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20120628

किंग खान के फरिश्ते

शाहरुख का बंगला मत्रत अभी जिस स्थान पर है, वहां कभी सलमान हैंगआउट किया करते थे.डीप फोकसलीवुड के बादशाह शाहरुख खान अब इंडस्ट्री में 20 साल पुराने हो चुके हैं. 20 साल पहले 25 जून को दिल्ली के एक सामान्य परिवार के इस लड़के ने बॉलीवुड में फिल्म ‘दीवाना’ से अपने कैरियर की शुरुआत की थी, लेकिन मुख्य किरदार निभाने का मौका उन्हे फिल्म ‘दिल आशिना’ से मिला. जिसे हेमा मालिनी ने निर्देशित किया था. कम लोग ही जानते होंगे कि शुरुआती दौर में शाहरुख ने ऐसी कुछ फिल्मों में भी काम किया था, जिसमें उन्होंने 2 मिनट के दृश्यों में भी भूमिका निभायी थी. पहली बार जब वह फिल्मफेयर अवार्ड लेने मंच पर गये थे. अभिनेत्री रेखा के हाथों उन्हें पहला पुरस्कार मिला था. उन्होंने उस वक्त बेहद सामान्य सा परिधान पहन रखा था. वे इस कदर खुश थे कि उन्हें शब्द नहीं मिल रहे थे. उन्होंने ईमानदारी से कई बातें कही थी. पहली बात जो उन्होंने कही थी वह यही कि पूरी दुनिया कहती थी कि वे अभिनेता नहीं बन सकते थे, लेकिन उनकी अम्मी जान ने उनसे कहा था कि उनके फरिश्ते हमेशा उनके लिए सकारात्मक ऊर्जा लेकर आयेंगे. अम्मी की वह बात सच हुई और उनके फरिश्तों ने उनकी हर मत्रत पूरी की. यही वजह है कि उन्होंने अपने घर का नाम भी मत्रत ही रखा. डर, अंजाम जैसी फिल्मों में खलनायक के रूप में खुद को साबित करनेवाले शाहरुख ने जब रोमांटिक किरदार निभाने शुरू किये थे. लोगों को यही लगा था कि वे नहीं कर पायेंगे. चूंकि वे बेहद सामान्य से कदकाठी के थे. लेकिन उन्होंने अपनी बादशाहत रोमांटिक हीरो के रूप में कायम की. उन्होंने अपने अभिनय शैली का लोहा यूं मनवाया कि राज की दीवानी दुनिया की सभी लड़कियां हो गयीं. इन 20 सालों में उन्होंने हालांकि अपनी कई बार इमेज बदली. लेकिन यश राज की फिल्म से वह फिर से रोमांटिक हीरो के रूप में स्थापित होने जा रहे हैं

बाबुल की दुआ से वंचित बेटी

दीवा हेमा मालिनी व लीजेंडरी धर्मेंद्र की बड़ी बेटी ऐशा 29 जून को परिणय सूत्र में बंधने जा रही हैं. शादी का जश्न पिछले चार दिनों से जारी है. मुंबई में हर तरफ ऐशा की संगीत व मेहंदी सेरेमनी के बारे में ही बातें हो रही हैं. शादी के रिसेप्शन का खास आयोजन किया जा रहा है, लेकिन इन तमाम तामझामों के बीच एक विशेष व्यक्ति की अनुपस्थिति ने सबको चौंका दिया. वह हैं धर्मेंद्र. एक पिता होने के नाते धर्मेंद्र को अपनी बेटी की शादी के हर आयोजन में शामिल होना चाहिए था, लेकिन वे संगीत सेरेमनी में शामिल नहीं हुए. हेमा मालिनी ने शुरुआती दौर से ही अपनी बेटियों की परवरिश मां और पिता दोनों के रूपों में की है. हेमा मालिनी धर्मेंद्र की दूसरी पत्नी हैं और दोनों ने प्रेम विवाह किया था. धर्मेंद्र और हेमा मालिनी आज भी एक दूसरे से अलग नहीं हैं, लेकिन हर मोड़ पर संग-संग भी नहीं दिखते. पिता होने के बावजूद धर्मेंद्र अलग-थलग हैं. क्या एक पिता की जिम्मेदारी केवल पैसे खर्च कर देने भर से हैं. धर्मेंद्र ने निस्संदेह हेमा से बेहद प्रेम किया, लेकिन एक पिता के रूप में उन्होंने जो जिम्मेदारी सनी व बॉबी के लिए निभायी. ऐशा और अहाना उस प्यार से हमेशा वंचित रही. हेमा बेटी की संगीत सेरेमनी में दिल खोल कर नाचीं. उनके चेहरे की खुशी बता रही है कि वे जो खुशियां खुद हासिल नहीं कर पायीं, वे हमेशा चाहेंगी कि ऐशा को वह खुशियां मिले. हेमा ने एकल नेतृत्व में भी अपनी दोनों बेटियों की परवरिश बेहतरीन ढंग से किया. ऐशा की अंतिम फिल्म ‘टेल मी ओ खुदा’ में उन्हें अपने पिता की तलाश थी. सच तो यह है कि वास्तविक जिंदगी में भी उन्हें हमेशा अपने पिता की तलाश रहेगी. ऐशा के मन में कहीं न कहीं यह सवाल जरूर उठ रहा होगा. क्या सिर्फ सरनेम देने से ही पिता की जिम्मेदारी पूरी हो जाती हैं

ब्रेक के बाद ब्रेक



टेलीवुड में नये चेहरों को खूब मौके मिल रहे हैं. ऐसे में कुछ कलाकारों को लगातार कई धारावाहिकों में मुख्य किरदार निभाने का मौका मिलता रहा है, लेकिन ज्यादातर कलाकार ऐसे हैं जो दूसरे धारावाहिकों में सहयोगी की भूमिका में नजर आने लगते हैं. 
टेलीविजन को लगातार नये चेहरों की तलाश रहती है. यही वजह है कि किसी धारावाहिक में मुख्य किरदार निभाने के बाद दूसरे धारावाहिकों में फिर मुख्य किरदार पाने के लिए कलाकारों को बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती है. कुछ कामयाब हो पाते हैं तो कुछ नहीं. प्रोडक्शन हाउस द्वारा किये गये श्रम शोषण के बारे में भी कलाकार खुल कर सारी बातें नहीं रख पाते, क्योंकि उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. गौर करें तो टेलीविजन में जिन किरदारों को मुख्य किरदार मिलते आये हैं, उन्हें दूसरे धारावाहिकों में सहयोगी के रूप में देखा जाता है.
कुछ चुनिंदा नामों को छोड़ दें तो. इस पर निर्माता का तर्क है कि नये शोज को नये चेहरे चाहिए. लेकिन वे कलाकार जो मुख्य भूमिका निभा चुके रहते हैं, उन्हें फिर सहयोगी किरदार निभाने में भी परेशानी होती है. ऐसे कई अच्छे कलाकार भी हैं जिन्हें एक शो से जितनी लोकप्रियता मिली, दोबारा फिर किसी शो में नहीं मिली. वहीं दूसरी तरफ कुछ कलाकारों को लगातार काम मिल रहा है और वे कामयाब भी हो रहे हैं. एक दृष्टिकोण से नये चेहरों को मौके तो मिलते हैं, लेकिन पुराने चेहरों के लिए इंडस्ट्री में पहचान स्थापित रखने तक में उन्हें परेशानी हो जाती है. मजबूरन उन्हें छोटे किरदार निभाने पड़ते हैं. या फिर अभिनय छोड़ कर एंकरिंग या होस्टिंग में अपना भाग्य आजमाना पड़ता है.
जिन्हें नहीं मिल रहे मौके
एक दौर में रतन राजपूत ने धारावाहिक अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो से एक सशक्त पहचान स्थापित की थी. इस शो से वह ललिया के रूप में घर-घर की चहेती बनीं. लेकिन अच्छी कलाकार होने के बावजूद अब तक वह किसी नये शो में नजर नहीं आ रही हैं. हालांकि, उन्होंने स्वयंवर से कुछ सुर्खियां जरूर बटोरीं. इस शो से पहले राधा की बेटियां कुछ कर दिखायेंगी में उनकी बेहतरीन अदाकारी से ही प्रभावित होकर उन्हें लाली का किरदार मिला था.
कुछ इसी तरह मिले जब हम तुम के मोहित सहगल अब तक किसी शो में मुख्य किरदार में नजर नहीं आये. जबकि उनके ही साथी कलाकार सनाया ईरानी, अजरुन बिजलानी, रति पांडे नये शोज में मुख्य किरदार निभा रहे हैं. कुछ इसी तरह पार्वती भाभी का किरदार निभानेवाली साक्षी तंवर को भी लंबे इंतजार के बाद प्रिया का किरदार मिला. श्वेता तिवारी ने जो पहचान कसौटी जिंदगी से बनायी थी, उसे वह बरकरार नहीं रख पायीं. हालांकि, वह परवरिश शो में मां के किरदार में हैं, लेकिन कुछ खास छाप नहीं छोड़ पा रही हैं. सुशांत राजपूत पवित्र रिश्ता फेम रहे हैं, लेकिन वर्तमान में उनके पास कोई शो नहीं है.
रश्मि संधू, नंदिश संधू उतरन के फेम कलाकार थे, लेकिन अब वे भी व्यस्त नहीं हैं. हितेन तेजवानी कभी टेलीविजन के चहेते कलाकार थे. उन्हें कुटुंब के बाद क्योंकि से भी पहचान मिली थी. लेकिन इसके बाद उनके कॅरियर में लंबा ब्रेक आ गया था. हालांकि अब उन्हें पवित्र रिश्ता व क्या हुआ तेरा वादा में काम करने का मौका मिल रहा है. प्रदीप सरकार को लंबे अरसे के बाद धारावाहिक क्या हुआ तेरा वादा में काम मिला. मौली गांगुली, रुपाली गांगुली भी इन्हीं नामों में शामिल हैं. जगिया का बाल किरदार निभा चुके अविनाश को भी किसी शो में नहीं देखा जा रहा है. शिल्पा अग्निहोत्री भी क्योंकि की खास पहचान थीं, फिलवक्त वह पार्टियों में नजर आती हैं. जूही परमार दोबारा किसी धारावाहिक में नजर नहीं आयीं. अंगद हंसिजा को दोबारा बड़ा ब्रेक नहीं मिला.
जिन्हें लगातार मिले मौके
हालांकि, कुछ कलाकार इस लिहाज से बेहद भाग्यशाली रहे हैं कि उन्हें एक के बाद एक लगातार शोज में मुख्य किरदार निभाने का मौका मिलता रहा. इनमें सबसे पहला नाम आता है गुरमीत चौधरी का. गुरमीत को रामायण के बाद गीत का किरदार मिला. इसके बाद वह पुनर्विवाह में मुख्य किरदार निभा रहे हैं.
इसके अलावा वह डांसिंग शो झलक के भी प्रतिभागी हैं. कुछ इसी तरह सनाया ईरानी व वरुण सोबती को इस प्यार को क्या नाम दूं से दोबारा मौका मिला. रति पांडे हिटलर दीदी में नजर आ रही हैं. किंशुक महाजन को अफसर बिटिया में मौका मिला. हालांकि, पारुल और साधना को भी शोज मिले. लेकिन जितनी सफलता उन्हें पहले शो से मिली थी वे उतना कामयाब नहीं हो पायीं. राम कपूर ने लगातार काम किया है. ब्याह हमारी बहू का में मुख्य किरदार निभा रहे गौरव खन्ना को भी लगातार काम करने का मौका मिला. उन्होंने अब तक 4 धारावाहिकों में मुख्य किरदार निभाया है. शरद केलकर लगातार काम करते रहे हैं.
कृतिका कामरा को लंबे दौर के बाद लेकिन कुछ तो लोग कहेंगे में वापसी से सफलता मिली. मोहनीश बहल लगातार काम करते रहे हैं. समीर सोनी को लंबे अंतराल के बाद परिचय में मुख्य भूमिका निभाने का मौका मिला. रेणु पारेख को हवन के बाद जल्द ही दूसरे धारावाहिक ब्याह हमारी बहू का में मौका मिल गया.
कोई एंकर, तो कोई बाहर
ऐसे कई कलाकार हैं, जिन्होंने अभिनय के साथ एंकरिंग भी की. इनमें मोना सिंह, रागिनी खन्ना, जय सोनी जैसे नाम प्रमुख हैं.
दूसरी ओर कुछ ऐसे नाम भी हैं जो किसी जमाने में बेहद लोकप्रिय थे. लेकिन अभी अभिनय से बाहर हैं. इनमें गौरी प्रधान, शिल्पा, पूनम, मानव गोविल, मालिनी डे, तनाज बख्तियार जैसे नाम प्रमुख हैं

