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20120531

तिनका तिनका जोड़ते फिल्मकार


अच्छी फिल्म बनाने के लिए एक अच्छी कहानी की ही नहीं, भारी-भरकम बजट की भी जरूरत होती है. इसीलिए कहा जाता है कि फिल्में बनाना बच्चों का खेल नहीं, यह पैसों का खेल है. आज के माहौल में तो यह और भी जोखिम भरा काम हो गया है, क्योंकि जहां स्टार फिल्म से जुड़ने के लिए मोटी रकम लेते हैं, वहीं पैसे लगाने वाले भी अच्छा रिटर्न चाहते हैं, जबकि बॉक्स ऑफिस पर सफलता की कोई गारंटी नहीं होती. ऐसे में कई फिल्मकार अच्छी कहानियां और सोच होने के बावजूद पैसों की किल्लत की वजह से आगे नहीं बढ़ पाते. ऐसे में कुछ फिल्मकारों ने एक नयी राह निकाल ली है. अब कई फिल्मकार अपने सोच को अंजाम देने के लिए क्राउड फंडिंग का सहारा ले रहे हैं. बॉलीवुड के इस नये ट्रेंड पर अनुप्रिया अनंत की विशेष रिपोर्ट..
एक रुपये की कीमत भले ही हमारी नजर में कुछ न हो, लेकिन इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में एक-एक रुपये को जोड़कर फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है. आम लोगों से छोटा-छोटा फंड जुटाकर फिल्म बनाने की प्रक्रिया बॉलीवुड में क्राउड फंडिंग के नाम से प्रचलित हो रही है. इंडस्ट्री का यह नया ट्रेंड कुछ कलाकारों को अपनी प्रतिभा को साबित करने का मौका दे रहा है, तो कुछ नये कलाकारों के सपने को साकार करने में मुख्य भूमिका निभा रहा है. चिड़िया जिस तरह तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाती है, कुछ उसी तर्ज पर फिल्मकार भी क्राउड फंडिंग के माध्यम से फिल्मों के निर्माण की तैयारी कर रहे हैं. क्राउड फंडिंग फिल्म मेकिंग का एक नया ट्रेंड है. यह ऐसे फिल्मकारों के लिए एक राह की तरह है, जो फिल्में बनाना चाहते हैं, लेकिन पैसों की कमी के कारण नहीं बना पाते. इस क्रम में फिल्मकार बहुत से लोगों से उनकी इच्छा के अनुसार मदद करने की अपील करते हैं और फिल्म में बतौर निर्माता उन सभी का नाम भी शामिल करते हैं. मुनाफा होने पर उन्हें मुनाफा लौटाते भी हैं.
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म आइ एम इसका बेहतरीन उदाहरण है. इस फिल्म की सफलता ने कई नये फिल्मकारों का हौसला बढ़ाया है. इन दिनों कई फिल्मकार इस माध्यम से शॉर्ट फिल्में, डॉक्यूमेंट्री व फीचर फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं.
मार्गदर्शक हैं अनुराग
अनुराग कश्यप आज बड़े और सफल निर्देशकों में से एक हैं. किसी दौर में उन्होंने भी बहुत संघर्ष से अपना निर्देशन कॅरियर शुरू किया था. वे हमेशा इस बात के खिलाफ रहे हैं कि स्टार्स को लेकर फिल्म निर्माण का खर्च बढ़ाया जाये. उनका मानना है कि फिल्म बनाना एक खर्चीला आर्ट फॉर्म है. इसमें आपको अपने सोच के साथ-साथ पैसे भी लगाने पड़ते हैं. ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि कोई भी फिल्मकार फिल्म को ग्लॉसी बनाने की बजाय सीमित संसाधन में उसे बेहतर बनाने की कला सीखे. यही वजह है कि आज भी अनुराग कम बजट में लीक से हटकर फिल्में बनाते हैं. आज वे व्यवसायिक रूप से सफल निर्देशक बन चुके हैं, इसके बावजूद फिल्म निर्माण से जुड़े किसी भी पहलू पर फिजूलखर्ची बर्दाश्त नहीं करते. यहां अनुराग की सफलता का जिक्र इसलिए जरूरी है, क्योंकि उनका सफर दर्शाता है कि फिल्में बनाने के लिए फंड जुटाने के साथ-साथ जरूरी है कि फिजूलखर्ची कम हो. साथ ही इसके लिए क्राउड फंडिंग के फंडे को ज्यादा से ज्यादा अपनाया जाये. खुद अनुराग क्राउड फंडिंग फिल्मों की सराहना करते हैं. जल्द ही वे क्राउड फंडिंग के माध्यम से दो फिल्मों का निर्माण करने जा रहे हैं.
आइ एम है लैंडमार्क
निर्देशक ओनिर ने बाल यौन शोषण और अन्य गंभीर मुद्दों पर आधारित फिल्म आइ एम का निर्माण किया. यह फिल्म सफल रही और इसे राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. इस फिल्म में संजय सूरी, जूही चावला, नंदिता दास, अनुराग कश्यप, मनीषा कोइराला जैसी बड़ी हस्तियों ने अभिनय किया. ओनिर के जेहन में जब इस फिल्म का ख्याल आया, तो उनके सामने समस्या यह थी कि इस फिल्म के निर्माण के लिए पैसे कहां से आयेंगे. लीक से हटकर कहानी होने के कारणआइ एम को फाइनेंसर नहीं मिल रहे थे. इसी बीच ओनिर ने तय किया कि वे कई माध्यमों से पैसे जुटायेंगे. इसमें उनका साथ दिया उनके दोस्त संजय सूरी ने. इसके लिए उन्होंने सोशल नेटवर्किग साइट्स का सहारा लिया.
बकौल ओनिर, क्राउड फंडिंग नये फिल्मकारों को प्रोत्साहित करती है. विषयपरक और अलग तरह की फिल्में बनाने के लिए यह बेहतरीन माध्यम है. वे कहते हैं, पैसों के बिना फिल्में नहीं बन सकतीं. न ही सभी के पास इतना पैसा होता है कि वह अकेले फिल्म बना ले. ऐसे में क्राउड फंडिंग से स्वतंत्र फिल्मकारों को बहुत मदद मिलती है.
एक रुपये की भी कीमत
छुपा रुस्तम जैसे लोकप्रिय हास्य शो के एंकर गुरपाल सिंह ने कुछ दिनों पहले अपने फेसबुक वॉल पर अपना स्टेटस अपडेट किया था- जुड़ जाओ..जोड़ दो, बड़े कॉरपोरेट्स की हिजेमनी तोड़ दो. दरअसल, यह बात उन्होंने द वन रुपी प्रोजेक्ट के संदर्भ में की थी. यह वन रुपी प्रोजेक्ट स्वतंत्र फिल्मकारों की एक सराहनीय पहल है, जिसमें वे एक-एक रुपये जोड़कर फिल्म का निर्माण कर रहे हैं. इस प्रोजेक्ट की वेबसाइट पर क्लिक करते ही सबसे पहले आपकी निगाह एक फिल्म के ट्रेलर पर जाती है. ट्रेलर का प्रस्तुतिकरण ही आपको इस प्रोजेक्ट के निर्माण का पूरा स्वरूप दर्शा देगा.
लिटिल फिश इट्स बिग फिश के कांसेप्ट के साथ चलने वाला यह ग्रुप मानता है कि फिल्म मेकिंग एक महंगा व्यवसाय है, लेकिन सिर्फ चकाचौंध ही फिल्म मेकिंग नहीं. इसी उद्देश्य के साथ वे एक-एक रुपये एकत्रित कर फिल्म बना रहे हैं. अनमित्र रॉय व श्रपर्णा रॉय उनमें से एक हैं. वे बताते हैं कि कैसे इसी फरवरी में उन्होंने तय किया कि वे लोगों से पैसे लेकर फिल्म बनायेंगे. उन्होंने यह आइडिया गुरपाल सिंह को बताया. तब गुरपाल सिंह ने बताया कि पिछले कई सालों से भारत में कई फिल्मकार ऐसी कोशिश कर रहे हैं, मगर पूरी तरह उन्हें कामयाबी नहीं मिल पा रही. यही वजह है कि उन्होंने वन रुपी फिल्म ब्लॉगस्पॉट शुरू किया. इसके माध्यम से वे लगातार क्राउड फंडिंग की अपील कर रहे हैं.
बिहार पर आधारित नया पता
छपरा के रहने वाले युवा फिल्मकार पवन श्रीवास्तव भी इन दिनों बिहार की कहानी पर आधारित फिल्म नया पता का निर्माण कर रहे हैं. यह फिल्म चंपारण टॉकीज के बैनर तले बन रही है. चंपारण टॉकीज ही फंड का इंतजाम कर रही है. उनकी यह पहली फिल्म है और क्राउड फंडिंग के माध्यम से ही उन्होंने फिल्म का बजट एकत्रित किया है. इनके अलावा कई नये फिल्मकार यू-ट्यूब और सोशल नेटवकिर्ंग साइट्स के माध्यम से क्राउड फंडिंग कर रहे हैं.

मालेगांव का असली सुपर हीरो

फैजा अहमद खान द्वारा मालेगांव इंडस्ट्री पर आधारित डॉक्यूमेंट्री आगामी 29 जून को भारत में रिलीज होने जा रही है. यह डॉक्यूमेंट्री दरअसल, महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर मालेगांव की फिल्म इंडस्ट्री पर आधारित है. भारत जैसे देश में जहां सिनेमा का प्रभाव समाज के हर हिस्से पर है, जहां फिल्म का मतलब सिर्फ चकाचौंध नहीं. इसका स्पष्ट उदाहरण मालेगांव की फिल्म इंडस्ट्री को में मिलता है. जहां फिल्मों का प्रभाव लोगों के कपड़ों या फिल्मी सितारों की नकल करने तक ही सीमित नहीं है. बल्कि फिल्मों के निर्माण तक इसका विस्तार है. हिंदी फिल्म शोले के तर्ज पर मालेगांव के शोले से शुरू हुई यह फिल्म इंडस्ट्री अपने आप में एक अनोखा प्रयोग था. इस अनोखे प्रयोग के पीछे सोच थी शेख नासिर की. जिन्होंने वर्ष 2000 में अपने भाई की मदद से गांव के लोगों को ही एकत्रित किया. और उन्हें ही संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन व धर्मेंद्र के रूप में तैयार कर दिया. नासिर के लिए क्रेन या ट्रॉली साइकिल, ट्रक या ऑटो है. मोहल्ले की शादियों में वीडियोग्राफी के लिए इस्तेमाल किये जानेवाले सामान्य से कैमरे से नासिर ने मालेगांव का शोले बना डाली. आप यूट्यूब पर मालेगांव की फिल्मी दुनिया सर्च करें. आपको मालेगांव की इस फिल्म इंडस्ट्री में होनेवाले प्रयोगों का जीवंत चित्रण नजर आ जायेगा, कि किस तरह नासिर जैसे व्यक्ति ने अपनी सोच के साथ इसे अंजाम दिया है. यह हकीकत है, कि फिल्में बनाना बच्चों का खेल नहीं. आज जहां हिंदी सिनेमा जगत 100 साल के जश्न की तैयारी में जुटा है, वहीं 12 साल पूरानी इस इंडस्ट्री को चलाने वाले नासिर व उनकी टीम ने साबित किया है कि दरअसल, सिनेमा सिर्फ तकनीक नहीं है, वहां कला भी महत्वपूर्ण है. डॉक्यूमेंट्री सुपरमैन ऑफ मालेगांव के निर्माण के लिए फैजा अहमद खान भी बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने ऐसे मुश्किल विषय का चयन किया. और पूरी दुनिया में इस प्रयोग को सम्मान दिलाया.और किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म का भारत में रिलीज होना भी एक बड़ी सफलता है. दादा साहेब फाल्के भी मानते थे कि प्रयोग ही सिनेमा है. उस लिहाज से नासिर ने इसे सार्थक किया है.

