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20120419

इस कोक से टूटेगी सरहद की दीवार.

 यह  कोक दरअसल, ठंडा नहीं है. इसमें बहुत आग है, क्योंकि इस कोक का निर्माण कलाकारों के जुनून से हुआ है. फिल्म ‘रॉकस्टार’ में र्जनाधन का दोस्त उसे समझाता है कि जब तक दर्द नहीं होगा, तब तक संगीत आत्मा को नहीं छुयेगी. शायद, यह सच है. क्योंकि यह कोक भी कुछ उसी दर्द से तैयार हुआ है. दर्द उन कलाकारों का, जिन्होंने रात दिन सिर्फ संगीत की पूजा की है. उनके लिए यह किसी देवालय से कम नहीं. पाकिस्तान स्थित कोक स्टूडियो एक ऐसे ही जत्रत का नाम है, जहां संगीत के मुसाफिरों को सरहदें भी नहीं रोकती. संगीत के प्रेमियों के लिए यह किसी मक्का-मदिना से कम नहीं. इसकी खास वजह यह है कि यह स्टूडियो संगीतकारों व गायकों को क्लासिकल, लोक व पॉपलुर म्यूजिक को प्रसारित करता है. साथ ही यह स्टूडियो उन गायकों को मौके देता है, जो नये हैं और संघर्षशील हैं. वे अपने गीत आकर यहां रिकॉर्ड कर सकते हैं. यह कोक स्टूडियो महज तकनीकी उपकरणों व ईंट-पत्थरों से नहीं बना है, बल्कि इसकी नींव उन तमाम कलाकारों से मजबूत हुई जिन्होंने संगीत की आत्मा को समझा है. इस स्टूडियो की अनोखी सोच की वजह से ही कोक स्टूडियो पाकिस्तान के साथ-साथ भारतीय गायकों को भी बहुत प्रभावित किया. विशेष कर एशिया में यह लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक है (पाकिस्तान समेत एशिया के कई एंटरटेनमेंट चैनल कोक स्टूडियो पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं. हाल ही में एमटीवी ने भी इसके तीसरे संस्करण का लंबे समय तक प्रसारण किया और यह बेहद चर्चित रहा). इस स्टूडियो में दुनिया के तमाम गायक शिरकत कर चुके हैं. खासतौर से भारत पाकिस्तान के गायकों की आवाजाही सबसे अधिक रही है. पिछले वर्ष स्टार प्लस पर सिंगिंग कार्यक्रम प्रसारित किया गया था छोटे उस्ताद. इसमें भारत व पाकिस्तान के बच्चों को गाने का मौका दिया गया. कोक स्टूडियो में भारतीय गायकों को आमंत्रित करना व छोटे उस्ताद जैसे शेज की परिकल्पना व इसका सफल निर्माण ही वे प्रयास हैं, जिनसे इन दो देशों की सरहदों की दीवारों को तोड़ा जा सकता है. गौरतलब है कि कोक स्टूडियो के अंतिम संस्करण का समापन वर्ष 2011 में ही किया जा चुका है. इसके बावजूद आज भी इसके गीत दर्शकों को याद हैं. खुद एआर रहमान भी मानते हैं कि कोक स्टूडियो जैसे पहल हर देश में होने चाहिए. अपने संघर्ष के दौर में मोहित चौहान ने कोक स्टूडियो में अपने कई परफॉरमेंस दिये हैं. भारत-पाकिस्तान व एशिया के हर देशों को इस तरह के प्रयासों की सराहना करनी चाहिए, साथ ही इसकी संरचना करनी चाहिए. सच्चाई यही है कि जिस तरह हर शीतल पेय पद्धार्थ पीने के बाद आपको एक अलग अनुभूति होती है. एक संतुष्टि का एहसास होता है. मुमकिन हो कि भविष्य में यही कोक स्टूडियो सरहदों की दीवारों को तोड़ने का आयाम बन जाये.कोक स्टूडियो की पहली शुरुआत ब्राजील के स्टूडियो कोका कोला के नाम से हुई थी. बाद में पाकिस्तान में इसका निर्माण हुआ.


20120418

क्षेत्रीय सिनेमा की नयी मिसाल


हिमालय की गोद में आयोजित सोनपानी फिल्मोत्सव के बाद फिल्मोत्सव की बयार ने अब उत्तर-पूर्व की तरफ रुख किया है. वाकई, ऐसे स्थानों पर जहां आम जीवन हर दिन कठिनाईयों से गुजरती है, वहां फिल्में बनाना, उन्हें देखना-दिखाना केवल वही कर सकते हैं, जो जुनूनी हों. इसमें कोई संदेह नहीं कि जहां परेशानियां अधिक होती हैं, वहां के लोग अधिक कर्मठ होते हैं. मुझे याद है दार्जलिंग में सफर करते वक्त मैंने एक गर्भवती महिला को पीठ पर सिलेंडर उठाये ऊंचाईयों पर चढ़ते देखा था. हमने शब्दों में बात नहीं की थी, लेकिन उसने अपनी मुस्कान से ही जाहिर कर दिया था कि वे कितने जुनूनी है. और जुनून का ही तो दूसरा नाम है सिनेमा. शायद यही वजह है कि अब इन स्थानों पर फिल्मों को लोगों ने गंभीरता से लेना शुरू किया. अब सिनेमा का नया सूरज इन राज्यों में भी चमकता नजर आ रहा है. इसी 15 अप्रैल से इंफाल में पहली बार इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्मोत्सव की शुरुआत की गयी है. इसमें बाहरी फिल्मों के अलावा वे फिल्में भी प्रदर्शित होंगी, जो मणिपुर के निर्देशकों ने बनाया है. इस वर्ष हालांकि मणिपुर की सिर्फ चार फिल्में ही शामिल हो पायी हैं. लेकिन यहां के युवा निर्देशकों ने संकेत दे दिया है कि अब वह भी फिल्म जैसे सशक्त माध्यम का और तेजी से इस्तेमाल करेंगे. भले ही मणिपुरी फिल्मों को अब तक सही तरीके से ऊंचा फलक नहीं मिला, लेकिन सीमित संसाधन, सीमित स्रोत के साथ ही उन्होंने कई फिल्में बनायी हैं. मणिपुर में भी फिल्मों के निर्माण का इतिहास बहुत पुराना है. वर्ष 1946 में श्री गोविंदाजी फिल्म कंपनी ने पहली बार यहां फिल्म कंपनी की शुरुआती की थी. अब तक लगभग 9 मणिपुरी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद ही यहां फर्स्ट मोशन पिक्चर  थियेटर स्थापित किया गया था. वर्ष 1948 में ही पहली बार मैनु बेमछा नामक पहली फिल्म बनाने का प्रयास किया गया था, लेकिन फिल्म बन नहीं पायी. इन सभी तथ्यों से ज्ञात होता है कि मणिपुर में फिल्मों को लेकर शुरू से लोग जुनूनी रहे हैं. मणिपुरी फिल्मों को उस वक्त भी अधिक बढ़ावा मिला जब यहां हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गयी थी. एक साल में लगभग उस वक्त 150 फिल्में बनने लगीं. सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए केवल मॉर्निंग शोज में फिल्में दिखायी जाती थीं. बावजूद इसके कि वहां फिल्म सिटी नहीं है. कलाकार सीमित स्थानों पर शूटिंग पूरी करते हैं. जहां लोग फिल्मों का निर्माण, अभिनय व सारे इंतजाम अपने बलबुते कर रहे हैं. अब भी यहां कलाकारों को 50 हजार में काम करना पड़ता है. इसके बावजूद वहां की सरकार की तरफ से इसके लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है. अगर सही तरीके से इन्हें मदद मिले और सरकार प्रयास करे तो यहां रोजगार के नये अवसर भी पैदा किये जा सकते हैं.

माँतामगी पहली लंबी मणिपुरी फिल्म थी. यह वर्ष 1972 में उषा टॉकिज में दिखायी गयी थी.

क्षेत्रीय सिनेमा की नयी मिसाल


हिमालय की गोद में आयोजित सोनपानी फिल्मोत्सव के बाद फिल्मोत्सव की बयार ने अब उत्तर-पूर्व की तरफ रुख किया है. वाकई, ऐसे स्थानों पर जहां आम जीवन हर दिन कठिनाईयों से गुजरती है, वहां फिल्में बनाना, उन्हें देखना-दिखाना केवल वही कर सकते हैं, जो जुनूनी हों. इसमें कोई संदेह नहीं कि जहां परेशानियां अधिक होती हैं, वहां के लोग अधिक कर्मठ होते हैं. मुझे याद है दार्जलिंग में सफर करते वक्त मैंने एक गर्भवती महिला को पीठ पर सिलेंडर उठाये ऊंचाईयों पर चढ़ते देखा था. हमने शब्दों में बात नहीं की थी, लेकिन उसने अपनी मुस्कान से ही जाहिर कर दिया था कि वे कितने जुनूनी है. और जुनून का ही तो दूसरा नाम है सिनेमा. शायद यही वजह है कि अब इन स्थानों पर फिल्मों को लोगों ने गंभीरता से लेना शुरू किया. अब सिनेमा का नया सूरज इन राज्यों में भी चमकता नजर आ रहा है. इसी 15 अप्रैल से इंफाल में पहली बार इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्मोत्सव की शुरुआत की गयी है. इसमें बाहरी फिल्मों के अलावा वे फिल्में भी प्रदर्शित होंगी, जो मणिपुर के निर्देशकों ने बनाया है. इस वर्ष हालांकि मणिपुर की सिर्फ चार फिल्में ही शामिल हो पायी हैं. लेकिन यहां के युवा निर्देशकों ने संकेत दे दिया है कि अब वह भी फिल्म जैसे सशक्त माध्यम का और तेजी से इस्तेमाल करेंगे. भले ही मणिपुरी फिल्मों को अब तक सही तरीके से ऊंचा फलक नहीं मिला, लेकिन सीमित संसाधन, सीमित स्रोत के साथ ही उन्होंने कई फिल्में बनायी हैं. मणिपुर में भी फिल्मों के निर्माण का इतिहास बहुत पुराना है. वर्ष 1946 में श्री गोविंदाजी फिल्म कंपनी ने पहली बार यहां फिल्म कंपनी की शुरुआती की थी. अब तक लगभग 9 मणिपुरी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद ही यहां फर्स्ट मोशन पिक्चर  थियेटर स्थापित किया गया था. वर्ष 1948 में ही पहली बार मैनु बेमछा नामक पहली फिल्म बनाने का प्रयास किया गया था, लेकिन फिल्म बन नहीं पायी. इन सभी तथ्यों से ज्ञात होता है कि मणिपुर में फिल्मों को लेकर शुरू से लोग जुनूनी रहे हैं. मणिपुरी फिल्मों को उस वक्त भी अधिक बढ़ावा मिला जब यहां हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गयी थी. एक साल में लगभग उस वक्त 150 फिल्में बनने लगीं. सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए केवल मॉर्निंग शोज में फिल्में दिखायी जाती थीं. बावजूद इसके कि वहां फिल्म सिटी नहीं है. कलाकार सीमित स्थानों पर शूटिंग पूरी करते हैं. जहां लोग फिल्मों का निर्माण, अभिनय व सारे इंतजाम अपने बलबुते कर रहे हैं. अब भी यहां कलाकारों को 50 हजार में काम करना पड़ता है. इसके बावजूद वहां की सरकार की तरफ से इसके लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है. अगर सही तरीके से इन्हें मदद मिले और सरकार प्रयास करे तो यहां रोजगार के नये अवसर भी पैदा किये जा सकते हैं.