डेली सोप की मनी पॉकेट



अकसर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि बॉलीवुड के कलाकार अच्छा मेहनताना लेते हैं. अब खबर यह भी है कि इस मामले में अब छोटे परदे के कलाकार भी कुछ कम नहीं हैं. अब टेलीवुड के कलाकार भी अपनी लोकप्रियता के अनुसार अपना मेहनताना ले रहे हैं. 
वह दौर गया, जब टीवी के कलाकारों को कम पैसों में मजबूरन अपना गुजारा करना पड़ता था. जैसे-जैसे टेलीविजन के दर्शक बढ़ रहे हैं, टेलीवुड एक्टर्स की लोकप्रियता भी बढ़ रही है. इसी के चलते कलाकारों ने अपना मेहनताना बढ़ा दिया है. यह इसलिए भी, क्योंकि इन दिनों कई प्रोडक्शन हाउस की शुरुआत हो चुकी है.
यही वजह है कि कई टेलीविजन स्टार अब छोटे परदे से ही खुश हैं. यहां कलाकारों को उनकी लोकप्रियता के अनुसार प्रतिदिन पैसे दिये जाते हैं. गौरतलब है कि एकता कपूर अपने पसंदीदा कलाकारों का पूरा ख्याल रखती हैं और उन्हें अच्छा मेहनताना देती हैं. हालांकि इसके बावजूद कि टेलीविजन महिला प्रधान है, कुछ लोकप्रिय पुरुष कलाकारों को भी महिलाओं से अधिक मेहनताना मिलता है.
रॉनित रॉय
रॉनित रॉय पिछले कई सालों से लगातार टेलीविजन पर काम कर रहे हैं और यही वजह है कि उनकी लोकप्रियता बरकरार है. इस वक्त वह सबसे अधिक मेहनताना लेने वाले टीवी कलाकारों में से एक हैं. वे एक दिन के 1.25 लाख रुपये लेते हैं. फिलहाल वह अदालत में नजर आ रहे हैं. रॉनित की अपनी सेक्योरिटी सर्विस भी है.
राम कपूर
राम कपूर एकता कपूर के पसंदीदा कलाकारों में से एक हैं और बड़े अच्छे लगते हैं शो में नजर आ रहे हैं. राम कपूर अपनी एक दिन की शूटिंग के 1 लाख रुपये लेते हैं. राम टीवी में अब काफी सीनियर भी हो चुके हैं. फिल्मों में लगातार काम मिलने की वजह से उनकी डिमांड बढ़ गयी है.
मोना सिंह
मोना सिंह अभी क्या हुआ तेरा वादा में नजर आ रही हैं. वे मुख्य भूमिका निभाने के लिए प्रतिदिन 70 से 80 हजार लेती हैं. वे शोज में एंकरिंग करती हुई भी लगातार नजर आती रहती हैं.
साक्षी तंवर
साक्षी तंवर भी बेहतरीन अदाकारा हैं और काफी समय से टेलीविजन पर सक्रिय हैं. इस वक्त वे 60 से 90 हजार रुपये प्रतिदिन का मेहनताना लेती हैं.
प्रत्यूषा
प्रत्यूषा बनर्जी बालिका वधू कर रही हैं. हालांकि यह उनका पहला शो है. लेकिन लोकप्रिय होने की वजह से उन्हें 40-50 हजार प्रतिदिन का मेहनताना मिलता है. कम उम्र की कलाकार में वे सबसे लोकप्रिय अदाकारा हैं,
इसके अलावा श्वेता तिवारी, गुरमीत चौधरी को लगभग 70 से 80 हजार रुपये प्रतिदिन मेहनताना मिलता है. आश्चर्यजनक बात यह है कि अनस राशिद जो टेलीविजन के नंबर वन शो दीया और बाती में मुख्य किरदार निभा रहे हैं उन्हें प्रतिदिन केवल 15 से 20 हजार ही मिलते हैं

20120625

जेएनयू में सिनेमा का मंच

अभिनेत्री  सोनम कपूर फिल्म ‘रांझना’ में जेएनयू में पढ.ाई कर रही एक लड़की का किरदार निभा रही हैं. इस किरदार को निभाने के लिए सोनम जल्द ही जेएनयू कैंपस में कुछ वक्त बितायेंगी. यह बात जगजाहिर है कि जेएनयू दिल्ली व भारत की अन्य यूनिवर्सिटी में बिल्कुल अलग सोच रखता है. वहां का एजुकेशन कल्चर बिल्कुल भित्र है. सभी जानते हैं कि वहां राजनीति, समाजिक मुद्दे आदि पर गंभीर बातें होती हैं. ऐसे में निश्‍चित तौर पर अगर सोनम कपूर वहां की छात्रा का किरदार निभा रही हैं, तो उन्हें वहां की सभ्यता का बारीकी से अध्ययन करना होगा. दरअसल, धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा जगत व इससे जु.डे लोग जेएनयू से जुड़ाव कर रहे हैं. गौरतलब है कि बलराज साहनी हिंदी सिनेमा जगत के पहले अभिनेता थे, जो वर्ष 1972 में जेएनयू गये थे. जेएनयू के क्रांतिकारी छात्र चंदू पर फिल्म बनाने की तैयारी है. हालांकि ऐसा नहीं है कि जेएनयू में फिल्म पर बातचीत नहीं होती या वहां फिल्म सोसाइटी नहीं. लेकिन हाल के दिनों में सिनेमा के लोगों की उपस्थिति वहां बढ. रही है. जेएनयू के ही पासआउट रहे छात्रों के प्रयासों से इन दिनों जो लीक से हट कर फिल्में बन रही हैं, उनके पात्र, निर्देशक सिनेमा पर बात करने लगातार वहां जा रहे हैं. चूंकि इन्हें भी ग्लैमर से अलग ईमानदारी से बात रखने और सुनने का एक बेहतरीन मंच मिल रहा है. डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी, मनोज बाजपेयी, पान सिंह तोमर के बाद इरफान, शंघाई की टीम, फिर गैंग्स को लेकर अनुराग भी वहां गये और वहां के छात्रों से बात की. बेबाक तरीके से विचारों व सवालों का आदान-प्रदान हो रहा है. फिल्म प्रोमोशन से इतर एक आम मंच पर लोगों से मिलने का यह नयी संस्कृति निश्‍चित तौर पर सिनेमा को आम लोगों के सोच से जो.डेगी

20120622

भूसे के ढेर में राई का दाना- गैंग्स ऑफ़ वासेपुर


भूसे के ढेर में राई का दाना ...अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स के ही फिल्म के एक गीत के बोल है. जिसका तात्पर्य शायद यही है कि भूसे के ढेर में एक राइ के दाने को  तलाशना जितना जटिल काम है. उनकी फिल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में  उनके विजन को समझना उतना ही कठिन है. लेकिन अगर आप अपनी समझ से उस राइ के दाने की तलाश में भूसे में घुसने की कूबत रखते हैं तो यकीं मानिये परत दर परत यह फिल्म आपको एक साथ कई पहलुओं से अवगत कराती है. जो आपको चौंकाती भी है. डराती भी है. तो कई सच्चाइयों से सामना भी कराती है. तो कई मायनों में आईना भी दिखाती है.


बहस हो रही है, मतलब कामयाब है film
गैंग्स ऑफ़ वासेपुर आज रिलीज हुई है. और लगातार जमकर  प्रतिक्रिया आ रही है. नेगेटिव भी. पोजिटिव भी. लोग बहस कर रहे हैं. फिल्म के रिलीज से पहले से बहस तलब हो रही है. मेरा मानना है कि वे फिल्में जिनपर फिल्म की मेकिंग से लेकर फिल्म रिलीज होने के बाद भी लोग बात करें. तो यही फिल्म की कामयाबी है. चूँकि, लगातार कई लोग अपनी अपनी सोच से जब बात रखते हैं तो निर्देशक को भी उनमे एक नया नजरिया मिलता है और संतुष्टि भी. क्यूंकि कुछ राय तो वो आ जाते हैं सामने जो वाकई निर्देशक ने सोच आकर फिल्म में दिखाई है. और कुछ ऐसे भी जो निर्देशक ने नहीं सोचा.वह भी उसे दर्शकों की नजर से जानने का मौका मिलता है. 
वरना,  हिंदी फिल्मों में गिनीचुनी ही तो फिल्में आ रही हैं.जिनपर बहस भी हो. लोग अपने अपने एंगल से राय रख सकें. प्राय: तो फिल्म कैसी है. देखें की नहीं देखें तक बात ख़त्म हो जाती है. तो बहस के मानक पर फिल्म की कामयाबी तय करें तो इधर रॉकस्टार ,पान सिंह तोमर , डेली बेली, डर्टी पिक्चर, शांघाई और अब गैंग्स ऑफ़ वासेपुर उन कामयाब  फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल है.
दिमाग से नहीं दिल से कनेक्शन 
बहरहाल, मेरा नजरिया आज रिलीज हुई गैंग्स... पर. यह प्रतिक्रिया एक पत्रकार के नजरिये से नहीं, बल्कि झारखंड के बोकारो शेहेर में बिताये अपनी जिंदगी के अहम् २० सालों के आधार पर हैं. एक आम दर्शक और एक छोटे शहर के परिवेश के आधार पर. इसे मेरी सोच में ब्यास्नेस भी समझा जा सकता है  कि मुझे वो फिल्में प्रभावित करती हैं जिनसे मैं खुद को कनेक्ट कर पाती हूँ. ऐसे फिल्मों से मैं दिमाग से जयादा दिल से कनेक्ट हो पाती हु. फिर चाहे वो कुछ कुछ होता है जैसी प्रेम कहानी हो, या फिर देसवा जैसी भोजपुरी फिल्म हो या फिर गैंग्स. चूँकि ऐसी फिल्मों पे मैं अपनी इमानदार और आँखों देखी. या अपने अनुभवों के आधार पर अपने विचार रख पाती हूँ.गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर इस लिहाज से मुझे प्रभावित करती है. 
चीनी मिटटी के बर्तन और स्टील के बर्तन के बीच की  खाई 
धनबाद बोकारो से १.५ घंटे की दूरी पर स्थित है. यह सच है कि वासेपुर को फिल्म से पहले मैं सिर्फ नाम से जानती थी. लेकिन इसके बावजूद फिल्म देखने के बाद मैंने कई चीजों से कनेक्ट किया. क्यूंकि फिल्म में दिखाए गए कई हालात, कई घटनाएं या दृश्य बोकारो और उससे जुड़े आसपास के इलाकों से मेल खाती हैं. 
एक हिन्दू के घर मुस्लमान आता है. और नेता की पत्नी अपनी नौकरानी से कहती है..चीनी मिटटी के बर्तन में देना. मुस्लिम है. समझी न...ऐसा वास्तविक जिंदगी बोकारो और उससे जुड़े हर मोहल्ले होता होगा. चूँकि धर्म के नाम पर आज भी लोगों की मानसिकता यही है. खुद हमारे घर हमारी दादी कभी भी मुस्लिमों के घर से आये किसी भी प्रकार के खाने को चीनी मिटटी के बर्तन में ही रखवाती थी. मेरी माँ की दोस्ती शादी से पहले मुस्लिम लड़कियों से रही है. सो, माँ वह खाने देख कर उत्साहित हो जाती थी. लेकिन मेरी दादी की तरफ से पाबन्दी थी.  हम बच्चों को भी खाने की इज्जाजत नहीं थी. 
फिल्म में भले ही यह छोटा सा दृश्य हो. लेकिन इसमें गहरी सोच है. यह वहां के समाज की सोच का आईना प्रस्तुत करता है. दरअसल, यह दरसता है कि चीनी मिटटी के बर्तन और स्टील के बर्तन के  बीच की  खाई क्या है. इस समाज की खाई क्या है. क्यों आज भी धर्म के आधार पर छुआ छूत की भावना प्रबल है.  यह अनुराग और उनके लेखक की बारीकी और उस जगह की सोच को लेकर उनकी इमानदारी को झलकता है.
 फिल्म के लेखक जीशान खुद वासेपुर से हैं. इससे साफ़ है कि उन्होंने बिना किसी आधार पर फिल्म को तथ्य नहीं दिए होंगे. और अनुराग आम निर्देशकों में से तो है नहीं. जो आँख मुंध कर किसी की बात पर अपनी सबसे महंगी फिल्म बना देंगे. जीशान पर उनका विश्वास फिल्म की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा सबूत है. यह मेरा मानना है. चूँकि अनुराग के मौलिक और पारखी नजर  का कायल पूरा हिंदी सिनेमा जगत है. 
अख़बारों के कटिंग और आकड़ें
दूसरी बात, झारखंड के लोग इस बात से नाराज हैं कि फिल्म में वासेपुर का नाम ख़राब किया जा रहा है. बदनामी हो रही है उनके शहर कि. तो इस बात पर मेरा सवाल उनलोगों से यह है कि फिल्म में अख़बारों के कटिंग, प्रकाशित खबरों के बारे में कहा गया है. तो निशित्तौर पे अनुराग ने केवल इस फिल्म के लिए तो खुद से कोई कटिंग नहीं बनवाई होगी, या प्रकाशित करवाई होगी. कि अरे मुझे अपनी फिल्म में दिखाना है तो भाई कुछ लिख दो ऐसा हुआ होगा. अब अगर अनुराग और लेखक जीशान पर यह सवाल उठ रहा है कि वह वासेपुर को बदनाम कर रहे हैं तो फिर तो वे अख़बारों के कटिंग जिसमे फिल्म में दिखाई गयी घटनायों से संबंधित खबरें हैं. उन पत्रकारों पर भी यही सवाल उठाया जाना चाहिए. कि कैसे उन्होंने लोकल होते हुए भी अपने ही जगह को बदनाम किया है. जीशान ने अपनी बातचीत के दौरान बताया है कि रिसर्च के दौरान वे कई लोगों से मिले. उन्होंने फिल्म इए दिखाई गई घटनाओं के बारे में पूछा. कई मामलों में कई केस, कई घटनाएं ऐसी थी जिसपर वहां के लोगों ने हामी भरी कि हाँ ऐसा हुआ था. खुद वासेपुर से हैं जीशान, तो इतना वाकिफ तो वो भी होंगे. और इसके साथ यह बात हम नहीं भूल सकते कि बात फिल्म दोक्युद्रमा नहीं है. न ही वृतचित्र है. फिल्म वास्तविक घटनायों से प्रेरित काल्पनिक फिल्म है. 

 मुझे याद है. फिल्म में दिखाई गयी कई घटना, जैसे लड़कियों का राह चलते अगवा कर लेना. दो परिवारों में आपसी रंजिश होने. कोयला पर राजनीति इस पर कई सालों से वहां लिखा जा रहा है. लगभग उस वक़्त से जब मै ९७-८ वी क्लास में रही होंगी. तब से सुनती आ रही हूँ.  शाम को पापा के दोस्तों के बीच अक्सर ऐसे मुद्दों पर बातचीत होती थी. 
बोकारो में कई सालों पहले मोनिका नमक लड़की के साथ गैंग रेप किया गया था. भर्रा बस्ती में. पूरे बोकारो में कर्फ्यू था. बीबीसी तक गयी थी खबर. अब अगर कोई फ़िल्मकार इस विषय को लेकर  फिल्म बनाता है तो बोकारो के लोगों का यह कहना बोकारो कि बदनामी हो रही है. कहाँ तक उचित होगा.   ( हालाँकि मेरे पास इन बातों को सच करार देने का कोई ठोस सबूत या फिर आंकड़ा नहीं है. लेकिन अनुभव के आधार पर यह बातें रख रही हूँ. )
फिल्म में दिखाई गई वासेपुर की सकारात्मक बातें 
जीशान से बातचीत के दौरान उन्होंने खुद स्वीकारा था कि वासेपुर में भी लोग इंजिनियर बन रहे हैं. डॉक्टर बन रहे हैं. एडुकेशन में आगे बढ रहा है. फैजल का किरदार निभा रहे नव्जुद्दीन ने बताया कि वासेपुर के लोग बहुत सिम्प्ले हैं. दिल के साफ़ हैं. कैलकुलेट करके बात नहीं करते. वफादार हैं वहां के लोग. अपने लोगों के लिए जान ले भी लेते हैं. दे भी देते हैं. 

