हैं. यह दर्शाता है कि रणबीर बेहतरीन आॅब्जर्बर हैं और उन्होंने उस दौर में ही सीख लिया था कि उन्हें आम दर्शकों को कैसे अपना बनाना है. बिल्कुल अपने दादाजी की तरह, शायद इसकी वजह यह हो सकती है कि रणबीर ने जब अपने दादाजी का इतिहास पलट कर देखा होगा. उनके बारे में जाना होगा. उन्हें यह बातें समझ में आयी होंगी कि किस तरह राज कपूर आम लोगों के बीच होकर रह जाते थे. और उनकी राजू वाले मासूम किरदार आज भी किस तरह दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं. राज कपूर का जो सीधा कनेक् शन आम दर्शकों से रहा है. शायद उनके बाद कपूर खानदान की किसी भी पीढ़ी से रहा हो. लेकिन वह खाई रणबीर कपूर तोड़ रहे हैं. कुछ ही दिनों पहले एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार ने बताया कि रणबीर को यह जानकारी ही नहीं थी कि हिंदी फिल्मी ुपत्रकारों की आमदनी बहुत नहीं होती. उन्हें जब पता चला तो वह सोच में पड़ गये. वे बार बार अपना सेट देकर आते और पूछते कि इतने कम पैसों में कोई मुंबई में कैसे सर्वाइव करता होगा....हंसते हुए उन्होंने ये भी कहा कि बाप रे इतने कम पैसों के लिए ही जर्नलिस्ट हमें इतना डराते रहते हैं. उनकी इस बात से साफ है कि वे अमा लोगों से मिलना और उन्हें जानने का प्रयास करना चाहते हैं. शायद यही वजह है कि वे अपनी किसी भी फिल्मों में लार्जर दैन लाइफ वाले किरदार निभाना ही नहीं चाहते. फिल्म सांवरिया से लेकर अब तक का उनका फिल्मी ग्राफ देख लें तो उनके सारे किरदार मीडिल क्लास परिवार से ही संबंध रखता है.

सुपरस्टार की राह
उनके पिता ऋषि कपूर ने हाल ही में दिये एक इंटरव्यू में यह बात कही है कि मुझे डर है कि कहीं रणबीर इस दौर का अमोल पालेकर न बन जाये. चूंकि वे जिस तरह की फिल्मों का चुनाव कर रहा है. उससे मुझे डर लगता है. लेकिन हमारे खानदान की परंपरा रही है कि हम कभी भी अपने बच्चों के काम में दखल नहीं देते. न मेरे बावूजी ने दिया था. न ही मैं दूंगा. वह खुद धीरे धीरे सब सीख जायेगा. लेकिन रणबीर कपूर लगातार अपनी फिल्मों के चुनाव से यह साबित कर रहे हैं कि आनेवाले समय में वे ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े सुपरस्टार होंगे. चूंकि उनके व्यक्तित्व में हर वह बात है जो एक सुपरस्टार की होती है. उनके व्यक्तित्व की एक खासियत यह भी है कि वह किसी को भी फॉलो नहीं कर रहे. न ही गुजरे जमाने के किसी सुपरस्टार को और न ही वर्तमान में स्थापित सुपरस्टार को. वे अपनी एक अलग ही धारा बना रहे हैं और वह उनकी मौलिक धारा है. जिस पर वे खुद बैटिंग, फिल्ंिडग और बॉलोइंग तीनों ही कर रहे हैं. और उनका यही व्यक्तित्व उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे लंबे दौर तक टिके रहनेवाले सुपरस्टार की उपाधि दिलाये.

11 फिल्में 11 नये किरदार
इन पांच सालों में केवल 11-12 फिल्मों में नहीं बल्कि 11 नये किरदार निभाये हैं और दर्शक उन सभी किरदारों को याद रखना चाहते हैं.फिल्म सांवरिया में वे जब टॉवेल गिरा कर मुस्कुरा कर स्माइल करते हैं तो कई लड़कियां उन पर फिदा हो जाती हैं तो दूसरी ही फिल्म में तीन लड़कियों से फर्ल्ट कर रहे राज शर्मा की उस अदा को भी लड़कियां पसंद करती हैं. लेकिन अचानक उनकी वह छवि टूट जाती है जब वह वेकअप सिड में सिद्धार्थ मेहरा के रूप में दर्शकों के सामने आते हैं. सिड के रूप में एक बेहतरीन दोस्त के रूप में रणबीर और कोंकणा सेन की जोड़ी वैसी ही लगती है जैसे एक श्रेष्ठ दोस्तों की जोड़ी होनी चाहिए.वेक अप सिड में उनकी और कोंकणा की जोड़ी बहुत असामान्य सी जोड़ी थी. लेकिन इसके बावजूद अन्य सुपरस्टार की तरह रणबीर ने नखरे नहीं किये कि वह अभिनेत्री के रूप में किसी स्टार अभिनेत्री को ही चाहते हैं. चूंकि रणबीर जानते हैं कि वे जिस तरह का अभिनय कर रहे हैं उन्हें भावपूर्ण अभिनेत्रियों का ही साथ मिलेगा. भी दर्शक उन्हें सिड शर्मा की छवि में स्वीकार ही रहे थे कि अचानक उनकी फिल्म अजब प्रेम की गजब कहानी में हंसी के हंसगुल्ले छोड़ कर उन्होंने अपनी गंभीर हीरो वाली इमेज ही तोड़ दी. लेकिन अगले ही पल वह फिर से रॉकेट सिंह के रूप में सेल्समैन के रूप में आ गये. फिल्म भले ही बॉक्स आॅफिस पर कामयाब नहीं रही. लेकिन सभी ने रणबीर कपूर के किरदार की सराहना की. इस फिल्म में उनसे बेहतर और कोई सेल्समेन हो ही नहीं सकता था. जिस तरह वे अपनी बुद्धि लगा कर एक से एक मार्केटिंग के फंडे अपनाते हैं. मार्केटिंग फील्ड के लोग उनके मुरीद हो जाते हैं. लेकिन अभ्यिय की उनकी यह गाड़ी यही आकर नहीं टिकती. वे राजनीति में दोबारा एक बड़े राजनीतज्ञ की तरह रणनीति बनानेवाले व राजनीति खेलनेवाले योद्धा के रूप में उभर कर सामने आते हैं. और इसी फिल्म से रणबीर संकेत दे देते हैं कि वे अब पूरी तरह से फॉर्म में आ चुके हैं. उन्होेंने कमर कस ली है. राजनीति के बाद उनका बिल्कुल अदभुत रूप उभर कर फिल्म रॉकस्टार में आता है.एक ही फिल्म में दो महत्वपूर्ण किरदार निभा कर रणबीर खुद को पूरी तरह स्थापित करने में कामयाब हो जाते हैं.दरअसल, हकीकत यह है कि रणबीर के फिल्मों के चुनाव से एक बात स्पष्ट होती है कि उन्होंने फिल्मों की रणनीति कुछ इस कदर तैयार कर रखी है कि वह जानते हैं कि उन्हें कौन कौन से निर्देशक और मांझ सकते हैं और तराश सकते हैं. ताकि दिन ब दिन व निखरते   जायें. और इसी सोच के साथ वह इम्तियाज अली, अनुराग बसु, अनुराग कश्यप, अभिनव कश्यप जैसे निर्देशकों का चुनाव कर रहे हैं.

रॉकस्टार जर्नाधन से जॉर्डन 
रणबीर खुद मानते हैं कि रॉकस्टार उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म है. चूंकि इस फिल्म को रणबीर ने पूरी तरह जिया है. एक सामान्य से जर्नाधन से जॉर्डन रॉकस्टार बनने तक के इस सफर में इम्तियाज ने रणबीर के अंदर बैठे अभिनेता के कई शेड्स को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है. जहां एक तरफ जर्नाधन की मासूमियत, अपने सपने को पूरे करने की ललक, एक लड़की से पहले हवस वाला प्यार और फिर वास्तविक प्यार करनेवाले एक लड़के के बीच छिपी द्वंद्व इस कहानी में इम्तियाज ने रणबीर से उनका श्रेष्ठ ले लेने की कोशिश की है. इस फिल्म में रणबीर ने न सिर्फ अभिनय के दृष्टिकोण से बल्कि संगीत के दृष्टिकोण से काफी प्रशिक्षण लिया. स्पष्ट है कि रणबीर ने फिल्म में कितनी मेहनत की होगी.सबसे बड़े फिल्मी खानदान से संबंध रखनेवाला एक अभिनेता चाहता तो वह कई ऐसी फिल्मों की लड़ी भी लगा सकता था, जिसमें केवल डांस गाना हो. लेकिन रणबीर ऐसा नहीं कर रहे और शायद यही वजह है कि उनकी तपस्या परदे पर साफ नजर आती है. रॉकस्टार देखने के बाद लोगों ने मान लिया था कि यह रणबीर की बेस्ट फिल्म है. इस िफल्म में इम्तियाज ने रणबीर के अभिनय का निचोड़ ले लिया है. अब इससे बेस्ट और क्या होगा. लेकिन रणबीर कहां इतने से संतुष्ट रहते. सुरों से सजी इस फिल्म से चौंकानेवाले रणबीर अपनी अगली ही फिल्म बर्फी में बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाते हैं और बर्फी की मिठास दर्शकों के दिलों में इस तरह घुल जाती है कि दर्शक चाह कर भी बर्फी के किरदार से दूर नहीं हो पाते.