माँतामगी पहली लंबी मणिपुरी फिल्म थी. यह वर्ष 1972 में उषा टॉकिज में दिखायी गयी थी.

20120417

बॉलीवुड के नए बिट्टू बबली

फिल्म बिट्टू बॉस’ में बिट्टू के रूप में जब पुलकित सम्राट लोगों के सामने आते हैं, तो यह अनुमान लगा पाना बेहद कठिन है कि पुलकित की यह पहली फिल्म है. वे टेलीविजन से आये हैं और कुछेक विज्ञापनों में उन्होंने काम किया है. फिल्म में उनके आत्मविश्‍वास व प्रस्तुतीकरण को देख कर कोई नहीं कह सकता कि वे नवोदित कलाकार हैं. उन्हें जैसा किरदार मिला है. उन्होंने उस किरदार में खुद को ढाल लिया है. संभव हो कि फिल्म को खास कामयाबी न मिले, लेकिन पुलकित सम्राट को निश्‍चित तौर पर दर्शक पसंद करेंगे और निर्देशकों की पसंद बन जायेंगे. कुछ इसी तरह फिल्म ‘विकी डोनर’ में मुख्य किरदार निभा रहे आयुष्मान खुराना भी टेलीविजन से ही आये हैं, लेकिन टेलीविजन शो की एंकरिंग में भी उन्होंने कुछ इस कदर अपना परफॉरमेंस दिखाया है कि उन्हें फिल्म में काम करने का मौका मिला. इसी फिल्म की यमी गौतम भी टेलीविजन की एक्ट्रेस हैं. भले ही भाषणबाजी के दौरान यह कहा जाता रहा हो कि छोटा परदा छोटा नहीं है और अब बड़े परदे से भी आगे बढ. चुका है. लेकिन वास्तविकता यही रहेगी कि आज भी बॉलीवुड टेलीविजन पर हावी है. ऐसे में अगर किसी कलाकार को फिल्मों में मुख्य किरदार निभाने का मौका मिलता है तो यह उपलब्धि है. दरअसल, इन दिनों फिल्मों में भी निर्देशकों की नजर नये कलाकारों की तलाश में हैं. खासतौर से वैसे कलाकारों की तलाश जो नया चेहरा होने के साथ-साथ परफॉर्म भी कर पाये. गौर करें तो ऐसे कई कलाकार हैं जिन्होंने छोटे परदे से शुरुआत की. लेकिन बड़े परदे पर भी उन्हें मौके मिलते रहे हैं, लेकिन वे ज्यादा कामयाब नहीं हो पाये. राजीव खंडेलवाल उन कलाकारों में से एक हैं, जिनके अभिनय की तारीफ होती है. वही आमना शरीफ, प्राची देसाई, अनिता जैसी अभिनेत्रियों को फिल्में तो मिलीं, लेकिन वह खास कामयाब नहीं हो पायीं. जल्द ही साक्षी तंवर भी फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत कर रही हैं. इस फिल्म में वे सनी देओल के साथ हैं. खुद निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेद्वी मानते हैं कि साक्षी ने इस किरदार के लिए बहुत मेहनत की है. अगर साक्षी इस फिल्म में खुद को प्रूव कर पाती हैं तो उन्हें आगे भी फिल्में मिलती रहेंगी. चूंकि इन दिनों बॉलीवुड को कुछ ऐसे ही होनहार, अभिनय को गंभीरता से लेनेवाले कलाकार चाहिए. क्योंकि हिंदी फिल्मों में स्थापित कलाकारों के पास छोटे बजट की फिल्मों के लिए वक्त नहीं होता या फिर छोटे बजट की फिल्मों के निर्देशकों के पास उतनी लागत नहीं होती. यही वजह है कि बॉलीवुड के कुछ ऐसे बबली और बिट्टओं को मौके मिल रहे हैं और वे खुद को प्रूव कर रहे हैं.

मनोरंजन के माध्यम से भारत जोड़ो आंदोलन

आमिर खान ने हाल ही में अपने शो सत्यमेव जयते का एक गीत मुंबई में लांच किया. इस गीत के दृश्यों में आमिर पूरे भारत के कई प्रांतों में घूमते नजर आ रहे हैं. वे तिब्बत के बच्चों के साथ मस्ती करते भी नजर आ रहे हैं, तो कहीं वह कश्मीर की वादियों का आनंद उठाते नजर आ रहे हैं. इस गीत की लांचिंग के दौरान उन्होंने कई बार इस बात का जिक्र किया कि वह एक बार फिर से चाहते है कि अपने शो के माध्यम से वे पूरे भारतवासियों तक पहुंच सकें. उनकी इच्छा है कि वे दिल से लोगों को जोड़ सकें. इससे साफ जाहिर होता है कि आमिर भी जानते हैं कि दरअसल कोई भी व्यक्ति कितनी भी ऊंचाइयों पर पहुंच जाये, लेकिन जमीन से जुड़े रह कर ही खुद को वास्तविक संतुष्टि मिलती है. यही वजह है कि वे भारत भ्रमण पर निकल पड़े. वे  खुद मानते हैं कि इस शो के बहाने उन्होंने खुद को अमीर किया है. अमीर इस लिहाज से कि उन्होंने भारत को नजदीक से देख लिया है और यहां की संस्कृति से समृद्ध हो चुके हैं. दरअसल भारत वाकई संस्कृति का देश है. यहां इतनी विभिन्नताएं हैं, जिन्हें अगर करीब से जी लें तो वाकई ऐसा महसूस होता है कि पूरी दुनिया जी ली. और शायद यही कारण भी है कि कई वर्षों से लोग मनोरंजन के लिए भी इसी तरीके को अपना रहे हैं. चूंकि खुद आमिर भी मानते हैं कि मनोरंजन का मतलब सिर्फ हंसाना नहीं है. अगर लोगों को किसी भी रूप में किसी चीज के साथ घुला मिला दें तभी वह मनोरंजन है. और इसके लिए भारत के विभित्र प्रांतों की संस्कृति को समझना और फिर उसका सही तरीके से इस्तेमाल करना से बेहतर और क्या होगा. न सिर्फ आमिर, बल्कि कई निर्देशक, कई कलाकार और कई संगीतकार व संगीत से जु.डे लोग भी कई बार इसी माध्यम से कुछ अर्जित करने की कोशिश करते हैं. क्योंकि पूरे भारत में ही कई अलग भारत हैं , जो स्रोत हैं जीवन के, नयी उम्मीदों के, ऊर्जा के. संगीतकार स्नेहा खानवलकर भी उन्हीं महिला संगीतकारों में एक हैं. जो गांव में जाकर कटी लोगों से मिलती है और फिर उन्हें वहां से वह अपनी सोच अर्जित करती है. सुरभि, भारत एक खोज, डिस्कवरी इंडिया जैसे धारावाहिक उनमें से एक हैं. खुद नसीरूद्दीन शाह भी साल में एक बार पूरे भारत की सैर पर निकलते हैं. निश्‍चित तौर पर वे इसी मकसद से सैर पर निकलते हैं कि वह आम जिंदगी को जीकर अपने अभिनय में और दक्षता ला सकें. पुराने दौर में बलराज साहनी, प्राण, शम्मी कपूर जैसे कलाकार प्राय: वक्त मिलने पर घूमने जाया करते थे. और फिर वे वहां से प्राप्त अनुभव से वह खुद के अभिनय को और निखारते थे. दरअसल, कुछ ऐसे ही प्रयासों से ही भारत को जोड़ा जा सकता है. यह भी एक तरह से भारत जोड़ो आंदोलन का ही रूप है.

20120413

क्या दहाड़ पायेगा यह शेर खां

वर्ष 1973 में निर्देशक प्रकाश मेहरा ने फिल्म ‘जंजीर’ का निर्देशन व निर्माण किया. फिल्म में अमिताभ बान, जया भादुड़ी (अब बान) व प्राण मुख्य भूमिका में थे. इसी फिल्म से अमिताभ बान सुपरस्टार बने और प्राण की शेर खां वाली भूमिका यादगार बन गयी. इन फिल्मों से पहले भी हालांकि प्राण ने कई फिल्मों में अदभुत अभिनय किया था, लेकिन जंजीर से उनकी शेर खां वाली छवि स्थापित बन कर उभरी. इस फिल्म का आम दर्शकों पर कुछ इस कदर प्रभाव हो चुका था कि दर्शक अमिताभ व प्राण को वास्तविकता में दोस्त समझने लगे थे. इस फिल्म ने कई मिसाल स्थापित किये थे. अमिताभ एंग्री यंग मैन के रूप में उभरे. प्रकाश मेहरा की आर्थिक स्थिति ठीक हुई और हिंदी सिनेमा जगत को प्राण के रूप में एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार मिले. जल्द ही अपूर्व लखिया इसी फिल्म का रीमेक बनाने जा रहे हैं. यह तय हो चुका है कि फिल्म में प्राणवाली शेर खान की भूमिका अर्जुन रामपाल निभायेंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘जंजीर’ हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में से एक जिसको आज भी दर्शक देखना पसंद करते हैं. मसलन लोगों के जेहन में आज भी शेर खान और विजय की दोस्ती जिंदा है. यारी है ईमान मेरा.. आज भी लोगों की जुबां पर है. खुद प्राण इसे अपनी जिंदगी की सबसे यादगार भूमिका मानते हैं. ऐसे में क्या अर्जुन रामपाल प्राण के उस जीवंत किरदार को सार्थक कर पायेंगे. क्या यह वर्तमान दौर के शेर खां की दहाड़ में उतनी ताकत होगी कि वह दर्शकों को अपना मुरीद बना लें. खुद अमिताभ बान ने अपनी बातचीत व प्राण पर लिखी गयी किताब में इस बात का जिक्र किया है कि प्राण अपने किरदार को लेकर कितने सजग थे. इस फिल्म के दौरान वे काम खत्म हो जाने के बावजूद तब तक घर नहीं जाते थे. जब तक पूरे प्रोडक्शन का काम खत्म न हो जाये. वे देर देर तक अपने मेकअप रूम में ही मेहनत करते रहते थे. रिहर्सल करते रहते थे. वे अपना मेकअप खुद करते. पूरे परिधान का ख्याल रखते. इस किरदार को निभाने के लिए उन्होंने कई महीनों तक रिहर्सल किया. क्या अर्जुन रामपाल जैसे कलाकार, जो एक साथ कई फिल्मों में व्यस्त रहते हैं, उतनी शिद्दत से इस किरदार को जीवंत कर पायेंगे. यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है. चूंकि वर्तमान में न तो कलाकारों के पास वक्त होता है और न ही वे किसी किरदार के साथ जी पाते हैं. ऐसे में वे किसी एक किरदार पर उतनी मेहनत नहीं कर सकते. रीमेक के इस भेड़चाल में कम से कम ऐसी फिल्में जिनके किरदार व उनकी गरिमा को बरकरार रखा जाना चाहिए था. जरूरी नहीं कि उन तमाम फिल्मों से छेड़छाड़ की जाये, जो मिसाल हैं.