फिल्म में पियूष मिश्र का किरदार इसी आधार पे गढ़ा गया है. दर्शकों का ध्यान उनपर भी जाना चाहिए. उन्होंने भी शाहिद खान और फिर उसके बेटे सरदार खान समेत उसके पूरे परिवार के साथ वफादारी निभाई. ऋचा चड्डा नगमा के किरदार में धोखा खाने और तंग हाली होने के  बावजूद अपने पति के दुश्मन के हाथों से दिए भीख को ठुकराती है. सरदार खान की ताकत उनके दोस्त ही बनते हैं. दो ही सही लेकिन वफादार दोस्त. यह भी तो वासेपुर के लोगों की अच्छाई ही दर्शाता है. 

सरदार खान अपराधी अपने पिता के मौत के बदले की वजह से बना. सरदार खान जो भी अपराध करते दिखाया गया है. वह वासेपुर को बदनाम करता है. लेकिन उसी सरदार खान के स्वभाव का यह पहलू कि उसे खुद एहसास होता है कि उसे अब खून खराबा छोड़ कर कुछ बिसनेस करना चहिए. बिना किसी मनोवैज्ञनिक के एक अपराधी का हृदय परिवर्तन सरदार खान के नेक दिल को भी दर्शाता है. अपने मोहल्ले की अगुवा लड़की की इज्जत बचाना फिर उसका ब्याह रच वाना दर्शाता है कि उसी वासेपुर में पापी भी हैं और सरदार खान जैसे अपराधी होने के बावजूद मोहल्ले की  बेटी की रक्षा करना एक जिम्मेदारी भी. यह वासेपुर के लोगों की छवी को ही तो दर्शाता है. कि वहां के लोग सिर्फ अपने लिए नहीं जीते. फिल्म के एक दृश्य में कुछ लड़के एक लड़की को अगवा करते हैं. वास्तविकता में भी बोकारो, धनबाद से नजदीक ऐसी कई इलाके हैं वाकई जहाँ दिन दहाड़े लड़कियों का अपहरण हो जाता है. सिमंडी, भरा बस्ती, वैसे इलाकों में से एक है. धनबाद जंक्शन में खुद मेरी एक दोस्त के साथ अकेले  एक ट्रेन का इंतज़ार करने के दौरान  करने के दौरान रात के १२ बजे रेलवे पूछताछ में बैठे लोगों द्वारा बदतमीजी और छेड़खानी से बातचीत करने की कोशिश की गई थी. उसने बमुश्किल खुद की रक्षा की थी. ऐसे में अगर किसी फिल्म में यह वाक्य दिखाया जाये तो क्या वो बेमतलब उस जगह की बदनामी होगी. हिंदी फिल्मों में यह पहली बार तो नहीं हो रहा की किसी स्थान को नाम शामिल किया जा रहा हो. शूट आउट अत वडाला के बाद शूट आउट अत लोखंडवाला भी बन रही है. इसका यह मतलब तो नहीं कि वहां के लोग कहें कि यह हमारे इलाके की बदनामी है. जबकि मुंबई के अधिकतर फिल्म स्टार इसी इलाके में रहते हैं. फिल्म लंका में बिजनौर की पूरी नेगेटिविटी ही दिखाई गई है. मतलब बिजनौर तो गन्दा शहर हो गया. वहां अछ्चाई बची ही नहीं. अधिकतर गैंग्स की फिल्म मुंबई पे है. मुंबई को हादसों का शहर कहा जाता है. इसका यह मतलब नहीं की वाकई यहाँ मोड़ मोड़ पे हादसे होते रहते हैं. 
दानिश और फैजल का बचपन 
 गौर करें तो सरदार खान को छोटा बेटा फैजल के हावभाव से लगता है कि अगर उसे मौके मिलते तो अच्छी तरह पढ़ लिख सकता था. लेकिन पैसे की तंगहाली में  उसे ट्रेन में गन्दगी साफ़ करनी पड़ती है. वास्तविकता में भी फैसल दानिश से कई बच्चे आपको ट्रेन में गन्दगी साफ़ करते नजर आयेंगे. 

सुल्ताना डाकू धनबाद नहीं आया?
इस पर भी बहस हो रही है कि सुल्ताना डाकू का धनबाद से संबंध नहीं रहा. इस संदर्भ में मैंने जो फिल्म में समझा. दरअसल, फिल्म में भी सुल्ताना डाकू की बात किस्से की तरह ही बताई गई है. क्यूंकि किसी ने उसे नहीं देखा.  सो, इसका फायदा  कुरैशी और खान दोनों परिवारों ने उठाया, सुल्ताना के नाम पर डकेती करती थी. जबकि दोनों परिवारों में से कोई भी सुल्ताना डाकू नहीं था. बस उसके नाम का इस्तेमाल होता था.  धनबाद जंक्शन आज भी दिन दहाड़े लूट और चोरी के लिए बदनाम है.  डाल्टनगंज, गया, जहानाबाद इलाके में आज भी ट्रेन में लूट हो जाती है. बिहार झारखंड के कई बस रूट में डकेती होती है.लोग सहम कर पैसे लेकर यात्रा करते हैं. विशेषकर बारात लेकर जा रहे लोग तो सबसे अधिक डरे रहते हैं. तो अगर कोई फिल्म मेकर यह सब दर्शा दे तो वह उस जगह की बदनामी होगी? या सच दर्शाना होगा.

फिल्म कोल माफिया पे है?
फिल्म को लेकर आम लोगों ने यह धारणा बना ली है कि वासेपुर का तो कोल से लेना देना नहीं. फिर कोल माफिया की बात फिल्म में कैसे दर्शा दी गई है. यह बातें करने वाले सबसे पहले फिल्म देख लें. फिल्म सिर्फ कोल माफिया पर नहीं है. यह बात शुरू से अनुराग कहते आ रहे हैं.गलत फहमी दूर हो जाएगी. 

पीठ पीछे वार, और अपने उल्लू सीधा करना
रामधीर सिंह कभी सामने से वार नहीं करता. फिल्म में. उसने हमेशा दो परिवारों को ही लड़ाया. मजदूरों के साथ ज्यद्द्ती, फिर मजदूरों में से ही एक शाहिद का अपने मतलब के लिए इस्तेमाल, फिर उसके दो परिवारों में आग लगाना और अपना फायदा करना. राजनीति की यह चाल तो आज भी कई छोटे जगहों पर खेली जा रही है.इस लिहाज से निर्देशक ने इसे बखूबी दर्शाया है कि कैसे आम मजदूर. अल्पसंख्यक हमेशा इस्तेमाल होते रहे हैं.सुल्तान कुरैशी जैसे मासूम लेकिन बेवकूफ तो हर गली मोहल्ले में बसे हैं. कही भग्गू के रूप में तो कहीं सुल्तान के रूप में.
एक साथ कई स्ट्रोक 
यह सच है कि अनुराग अपनी फिल्मों में एक साथ कई कनवास पर पेंटिंग करते हैं. वे एक साथ बहुत कुछ दिखा जाते हैं. फिल्म में इमोशन भी है. सरदार खान का अपने बच्चों अपनी दोनों पत्नियों के लिए प्रेम, मोहल्ले की लाज, एक दबंग का शान से जीने का अंदाज़, हंसी ठिठोली, फैजल, दानिश का प्रेम प्रसंग, कसाई की अत्यधिक क्रूरता, एक लालची , इन्सेक्युर नेता की कमजोरी, उसकी ताकत. पीठ पीछे वार करनेवाले राज नेता की छवी, राजनीति और राजनीति में रहने वाले के दो चेहरे. साजिश, रंजिश. सब एक साथ है इस फिल्म में. कई कहानियां एक साथ. कई किरदार और सभी किरदारों की अपनी एक कहानी. अनुराग की इस फिल्म की यह भी बड़ी खासियत है कि इस फिल्म का हर किरदार एक कहानी है. सब पर अलग से छोटी छोटी फिल्में बन सकती है. सरदार खान की दबंगई, और एक पिता की मौत में जलते आदमी के जिंदगी के मकसद की कहानी, दानिश की प्रेम कहानी से दो परिवारों का मिलन. नगमा के रूप में एक पत्नी और माँ के फ़र्ज़ को अदा करती औरत की कहानी. गंगा के रूप में दूसरी औरत  की इन्सेक्त्युरिटी, पियूष मिश्र के रूप में एक वफादार नौकर की कहानी, फैजल के रूप में एक ऐसे बच्चे की कहानी जो एक गलतफहमी की वजह से माँ से दूर हो जाता हो और उस वजह से नशे की लत, सुल्तान के रूप में एक कट्टर परिवार के लड़के की कहानी. इस लिहाज से एक साथ फिल्म में कई कहानियां हैं. और अनुराग सभी को दिखाने में सफल हुए हैं.
फिल्म के हंसगुल्ले
ऐसा नहीं है कि अनुराग ने फिल्म में सिर्फ हिंसा ही दिखाई है. कई संवाद, सरदार खान के चेहरे के हावभाव, गंभीर जगहों पर भी हंसी ठिठोली, बम बनाते वक़्त भी चाय बनाने सा आनंद और सरदार खान का मोहल्ले में खुल्ले आम रामधीर को चुनौती देने वाले दृश्य, फैजल का प्यारा सा रोना धोना, उसकी मासूम हरकतें. इन सभी पलों के साथ आप न सिर्फ हँसते हो बल्कि इन्हें आप खुद के साथ घर भी लाते हो. 

कुछ बातें जो खटकी 
फिल्म में कुछ दृश्य अत्यधिक लम्बे हैं. फिल्म में कसायिओं के काम और बूचर खाने के दृश्य अत्यधिक वास्तविक होने की वजह से विचलित करते हैं. वे न भी रहे तो फिल्म अपनी नब्ज पकड़े रहते. चूँकि हिंदी फीचर फिल्म के दर्शक शायद अब भी इतनी हिंसक चीजें बर्दाशत न कर पाएं. फिल्म के अंत के दृश्य में बिहार के लाला गीत का इस्तेमाल ऐसे जगह पर क्यों. जहाँ दुख है. जबकि यह गीत सेलेब्रेशन का है. 


बॉलीवुड की नयी बिजली

orginally published on 21 june2012 in prabhat khabar
यशराज  बैनर ने ‘रब ने बना दी जोड़ी’ बना कर बॉलीवुड में एक नयी अभिनेत्री को शामिल किया. उस फिल्म से अपने कैरियर की शुरुआत करनेवाली अनुष्का ने अपनी मेहनत से अपनी पहचान बनायी है. वह न तो बहुत बड़बोली है और न ही अन्य अभिनेत्रियों की तरह नखरे करने वाली. शायद इसलिए वह जल्द ही जहां एक ओर शाहरुख खान के साथ यश चोपड़ा की फिल्म में नजर आनेवाली हैं तो वहीं दूसरी तरफ विशाल भारद्वाज उन्हें मटरू की बिजली का मनडोला में अलग ही अंदाज में प्रस्तुत करने जा रहे हैं. इसके साथ ही वह आमिर खान के साथ राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ और अनुराग कश्यप की फिल्म ‘बांबे वेल्वेट’ में रणबीर कपूर के साथ नजर आयेंगी. खुद अनुष्का भी मानती हैं कि बॉलीवुड में उन्हें खूबसूरत अभिनेत्री नहीं माना जाता. न ही निर्देशक उनके नैन नक्श की तारीफ करते हैं. कई बार अनुष्का को अपनी लंबाई और दुबलेपन की वजह से आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. इसके बावजूद उन्हें लगातार बेहतरीन निर्देशकों की फिल्म मिल रही है. इससे साफ जाहिर होता है कि अनुष्का शर्मा में कुछ खास बात तो है. खास तौर से जब विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशक उन्हें अपनी फिल्म के लिए चुन रहे हों. जो अपनी स्टार कॉस्ट को लेकर अति गंभीर होते हैं और चूजी भी. ऐसे में अनुष्का का उन्होंने फिल्म में चुनाव किया. विशाल के बाद अब अनुराग व राजू हिरानी जैसे अलग तरह की फिल्में बनाने वाले निर्देशकों की भी उन पर नजर पड़ी है. स्पष्ट तौर पर अनुष्का भी अब अभिनय के लिहाज से निर्देशकों की पहली पसंद बन रही हैं. इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि बेंगलुरु में परवरिश होने के बाद उनकी हिंदी बेहतरीन हैं. साथ ही वह आर्मी परिवार से हैं. इसलिए अनुशासित भी. यही वजह है कि उनके अभिनय में खूबियां निखर कर सामने आ रही हैं

कलाकारों की मजबूत गैंग

फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर आज रिलीज हो रही है. फिल्म में कलाकारों का चयन फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी और ताकत साबित होगी.बॉलीवुड को यह ट्रेंड अपनाना चाहिए और ऐसी कहानियां लिखी जानी चाहिए, जहां छोटे किरदार भी दमदार साबित हों. इससे न सिर्फ नये कलाकारों को मौका मिलता है बल्कि अलग तरह की फिल्में भी दर्शकों के सामने अच्छी फिल्में भी आयेंगी. यह फिल्म के कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा की समझ व अनुराग के विजन का कमाल है कि उन्होंने कहानी के अनुसार हर किरदार पर होमवर्क किया है. परदे पर उनकी मेहनत नजर आती है. अक्सर, हम फिल्में देखते वक्त यह बात करने लगते हैं कि अरे, इस फिल्म में वह किरदार अधिक परफेक्ट होता. लेकिन यहां कुछ मिसपरफेक्ट नहीं लगता. लेकिन गैंग्स आपको कहीं किसी कमी का एहसास नहीं होने देती. फिल्म में मनोज बाजपेयी के पिता का किरदार निभा रहे जयदीप अहलवातास को देख कर आप चौंकेंगे, चूंकि जयदीप हूबहू मनोज की तरह नजर आते हैं. कुछ इसी तरह तिग्मांशु धूलिया की जवानी का किरदार निभा रहे पात्र हूबहू तिग्मांशु से नजर आते हैं. ऐसे चुनाव से यह जाहिर होता है कि किसी फिल्म का कास्टिंग निर्देशक भी अगर विजनरी हो तो फिल्मों को बेहतरीन एक्टर मिल जाते हैं. नवाजुद्दीन , विनीत सिंह, ऋचा चड्डा, पीयूष मिश्रा के साथ साथ दो दृश्यों में नजर आये वाराणसी के बंदूक की सप्लाइ करनेवाले किरदार, पुलिस के किरदार में अभिनेता प्रणय भी अपना असर छोड़ जाते हैं. रामधीर की पत्नी के दो संवाद के किरदार भी आपको याद रह जाते हैं.