20120530

फार्मूला ईजाद करनेवाला निर्देशक

दिबाकर बनर्जी जब अपनी फिल्म ‘खोंसला का घोंसला’ लेकर आये थे, तो इस फिल्म ने बनने में जितना वक्त लिया, उससे कहीं अधिक वक्त व संघर्ष उन्होंने फिल्म को रिलीज कराने के लिए किया. जब फिल्म रिलीज हुई थी, तो सभी चकित थे. क्योंकि दिबाकर ने एक ऐसे विषय पर फिल्म बनायी थी, जिसके बारे में लोगों ने सोचा भी नहीं था. आम आदमी की सामान्य सी समस्या को उन्होंने फिल्म पर जीवंत रूप से दर्शाया और अपनी पहली फिल्म से ही उन्होंने साबित कर दिया कि वे बिल्कुल मौलिक सोच के साथ नवीन विषयों पर फिल्में बनानेवाले निर्देशक हैं. दिबाकर दरअसल, उन निर्देशकों में से एक हैं, जिन्होंने हमारे ही बीच की कहानियों को, किरदारों को दिलचस्प तरीके से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है. वे अपनी फिल्मों से बौद्धिक होने का दावा नहीं करते, लेकिन फिर भी वह आकर्षित करते हैं. उनके निर्देशन शैली की यह खासियत है कि उन्होंने अब तक केवल चार फिल्मों का निर्माण किया है और चारों ही फिल्में किसी भी दृष्टिकोण से एक दूसरे से नहीं टकराती. गौर करें तो उन्होंने अपनी हर फिल्मों में दो साल का अंतराल रखा है. इन दो सालों में वे बिल्कुल नये तेवर, नये सरप्राइज पैकेज के साथ दर्शकों के सामने आ जाते हैं. ‘खोंसला का घोंसला’ 2006 में आयी, ‘ओये लकी..’2008, ‘एलएडी’ 2010 में और 2012 में आ रही है ‘संघई’. ‘खोंसला..’ में उन्होंने आम आदमी की एक ऐसी समस्या को दर्शाया जिससे वाकई हर व्यक्ति कई बार जूझता है. ‘ओय लकी..’ में अजीबोगरीब बंटी चोर की दास्तां ही गढ. दी तो ‘एलएसडी’ में उन्होंने खूफिया कैमरे के फायदे, नुकसान के साथ कई कहानियां ही कह दी. ‘एलएसडी’ प्रयोगात्मक सिनेमा के रूप में एक महत्वपूर्ण फिल्म है, जिसे फिल्म मेकिंग के छात्रों को जरूर देखनी चाहिए. जल्द ही उनकी फिल्म ‘संघई’ रिलीज हो रही है. जिसमें उन्होंने इमरान हाशमी के किरदार को गढ. कर सबको चौंका दिया है. दिबाकर अखबार व किताबें पढ.ते रहते हैं. यही वजह है कि वे छोटी खबरों पर भी नजर रखते हैं और उन्हें उसी में अपनी एक कहानी मिल जाती है. हो सकता है कि जब मुंबई को संघई बनाने की कवायद चल रही थी, तभी दिबाकर के मन में यह ख्याल आ गया हो और उन्होंने इसकी तैयारी कर ली होगी. ‘संघई’ के प्रोमोज आकर्षित कर रहे हैं. दिबाकर फिर कुछ सरप्राइज लेकर आयेंगे और फिर अपना हस्ताक्षर छोड़ जायेंगे. ऐसे ही निर्देशक हैं, जो खुद फार्मूला निर्देशक नहीं बनते, बल्कि लोग उनके बनायी गयी चीजों को फार्मूला मानते हैं. वे युवा लीडर फिल्मकारों में से एक हैं.

20120529

बड़ी लंबी है शहीदों की फेहरिस्त


haal में ही राज्यसभा ने कॉपीराइट संशोधन बिल पास किया. राज्यसभा में कॉपीराइट के मुद्दे पर गीतकार व लेखक जावेद अख्तर ने अपने भाषण में मार्मिक बातें कही. निस्संदेह जावेद साहब का वह भाषण कॉपीराइट मामले पर आधारित था. लेकिन उस दिन उनके हर एक वाक्य, हर शब्द में एक नयी परत खुलती नजर आ रही थी. उनकी बातों में कुछ भी बनावटी नहीं था. बेहद सटीक व स्पष्ट शब्दों में उन्होंने न सिर्फ एक लेखक की पीड़ा का बखान किया, बल्कि उन्होंने संगीतकारों की भी दुर्दशा पर भी प्रकाश डाला. दरअसल, जावेद अख्तर ने इन 100 सालों में बनी एक महान इंडस्ट्री की हकीकत का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है. उनकी बातें साफ दर्शाती हैं कि ऐसे देश में जहां भारतीय सिनेमा जगत एक इंडस्ट्री बन चुकी है. उन्होंने बताया कि इस इंडस्ट्री में श्रेष्ठ कलाकारों व निर्माताओं को छोड़ कर शेष क्रिएटिव लोगों की क्या दुर्दशा है. उन्होंने पंडित खेमचंद का जिक्र किया, जो उस जमाने के ब.डे संगीतज्ञ थे. उस संगीतकार की पत्नी पिछले दिनों मलाड स्टेशन पर भीख मांगती नजर आयी थी. कुछ इसी कदर उन्होंने ओपी नैयर की स्थिति का भी जिक्र किया कि कैसे एक दौर में फिल्मी पोस्टर पर छाये रहनेवाले सुर के जादूगर, नैयर अंतिम दिनों में एक फैन के घर में छोटे से कमरे में रहे, जबकि उनके सैकड़ों गाने आज भी बज रहे हैं और रॉयल्टी म्यूजिक कंपनियां ले रही हैं. भारत से बाहर के दर्शक भारतीय सिनेमा को यहां के गीत-संगीत से ही जानते हैं. गीतकारों, संगीतकारों की ऐसी दुर्दशा दुखद है. जबकि विदेशों में आज भी ऐसे कई संगीतकार-गायक हैं, जिन्होंने कुछ गाने बनाये. कुछ गीत कंपोज किये और उसके बाद ताउम्र रॉयल्टी से अपनी खुशहाल जिंदगी व्यतीत करते रहे. जावेद साहब ने भाषण के अंत में एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी. उन्होंने शैलेंद्र, मजरूह, गुलाम मोहम्मद जैसे हिंदी सिनेमा के संगीत में योगदान करनेवाले कई लोगों को शहीद कह कर संबोधित किया. वाकई, ये सभी शहीद ही तो हैं, जैसे एक सिपाही देश की आजादी में अपनी जान की कुर्बानी देता है. इन्होंने भी अपनी कला की कुर्बानी ही तो दी है. हिंदी सिनेमा के 100 साल पर यह मुद्दा जरूरी है कि अब इन शहीदों की फेहरिस्त में कोई नया नाम न जु.डे और उन्हें उनका हक मिले.

बड़ी लंबी है शहीदों की फेहरिस्त


हाल में ही राज्यसभा ने कॉपीराइट संशोधन बिल पास किया. राज्यसभा में कॉपीराइट के मुद्दे पर गीतकार व लेखक जावेद अख्तर ने अपने भाषण में मार्मिक बातें कही. निस्संदेह जावेद साहब का वह भाषण कॉपीराइट मामले पर आधारित था. लेकिन उस दिन उनके हर एक वाक्य, हर शब्द में एक नयी परत खुलती नजर आ रही थी. उनकी बातों में कुछ भी बनावटी नहीं था. बेहद सटीक व स्पष्ट शब्दों में उन्होंने न सिर्फ एक लेखक की पीड़ा का बखान किया, बल्कि उन्होंने संगीतकारों की भी दुर्दशा पर भी प्रकाश डाला. दरअसल, जावेद अख्तर ने इन 100 सालों में बनी एक महान इंडस्ट्री की हकीकत का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है. उनकी बातें साफ दर्शाती हैं कि ऐसे देश में जहां भारतीय सिनेमा जगत एक इंडस्ट्री बन चुकी है. उन्होंने बताया कि इस इंडस्ट्री में श्रेष्ठ कलाकारों व निर्माताओं को छोड़ कर शेष क्रिएटिव लोगों की क्या दुर्दशा है. उन्होंने पंडित खेमचंद का जिक्र किया, जो उस जमाने के ब.डे संगीतज्ञ थे. उस संगीतकार की पत्नी पिछले दिनों मलाड स्टेशन पर भीख मांगती नजर आयी थी. कुछ इसी कदर उन्होंने ओपी नैयर की स्थिति का भी जिक्र किया कि कैसे एक दौर में फिल्मी पोस्टर पर छाये रहनेवाले सुर के जादूगर, नैयर अंतिम दिनों में एक फैन के घर में छोटे से कमरे में रहे, जबकि उनके सैकड़ों गाने आज भी बज रहे हैं और रॉयल्टी म्यूजिक कंपनियां ले रही हैं. भारत से बाहर के दर्शक भारतीय सिनेमा को यहां के गीत-संगीत से ही जानते हैं. गीतकारों, संगीतकारों की ऐसी दुर्दशा दुखद है. जबकि विदेशों में आज भी ऐसे कई संगीतकार-गायक हैं, जिन्होंने कुछ गाने बनाये. कुछ गीत कंपोज किये और उसके बाद ताउम्र रॉयल्टी से अपनी खुशहाल जिंदगी व्यतीत करते रहे. जावेद साहब ने भाषण के अंत में एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी. उन्होंने शैलेंद्र, मजरूह, गुलाम मोहम्मद जैसे हिंदी सिनेमा के संगीत में योगदान करनेवाले कई लोगों को शहीद कह कर संबोधित किया. वाकई, ये सभी शहीद ही तो हैं, जैसे एक सिपाही देश की आजादी में अपनी जान की कुर्बानी देता है. इन्होंने भी अपनी कला की कुर्बानी ही तो दी है. हिंदी सिनेमा के 100 साल पर यह मुद्दा जरूरी है कि अब इन शहीदों की फेहरिस्त में कोई नया नाम न जु.डे और उन्हें उनका हक मिले.

20120528

बोले तो..लौट रहे हैं रोडछाप


टिकट की खिड़की पर राउड़ी बोल. बाकी काम मुझ पर छोड़..फिल्म ‘राउड़ी राठौड़’ के प्रोमोशनल पोस्टर्स पर इन दिनों यह संवाद खूब नजर आ रहे हैं. आम लोगों में यह बेहद लोकप्रिय हो रहा है. दरअसल, जब से फिल्म ‘राउड़ी राठौड़’ की चर्चा शुरू हुई है, उस वक्त से ही इसकी पंचलाइन बेहद पसंद की जा रही है. इसकी खास वजह यह है कि यह दो पंक्तियों की पंचलाइन बेहद सामान्य से शब्दों में लिखी गयी है और लोगों को इससे अपनापन लग रहा हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो राउड़ी के संवादों में फिर से टपोरी अंदाज के नायकों की वापसी हो रही है. यह टपोरी अंदाज नायक का अपना स्टाइल है. वह डिजाइनर कप.डे नहीं पहनता. ब्रांडेड चश्मे नहीं लगाता, लेकिन फिर भी उसके स्टाइल की अपनी दुनिया है. लोग उसे उसी अंदाज में पसंद करते हैं. खुली शर्ट, गले में रूमाल और डुप्लीकेट सनग्लासेज उसकी पहचान हैं. और बोले तो, टेंशन, ठोक डाल उसकी डिक्शनरी के शब्द. इन सब के बावजूद वह लोकप्रिय है. हिट है. हिंदी सिनेमा में टपोरी अंदाज के नायकों को लोकप्रिय बनाने का मुख्य श्रेय अनिल कपूर को जाता है. फिल्म ‘राम-लखन’ में वन टू का फोर करनेवाले अनिल ने इस फिल्म से टपोरी अंदाज के नायकों को मुख्यधारा की फिल्मों का नायक बना डाला था. ये टपोरी, बिंदास अंदाज में बोलते हैं. चलते हैं. लोगों की मदद करते हैं. रफ एंड टफ रहनेवाले इन टपोरियों से पूरी दुनिंया डरती है. लेकिन वह हंसमुख भी होते हैं और भावनात्मक भी. अनिल के बाद फिल्म मुत्राभाई सीरीज में टपोरियों का अलग रूप दर्शकों के सामने आया. एक लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर से रूपहले परदे पर ऐसे किरदारों की लोकप्रियता बढ. रही है. फिल्म ‘इशकजादे’ में अर्जुन का किरदार भी अनपढ. टपोरी का ही है. ‘गैंग ऑफ वसैपुर’ में भी टपोरी अंदाज को अहमियत दी गयी है. हाल में दिखायी जा रही फिल्मों में टपोरियों के किरदारों में अलग-अलग राज्यों की झलक है. गौर करें तो ‘गैंग ऑफ वसैपुर’ में बिहार-झारखंड के टपोरियों का अंदाज नजर आ रहा है, तो राउड़ी में साउथ का. ‘इशकजादे’ में यूपी के टपोरी का तो अन्य फिल्मों में मुंबई के टपोरियों का. दरअसल, रोडछाप, रोमियो, टपोरी, छोकरा जैसे नामों से विख्यात यह किरदार भारत के राज्यों के एक ऐसे युवा वर्ग से परिचय कराता है, जो ऐसी जिंदगी जीते हैं और इनकी जिंदगी बेहद दिलचस्प भी होती है. आम युवा वर्ग उनमें अपनी छवि को तलाशता है. इसलिए फिल्मों में वे हमेशा लोकप्रिय रहे हैं और लोकप्रिय होते रहेंगे.