20120412

पुलकित बने बिट्टू बॉस

क्योंकि सास भी कभी बहू थी में अहम किरदार निभाने के बाद पुलकित ने अपनी पहचान बना ली थी, लेकिन वे बड़े परदे पर अपनी अभिनय क्षमता को आजमाना चाहते थे. इसी के चलते वे सबके सामने बिट्ट बॉस बन कर आ गये हैं. छोटे परदे से फिल्म बिट्ट बॉस तक के सफर के बारे में बता रहे हैं पुलकित सम्राट.
बिट्टू बॉस पुलकित की पहली हिंदी फिल्म है. इस फिल्म से वह बॉलीवुड में एंट्री कर रहे हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि दर्शक उन्हें पसंद करेंगे. बिट्ट बॉस में वे वीडियोग्राफर की भूमिका निभा रहे हैं.
नर्वस हूं
यह सच है कि बड़े परदे पर लीड किरदार निभाना एक चुनौती होती है और हर किसी के लिए यह बेहद मुश्किल होता है. मैं भी अपनी इस फिल्म को लेकर टेंशन में हूं. नर्वस हूं. साथ ही मैं खुश भी हूं क्योंकि इस फिल्म में मैंने कॉमेडी किरदार निभाया है और कॉमेडी करना सबसे कठिन होता है.
बिट्ट बॉस के बारे में
यह फिल्म पंजाबी रीति रिवाजों पर आधारित है. शादी का माहौल है, जिसमें मैं वीडियोग्राफर हूं. लेकिन यह वीडियोग्राफर औरों से अलग और खास है. यही वजह है कि सभी उसके चहेते बनना चाहते हैं. लेकिन बिट्ट का भी अपना अलग तरह का स्टाइल है और वह केवल उन्हें ही प्यार करता है, जो उसकी इज्जत करते हैं.
इस फिल्म में यह भी दर्शाने की कोशिश की गयी है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. वह खास होता है और काम करने वाला और भी खास. यह एक छोटी सी जगह की कहानी है. एक मोहल्ले में भी कैसे कोई हीरो बन सकता है उसकी कहानी है. खूब सारी मस्ती और हंगामा है. खासतौर से संवाद लोगों को जरूर पसंद आयेंगे.
यूं मिली फिल्म
मैंने इसके लिए बहुत सारे ऑडिशन दिये. फिर जाकर मुङो मौका मिला. मैं पिछले सात सालों से मुंबई में हूं और लगातार बड़े अवसर की तलाश कर रहा था. लेकिन अब जाकर मुजे यह मौका मिला है. पता नहीं मैंने इन सात सालों में कितने सारे ऑडिशन दिये होंगे. मेरा चुनाव होने के बाद भी मुझे कई बार हर लुक में रख कर देखा गया कि मैं बिट्ट के किरदार में फिट बैठता हूं या नहीं.
खुश हूं कि मिला है
सलमान का प्यार
सलमान हमेशा से मेरे पसंदीदा अभिनेता रहे हैं. उन्होंने इस फिल्म के म्यूजिक लांच पर मेरे काम को सराहा और इस बात की मुङो बेहद खुशी है कि मुझे उनका प्यार मिला है. मैं उम्मीद कर सकता हूं कि मुझे कामयाबी मिलेगी

फिल्म बनी जिंदगी की पाठशाला !

हम लिखते-लिखते ही कहानीकार बनते हैं. फिल्में देखकर निर्देशक व कलाकारों के अभिनय से प्रभावित होकर ही हम अपने अंदर छिपे कलाकारों को भी पहचान पाते हैं. हिंदी फिल्म जगत की कई जानी मानी हस्तियां भी सृजन की इसी प्रक्रिया से गुजरी हैं. उन्होंने भी अपने जीवन में कई चीजें देखी, पढ़ी, सुनी हैं और जिसकी वजह से ही वह उस मुकाम पर पहुंचीं, जहां पहुंचना चाहती थीं. ऐसा वे खुद मानती हैं.
अर्थ से मिला मुझे जीवन का अर्थ
शबाना आजमी
मेरी जिंदगी में महेश भट्ट की फिल्म अर्थ हमेशा अहम रहेगी. इस फिल्म में मैंने पूजा का किरदार निभाया था. इस फिल्म ने मेरी अंतरात्मा को पूरी तरह झकझोर दिया था. खासतौर से फिल्म का वह हिस्सा जिसमें मैं स्मिता पाटिल से बात कर रही हूं. मुङो याद है, इस सीन के लिए मैंने कई बार रिहर्सल की थी. एक और खास बात यह थी कि यह सीन अंतिम दिन शूट किया गया था. स्मिता फोन के दूसरे तरफ थीं फिल्म में. लेकिन शूटिंग के वक्त मैंने वह सीन दीवारों के साथ किया था. क्योंकि स्मिता दूसरे सीन की शूटिंग कर रही थीं. मुङो महेश ने कहा शबाना तुम बस बोलती जाओ फोन पकड़ कर. कल्पना कर लो कि आपकी दूसरी तरफ स्मिता हैं. और मैं बोलती जा रही थी. मेरे टाइट क्लोज अप लिये गये थे फिल्म में. और वह फिल्म का सबसे बेहतरीन दृश्य बना. इस फिल्म से मैंने अपने आपमें एक वर्सेटाइल अभिनेत्री को पा लिया था. इस फिल्म से मैंने महसूस किया कि अगर किसी औरत के साथ ऐसा हो, तो उस पर क्या गुजरेगी.अर्थ ने मुझे जीने का अर्थ दे दिया.
पारिवारिक मूल्यों की अनूठी फिल्म
करन जौहर
मेरे जीवन में फिल्म हम आपके हैं कौन की बहुत अहमियत है. ऐसा इसलिए क्योंकि मैं आज भी यह महसूस करता हूं कि हम आपके हैं कौन भारत की उन महत्वपूर्ण हिंदी फिल्मों में से एक है, जिसमें भारत के परिवारों की आत्मा छिपी है. परिवार के मूल्य छिपे हैं. परिवारों की खुशियां छिपी हैं. मैं इस फिल्म की शूटिंग के दौरान आदित्य चोपड़ा के साथ कई बार सेट पर मौजूद रहता था.
उन्हीं दिनों आदित्य को फिल्म दिलवाले दुल्हनिया .. के लिए अनुपम खेर से बात करनी होती थी और वे उस वक्त इस फिल्म में काम कर रहे थे, तो ऐसे में मुझे मौका मिल जाता था शूटिंग देखने का.
इसी फिल्म से मैंने सीखा था कि मुङो भी अपनी फिल्मों में पारिवारिक मूल्यों को अहमियत देनी है. एक दृश्य में आलोक नाथ व रीमा लागू रेणुका की तसवीर को देख कर गीत गाते हैं. आप गौर करें तो वह आंखों से अपना आभार प्रकट करते हैं. वह दृश्य मेरे लिए बहुत भावुक था.
अलग ही था वह अंदाज
जूही चावला
आप शायद इसे मजाक समझ सकते हैं, लेकिन यह सच है कि मुङो फिल्म अंदाज अपना अपना ने बहुत प्रभावित किया था. मैंने उससे फनी फिल्म आज तक नहीं देखी थी. एक दृश्य में आमिर, सलमान एक पिस्तौल के जरिए रवीना और करिश्मा को गुंडों से छुड़वाते हैं और अंत में पता चलता है कि उसमें गोली ही नहीं, वह बेहद रोचक था.
साथ ही आमिर व सलमान की जुगलबंदी मजेदार थी फिल्म में. जिसमें सलमान को आमिर जमाल गोटा मिला कर पिला देते हैं, वह दृश्य भी बहुत रोचक है. मैंने उस फिल्म से कॉमेडी के कई टिप्स लिये हैं. यह एक ऐसी फिल्म है जिसे मैं बार बार देख सकती हूं.
मासूम की मासूमियत नहीं भूल सकता
शेखर कपूर
मासूम मेरी पहली फिल्म थी, सिर्फ इसलिए वह मेरे लिए खास नहीं, और इसलिए भी नहीं कि उसे मैंने बनाया है, बल्कि इसलिए क्योंकि इस फिल्म की मासूमियत मुङो हमेशा रास आती है. मैं इस फिल्म में जुगल हंसराज व नसीरुद्दीन शाह के किरदार से कुछ इस तरह प्रभावित था कि उन दोनों के बीच जब भी संवाद फिल्माता, तो रो देता था. आपको शायद वह दृश्य याद हो जिसमें जुगल, नसीर से पूछते हैं कि क्या आप मेरी मम्मी को जानते हैं.
साथ ही वह दृश्य जब वह कहते हैं कि चिट्ठी में लिखा है कि आप मेरे पापा हैं. ये सभी दृश्य जब एडिट होते भी देखता था तो मैं रो देता था. एक दृश्य में जहां जुगल पूरे परिवार की तसवीर बना रहे हैं. उसमें वह खुद नहीं, लेकिन कितनी मासूमियत से वह पूछते हैं कि मैं अपनी तसवीर भी बना दूं क्या. आज भी इस फिल्म के दृश्यों को मैं खुद से अलग नहीं कर पाया.
मास्टरपीस थी पाथेर पांचाली
श्याम बेनेगल
मैं हमेशा से सत्यजीत रे से प्रेरित रहा हूं और प्रभावित भी. मैंने फिल्में बनाते वक्त यही कोशिश की है कि मैं उनकी ही तरह दृश्यों को संजो कर रखूं. मेरे कानों में आज भी पाथेर पांचाली के बैकग्राउंड स्कोर गूंजते हैं, जिस दृश्य में छोटे बच्चे दौड़ते हैं खेत में और जिस तरह से संवाद अदायगी की गयी, वह बिलकुल अलग थी. बच्चे ट्रेन के पीछे दौड़ते हैं..मैं उन दृश्यों को भूल नहीं सकता. यह पहली फिल्म थी जिसे देख कर मैं रोया था.
आनंद से हुआ था प्रभावित
राजकुमार हिरानी
मैं बहुत छोटा था जब मैंने आनंद फिल्म देखी थी और इससे मैं बहुत प्रभावित हुआ था. लंबे अरसे तक यह फिल्म मेरे जेहन में रही थी. खास बात यह थी कि मैं जब फिल्म इंस्टीट्यूट गया और फिल्म मेकिंग का ग्रामर सीखा, तो मैंने दोबारा आनंद देखी तब मुङो एहसास हुआ कि फिल्म में किसी तरह का कोई ग्रामर नहीं था, लेकिन फिर भी लाजवाब थी. उसी वक्त मैंने तय कर लिया था कि मैं ऐसी ही फिल्में बनाया करूंगा.

किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं आमिर

आमिर खान के नये शो ‘सत्यमेव जयते’ के प्रोमोज टेलीविजन पर दिखाये जाने लगे हैं. छोटे परदे पर यह आमिर का पहला शो है. शो का प्रसारण 6 मई से स्टार प्लस पर होना है. इसके प्रोमोज ने दर्शकों के दिलों में जिज्ञासा उत्पत्र कर दी है. वजह यह है कि प्रोमोज में फिलहाल कुछ क्लीपिंग दिखाई जा रही है, जिसमें आमिर यह दावा करते हैं कि एंटरटेनमेंट का मतलब सिर्फ हंसाना नहीं होता. अब तक उन्होंने इसका कोई खुलासा नहीं किया है कि आखिरकार इस शो का फॉरमेट क्या है और इसकी थीम क्या है. दरअसल, आमिर खान का यह अंदाज भी किसी पब्लिसिटी स्टंट से कम नहीं कि वे अपने प्रोजेक्ट्स को गोपनीय रखते हैं और लोगों को मजबूर कर देते हैं कि वह अनुमान लगाते रहें कि वह क्या दिखानेवाले हैं. बाद में वे कुछ बेहद चौंकानेवाली चीज लेकर दर्शकों के सामने आते हैं. बतौर अभिनेता मिस्टर परफेक्शनिस्ट की उपाधि हासिल करनेवाले आमिर भी किसी गुत्थी से कम नहीं हैं. वे न केवल अपनी व्यक्तिगत बातों को राज बनाये रखने में माहिर हैं (सरोगेसी के माध्यम से पुत्र आजाद की प्राप्ति) बल्कि अपनी फिल्मों के लुक, उनके नाम, उनके कलाकारों को लेकर भी बेहद गोपनीय रहते हैं. उनकी आगामी फिल्म ‘तलाश’ के शीर्षक को लेकर लोगों में चर्चा थी कि फिल्म का नाम धुआं होगा, लेकिन उन्होंने फिल्म का नाम ‘तलाश’ रख कर लोगों को चौंकाया. कुछ इसी तरह उन्होंने इस फिल्म की कहानी का वनलाइनर भी किसी के सामने जिक्र नहीं किया. यशराज की फिल्म ‘धूम 3’ में उन्होंने जब बतौर खलनायक काम करने की हामी भरी, लोग चौंके. दरअसल, आमिर इसी विधा में तो माहिर हैं. ‘पीपली लाइव’, ‘धोबी घाट’ जैसी फिल्में बनानेवाले अपने ही बैनर तले उन्होंने ‘डेली बेली’ जैसी फिल्म बनायी, तब भी लोग चौंके. क्योंकि आमिर की छवि लोगों के जेहन में एक आदर्शवादी, पढे. लिखे शिक्षित व्यक्ति की है. साथ ही एक संवेदनशील नागरिक के रूप में भी, क्योंकि वे लगातार कई जागरूकता मिशन, अतिथि देवोभव: जैसे विज्ञापनों का हिस्सा रहे हैं. इसलिए, लोगों को यकीन ही नहीं हुआ कि उनके प्रोडक्शन हाउस भी कभी शीट हैप्नस(डेली बेली के संदर्भ में) कर सकता है. तमाम आलोचनाओं के बावजूद आमिर ने ‘डेली बेली’ को ब्रांड बनाया और अब वह फिर से ‘सत्यमेव जयते’ लेकर आ रहे हैं. दरअसल, आमिर अपनी आनेवाली थ्रीलर फिल्म की तरह ही खुद में एक तिलिस्म है. वह खुद एक थ्रीलर हैं. उनकी व्यक्तिगत जिंदगी व प्रोफेशनल जिंदगी की गुत्थियां परत दर परत खुलती जाती हैं और वे वाकई चौंकाती हैं. शायद इस दौर में जहां मीडिया से किसी भी तरह की खबर नहीं छुपती. ऐसे दौर में भी आमिर इसलिए कामयाब हैं क्योंकि वे चुपचाप अपनी स्ट्रेजी तैयार करते हैं और बिना किसी भनक के वे काम कर जाते हैं. वाकई आमिर किसी मार्केटिंग गुरू से कम नहीं है. बहरहाल शो के शीर्षक से फिलहाल केवल अनुमान हीं लगाया जा सकता है कि शो संवेदनाओं से भरपूर होगा

20120411

जीवन साथी हम दीया और बाती हम

स्टार प्लस के शो दिया और बाती हम की परिकल्पना सुमित मित्तल ने अपनी वास्तविक जिंदगी से प्रभावित होकर ही की थी. उन्होंने यह धारावाहिक अपनी पत्नी शशि की जिंदगी पर बनाया है. शशि उनकी पत्नी हैं और दोनों साथ मिल कर शशि व सुमित मित्तल प्रोडक्शन का संचालन करते हैं.
टेलीविजन पर इन दिनों उनके लगभग सभी शो पसंद किये जा रहे हैं. परदे के पीछे यह जोड़ी इसलिए कमाल दिखा पा रही है क्योंकि दोनों दिया और बाती की तरह ही काम करते हैं. सूर्योदय से सूर्योदय तक होता है इन दोनों का साथ. दोनों अहमदाबाद के ही एक स्कूल में पढ़े. प्यार हुआ. फिर दोनों एक हुए. शशि लिखना चाहती थीं और अच्छा लिखती थीं. सुमित ने उनका साथ दिया. फिर दोनों ने मिलकर प्रोडक्शन हाउस शुरू किया.
बकौल शशि सुमित हम दोनों लेखक हैं, इसलिए हममें झगड़े भी होते हैं. लेकिन दोनों ही एक दूसरे को शांत कर देते हैं. इसलिए हम आज सफल हो पाये. आज भी हम अच्छे दोस्त हैं. शशि लेखन का हिस्सा संभालती हैं और सुमित प्रोडक्शन व निर्देशन का.
बकौल शशि सुमित यह सच है कि हम अपने बच्चों के साथ बहुत वक्त नहीं गुजार पाते. लेकिन जो भी समय हम उनके साथ बिताते हैं, बेहतर ढंग से बिताते हैं और बच्चे छोटे हैं अभी. मेरी दो बेटियां हैं और दोनों बहुत समझदार हैं. शुरुआती दौर में शशि सुमित ने अपना पारिवारिक व्यवसाय ही ज्वाइन कर लिया था. लेकिन फिर वे दोनों मुंबई आ गये. क्योंकि सुमित एक्टर बनना चाहते थे.
धीरे-धीरे इंडस्ट्री के सच से वे वाकिफ हुए और फिर उन्होंने तय किया कि वह प्रोडक्शन करेंगे. शशि सुमित ने पहली बार मिल कर सजन घर जाना है शो बनाया और उसके बाद से यह सिलसिला जारी है.
फिलहाल दोनों कई नये शोज बनाने की तैयारी में हैं. लेकिन एक बात दोनों स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे हमेशा रिश्तों की अलग- अलग मायनों पर आधारित कहानियां प्रस्तुत करते रहेंगे

मुझे रोमांचित करती हैं हिंदी फिल्में''