मतवाला बर्फी
फिल्म बर्फी में रणबीर कपूर ने खामोश रह कर भी खुद को स्थापित कर लिया. इस फिल्म में रणबीर के किरदार को देख कर आप अनुमान लगा सकते हैं कि वह वास्तविक जिंदगी में भी कितनी जिंदादिल हैं.फिल्म में उन्होंने अपने चेहरे से अभिनय किया है. एक ही फिल्म में एक शरारती लड़के,अपने पिता से दुलार करनेवाला बेटा, किसी आम युवा की तरह खूबसूरत की लड़की से प्यार करनेवाला एक लड़का, एक संवेदनशील दोस्त, जिम्मेदार व्यक्ति और प्यार की गहराईयों को समझनेवाला भावपूर्ण व्यक्ति का संपूर्ण किरदार निभाया है. यह दर्शाता है कि बतौर अभिनेता रणबीर एक गंभीर, अनुशासित व समर्पित अभिनेता हैं जो निर्देशकों के अनुसार ही काम करते हैं

निर्देशकों के चहेते
हाल ही में रणबीर कपूर ने अपनी सबसे बुरी लत छोड़ दी है. उन्होंने स्मोकिंग छोड़ दिया है. चूंकि उन्होंने फिल्म बर्फी के सेट पर अनुराग बसु से वादा किया था कि अगर बर्फी 70 करोड़ का आंकड़ा पार कर जायेगी तो वह स्मोकिंग छोड़ देंगे. जिस दिन फिल्म ने 70 करोड़ का आंकड़ा पार किया. उसी दिन खुद सामने से रणबीर ने अनुराग बसु को फोन करके कहा कि उन्होंने स्मोकिंग छोड़ दिया. अनुराग बसु बताते हैं कि रणबीर अपने निर्देशकों को सर कह कर ही पुकारते हैं. खुद रणबीर ने कई फिल्म समारोह में इम्तियाज अली इम्तियाज अली सर कह कर ही संबोधन किया था. रणबीर खुद मानते हैं कि उन्हें संवारने में उनके निर्देशकों की सबसे अहम भूमिका है. इसलिए वे सबसे अधिक सम्मान अपने निर्देशकों की करते हैं. बकौल अनुराग रणबीर काम करते वक्त बेहद गंभीर रहते हैं ,लेकिन कैमरा आॅफ होते ही उसके अंदर का बच्चा जाग उठता है. मुझे याद है किक जब बर्फी की शूटिंग का अंतिम दिन था, सभी रणबीर को पकड़ कर रो रहे थे. वजह यह थी कि रणबीर के कुशल और मिलनसार व्यवहार की वजह से उन्होंने सभी को अपना दीवाना बना दिया था. रणबीर दूसरों को सम्मान देना जानते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी यूएसपी है. शायद यही वजह है कि मैं और रणबीर आगे भी साथ साथ काम करते रहेंगे. वही इम्तियाज रणबीर की सबसे खास बात यह है कि वह बहुत अच्छे श्रोता हैं. वे उस वक्त तो कई प्रश्न नहीं करते. जब तक वह सबकी बात सुन न लें. वे निर्देशकों को खुद को सौंप देते हैं. मैं मानता हूं कि रणबीर निर्देशकों के हीरो हैं. जो निर्देशक उन्हें जिस तरह ढालना चाहेगा. ढाल लेगा. इम्तियाज का मानना है कि जिस तरह कई भगवानों के कई रूप होते हैं. कई नाम होते हैं. रणबीर के भी अभी कई रूप प्रतीत होना बाकी है. वे लगातार चौंकाते रहेंगे. अनुराग कश्यप जिनके साथ रणबीर फिल्म बांबे वेल्वेट में काम करने जा रहे हैं. उनका मानना है कि रणबीर वर्तमान में एकमात्र अभिनेता हैं, जो हमेशा भिन्न रहेंगे. वहीं अभिनव कश्यप का मानना है कि रणबीर उन कलाकारों में से एक हैं, जिनसे एक साथ एक टपोरी का किरदार, एक जेंटलमेन का किरदार, एक रोमांटिक किरदार, एक फर्ल्टर का किरदार. हर तरह का किरदार करवाया जा सकता है.

राजकपूर से तूलना
यह हकीकत है कि राजकपूर ने हिंदी सिनेमा में जो पहचान बनायी. उसे तोड़ना बेहद मुश्किल है. लेकिन यह रणबीर कपूर की काबिलियत है कि वे ताउम्र अपने दादा राजकपूर की तूलनात्मक दृष्टिकोण को भी झेलने को तैयार हैं. लेकिन वे न हो इस बात से अत्यधिक हताश हैं कि उनकी सफलता का सेहरा कपूर खानदान के सिर पर बांध दिया जाता है और न ही इस बात से अति उत्साही हैं कि उनके पास कपूर सरनेम है ही. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा विरले ही होता है कि किसी   सुप्रसिद्ध फिल्मी सितारे के खानदान का व्यक्ति अपनी एकल पहचान स्थापित कर पाये. लेकिन रणबीर को इस नीति में महारथ हासिल है और वे बेहद समझदारी से अपने कदम बढ़ा रहे हैं और कामयाब हो रहे हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि यकीनन आज के दौर में कपूर खानदान राजकपूर की वजह से जाना जाता है. आनेवाले समय में राजकपूर के समांतर रणबीर कपूर को भी वह ओहदा हासिल होगा. उनका हर कदम, उनकी कामयाबी उनकी सोच, फिल्मों के चयन, उनके अभिनय के गुर इसका शुभ सांकेतिक संदेश दे रहे हैं.

Amitabh special(7) : परदे पे अमिताभ



  अनुप्रिया अनंत-उर्मिला कोरी

सेकेंड च्वाइस रहे 
आज 70 साल की उम्र में अमिताभ की फेहरिस्त में 100 से भी अधिक फिल्में दर्ज हैं. हिंदी सिनेमा के 100 साल में अमिताभ के 43 अहम साल हिंदी फिल्म जगत को मिले हैं. आज अमिताभ अपनी फिल्मों में बेहतरीन अदाकारी, समर्पित अभिनेता की वजह से सदी के महानायक हैं. लेकिन हिंदी फिल्मों में उनका सफर जहां से शुरू हुआ था. उस वक्त कभी शायद खुद अमिताभ ने भी परिकल्पना न की होगी कि कभी अधिकतर फिल्मों के सेकेंड च्वाइस माने जानेवाला नायक एक दिन सिनेमा जगत के उस मुकाम पर पहुंचेगा. जहां उन्हें रिप्लेस करनेवाला कोई नहीं. उनका कोई सानी नहीं. यह अमिताभ की फिल्मी करियर का संयोग रहा है कि वे शुरुआती दौर से ही हमेशा निर्देशकों की दूसरी पसंद रहे. यह सिलसिला फिल्म सात हिंदुस्तानी से ही शुरू हुआ. पहले अमिताभ का किरदार टीनू आनंद को आॅफर हुई थी. बाद में ख्वाजा को अमिताभ जंच गये. और यही से उनकी फिल्मी करियर की शुरुआत हुई. इसके बाद फिल्म आनंद में  अमिताभ का बाबूमोसाय किरदार महमूद करनेवाले थे. लेकिन जब फिल्म में किशोर कुमार की जगह राजेश खन्ना को लिया गया तो बाबूमोसाय के लिए भी अमिताभ को चुना गया. बांबे टू गोवा मेहमूद ने राजीव गांधी को ध्यान में रख कर लिखी थी. लेकिन फिर अमिताभ को य ह फिल्म मिली. फिल्म जंजीर पहले राजकुमार, धर्मेंद्र को आॅफर हुई थी. उन्होंने ठुकराया तो अमिताभ को मिली और इसी फिल्म से अमिताभ का एंग्री यंग मैन की छवि का जन्म हुआ. इस फिल्म में काम करने के दौरान ही प्राण ने ऐलान कर दिया था कि हिंदी सिनेमा को अगले 100 सालों के लिए सुपरस्टार मिल गया है. प्राण की वह भविष्यवाणी सही साबित हुई और वाकई अमिताभ मिलेनियम स्टार के रूप में उभर कर सामने आये.  फिल्म शोले में अमिताभ का किरदार शत्रुघ्न सिन्हा को आॅफर किया गया था. लेकिन शत्रुघ्न ने यह कह कर फिल्म ठुकरा दिया था कि वे मल्टीस्टारर फिल्मों में काम नहीं करते. बाद में अमिताभ का जय किरदार हिंदी सिनेमा के ऐतिहासिक किरदारों में से एक बना. फिल्म चुपके चुपके में भी ऋषिकेश मुखर्जी अमिताभ की जगह नये चेहरे को लेना चाहते थे. लेकिन धर्मेंद्र की जिद्द पर अमिताभ को यह फिल्म मिली.फिल्म दीवार भी पहले राजेश खन्ना और शशि कपूर को ध्यान में रख कर लिखी गयी थी. उन्होंने ठुकराया तो अमिताभ को मिली. गौरतलब है कि वे सारी फिल्में जो अमिताभ के लिए मिल का पत्थर साबित हुई. वे सारी फिल्में अमिताभ को ध्यान में रख कर लिखी नहीं गयी थी. लेकिन अमिताभ ने अपने समर्पण व समझदारी से सारे किरदारों को बखूबी निभाया. और धीरे धीरे निर्देशकों के फर्स्ट च्वाइस बने. दरअसल, अमिताभ का करियर भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा. शुुरुआती दौर में उन्होंने केवल विफलता ही देखी. लेकिन बार बार वह संघर्ष करते रहे. और अपना मुकाम हासिल किया.
अहम रहे निर्देशक 
अमिताभ के फिल्मी करियर का एक खास पहलू यह भी रहा है कि उन्हें एक ही निर्देशक के साथ कई फिल्में करने का मौका मिलता रहा. वे जिस निर्देशक के प्रिय हुए. उन्होंने अमिताभ के साथ कई फिल्में लगातार बनायी. ऋषिकेश मुखर्जी, मुकूल आनंद, मनमोहन देसाई, यश चोपड़ा, टीनू आनंद, प्रकाश मेहरा और बाद के दौर में राम गोपाल वर्मा के साथ उन्होंने लगातार फिल्में बनायी. ऋषिकेश मुखर्जी ने कहा था कि अमिताभ के अंदर के अभिनेता को कम ही निर्देशकों ने पहचाना. ऋषिकेश मानते थे कि अमिताभ को केवल एक् शन फिल्में या बंदूक चलानेवाले हीरो की छवि में बांधना नहीं चाहिए था. चूंकि वह वर्सेटाइल एक्टर है. फिल्म अलाप में अमिताभ ने शास्त्रीय संगीत की समझ करनेवाला किरदार निभाया था और उसे बखूबी निभाया था. इससे जाहिर होता था कि अमिताभ बेहतरीन अभिनेता है. वह हर तरह का किरदार निभा सकते थे. यश चोपड़ा ने अपने 80 वां जन्मदिन पर भी विशेष रूप से अमिताभ की तारीफ करते हुए कहा दीवार अमिताभ की अब तक की बेस्ट फिल्म है. यश चोपड़ा मानते हैं कि जिस तरह दीवार की स्क्रिप्ट में कोई कमी नहीं थी. अमिताभ के अभिनय में भी इस फिल्म में कोई खामी नहीं निकाल सकता था. यही वजह रही कि बाद के दौर में अमिताभ के साथ यश चोपड़ा ने और भी कई फिल्में बनायी. कभी-कभी, सिलसिला, त्रिशुल, काला पत्थर में अमिताभ के अभिनेता को निखार कर दर्शकों के सामने रख दिया. यश चोपड़ा आज भी अमिताभ के स्टाइल के मुरीद हैं. कयश चोपड़ा ने कभी कभी  में अमिताभ के वार्डरॉब में कपड़े लिये हैं. यश चोपड़ा स्वीकारते हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को पंचुअल बनानेवाला पहला अभिनेता अमिताभ ही है. चूंकि इससे पहले हीरो काफी हीरोइज्म में जीते थे और देर देर से सेट पर आते थे. लेकिन अमिताभ शुरू से लेकर आज तक कभी भी सेट पर देर से नहीं पहुंचे. उनके इस प्रोफेशनलिज्म अंदाज के भी कायल हैं यश. बाद के दौर में वीर जारा में भी अमिताभ शूटिंग के लिए बिना अपने किरदार के बारे में पूछे सेट पर पहुंच गये थे. चूंकि वह यश की फिल्म थी. यश मानते हैं कि अमिताभ बेहद विनम्र अभिनेताओं में से एक हैं. शोले, शान, शक्ति जैसी फिल्मों में अमिताभ को निर्देशित कर चुके रमेश सिप्पी का मानना है कि अमिताभ जैसा प्रोफेशनल, पंचुअल, सीनिसियरिटी आज तक और किसी अभिनेता में नहीं देखी जा सकती. 70 की उम्र में भी अमिताभ सक्रिय हैं. क्योंकि   उनमें ये गुण हैं. अमिताभ की जिंदगी का पहली माइलस्टोन फिल्म जंजीर देनेवाले प्रकाश मेहरा ने जब अमिताभ का चुनाव किया था तो फिल्मी जगत के कई लोगों ने प्रकाश को कहा था कि अमिताभ पनौती हैं. उन्हें न ले. फिल्म फ्लॉप होगी. उस वक्त प्रकाश ने कहा था कि अमिताभ हीरा है और हीरे की परख जोहरी को ही होती है. अमिताभ वाकई हीरा निकले. इसके बाद प्रकाश मेहरा ने अमिताभ के साथ एक के बाद हिट फिल्में दी. जंजीर, खून पसीना, हेरा फेरी, मुकद्दर का सिकंदर, लावारिश, नमक हलाल, शराबी तक लगातार प्रकाश व अमिताभ ने बॉक्स आॅफिस पर धमाल मचाया. अमिताभ के फिल्मी करियर में मनमोहन देसाई की भी अहम भूमिका रही. मनमोहन देसाई उस दौर में राजेश खन्ना को लेकर कई अच्छी फिल्में बना चुके थे. लेकिन मनमोहन देसाई भी नये चेहरे की खोज में थे. ऐसे में उन्हें परवरिश, अमर अकबर एंथनी, सुहाग, नसीब, देश प्रेमी व कूली मर्द, गंगा जमूना सरस्वती एक के बाद एक हिट फिल्में दीं. उस वक्त मनमोहन यही कहते थे कि अमिताभ को लेकर फिल्म न बनाना घर आयी लक्ष्मी को लौटाना है. चूंकि अमिताभ ने मनमोहन देसाई की फिल्मों को बॉक्स आॅफिस पर खास सफलता दिला दी थी. अमिताभ के करियर को खास मुकाम देने में मुकुल आनंद की भी अहम भूमिका रही. खुदा गवाह, हम जैसी फिल्में बनायी. लेकिन अग्निपथ में विजय दीना नाथ चौहान के किरदार को ऐतिहासिक बना दिया. हालांकि उस दौर में वह फिल्म कामयाब नहीं रही थी. लेकिन अमिताभ के किरदार का लोहा सबने माना था. चंद्रा बरोट की फिल्म डॉन भी अमिताभ के करियर की माइलस्टोन फिल्म रही. निर्देशकों के साथ के अलावा सलीम जावेद की स्क्रिप्टवाली फिल्में भी अमिताभ के लिए लकी रही.
अमिताभ के फिल्मी करियर की दूसरी पारी की शुरुआत भले ही आदित्य की फिल्म मोहब्बते से हुई. लेकिन इस फिल्म के बाद से अमिताभ को मुख्य नहीं सेकेंड लीड किरदार मिल रहे थे. लेकिन इस दौर में भी उन्हें रामगोपाल वर्मा का साथ मिला जिन्होंने अमिताभ को लेकर केंद्र भूमिका वाली फिल्में बनायी. सरकार, निश्रशब्द, सरकार राज जैसी फिल्में बना कर फिर से अमिताभ को मुख्यधारा का अभिनेता बना दिया. इस लिहाज से रामगोपाल वर्मा भी अमिताभ की जिंदगी में अहम रहे. रामगोपाल वर्मा मानते हैं कि अमिताभ को किसी भव्य सेट, लोकेशन की जरूरत नहीं. अमिताभ का करिश्मा खुद में भव्य है. अमिताभ की उपस्थिति ही लार्जर दैन लाइफ की भव्यता को स्थापित कर देती है. अमिताभ खुद में संपूर्ण है.