20120516

बेबस, अकेला, बेजुबां चुपचाप रोया

आमिर खान ने अपने शो ‘सत्यमेव जयते’ में बीते रविवार बाल यौन शोषण का मुद्दा उठाया था. शो के पहले एपिसोड से ज्यादा उन्हें इस बार प्रतिक्रियाएं मिलीं. इस शो के प्रसारण के बाद सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कई लोगों ने आकर लगातार इस मुद्दे पर चर्चा की. इन लोगों में कई सेलिब्रिटी भी शामिल थे. अभिनेत्री व गायिका सोफिया हयात ने ट्वीट किया और अपने ब्लॉग पर लिखा है कि उनके साथ भी कभी बचपन में ऐसा हादसा हुआ था. सेलिब्रिटीज के अलावा चौंकानेवाली बात यह थी कि कई लड़कियों व लड़कों ने जिनके साथ बचपन में कभी ऐसी घटना घटी, उन्होंने ने भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आकर अपना स्टेटस अपडेट दिया. सोमवार व मंगलवार के दिन मैंने नोटिस किया. ऐसे स्टेटस लिखनेवाले कई लोग नजर आये. यह आंक.डें साफतौर पर बताते हैं कि कितने लोगों ने अपना मासूम बचपन इस हैवानियत की वजह से खोया है. आमिर खान के इस खास एपिसोड व खास मुहिम की सराहना की जानी चाहिए. इससे लोगों में न सिर्फ जागरूकता आयी है, बल्कि कई खामोश आवाजों ने अपनी चुप्पी भी तोड़ी है. आमिर के शो का गीत वाकई इस रूप में सार्थक है कि अब पीड़ित लोगों ने धीरे-धीरे ही सही पर इस चुप्पी को तोड़ा है. कई वर्षों पहले मीरा नायर की फिल्म आयी थी ‘मॉनसून वेडिंग’. इस फिल्म का केंद्रीय विषय बाल यौन शोषण का मुद्दा तो नहीं था, लेकिन शेफाली छाया व रजत कपूर के किरदारों में मीरा नायर ने एक अहम बात कहने की व दिखाने की कोशिश की थी. इस फिल्म को जिन दर्शकों ने भी गौर से देखा होगा, वे निश्‍चित तौर पर निर्देशक के उद्देश्य को समझ पाये होंगे. आज से लगभग 11 साल पहले मीरा ने यह फिल्म भारतीय दर्शकों के लिए बनायी थी. शायद मीरा ने महसूस किया होगा कि उस वक्त इस विषय को शायद न स्वीकारा जाये, लेकिन संकेत के रूप में ही सही उन्होंने इस विषय पर बातचीत का एक माहौल तैयार किया था. मधुर भंडारकर ने भी फिल्म ‘पेज 3’ में चौंकानेवाले दृश्य दिखाये थे. जिनमें एक कंपनी का सीइओ बाल यौन शोषण करता है. फिल्म ‘आइएम’ में भी इस मुद्दे पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है. इन फिल्मों के माध्यम में बाल यौन शोषण के ही विभित्र रूपों को दर्शाया गया है. आमिर खान की इस मुहिम के बाद इस संवेदनशील विषयों पर और फिल्में बने तो शायद और लोगों की आंखें खुलेंगी.

20120515

बंदिनी से बंदूक धारिणी


बिमल रॉय की फिल्म ‘बंदिनी’ में कल्याणी (नूतन), विकास कुमार ( अशोक कुमार) से बेहद प्यार करती है, लेकिन विकास उसे धोखा देता है. इसके बावजूद फिल्म के अंत में वह जाकर विकास के ही चरणों में गिर जाती है. मेरा पति परमेश्‍वर की तर्ज पर वह विकास कुमार के साथ आगे का सफर पूरा करती है. वह उस देवेन को भी भूल जाती है, जो उस वक्त उसके सहारा बनते हैं, जब उसके पास कोई नहीं होता. इसके बावजूद विकास के तमाम बेवफाई के वह विकास का ही साथ चुनती है. बिमल रॉय की यह फिल्म 1963 में रिलीज हुई थी. यानी आज से 49 वर्ष पूर्व. उस दौर में भारतीय समाज का परिवेश उसका ढांचा बिल्कुल अलग था. उस वक्त महिलाएं शायद उसी सोच के साथ आगे बढ.ती थीं, जिनके लिए उनके पति में ही उनकी दुनिया बसती है. उसी के मद्देनजर फिल्मों में महिलाओं की भूमिकाएं गढ.ी जाती थीं. इन 49 सालों में इस सोच में बड़ी तब्दील आ चुकी है. अब प्यार की परिभाषा भी बदल चुकी है और इसे जताने-निभाने का तरीका भी. अब अभिनेत्रियों को बंदिनी बनना नहीं बल्कि बंदूकधारिणी बनना गंवारा है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘इशकजादे’ में जोया के रूप में परिणिति के किरदार को कुछ ऐसा ही बेखौफ दिखाया गया है. अपने पति से मिले धोखे से वह भी टूटती है. आह भरती है. लेकिन वह आह भर कर शांत नहीं हो जाती, बल्कि आह के साथ वह बंदूक में गोलियां भरती है और अपने धोखे का बदला लेने के लिए निकल पड़ती है. वह सिसकने की बजाय अपने प्रेमी से पति बने परमा की गर्दन पर बंदूक तान देती है. इससे साफ जाहिर होता है कि वर्तमान दौर की महिलाएं आंसू बहा कर चुपचाप अपनी जिंदगी व्यतीत नहीं कर सकतीं. फिल्म ‘अर्थ’ में शबाना आजिमी अपने पति की बेवफाई को चुपचाप सह लेती है, लेकिन वहीं फिल्म ‘इश्किया’ में अपने पति के सच को जानने के लिए, अपना बदला पूरा करने के लिए साजिश तक रच जाती है और अंतत: अपने पति को मारने में भी वह नहीं हिचकती. हाल ही में रिलीज हुई हेट स्टोरी की महिला किरदार अपने बदले के खिलाफ एक अलग ही रुख इख्तियार कर लेती है. दरअसल, हकीकत यह है कि वर्तमान में महिलाएं अब बेबस, लाचार कहलाने की बजाय पुरुषों को सबक सिखाने में विश्‍वास रखती है. पुरुष प्रधान समाज में वाकई ऐसे निर्देशक जो महिलाओं की इतनी सशक्त भूमिकाएं गढ. रहे हैं वह काबिल-ए-तारीफ हैं.

20120514

छोटी-सी उमर से 1000वां कदम

आज बालिका वधू के 1000 एपिसोड पूरे हो रहे हैं. बालिका वधू की पूरी टीम इसका जश्न मना रही है. यह जश्न केवल बालिका वधू की टीम का नहीं है, बल्कि धारावाहिक के लेखक पुरनेंदुशेखर की सोच के परिपक्व होने का भी जश्न है. उन्होंने ही पहली बार इस मुद्दे को महसूस किया और उसे छोटे परदे पर पहचान दिलायी. कभी पुरनेंदु इस विषय को लेकर फिल्म बनाने की परिकल्पना कर रहे थे, लेकिन इस छोटे परदे की बालिका वधू ने उसे किसी सुपरहिट फिल्म से भी अधिक लोकप्रिय बना दिया. ‘बालिका वधू’ धारावाहिक भले ही छोटे परदे पर प्रसारित होता हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता किसी 100 करोड़ का आंकड़ा पार करनेवाली फिल्म से कम नहीं. इस दौर में जहां हर तरफ टीआरपी की होड़ है. मनोरंजन को अहमियत दी जा रही है. ऐसे में एक ऐसा शो जो लगातार गंभीर मुद्दों को उठा रहा है. गंवई कहानियां दिखा रहे हैं. वह लगातार लोकप्रियता बनाये रखने में कामयाब है. यही वह शो है, जिसने उस दौर में अपना स्थान बनाने में काफी मशक्कत की थी, जिस वक्त छोटे परदे पर सास बहू वाले धारावाहिकों का बोलबाला था. उस वक्त कलर्स भी नया चैनल था और बालिका वधू जैसे धारावाहिक का सोच भी. दोनों ही नये प्रतिभागियों ने खुद को साबित कर दिया. किसी दौर में जो दर्शक बालिका वधू के रूप में सचिन की फिल्म ‘बालिका वधू’ को याद करते थे. अचानक धारावाहिक ‘बालिका वधू’ व उसकी आनंदी इस शब्द की पयार्यवाची बन गयी. गौर करें तो बालिका वधू केवल एक लड़की की कहानी नहीं (जिसकी बचपन में शादी हो जाती है), बल्कि यह समाज की हर वर्ग की महिला की कहानी है. इस धारावाहिक का हर किरदार अपने आप में एक कहानी है. अगर संयुक्त रूप से देखें तो इस धारावाहिक को आधार बना कर महिलाओं पर केंद्रित सीरीज फिल्मों का निर्माण किया जा सकता है. फिर चाहे वह सुगना, फुली के रूप में बाल विधवा का संघर्ष हो, गहना व आनंदी के रूप में बालिका वधू का संघर्ष, गौरी के रूप में शादी टूट जाने के बाद की जिंदगी का संघर्ष हो या दादी सा के रूप में अकेली महिला के रूप में परिवार का स्तंभ बनना. बालिका वधू की पूरी यात्रा किसी हिंदी फिल्म से कम दिलचस्प नहीं. दरअसल, यह जश्न उन हजारों किरदारों का है, जो वास्तविक जिंदगी से प्रभावित थी और जिन्होंने वास्तविक जिंदगियां सकारात्मक रूप से बदली.