फिल्म कहानी 9 मार्च को रिलीज हुई थी. यानी एक महीने पहले. लेकिन अब भी इस फिल्म को दर्शक मिल रहे हैं. वर्तमान में जहां तीन दिन भी फिल्में नहीं टिकती हैं, कहानी अब भी सफलता की कहानी लिख रही है. नि:संदेह इसका श्रेय लेखक-निर्देशक सुजॉय घोष को जाता है. इस फिल्म को बनाने व विद्या बालन से जुड़े कुछ पहलुओं के बारे में बता रहे हैं स्वयं सुजॉय घोष..
सुजॉय घोष की फिल्म कहानी को सफलता मिल चुकी है. लेकिन यह सफलता आसानी से नहीं मिली. इस सफल कहानी के पीछे उनकी दो असफल फिल्में भी हैं, क्योंकि सुजॉय मानते हैं कि आप बेहतर तभी बना सकते हैं, जब आप शुरुआत करें. वे मानते हैं कि बस ऑडियंस को जो चीजें अच्छी लगीं, वह अच्छी हैं.
अगर आप निर्देशक हैं तो आपको एक अच्छी कहानी कहने की कला आनी चाहिए. क्योंकि आप जो कहना चाहते हैं अगर वह दर्शकों तक पहुंच जाता है तो आप अच्छे निर्देशक हैं. फिल्म अलादीन के माध्यम से मैं यह बताना चाहता था कि कोई मैजिक लैंप नहीं होता. लेकिन वह बात दर्शकों तक नहीं पहुंच पायी. फिल्म कहानी में मैं अपनी बात दर्शकों तक पहुंचा पाया, इसलिए वह कामयाब रही.
कैसे बनी कहानी
कहानी थ्रिलर फिल्म थी और मुझे इस बात का खास ख्याल रखना था कि कैसे मैं दर्शकों को तीन घंटे तक बांधे रख सकूं.
जेहन में विद्या पहले आयीं
मैं विद्या के साथ हमेशा से काम करना चाहता था. उनसे कहता भी रहता था कि हम साथ में फिल्म बनायेंगे. मैंने विद्या को ध्यान में रख कर फिल्म कहानी लिखी. विद्या जब फिल्म इश्किया की शूटिंग कर रही थीं, उस वक्त उन्होंने कहा था मुझे हीरोइन बाउंड स्क्रिप्ट दो.. अंतत: मैंने कहानी लिखी और दोनों ने साथ काम किया.
कहानी में विद्या ही क्यों
विद्या उन अभिनेत्रियों में से एक हैं, जिन्हें हर कोई पसंद करता है. हर वर्ग के दर्शक खुद को कनेक्ट करते हैं उनसे. विद्या केयरिंग फिगर हैं. मैं भी अपनी कहानी में किसी ऐसे ही किरदार को लेना चाहता था, जिसके साथ लोगों को प्यार हो. लोग उसके साथ हमदर्दी रखें. इस फिल्म के लिए मुझे विद्या जैसी ही मासूम लेकिन मजबूत लड़की चाहिए थी.
किरदार गर्भवती क्यों
फिल्म में विद्या बागची के किरदार को गर्भवती दिखाने की खास वजह यह थी कि गर्भवती महिला को हर कोई प्यार करता है. उसका ख्याल रखता है. उसके साथ जुड़ जाता है. फिल्म में दर्शकों को अंत तक बिठाये रखने के लिए यह जरूरी था कि लोग उस मां के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जायें.
किसी भी फिल्म में यही सबसे बड़ी चुनौती होती है कि आप कैसे दर्शकों को फिल्म में इमोशनली इन्वॉल्व करें. दूसरी बात मेरी फिल्म एक महिला की जर्नी की कहानी है. उसकी परेशानी की कहानी है. उसने अपने पति व अपने बच्चे, दोनों को खोया था. उसका दर्द दिखाना था. इसलिए, किरदार को इस रूप में प्रस्तुत किया.
आंखों से बोलती हैं विद्या
मैंने महसूस किया है कि वह आंखों से अभिनय करती हैं. अब तक उनके इस भाग का अभिनय पूरी तरह परदे पर नहीं दिखा था. मैंने फिल्म में विद्या से आंखों से अभिनय करवाया. एक और खास बात यह भी थी कि मैंने विद्या बागची व विद्या बालन में बहुत कुछ समान चीजें देखीं. दोनों ही मजबूत महिलाएं हैं.
वास्तविक जिंदगी में विद्या निर्भीक होकर चलने वाली लड़की हैं और इमोशनल भी हैं. आपने गौर किया होगा फिल्म में विद्या ने कई जगहों पर पैर हिलाया है. दरअसल, वास्तविक जिंदगी में भी वह जब परेशान होती हैं या कुछ सोचती रहती हैं तो पैर हिलाती हैं. मैंने उनकी इन चीजों को नोटिस कर विद्या बागची का किरदार गढ़ा था.
डिटेलिंग जरूरी
मैं एक और बात का ख्याल रखता हूं कि मेरे छोटे किरदारों में भी डिटेलिंग हो,कॉस्टयूम, संवाद सभी चीजों में दर्शक को कुछ अटपटा न लगे. वे देखें तो उन्हें लगे, अरे यह तो हमारी जिंदगी का हिस्सा है. मैं ऑब्जरवेशन पर खास ध्यान देता हूं.
हिंदी सिनेमा से बेइंतहा प्यार
मैं बंगाली हूं और मुझे बेहद प्यार है अपनी भाषा से. लेकिन फिल्में मैं हिंदी में ही बनाऊंगा. क्योंकि मुझे हिंदी फिल्मों में ड्रामा, एक्शन, मस्ती सबकुछ देखने में मजा आता है. मैं शक्ति, शोले, शान जैसी फिल्में देख कर बड़ा हुआ हूं और यही फिल्में मुझे आकर्षित करती हैं.

"बेटे की नजर में मैं स्टंट हीरो हूं"

राउडी राठौड़, जोकर, खिलाड़ी 786 के साथ ही इन दिनों अपने होम प्रोडक्शन की फिल्मों में व्यस्त हैं अक्षय कुमार. इसके बावजूद बात जब हाउसफुल 2 की आती है. उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती है. क्योंकि वे मानते हैं कि हाउसफुल जैसी फिल्में दिल और दिमाग दोनों को फिर से तरोताजा कर देती हैं.
अक्षय, इस साल आप कई फिल्मों में काम कर रहे हैं ? फिर हाउसफुल 2 से क्या उम्मीदें हैं?
देखिये! उम्मीद बस इतनी ही है कि दर्शक फिल्म देखें और खूब हंसे. जी हां, इस साल मेरी कई फिल्में आ रही हैं और मैं सभी को लेकर बहुत उत्साहित हूं. हर फिल्म में मेरा अलग किरदार दर्शकों के सामने होगा. राउडी राठौड़ में बिल्कुल ही अलग गेटअप है. अलग जॉनर की फिल्म है वह. अलग तरह के संवाद आपको सुनने को मिलेंगे राउडी में. जोकर बिल्कुल अलग है. ऐसे में जब मैं हाउसफुल जैसी फिल्में करता हूं, तो दिमाग में बस एक ही ख्याल रहता है कि दोस्तों के साथ थोड़ी मस्ती कर ली जाये.
आप कई फिल्में एक साथ कर रहे हैं, ऐसे में शूटिंग के दौरान खुद को कैसे एक किरदार से दूसरे में ढालते हैं?
देखिये! ऐसी नौबत हमेशा नहीं आती. जब ऐसा होता है, तो कम-से-कम दो फिल्मों में एक दिन का गैप जरूर रखता हूं. थोड़ा मेडिटेशन करता हूं. किरदार की तैयारी के बारे में सोचता हूं. उसे तैयार करता हूं और खुद को रिलैक्स कर दूसरे किरदार में जाने की तैयारी करता हूं.
हाउसफुल 2 में शीर्षक का मतलब बॉक्स ऑफिस के हाउसफुल से है या..
नहीं, फिल्म में शीर्षक हाउसफुल का मतलब एक ऐसा घर जो लोगों से फुल हो. मतलब जहां कई लोग रहते हों.
क्या यही वजह है कि हाउसफुल में हमेशा मल्टीस्टार रहते हैं?
जी हां, बिल्कुल. पिछली बार तो हमारी दो जोड़ियां थीं. इस बार न केवल चार जोड़ियां हैं, कई सीनियर कलाकार भी हैं. चिंटू जी ( ऋषि कपूर ), रणधीर कपूर ( जिनके साथ मैंने पहले भी काम किया है ), मिथुन और बोमन ईरानी. तो पूरे घर में हमारी यही कोशिश है कि जहां भी आपकी निगाह जाये लोग ही लोग नजर आयें.
आपने बताया कई सीनियर कलाकारों के साथ काम कर रहे हैं, तो कुछ सेट से जुड़ी बातें बताना चाहेंगे?
मैंने जैसा पहले ही कहा कि हाउसफुल दिमाग लगाने वाली फिल्म नहीं है, इसलिए हम वहां सिर्फ मस्ती के बारे में ही सोच सकते हैं. ऐसे में जब सीनियर कलाकार भी आपके साथ होते हैं, तो मस्ती के डोज के बढ़ने की ही संभावना होती है, घटने की नहीं. सभी बड़े कलाकारों के साथ हमने बहुत मस्ती की. असिन को जब भी हम सेट पर छेड़ते थे, क्योंकि उसकी हिंदी ज्यादा अच्छी नहीं है, चिंटू जी उसे बहुत पैंपर्ड करते थे. फिल्म में वह उनके पिता हैं. मुझे उस पार्ट की शूटिंग में मजा आया. जब भी सेट पर सभी कलाकार एक साथ होते थे, उस दिन सभी सीनियर कलाकार अपने अनुभव की बातें साझा करते थे. रणधीर कपूर सर ने चिंटूजी के बारे में बताया था कि बचपन में वे किस तरह की शरारत करते थे. राज कपूर सर चिंटूजी को लाड साहब कह कर पुकारते थे और चिंटूजी बच्चों में सबसे शरारती होते हुए भी राज कपूर से बहुत डरते थे.
अक्षय, आप खुद भी निर्माता बन चुके हैं. बतौर निर्माता-प्रोडक्शन के काम और कलाकारों के चुनाव के साथ खुद अपनी फिल्म में अभिनय करना कितना कठिन होता है?
मुझे लगता है कि चीजें आसान हो जाती हैं, क्योंकि आप खुद जब अभिनेता हैं और निर्माता भी तो कभी भी आप अपने काम में देर नहीं करेंगे. प्रोजेक्ट जल्दी पूरी करने की कोशिश करेंगे. हां, यह जरूर है कि माथापच्ची ज्यादा है. क्योंकि शॉट के साथ-साथ सेट पर होने वाले खर्च का भी ख्याल रखना पड़ता है. एक फायदा है कि लीड हीरो के पैसे तो बच जाते हैं भाई.. (हंसते हुए) और मैं तो निर्माता बना ही इसलिए हूं, ताकि जब मुझे कहीं काम न मिले तो अपनी ही फिल्मों में खुश हो लेंगे और क्या..
अक्षय आपने सभी जॉनर में काम किया है. सबसे ज्यादा मजा किस जॉनर में आता है?
मुझे एक्शन करने में सबसे ज्यादा मजा आता है.
किसी स्टंट को करते समय कभी डर नहीं लगा?
नहीं. इसकी एक खास वजह है, क्योंकि स्टंट करते वक्त मैं अपने बेटे को याद करता हूं और मेरे बेटे की नजर में मैं एक बेहतरीन स्टंट हीरो हूं.