नाम है विजय दीना नाथ चौहान
अमिताभ की जिंदगी की पहली सफल फिल्म जंजीर थी. और इसी फिल्म से उन्हें विजय के नाम का किरदार मिला. और ताउम्र विजय उनके लिए लकी नाम रहा. इस फिल्म के बाद उन्होंने दीवार में विजय वर्मा का किरदार निभाया. फिर अग्निपथ में विजय दीना नाथ चौहान रहा. डॉन में विजय रहा.द ग्रेट गैंबलर में विजय रहे. हेरा फेरी में विजय रहे. दो और दो पांच, दोस्ताना, शान, त्रिशुल, नि:शब्द, और बुड्ढा होगा तेरा बाप में भी अमिताभ को विजय नाम के ही किरदार मिलते रहे.

70 का दशक रहा खास
अमिताभ आज अपना 70वां जन्मदिन मना रहे हैं और उनकी जिंदगी में भी 70 की अहम भूमिका रही है. अमिताभ ने अपने फिल्मी करियर का पहला और सबसे अहम सफलता का स्वाद 70 के दशक में ही चखा. अमिताभ की फिल्म जंजीर से ही उन्होंने पहली बार स्टारडम का स्वाद चखा. इसके बाद लगातार दीवार, चुपके चुपके, मिली, शोले, कभी कभी हेरा फेरी, अमर अकबर एंथनी, खून पसीना, त्रिशुल, जमीर. मुकद्दर का सिकंदर, डॉन, गंगा की सौंगध, कसमें वादे, सुहाग, नटवर लाल, दो और दो पांच लगातार 40 फिल्में की जिसमें लगभग उन्हें 90 प्रतिशत सफलता हासिल हुई. फिल्मों का दौर कायम रहा. यही नहीं वर्ष 1975 में एक साथ उनकी चार फिल्में रिलीज हुई थीं. और सभी ब्लॉकबस्टर रहीं. 70 के दशक में ही उन्होंने बॉक्स आॅफिस हैट्रिक भी लगाई. 74 में कसौटी, मजबूर व चुपके चुपके बॉक्स आॅफिस पर सुपरहिट साबित हुई. लेकिन 75 में एक साथ मिली, दीवार शोले हिट रही. 76 में कभी कभी, अमर अकबर एंथनी, हेरा फेरी सफल रही. 77 में खून पसीना, परवरिश और गंगा की सौंगध कामयाब रही. 78 में त्रिशुल, डॉन, मुकद्दर का सिकंदर ब्लॉकबस्टर रही. 79 में नटवर लाल, काला पत्थर, सुहाग लगातार सुपरहिट फिल्में रहीं. यह वह दौर था जब हिंदी सिनेमा में पहली बार किसी अभिनेता ने 1 करोड़ के जादूई आंकड़े को टच किया था. तरन आदर्श बताते हैं कि अमिताभ पहले अभिनेता थे जिनकी फिल्म एक साथ मुंबई के 9 सिनेमा घरों में गोल्डन जुबली मनायी.

पा : दूसरी पारी
अमिताभ ने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत कई बुरी फिल्मों से किया. लेकिन उन्होंने अपने जीवन की अहम भूमिका निभायी फिल्म पा में. पा में एक ऐसे बच्चे की भूमिका निभा कर उन्होंने सबको आश्चर्यचकित कर दिया. प्रोजेरिया से ग्रसित बच्चे के किरदार में अमिताभ ने खुद को पूरी तरह आॅरो में ढाल लिया था. खुद आर बाल्की मानते हैं कि उनके जीवन की सबसे अहम फिल्म पा रहेगी. चूंकि अमिताभ ने इस फिल्म में एक ऐसा किरदार निभाया. जिसे हिंदी सिनेमा में और कोई नहीं निभा सकता था. आर बाल्की मानते हैं कि वे हमेशा अमिताभ को लेकर ही फिल्में इसलिए लिख और सोच पाते हैं क्योंकि अमिताभ में उन्हें आज भी कई रंग नजर आते हैं और वह मानते हैं कि अब बी अमिताभ के   अभिनय के कई रूप को निखार कर सामने लाया जा सकता है. यही वजह है कि आर बाल्की ने अमिताभ को लेकर चीनी कम और पा जैसी फिल्में बनायी. आगे भी वह अमिताभ के साथ ही फिल्में बनाना चाहते हैं. अमिताभ भी मानते हैं कि उन्हें अपने जिंदगी की स्पेशल भूमिका पा से मिली. इस फिल्म से अमिताभ के अभिनय को बी नया रूप दिया. अमिताभ मानते हैं कि इस फिल्म से आर बाल्की ने उन्हें उनका बचपन वापस कर दिया. पा के अलावा बागवां भी अमिताभ की जिंदगी में खास रही. बुड्ढा होगा तेरा बाप में मेरी अमिताभ का स्टाइलिश अंदाज हमेशा याद किया जाता रहेगा.