20120621

डांस फ्लोर पर जयसूर्या



वर्ष 1996 में अपने देश को वर्ल्ड कप जिताने वाले श्रीलंकाई कप्तान सनथ जयसूर्या अब झलक दिखला जा में डांसिंग स्टेप्स के साथ सबको दीवाना बनाते नजर आ rahe hain
सनथ हिंदी भाषा बहुत अच्छी तरह बोल नहीं पाते. लेकिन उनकी टूटी- फूटी हिंदी भी बेहद मजेदार थी. उन्होंने उसी अंदाज में हमसे बात की. वे हिंदी अच्छी तरह बोल नहीं पाते, लेकिन समझ लेते हैं. झलक दिखला जा सीजन 5 में वह कमाल दिखा रहे हैं. बॉलीवुड से उनका बहुत ताल्लुक नहीं, न ही वह बॉलीवुड की फिल्में अधिक देखते हैं. माधुरी दीक्षित के बारे में उन्होंने भारत आकर जाना.
अपनी बातों में स्पष्ट रहने वाले सनथ ने बेहद मजाकिया अंदाज में अपनी बातें साझा कीं. उनके बातचीत के अंदाज में तमिल की झलक थी. अच्छा लग रहा था. वह हिंदी बोलने की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने जिस अंदाज में बातचीत की, उसी अंदाज में उसे हूबहू पेश किया जा रहा है.
चिल करने आया
मैं डांस वास नहीं जानता. लेकिन मैं फिर भी इधर आया. सबने कहा डांस करना है. मेरे को लगा नया एक्सपीरियंस होगा. करते हैं. तो मैं आ गया. मैंने इसे चैलेंज के जैसा लिया है. और मुझे मजा आ रहा है. मैं डांसिंग में बिल्कुल जीरो. अब तक केवल मैच जीतने के बाद सिर्फ मस्ती में डांस करता था. लेकिन अब डांस टफ लग रहा है.
फिल्म नहीं देखता

नहीं, मैं जैकलीन फर्नाडीस का कोई फिल्म नहीं देखा. यस, आइ नो वह इंडिया में अच्छा कर रही है. तो अच्छा है. मैंने सुना है इंडियन फिल्में अच्छी होती हैं. हमारा जज माधुरी दीक्षित भी बहुत बड़ी स्टार है.
डांस ज्यादा मुश्किल
मुझे डांस करना बेहद टफ लग रहा है. लेकिन मेरी कोरियोग्राफर को हैट्स ऑफ. वो मुझे अच्छी तरह सिखा रही हैं. डांसिंग मूव्स. अब मैं बॉलीवुड के गाने देखने भी लगा हूं. एंजॉय भी कर रहा हूं.
भज्जी से मिले टिप्स
मैं बहुत खुश हुआ जब मुझे पता चला कि हरभजन मुझे चियरअप करने आयेगा. वह मेरी फील्ड से है और उसे पता है कि कितना टफ है डांस. मैंने सुना कि वह यहां पहले आ चुका है और उसने जीता भी है. हरभजन ने एक दोस्त की तरह टिप्स दिया है कि बस जो कोरियोग्राफर कहे, करते जाओ.
माशाअल्लाह
मैंने अब हिंदी में बहुत कुछ नये शब्द सीखे हैं. मैंने माशाअल्लाह सीखा है. इसका मतलब होता है ऑवसम, धीरे धीरे मैं सीख जाऊंगा.
इंडिया अच्छा है
इंडिया बहुत सुंदर है. यहां क्रिकेटर्स के आज भी अच्छे फैन हैं. लोग बाहरी क्रिकेर्ट्स की भी रेस्पेक्ट करते हैं. यह सबसे अच्छा लगा हमको. प्रेस कांफ्रें स के दौरान कई लोग आकर हमसे मिला. गले लगा. ऑटोग्राफ मांगा. फोटो लिया. मैंने सबसे मजाक में कहा पर फोटो विल चार्ज 5 रुपीज. सभी मजाकिया हैं. अच्छा माहौल है.
रजनीकांत का फैन
मैं रजनीकांत का कई फिल्म देखा. और मैं उसका फैन. वो हमेशा लोगों का साथ देता. मदद करता है. इसलिए अच्छा लगता है.

वासेपुर का सरदार खान



अकसर मनोज बाजपेयी अपनी फिल्मों में नये लुक के साथ नजर आते हैं. गैंग्स ऑफ वासेपुर में वे एक माफिया की भूमिका निभा रहे हैं. यह एक ऐसे व्यक्ति का किरदार है,जिसके नाम से वासेपुर के लोग डर से कांपते हैं.
* इससे पहले भी कई फिल्मों में आपका और अनुराग कश्यप का साथ रहा है. लेकिन लंबे अरसे के बाद आप दोनों इस फिल्म में जुड़े. यह संयोग कैसे बना?
यह सच है कि इस फिल्म में मैंने और अनुराग ने लंबे अरसे बाद साथ काम किया है, लेकिन हमारा जुड़ाव हमेशा ही बना रहा है. उनकी फिल्में देखने के बाद मैं अकसर उन्हें फोन करता था. जब अनुराग ने गैंग्स ऑफ वासेपुर की स्क्रिप्ट तैयार की, उसी वक्त मुझे फोन पर इस बारे में थोड़ा ब्रीफ कर दिया था. उन्होंने मुझे बताया था कि अपनी फिल्म के अहम किरदार में लेना चाहते हैं. मैंने पूरी स्क्रिप्ट सुनी और हां कह दिया.
* फिल्म में अपने किरदार के बारे में बताएं?
यूं तो लोग गैंग्स ऑफ वासेपुर के बारे में कई तरह की बातें बनाते आ रहे हैं. कोई कहता है कि यह फिल्म कोल माफिया पर बनी है, तो कोई इसके बारे में कुछ और कहता है. हकीकत यह है कि यह फिल्म सिर्फ कोल माफिया पर नहीं, बल्कि तीन जेनरेशन की कहानी पर आधारित है. पारिवारिक रंजिश की वजह से जो माहौल तैयार होता है, उस पर आधारित है सरदार खान का मेरा किरदार. फिल्म में यह ऐसा किरदार है, जिसे देखकर आपको एक बार गुस्सा भी आयेगा और फिर अचानक उससे प्यार भी हो जायेगा.
* फिल्म वास्तविक घटना पर आधारित है. बतौर कलाकार, ऐसे किरदार निभाने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
मेरे ख्याल से वास्तविक किरदारों को निभाने में ज्यादा आसानी होती है. इसका कारण यह है कि आपके पास रिसर्च सामग्री ज्यादा होती है. बस उसी रिसर्च के आधार पर आप अपनी सोच गढ़ लीजिए. वैसे, मुझे इस किरदार के लिए खास तैयारी करने की जरूरत नहीं पड़ी. जब आप अनुराग जैसे निर्देशक के साथ काम करते हैं, तो आपका काम हल्का हो जाता है. वह इतनी डिटेलिंग में हर किरदार को गढ़ते हैं कि किरदार निभाने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती. मैं तो बस उनके पास जाता था. वे जो भी बताते थे, मैं
वैसा ही अभिनय कर देता था.
आप बिहार से हैं, तो क्या क्या आप वासेपुर के बारे में पहले से वाकिफ थे?
हां, वहां के बारे में कुछ बातें तो मैं जानता था, लेकिन मैं कभी वासेपुर गया नहीं. इसलिए बहुत विस्तार में और गहराई से नहीं जानता था. इस फिल्म के दौरान जिस तरह से चीजें सामने आयी हैं. उन्हें देखकर मैं दंग था.
* आप लगातार नकारात्मक किरदार निभा रहे हैं. इसकी कोई खास वजह?
मेरे लिए नकारात्मक या सकारात्मक भूमिका अहमियत नहीं रखती. अहम है कि मैं जो किरदार निभा रहा हूं, उसकी फिल्म में क्या भूमिका है. फिर चाहे वह राजनीति हो, आरक्षण हो या फिर गैंग्स के सरदार का किरदार.
* एक बार फिर आप गैंगस्टर के रोल में हैं.
हां, मुझे लगता है कि निर्देशक इस बात की समझ अच्छी तरह रखते हैं कि मैं ऐसी भूमिकाएं निभा सकता हूं. फिल्म सत्या का गैंगस्टर और गैंग्स.. का गैंगस्टर बिल्कुल अलग हैं. दोनों में कोई समानता नहीं है. दोनों की तुलना सही नहीं होगी.
* आप बिहार से हैं, लेकिन बिहार पर आधारित फिल्मों में नजर नहीं आते. कोई खास वजह?
नहीं, मैं तो तैयार हूं. जब अच्छी स्क्रिप्ट मिलेगी काम करूंगा. मैं तो भोजपुरी फिल्मों में भी काम करने के लिए तैयार हूं. बशर्ते कि फिल्म की स्क्रिप्ट खास हो और मेरे किरदार में वो बात हो कि लोग कहें कि मनोज ने इसमें भी कमाल किया. अलग तरह से नजर आयें तभी करूंगा वैसी फिल्में.



फिल्म इंड्रस्ट्री, ‘फरारी की सवारी’ की रिलीज के दौरान विधु विनोद चोपड़ा द्वारा कही गयी बातों से खफा है. हालांकि, विधु को इन बातों से कोई नहीं पड़ता, क्योंकि वह शुरुआती दौर से ही इंड्रस्ट्री की आलोचनाओं का सामना करते रहे हैं.
रिलीज के दौरान विधु ने कहा कि बॉलीवुड में अब तक जितनी भी फिल्में 100 करोड़ के क्लब में पहुंची हैं, वे वाहियात फिल्में हैं. उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि हिंदी फिल्में बनानेवाले लोगों ने अपना ईमान बेंच दिया है. सब सिर्फ पैसे कमाने में लगे हुए हैं. दरअसल, यह वह सच्चई है जिसे इन दिनों कम ही निर्देशक या फिल्मकार कहने की हिम्मत कर पाते हैं. बल्कि, 100 करोड़ क्लब में पहुंचनेवाली फिल्मों की जम कर तारीफ की जाती है. अब सवाल यह उठता है कि क्या 100 करोड़ क्लब वाली फिल्में वाकई याद रखी जायेंगी?
इन दिनों दक्षिण भारतीय फिल्मों के खूब रीमेक बन रहे हैं. संजय लीला भंसाली जैसे कलात्मक फिल्मों के निर्देशक भी अब यही करने लगे हैं. इस पर भंसाली का तर्क है कि कलात्मक फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते. वह सामान्य कमाई भी नहीं पाती है. हम पहले हॉलीवुड और अब साउथ की फिल्मों की नकल कर रहे हैं या रीमेक बना रहे हैं. लगातार और गौर करें तो साउथ की रीमेक बनीं सभी हिंदी फिल्में हिट हो रही हैं.
फिर चाहे वह वांटेड हो, बॉडीगार्ड हो, रेडी हो या राउड़ी राठौड़, संजय लीला भंसाली, संजय दत्त और अक्षय कुमार भविष्य में भी कई साउथ की फिल्मों का हिंदी रीमेक बनाने जा रहे हैं. यह ट्रेंड अब और मजबूत होता जा रहा है. लेकिन इसमें दोष सिर्फ फिल्मकारों का ही नहीं है बल्कि दर्शकों का भी है और दोष उस पंरपरा का भी है जिसके तहत भारत में फिल्म देखने की सूझ विकसित हुई. यह बॉलीबुड की मौलिकता के लिए खतरनाक है.
ऐसे में अगर विधु विनोद खुल कर ऐसी बातें कर रहे हैं तो अन्य गंभीर फिल्मकारों को भी आंखें खोलनी चाहिए. ताकि बॉलीवुड की अपनी पहचान स्थापित हो पाये. वरना, जिस तरह विदेशों में हमें नकलची बंदर की उपाधि मिली है.
जल्द ही साउथ वाले बॉलीवुड पर मालिकाना हक जमा लेंगे.