एक नायक की ईमानदार आत्मकथा

फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ की शूटिंग के दौरान बलराज भिखारी के वेष में ही जब किसी दुकान में सिगरेट या खाना मांगने जाते, तो दुकानदार उन्हें भिखारी समझ कर इनकार कर देते थे.ल ही में अभिनेता बलराज साहनी की आत्मकथा पढ.ी. अब तक हिंदी सिनेमा से जुड़ी जिन शख्सियत की भी आत्मकथा पढ.ी है, उनमें बलराज साहनी की आत्मकथा हर मायने से खास है. जिस शैली में बलराज ने अपने अभिनय जीवन के सफर व साईयों से रू-ब-रू कराया है. वह बेहद ईमानदार और निष्पक्ष है. शायद यही वजह है कि इस आत्मकथा के चंद पóो ही आपके अजीज हो जाते हैं. किताब में पóो बेहद कम है, लेकिन कम अल्फाज में ही बलराज ने जिंदगी की व्यथा का सजीव चित्रण कर दिया है, क्योंकि यह दिल से लिखी गयी है. उन्होंने अपनी आत्मकथा में खुद को कहीं से नायक नहीं बनाया है और न ही लिखते वक्त वह आत्ममुग्ध नजर आये हैं. ऐसा भी नहीं है कि इस आत्मकथा में उन्होंने अपनी विफलताओं का जिक्र नहीं किया है, बल्कि अपनी विफलताओं के साथ ही उन्होंने साफतौर पर उन लोगों के बारे में भी लिखा है, जिन्होंने उनके जीवन में जहर घोला है. दरअसल, किसी भी व्यक्ति की आत्मकथा कुछ इसी अंदाज में लिखी जानी चाहिए. किताब का आकार भले ही छोटा हो, लेकिन स्पष्ट रूप से उन पहलुओं का जिक्र हो. बिना किसी लागलपेट कुछ इसी तरह बलराज साहनी अपनी जीवन की गाथा को दर्ज करते हुए बताते हैं कि एक दौर में जब वह मुफलिसी की जिंदगी जी रहे थे. उस वक्त छोटी उम्र में ही उन्होंने अपने बेटे परीक्षित को काम पर लगा दिया था. वे स्वीकारते हैं कि अपनी पत्नी दम्मो को वह अपने अहम की वजह से वह सारी खुशियां नहीं दे पाये. साथ ही वह उन सभी घटनाओं का जिक्र करते हैं, जिसे पढ. कर आंखों के सामने इस इंडस्ट्री का सच सामने नजर आ जाता है. बलराज ने सिर्फ अपनी आपबीती का ही जिक्र नहीं किया है, बल्कि कई घटनाओं के माध्यम से उन्होंने कई कड़वे सच से भी लोगों को रू-ब-रू कराया है. जिनमें मीना कुमारी पर उनके निर्माता की बुरी नजर व नायिका होने की भुक्तभोगी होने का पूरा वाक्या सुनाया है. उन्होंने बताया है कि कैसे उनके साथ उस दौर की मशहूर अभिनेत्रियां (जिनमें गीता बाली प्रमुख हैं) उनके साथ काम नहीं करना चाहती थीं. चेतन आनंद से उनकी गहरी दोस्ती, फिर देव आनंद को गलती से कहे गये यह शब्द कि वह कभी अभिनेता नहीं बन सकते. कैसे देव आनंद के दिल में घर कर गये और उनकी दोस्ती में दरार आ गयी. इस बात का मलाल भी ईमानदारी से जाहिर करते हैं बलराज. आत्मकथा के माध्यम से ही उन्होंने जॉनी वॉकर जैसे बेहतरीन कलाकार को कभी मदारी का नाच दिखानेवाला महज बंदर समझा जाता था. उस जमाने के लोकप्रिय कलाकारों के लिए वह केवल मनोरंजन के माध्यम थे. लेकिन बलराज ने उन्हें हौसला दिलाया और फिल्मों में उनकी एंट्री हुई. इसका भी पूरा विवरण दिया है. उन्होंने इस दर्द को भी जाहिर किया है कि किस तरह कम्युनिष्ट का ठप्पा लग जाने की वजह से उनके अभिनय जीवन पर विराम लगा. बलराज स्वीकारते हैं कि अपने इगो व गुस्सैल स्वभाव की वजह से वे कई बार असफल रहे हैं. मेरी समझ से अब तक लिखी गयी तमाम आत्मकथा में यह एक महत्वपूर्ण आत्मकथा है. जिसे जरूर पढ.ी जानी चाहिए.

20120410

फिल्म व साहित्य का रिश्ता

फिल्म और साहित्य का गहरा रिश्ता रहा है. हिंदी फिल्मों में खासतौर से साहित्य को अहमियत दी जाती रही है. कई फिल्मों का प्रारूप साहित्यिक रखा गया है तो कभी फिल्म की कहानी किसी साहित्य को ध्यान में रख कर बनायी जाती रही है. लेकिन पिछले कई सालों से हिंदी सिनेमा में अंगरेजी साहित्य ने अपनी खास जगह बना ली है. हिंदी के निर्देशक अंगरेजी साहित्य से प्रभावित होकर फिल्में बना रहे हैं. रोमियो जूलियट, ओथेलो की कहानियां हमेशा हिंदी फिल्मों में नजर आती रही है. विशेषकर विशाल भारद्वाज साहित्यिक फिल्में बनाने में माहिर रहे हैं. चेतन भगत की किताब वन नाइट एट ए कॉल सेंटर पर ‘हैलो’ फिल्म बन चुकी है. साथ ही फिल्म ‘3 इडियट्स’ में चेतन की ही किताब ‘5 प्वाइंट समवन’ से कुछ प्रभावित घटनाएं ली गयी थीं. इन दिनों एक बार फिर से अंगरेजी साहित्य पर हिंदी फिल्मों के निर्देशकों की विशेष नजर है. ‘पीपली लाइव’ की निर्देशिका अनुषा रिजवी लेखक अमिताभ घोष की पुस्तक ‘द सी पॉपिस’ पर फिल्म बनाने जा रही हैं. अमिताभ घोष की यह फिल्म वर्ष 2009 में मैन बुकर प्राइज के लिए मनोनित हुई थी. अमिताभ घोष की यह किताब इंडियन-इंग्लिश भाषा में लिखी गयी है. यह फिल्म रोमांचित थ्रीलर होगी. फिल्म की कहानी अफीम की तस्करी व पलायन पर आधरित होगी. अनुषा के अलावा जल्द ही मनमोहन शेट्ठी की टीम भी जल्द ही अनुजा चौहान की किताब ‘द जोया फैक्टर’ पर फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं. इसी किताब पर कुछ दिनों पहले तक शाहरुख खान भी फिल्म बनाने की योजना बना रहे थे. लेकिन इसे अब मनमोहन शेट्ठी की टीम बना रही है. अनुजा की ही किताब द बैटल फोर बिटोरा पर भी फिल्म बनाने की चर्चा हो रही है.

20120409

एक मां भी होती है अभिनेत्री

ऐश्वर्या राय इन दिनों फिल्मों में नजर नहीं आ रहीं, लेकिन फिर भी चर्चा में रहती हैं. जब वह गर्भवती थी, तो इस बात पर सभी सोशल नेटवर्किंग साइट, अखबारों में चर्चा हो रही थी कि आखिर वे पुत्र को जन्म देंगी या पुत्री को. अब जब वह मां बन चुकी हैं, तो इस बात पर चर्चा हो रही है कि आखिर ऐश्‍वर्या इतनी मोटी क्यों होती जा रही हैं. कई लोगों ने तो उनके फिल्मी कैरियर के अंत हो जाने तक की बात कह दी है. क्योंकि भारत में अभिनेत्रियों को मोटे होने की इजाजत नहीं. हैरत की बात यह है कि फिलहाल ऐश्‍वर्या किसी फिल्म में काम तो कर नहीं रही, फिर लोगों को इस बात से क्यों परेशानी हैं कि वह मोटी हो गयी हैं. यह एक स्वभाविक सी बात है कि जब एक औरत मां बनती हैं, तो उन्हें ऐसी शारीरिक परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है. पूरे विश्‍व में 90 प्रतिशत महिलाएं गर्भवास्था के बाद मोटी हो जाती हैं. इसका यह कतई मतलब नहीं कि यह अनुमान लगाया लिया जाये कि उन्हें अब काम नहीं मिलेगा. एक अभिनेत्री होने से पहले वह एक औरत हैं और उन्हें भी पूरा हक है कि वह अपने मातृत्व का सुनहरा जीवन जियें. उनके बढ.ते वजन पर कटाक्ष करना उस वक्त शोभनीय होता, अगर वह फिल्मों में कुछ ऐसे किरदार कर रही होतीं, जो उनके वजन के अनुसार फिट नहीं बैठता. यही वजह है कि भारत में अभिनेत्रियां जल्दी शादी नहीं करना चाहतीं और अगर शादी हो भी जाये, तो वे मां बनने से कतराती हैं. इस वजह से अभिनेत्रियां उम्र ढल जाने के बाद शादी करती हैं, जिससे उन्हें कई बार परेशानियों से भी गुजरना पड़ता है. जिस दौर में माधुरी दीक्षित ने खुद को फिल्मों से दूर किया था. वह उनका सुनहरा दौर था. वे खुद भी इस बात से वाकिफ थी कि उन्हें हिंदी इंडस्ट्री दोबारा जल्द स्वीकार नहीं करेगी. सो, उन्होंने फिल्मों से ही किनारा कर लिया. वह भाग्यशाली रहीं कि शादी व गर्भवती होने के बाद भी उनकी शारीरिक बनावट पर खास असर नहीं पड़ा. यह हमारी इंडस्ट्री व हमारी विडंबना है कि हम किसी अभिनेत्री को सिर्फ इसलिए आउटडेटेड घोषित कर देते हैं, क्योंकि वह शादीशुदा है या बच्चों की मां है. हम कभी उसको उसके अभिनय के आधार पर नहीं आंकते. हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि अगर वाकई उस अभिनेत्री ने काम करना छोड़ दिया तो इंडस्ट्री एक अच्छी अभिनेत्री को खो देगी. ऐश्‍वर्या राय एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं. यह उन्होंने साबित किया है. उन्होंने मिस वर्ल्ड बन कर भारत का नाम गौरवांवित किया है. ऐसे में अगर वह बतौर औरत एक मां की जिंदगी को जीना चाहती हैं तो उन पर कटाक्ष, उनकी निंदा करने की बजाय. उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए और जब वे दोबारा वापसी करें तो सभी को उनका स्वागत करना चाहिए. यह बात केवल ऐश पर ही नहीं, बल्कि उन तमाम अभिनेत्रियों पर लागू होती है, जो शादी के उपरांत मां बनती हैं और उसके बाद भी अपना अभिनय जारी रखती हैं.