Amitabh special(6)-बाबूजी के अमिताभ


  बाबूजी हरिवंशराय बच्चन सबसे करीबी दोस्त 


दुनिया के लिए महान साहित्यकार हरिवंशराय बच्चन बेटे अमिताभ के लिए उनके बाबूजी थे. दुनिया अमिताभ को महानायक मानती है और वे अपने बाबूजी को. बचपन से 70 तक आज भी उनके आदर्श बाबूजी हैं. बाबूजी के सिद्धांत ही हैं. उन्हें आज भी अपने जीवन में बस एक ही मलाल है कि वह और अधिक वक्त अपने बाबूजी के साथ गुजार पाते. वे हमेशा मानते हैं कि हरिवंशराय बच्चन का ओहदा हमेशा उनसे ऊंचा रहेगा. क्योंकि बाबूजी साहित्यकार थे और साहित्य का कद हमेशा फिल्मों से ऊपर है. दरअसल, अमिताभ फिल्मों के साथ साथ अपनी गृहस्थ जीवन में भी कामयाब इसलिए रहे. क्योंकि वे एक आदर्श बेटे बन पाये. परिवार को जीवन का अभिन्न अंग मानने की सीख उन्हें पिताजी से ही मिली. शायद यही वजह रही कि वे अपने व्यस्त जिंदगी के बावजूद अपने परिवार को जोड़ कर रख पाये. दरअसल, हरिवंशराय बच्चन अमिताभ के सबसे करीब दोस्त बने. शुरुआती दौर से ही उन्होंने अमिताभ से दोस्ताना व्यवहार रखा और अमिताभ ने भी वही व्यवहार अभिषेक से रखा. किसी समृद्ध परिवार में भी बाप-बेटे के रिश्तों में ऐसा खुलापन व विचारों के आदान प्रदान की छूट कम ही देखने को मिलती है. लेकिन हरिवंश राय ने इसे बरकरार रखा. बचपन में भी वे अमिताभ की पढ़ाई लिखाई के अलावा अन्य गतिविधियों में भी अमिताभ को गाइड करते रहे. अमिताभ शुरुआती दौर से शर्मिले थे. लोगों से कम बातें करते थे. उन्हें मुखर बनाने का श्रेय उनके पिता को ही जाता है. इलाहाबाद में अमिताभ के शर्मिले मिजाज की वजह से ही हरिवंशराय बच्चन ने एक टांगा खरीद रखा था. जिसमें बैठ कर अमिताभ स्कूल व नर्सिंग होम जाते थे. ताकि उन्हें किसी से रास्ते में बात न करनी पड़े. अमिताभ के लिए हरिवंशराय ने एक कविता शुरुआती दौर में ही लिख दिया था जब अमिताभ ने उनसे यह प्रश्न पूछा था कि उन्होंने अमिताभ को जन्म क्यों दिया. जिस मजाकिया अंदाज में हरिवंश जी ने उनको जवाब दिया था. शायद वही से बाप बेटे के रिश्ते में लगाव व दोस्ती के बीज पनप गये थे. इसके बाद अमिताभ ने हर पथ पर बाबूजी की रचनाओं से प्रेरणा ली. बाबूजी हमेशा कहते जो मिला अच्छा, जो न मिला वो और भी अच्छा...इसे अपने जीवन का सूत्र बना कर रखा अमिताभ ने. ऐसा नहीं था कि दोनों के विचारों में कभी मनमुटाव न रहा. बाबूजी नहीं चाहते थे कि अमित राजनीति में जाये. लेकिन अमिताभ गये. अपने जिद्द से. लेकिन असफल होकर वापस पिता की ही शरण में आये.खुद अमिताभ मानते हैं कि उनके ज्यादा दोस्त नहीं हैं. क्योंकि वे अधिक घूल मिल नहीं पाते. लेकिन स्पष्ट रूप से हरिवंशराय बच्चन ही एकमात्र व्यक्ति रहे जिन्होंने अमिताभ को एक पिता नहीं एक सच्चा दोस्त दिया. अमित आज भी कहते हैं कि अगर कभी उनका घर टूटा तो वे सबसे पहले अपने पिताजी की रचनाएं लेकर भागेंगे. वे आज भी वक्त मिलने पर या कहीं भी यात्रा पर पिताजी की रचनाएं साथ रखते हैं. चूंकि आज बाबूजी का साथ न होते हुए भी उनकी रचनाओं से उन्हें बल मिलता है. ताकत मिलती है. शायद आज 70 की उम्र में भी वे कामयाबी की सीढ़िया चढ़ रहे हैं. क्योंकि पिताजी साथ नहीं. लेकिन उनकी रचनाओं में इतनी ताकत है, जिंदगी का वह रहस्य है. वह रस है. कि आज भी अमिताभ स्फूर्ति और ऊर्जा के साथ डटे हैं. विजयमान हैं. निरंतर हैं.

Amitabh special (5) : परिवार का मुखिया


उर्मिला कोरी- अनुप्रिया 

केबीसी की शूटिंग में अमिताभ व्यस्त थे. लेकिन इसके बावजूद वे वक्त निकाल कर अपनी पोती आराध्या व बहू को लेने खुद एयरपोर्ट पहुंच गये. खुद ड्राइव करके. जबकि पूरी की पूरी ड्राइवरों की पलटन है उनके पास. लेकिन वे अपनी पोती के लिए खुद ड्राइवर बन कर खुश हैं. बेटी श्वेता के बच्चों के घर पर आने पर वे वक्त निकाल कर सबके साथ वक्त बिताते हैं. चूंकि उन्हें पसंद है कि उनका परिवार उनके साथ रहे. कभी कभी जब वह अकेला महसूस करते हैं. वे बेटे अभिषेक के साथ शांति से केवल एक कमरे में बैठना पसंद करते हैं. बहू ऐश्वर्य राय को बेटी की तरह प्यार और सम्मान देने में वे कोई कसर नहीं छोड़ते. पत् नी जया को शादी के बाद भी राजनीति में जाने से नहीं रोका. उनका साथ देते रहे. वे एक साथ निरंतर एक पति, पिता, ससुर व अब दादा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. घर में वे ही बिग बॉस हैं. सारे महत्वपूर्ण निर्णयों पर उनका ही आखिरी फैसला माना जाता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने कभी किसी पर कोई पाबंदी लगा रखी है. दरअसल, अपने पिता हरिवंशराय बच्चन के दिये गये आदर्श व पारिवारिक मूल्यों की उन्हें आज भी कद्र है. वे परिवार को अपने 70वें साल का सबसे अनमोल तोहफा मानते हैं. वे आज सफल हैं. इसका श्रेय भी वे परिवार को ही देते हैं. क्योंकि वे परिवार के भी महानायक हैं. इसलिए बहू ऐश के भी चहेते हैं तो अभिषेक के लिए उनके बेस्ट बडी हैं. पत् नी के लिए वे हिमालयपुत्र हैं. अमिताभ यह बखूबी जानते हैं कि परिवार का हर सदस्य एक सा नहीं होता. लेकिन एक दूसरे को समझ कर, एक दूसरे की कद्र करके ही और सामांजस्य बिठा कर ही वे परिवार को खुशहाल रख सकते हैं. शायद यही वजह है कि वे अभिषेक-ऐश की जिंदगी में बहुत दखल नहीं देते. परिवार में सबको आजादी है. वे छोटों का सम्मान करते हैं. इसलिए आज उन्हें भी सम्मान प्राप्त है. वरना, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कई सुपरस्टार बने. लेकिन वे सुपरस्टार परिवार के लिए भी सुपरस्टार बन पाये. इसका विलक्षण उदाहरण अमिताभ हैं. बकौल जया अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि एक सुपरस्टार की पत्नी होने के नाते जिंदगी कितनी अलग है. सच कहूं तो बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि अमित ने जिंदगी को हमेशा ही आम लोगों की तरह ही जिया है. एक सुपरस्टार किस तरह का बर्ताव करता है. मैं नहीं जानती हूं क्योंकि अमित एक आम आदमी की तरह हमेशा ही अपने परिवार को ढेर सारा प्यारा और महत्व देते रहे हैं.  वे फैमिली मैन  हैं. वे हमेशा से ही बहुत जिम्मेदार रहे हैं. बाबूजी बताते थे कि अमित की उम्र मुश्किल से १० की रही होगी. बाबूजी इंग्लैंड गये थे.  अजिताभ भी उस वक्त बहुत छोटा थे.मां की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गयी. वे बेहोश हो गयी थीं. उस परिस्थति में भी अमित घबराये नहीं उन्होंने मां को न सिर्फ संभाला बल्कि एक चिट्ठी लिखकर नौकर को दी कि वे डॉक्टर के पास यह चिट्ठी लेकर जाये. अपने जिम्मेदार अप्रोच से उन्होंने उस दिन बड़ी घटना को होने से टाल दिया. परिवार के प्रति उनका जिम्मेदाराना अप्रोच हमेशा ही रहा है. हमारे परिवार में सभी को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने की छूट है लेकिन जब कभी भी कोई परेशानी आती है. हम सब मिलकर फैसला लेते हैं. गुस्सा तो वह बमुश्किल होते हैं. लापरवाही, गंदगी से उन्हें सख्त ऐतराज है. कमरे की गंदी बेडशीट और परदे से उन्हें चिढ़ है. एक फिक्रमंद दादाजी की तरह वे शाम के  वक्त खिड़कियां बंद रखते हैं. ताकि घर में मच्छर न आ जाये और अराध्या को परेशानी न हो. अमित की धैर्यता भी उन्हें परिवार का मुखिया बनाती है. बेटियों को खास मानने वाले बिग बी की बिटिया श्वेता नंदा अपने पिता पर बातचीत करती हुई कहती हैं कि  मैं इस बात को शब्दों में नहीं बता सकती कि मेरे पापा मेरे लिए कितने स्पेशल हैं. हमारी जिंदगी, हमारा बचपन सबकुछ बेहतरीन रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि वे इन सबका आधार थे. वे हमेशा मेरे साथ रहे हैं. फिर चाहे वह अपनी फिल्मों की शूटिंग में कितना भी व्यस्त रहे हो. मुझे कौन सी ड्रेस पहननी है, कैसा मेकअप करना है. मां से ज्यादा पापा इन सब में मेरी मदद करते थे. उन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया है. फिर चाहे वह मेरी डिलीवरी का ही वक्त क्यों न हो. वे पापा ही नहीं बेहतरीन नाना भी हैं. अगस्थ्य हो या नव्या नवेली उनसे उनका रिश्ता अनूठा है. मुझे याद है एक बार जब वे तिरूपति जा रहे थे.किसी कारणवश मैं नहीं जा पायी थी. लेकिन उन्होंने मुझसे कहा कि बच्चों को मेरे साथ भेज दो. उस वक्त अगस्थ्य दो साल का होगा और नव्या नवेली ४ साल की. इतने छोटे बच्चों का खास ख्याल रखा. उसके बाद तो बच्चों को उनका साथ बहुत ज्यादा भाता है.अमिताभ बच्चन की बेटी होना बहुत ही खुशी के साथ-साथ गौरव की बात भी है. मैं उनकी परदे की इमेज और उससे जुड़े स्टारडम को नहीं बल्कि निजी जिंदगी में जिस तरह के वे इंसान हैं. मेरे लिए तो वह रियल हीरो हैं. महानायक अमिताभ बच्चन को अभिषेक अपना भगवान मानते हैं. बकौल अभिषेक सच कहूं तो मुझे घर पर कभी भी नहीं लगा कि पापा एक सुपरस्टार हैं. एक पल को भी उन्होंने कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया. वे घर पर एक आम पिता की तरह ही होते थे. बचपन में पा शूटिंग के बाद जैसे ही घर लौटते थे.  चाहे कितना भी थके   क्यों न हो. वे हर दिन दौड़कर मुझे गले लगाते थे और मेरे साथ जरूर खेलते थे.  पापा एक घरेलू आदमी हैं. उन्हें खुश करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है. बस उनका परिवार उनके पास हो. मुझे याद है जब पढ़ने के लिए विदेश गया था और छुट्टियों में वापस लौटा तो पापा मुझे लेकर आॅफिस आये और अपने केबिन में सारा दिन अपने पास बिठाये रखा. वे अपना काम करते और मुझे देखते मुस्कुराते. ज्यादा बात भी नहीं की लेकिन जब शाम को वापस लौटे तो उन्होंने कहा कि आज तुम्हारी मौजूदगी ने मेरा पूरा दिन बना दिया. यही वजह है कि जब भी समय मिलता है. मैं और पा लॉग ड्राइव्व पर या मूवी देखने चले जाते हैं. मेरी फिल्मी कैरियर में उन्होंने दखलअंदाजी कभी नहीं की लेकिन मुझे बेहतरीन बनाने के लिए वे हमेशा अपने टिप्स देते रहे हैं. मेरी शूटिंग के पहले दिन उन्होंने मुझसे कहा था कि अपना काम पूरी मेहनत, लगन और ईमानदारी से करना. स्वभाव में विनम्रता हमेशा बनाए रखना क्योंकि तुम्हारे नाम के साथ तुम्हारे दादाजी का नाम भी जुड़ा है. जब मेरी एक्टिंग की सभी जगह आलोचना हो रही थी तब पा ने ही कहा कि तुम्हारे अभिनय के बारे में जो कुछ भी अखबारों में लिखा जा रहा है. उसे अंडरलाइन कर अपने रुम में लगा लो और रोज सोने से पहले और उठने के बाद पढ़ो और सुधार करो और अपनी दूसरी फिल्म की रिलीज के बाद देखों की तुम्हारी आलोचना मे लिखी गयी लाइनें कितनी कम हुई है.वाकई उनका फार्मूला कारगर साबित हुआ है. पा ने न सिर्फ मुझे जिंदगी दी है बल्कि उसे संवारा भी है इसलिए मेरे लिए पा मेरे भगवान है. अभिषेक की तरह ऐश्वर्य राय की राय यही है बकौल ऐश पा जिस तरह से घर और अपने काम को मैनेज करते हैं. बहुत हद तक वह उनको भी प्रभावित करता है. आराध्या के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने के लिए वे अराध्या के सोने और उठने का समय सबकुछ याद रखते हैं. सिर्फ यही नहीं अराध्या के खातिर उन्हें ड्राइवर बनने से भी कोई ऐतराज नहीं है. आराध्या जब कभी भी बाहर जाती है. पापा उसके साथ हमेशा ही होते हैं ताकि वो इस बहाने ही सही आराध्या के साथ उन्हें समय बिताने का मौका तो मिल जाए. पा बेस्ट हैं. मुझे उन्होंने कभी ऐहसास नहीं कराया कि मैं घर की बहू हूं.