20120511

हुआ छोकरा जवां रे

फिल्म ‘इशकजादे’ आज रिलीज हो रही है. बोनी कपूर के बेटे अर्जुन कपूर अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत कर रहे हैं. इस कपूर खानदान (सुरविंदर कपूर-बोनी कपूर के पिता) की यह तीसरी पीढ.ी है. तीसरी पीढ.ी में अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर के बाद अर्जुन दूसरे सदस्य होंगे, जो फिल्मी कैरियर की शुरुआत कर रहे हैं. यह सच है कि जो सुपरसितारा हैसियत कपूर खानदान (पृथ्वराज कपूर खानदान) की चौथी पीढ.ी व भाई बहन करीना कपूर व रनबीर कपूर को प्राप्त है, वह इस कपूर खानदान की तीसरी पीढ.ी को प्राप्त नहीं था. इसके बावजूद इस कपूर (अर्जुन) में कुछ खास बात नजर आ रही है. अर्जुन की परवरिश शानौ शौकत और ऐशो आराम से हुई है. चूंकि वह ब.डे निर्माता बोनी कपूर के परिवार से हैं, फिर भी बोनी कपूर के प्रोडक् शन हाउस से वह लांच नहीं हो रहे. उन्होंने आम प्रतिभागियों की तरह कई दफे ऑडिशन दिया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि फिलवक्त बोनी इस आर्थिक स्थिति में नहीं कि वह किसी बड़ी फिल्म का निर्माण अकेले अपने कंधे पर करें. उनकी खस्ताहाल आर्थिक स्थिति का अनुमान इंडस्ट्री व उनके करीबियों को बखूबी मालूम है. ऐसे में अर्जुन का यह निर्णय कि वह किसी दूसरे प्रोडक्शन हाउस के साथ अपने कैरियर की शुरुआत करेंगे, बेहद उचित था. उनके कैरियर की शुरुआत के लिए भी. दरअसल, अपने जंगल में तो सभी राजा होते हैं. असली कमाल तो जब दिखता है, जब वह शेर दूसरे जंगल में जंग जीत आये. उस लिहाज से अर्जुन को भी ‘इशकजादे’ के रूप में शुरुआती दौर से ही एक बड़ा इंस्टीटयूशन मिला. वे स्वयं बताते हैं कि किस तरह निर्देशक हबीब फैजल के साथ उन्होंने लगातार ट्रेनिंग ली. शायद अपने होम प्रोडक्शन में वे इतनी मेहनत व शिद्दत से काम नहीं कर पाते. अपनी अभिनय क्षमता पर उतनी बारीकियों से ध्यान नहीं दे पाते. क्योंकि कहीं न कहीं उन पर अपने जंगल के राजा वाले ख्याल मंडराते रहते. केवल अर्जुन ही नहीं, बल्कि वे सभी सुपरसितारों के बेटे बेटियां जिनका अपना प्रोडक्शन हाउस है, उन्हें शुरुआत हमेशा दूसरे मंझे निर्देशकों के साथ ही करना चाहिए

20120510

लौट रही हैं पति, पत्नी और वो की कहानियां


छोटे परदे पर पति, पत्नी और वो की कहानी हम कई वर्षो से देखते आ रहे हैं. खासतौर से एकता कपूर के शोज में इन कहानियों को तूल दिया जाता रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों में इस ट्रेंड में बदलाव आया था. पति, पत्नी और वो की त्रिकोणीय प्रेम कहानियों पर ब्रेक लग गया था. पिछले कुछ सालों में यह स्थान सामाजिक विषयों ने लिया था. लेकिन एक बार फिर टेलीवुड के कई धारावाहिकों में इसी ट्रैक पर कहानियों को मोड़ा जा रहा है.
वर्षो पहले शोभा डे के शो स्वाभिमान में शादी के बाद एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर पर आधारित कहानी दिखाई गयी थी. शो का निर्देशन महेश भट्ट ने किया था. उन्होंने इसी विषय पर अर्थ नामक फिल्म भी बनाई थी, जो सफल रही थी. जिस दौर में स्वाभिमान का निर्माण हुआ था वह दौर 1995 का था. तब इस धारावाहिक के विषय को लेकर काफी चर्चाएं हुई थीं कि इस तरह के विषय को छोटे परदे पर नहीं लाना चाहिए.
लेकिन गौर करें, तो इसी शो से छोटे परदे ने इस बोल्ड विषय को अपनाया और तब से छोटे परदे के निर्माताओं के लिए यह विषय टीआरपी बढ़ाने का एक जरिया बन चुका है. स्वयं महेश भट्ट मानते हैं कि यह वास्तविकता है कि भले ही इंसान खुद को कितना भी ईमानदार और आदर्श बताने की कोशिश करे, ऐसे रिश्ते जुड़ते जाते हैं. और मैं मानता हूं कि दिल से झूठ नहीं बोलना चाहिए. आम जिंदगी में भी ऐसे कई किस्से दर्शकों के सामने हैं.
क्योंकि प्यार, शादी और जिम्मेदारियों का रिश्ता लंबे समय तक लेकर चलना एक कठिन कार्य है. छोटे परदे पर जब भी ऐसी कहांिनयां दिखायी गयी हैं, दर्शकों ने हमेशा पहली पत्नी का ही साथ दिया है. फिर चाहे वह क्योंकि सास भी कभी बहू थी की तुलसी हो या क्या हुआ तेरा वादा की मोना. दर्शक हमेशा यह महसूस करते हैं कि पहली पत्नी के साथ धोखा हुआ है.
और दर्शकों की यही हमदर्दी टीआरपी के अंक बटोरने में कामयाब हो जाती है. दर्शकों को उस वक्त सबसे बड़ा झटका लगा था जब एकता कपूर ने अपने सुपरहिट शो क्योंकि सास भी कभी बहू थी में आदर्श पति-पत्नी मीहिर व तुलसी की जिंदगी में मंदिरा नामक दूसरी औरत की एंट्री करायी थी. उस वक्त भी सभी दर्शकों ने तुलसी का ही साथ दिया था.
क्या हुआ तेरा वादा
सोनी टीवी पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक क्या हुआ तेरा वादा में इन दिनों मोना अपने पति प्रदीप द्वारा दिये गये धोखे से खुद को उबारने की कोशिश कर रही हैं. प्रदीप व मोना के बीच प्रदीप की पुरानी गर्लफ्रेंड अनुष्का आ चुकी है. बहुत मिन्नतें करने के बाद जब अनुष्का मोना की जिंदगी से नहीं गयी, तो अब मोना ने अपना अलग रास्ता चुन लिया है. कई सालों पहले बनी फिल्म अर्थ में शबाना आजमी ने चुपचाप सारी परेशानियों व दर्द को ङोल लिया था. लेकिन इस जमाने में मोना अपना सम्मान वापस हासिल करने के लिए जद्दोजहद कर
रही है.
साथ निभाना साथिया
स्टार प्लस के धारावाहिक साथ निभाना साथिया में इन दिनों गोपी और अहम की जिंदगी में अहम की पुरानी गर्लफ्रेंड अनीता की एंट्री हुई है. लेकिन गोपी की सास कोकिला अपनी बहू की गृहस्थ जिंदगी को टूटते व बिखरते देखने की बजाय जल्द से इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश कर रही है.
ससुराल सिमर का
कलर्स के ससुराल सिमर का में भी इन दिनों यही ट्रैक चल रहा है. प्रेम की जिंदगी में एक नयी लड़की की एंट्री हुई है, जिसकी गुत्थी सिमर सुलझाने की कोशिश कर रही है.
तुम देना साथ मेरा
लाइफ ओके के शो तुम देना साथ मेरा में भी हूबहू इसी ट्रैक पर कहानी दोहरायी जा रही है.
बालिका वधू
कलर्स के लोकप्रिय धारावाहिक बालिका वधू में आनंदी, जगिया और गौरी की कहानी भी इसी विषय पर आधारित है. इस शो में लगातार नये ट्विस्ट आ रहे हैं.
इसके अलावा कुछ तो लोग कहेंगे में निधि व आशुतोष के बीच डॉ मल्लिका ने कई बार दरार डालने की कोशिश की. लेकिन वह कामयाब नहीं हुई. प्रतिज्ञा, आइएम विरानी, मैं लक्ष्मी तेरे आंगन की, तेरे लिए जैसे धारावाहिकों में भी इस ट्रैक पर कहानियों का निर्माण होता रहा है.

जवां इशकजादा अर्जुन


उनका बचपन लाइट, कैमरा एक्शन के बीच ही बीता. लगभग पूरा परिवार फिल्म निर्माण से जुड़ा रहा है. इसके बावजूद जब पहले ब्रेक की बारी आयी, तो उन्होंने अपने होम प्रोडक्शन की बजाय यशराज बैनर के साथ शुरुआत की.
इसके पीछे मंशा साफ थी कि वे भी संघर्ष का स्वाद चखें. बात हो रही है निर्माता बोनी कपूर के बेटे अर्जुन कपूर की. यशराज की फिल्म इशकजादे से अपने कॅरियर की शुरु आत कर रहे अर्जुन इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हैं. पहली फिल्म से जुड़े उनके अनुभव और तैयारियों पर अनुप्रिया अनंत ने उनसे विशेष बातचीत की.
इशकजादे के प्रोमोज में अर्जुन कपूर दर्शकों को आकर्षित करने में कामयाब रहे हैं. उनकी पूरी कोशिश और उम्मीद यही है कि फिल्म को भी दर्शकों का प्यार मिले.
अर्जुन, यह आपकी पहली फिल्म है. क्या इसको लेकर आप नर्वस हैं?
जी हां, बहुत नर्वस हूं. बावजूद इसके कि मैंने अपने परिवार में हमेशा फिल्में बनते देखी हैं. लेकिन बतौर एक्टर बात और हो जाती है. पूरी दुनिया की नजर आप पर होती है. आपकी छोटी सी भी गलती लोग नोटिस करते हैं.
प्रोमोज देखकर लोग आपकी तारीफ कर रहे हैं. कैसा लग रहा है?
इसलिए और अधिक नर्वस हूं, क्योंकि प्रोमोज में दर्शकों ने मुझे पसंद किया है. अब फिल्म में भी पसंद कर लें, तो बात बने.
फिल्म का नाम इशकजादे क्यों है. इश्कजादे क्यों नहीं?
इस बारे में हबीब सर बेहतर बता पायेंगे. हालांकि, मैं मानता हूं कि फिल्म युवाओं की है और युवा इन दिनों कोई भी काम सीधे तरीके से तो करते नहीं. इसलिए, इशकजादे हैं. और देखिए, यह अलग नाम है तभी तो लोकप्रिय है. तभी तो आपने सवाल पूछा.
आप खुद एक फिल्मी खानदान से संबंध रखते हैं, फिर शुरुआत के लिए बाहरी प्रोडक्शन हाउस का सहारा क्यों लिया?
मैं मानता हूं कि किसी भी अभिनेता के लिए अभिनय सीखने का यही सही तरीका हो सकता है. अपने घर से तो मैं कभी भी लांच हो सकता था. लेकिन शायद वहां मुझे इतना कुछ सीखने का मौका नहीं मिलता. लोगों को ऐसा लगता है कि आप फिल्मी खानदान से हैं, तो आपके लिए राहें आसान होंगी. लेकिन मैं खुद को खुशनसीब मानता हूं कि जब मैंने यशराज में ऑडिशन दिया था, लोगों को पता नहीं था कि मैं बोनी कपूर का बेटा हूं. मेरे साथ ऑडिशन की वही प्रक्रिया हुई थी जो किसी भी दूसरे कलाकार के साथ होती है.
दरअसल, मैंने जब ऑडिशन दिया था, उस वक्त वायरस दीवान नामक फिल्म के लिए मेरा चुनाव किया गया था. लेकिन बाद में इशकजादे की शुरुआत हुई. मुझे हबीब फैजल जैसे बेहतरीन निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिला. उनके साथ मैंने कई वर्कशॉप किये हैं. बहुत तैयारी की है. मैं खुद औरों के ऑडिशन में भी चला जाता था.
इशकजादे के लिए सबसे पहले बतौर लीड एक्टर मेरा नाम फाइनल हुआ. फिर बाद में अभिनेत्री का चुनाव हुआ था. उस दौरान भी मैं अपने किरदार में रह कर सारे ऑडिशन में भाग ले लिया करता था. इससे सबसे ज्यादा फायदा मेरा ही हुआ कि मैंने काफी मेहनत की अपने किरदार पर.
अपने किरदार की तैयारियों के बारे में और विस्तार से बताएं.
दरअसल, जब आप हबीब सर जैसे निर्देशक के साथ काम कर रहे होते हैं, तो तैयारियों का लेवल इस लिहाज से थोड़ा कम हो जाता है कि हबीब सर, अपनी स्क्रिप्ट कुछ इस कदर तैयार रखते हैं कि अगर आह, उफ भी करना है तो वह स्क्रिप्ट में मेंशन होता है. अब निर्भर आप पर करता है कि आप किस तरह उसे निभा पाते हैं. हालांकि, जब से अहसास हुआ कि मुझे अभिनय करना है, मैंने बैरी जोन्स के अभिनय वर्कशॉप को अटेंड करना शुरू किया. हबीब सर ने भी मेरी बहुत मदद की.
सुना है आप निर्देशक बनना चाहते थे. फिर अभिनय के क्षेत्र में?
जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना है. मैं भविष्य में जरूर निर्देशन करूंगा. दरअसल, मैं खुद भी नहीं जानता था और न ही कभी सोचा था कि अभिनय में आऊंगा. लेकिन सलमान भाई की वजह से मैंने इस तरफ सोचना शुरू किया. सलमान भाई की बहन अर्पिता मेरी गर्लफ्रेंड थी. हम दोनों के परिवार में बहुत नजदीकी थी. मैं उस वक्त सलमान भाई से मिलता रहता था. सलमान भाई पापा की फिल्मों में काम कर रहे थे. हमने बहुत वक्त साथ गुजारा था. उन्होंने ही मुझे एक दिन कहा कि यार अर्जुन तू एक्टर बन सकता है.
तुझमें वह स्पार्क नजर आ रहा है. उस दिन मैं घर लौटा तो मुझे लगा कि सलमान भाई की बातों में कुछ तो दम है. मैंने सोचना शुरू किया. लेकिन परेशानी यह थी कि मैं बहुत मोटा था. फिर मैंने सलमान भाई से बात की तो उन्होंने मेरा साथ दिया और तीन साल में मैंने 50 किलो वजन घटाया. इतना वजन कम करने के बावजूद आज भी मैं डरा रहता हूं कि कहीं मेरा वजन फिर से न बढ़ जाये.
फिल्म युवाओं पर आधारित है, तो निश्चित तौर पर आप सबने बहुत मस्ती की होगी सेट पर.
हां जी बिल्कुल बहुत मस्ती की थी. मैं और परिणिति सेट पर खूब मस्ती करते थे. हम दोनों ही खाने, खिलाने और हंसी मजाक करने के शौकीन हैं. इसलिए, सेट पर माहौल बेहद अलग होता था. फिल्म में जो दृश्य मेरे लिए सबसे कठिन रहा उसी में सबसे मजा भी आया. लखनऊ में जब हम इस सीन की शूटिंग कर रहे थे, उस वक्त बहुत गर्मी थी.
वहां येज्दी बाइक चलानी थी मुझे, जो अब शायद मिलती भी नहीं. मैं ठहरा मुंबई का लड़का. कभी उतनी भारी बाइक चलायी नहीं थी. जब वह चलानी पड़ी, मेरी तो हालत खराब हो गयी. उसमें मेरे न जाने कितने सारे रीटेक हुए थे. मजे की बात यह थी कि वह बाइक हमने वहां के दूधवालों से ली थी. फिर उन्होंने ही मुझे ट्रेनिंग भी दी थी.
परिणिति के साथ आपकी केमेस्ट्री कैसी रही?
मजेदार. आप देखना इस पूरी फिल्म में परमा और जोया ही नजर आयेंगे आपको. यह फिल्म पूरी तरह इन दोनों किरदारों पर ही निर्भर है.
हुआ छोकड़ा जवान रे..गीत में आपने एक्सप्रेशन का काफी इस्तेमाल किया है. खास ट्रेनिंग ली?
नहीं. हां, यह जरूर है कि डांसिंग में मेरी शुरू से ही दिलचस्पी रही है इसलिए इस गाने की शूटिंग में मैंने बहुत एंजॉय किया.यह गीत भी लखनऊ में ही फिल्माया गया था. चिनी प्रकाश सर जो खुद बेहद शानदार डांसर हैं, उन्होंने मेरी बहुत मदद की.
बतौर अभिनेता, आप दर्शकों से क्या उम्मीद कर रहे हैं?
बस यही कि मेरी फिल्में देखने के बाद कोई यह न कहे कि सिर्फ दिखने में अच्छा है. इसे एक्टिंग नहीं आती, क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं बहुत मेहनत कर रहा हूं और बारीकी से काम सीख रहा हूं. चाहता हूं कि अच्छा अभिनय कर सकूं.
आपकी मां, आपकी पहली शुरुआत में साथ नहीं?
हां, लेकिन मां का आशीर्वाद हमेशा साथ रहेगा. उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया है. इसलिए, उम्मीद है कि कामयाबी मिलेगी.