गैंग्स ऑफ कलाकार



गैंग्स ऑफ वासेपुर निर्देशक अनुराग कश्यप की अब तक की सबसे महंगी फिल्म है. फिल्म की खासियत यह भी है कि इसमें कुल 340 किरदार हैं और लगभग 270 किरदारों के संवाद हैं. इस लिहाज से इस फिल्म में कलाकारों का गैंग भी एकत्रित हुआ है.
अनुराग कश्यप कहते हैं कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी और मनोज बाजपेयी उनकी फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर की रीढ़ हैं. इन दोनों अभिनेताओं की खासियत यह है कि उन्होंने इस फिल्म में अभिनय नहीं किया, बल्कि किरदारों को जिया है. फिल्म में सरदार खान का किरदार निभाने वाले मनोज बाजपेयी और फैजल के रूप में दिखने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी से अनुप्रिया अनंत की विशेष बातचीत.
वाजुद्दीन सिद्दीकी गैंग्स ऑफ वासेपुर में सरदार खान के छोटे बेटे फैजल का किरदार निभा रहे हैं. पीपली लाइव, कहानी, पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों में छोटी लेकिन अहम भूमिकाओं में नजर आ चुके नवाजुद्दीन के अभिनय की इन दिनों काफी तारीफ हो रही है.
वर्ष 2012 में कई फिल्मों में नजर आ चुके नवाजुद्दीन आने वाले 6 महीनों में तलाश, मिस लवली, पतंग और देख इंडिया सर्कस जैसी कई फिल्मों में अहम भूमिकाओं में नजर आयेंगे. 14 साल के लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने बालीवुड में अपनी मौजूदगी को किरदारों के माध्यम से स्थापित करना शुरू कर दिया है. अब उनकी उम्मीदें जुड़ी हैं अगली फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर से.
गैंग्स ऑफ वासेपुर से जुड़ना
अनुराग कश्यप मुझे बहुत पहले से जानते थे. मैंने फिल्म ब्लैक फ्राइडे में भी उनके साथ काम किया है और कुछ छोटे-छोटे प्रोजेक्टों में भी हम साथ काम करते रहे हैं. फिल्म आमिर के दौरान उन्होंने ही राजीव खंडेलवाल को ट्रेन्ड करने के लिए निर्देशक राजकुमार गुप्ता को मेरा नाम सुझाया था. मेरा अभिनय देखने के बाद अनुराग हमेशा मुझसे कहते रहते थे कि जब मैं कुछ बड़ा करूंगा, तो तुङो जरूर अच्छा रोल दूंगा. वही हुआ. मेरी हमेशा से इच्छा थी कि मैं कोई दबंग किरदार निभाऊं.
जब मैंने गैंग्स.. की स्क्रिप्ट पढ़ी तो मैं दंग रह गया. मैं सोचने लगा कि मैंने तो कभी अनुराग को यह नहीं बताया कि मैं ऐसा रोल करना चाहता हूं, फिर उन्होंने मेरे मनमुताबिक किरदार कैसे गढ़ दिया. अनुराग में यह खूबी है कि कलाकार से किस तरह का अभिनय करवाया जा सकता है, ये वह अच्छी तरह से जानते हैं. उन्होंने फिल्म गैंग्स.. के पहले पार्ट में मुझे अंडरडॉग जैसा किरदार दिया है, जो एक लड़की से प्यार करता है, लेकिन कह नहीं पाता. वह काफी संकोची है.
फिल्म के दूसरे हिस्से में आप देखेंगे कि मैं बिल्कुल दबंग जैसा हूं. दूसरे भाग में मैं लीड किरदार निभा रहा हूं. अपने किरदार को रियल टच देने के लिए मैं 15 दिन वासेपुर में रहा. वहां रह कर मैंने महसूस किया कि छोटे शहर के लोग कैल्कुलेट करके बात नहीं करते. वे बिंदास बातें करते हैं. दोस्ती के नाम पर जान ले भी सकते हैं और दे भी सकते हैं. अपने किरदार को समझने के लिए मुझे यहां के लोगों और माहौल से काफी मदद मिली.
सेट की मस्ती
अनुराग कश्यप की यह खासियत है कि शूटिंग के दौरान वह अपने सभी कलाकारों के साथ दोस्त जैसा बर्ताव करते हैं. मुझे वे हमेशा कहते हैं कि नवाज तू लड़की होता तो मैं तुझसे शादी कर लेता. पता नहीं वह ऐसा क्यों कहते हैं, लेकिन मुझे इतना पता है कि वह मेरे अभिनय की कद्र के लिहाज से ऐसा कहते हैं.
फिल्म के एक सीन की बात बताता हूं. मुझे मेरी को-स्टार हुमा कुरेशी के साथ रोमांटिक सीन देना था, लेकिन ऑफ स्क्रीन वह मुझे बात-बात में नवाजुद्दीन भाई कहतीं. इस पर मैंने मजाकिया अंदाज में अनुराग से कहा कि माना मैं छह फुट का हैंडसम बंदा भी नहीं हूं. देखने में भी गरीब-सा दिखता हूं, लेकिन मेरी हीरोइन जिसके साथ रोमांटिक सीन करना है, वह मुझे भाई बोलेगी तो मैं खाक रोमांटिक सीन कर पाऊंगा! अनुराग हंसे, फिर उन्होंने हुमा की क्लास लगायी. फिर क्या था हुमा ने मुझे भाई कहना छोड़ दिया. इस फिल्म के सेट पर हम कलाकारों ने बहुत मस्ती की है.
कान का अनुभव
यह साल मेरे लिए बेहद खास रहा. मेरी फिल्म मिस लवली और गैंग्स.. को कान में शामिल किया गया. मुझे खुशी है कि दोनों ही फिल्मों में मेरे किरदार की सराहना हुई. गैंग्स.. देखते वक्त लोग सबटाइटिल पढ़ कर हंसी से लोटपोट हो रहे थे. सबने पूरी फिल्म देखी. मिस लवली देखकर वहां के क्रिटिक्स दंग थे कि बॉलीवुड में ऐसी फिल्में भी बनती हैं. दरअसल, मिस लवली के निर्देशक ने फिल्म को एक अलग तरह का ट्रीटमेंट दिया है. क्योंकि वहां के क्रिटिक्स बॉलीवुड की फिल्में काफी कम देखते हैं, तो उन्हें इस फिल्म में मेरा किरदार काफी अलग लगा.
मनोज बाजपेयी
मनोज से मेरा जुड़ाव दिल्ली के साक्षी गुप्र से ही हो गया था. हमने फिल्म चिटगांव में भी साथ काम किया है और अब वासेपुर में हम साथ हैं. उनसे मेरी ट्यूनिंग काफी अच्छी रही है. वे बेहद अच्छे कलाकार हैं.
आनेवाली फिल्में
पीपली लाइव में मेरे किरदार को देखकर आमिर खान ने उसी वक्त मेरा नाम तलाश के लिए रिकमेंड कर दिया था. तलाश के अलावा मैं पतंग, चटगांव, देख इंडिया सर्कस, मॉनसून शूटआउट में नजर आऊंगा. मेरी पूरी कोशिश है कि मैं अपने अभिनय के अलग-अलग रंग दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर सकूं.

20120618

फिल्मों को भी एग्जाम देना पड़ता है


 गौरी शिंदे की फिल्म इंग्लिश-विग्लिंश के ट्रेलर में श्रीदेवी सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट पढ.ती हुईं खुद से सवाल कर रही हैं कि फिल्मों को भी एग्जाम देना पड़ता है? यह वाकई अहम सवाल है. वर्ष 1920 से लेकर अब तक हर शुक्रवार को फिल्में सिनेमाघर तक सेंसर बोर्ड की परीक्षा से पास होकर पहुंचती रही हैं, लेकिन किसी दौर में इसके कठोर नियम निर्देशकों के लिए परेशानी का सबब बन जाया करते थे. हिंदी सिनेमा में बदलते समय के साथ जिस तरह सिनेमा ने अपना अंदाज बदला है. उसके साथ ही सेंसर बोर्ड ने भी सकारात्मक रुख अपनाया है. एक दौर में निर्देशकों को छोटी-छोटी बातों पर ए सर्टिफिकेट थमा दिया जाता था, जिसके कारण पारिवारिक फिल्म होने के बावजूद उनकी फिल्में सभी तक नहीं पहुंच पाती थीं. आज भले ही निर्देशक खुशी-खुशी फिल्मों की कांट छांट की बजाय ए सर्टिफिकेट को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन एक जमाने में निर्देशकों को क.डे नियमों की वजह से बेहद नुकसान हो जाया करता था. ऋषि कपूर ने स्वयं स्वीकारा है कि फिल्म बरसात को सिर्फ इसलिए ए सर्टिफिकेट दिया गया था. चूंकि इस फिल्म में नायिका ने सलवार-कमीज के साथ दुपट्टा नहीं लिया था. भारतीय सेंसर बोर्ड की सोच उसके आधार व नियमों पर हमेशा से मतभेद होते रहे हैं. इससे संबंधित कई दिलचस्प किस्से भी सामने आते रहे हैं. एक बार अभिनेत्री नूतन को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ा था. नूतन ने जिस फिल्म में अभिनय किया, उसी फिल्म को सिनेमाघरों में देखने के लिए उन्हें मना कर दिया गया, क्योंकि उस समय नूतन की उम्र 14 वर्ष की थी और फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला था. कुछ ऐसा ही हुआ था फिल्म चौदहवीं के चांद के वक्त भी. फिल्म चौदहवीं का चांद के टाइटिल गीत को गुरुदत्त ने अपनी जिद्द से रंगीन में फिल्माया था. जबकि उस दौर में फिल्मों को रंगीन में शूट करना बेहद कठिन था. लेकिन वह जमाना रंगीन का आ चुका था. गुरुदत्त ने बमुश्किल इस गाने को रंगीन में शूट किया. तरह-तरह के लेंस लगा कर. हालत यह थी कि लेंस की रोशनी से वहीदा परेशान हो जाया करती थीं. लेकिन गुरुदत्त की जिद के सामने सब फेल. उन्हें बर्फ लगा लगा कर शूटिंग करनी पड़ी. लेकिन अफसोस तो तब हुआ. जब गाना रंगीन में आया और सेंसर के पास गया, तो उन्होंने गाने को ईल घोषित कर दिया. गुरुदत्त ने सवाल उठाया कि जो गीत ब्लैक एंड व्हाइट में ईल नहीं. वह अभी ईल कैसे. इस पर सेंसर ने कहा, वहीदा की आंखों में रंगीन होने की वजह से उत्तेजना झलकती है.

20120614

चले चलो- द मेकिंग ऑफ़ लगान


आज  से 11 साल पहले वर्ष 2001 में आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म लगान रिलीज हुई थी. पिछले वर्ष लगान के दस साल पूरे होने पर आमिर खान प्रोडक्शन ने भव्य आयोजन किया था. आमिर खान प्रोडक्शन की शुरुआत भी लगान से ही हुई थी और आज यह प्रोडक्शन हाउस हिंदी सिनेमा जगत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. इसी अवसर पर प्रोडक्शन हाउस ने चले चलो - द मेकिंग ऑफ लगान नामक फिल्म की भी स्क्रीनिंग की. यह फिल्म लगान की मेकिंग पर आधारित है. जिसका निर्देशन आमिर के बचपन के दोस्त सत्यजीत भटकल ने किया है. यह वही सत्यजीत भटकल हैं, जो वर्तमान में आमिर के लोकप्रिय टीवी शो सत्यमेव जयते के निर्देशक हैं. लगान के मेकिंग पर बनी फिल्म की चर्चा इसलिए क्योंकि, इस फिल्म में लगान के परदे के पीछे के सारे जख्म, कष्ट और कठिनाईयों के बावजूद पूरी लगान टीम की मेहनत का लेखा जोखा है. यह फिल्म सिनेमा की पढ.ाई कर रहे छात्रों के लिए एक मजबूत दस्तावेज है. चूंकि यह फिल्म दर्शाती है कि किस तरह निर्देशक आशुतोष ग्वारिकर ने सारी परेशानियों के बावजूद इस बेहतरीन फिल्म को अंजाम दिया. यह फिल्म यूटयूब पर देखी जा सकती है. फिल्म लगान देखकर आपको जितना मजा आया होगा. चले चलो देख कर आप उससे भी ज्यादा ऊर्जावान होंगे. लोगों की ऊर्जा, उनका जुनून दिल को छू जाता है. फिल्म के निर्देशक आशुतोष ग्वारिकर इस फिल्म के दौरान बुरी तरह बीमार प.डे थे. उनकी पीठ में इस कदर परेशानी आयी थी कि उन्हें डॉक्टर ने बिस्तर से उठने से भी मना कर दिया था. आशुतोष किसी भी हाल में इस मिशन को अधूरा नहीं छोड़ सकते थे. फिल्म से समझा जा सकता है कि किस तरह आशुतोष खुद को बिस्तर पर बांध कर फिर थोड़ी ऊंचाई देकर वे एक्शन कहते रहे. हंगल साहब भी सेट पर बुरी तरह बीमार प.डे, और उन्होंने भी अपना शॉट दिया. लोगों का मानना है कि लगान बेहतरीन फिल्म है, महान फिल्म नहीं. लगान की मेकिंग देखने पर ही टीम लगान की मेहनत का अंदाजा लगाया जा सकता है. लगान को फीचर के रूप में देखना जितना रोमांच से भरा अनुभव. उतनी ही हकीकत बयां करती है इसकी मेकिंग . शेष आप खुद देखें और अनुभव करें

हंटर वुमनिया की चटनी चटनिया



फिल्म का गीत ‘हंटर’ आप पर चाबुक नहीं बरसाता, बल्कि आपकी पैरों में एक थिरकन पैदा कर देता है. फिल्म के गीतों में बिहारी चटनी म्यूजिक की छटा भी है और कैरेबियन म्यूजिक की घटा भी. इस अनोखे संगीत सफर पर फिल्म के गीतकार वरुण ग्रोवर से अनुप्रिया अनंत की बातचीत..
हिंदी सिनेमा में यह नये-नये प्रयोगों का मौसम है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के गीतों को ऐसी ही प्रयोगधर्मिता की रोचक मिसाल कहा जा सकता है. फिल्म के गाने अपनी खास धुन के कारण ही नहीं, अपने बोलों के कारण भी लोगों की जुबान पर चटपटी चटनी की तरह चढ़ गये हैं. बिहार और झारखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म के गीतों का जायका खास बिहारी-झारखंडी है.