Amitabh special(4)- अमिताभ एक परिघटना


  रॉफ अहमद, फिल्म क्रिटिक
कभी बेहद शर्मिले अमिताभ हिंदुस्तान के दर्शकों के दिलों में राज करेगा. यह शायद उस वक्त कभी तेजी बच्चन और हरिवंशराय बच्चन ने सोचा भी न होगा. हां, मगर यकीनन उन्हें इस बात का अनुमान जरूर होगा कि उनके बड़े बेटे के चेहरे पर कुछ तो अलग तेज है और उसका वही तेज उसे आम से खास बना देगा. माता-पिता का आत्मविश्वास ही था, जो उन्होंने 11 अक्तूबर 1942 में जन्में बेटे का नाम अमिताभ रखा. मतलब आंतरिक रोशनी. जिस वक्त अमिताभ का जन्म हुआ था. उस वक्त इलाहाबाद के कई इलाकों में भारतीय स्वाधीनता का संघर्ष चल रहा था. हर तरफ इंकलाब का नारा था. उस वक्त एकबारगी तेजी और  हरिवंशराय के मन में यह बात आयी कि क्यों न बेटे का नाम इंकलाब राय रखें. उन्होंने कुछ दिनों के लिए रखा भी. लेकिन बाद में उन्होंने इसे बदल कर अमिताभ कर दिया. अमिताभ की परवरिश भी ठीक उसी तरह हुई, जैसे किसी आम साहित्यकार के बेटे बेटियों की होती है. हां, एक खास बात यह रही थी कि ंिपता हरिवंशराय से लगाव होने के कारण अमिताभ भी साहित्य में बेहद रुचि लेते है. बचपन में मिली अपने पिता की साहित्य समृद्धि की ही यह देन है कि आज भी अमिताभ न सिर्फ साहित्य की अच्छी समझ रखते हैं, बल्कि वे साहित्य का सम्मान भी करते हैं. और कहीं न कहीं से उनकी शख्सियत व जो उनका स्वभाव है. उनमें साहित्यिक सोच जरूर नजर आती है. अमिताभ खुद को कभी परिघटना नहीं मानते. लेकिन हकीकत यह है कि  अमिताभ के बाद किसी दूसरे अमिताभ का आना संभव नहीं है. जो आॅरा अमिताभ का है. वह कई पीढ़ियों तक कम से कम किसी हिंदी सिने जगत के लिए बनाना मुश्किल होगा. अमिताभ ने शुरुआती दौर से नाकामायबी और रिजेक् शन का दौर झेला. लेकिन फिर भी बार बार रुक कर, गिर कर वह आगे बढ़ते रहे हैं. ऐसा केवल किस्से कहानियों में ही होता और 100 में से एक लोग ही कर पाते हैं कि वे बार बार नाकामयाब होकर भी चलते रहे और राह बनाते रहे. निश्चित तौर पर युवाओं को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए और मुझे लगता है कि आज अमिताभ इसलिए भी हर वर्ग को कनेक्ट कर पाते हैं, क्योंकि उनकी जिंदगी का सफर कई लोगों की प्रेरणा है. कई लोग उनमें अपना सपना देखते हैं कि अगर अमिताभ इलाहाबाद शहर से आकर मुंबई में अपना साम्राज्य स्थापित कर सकता है तो फिर हम क्यों नहीं. आज भी अमिताभ के घर पर रविवार के दिन लाखों लोगों की भीड़ होती है. उस भीड़ में अधिकतर वे लोग हैं, जो अमिताभ को अपना आदर्श मानते हैं. किसी दौर में राजकपूर ने आम लोगों से अपना जुड़ाव किया था. इसके बाद जो भी अभिनेता आये. वे एक वर्ग के अभिनेता बने. लेकिन अमिताभ ने जनमानस का अभिनेता बन कर दिखाया. वे आॅटो चलानेवाले एक व्यक्ति के भी चहेते हैं तो दूसरी तरफ इंटरनैशनल कंपनियों के भी ब्रांड एंबैस्डर. किसी व्यक्ति के लिए हर वर्ग के साथ मास अपील कर पाना इतना आसान नहीं. लेकिन अमिताभ इसमें माहिर हैं.
शुरुआती दौर में लगातार उनकी 12 फिल्में  लगातार फ्लॉप रहीं. उस वक्त उन्होंने अभिनेता से लेकर विलेन हर तरह के किरदार निभाये. लेकिन अमिताभ की प्रतिभा को लोगों ने नोटिस नहीं किया. लेकिन फिर भी अमिताभ डटे रहे. जबकि शुरुआती दौर की उनकी फिल्में सात हिंदुस्तानी, सौदागर, परवाना हर फिल्म में अमिताभ ने अपना बेस्ट देने की कोशिश की. आनंद में वे सेकेंड लीड में रहे. लेकिन फिर भी लोगों ने उनके किरदार को पसंद किया. इसके बाद लगातार अमिताभ ने बेहतरीन किरदार निभाये. अमिताभ को दर्शकों का प्यार आज भी मिल रहा है. उसकी एक खास वजह यह भी है कि उन्होंने कभी खुद पर स्टारडम हावी नहीं होने दिया. उन्होंने अपने स्टारडम को एक धरोहर की तरह संभाला. शायद इसकी वजह यह थी कि उन्होंने जो मुकाम हासिल की वह कई नाकामयाबियों के बाद उन्हें मिली थी.