विधु की फरारी की सवारी

विधु विनोद चोपड़ा ने हाल ही में अपने फिल्मी कैरियर के 30 साल पूरे किये. इन 30 सालों में इस प्रोडक्शन कंपनी से न सिर्फ बेहतरीन फिल्में निकली, बल्कि हिंदी सिनेमा जगत को राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी, स्वानंद किरकिरे जैसे कई बेहतरीन लेखक, निर्देशक व गीतकार मिले. इतना ही नहीं, उन्होंने संजय दत्त को मुत्रा भाई सीरिज से उस वक्त चमकाया, जब उनका फिल्मी कैरियर पूरी तरह ढलान पर था. माहिर अभिनेता बोमन ईरानी भी इसी प्रोडक्शन कंपनी की खोज है. सफलता की ऊंचाईयां छू रही विद्या पर पहला विश्‍वास भी विधु ने ही किया था. जल्द ही उनके प्रोडक्शन की फिल्म ‘फरारी की सवारी’ रिलीज होगी. इस फिल्म से भी उन्होंने राजेश मापुस्कर नामक नये निर्देशक को निंर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी है. राजेश मापुस्कर पिछले कई सालों से विधु की फिल्मों में एसोसिएट की भूमिका निप्रभाते आ रहे थे. इस फिल्म में मुख्य किरदार में शरमन जोशी हैं, जिन्होंने इससे पहले एकल भूमिकाएं वाली फिल्म में अब तक काम नहीं किया था. निश्‍चित तौर पर यह उनके कैरियर की सबसे अहम फिल्म होगी. फिल्म के प्रोमोज व गीत से शरमन की मेहनत झलक रही है. इस फिल्म को लिखने व बनने में कुल चार साल लगे हैं. खुद विधु ने फिल्म के लेखन में मुख्य योगदान दिया है. इससे साफ जाहिर होता है कि यह फिल्म यूं ही हवा में बातें नहीं करेंगी. शरमन ने भले ही ‘3 इडियट्स’ जैसी फिल्मों में अहम भूमिकाएं निभाई हों, लेकिन अब तक उन्हें ए ग्रेड स्टार्स की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है. इसके बावजूद विधु ने उन पर भरोसा कर ‘फरारी की सवारी’ जैसी फिल्म में एक बड़ा मौका दिया. जरा सोचिए, अगर विद्या बालन जैसी सशक्त और बेहतरीन अभिनेत्री को लगातार कई सालों तक अभिनय के रास्ते में धोखे खाने के बाद भी ‘परिणीता’ नहीं मिलती तो क्या आज वह इस मुकाम तक पहुंच पातीं. विधु के लिए ‘परिणीता’ अहम फिल्म थी. वे चाहते तो किसी भी स्थापित अभिनेत्री को यह अवसर देते, लेकिन उन्होंने नये चेहरे के रूप में विद्या पर भरोसा किया और कामयाब हुए. संभव हो शरमन जोशी में भी उन्हें वही बात नजर आयी हो. हालांकि विधु खुद प्यार से कहते हैं कि मेरा सुपरमैन है शरमन. फरारी दुनिया की महंगी व तेज गति से चलनेवाली कारों में से एक है. विधु ने शरमन को इस फरारी की सवारी तो करवा दी है, अब देखना है कि शरमन विद्या की तरह उस रफ्तार को पकड़ पाते हैं या नहीं.

20120508

कपूर खानदान : कल आज कल

हिंदी सिनेमा के 100 सालों के सफर में कपूर खानदान का सक्रिय योगदान रहा है. कपूर खानदान उन चुनिंदा खानदानों में से एक है, जिसकी लगभग चार पीढ.ियां लगातार थियेटर व सिनेमा में सक्रिय रही है. पृथ्वीराज कपूर ने भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की थी. पृथ्वीराज कपूर के साथ शुरू हुए इस परंपरा की जिम्मेदारी वर्तमान में खानदान की चौथी पीढ.ी के सदस्य करिश्मा, करीना, रनबीर कपूर निभा रहे हैं. फिलवक्त कपूर खानदान के बेटे रनबीर और बेटी करीना कपूर मुख्य रूप से अभिनय में सक्रिय हैं और वे लगातार अपनी फिल्मों से सफलता की सीढ.ी चढ. रही हैं. बहन करिश्मा भी ‘डेंजरस इश्क’ से फिल्मी दुनिया में वापसी कर रही हैं. वर्तमान में करीना व रनबीर कपूर इन दो भाई बहनों पर सबकी निगाहें हैं, क्योंकि दोनों की ही फिल्में लगातार सफल हो रही हैं. ऐसे में यह कयास कई दिनों से लगाये जा रहे थे कि ये दोनों कब एक साथ किसी फिल्म में नजर आयेंगे. कई निर्देशकों की यह चाहत थी, लेकिन निर्देशिका जोया अख्तर ने बाजी मार ली. जिन्होंने अब तक ‘लक बाय चांस’ व ‘जिंदगी मिलेगी न दोबारा’ जैसी सफल फिल्में दी हैं. जोया ने करीना व रनबीर दोनों को अपनी फिल्मों में भाई बहन की मुख्य किरदारवाली फिल्म में काम करने के लिए मना लिया है. यह पहली बार होगा जब दोनों भाई बहन एक साथ इस फिल्म में नजर आयेंगे. इस फिल्म की कहानी भाई-बहनों के रिश्ते के इर्द-गिर्द होगी. निश्‍चित तौर पर इस फिल्म पर पूरी इंडस्ट्री व दर्शकों की विशेष नजर रहेगी. दरअसल, कपूर खानदान अभिनय का कॉकटेल रहा है. इस परिवार के लगभग सभी सदस्य कलाकार हैं और सभी एक दूसरे से जुदा हैं. पूरा इतिहास देखें तो सभी सदस्यों ने एक दूसरे से बिल्कुल जुदा अंदाज में अभिनय किया है. किसी में कोई समानता नहीं. फिर भी सभी कामयाब हैं. शायद इस खानदान की कामयाबी का यही रहस्य है. किसी दौर में ‘कल आज और कल’ में पहली बार कपूर खानदान की तीन पीढ.ियां एक साथ आयी थीं. इसके बाद रणधीर कपूर व ऋषि कपूर ने हाल ही में ‘हाउसफुल 2’ में साथ अभिनय किया. अब करीना व रनबीर साथ हैं और यह दोनों भी बिल्कुल अलग जॉनर व स्वभाव की फिल्में करते आ रहे हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह इतिहास फिर से लौटता है, जो जादू राजकपूर अपनी फिल्म ‘कल आज और कल’ से कायम करने में नाकामयाब रहे थे. क्या यह भाई बहने उस कायम करने में कामयाब हो पायेंगे. बहरहाल, दोनों ही कामयाब हैं और उनसे यह उम्मीद की जा सकती है.

तेरे पास आकर जाना जिंदगी का मतलब


आमिर का सपना है कि वह महाभारत का निर्माण करें, लेकिन कुछ वक्त के लिए उन्होंने अपना ध्यान इस सपने से परे टेलीविजन शो सत्यमेव जयते पर लगा दिया है. आगामी 6 मई से इस शो का प्रसारण दूरदर्शन और स्टार प्लस दोनों चैनलों पर एक साथ किया जायेगा. हाल में इसके म्यूजिक लांच के अवसर पर आमिर ने शो से संबंधित कुछ अहम पहलुओं पर बात की.
आमिर खान पहली बार शो सत्यमेव जयते को लेकर टेलीविजन पर आ रहे हैं और वे इसे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट मानते हैं. उनका कहना है कि इस शो से ही उन्होंने अपने जीने का मकसद जाना है.
आत्मा बसती है इस शो में
स्टार नेटवर्क के प्रमुख उदय शंकर ने मेरे सामने यह प्रस्ताव रखा कि मैं उनके लिए छोटे परदे पर कोई शो करूं. उस वक्त तो मैंने उनसे कह दिया कि मुझे ऐसे शोज में खास दिलचस्पी नहीं है. फिर उन्होंने पूछा कि आप बतायें आप क्या करना चाहते हैं. तब मैंने कहा कोई ऐसा शो जो दिल को छू ले. बिल्कुल अंदर तक लोगों को झकझोर दे. उदय ने तुरंत हां कह दिया और कहा कि आमिर आप आगे बढ़ें, हम आपका साथ देंगे. यही से शुरुआत हुई इस सफर की.