आइ एम हंटर’, ‘वुमानिया’, ‘जिया तू हजार साला..’ जैसे गीतों के बोल इन दिनों लोगों की जुबां पर थिरक रहे हैं. इन गीतों पर जुबां के साथ-साथ उनके पैर भी थिरक रहे हैं. वजह साफ है, फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के इन गीतों के बोल व संगीत आमतौर पर सुने जाने वाले गीतों से बेहद अलग हैं.
निर्देशक अनुराग कश्यप ने न सिर्फ कहानी के लिहाज से ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में अपनी अलग प्रतिभा दिखायी है, बल्कि संगीतकार स्नेहा खानवलकर की मदद से इसे संपूर्ण व अनोखा म्यूजिकल एलबम भी बना दिया है. लोकगीत-संगीत के साथ चटनी म्यूजिक और बिहारी लहजे के बोल ने फिल्म के गीतों को दिलचस्प बना दिया है.
चटनी और लोक संगीत का मिश्रण
चटनी म्यूजिक शब्द भले ही बिहार, झारखंड के लिए अपरिचित हो, लेकिन इसका सीधा जुड़ाव इन्हीं राज्यों से है. बिहार-झारखंड से पलायन कर चुके कलाकारों ने ही अब तक इसके अस्तित्व को बचाकर रखा है. यह संगीत कैरेबियन जीवनशैली का अभिन्न अंग है. चटनी म्यूजिक दरअसल ढोलक, धानताल और हारमोनियम के साथ तैयार किया जाता है.
चटनी म्यूजिक के गीत के बोल प्राय: हिंदी, भोजपुरी और अंगरेजी के मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं. कई भाषाओं के मिश्रण के कारण ही इसे चटनी म्यूजिक कहा जाता है. धानताल बिहार का ही एक वाद्ययंत्र है, जिसे बिहार में अब इस्तेमाल नहीं किया जाता. लेकिन आज भी इसे त्रिणिनाद में इस्तेमाल करते हैं. वहां के लोगों ने आज भी भोजपुरी गीत-संगीत, लोक संगीत को चटनी संगीत के रूप में जिंदा रखा है.
भजन गायक सुंदर पोपो ने अनूप जलोटा के साथ मिलकर कई गीतों को चटनी म्यूजिक के आधार पर तैयार किया है. बाबला और कंचन नामक गायकों ने भी भारत में चटनी म्यूजिक को जिंदा रखा. इसके अलावा फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में भी इस म्यूजिक का इस्तेमाल हुआ है. यह संगीत वेस्ट इंडीज में बसे बिहार के लोगों में आज भी बेहद लोकप्रिय है.
ऐसे कई शब्द हैं जो बिहार के ठेठ शब्द हैं और जिनका इस्तेमाल भले ही बिहार में अब न किया जाता हो, लेकिन वहां के गीतों में इस्तेमाल होते हैं. स्थानीय व आंचलिक होने के कारण से ये शब्द बेहद लोकप्रिय, अलग लेकिन रोचक होते हैं. यही वजह है कि लोग उन्हें पसंद करते हैं.
कैसे बने गीत
फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के गीत सुनकर न सिर्फ आप उनके बीट्स पर झूम उठते हैं, बल्कि उसे बोल के अर्थ समझकर आपके पैर मुस्कुराते हुए थिरकने लग जाते हैं. दरअसल, लंबे अरसे के बाद किसी फिल्म में पूरी तरह से लोक संगीत को कंटेंपररी अंदाज में प्रस्तुत किया गया है. इसके अलावा चटनी म्यूजिक जैसे अनोखे अंदाज के संगीत को देसी अंदाज की चाशनी में डाल कर ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है कि इस फिल्म के अधिकतर गीत लोगों की जुबां पर चढ़ गये हैं. यह कमाल कर दिखाया है संगीतकार स्नेहा खानवालकर की सोच व उनकी रिसर्च ने.
‘आइएम हंटर’ इस फिल्म के लोकप्रिय गीतों में से एक है. इसके बनने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. ‘हंटर’ दरअसल करेबियन चटनी म्यूजिक का गीत है. स्नेहा इस म्यूजिक का कांसेप्ट इंडो-कैरिबियन कम्युनिटी से लेकर आयी थी. इंडो कैरिबियन कम्युनिटी आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व बिहार व उत्तर प्रदेश के ऐसे लोगों से बनी है, जो कई साल पहले पलायन कर गये थे.
इन लोगों ने वहां जाकर भी भोजपुरी लोक संगीत को जिंदा रखा. उन्होंने ठेठ शब्दों को भी वहां जिंदा रखा और ठेठ शब्दों से बनाया गीत ही आगे जाकर चटनी म्यूजिक कहलाया. स्नेहा फिल्म में इसका इस्तेमाल करना चाहती थीं, लेकिन वह यह भी चाहती थी कि गाने में कहीं भी अंगरेजियत न हो. वे बताती हैं, ‘इस डिमांड के बाद मैंने गाने के हिंदी संस्करण को लिखा. गाने को कंटेपररी ट्रीटमेंट के साथ प्रस्तुत किया गया.’
गीतकार वरुण की दमदार एंट्री

गीतों को बोल से सजाया है गीतकार वरुण ग्रोवर ने. बतौर गीतकार वरुण की यह पहली फिल्म है, लेकिन गीतों के बोल सुनकर यह अनुमान लगाना नामुमकिन है कि वह इस क्षेत्र में नये हैं. उन्होंने पहली ही फिल्म में कई प्रयोग किये हैं और बिहार-झारखंड से जुड़े ठेठ शब्दों का इस्तेमाल किया है. एक और खास बात यह भी है कि वरुण लखनऊ से हैं. फिर भी उन्होंने झारखंड बिहार की बोली को बेहतरीन तरीके से समझा है.
बकौल वरुण, अनुराग कश्यप ने जितने रोमांच से फिल्म बनायी है. कुछ उतनी ही रोमांचक यात्र इसके गीतों की मेकिंग की भी रही है. मैंने सुना था कि अनुराग ‘दैट्स गर्ल इन यलो बूट्स’ बना रहे हैं और वे नये लोगों को काम दे रहे हैं. यह एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म है. मैंने अनुराग से बात की तो उन्होंने मुङो एक गीत लिखने का मौका दिया. उसी दौरान मैंने ‘भूस.’ गीत लिखा था. उस वक्त यह गीत फिल्म (दैट्स गर्ल इन यलो बूट्स) में इस्तेमाल नहीं हो पाया.
उस वक्त फिल्म ‘वासेपुर’ की तैयारी चल रही थी. मैंने अनुराग से कहा कि मुङो गीत लिखने का मौका दें. उन्होंने कहा बड़ी फिल्म है, कैसे करोगे. मैंने कहा कोशिश करता हूं. उन्होंने कहा कि ठीक है. तुम स्नेहा से मिल लो. उन्होंने बस इतना ब्रीफ दिया था कि फिल्म बिहार-झारखंड की पृष्ठभूमि पर है, तो गीत में लोक संगीत को तवज्जो देनी होगी. मैं संगीतकार स्नेहा खानवालकर से मिला. स्नेहा ने पहले से ही काफी रिसर्च कर रखी थी.
मैं भी बिहार के चक्कर लगा आया. चूंकि मेरी पत्नी बोकारो से है, तो मैं वहां की भाषा और वहां इस्तेमाल होने वाले शब्दों से वाकिफ था. वैसे, स्नेहा की रिसर्च इतनी पुख्ता थी कि उसकी मदद से कई काम आसान हो गये. उसने भोजपुरी, अंगिका, बजिका, मैथिली सभी के साउंड इकट्ठे कर लिये थे. उससे काफी मदद मिली. ‘भूस के ढेर’ गीत तो पहले से तैयार था. स्नेहा व अनुराग दोनों को लगा कि कहानी के आधार पर इस गीत का इस्तेमाल इस फिल्म में हो सकता है. इसी के बाद ‘भूस के ढेर’ गीत ‘गैंग्स..’ पार्ट वन में शामिल हो गया.
वुमानिया’ गीत
वुमानिया’ शब्द स्नेहा की ही खोज है. अपनी रिसर्च के दौरान स्नेहा ने इन शब्दों को खोजा था. उसे पता चला था कि कैसे बिहार-झारखंड में शादी के वक्त महिलाएं एक-दूसरे को छेड़ती हैं. फिल्म में एक शादी का गीत शामिल करना ही था. बिहार, झारखंड में शादियों में मजाक वाले गीत गाये जाते हैं. मजाक-मजाक में लोग एक-दूसरे को गालियां भी देते हैं. अनुराग ने मुझे बस इतना बताया कि कोई ऐसा गीत बनना चाहिए, जिसमें नयी नवेली दुल्हन को उनकी सहेलियां समझा रही हों. इसी आधार पर स्नेहा की मदद से मैंने यह गीत तैयार किया. आप जब यह गीत सुनेंगे तो खुद ही महसूस करेंगे कि इसके बोल बिहार से कितने मेल खाते हैं.
जिय हो बिहार..

स्नेहा ने अपनी रिसर्च के दौरान ही पटना की लाइब्रेरी से कई ऐसे गीत इकट्ठे किये थे, जो वहां के लोकप्रिय लोक संगीत पर आधारित थे. बिहार में जो नौटंकी होती है, वहां लोगों को उत्साहित करने के लिए लोग ‘जिय हो बिहार के लाला..’ जैसे गीत गाते हैं. अनुराग ने इस बारे में बताया कि बिहार, झारखंड में लोग किस तरह सेलिब्रेशन में कुछ ऐसे ही गीत गाते हैं. उन्हें कोई ऐसा गीत चाहिए था, जिसमें सेलिब्रेशन नजर आये. इसी आधार पर मैंने उन सारे शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश की, जिसमें बिहार के सेलिब्रेशन की झलक हो. फिर बात आयी कि इसे गायेगा कौन. मनोज तिवारी वहां के लोकप्रिय गायक हैं. उनकी आवाज मेल खाती, सो उन्हें शामिल किया गया.
हम ही के छोड़ी
स्नेहा की एक आदत है, वह हर तरह के म्यूजिक को रिकॉर्ड करती है. फिर चाहे साइकिल की आवाज हो या कोई और साधारण से साधारण वस्तु. वह सबकी आवाज को रिकॉर्ड कर लेती है. वह अपने आस-पास मौजूद हर किसी की आवाज सुनती है. मसलन अगर कोई रिकॉर्डिग के लिए आया है और साथ में कुछ और लोग हैं, तो वे उनसे भी गवांयेगी.
इसी क्रम में हमें ‘हमकी ही के छोड़ी’ गीत में दीपक की आवाज मिली. यह मुजफ्फरपुर के एक होटल के कमरे में रिकॉर्ड की गयी थी. वहां दीपक कुछ साथी व गुरुजी के साथ आया था. दीपक कोने में खड़ा था. जिस वर्ष इसकी रिकॉर्डिग हुई थी, उस वर्ष वह मात्र 15 साल का था. इसी के चलते सब कहने लगे बच्चा है क्या गायेगा, लेकिन स्नेहा ने गवाया और उसी की आवाज सेलेक्ट हुई.
कई नयी आवाजें
गीतों की रिकॉर्डिग भी बेहद दिलचस्प अंदाज में हुई है. हमने शारदा सिन्हा (शारदा जी ने सेकेंड पार्ट में गीत गाया है), मनोज तिवारी, पीयूष मिश्र के अलावा उन सारी नयी आवाजों में गाने रिकॉर्ड करवाये हैं, जो लोगों से परिचित नहीं हैं. ऐसे में गीत को ऐसा नया ट्रीटमेंट देना था कि लोग खुद से उसे जोड़ पायें. इसी क्रम में हमें कई नयी आवाजें मिली.
रेखा झा, खुशबू राज जैसे गायक हमें ऐसे ही मिले. इन गीतों की खासियत यह भी है कि इनकी रिकॉर्डिग भी हम लोगों ने पटना के स्टूडियो में की है. वहीं की पृष्ठभूमि के गीत उसी जगह पर रिकॉर्ड करने का एक अलग ही अनुभव था. जहां हम रिकॉर्डिग कर रहे थे, वहां मुश्किल से पांच लोगों के बैठने की जगह थी. फिर भी सीमित संसाधनों में स्नेहा ने कमाल का म्यूजिक तैयार किया

उस कोरोला का स्वाद था शहद से भी मीठा


फिल्म ‘गोलमाल’ सीरिज के निर्देशक रोहित शेट्ठी की फिल्म ‘बोल बच्चन’ के प्रोमोज व गीत प्रदर्शित हो रहे हैं. विकीपिडिया की जानकारी के अनुसार फिल्म 1979 की ऋषिकेश मुखर्जी की कॉमिक फिल्म ‘गोलमाल’ से प्रभावित है. फिल्म में अभिषेक बच्चन ने अब्बास अली का किरदार निभाया है, जबकि 1979 में बनीं फिल्म गोलमाल में अमोल पालेकर ने रामप्रसाद व लक्ष्मी प्रसाद का किरदार निभाया था. 1979 की गोलमाल में भी रामप्रसाद व लक्ष्मी प्रसाद का अंतर भवानी शंकर का किरदार निभा रहे उत्तपल दत्त उनकी मूंछों से ही समझ पाते थे. कुछ इसी तरह बोल बच्चन के पोस्टर्स को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि इस फिल्म में भी मूंछों के पीछे एक कहानी गढ.ी गयी है. निर्देशक रोहित शेट्ठी ने अपने साथी अजय देवगन की मदद से पहले ही ‘गोलमाल’ नामक सीरिज फिल्मों का निर्माण कर लिया है, लेकिन उस फिल्म में उन्होंने केवल शीर्षक के रूप में इस फिल्म के नाम का इस्तेमाल किया था. इस बार उन्होंने ऋषिकेश दा इसी फिल्म की कहानी से प्रभावित होकर कहानी का प्लॉट यही से तैयार किया है. यह साफ दर्शाता है कि रोहित शेट्ठी जैसे हास्य फिल्में बनानेवाले निर्देशक पर ऋषिकेश दा की फिल्मों व उनके निर्देशन का प्रभाव रहा है. वास्तविकता भी यही है कि हिंदी सिनेमा में ऋषिकेश दा ने अपनी समझ से, सूझबूझ से एक से बढ. कर एक हास्य फिल्मों का निर्माण किया. उनकी शैली की ही यह खासियत थी कि आज भी जब टीवी पर चुपके-चुपके प्रसारित होता है, तो दर्शक इसे बार-बार देखते हैं. फिल्म चुपके-चुपके में जिस अंदाज में ऋषिकेश दा ने एक अंग्रेजी के प्रोफेसर को बॉटनी टीचर बना कर कोरोला नामक मनगढ.ंत चीज का इजाद किया था. दरअसल, वह कोरोला ( करेला से बना) संदर्भ किसी शहद से कम मीठा नहीं था. मसलन, यह ऋषिकेश दा के निर्देशन और आम चीजों पर उनकी पारखी नजर का जलवा था कि गो, बट, पुट जैसे अंग्रेजी शब्दों के मेकिंग पर ही उन्होंने चुपके-चुपके में ड्राइवर बने धर्मेंद्र द्वारा एक डिबेट ही करवाया दिया था. फिल्म खूबसूरत हिटलरशीप परिवार पर बेहतरीन कटाक्ष थी. ऐसे में नये जमाने के कॉमेडी फिल्में बनानेवाले निर्देशकों को सिर्फ उनकी फिल्मों के नाम व प्लॉट से ही प्रेरणा नहीं, बल्कि उनसे यह भी प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे समाज के अहम विषयों को आम लोगों से जोड़ कर हास्य फिल्मों द्वारा एक संदेश भी दिया जा सकता है.