निस्संदेह वह लार्जर देन लाइफ के अभिनेता हैं. लेकिन वह लोगों के सामने कभी एक सुपरस्टार की तरह नहीं, बल्कि आम लोगों की तरह मिलते हैं. उनके स्टारडम में एक विनम्रता है. अमिताभ ने एक बार अपनी बातचीत में मुझे बताया कि  शुरुआती दौर में वे किस तरह अपना वक्त स्टूडियो में शूटिंग देखने में गुजारा करते थे. एक बार जब उन्होंने मनोज कुमार को पहचान फिल्म के लिए डांस नंबर करते हुए देखा था. उस वक्त वह घर जाकर कितने नर्वस थे कि क्या एक अभिनेता को डांस भी करना पड़ता है. जब फिर अमिताभ ने शूटिंग शुरू की और परवाना से उन्हें सिर्फ इसलिए हटाया जा रहा था क्योंकि वह डांस नहीं कर पा रहे थे. उस वक्त उन्होंने तय किया था कि वह एक्टिंग के लिए सबकुछ करेंगे और डांस भी सीखेंगे. यह अमिताभ की तत्परता थी कि वे जूझारू होकर लगातार नाकामयाबी के बाद भी हर संभव प्रयास कर रहे थे. उन्होंने आज तक स्टारडम के आड़ में कभी कोई गलत निर्णय नहीं लिया. राजेश खन्ना सुपरस्टार रहे. लेकिन बाद के दौर में उन्होंने अपनी छवि बेहद बिगाड़ ली थी. अमिताभ उस लिहाज से काफी बौद्धिक, धैर्य और समझदारी से आगे बढ़ते रहे. 1973 के बाद 1980 तक लगभग उस दौर में उन्होंने 80 फिल्मों में काम किया और केवल पांच फिल्में ही फ्लॉप रहीं. बाकी सभी कामयाब रहीं. यह दर्शाता है कि उस दौर में किस तरह दर्शक इस अभिनेता को दिल से स्वीकार चुके थे. यह सच है   कि उन्हें कई निर्देशकों ने ंिनखारा. कई लोग उनकी कामयाबी में उनके साथ रह.े लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि अमिताभ में अगर टैलेंट न होता तो वह किसी के सहारे इतना लंबा सफर तय नहीं कर पाते. हिंदी सिनेमा को अनुशासन और सिलसिलेवार तरीके से काम करने की आदत अमिताभ ने लगायी. बीच में अमिताभ के कदम लड़खड़ाये. लेकिन फिर अमिताभ उठ कर खड़े हुए. जीरो से शुरुआत की. और फिर वे कामयाब हुए,आज अमिताभ बोलते हैं तो लोग सुनते हैं. उन्हें मानते हैं.क्योंकि अमिताभ और दर्शकों का रिश्ता अटूट हो चुका है. यह विश्वास उन्हें अमिताभ ने दिलाया है. वे असफल रहे. फिर कोशिश की. फिर सफल रहे. फिर 80 के दशक के बाद कई सालों तक अपनी कंपनी एबीसीएल के कर्ज में डूबे. उस वक्त अमिताभ छोटे परदे पर आ गये. वहां आकर उन्होंने अपना दर्शक वर्ग तैयार किये और फिर एक बार वे कामयाब रहे. गिरना, संभलना, फिर गिर कर संभलना. शून्य से शिखर. शिखर स फिर शून्य. और शून्य से फिर शिखर तक सफर तय करना कोई वही व्यक्ति कर सकता है, जिसका सबसे अटूट विश्वास खुद पर हो. उनका आत्मविश्वास ही आज उनकी सबसे बड़ी पूंजी है. और इसी के सहारे वे आज भी 70 की उम्र में हर वर्ग के चहेते हैं. आनेवाली पीढ़ी भी अपनी पहली पीढ़ी से अमिताभ के संघर्ष व सफलता के बारे में इतना कुछ सुन चुकी है कि वह भी अमिताभ से प्रभावित है.
अमिताभ की पर्सनैलिटी की कुछ खास बातें
अमिताभ पुराने लोगों के साथ साथ नये टैलेंट, निर्देशकों का भी प्रोत्साहन बढ़ा रहे हैं. उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर कर रहे हैं. चूंकि वे आनेवाली पीढ़ी के साथ भी कदमताल करते चलना चाहते हैं.
अनुशासन, धैर्य और लगातार काम की भूख उन्हें आज भी फर्स्ट च्वाइस बना रही है.
अभिनेता के साथ साथ एक सुखद परिवार का वाहन करने वाले अमिताभ को आज भी परिवार आदर्श मानते हैं. चूंकि हिंदी सिनेमा में कम ही उदाहरण रहे हैं जो सफल अभिनेता होते हुए भी सफल फैमिली मैन भी हों.
एक्सट््रा शॉट
फिल्म डॉन के गाने खइकेपान बनारस वाला के लिए लगभग हर शॅट के लि 20 बार रिहर्सल किया था  अमिताभ ने. चूंकि वे अभिनय के साथ साथ डांस में भी परफेक्ट होना चाहते थे.
प्रस्तुति : अनुप्रिया

Amitabh special -(3)छोटे परदे पे अमिताभ बच्चन


  
मस्टर बच्चन होस्ट नहीं, मैजिशियन हैं : सिद्धार्थ बासु

कौन बनेगा करोड़पति की परिभाषा अमिताभ बच्चन से है. केबीसी और मिस्टर बच्चन का साथ अब एक दूसरे के बिना अधूरा है. इन 12 सालों में मैंने यही महसूस किया है कि किस तरह हर बार अमिताभ केबीसी को एक नया रूप देते हैं. किस तरह केबीसी की कहानी दिन ब दिन नयी होती जा रही है. इन 12 सालों में आज भी केबीसी में ताजगी नजर आती है तो वह मिस्टर बच्चन की वजह से ही. हिंदी सिनेमा के कई सितारें टीवी पर एंकरिंग कर चुके हैं. लेकिन यह जरूरी नहीं कि जो बेहतरीन कलाकार हों वह बेहतरीन एक्टर भी हों. लेकिन जिस शिद्दत से अमिताभ बच्चन ने छोटे परदे पर अपना नया अवतार लोगों के सामने प्रस्तुत किया. वह कमाल का था. केबीसी समीर नायर की सोच थी. जब वह यह आइडिया लेकर मेरे पास आये तो मुझे आइडिया बेहद पसंद आया था. फिर हमारी सोच इस पर शुरू हुई थी कि हम ऐसे किस व्यक्ति को केबीसी का चेहरा बनाये, जिसके पास स्टाइल भी हो. वह गंभीर भी हो. शो के फॉरमेट के अनुसार लोग उन्हें बौद्धिक भी मानें और जिसके पास मास अपील भी हो. हमारे सामने सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम आया अमिताभ बच्चन. चूंकि मिस्टर बच्चन ही वह पर्सनैलिटी हैं. शख्सियत हैं. जो मास को तो अपील करते हैं. साथ ही उनका अपना स्टाइल भी है. जो लोगों को आकर्षित कर देता है. आज भी इन 12 सालों में मैं हर वक्त उन्हें सेट पर देखता हूं तो आश्चर्यचकित रहता हूं. वह हर बार नये जोश के साथ काम करते हैं. कुछ गलतियां हो तो वे खुद भी टीम से जाकर पर्सनली बात करते हैं. वहां आयी आॅडियंस सुबह से शाम तक सिर्फ इसलिए शांति से बैठती है क्योंकि अमिताभ उन्हें प्यार और स्रेह से आग्रह करते हैं कि आप कहीं न जायें. हमारा सहयोग करें. शाम में हम सब साथ में फोटो खिंचवायेंगे. किसी भी दूसरे व्यक्ति के लिए हर दिन एक तरह का काम लगातार करना बेहद बोरिंग होता . लेकिन मिस्टर बच्चन अपनी सूझबूझ से सबकुछ नया सा कर देते हैं. वे सेट पर सुबह 9 बजे तक आ जाते हैं. लेखक तेलांग के साथ बैठ कर प्रतिभागी की पूरी हिस्ट्री सुनते हैं और फिर बात करते हैं. मैं मानता हूं कि छोटे परदे पर भी अमिताभ आज भी कामयाब हैं. मैं सिर्फ केबीसी की ही नहीं, बल्कि बिग बॉस जैसे शो की बात करूंगा कि वहां भी अमिताभ काफी कामयाब रहे. विज्ञापनों में भी अमिताभ के उपस्थिति ही विज्ञापन का कद ऊंचा कर देती है. चूंकि मिस्टर बच्चन के पास जो सेंस आॅफ ड्रामा है, इलाहाबाद के होने की वजह से आज भी वे लोगों को वहां के ठेठ भाषा में बात करके जोड़ लेते हैं. दो भाषाओं का ज्ञान तो कई लोगों को होता है. लेकिन अमिताभ हिंदी, अंगरेजी व आम आदमी की भाषा के साथ इतनी मधुर भाषा बोलते हैं कि हर कोई उनका कायल हो जाता है. मैं विशेष  कर एक और बात यह भी कहना चाहूंगा कि मिस्टर बच्चन का अनुशासन भी उन्हें छोटे परदे का बादशाह बनाता है. वे बहुत धैर्य के साथ बातें करते हैं. काम के वक्त मैंने कभी उन्हें खींजते हुए नहीं देखा. कोई प्रतिभागी जब उनसे ज्यादा देर तक बातें करता रह जाता है. उस वक्त भी वे उन्हें निराश नहीं करते. चूंकि खुद अमिताभ की जानते हैं कि वे कहां हैं. किस मुकाम पर हैं. लेकिन इस मुकाम पर भी वे आम लोगों से उनकी तरह ही मिलते हैं. सेट पर ही कई बार मैंने देखा है. वे आॅडियंस में आये लोगों के बच्चों को गोद में उठा लेते हैं. कभी अगर किसी की घड़ी अच्छी लग रही है तो वह उनकी तारीफ कर देते हैं. अमिताभ के लि यह बड़ी बात नहीं. लेकिन आम लोगों के लिए यह खास बात हो जाती है कि यह अमिताभ उन्हें कह रहे हैं. शयद उनका यही अंदाज उन्हें लार्जर दैन लाइफ का अभिनेता होने के बावजूद छोटे परदे का जादूगर बनाने में कामयाब है. चूंकि मेरा मानना है कि छोटे परदे का फैन या दर्शक अधिक लॉयल होते हैं. लेकिन बहुत स्थिर नहीं होते. वे केवल उन्हीं लोगों के साथ लंबे समय तक जुड़े रह सकते हैं. जो उन्हें उनकी तरह से जोड़े रखने में कामयाब हो. अमिताभ में वह स्पार्क है. अमिताभ केबीसी या फिर मुझे लगता है कि किसी भी प्रोजेक्ट को 100 प्रतिशत से भी ज्यादा देते हैं. चूंकि आज तक इतने सालों में मैंने उन्हें कभी नहीं देखा कि वह बिना रिहर्सल किये या शूटिंग के दौरान सीन पढ़ते हों. वे पहले से ही सारी तैयारी करके रखते हैं. मिस्टर बच्चन प्राय: यह कहते हैं कि केबीसी का फॉरमेट ग्लोबल है. हिट है. और सिर्फ होस्ट के बदलने से भी शो हिट रहेगा. लेकिन मैं इस शो को अब उनके बिना सोच भी नहीं सकता. वे न तो बिना रिहर्सल के कभी शूटिंग शुरू करते हैं और न भी बिना रिव्यू देखे वाइंड अप करते हैं. चूंकि वे खुद मानते हैं कि उनकी कमियां शो के साथ साथ उनकी छवि को भी धूमिल करेगी. वे पूरे शो में खुद इंवॉल्व होते हैं. ये सब कोई क संवेदनशील अभिनेता, कलाकार और कल्पनाशील व्यक्ति ही कर सकता है. अमिताभ वर्कहोलिक हैं. और उनकी यही खूबी आज उन्हें 70 साल में भी ऊर्जा प्रदान कर रही है. मिस्टर बच्चन में मुझे आज भी हर दिन कुछ ना करने और अपना बेस्ट देने की भूख नजर आती है. यह भूख जिंदा  है. इसलिए वे भी एक्टिव हैं. वह शो के और छोटे परदे पर इंक्रेडिबल फोर्स हैं. मैं उनके लिए एक टर्म यूज करूंगा. कांन्समेट परफॉरमर. मतलब वह   परफॉरमर होने के साथ साथ इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि वह किसी प्रोडक्ट पर कैसे लोगों को यकीन दिलायें. प्रोफेशनली वह मेरे लिए अनुशासित टैलेंट हैं जो कमिटमेंट के साथ अपना काम उत्कृष्टता और जिम्मेदारी से करते हैं. और पर्सनली कहूं तो वे बेहतरीन हास्य अभिनेता भी हैं. उनके जोक्स केबीसी के सेट पर बेहद फेमस हैं. मैं मानता हूं कि मिस्टर अमिताभ की उपस्थिति छोटे परदे पर केवल पैसों का नाम नहीं है. यह क तरह का मैजिक है जो सिर्फ मिस्टर बच्चन ही क्रियेट कर सकते हैं. और यही वजह है कि उनके साथ जुड़ने के साथ सफलता की गारंटी 100 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ जाती है.