मैंने अपनी टीम तैयार की. उन्हें बुलाया. प्रसून जोशी से कहा कि मुझे कोई ऐसा गीत लिखकर दो, जो कि रोमांटिक हो. सब चौंक गये कि शो का नाम सत्यमेव जयते है और आमिर हमें रोमांटिक गाना लिखने को कह रहा है. मैंने सभी को समझाया कि मुझे ऐसा गीत चाहिए जो ऐसा न लगे कि सिर्फ मैं गा रहा हूं, बल्कि वह पूरे देश के हर नागरिक को संबोधित करे और उनकी तरफ से हो. प्रसून ने केवल आधे घंटे में गीत लिख दिया. राम संपत ने म्यूजिक तैयार किया और बस हम फिर निकल पड़े पूरे भारत के भ्रमण पर. राम वाधवानी ने इस शो को परदे पर उतारा और सत्यजीत भटकल इसके निर्देशक हैं.
पसंदीदा पंक्तियां
मुझे उम्मीद है कि ये शो दर्शकों को नया और दिल को छूने वाला लगेगा. इसकी एक खासियत यह भी होगी कि हर एपिसोड में दर्शकों को एक नया गीत सुनने को मिलेगा. शो के टाइटिल सांग के हर शब्द से मुझे प्यार हो गया है. खासतौर से यह पंक्तियां कि जैसा भी हूं, अपना मुझे.. मुझे ये नहीं है बोलना. काबिल तेरे मैं बन सकूं..है द्वार ऐसा खोलना.. सबसे पसंदीदा है. चूंकि इन पंक्तियों से मुझे ऊर्जा मिलती है. उम्मीद है कि ऐसी ही ऊर्जा दर्शक भी अपने अंदर महसूस कर सकेंगे. दरअसल, यह शो सबको खुशियां और ताकत के साथ देशभक्ति का भी एहसास करायेगा.

आम लोगों से जुड़ना चाहता था
इस शो के माध्यम से मैं आम लोगों से जुड़ना चाहता था. सेलिब्रिटी बनने के बाद हमेशा ऐसा होता है कि हम खुलकर किसी से मिल नहीं सकते. सार्वजनिक स्थानों पर नहीं जा सकते, लेकिन इस शो के माध्यम से मैंने पूरे भारत को जिया है. यूं कह लें कि पूरी दुनिया को जिया है. यह मेरे जीवन के सबसे यादगार पलों में से एक होगा. मैं पिछले दो सालों से इस शो पर काम कर रहा था और मैंने अपने कुछ साथियों के अलावा किसी से भी इस बारे में कोई चर्चा नहीं की. मैं चाहता हूं कि जब शो का प्रसारण हो तो आप खुद इसका आनंद उठाएं.
बार बार भावुक हुआ
मैं अपने वास्तविक जीवन में भी बहुत भावुक हूं. भावनात्मक बातों पर रो देता हूं. आप कह सकते हैं कि मैं रोंदू बच्चा हूं. इस शो के दौरान भी मेरे साथ ऐसे कई वाकिये हुए, जिन्हें देखकर मैं रोया. मेरी आंखों से कई बार आंसू गिरे हैं. फिलहाल मैं उन घटनाओं के बारे में नहीं बताऊंगा. शो के माध्यम से आप उन्हें देख सकेंगे.
हां, इतना जरूर बताना चाहूंगा कि एक जगह मैं बच्चों के साथ हॉकी खेल रहा था. एक बच्चे ने मेरे पैर पर हॉकी चला दी और मुझे बुरी तरह चोट लग गयी. लेकिन उस चोट में भी मुझे उस बच्चे का जुनून ही नजर आया था. जो खेलने में यूं मग्न था कि उसे मेरा पैर भी नजर नहीं आया.
देश को एक सूत्र में बांधना
मैं नहीं कहता कि यह कोई आंदोलन है. इसके लिए मैं किसी तरह का दावा भी नहीं करता. हां, यह जरूर है कि शो देखने के बाद आप महसूस करेंगे कि पूरी दुनिया दरअसल एक सूत्र में ही बंधी है. यह शो सबके दिलों को छुएगा. सभी महसूस करेंगे कि यह उनका अपना शो है.
यही वजह है कि हमने स्टार प्लस के साथ-साथ दूरदर्शन को भी इससे जोड़ने की कोशिश की है. दूरदर्शन की पहुंच गांव-गांव तक है और मैं चाहता हूं कि यह शो हर
गांव तक जाये.
हर प्रांत में नहीं गया
फिर भी..
यह सच है कि पूरे भारत में घूमने व उसे समझने के लिए दो साल पर्याप्त नहीं हैं. फिर भी मेरी कोशिश रही है कि मैं हर जगह जाऊं और जहां नहीं जा पाया हूं, वहां के लोग आकर मुझसे मिले हैं. दरअसल, यह शो आम लोगों को समर्पित है. दो सालों की मेहनत के बावजूद हम केवल 13 एपिसोड ही तैयार कर पाये हैं, क्योंकि यह एक कठिन काम था.
 
सत्यमेव जयते

यह शीर्षक हमें उदय शंकर ने ही सुझाया था. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम इसे रजिस्टर नहीं कर सकते. मैंने उनसे कहा कि कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि यह शो सभी का है. देश का है. हम इसका यही नाम रखते हैं

जायका कलाकारों के डब्बे का


वे लगातार 12 -12 घंटे, रात-दिन शूट करते हैं, रीटेक पर रीटेक देते हैं. निश्चित तौर पर उन्हें बेहद थकान भी होती है. ऐसे में वे अगर अपनी सेहत का ख्याल न रखें तो परेशानियां हो सकती हैं. जी हां, बात हो रही है छोटे परदे के कलाकारों की, जो शूटिंग के दौरान बहुत मेहनत करते हैं और इसके लिए वे अपने खानपान का भी पूरा ध्यान रखते हैं.
वे अपनी शिफ्ट के अनुसार अपना खाने का डब्बा साथ लेकर चलते हैं. इस डब्बे में केवल दो वक्त का खाना नहीं, बल्कि 12 घंटे की रुटीन के अनुसार और भी कई चीजें होती हैं. टेलीवुड के कुछ चुनिंदा कलाकारों के इसी डब्बे का जायजा लिया अनुप्रिया ने..
खुशी कुमारी जब टेलीविजन पर आती हैं और अपनी मुस्कान बिखेरती हैं तो दर्शक उनके चेहरे की रौनक को देखकर खुश हो जाते हैं. ये रौनक यूं ही नहीं रहती. वे अपने खानपान का पूरा ख्याल रखती हैं. जी हां, सच्चाई यही है कि कलाकारों के लिए दिन-दिन भर लगातार शूटिंग करना थकाने वाला होता है.

ऐसे में उन्हें अपने खानपान का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि अगर वे थोड़े भी कमजोर हुए तो कैमरा सच कह देता है. क्योंकि स्क्रीन पर उन्हें हमेशा खुश और आकर्षक दिखना है, इसलिए कलाकार अपने खाने के डिब्बे का पूरा ख्याल रखते हैं.
हीना खान
( ये रिश्ता क्या कहलाता है में अक्षरा का किरदार )
हीना अपने खानपान को लेकर हद से अधिक सजग रहती हैं. वे वक्त पर नाश्ता करना और बीच बीच में स्नैक्स खाना पसंद करती हैं. वे कूकीज की दीवानी हैं. इसलिए उनके पास हमेशा कूकीज उपलब्ध रहते हैं. हीना की खासियत है कि वह हर तरह का खाना खाती हैं, क्योंकि उनका उनके वजन पर नियंत्रण रहता है.

हीना के डब्बे की खास बात यह है कि उनके पास एक बास्केट में लगभग कई छोटे-छोटे डब्बे होते हैं. उन डब्बों में कई तरह की चटनियां नियमित रूप से मिल जाया करती हैं, क्योंकि हीना को चटनी बेहद पसंद है. साथ ही आम के अचार भी उन्हें बेहद पसंद है. वे स्नैक्स के रूप में केले के चिप्स रखती हैं. उनकी एक फैन बेंगलुरु में है, जो उन्हें हर महीने कुछ न कुछ चीजें भेजती हैं. हीना को खाने में बेहद दिलचस्पी है, इसलिए हीना उनकी भेजी गयी चीजें जरूर अपने साथ रखती हैं. हीना डार्क चॉकलेट भी हमेशा अपने साथ रखती हैं.
सनाया ईरानी
( स्टार प्लस के शो इस प्यार को क्या नाम दूं में खुशी का किरदार )
सनाया खुशी कुमारी का किरदार निभा रही हैं. उन्हें लगभग हर दिन 12 घंटे की शूटिंग करनी पड़ती है. वह सुबह 8 बजे तक सेट पर पहुंच जाती हैं. वे लोअर परेल में रहती हैं और उन्हें शूटिंग के लिए फिल्म सिटी आना होता है. इसलिए उनकी मम्मी उनके लिए पूरे 12 घंटे का डब्बा तैयार करके देती हैं. इसमें विशेष कर ईरानी भोजन तो होता ही है.

साथ ही ढोकले, पात्र जैसे व्यंजन भी होते हैं. वे अपना ब्रेकफास्ट कार में ही करती हैं. फिर सेट पर पहुंचने के साथ वे घर का बना ब्लैक कॉफी लेती हैं. उनके खाने के डब्बे में हमेशा ड्राइ फ्रूट्स मिलते हैं. वे चॉकलेट की भी शौकीन हैं. हां, लेकिन जिस दिन उनकी मम्मी उन्हें भिंडी की सब्जी दे देती हैं, वे इसे पूरे सेट के लोगों को खिला देती हैं.

हालांकि सनाया को खाने-पीने में रुचि नहीं. वे लगातार खाने में विश्वास नहीं करतीं. वे थोड़े अंतराल पर खाती हैं. सनाया को स्प्राउट्स खाना भी बेहद पसंद है. सो, उनके डिब्बे में लगभग 12 डब्बे होते हैं. उनके डिब्बे के बारे में यह खासियत है कि वे सेट पर स्पॉट ब्वॉय से लेकर क्रू के सभी लोगों को इलायची खिलाती रहती हैं.
वरुण सोबती
( इस प्यार को क्या नाम दूं में अरनव का किरदार )
वरुण शादीशुदा हैं. इसलिए उनके खानपान का पूरा ध्यान उनकी पत्नी रखती हैं. वे हमेशा वरुण की पसंदीदा आलू-गोभी की सब्जी, दाल, रोटी और अचार रखना नहीं भूलतीं. साथ ही वरुण समय-समय पर सेव खाना पसंद करते हैं. ड्राइ फ्रूट्स में उन्हें पिस्ता बेहद पसंद है. सो, वे पिस्ता हमेशा अपने साथ लिये घूमते हैं. शाम के वक्त वे घर की बनी ब्लैक कॉफी और दो बिस्किट खाना पसंद करते हैं. उनके डिब्बे की खास बात यह होती है कि सारे फूड आयटम के टिफिन पर यह लिखा होता है कि उन्हें कौन सा आयटम किस वक्त खाना है.
श्वेता तिवारी
( परवरिश में मां का किरदार )
श्वेता तिवारी की सबसे खास बात यह है कि उनका डब्बा उनका सेट ही होता है. जी हां, श्वेता अपने घर से अपने खाने का डब्बा तैयार करके नहीं जातीं. वे सेट पर क्रू के लोगों के घर के खाने को शेयर करती हैं, श्वेता कहती हैं कि वह चाहें तो वह घर से खाना ला सकती हैं. लेकिन वह ऐसा इसलिए नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें यहां सबके घरों का खाना पसंद है. ऐसे में क्रू के लोगों से भी उनका अपनापन बना रहता है.
ऐश्वर्य
( सास बिना ससुराल में टोस्टी का किरदार )
ऐश्वर्य अपने घर से ही अपना खाने का डब्बा लेकर आती हैं. उन्हें अपने सेट के पूरे परिवार के साथ लंच करने की आदत है. वे हर दिन नये-नये व्यंजन बना कर लाती हैं. उनकी मम्मी उनका टिफिन पैक करती हैं, उन्हें गरमागम खाना पसंद है. इसलिए उनकी मम्मी उन्हें लंच के वक्त से थोड़े समय पहले घर से खाना भेजती हैं.