20120613

ढलती उम्र के शीरी-फरहाद


संजय लीला भंसाली की बहन बेला भंसाली अपनी पहली फिल्म लेकर आ रही हैं. फिल्म का नाम है ‘शीरी फरहाद की तो निकल पड़ी’. इसमें मुख्य किरदार निभा रहे हैं बोमन ईरानी और फराह खान. फिल्म के प्रोमोज से अनुमान लगाया जा सकता है कि फिल्म की कहानी ढलती उम्र के दो लोगों की प्रेम कहानी पर आधारित है. हिंदी में ऐसी फिल्में कम ही बनती हैं, जिनमें केंद्रीय भूमिका निभानेवाले किरदारों में अधिक उम्र के किरदारों का चयन किया जाये. लेकिन शीरी फरहाद की कहानी बेला ने फराह को ही ध्यान में रख कर लिखी है. उन्होंने बड़ी मुश्किल से फराह को फिल्म में अभिनय के लिए तैयार किया है. जाहिर है यह फिल्म किसी मजबूरी में नहीं बनायी जा रही है. ऐसे दौर में जहां सुपरसितारों को ध्यान में रख कर ही कहानियां गढ.ी जा रही हैं, वैसे में बेला ने अगर बढ.ती उम्र के दो प्रेमियों की कहानी पर काम करने की ठानी है तो यह उनकी नयी सोच ही है. भंसाली जैसे कुशल निर्माता का ऐसी कहानी पर विश्‍वास किया जाना भी सराहनीय हैं. माना जाता है कि आज भी हिंदी सिनेमा के दर्शकों को जवां प्रेम कहानियां ही देखना पसंद हैं. वे ढलती उम्र की प्रेम कहानियों को स्वीकार नहीं कर पाते. आम तौर से इस तरह की बनने वाली फिल्मों को कॉमेडी फिल्म की श्रेणी में रखा जाता है. दरअसल, हमारी सामाजिक संरचना भी ऐसी ही है जहां उम्र के ढलान पर प्रेम करने की इच्छा को फुहड़ता और नैतिक पतन के तौर पर देखा जाता है, जबकि विदेशों में फिल्मों समेत वास्तविक जिंदगी में भी लोग 60 की उम्र में भी शादी करते हैं. चूंकि उनके लिए शादी या प्यार का मतलब केवल शारीरिक सुख की प्राप्ति नहीं, बल्कि बढ.ती उम्र में एक दूसरे का सहारा बनना भी है. आर बाल्कि ने फिल्म ‘चीनी कम’ में भी इस संदर्भ में बेहतरीन कहानी कही है. फिल्म ‘मेरे बाप पहले आप’ जैसी फिल्मों में भी एक बेटे द्वारा एक पिता की अधूरी प्रेम कहानी को पूरा करते दिखाया गया है. लेकिन ऐसी फिल्मों में भारतीय दर्शक सहज महसूस नहीं करते, क्योंकि अब भी हमारी मानसिकता प्रेम को लेकर नहीं बदली है. चूंकि भारत में प्रेम का मतलब जवानी से है. ऐसे में जहां जवां शीरी फरहाद की प्रेम कहानी अमर है. देखना यह है कि ढलती उम्र के शीरीं फरहाद के प्रेम को कितना समझ पाते हैं

भारतीय कलाकार की विदेश में कद्र

फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ की कामयाबी के बाद इरफान एक और फिल्म में बायोपिक किरदार निभाने जा रहे हैं, जिसे इटली के निर्देशक मार्को अमनीटा बना रहे हैं. फिल्म ‘बैंकर टू द पुअर’ शीर्षक पर आधारित यह फिल्म चिट्टगांव के इकोनॉमिस्ट मोहम्मद युनूस पर आधारित है. मोहम्मद युनूस को वर्ष 2006 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. निर्देशक मार्को युनूस की इस किताब से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने युनूस के जीवन पर फिल्म बनाने का निर्णय किया. इटली के निर्देशक मार्को ने इरफान को यह किरदार उनकी फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ देख कर नहीं, बल्कि मीरा नायर की फिल्म ‘नेमसेक’ में इरफान द्वारा निभाये गये भद्रलोक किरदार को देख कर ऑफर किया था. फिल्म के लिए इरफान ने होम वर्क शुरू कर दिया है. इरफान के अभिनय शैली की यही खासियत है कि वे अपने किरदारों पर ज्यादा से ज्यादा रिहर्सल करते हैं. वे घर पर भी कई र्मतबे उस शख्स के बारे में पूरा अध्ययन करते हैं. लोगों से मिलते हैं और जब तक वह अपने होमवर्क से संतुष्ट नहीं हो जाते. वे इस पर आगे की प्रक्रिया शुरू नहीं करते. इरफान की पत्नी बताती हैं कि इरफान जब किसी प्रोजेक्ट को हाथ में लेते हैं तो वह पूरी तन्मयता से उसमें खो जाते हैं. वे फिल्मों की शूटिंग से लौटने के बाद भी लगातार पढ.ाई करते हैं. यही वजह है कि किरदारों में वे भाव नजर आते हैं. इरफान की इसी विशेषता की वजह से उनके किरदारों ने उन्हें अन्य कलाकारों से अलग किया है. भारत के साथ-साथ उन्हें विदेशों से भी अच्छे प्रोजेक्ट्स मिल रहे हैं. ‘अमेजिंग स्पाइडर मैन’ के प्रेस कांफेंस में स्पाइडरमैन के मेकर्स ने कहा कि इरफान बेहतरीन अभिनेता हैं. उनकी विलक्ष्ण प्रतिभा पहचाननी चाहिए और इस कलाकार का सही इस्तेमाल करना चाहिए. भारत में इरफान को भले ही उनके मन मुताबिक किरदार न मिल रहे हों, लेकिन विदेशों में लोग उनकी प्रतिभा का सम्मान कर रहे हैं और सही इस्तेमाल भी कर रहे हैं. इटली के निर्देशक द्वारा हिंदी विषय का चुनाव व इसके साथ ही मुख्य किरदार में इरफान का चयन यह दर्शाता है कि विदेशों में उनकी प्रतिभा की कद्र है. भारत में इरफान को वाहवाही मिल रही है, जबकि इटली के निर्देशक ने उन्हें ‘नेमसेक’ फिल्म में देख कर ही साइन कर लिया था.

लट्टू की तरह नाचता भग्गू


फिल्म  शंघाई का ओपनिंग शॉट, एक ऑटो पर लेटा एक लड़का, पहला संवाद ऐ मामा मटन को अंगरेजी में क्या कहते हैं? पहले शॉट, संवादों के आदान-प्रदान व उस किरदार के हावभाव से यही लगता है कि वह फिल्म में कोई कॉमिक किरदार निभाने जा रहा है, लेकिन अचानक एक बच्ची बाल्टी थमाती है. उस बाल्टी को लेकर शहर नहीं शांघाई का मोरचा निकालता वह लड़का गली-गली में लोगों के मुंह पर कालिख पोतता है और यही दर्शक चौंकते हैं. दर्शक यह सोचने पर अचानक मजबूर हो जाते हैं. कॉमिक से दिखनेवाला यह किरदार अचानक खूंखार रूप कैसे धारण कर लेता है? दर्शक तब और भी चौंकते हैं, जब हंसी ठिठोली करनेवाला और मोहल्ले का हरफनमौला कुछ ऐसा कर जाता है, जो अपराध है. दर्शकों के चौंकने की एक खास वजह यह भी थी, चूंकि अब तक उन्होंने जिन फिल्मों में भी इस कलाकार को देखा था. उन फिल्मों में उन्होंने हास्य किरदार ही निभाया था. लेकिन अचानक शांघाई में उन्हें एक ऐसे किरदार में प्रस्तुत किया जाता है, जो अब तक निभाये गये उनके शेष किरदारों से बेहद अलग थी. ओड़िशा से संबंध रखनेवाले पिटोबाश त्रिपाठी इस फिल्म में केवल फीलर किरदार नहीं हैं. और न ही भीड़ के एक चेहरा मात्र हैं. बल्कि इस फिल्म में वह भग्गू के अहम किरदार में हैं. विकास की लालसा रखनेवाले व अपने शहर की प्रगति की मनसा रखनेवाले भग्गू का किरदार उन तमाम आम लोगों का प्रप्रतिनिधित्व करता है, जो किसी राजनीतिक दांव पेंचों को नहीं समझता. वह सिर्फ वही देखता है, जो उसे दिखाया जाता है. वह यह समझ ही नहीं पाता कि जिसे वह दोस्त समझ रहा है, वे ही उसके वास्तविक दुश्मन हैं. एक पार्टी के नेता को वह इस कदर देवता की तरह पूजता है कि जब वह किसी की हत्या के लिए जा रहा है, तब भी वह उस नेता का आशीर्वाद लेना चाहता है. भग्गू का यह किरदार दरअसल वास्तविक में ठगे जानेवाले उन तमाम लोगों की मानसिक स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वे नेताओं की भक्ति में इस कदर लीन हो जाते हैं कि उन्हें सही और गलत की समझ ही नहीं होती, लेकिन वे इस हकीकत को नहीं समझ पाते कि दरअसल, वह इस राजनीतिक भंवर में महज एक  लट्टू  है.

20120609

आठ पन्नों का रहस्य गैंग्स ऑफ वासेपुर



अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के प्रोमोज आने के साथ ही लोगों में इस फिल्म को लेकर काफी जिज्ञासा देखी जा रही है. सोशल नेटवर्किग साइट्स, अखबारों व झारखंड के आम लोगों में इस फिल्म की चर्चा है. झारखंड के धनबाद जिले के छोटे से स्थान वासेपुर का नाम कुछेक लोग ही जानते थे, लेकिन अब इस जगह का नाम कान फिल्मोत्सव में जाना जाने लगा है. फिल्मी जानकारों का मानना है कि कई वर्षो के बाद किसी फिल्म की चर्चा इतने व्यापक स्तर पर हो रही है.
आपको जानकर हैरत होगी कि इस बहुचर्चित फिल्म की कहानी का रहस्य धनबाद के वासेपुर के लेखक जिशान कादरी की आठ पन्नों की कहानी में छुपा था, जिसे सुन कर अनुराग ने अब तक की अपनी सबसे महंगी फिल्म बनाने का निर्णय लिया. जी हां, अनुराग की चर्चित फिल्म के मास्टरमाइंड जिशान कादरी ही हैं. आठ पन्ने की कहानी से पांच घंटे की फिल्म बनने तक के इसके रोमांचक सफर के बारे में जिशान से अनुप्रिया अनंत ने बातचीत की.
अनुराग कश्यप उस दिन पृथ्वी थियेटर आनेवाले थे. जिशान को यह जानकारी वहां लगे एक पोस्टर से मिली. वह जानते थे कि उनकी कहानी अनुराग जैसे निर्देशक ही समझ सकते हैं. उन्होंने अनुराग का लगातार 1 से डेढ़ घंटे तक पीछा किया. अनुराग की पारखी नजर भी समझ चुकी थी कि यह लड़का कुछ कहना चाहता है.
अंतत: अनुराग आये. जिशान ने अपनी आठ पन्ने की कहानी उन्हें सुनायी. अनुराग दंग थे. धनबाद के जिशान कादरी की इस आठ पन्ने की कहानी में अनुराग को वह बात नजर आयी, जो आज पांच घंटे की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के रूप में तैयार है. आठ पन्नों की कहानी में जेल है, तो बेल है, एक जान है. ये अल्ला लेगा या मोहल्ला जैसे वन लाइनर व बेखौफ संवादों ने अनुराग को आकर्षित किया.
जिशान के साथ उस दिन के बाद लगातार अनुराग ने मुलाकात की. चर्चा हुई. अनुराग के मन में कई सवाल थे, क्योंकि जिशान की कहानी में कुछ ऐसे लोगों, परिवार व उनसे जुड़ी घटनाओं का जिक्र था, जिनके बारे में यकीन करना मुश्किल था. अनुराग ने जिशान से बार-बार पूछा कि क्या वाकई यह सच्ची कहानी है. क्या ऐसा हो सकता है कि कहीं बात-बात पर बंदूक उठ जाये?
जिशान ने जब उन्हें यकीन दिलाया, तो अनुराग ने तय कर लिया कि वे इस पर फिल्म बनायेंगे. जिशान की कहानी में इतना दम था कि अनुराग ने तय किया, भले ही यह फिल्म कई हिस्सों में बने, कितनी भी लंबी क्यों न हो, वे इसे जरूर बनायेंगे. यहीं से शुरू हुई गैंग्स ऑफ वासेपुर की सिनेमाई कहानी.अनुराग ने जिशान को इस विषय पर पूरी तरह से शोध करने को कहा. 35 दिनों में जिशान अपनी रिसर्च के साथ मौजूद थे. रिसर्च के दौरान जिशान ने इस संदर्भ में जिन लोगों से भी मुलाकात की, ऐसी कई बातें उभर कर सामने आयीं जिन पर सबने चर्चा की. सबने एक परिवार, मर्डर, केस की बात की..जिससे यह बात पुख्ता हुई कि वहां वाकई वैसी बातें हुई थीं.
कैसे आयी जेहन में कहानी
बकौल जिशान, मैं खुद वासेपुर से हूं, इसलिए मेरे जेहन में वहां की हर बात तरोताजा है. कई चीजें मेरी आंखों के सामने घटी हैं. छोटे शहरों की अपनी खासियत होती है. सबको हर छोटी-बड़ी बात पता होती है. यह कहानी लिखने में मेरे लिए यही तत्व सहायक रहे. मेरा बचपन वासेपुर, धनबाद में बीता है. मैं यहां ही हर चीज से वाकिफ था. कहानी लिखते वक्त वही सारी घटनाएं मेरी आंखों के सामने आती रहीं. आप एक और बात पर गौर करेंगे, इस फिल्म में कोई एक हीरो नहीं. जितने किरदार हैं, उतने ही हीरो हैं. मसलन सभी अपने आप में हीरो हैं. सभी का अहम किरदार है.
पर्दाफाश का कोई इरादा नहीं
यह सच है कि कई लोग इस तरह की बातें कह रहे हैं कि हम इस फिल्म से वासेपुर का नाम खराब कर रहे हैं. लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमारा इस फिल्म के जरिये किसी का पर्दाफाश करने का इरादा नहीं है. जो सच है, हम वही दर्शा रहे हैं. पूरी रिसर्च के बाद हमने कहानी बनायी. हमने सिर्फ माहौल, एंबीयंस या लोकेशन का ही इस्तेमाल नहीं किया.