Amitabh special-2 ( अमिताभ की जिंदगी में पांच अहम लोग)

उर्मिला कोरी- अनुप्रिया 


अजिताभ बच्चन ( छोटे भाई) : अमिताभ बच्चन कभी फिल्मों में नहीं आना चाहते थे और न ही उन्होंने कभी परिकल्पना की थी. लेकिन भाई अजिताभ को फोटोग्राफी का शौक था और उन्होंने ही भाई अमिताभ को एक दिन कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल ले जाकर अमिताभ की कई तसवीरें लीं. अपनी तरह तरह की तसवीरें. अलग अलग अंदाज में तसवीरें देख कर अमिताभ दंग रह गये थे कि वे भी इतने हैंडसम नजर आ सकते हैं. वहीं से अमिताभ को भी तसवीरें खींचवाने का चस्का लगा. भाई अजिताभ ने अमिताभ की चुनिंदा तसवीरें फिल्मफेयर हंट शो में भेजी थी. लेकिन वहां उनकी तसवीरें चुनी नहीं गयी थी. लेकिन इसके बावजूद अजिताभ मुंबई आकर निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास से मिले. और उन्हें भाई की तसवीरें दिखायी. अमिताभ व अजिताभ जब कोलकाता में रहने लगे थे. उस वक्त वे कई नाटक देखने जाते थे. वहीं से फिर अमिताभ को अभिनय का चस्का लगा. फिर लगातार अजिताभ मुंबई में कई निर्देशकों से मिलते रहे. कई निर्देशकों ने अजिताभ को यह कह दिया कि अमिताभ बहुत लंबे हैं और कई निर्देशकों ने यह कह कर अमिताभ की तसवीरें चयन नहीं की कि अमिताभ इतने लंबे हैं तो इतनी लंबी हीरोइन का मिलना मुश्किल है. लेकिन अजिताभ ने हिम्मत नहीं हारी और आखिरकार भाई की मेहनत भाई के लिए रंग लायी. ख्वाजा अहमद अब्बास ने फिल्म सात हिंदुस्तानी के लिए अमिताभ को चुना.  जलाल आगा की वर्ली स्थित रिकॉर्डिंग कंपनी में भी अमिताभ को उस वक्त भी अजिताभ के कहने पर ही काम पर रखा गया था जब अमिताभ की स्थिति मुंबई में बेहद अच्छी नहीं थी. अमिताभ को 50 रुपये मिलते थे.

सुनील दत्त-नरगिस : ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म सात हिंदुस्तानी के बुरी तरह असफल होने के बाद अमिताभ बेहद हताश हो गये थे. हालांकि अमिताभ कोइसी फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से नवाजा गया था. लेकिन फिर भी अमिताभ का करियर पटरी पर नहीं आ पाया था. अमिताभ को लगा कि उन्हें अब कभी कोई मौका नहीं देगा. इस हताशा के दौर में उनकी मदद सुनील दत्त और नरगिस ने की. नरगिस ने ही सुनील दत्त से अमिताभ के बारे में कहा कि अमिताभ टैलेंटेड है. इस लड़के में बात है. इसे अगला मौका देना ही चाहिए. उ्यके कहने पर ही सुनील दत्त ने मिताभ को फिल्म रेश्मा शेरा में मौका दिलाया. फिल्म में अमिताभ को गंूगे का किरदार मिला. लेकिन उन्होंने इस किरदार को भी बखूबी निभाया.


अनवर अली- मेहमूद: हास्य अभिनेता महमूद के भाई अनवर अली ने अमिताभ की खास मदद की.सात हिंदुस्तानी में अनवर अली ने भी मुख्य किरदार निभाया था. यही से अनवर अली व अमिताभ के बीच दोस्ती हुई.अमिताभ के तंगी हालात में अनवर अली ने अपने भाई मेहमूद द्वारा अंधेरी में दिये गये फ्लैट में अमिताभ को भी रहने के लिए जगह देदी. यहां से दोनों की दोस्ती गहरी हुई. दोनों साथ साथ स्टूडियो देखने जाया करते थे. यहां तक कि मेहमूद ने भाई अनवर अली कार भी दे रखी थी. उस कार में अनवर अमिताभ के साथ जाया करते थे. दोनों उस दौर में संघर्ष कर रहे थे. उसी दौरान अनवर को पता चला कि भाई मेहमूद बांबे टू गोवा बना रहे हैं. तो अनवर ने भाई से अमिताभ के लिए सिफारिश की. मेहमूद ने अमिताभ का लुक टेस्ट लिया और फिर उन्हें अमिताभ पसंद आ गये. बांबे टू गोवा में उन्हें मौका मिल गया. फिल्म में गाने में बस कंडक्टर की भूमिका अनवर ने निभायी और लीड किरदार अमिताभ को दिया गया. इस फिल्म में पहली बार एक गाने की शूटिंग में अमिताभ रात भर सोये नहीं थे. वे अकेले ही गाने की रिहर्सल करते रह गये थे. अमिताभ का यह समर्पण देख कर मेहमूद अमिताभ के मुरीद हो गये थे. बाद के दौर में अनवर अली की फिल्म खुद्दार में दोस्ती निभाने के लिए अमिताभ ने इस फिल्म में काम किया था.

जया भादुड़ी : यहां जया भादुड़ी का जया भादुड़ी के रूप में परिचय इसलिए चूंकि जिस वक्त जया ने अमिताभ को अपनाया था. उस वक्त वह भादुड़ी ही थीं. जया ने अमिताभ का उस वक्त साथ दिया जब वह मिस्टर अमिताभ बच्चन नहीं थे. उस वक्त जया सुपरस्टार थी. क्योंकि उनकी फिल्में लगातार हिट हो रही थीं. लेकिन अमिताभ को खास पहचान नहीं मिली थी. जया ने ही ऋषिकेश दा से अमिताभ को मिलाया. ऋषिकेश दा से सिफारिश की कि वे उन्हें और अमिताभ को लेकर फिल्म बनाये. जया को अमिताभ पर पूरा भरोसा था कि अमिताभ एक दिन सितारा बनेंगे. लेकिन बावर्ची के सेट पर अमिताभ जब भी जया से मिलने आते. राजेश जया को समझाते कि क्यों वह अमिताभ जैसे आदमी में वक्त बर्बाद कर रही हैं. राजेश खन्ना ने उस वक्त कह दिया था कि अमिताभ स्टार बन ही नहीं सकते. लेकिन जया का विश्वास कायम रहा. ऋषिकेश ने उनके कहने पर ही फिल्म मिंली  में अमिताभ को लिया. फिर बाद में चुपके  चुपके, अभिमान में दोनों की जोड़ी हिट रही. हालांकि फिल्म गुड्डी में अमिताभ ने शूटिंग पूरी कर ली थी. लेकिन फिर भी ऋषिकेश दा ने उन्हें हटा कर किसी दूसरे हीरो को ले लिया . यह कह कर कि वे फिल्म में किसी नये चेहरे को लेना चाहते थे. उस वक्त भी जया ने ही अमिताभ का मनोबल बढ़ाया. जंजीर की सफलता ने दोनों को जीवनसाथी बनाया. लेकिन एक सच्चे दोस्त की तरह जया ने अमिताभ की शुरुआती दौर से ही बेहद मदद की थी. किसी लड़की के लिए उस वक्त किसी संघर्षशील व्यक्ति का साथ देना और साथ निभाना बेहद मुश्किल   निर्णय था. लेकिन जया ने उनका साथ दिया.

टीनू आनंद : अमिताभ और टीनू आनंद की दोस्ती भी सात हिंदुस्तानी से ही हो गयी थी. दरअसल, जो किरदार अमिताभ ने सात हिंदुस्तानी में निभाया था वह असल में टीनू को ध्यान में रख कर लिखी गयी थी. लेकिन जब ख्वाजा को अमिताभ की तसवीर देखी तो उन्होंने टीनू को हटा कर अमिताभ को ले लिया. लेकिन इस बात से टीनू को तकलीफ नहीं हुई और उन्होंने अमिताभ के साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ा दिया. अमिताभ के शुरुआती दिनों में टीनू आनंद ने भी अमिताभ की काफी मदद की थी. आर्थिक रूप से भी अमिताभ को टीनू ने किसी दौर में मदद की. मनमोहन देसाई से अमिताभ को मिलवाने वाले टीनू आनंद ही थे. अमिताभ ने दोस्ती निभाते हुए टीनू आनंद की फिल्म शहंशाह में उस वक्त भी शूटिंग पूरी की. जब वह बेहद बीमार थे और डॉक्टर ने उन्हेंआराम लेने की सलाह दी थी. अमिताभ ने टीनू आनंद के साथ कालिया, शहंशाह, मैं आजाद हूं, मेजर साब जैसी फिल्मों में काम किया.

Amitabh spl-1 (70 को पड़ाव क्यों मानूं)



  70 को पड़ाव क्यों मानूं.क्यों मुझे अब और काम नहीं करना चाहिए. मैं जब तक स्वस्थ हूं काम करता रहूंगा. हां, इस बात की खुशी जरूर है कि मुझे 70 सालों में अपने परिवार का और अपने फैन का साथ मिला है और मेरी 43 साल की मेहनत का यही धरोहर है. मन में बस एक मलाल है कि बाबूजी का साथ और मिला होता... अपने 70वें जन्मदिन पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन बस यही कामना करते हैं कि आगे भी उन्हें फैन से प्यार मिलता रहा रहे. 70वें जन्मदिन के खास मौके पर उन्होंने अपने जीवन के सफर के कुछ पहलुओं और लम्हों के बारे में खास बातचीत

अमित जी, सबसे पहले आपको आपके जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई
जी बहुत बहुत शुक्रिया.

आपने अपने जीवन के 70 बसंत देख लिये हैं. किस तरह की संतुष्टि है. जो कभी सोच रखा था. क्या अब लगता है कि हां, मेरा सपना पूरा हुआ.
ंहमारा तो सपना था. कि हम बाबूजी के साथ और वक्त गुजारें. लेकिन बाबूजी जल्दी साथ छोड़ कर चले गये. हां, लेकिन इस बात की खुशी है कि उनके आशीर्वाद से आज कम से कम हम अपने और अपने परिवार का ख्याल रख पा रहे हैं तो इस बात की संतुष्टि है. बाबूजी चाहते थे कि उनका बेटा कुशल परिवार का वाहक बनें. तो इतना कर पाया हूं कि उनकी कसौटी पर खरा उतरा.