ऐश्वर्य को खाने में नमक और मिर्च जरूर चाहिए, साथ ही उन्हें बेसन के चिल्के बेहद पसंद हैं. इसलिए उनकी मम्मी उन्हें यह आयटम देना नहीं भूलतीं. ऐश्वर्य के डब्बे की खास बात यह है कि उनमें सौंफ जरूर मिलते हैं और वे भी कई वेराइटिज के.
फराह खान
फराह खान भी उन कलाकारों में से एक हैं जो सेट का खाना खाती हैं और वे वही खाना खाती हैं जो सेट का एक स्पॉट ब्वॉय खाता है. चूंकि फराह का मानना है कि शुरुआती दौर में जब वह संघर्ष कर रही थीं, तब वे वही खाना खाया करती थीं, सो, आज भी वह अपनी यह आदत नहीं बदलना चाहतीं.

हीरोइन.. अल्पविराम


हजारों लड़कियों की तरह उसके भी यही सपने थे कि वह ऊंचाइयों को हासिल करे. लोग उसके ऑटोग्राफ लेने के लिए लाइन लगाएं. वह खूबसूरत भी थी और आगामी फिल्म हीरोइन में उसे जूनियर आर्टिस्ट का किरदार भी मिल गया था, लेकिन उसकी चाहत सिर्फ इतनी ही नहीं थी. वह मुख्य किरदार निभाना चाहती थी.
शोहरत हासिल करना चाहती थी. लेकिन उसकी इस चाहत ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. मीनाक्षी थापा को पिछले दिनों बेदर्दी से मार दिया गया. हीरोइन बनने की चाहत और इसके जुर्म में तब्दील होने के दर्दनाक अल्पविराम सफर पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट.
हिंदी सिनेमा में नायिकाओं की जिंदगी को खंगालने वाली कई फिल्में बनी हैं. इन फिल्मों के माध्यम से कई तरह की कड़वी सच्चाइयां भी सामने आयी हैं और कई बातों से परदा उठा है. मधुर भंडारकर की आगामी फिल्म हीरोइन भी हीरोइन बनने की प्रक्रिया के सच को दर्शाती है. इससे पहले द डर्टी पिक्चर, वो लम्हे में एक नायिका के जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव को दर्शाया जा चुका है. एक नायिका गलत रास्ता क्यों अख्तियार करती है. इस प्रश्न की खाक छानी गयी है.
कई बार ऐसा होता है कि लड़कियां न चाहते हुए भी कास्टिंग काउच का शिकार हो जाती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि यहां संघर्ष की कहानी नहीं, सफलता की कहानी देखी जाती है. कई लड़कियां परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने जैसी मजबूरियों के चलते बुरी फिल्मों में काम कर लेती हैं. इस इंडस्ट्री में लड़कियों को अच्छे कामों के लिए भले ही पैसे न मिलते हों, लेकिन बुरे कामों के लिए दुनिया पैसे न्योछावर करती है.
ऐसे में फिर जब इस्तेमाल करने के बाद वे गुमनामी की जिंदगी जीने लगती हैं, तो वे पागल हो जाती हैं और उनका हश्र भी परवीन बॉबी जैसा होता है, जो किसी जमाने में लोकप्रिय अभिनेत्रियों में से एक थी. यह अभिनेत्री की जिंदगी का सच है- विशेषकर भारत में. जब तक ये अभिनेत्रियां जवान हैं, अभिनेत्री के रूप में जिंदा हैं. वरना वे कुछ नहीं हैं. यही वजह है कि हर युवा अभिनेत्री अपनी उम्र ढलने से पहले अपने सपने को साकार करने के लिए कुछ भी कर गुजरती है.
मीनाक्षी थापा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. अच्छी फिल्मों के ऑफर का लालच देकर उसका अपहरण हुआ और फिर उसे मौत के घाट उतार दिया गया. यह बॉलीवुड का पहला वाकया नहीं है, लेकिन कुछ दिनों तक इस विषय पर चर्चा होने के बाद लोग इस बात को भूल जाते हैं. दरअसल, अभिनेत्रियों का मर्डर या उनकी खुदकुशी जैसी प्रक्रिया उनकी चाहत से जुड़ी है.
जब उनकी वह चाहत पूरी नहीं होती है, तभी उनके साथ ऐसे हादसे होते हैं. गौर करें तो सनी लियोन को भले ही महेश भट्ट की फिल्म में मौका मिल गया है, लेकिन अब भी लोग उनके साथ अछूत-सा व्यवहार कर रहे हैं, जो अनुचित है. क्योंकि वह लड़की है, इसलिए सनी को यह परेशानी ङोलनी पड़ रही है और समाज उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं. सनी ने भले ही किसी कारणवश पोर्न फिल्मों का रास्ता चुना हो, लेकिन महेश भट्ट उन्हें मौका दे रहे हैं तो अब लोगों को उनका सम्मान करना चाहिए.
यहां इंडस्ट्री में किसी भी लड़की को अपनी बनायी गयी छवि से बाहर निकलने का हक ही नहीं मिलता. भोजपुरी फिल्मों में काम करनेवाली भावना तिवारी के हाथ लोकल ट्रेन में कट गये, जबकि भावना अपने परिवार में कमाने वाली एक मात्र सदस्य थी. गोरेगांव में रहनेवाली भोजपुरी अदाकारा रूबी सिंह ने आत्महत्या कर ली. यह सारी घटनाएं हीरोइन की जिंदगी के दर्द को दर्शाती है.
इससे जाहिर होता है कि कुछ किस्मतवालों को छोड़ दें, तो हीरोइन की जिंदगी अल्पविराम की तरह ही होती है. कभी किसी को ब्रेक नहीं मिलता, तो कभी उसके साथ कोई हादसा हो जाता है, जिसके बाद इंडस्ट्री उसे अपाहिज मान लेती है. अगर कोई सफल हो भी गया तो उसकी पुरानी छवि उसका पीछा नहीं छोड़ती.
अभी और बढ़ेगी यह तादाद
-रामगोपाल वर्मा-
मीनाक्षी थापा की हत्या एक दुखद घटना है. लगातार हो रही ऐसी वारदात से पता चलता है कि लड़कियों में किसी तरह बड़े परदे पर एक बार दिखने की चाहत ने दिन-ब-दिन जोर पकड़ा है. आज लगभग हर दूसरी लड़की अभिनेत्री बनना चाहती है, जबकि सच्चाई यह है कि केवल वही पूरी तरह कामयाब हो पाती हैं, जो एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी होती हैं. केवल स्लिम फिगर, गोरा रंग है तो चलो हीरोइन बन जाते हैं, ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए. साथ ही मैं यह भी सलाह दूंगा कि हर व्यक्ति सब कुछ नहीं कर सकता. इसलिए सिर्फ लीड किरदार निभाने की जिद्द में न रहें. अगर आपको कैरेक्टर रोल भी मिल रहे हैं, तो उसे हाथ से न जाने दें, ताकि आपका स्क्रीन पर आने का सपना पूरा हो.
सही टैलेंट की पहचान जरूरी
-महेश भट्ट-
फिल्मी दुनिया की चकाचौंध कभी कम नहीं होती. पिछले कई वर्षो में यह चमक और तेज हुई है. विशेषकर छोटे शहरों में. मुंबई जो भी आता है, हीरो या हीरोईन बनना चाहता है. यही वजह है कि कई बार वह अपनी काबिलियत पहचाने बिना ही गलत इनसान के चक्कर में फंसता जाता है

सिनेमा सदी और किरदार



तारीख 3 मई 1913. परदा उठता है और लोगों के सामने इतिहास रच जाता है. यही वह दिन था, जब भारत में दर्शक पहली बार चलती-फिरती फिल्म देख रहे थे.
लोगों के लिए यह हैरतअंगेज लम्हा था, लेकिन उन्होंने इस प्रयोग को स्वीकारा और हरी झंडी दिखायी. अब चलचित्र की यह अनोखी दुनिया किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह नित-नये प्रयोगों के साथ अपने 99वें पड़ाव पूरे कर 100वें पड़ाव की ओर बढ़ चुकी है. दादा साहेब फाल्के का सपना आज 99 वर्ष का हो चुका है. भारतीय सिनेमा के इस ऐतिहासिक दिन को समर्पित है रंग का यह परिशिष्ट, जिसे प्रस्तुत कर रही हैं उर्मिला कोरी और अनुप्रिया अनंत..
हिंदी सिनेमा के 100वें वर्ष में प्रवेश करने के बहाने कुछ ऐसे किरदारों पर प्रकाश डालते हैं, जिन्होंने आम व्यक्ति को कलाकार की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया. उन किरदारों ने अपने अभिनय की जिंदगी को सार्थक कर दिया.
दादा साहेब फाल्के ने जब परिकल्पना की कि वह एक चलचित्र बनायेंगे, तो उनके जेहन में सबसे पहली बात ये आयी कि आखिर इसके किरदारों को कौन निभायेगा. किसी भी कहानी की सार्थकता उसके किरदारों से ही होती है. उन्हें कुछ कलाकार तो मिले, लेकिन महिला किरदार निभाने के लिए जब कोई कलाकार नहीं मिली, तो उन्होंने एक चाय बेचने वाले लड़के में ही अपने किरदार को तलाश लिया और उसे अपनी फिल्म में अभिनेत्री के रूप में पेश किया.
हकीकत यही है कि कलाकारों को उनके किरदारों ने ही कलाकार बनाया है. हर व्यक्ति उस वक्त तक आम व्यक्ति होता है, जब तक वह कोई किरदार न निभा ले, किरदार निभाते हुए ही वह कलाकार हो जाता है. यही वजह है कि आज भी कई कलाकार अपनी जिंदगी में अपने किरदारों को अहमियत देते हैं. हर कलाकार अपने अभिनय सफर में एक बार ऐसा किरदार जरूर निभाना चाहता है, जिसमें उसके कलाकार की सारी खूबियां निखरकर सामने आ सकें. हिंदी सिनेमा में किरदारों ने कई कलाकारों को संजीवनी दी है.
पृथ्वीराज कपूर में नजर आया असली सिकंदर
थिएटर के महारथी कलाकार पृथ्वीराज कपूर पर पहली बार आर्देशर ईरानी की नजर पड़ी और उन्हें भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा से फिल्मी दुनिया में प्रवेश मिला. इसके बाद उन्होंने अपने विलक्षण अभिनय से साबित कर दिया कि वे बेहतरीन कलाकार हैं. उनके अभिनय का वास्तविक रूप निखरकर दर्शकों के सामने आया फिल्म सिकंदर व मुगल-ए-आजम में. पृथ्वीराज कपूर इन दोनों फिल्मों में निभाये गये किरदार को अपनी जिंदगी का सबसे अहम किरदार मानते थे.
दरअसल, इन्हीं फिल्मों ने उन्हें स्थापित किया और वह हिंदी सिनेमा की विधा को समझ पाये. पृथ्वीराज उन शुरुआती सशक्त व बेहतरीन कलाकारों में से एक थे, जिन्होंने बिना किसी प्रशिक्षण के सिर्फ रंगमंच के अनुभव से अपने किरदारों को जीवंत बनाया. आज भी दर्शक मुगल-ए-आजम के अकबर की बुलंद आवाज को भूल नहीं पाते.
बलराज साहनी को मिली दो बीघा से पहचान
बलराज साहनी उन बेहतरीन अभिनेताओं में से एक थे, जिनमें अभिनय की विशेष कला का समागम था, लेकिन उनकी अभिनय क्षमता का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था. उन्होंने बतौर कैरेक्टर आर्टिस्ट कई किरदार निभाये, लेकिन उन्हें नायक के रूप में स्थापित किया फिल्म दो बीघा जमीन ने. बिमल रॉय ने इस फिल्म से बलराज साहनी को बतौर अभिनेता स्थापित किया और यहीं से बलराज की जिंदगी बदल गयी.
राजकपूर ने जोकर बनकर दुनिया को हंसाया
राजकपूर ने अपनी जिंदगी में कई बेहतरीन व महत्वपूर्ण फिल्में ही नहीं बनायीं, बल्कि कई यादगार किरदार भी निभाये. लेकिन वे मेरा नाम जोकर के राजू को अपना सबसे पसंदीदा किरदार मानते थे. भले ही यह फिल्म असफल रही, लोगों ने राज कपूर को जोकर के रूप में नहीं स्वीकारा, इसके बावजूद राज कपूर मानते थे कि यह उनके जीवन का सबसे अहम किरदार था. क्योंकि उन्होंने इस एक फिल्म में राजू के किरदार के रूप में अपनी जिंदगी के अहम पहलुओं को जिया था.
मदर इंडिया बनीं नरगिस
मदर इंडिया से पहले नरगिस की पहचान हमेशा रोमांटिक नायिकाओं के रूप में होती थी, लेकिन इस फिल्म से उन्होंने इस छवि को तोड़ा और एक मां का गंभीर किरदार निभाया. इस एक फिल्म से उन्हें पूरे देश की मदर इंडिया बनने का मौका मिला.
मधुबाला ने पायी अनारकली की पहचान
किशोर कुमार की हास्य फिल्मों में नजर आनेवाली मधुबाला जब मुगल-ए-आजम में अनारकली के रूप में दर्शकों से रूबरू हुईं, तो उनका व्यक्तित्व एक अलग ही रूप में सामने आया. इस फिल्म के बाद वह सशक्त और अलग तरह की फिल्मों के किरदार निभाने वाली नायिका के रूप में स्थापित हुईं.
जब गाइड बने देव आनंद
फिल्म गाइड से पहले देव आनंद थ्रिलर फिल्मों में नजर आते थे, लेकिन फिल्म गाइड में उन्होंने राजू गाइड और संत के किरदार को बखूबी निभाया. इसी के बाद देव आनंद की गिनती अलग तरह के किरदारों को निभाने वाले नायक के तौर पर होने लगी.
परिणीता और सिल्क के रूप में सराही गयीं विद्या बालन
विद्या बालन मानती हैं कि उन्होंने फिल्म परिणीता के किरदार में पूरी दुनिया जी ली. उस एक किरदार में उन्होंने शादीशुदा महिला, चुलबुली लड़की और प्यार करने वाली लड़की जैसे अनेकों रूप को जी लिया था. फिल्म द डर्टी पिर की सिल्क से उन्होंने डांस के मर्म को समझा. इसलिए यह दोनों ही किरदार उनके जीवन को साकार करते हैं. वे मानती हैं कि परिणीता से लेकर सिल्क तक के किरदारों ने उन्हें परिणीता से पूर्णत: बनाया है.
पा के ऑरो की खोज पूरी की अमिताभ ने
अमिताभ बच्चन कई दशकों से हिंदी सिनेमा में सक्रिय हैं. उन्होंने दीवार, मुकद्दर का सिकंदर और कई ऐसी सुपरहिट फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें उनकी एकल भूमिकाएं थीं. लेकिन स्वयं अमिताभ मानते हैं कि फिल्म पा उनके लिए जिंदगी का सबसे अहम किरदार है. वे मानते हैं कि यह किरदार निभाना न केवल उनके लिए सबसे कठिन था, बल्कि नामुमकिन-सा था. लेकिन इसे सार्थक किया आर बाल्की ने. एक लंबे चौड़े, सशक्त व्यक्ति को प्रोजोनिया बीमारी से ग्रसित बच्चे ऑरो के किरदार में संजोना एक रोमांचकारी सोच थी.
इस फिल्म में अमिताभ ने दोबारा अपने बचपन को जिया. अमिताभ इस किरदार को अपनी जिंदगी में सबसे अहम किरदार इसलिए भी मानते हैं कि क्योंकि इस फिल्म में उन्होंने खुद को भुला कर ऑरो को जिया