20120406

सीमित बजट में हिंदी फिल्में

विनोद चोपड़ा द्वारा आयोजित फिल्मोत्सव में उनके बैनर की बनी लगभग सभी फिल्मों पर चर्चा हो रही है. और ऐसी कई बारीकियां हैं, फिल्म के प्रोडक्शन के पहलू की, जो लोगों के सामने आ रही हैं. और इन सभी फिल्मों में एक बात खास नजर आ रही है, वह यह कि विदु विनोद ने लगभग अपनी सभी फिल्मों का निर्माण बेहद सीमित बजट में किया है. वर्तमान में जहां करोड़ों रुपये तो केवल फिल्म की माकर्ेटिंग में खर्च कर दिये जाते हैं. वहां किसी दौर में केवल 8 से 15 लाख में फिल्में बन जाया करती थीं. ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों में उस दौर के लोकप्रिय कलाकार नहीं होते थे. अनिल कपूर, मनीषा कोइराला, जैकी श्राफ, अनुपम खेर, शबाना आजिमी, अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह जैसे लगभग सभी लोकप्रिय कलाकारों ने इन बैनर के साथ काम किया है. लेकिन फिर भी उस दौर में अच्छी फिल्में सीमित बजट में बन जाया करती थी. और दर्शकों को वह पसंद भी आती थी. वर्ष 1985 में बनी खामोश फिल्म केवल 8 लाख की लागत में बनी है. जबकि फिल्म की शूटिंग पहलगांव में की गयी थी. और फिल्म में उस दौर के लोकप्रिय अभिनेता थे. यह चौंकानेवाली बात है कि उस वक्त विदु ने अपने प्रोडक्शन का कॉस्ट इस तरह सीमित रखा था कि जब उन्हें पहलगांव में वॉटर टैंक की जरूरत पड़ी थी तो उन्होंने वहां की नदी के पानी का ही इस्तेमाल कर लिया था. 1942 लव स्टोरी महज 15 लाख में बनी है. जबकि फिल्म में बरसात के दृश्य हैं और लगभग सभी लोकप्रिय कलाकार हैं. दरअसल, केवल विदु ही नहीं, बल्कि उस दौर के वे सभी निदर्ेशक जो फिल्म को कला का रूप मानते थे.वे फिल्म की पब्लिसिटी पर नहीं, बल्कि मेकिंग पर ध्यान देते थे. वे हर तरह से अपनी स्क्रिप्ट को दुरुस्त रखते थे. सारी प्लानिंग पहले होती थी. ताकि शूटिंग के दौरान किसी भी तरह का कोई संदेह न हो और कॉस्ट बिल्कुल सीमा में रहे. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और महेश भट्ट जैसे निदर्ेशक भी अपने दौर में कम बजट की फिल्में बनाते थे. लेकिन वे सभी फिल्में लोकप्रिय रहीं. दरअसल, वर्तमान दौर में किसी फिल्म की कामयाबी फिल्म की मेकिंग पर नहीं, बल्कि उसकी पब्लिसिटी वैल्यू पर निर्भर हो गया था. ऐसा नहीं है कि आज भी कम बजट की फिल्में नहीं बनती. लेकिन उन कम बजट की फिल्मों में भी पब्लिसिटी के बजट को तैयार रखा जाता है. मसलन आमिर अपने बैनर की सभी फिल्में सीमित बजट में बनाते थे और फिर उसकी पब्लिसिटी पर जम कर खर्च करते थे. और अपने इस बिजनेस फंडे में कामयाब हैं. इस लिहाज से अनुराग कश्यप जैसे निदर्ेशक भी उन निदर्ेशकों की श्रेणी में आते हैं जो सीमित बजट की फिल्में बनाते हैं. लेकिन अनुराग की यह भी खूबी है कि वे अपनी फिल्मों की पब्लिसिटी पर भी बहुत खर्च नहीं करते. वे आज भी मेकिंग को ही अहमियत देते हैं. ऐसे में उनकी दैट गर्ल इन यलो बुट्स जैसी फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती. लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता. दरअसल, वर्तमान में निदर्ेशकों व निर्माताओं को पुरानी सीमित बजट की फिल्मों से सीख लेनी चाहिए कि फिजूलखर्ची के बगैर फिल्मों का निर्माण किस तरह किया जा सकता है.

सीमित बजट में हिंदी फिल्में

विनोद चोपड़ा द्वारा आयोजित फिल्मोत्सव में उनके बैनर की बनी लगभग सभी फिल्मों पर चर्चा हो रही है. और ऐसी कई बारीकियां हैं, फिल्म के प्रोडक्शन के पहलू की, जो लोगों के सामने आ रही हैं. और इन सभी फिल्मों में एक बात खास नजर आ रही है, वह यह कि विदु विनोद ने लगभग अपनी सभी फिल्मों का निर्माण बेहद सीमित बजट में किया है. वर्तमान में जहां करोड़ों रुपये तो केवल फिल्म की माकर्ेटिंग में खर्च कर दिये जाते हैं. वहां किसी दौर में केवल 8 से 15 लाख में फिल्में बन जाया करती थीं. ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों में उस दौर के लोकप्रिय कलाकार नहीं होते थे. अनिल कपूर, मनीषा कोइराला, जैकी श्राफ, अनुपम खेर, शबाना आजिमी, अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह जैसे लगभग सभी लोकप्रिय कलाकारों ने इन बैनर के साथ काम किया है. लेकिन फिर भी उस दौर में अच्छी फिल्में सीमित बजट में बन जाया करती थी. और दर्शकों को वह पसंद भी आती थी. वर्ष 1985 में बनी खामोश फिल्म केवल 8 लाख की लागत में बनी है. जबकि फिल्म की शूटिंग पहलगांव में की गयी थी. और फिल्म में उस दौर के लोकप्रिय अभिनेता थे. यह चौंकानेवाली बात है कि उस वक्त विदु ने अपने प्रोडक्शन का कॉस्ट इस तरह सीमित रखा था कि जब उन्हें पहलगांव में वॉटर टैंक की जरूरत पड़ी थी तो उन्होंने वहां की नदी के पानी का ही इस्तेमाल कर लिया था. 1942 लव स्टोरी महज 15 लाख में बनी है. जबकि फिल्म में बरसात के दृश्य हैं और लगभग सभी लोकप्रिय कलाकार हैं. दरअसल, केवल विदु ही नहीं, बल्कि उस दौर के वे सभी निदर्ेशक जो फिल्म को कला का रूप मानते थे.वे फिल्म की पब्लिसिटी पर नहीं, बल्कि मेकिंग पर ध्यान देते थे. वे हर तरह से अपनी स्क्रिप्ट को दुरुस्त रखते थे. सारी प्लानिंग पहले होती थी. ताकि शूटिंग के दौरान किसी भी तरह का कोई संदेह न हो और कॉस्ट बिल्कुल सीमा में रहे. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और महेश भट्ट जैसे निदर्ेशक भी अपने दौर में कम बजट की फिल्में बनाते थे. लेकिन वे सभी फिल्में लोकप्रिय रहीं. दरअसल, वर्तमान दौर में किसी फिल्म की कामयाबी फिल्म की मेकिंग पर नहीं, बल्कि उसकी पब्लिसिटी वैल्यू पर निर्भर हो गया था. ऐसा नहीं है कि आज भी कम बजट की फिल्में नहीं बनती. लेकिन उन कम बजट की फिल्मों में भी पब्लिसिटी के बजट को तैयार रखा जाता है. मसलन आमिर अपने बैनर की सभी फिल्में सीमित बजट में बनाते थे और फिर उसकी पब्लिसिटी पर जम कर खर्च करते थे. और अपने इस बिजनेस फंडे में कामयाब हैं. इस लिहाज से अनुराग कश्यप जैसे निदर्ेशक भी उन निदर्ेशकों की श्रेणी में आते हैं जो सीमित बजट की फिल्में बनाते हैं. लेकिन अनुराग की यह भी खूबी है कि वे अपनी फिल्मों की पब्लिसिटी पर भी बहुत खर्च नहीं करते. वे आज भी मेकिंग को ही अहमियत देते हैं. ऐसे में उनकी दैट गर्ल इन यलो बुट्स जैसी फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती. लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता. दरअसल, वर्तमान में निदर्ेशकों व निर्माताओं को पुरानी सीमित बजट की फिल्मों से सीख लेनी चाहिए कि फिजूलखर्ची के बगैर फिल्मों का निर्माण किस तरह किया जा सकता है.

सीमित बजट में हिंदी फिल्में

विनोद चोपड़ा द्वारा आयोजित फिल्मोत्सव में उनके बैनर की बनी लगभग सभी फिल्मों पर चर्चा हो रही है. और ऐसी कई बारीकियां हैं, फिल्म के प्रोडक्शन के पहलू की, जो लोगों के सामने आ रही हैं. और इन सभी फिल्मों में एक बात खास नजर आ रही है, वह यह कि विदु विनोद ने लगभग अपनी सभी फिल्मों का निर्माण बेहद सीमित बजट में किया है. वर्तमान में जहां करोड़ों रुपये तो केवल फिल्म की माकर्ेटिंग में खर्च कर दिये जाते हैं. वहां किसी दौर में केवल 8 से 15 लाख में फिल्में बन जाया करती थीं. ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों में उस दौर के लोकप्रिय कलाकार नहीं होते थे. अनिल कपूर, मनीषा कोइराला, जैकी श्राफ, अनुपम खेर, शबाना आजिमी, अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह जैसे लगभग सभी लोकप्रिय कलाकारों ने इन बैनर के साथ काम किया है. लेकिन फिर भी उस दौर में अच्छी फिल्में सीमित बजट में बन जाया करती थी. और दर्शकों को वह पसंद भी आती थी. वर्ष 1985 में बनी खामोश फिल्म केवल 8 लाख की लागत में बनी है. जबकि फिल्म की शूटिंग पहलगांव में की गयी थी. और फिल्म में उस दौर के लोकप्रिय अभिनेता थे. यह चौंकानेवाली बात है कि उस वक्त विदु ने अपने प्रोडक्शन का कॉस्ट इस तरह सीमित रखा था कि जब उन्हें पहलगांव में वॉटर टैंक की जरूरत पड़ी थी तो उन्होंने वहां की नदी के पानी का ही इस्तेमाल कर लिया था. 1942 लव स्टोरी महज 15 लाख में बनी है. जबकि फिल्म में बरसात के दृश्य हैं और लगभग सभी लोकप्रिय कलाकार हैं. दरअसल, केवल विदु ही नहीं, बल्कि उस दौर के वे सभी निदर्ेशक जो फिल्म को कला का रूप मानते थे.वे फिल्म की पब्लिसिटी पर नहीं, बल्कि मेकिंग पर ध्यान देते थे. वे हर तरह से अपनी स्क्रिप्ट को दुरुस्त रखते थे. सारी प्लानिंग पहले होती थी. ताकि शूटिंग के दौरान किसी भी तरह का कोई संदेह न हो और कॉस्ट बिल्कुल सीमा में रहे. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और महेश भट्ट जैसे निदर्ेशक भी अपने दौर में कम बजट की फिल्में बनाते थे. लेकिन वे सभी फिल्में लोकप्रिय रहीं. दरअसल, वर्तमान दौर में किसी फिल्म की कामयाबी फिल्म की मेकिंग पर नहीं, बल्कि उसकी पब्लिसिटी वैल्यू पर निर्भर हो गया था. ऐसा नहीं है कि आज भी कम बजट की फिल्में नहीं बनती. लेकिन उन कम बजट की फिल्मों में भी पब्लिसिटी के बजट को तैयार रखा जाता है. मसलन आमिर अपने बैनर की सभी फिल्में सीमित बजट में बनाते थे और फिर उसकी पब्लिसिटी पर जम कर खर्च करते थे. और अपने इस बिजनेस फंडे में कामयाब हैं. इस लिहाज से अनुराग कश्यप जैसे निदर्ेशक भी उन निदर्ेशकों की श्रेणी में आते हैं जो सीमित बजट की फिल्में बनाते हैं. लेकिन अनुराग की यह भी खूबी है कि वे अपनी फिल्मों की पब्लिसिटी पर भी बहुत खर्च नहीं करते. वे आज भी मेकिंग को ही अहमियत देते हैं. ऐसे में उनकी दैट गर्ल इन यलो बुट्स जैसी फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती. लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता. दरअसल, वर्तमान में निदर्ेशकों व निर्माताओं को पुरानी सीमित बजट की फिल्मों से सीख लेनी चाहिए कि फिजूलखर्ची के बगैर फिल्मों का निर्माण किस तरह किया जा सकता है.