लोगों का मानना है यहां तक कि अभिषेक का भी मानना है  कि आप वर्ककोलिक हैं. बहुत ज्यादा काम करते हैं. आपको नहीं लगता कि अब थोड़ा आराम करना चाहिए.
देखिए, एक बेटे की पिता के लिए चिंता होती है. अभिषेक की भी है. लेकिन मैं तो यही कोशिश करता हूं कि जब तक शरीर साथ दे काम करेंगे. वैसे 70 साल की उम्र होने पर खुद शरीर कई बार आपको रोकने टोकने लगती है. हो गया. अब और काम न हो. ऐसे में शरीर को भी समझाना पड़ता है. कि अभी थोड़ा और हो जायेगा. दूसरी बात है कि मैं काम के बिना नहीं रह पाऊंगा. काम करता रहता हूं तो खुद को तंदरुस्त महसूस करता हूं. बाकी आराम तो होता रहेगा.

आपके इंडस्ट्री में 43 साल दे दिये. हिंदी सिनेमा में आपका खास योगदान है. तो किन किन का शुक्रिया अदा करना चाहेंगे.
हां, मुझे खुशी है कि मैंने 43 साल इस इंडस्ट्री में गुजारे और इस इंडस्ट्री ने लोगों ने प्यार सम्मान गिया. सुखद रहा अनुभव. मैं इस पड़ाव पर आकर सबसे पहले ख्वाजा अहमद अब्बास का शुक्रिया अदा करना चाहंूगा. उन्होेंने मुझे पहला मौका दिया. पहला मौका जिंदगी में हमेशा अहम होता है. सो वह हमेशा मेरे पूज्नीय रहेंगे. ऋषिकेश दा के साथ मैंने सबसे ज्यादा फिल्में की और उन्होंने मुझसे हर तरह के किरदार निभायें. सो उनका भी शुक्रिया. सलीम जावेद साहब ने इतने खूबसूरत स्क्रिप्ट लिखे कि मुझे दीवार, जंजीर, शोले जैसी फिल्मों में काम करने का मौका मिला. यश चोपड़ा साहब का भी तहे दिल से शुक्रगुजार रहूंगा. मनमोहन देसाई, रमेश सिप्पी, मुकुल आनंद, प्रकाश मेहरा. सबका शुक्रगुजार रहूंगा. उस दौर में वाकई सारे निर्देशकों ने इतने सुंदर सुंदर फ्रेम बनायी मेरी. मुझे निखारा. मेरा अलग अलग रूप दर्शकों तक पहुंचाया. उन लोगों की वजह से ही पहचान मिली तो उनका शुक्रगुजार रहूंगा.हाल के दिनों की बात करें तो मुझे करन, आदित्य चोपड़ा, आर बाल्की और सुजोय घोष जैसे निर्देशकों ने बेहतरीन मौके दिये हैं. अच्छा लगता है इनके साथ काम करना.
अमित जी, आपको कभी अपना कोई खास जन्मदिन याद है. जब बाबूजी से खास तोहफा मिला हो.
देखिए, हमारा जन्मदिन भी आम बच्चों की तरह ही मनाया जाता था. हां, लेकिन अच्छा लगता था. मोहल्ले के दोस्त आते थे. बाबूजी के कुछ दोस्त आते हैं. हां, लेकिन यह जरूर है कि सबसे ज्यादा इंतजार तोहफे का ही करता था. बाबूजी तो हमेशा जब भी बाहर जाते थे तो हमारे लिए कोई न कोई टॉफी ले आते थे. उस जमाने में हम उसे लेमन चुस कहते थे. और खास तोहफे की जहां तक बात है. तो ऐसा कुछ याद नहीं है.

अमित जी, अगर वर्तमान की बात करें तो 70 साल की उम्र में पहुंच कर आप अपनी जिंदगी का सबसे अहम तोहफा किसे मानेंगे.
ईश्वर ने सबसे पहले अभिषेक और श्वेता के रूप में मुझे खास तोहफा दिया, इसके बाद श्वेता के बच्चे और अब अभिषेक और ऐश्वर्य की बेटी आराध्या मेरे जीवन के सबसे खास तोहफे हैं. मुझे लगता है कि अगर ये लोग भी खुश रहेंगे तो मुझे लगेगा कि मैंने अपनी जिंदगी में सबकुछ पा लिया है.

आज भी आप वक्त के इतने पाबंद कैसे हैं?
यह हमारी आदत बन चुकी है. अगर हमने कहीं खुद को अनुबंधित कर लिया है तो यह हमारा कर्तव्य है कि हमें वक्त पर पहुंचना ही चाहिए. आखिर एक निर्माता कितने पैसे लगाकर हमारे साथ काम करता है तो हमारा यह फर्ज है कि हम वक्त पर पहुंचे. मैं तो अभिषेक को भी डांटता हूं. जब वह कहीं देरी से पहुंचते हैं.

आपने उस दौर के भी कई निर्देशकों के साथ काम किया है. आज भी आप लगातार नये निर्देशकों के साथ काम कर रहे हैं. क्या क्या बदलाव नजर आते हैं?
कई बदलाव है. उस वक्त स्क्रिप्ट अलग तरीके से लिखी जाती थी. हाल ही में एक नये दौर के निर्देशक से बात कर रहा था. मैंने पूछा कि आज कल फिल्मों के संवाद फ्लावरी और गंभीर क्यों नहीं होते?तो मुझे उन्होंने बताया कि आज कल लोगों के पास इतना वक्त नहीं कि वह गौर करते हुए स्क्रिप्ट को पढ़े. सो, बोलचाल की भाषा को ही रखा जाता है. आज   सिनेमा ने रफ्तार पकड़ ली है. शॉट फटाफट निकल जाते हैं. हम फ्रेम को चंद सेकेंड के लिए होल्ड नहीं कर पाते. तेज रफ्तार वाली एडिटिंग होती है.दर्शकों का अटेशन स्टैंड नहीं होता. लेकिन ठीक है, हर दौर के साथ सिनेमा बदला है. आज युवा डिक्टेट करते हैं कि उन्हें किस तरह का सिनेमा देखना है. लेकिन फिर भी मुझे युवाओं के जोश और जुनून को देख कर अच्छा लगता है. आज लोग ज्यादा काम करना चाहते हैं. हर कोई लगा रहता है. मेहनत करता रहता है. मुझे ऐसी टीम को देख कर अच्छा लगता है.

आपने 180 फिल्मों से भी ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया. कभी ऐसा लगा कि यह किरदार नहीं करना चाहिए था. यह िफल्म चुनने में भूल हो गयी.
देखिए, जिस वक्त स्क्रिप्ट लिखी या चुनी जाती है. उस वक्त हमें स्क्रिप्ट अच्छी लगती होगी किरदार पसंद आया होगा. तभी हम हामी भरते हैं. फिल्म चलना न चलना बाद की बात है. मुझे ऐसा कभी मलाल नहीं रहा. चूंकि मैं एक बार निर्देशक के साथ हां बोल देता हूं तो फिर सब उन पर निर्भर करता है. कि उन्हें कैसे काम करवाना है.

आपको अब तक इतने नाम मिल चुके हैं. शहंशाह, बादशाह, बिग बी आपको खुद को क्या समझना पसंद है.खिताब तो सब आप लोग दे देते हैं. बाबूजी ने हमारा नाम अमिताभ बच्चन रखा है. तो वही कहलाना पसंद है.लोग आपको आदर्श मानते हैं? 
अरे नहीं नहीं. मैं नहीं मानता कि मैंने कुछ भी महान काम किया है और मैं किसी को कुछ सीखा पाऊंगा. हां, अगर मुझसे कोई सीख सके तो मैं बस यही कहना चाहूंगा कि जीवन में अनुशासन हो तो आप कोई भी काम आसानी से कर सकते हैं.
लेकिन आप लगातार काम कर रहे हैं. इतनी ऊर्जा कहां से मिलती है?आप दिन ब दिन और युवा नजर आते हैं.
हाहाहा, मेरे डॉक्टर से पूछिए कि मैं कितना जवान हुआ हूं. आंखें कमजोर हो गयी हैं. कई परेशानियां हैं शरीर में. और आप लोगों को लगता है मैं जवान हो गया हूं. ऐसा नहीं है. बुढ़ापे की सारी परेशानियां मुझे भी हैं. लेकिन मेकअप मैन दीपक सावंत का कमाल है कि वह मेकअप ही ऐसा करते हैं कि आपको हमारे चेहरे पर उम्र का पता नहीं चलता.( दीपक सावंत की तरफ ईशारा करते हुए) यही हैं हमारे चेहरे के रक्षक़. लेकिन हां, अपने काम में मैं जोश रखना चाहता हूं और वह जोश मुझे मेरे परिवार और बाबूजी की रचनाओं से मिलती है.

आप सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बेहद एक्टिव रहते हैं.
हां.क्योंकि मेरी जिंदगी में मेरो दो ही दोस्त हैं. मेरा परिवार और मेरे फैन. इस माध्यम से मैं सीधे तौर पर दर्शकों से संपर्क बना पाता हूं. यहां आने से हुआ यह है कि आप फिल्मी बिरादरी से बाहर की दुनिया को भी देख समझ पाते हैं.कई बार हमारे लिए आम चीजें जानने का मौका नहीं मिल पाता. तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम लोगों से सीधा संपर्क बनता है. लोगों का जानने समझने का मौका मिलता है.

अब तक का आपना अपना सबसे पसंदीदा किरदार?
यह तो आप ऐसा सवाल पूछ रहे हैं कि अभिषेक श्वेता में किसे ज्यादा प्यार करता हूं. सारे किरदार खास रहे हैं. अहम रहे हैं.
आपके रोल मॉडल 
हमेशा माता पिता रहे हैं. खासकर बाबूजी. और एक्टिंग में वहीदा रहमान दिलीप साहब का फैन रहूंगा.

70 साल की उम्र में भी आप सबसे अधिक व्यस्त अभिनेता हैं?
हां, ( हंसते हुए) सुबह जल्दी उठने की आदत है न. तो इतना समय रहता है दिन का. तो सोचता हूं काम में व्यस्त रहूं.
आनेवाले समय से उम्मीदें
बस दर्शकों का प्यार यूं ही मिलता रहे. काम मिलता रहे. और जब तक कर सकूंगा. दर्शकों का मनोरंजन करता रहूंगा. और बहुत ज्यादा कुछ योजना सोच कर नहीं चला हूं.