वासेपुर के संदर्भ में. हमने उन घटनाओं को वैसे ही प्रस्तुत किया है, जो सचमुच घटी हैं. दूसरी बात, हम यह दर्शाना नहीं चाहते कि वासेपुर में सिर्फ खून खराबा होता है. ऐसा नहीं है. वहां से भी हर साल आइएएस अधिकारी, डॉक्टर निकल रहे हैं.

लेकिन क्राइम का मुद्दा भी अहम है. वासेपुर में परेशानियां हैं, जो सुलझ नहीं रही हैं. इसकी अपनी कई वजहें हैं. कुछ लोग ये सब खत्म कर सकते हैं, लेकिन पीछे हट रहे हैं. हमारी फिल्म बस उसी हकीकत को दर्शाती है. आप ही सोचिए, मैं क्यों अपनी ही जगह का नाम खराब करूंगा. हां, जो सच है, उसे फिल्म के माध्यम से दिखाऊंगा. वहां के दर्शक जब फिल्म देखेंगे तो खुद उन्हें यकीन हो जायेगा कि हमने सच दिखाया है.
हार्ट ऑफ द टाउन
मेरे लिए तो हमेशा मेरा शहर वासेपुर हार्ट ऑफ द टाउन रहेगा, क्योंकि वहां के लोग बहुत अच्छे हैं. सबसे खास बात है कि एक दूसरे की परवाह करते हैं. वहां लोगों का गप्पे मारना, शाम को चौक-चौराहे पर बातें करना वगैरह. छोटे शहर में हर कोई रॉबिनहुड होता है. ऐसे रॉबिनहुड भी नजर आयेंगे फिल्म में.
कान फिल्मोत्सव का अनुभव
बतौर लेखक मेरी यह पहली फिल्म है और मैं खुश हूं कि पहली बार ही मुझे कान जैसे प्रतिष्ठित फिल्मोत्सव का हिस्सा बनने का मौका मिला. गैंग्स ऑफ वासेपुर के दोनों हिस्से यानी पांच घंटे की पूरी फिल्म वहां दिखाई गयी थी. ढाई घंटे की फिल्म के बाद 20 मिनट ब्रेक था. लगभग 800 लोग वापस ब्रेक के बाद लौट कर आये और पूरी फिल्म देखी. अनुराग कश्यप के निर्देशन को हैट्स ऑफ. यह उनका ही कमाल था. वरना, फिल्मोत्सव में आप प्राय: बोरिंग फिल्में छोड़ कर चले जाते हैं.
एक्टिंग का पैशन बरकरार रहेगा
मुझे अनुराग कश्यप फिल्म रॉकी के सिल्वेस्टर स्टैलॉन पुकारते हैं. क्योंकि रॉकी फिल्म भी सिल्वेस्टर ने लिखी थी और यही शर्त रखी थी कि वह फिल्म में एक्ट भी करेंगे. मैंने भी यही शर्त रखी थी. अभिनय मेरा पैशन है और मैं उसे ही बरकरार रखूंगा.

20120608

जब बोकारो में ग़दर देखने के लिए मची थी ग़दर


बोकारो के लिए ग़दर ही थी १०० करोड़ क्लब की फिल्म 
बोकारो का महा ब्लॉक बस्टर ग़दर ....
वर्ष २००१ में रिलीज हुई थी फिल्म ग़दर.बोकारो में एक तरफ देवी सिनेमा हॉल में लगान लगी थी. दूसरी तरफ जीतेन्द्र में ग़दर. मैं, माँ- पापा. सिन्हा आंटी, चाची. सभी साथ में गए थे. मैं शुरुआती दौर से ही इस लिहाज से लकी रही हूँ कि मेरे ममी पापा दोनों ही सिनेमा थेयेटर में फिल्म देखने और हमें दिखाने के शौक़ीन थे. सो, हम सारी नयी फिल्में हॉल में ही देखते थे. कई बार तो हमने फर्स्ट डे फर्स्ट शो में भी फिल्में देखी हैं. लेकिन ज्यादातर वीकेंड जो बोकारो के लिए इतवार यानि रविवार ही होता है उस दिन देखी हैं.  उस दिन टिकट न मिल पाने की वजह से कई बार हम सोमवार को भी फिल्में देखते थे. जी, स्कूल में अब्सेंट रहकर भी. लेकिन यह पापा की अनुमति के बाद ही होता था. बहरहाल, बोकारो में जितनी भी फिल्में देखीं उनमे ग़दर एक प्रेम कथा इतवार के दिन २ से पांच के शो के लिए टिकट के लिए जो मारामारी हुई थी. वह किसी जंग को जितने से कम नहीं थी. मुझे अच्छी तरह याद है जो जतन हमने फिल्म ग़दर देखने के लिए किया था. किसी और फिल्म के लिए वैसी स्थिति कभी नहीं हुई थी. बोकारो में प्राय: फिल्म के हिट फ्लॉप की खबरें बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के आधार पर नहीं. बल्कि मोहल्ले व पड़ोसियों के माउथ पब्लिसिटी के आधार पर ही होती है.हमारे मोहल्ले में भी एक अजय भैया हैं. वे उस दौर में  हमारे इलाके के फिल्म समीक्षक थे. हिंदी फिल्मों के गाने के कैस्सेट ( उस वक़्त सीडी नहीं थी ) आते. सबसे पहले हमें उनके लाउड स्पीकर से ही सुनने को मिलते थे. कैसी है फिल्म? वे बताते थे. फिर हम जाते थे. सो, शुकवार को फिल्म देखने के बाद अजय भैया ने फिल्म को पांच स्टार दिए थे. हम सन्दे को गए थे फिल्म देखने. एक घंटे पहले पहुँचने के बावजूद हमें टिकट खिड़की नजर नहीं आ रही थी. लम्बी कतार थी. सब एक दुसरे पर लदे थे. बमशक्त हमें टिकट तो मिल गयी. और महिला होने की वजह से मैं, एंटी, चाची और निशि दी को हॉल के अंदर भेज दिया गया. पापा बाहर रह गए थे. उस वक़्त पापा ने कुछ कारणवश बाल मुरवा रखे थे. हम अंदर थे और बाहर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस लाठी चार्ज कर रही थी. मैंने देखा और लोगों ने कहना भी शुरू कर दिया कि सारे टकलों पर पुलिस लाठी मार रही है. माँ की हालत ख़राब. पापा नजर भी नहीं आ रहे थे. हम डरे हुए थे. माँ बार बार यही दोहरा रही थी. कि बाद में आते. रेलेज से दुसरे दिन ही नहीं आना चहिये था. पापा को देखो. हम सभी चिंतित थे. क्यूंकि शीशे के ग्लास से बाहर का नजारा साफ़ दिख रहा था. युवा और स्टॉल में फिल्म देखने वालों की बहुत भीड़ थी. लेकिन सामने से सीढ़ी से पापा को आते देखा तो सबकी जान में जान आयी. लेकिन माँ फिर भी अंदर जाने के मूड में नहीं थी. पापा ने कहा अब इतनी मुश्किल से मिला है टिकट तो चलते हैं. फिल्म ग़दर एक प्रेम कथा थी. लेकिन सच में इतनी परेशानियों के बावजूद चार चार महिलाओं को हिम्मत से थेयटर में बिठाना. एक हिम्मत की बात थी. फिल्म देखने की यह ललक  दर्शक की फिल्म से जुड़ी प्रेमकथा को दर्शाता है. अंदर जाकर भी माँ परेशान थी. उन्होंने मुझे समझा रखा था मान लो कुछ हंगामा हो तो तुम हमलोगों के बारे में मत सोचना चुपचाप निकल जाना और सेक्टर ४ से घर चली जाना. चूँकि फिल्म के हर संवाद के बाद भी शोर शराबा हो रहा था. इंटरवल में भी माँ ने पापा को कही जाने नहीं दिया था. इन सब के बावजूद ग़दर के हर दृश्य, संवाद मुझे अच्छी तरह याद हैं. अमीषा की मासूमियत. सन्नी के संवाद. गीत. सब कुछ अच्छी तरह याद हैं. इधर फिल्म में सन्नी चापाकल उठाते और हॉल में हाहाकार मच जाती. मुझे भी  फिल्म पसंद आयी थी. फिल्म ख़त्म होने के बाद भी भीड़ इस तरह अनियंत्रित थी कि हमें थेयटर से बाहर निकलने में काफी समय लगा. मेरे होश में  ग़दर अबतक की बोकारो की एक मात्र ऐसी फिल्म है, जिसे देखने के लिए लोगों की ऐसी भीड़ उमड़ी थी. लोगों ने मारपीट करके वह फिल्म देखी थी. लगातार कई हफ़्तों तक यही नजारा था इस फिल्म का. वर्तमान में बोकारो में केवल फ़िलहाल दो ही सिनेमा हॉल सक्रिय है जीतेन्द्र और पाली. . उस दौर में तो सीटें भी फटी थीं. मल्टीप्लेक्स तो वहां आज भी नहीं.  फिलवक्त सीट की व्यस्था ठीक ठाक कर दी गयी है. लेकिन अब वहां स्टाल में फिल्म देखने वालों की भी गदर नहीं मचती. लोगों में दिलचस्पी खत्म हो गई है. या फिर अब वैसी फिल्में नहीं बनती. ठीक है कि अब फिल्मों किस श्रेणी की हैं इसकी थोड़ी बहुत समझ आ गयी है, उस लिहाज से ग़दर एक मसाला फिल्म थी. तो, मसाला फिल्में तो अब भी बनती हैं. भले ही फिल्में १०० करोड़ का आंकड़ा पार कर रही हो. लेकिन बोकारो जैसे जगहों पर अब थेयटर में जाकर फिल्में देखने का ट्रेंड कम हुआ है. मैं वर्तमान में मुंबई में हूँ.लेकिन माँ से जानकारी मिलती रहती है. माँ खुद कई सालों से हॉल नहीं गयीं. वे अब घर में ही सैटेलाईट चैनल पर प्रसारित होने का इंतज़ार करती हैं. मुझे आश्चर्य होता है जो माँ कभी इतवार तक इंतज़ार नहीं कर पाती थी. अब उन्हें खास दिलचस्पी नहीं. इस दिलचस्पी के कम होने की वजह उनकी उम्र नहीं हैं. बल्कि वह आज भी फिल्मों की खबरें जानने की शौक़ीन हैं. ,लेकिन वो खुद कहती हैं कि अरे कोई बहुत खास तो होता नहीं आजकल कहानी में. घर पे देख लेंगे टीवी पे. इस बीच माँ ने कहानी और डर्टी पिक्चर देखने की खवहिश जरुर जाहिर की थी. गौर  करें तो आज जबकि प्रोमोशन के कितने हत्कंडे लोगों के पास हैं. फिर भी बोकारो जैसे शेहर में इसका खास फर्क नहीं पड़ता. ऐसा नहीं कि सिर्फ मेरी माँ, वह खुद बताती हैं कि अब यहं के बच्चे भी बंक करके फिल्में देखने नहीं जाते. तो, इससे क्या स्पष्ट होता है कि अब फिल्में प्रोम्शन के बावजूद, १०० करोड़ का आंकड़ा पार करने के बावजूद बोकारो जैसे शहरों के दर्शकों को दिल से आकर्षित नहीं कर पा रही. उनमें ललक पैदा नहीं कर पा रही. जो किसी दौर में हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुल्हनिया और इश्क जैसी फिल्मों के दौरान होती थी कि पूरा मोहल्ला एक साथ हाथ में भुन्जे का ठोंगा फांकते १२ इ से सेक्टर ४ कम से कम 5 कीमी लोग गप्पे हांकते पैदल चले जाया करते थे. और फिर डीसी में टिकट न मिले तो पूरे मोहल्ले साथ में स्टाल में भी फिल्म देखा करते थे. बजाय इसके कि हताश होकर घर लौटा जाये. लौटते वक़्त उस फिल्म के गीत, संवादों कि चर्चा होती थी. कई दिनों तक. फिर आपस  में सभी मस्ती किया करते थे. पिंकू भैया सबके सुरक्षा की जिम्मेदारी लिया करते थे. मैं अप्रैल में बोकारो में थी,. उसवक्त वहां हाउसफुल २ लगी थी, सभी बेहेनएं थे. लेकिन किसी ने भी फिल्म हॉल में जाकर देखने की इक्च्चा जाहिर नहीं की. एक दिन खुद सेक्टर ४ गई. वहां मुझे फिल्म देखने वालों की कतार नजर नहीं आयी. इसे क्या समझें. क्या दर्शकों की दिलचस्पी खत्म हो गयी है. हम सिनेमा से जुड़े लोग इसपर बहस करते हैं कि हिंदी सिनेमा के दर्शकों को मसाला चहिये. अब भी बनती हैं मसाला फिल्में.उस वक़्त भी तो ये सारी मसाला ही फिल्में थी. फिर उस दौर में बिना प्रोमोशन के भी भीड़ कैसे जुट जाया करती थी. लेकिन अब नहीं. हमारे मोहल्ले के फिल्म विश्लेषक अजय भैया जिनके स्टार्स पर हम फिल्में देखा करते थे..उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने भी कहा कि अब हॉल में देखने और वक़्त बर्बाद करने से अच्छा है कि थोडा काम ज्यदा कर लूं. नहीं मजा आता अब निशु..उतना.बहरहाल, फिल्में धराधर बन रही हैं. १०० का सम्मान बढ़ा रही हैं. ऐसे में एक छोटे से शहर में ठेयर में जाकर फिल्में देखने से लोगों की रुचि खत्म भी हो रही है तो क्या फर्क पड़ता है. धंधा तो चलता रहेगा. भले ही ग़दर मचे न मचे. वैसे सुना है जल्द ही बोकारो में भी मल्टीप्लेक्स बनने जा रहे हैं.  लेकिन यह तय है कि बोकारो के लिए १०० करोड़ क्लब की फिल्में ग़दर, इश्क, दिलवाले दुल्हनिया.हम आपके हैं कौन ...ही रहेंगी.