स्वतंत्र पहचान बनाने की जद्दोजहद

अनुराग कश्यप की बहन अनुभूति कश्यप भी निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने जा रही हैं. फिलहाल उन्होंने इस बात की घोषणा नहीं की है कि उनकी पहली फिल्म किस विषय पर आधारित होगी. अनुराग के भाई अभिनव कश्यप ने भी फिल्म ‘दबंग’ से अपने निर्देशन कैरियर की शुरुआत की. वह कामयाब भी रहे. बहन अनुभूति ने कहा है कि वह अपने भाई के बैनर से पहली शुरुआत नहीं करेंगी. हालांकि उन्होंने निर्देशन की बारीकियां अनुराग कश्यप की फिल्में ‘गैंग ऑफ वसईपुर’ व ‘देव डी’ से ही सीखी है. इसके बावजूद वे नहीं चाहती कि उनका पहला वेंचर अनुराग के बैनर से शुरू हो. अभिनव कश्यप ने भी अपनी पहली शुरुआत अनुराग की बजाय किसी बाहरी प्रोडक्शन से शुरू किया. शायद इसकी वजह यह है कि वे अपनी पहचान अपने बलबुते बनाना चाहते हैं. चूंकि हिंदी सिनेमा में प्राय: नये चेहरे की पहचान उनसे पहले इंडस्ट्री से जु.डे व्यक्ति की पहचान पर आधारित होता है. उसकी सफलता का सेहरा उसके परिवार के स्थापित व्यक्ति के सिर पर ही बांध दिया जाता है. यकीनन अभिनव कश्यप व उनकी बहन ऐसा नहीं चाहते होंगे. वे जानते हैं कि उनकी पहली कदम पर पारखी नजर रखी जायेगी, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें अपनी पहचान मिले. ऐसे में अनुभूति का यह कदम सराहनीय है. स्वतंत्र सोच रखनेवाले व फिल्म बनानेवाले ऐसे भाई-बहन इंडस्ट्री में और भी हैं. निर्देशिका फराह खान व साजिद खान भी भाई-बहन हैं. दोनों निर्देशक हैं, दोनों अलग तरह की फिल्में भी बनाते हैं. दोनों ने संघर्ष से भरा कठोर सफर तो साथ में तय किया, लेकिन प्रोफेशनल रिश्तों में वे अलग हैं. दोनों ने कभी एक दूसरे का इस्तेमाल नहीं किया. यही वजह है कि आज उनकी स्वतंत्र और एकल पहचान है. दरअसल, हिंदी सिनेमा को ऐसे ही स्वतंत्र सोच रखनेवाले व बिना किसी कंधे के सहारे आगे बढ.नेवाले लोगों की जरूरत है.

स्वतंत्र पहचान बनाने की जद्दोजहद

अनुराग कश्यप की बहन अनुभूति कश्यप भी निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने जा रही हैं. फिलहाल उन्होंने इस बात की घोषणा नहीं की है कि उनकी पहली फिल्म किस विषय पर आधारित होगी. अनुराग के भाई अभिनव कश्यप ने भी फिल्म ‘दबंग’ से अपने निर्देशन कैरियर की शुरुआत की. वह कामयाब भी रहे. बहन अनुभूति ने कहा है कि वह अपने भाई के बैनर से पहली शुरुआत नहीं करेंगी. हालांकि उन्होंने निर्देशन की बारीकियां अनुराग कश्यप की फिल्में ‘गैंग ऑफ वसईपुर’ व ‘देव डी’ से ही सीखी है. इसके बावजूद वे नहीं चाहती कि उनका पहला वेंचर अनुराग के बैनर से शुरू हो. अभिनव कश्यप ने भी अपनी पहली शुरुआत अनुराग की बजाय किसी बाहरी प्रोडक्शन से शुरू किया. शायद इसकी वजह यह है कि वे अपनी पहचान अपने बलबुते बनाना चाहते हैं. चूंकि हिंदी सिनेमा में प्राय: नये चेहरे की पहचान उनसे पहले इंडस्ट्री से जु.डे व्यक्ति की पहचान पर आधारित होता है. उसकी सफलता का सेहरा उसके परिवार के स्थापित व्यक्ति के सिर पर ही बांध दिया जाता है. यकीनन अभिनव कश्यप व उनकी बहन ऐसा नहीं चाहते होंगे. वे जानते हैं कि उनकी पहली कदम पर पारखी नजर रखी जायेगी, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें अपनी पहचान मिले. ऐसे में अनुभूति का यह कदम सराहनीय है. स्वतंत्र सोच रखनेवाले व फिल्म बनानेवाले ऐसे भाई-बहन इंडस्ट्री में और भी हैं. निर्देशिका फराह खान व साजिद खान भी भाई-बहन हैं. दोनों निर्देशक हैं, दोनों अलग तरह की फिल्में भी बनाते हैं. दोनों ने संघर्ष से भरा कठोर सफर तो साथ में तय किया, लेकिन प्रोफेशनल रिश्तों में वे अलग हैं. दोनों ने कभी एक दूसरे का इस्तेमाल नहीं किया. यही वजह है कि आज उनकी स्वतंत्र और एकल पहचान है. दरअसल, हिंदी सिनेमा को ऐसे ही स्वतंत्र सोच रखनेवाले व बिना किसी कंधे के सहारे आगे बढ.नेवाले लोगों की जरूरत है.

राजसी ठाठ बनाम राह में काटें

सैफ अली खान व अमृता सिंह की 16 वर्षीय बिटिया पहली बार एक मैगजीन के कवर पेज पर नजर आयीं. पारंपरिक लिबाज में सजी धजी बिटिया सारा अली खान ने शायद ही यह परिकल्पना की होगी कि इस महज एक झलक को देख कर उनके पास हिंदी फिल्मों की बौछार हो जायेगी. या यूं कहें कि उन्होंने कभी इस ओर ध्यान भी नहीं दिया होगा. चूंकि वे अभी बेहद छोटी हैं, इसलिए फिल्मों के ऑफर मिलना उनके लिए खास अहमियत नहीं रखती होगी. अमृता सिंह ने तो साफतौर पर कह दिया है कि वे नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी फिल्मों में आये. उन्होंने कहा कि सारा अपनी पढ.ाई ही पूरी करेंगी. दरअसल, यह हिंदी सिनेमा की भेड़चाल है. यहां हर दिन नये और आकर्षक चेहरे (खासकर अभिनत्रियों के लिए) की तलाश जारी रहती है. ऐसे में जब वह नवाब की बेटी हो, तो उनके लिए रास्ते और साफ होते जाते हैं. यहां अफसोसजनक बात यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कलाकारों के बेटे-बेटियों की पहली लांचिंग उनके माता या पिता के स्तर को देख कर किया जाता रहा है. सैफ की बेटी, संजय दत्त की बिटिया को अपनी फिल्मों में लेने की चाहत हर निर्देशक दिखा रहे हैं, क्योंकि वर्तमान में ये दोनों शीर्ष पर हैं. लेकिन वहीं गोविंदा की बेटी नर्मदा कपूर जो पिछले कई सालों से संघर्ष कर रही हैं. अब तक लांच नहीं हो पायी हैं. कई निर्माताओं ने उन्हें लांच करने की बात की, लेकिन उन्हें मौके मिल नहीं पाये. अब खुद गोविंदा उन्हें लांच कर रहे हैं. किसी दौर में गोविंदा भी सुपरसितारा हैसियत रखते थे, लेकिन आज वे ढलान पर हैं. यकीन मानें कुली नंबर व यूपी के ठुमके लगानेवाले दौर में अगर नर्मदा इस इंडस्ट्री में कदम रखतीं तो निश्‍चिततौर पर उन्हें परेशानियां नहीं होतीं. कुछ इसी तरह मशहूर हास्य अभिनेता मेहमूद के बेटे मंसूर को अपने पहले एल्बम को तैयार करने व उसे रिलीज करने में बहुत परेशानियां झेलनी पड़ी. उस लिहाज से जैकी श्राफ के बेटे टाइगर लकी रहे कि उन पर आमिर खान की नजर पड़ गयी. वरना, शक्ति कपूर की बेटी श्रद्धा कपूर को भी शुरुआती दौर में परेशानियां झेलनी पड़ी. लेकिन सैफ, शत्रुघ्न सिन्हा या धर्मेंद्र जैसे सितारों को अपनी बेटियों को लांच करने में कभी संघर्ष करने की नौबत नहीं आयी, क्योंकि ये हस्तियां सिर्फ फिल्मी हस्तियां नहीं, बल्कि राजसी हैसियत वाले लोग हैं. सो, इनके आनेवाली पीढ.ियां भी शायद ही कभी किसी परेशानी से जूझना प.डे. लेकिन हिंदी सिनेमा के निर्देशकों द्वारा खानदान देख कर लार टपकाने की आदत सरासर गलत है. पक्षपात है