अफसाना मुझे लिखता है

orginally published in prabhat khabar
आगामी 11 मई को सादत हसन मंटो का जन्मशताब्दी वर्ष मनाया जायेगा. सादत्त हसन मंटो उर्दू के जाने माने लेखक थे. विशेष कर लघु कहानियां लिखने में वे माहिर थे. मंटो इस वर्ष केवल औपचारिक रूप से स्मरण किये जाने योग्य नहीं हैं, बल्कि उनके योगदानों के लिए उन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए. नयी पीढ़ी शायद इस लेखक के नाम से भी वाकिफ हो. लेकिन उनकी लघु कहानियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. जितनी कई सालों पहले थी. मंटो शुरुआती दौर से ही लिखने के शौकीन रहे और शायद यही वजह है कि उन्हें जब भी जिस माध्यम में भी लिखने का मौका मिला वे लिखते रहे. वे रेडियो के लिए भी लेखन करते रहे और किताबों के लिए भी. साथ ही उन्होंने कई फिल्मों के लिए भी कहानियां लिखीं. मंटो को जितना लगाव लेखन से था. उतनी ही शिद्दत से वह फिल्में भी देखा करते थे. दरअसल, मंटो उन लोगों में से एक हैं, जो मूल्कों के बंटवारे को नहीं मानते थे.जिन्होंने जितना प्यार लाहौर को दिया. उतना ही प्यार वे मुंबई से भी करते थे. मुंबई में उनका दिल बसता था तो आत्मा लाहौर में. मुंबई से भी उनका खास लगाव रहा. वे 1936 में मुंबई आ गये थे. और बतौर फिल्म लेखक वे लोकप्रिय हो चुके थे. उन्होंने बांबे टॉकीज के लिए कई फिल्मों की कहानियां लिखी. साथ ही अच्छी आमदनी भी हो रही थी. उस दौर में भारत व पाकिस्तान का बंटवारा हो रहा था. मंटो भारत में ही थे. उनके दोस्तों में कई हिंदू दोस्त भी शामिल थे. उन्होंने मंटो को सलाह दी कि वे पाकिस्तान न जायें. चूंकि पाकिस्तान में फिल्म लेखकों के लिए खास करियर विकल्प नहीं थे. लेकिन उन्हें मजबूरन वर्ष 1948 में लाहौर जाना पड़ा. वह दौर जब उन्होंने आठ दिन, चल चल रे नौजवान व मिर्जा गालिब जैसी फिल्मों के लिए बतौर लेखक काम किया, उस वक्त वे फिल्में रिलीज नहीं हुई थीं, लेकिन फिर भी मंटो उसे अपनी जिंदगी का अहम दौर मानते थे. क्योंकि उस दौर में उन्होंने बतौर लेखक कई कृतियां तैयार कीं. वर्ष 1954 में जाकर ये फिल्में रिलीज हुईं.मंटो की जिंदगी का सफर बेहद दिलचस्प रहा है. और शायद यही वजह रही कि हिंदी फिल्मों में कई लोगों ने मंटो की कहानियों को, उनकी जिंदगी को कई रूपों में फिल्माने की कोशिश की.वर्ष 1936 में बनी किशन कनैहयया व नगरिया जैसी फिल्मों के लिए उन्होंने संवाद लेखन किया है. नसीरुद्दीन शाह ने मंटो इश्मत हाजिर हो नामक प्ले का निर्देशन किया इस प्ले में मंटो की कहानियों को दर्शाया गया. उनकी कहानियों पर आधारित तोबा तेक सिंह, खोल दो, ठंडा गोस्त व काली सलवार जैसी कई कृतियों पर भी नाटक होते रहे हैं. टोबा टेक सिंह पढ़ते व इस पर आधारित फिल्म देखते वक्त आप खुद समझने लगते हैं कि पागल कौन है टोबा टेक सिंह या हमसब.यह विशेषता थी मंटो की कहानी की. आप पढ़ते हुए ही इस बात को समझने लगेंगे कि क्या हकीकत है. मंटो अक्सर पीने के बाद दोस्तों से कहा करते मैं अफसाना अव्वल तो इसलिए लिखता हूं कि मुझे अफसाना लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है.दरअसल, हकीकत यह थी कि मंटो अफसाने नहीं लिखते थे, बल्कि मंटो जैसी शख्सियतों को खुद अफसाने लिखा करते थे.

बदनाम गलियों का सच

पान सिंह तोमर की कामयाबी के बाद एक बार फिर से तिग्मांशु धूलिया बायोपिक फिल्म बनाने की तैयारी में है. यह फिल्म वह रानी मुखर्जी के साथ बनाने जा रहे हैं.फिल्म 18वीं सदी की शासक रह चुकी बेगम जोयाना नोबिस सोमरु पर होगी उर्फ बेगम समरु मेरठ स्थित सरधाना में 18वीं शताब्दी में शासन किया.बेगम समरु ने अपने करियर की शुरुआत नाच करनेवाली डांसर के रूप में किया था.आगे चल कर उन्होंने शासन किया.उन्होंने आर्मी में ट्रेनिंग भी ली.वाकई कितने दिलचस्प पहलू हैं बेगम समरु के. छुटपन में ही उन्होंने विदेशी सैनिक से शादी कर ली.फिर ब्रिटिश हुकुमत पर राज किया. एक नौटंकी करनेवाली लड़की से राज सम्राज्ञी बनने का उनका यह सफर बेहद रोचक रहा होगा. पान सिंह तोमर के बाद हिंदी सिनेमा में यह बायोपिक भी मिसाल कायम करेगी. चूंकि पान सिंह तोमर की तरह ही बेगम समरु के जीवन में कई उतार चढ़ाव आये हैं. उन्होंने ही एक ही जिंदगी में कई जिंदगी जिये. निश्चित तौर पर उनकी कहानी रुपहले परदे पर रोचक पहलुओं के प्रस्तुत की जायेगी. दरअसल, हकीकत में लोग उन शख्सियतों में अधिक रुचि लेते हैं. जो लोकप्रिय होते हैं, लेकिन जिनकी जिंदगी खुली किताब नहीं होती. यह इंसानी फितरत है कि वह बातों को कुरेदना चाहता है और दूसरों की जिंदगी में झांकना चाहता है. या फिर उनकी जिंदगी के बारे में भी लोग जानना चाहता हैं जो लोकप्रिय होते हैं तो सिर्फ अपने विवादों के कारण. या यूं कह लें कि नाम के साथ साथ बदनामों की दुनिया में झांकना भी लोगों को पसंद है. और शायद यही वजह है कि ऐसे विषय फिल्मों के माध्यम से दिलचस्प हो जाते हैं. और खासतौर से जब इन विवादों से महिला जुड़ी हों तो दर्शकों की दिलचस्पी और बढ़ जाती है. यही वजह रही कि अब तक महिलाओं से जुड़ी सभी बायोपिक फिल्में उमराव जान, बैंडिंट क्वीन, सिल्क स्मिथा जैसी फिल्में पसंद की जाती रही हैं. क्योंकि घूंघट के पीछे छिपे मुखड़े के दीदार हर कोई एक बार तो जरूर करना चाहता है. ऐसे में निश्चित तौर पर बेगम समरु भी माइलस्टोन साबित हो सकती है. तिग्मांशु बधाई के पात्र हैं कि वे लगातार ऐसे अनछुए आम लोगों, जो कि खास होते हुए भी खास न बन पाये थे. उन्हें खास बनाने की कोशिश कर रहे हैं. वरना, अब तक स्वतंत्रता से जुड़ी एक ही शख्सियतों पर कई फिल्में बनाने का ही प्रचलन था. यह बदलाव विकसित सिनेमा की सोच को दर्शाता है. ऐसे विषयों पर फिल्मों के निर्माण से एक और लाभ यह है कि लोगों के सामने किसी नौटंकी करनेवाली या पॉर्न स्टार, या तबायफ या वैश्याओं की जिंदगी का दर्द भी प्रस्तुत होता है. चूंकि प्रायः आम अवधारणा के अनुसार व इंटरनेट या लिखित दस्तावेजों के अनुसार सतही तौर पर जानकारी रखनेवाले लोग महिलाओं के केवल उन्हीं पहलुओं को देखते हैं.वे उनके संघर्ष पर गौर नहीं करते और फिर उनकी गलत छवि अपने जेहन में बिठा लेते हैं. लेकिन जब सिल्वर स्क्रीन पर कैमरा घूमता है और परदा उठता है तो अचानक लोग सिल्क (द डर्टी पिक्चर के बाद दर्शकों का रवैया सिल्क के प्रति बदला है)को प्यार करने लगते हैं. चूंकि फिल्म के माध्यम से वे सच के करीब पहुंचे हैं.चूंकि विजुअल लंबे अरसे तक लोगों के जेहन में जिंदा रहता है.

निर्देशकों का थॉट फ्लोडर

फिल्म करीब के दौरान ही लेखक अभिजात व निदर्ेशक विधु विनोद चोपड़ा की मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई थी, जिसने किसी यूनिवर्सिटी से लगभग साल की पढ़ाई किसी दूसरे नाम से पूरी की. क्योंकि वह पढ़ाई डिग्री के लिए नहीं, बल्कि महज शिक्षित होने के लिए पढ़ना चाहता था. अभिजात ने यह बात निदर्ेशक राजकुमार हिरानी को बतायी. राजकुमार चकित हुए. वे बकायदा गये और उन्होंने उस व्यक्ति से मुलाकात की. और यहीं नींव पड़ी फिल्म 3 इडियट्स की. राजकुमार हिरानी ने तय कर लिया था कि उनकी फिल्म का वन लाइनर यही होगा. और फिर पूरी कहानी गढ़ी गयी. आप अनुमान लगाये करीब रिलीज हुई थी वर्ष 1998 में और 3 इडियट्स वर्ष 2009. लगभग 8-9 सालों का फर्क है. लेकिन फिल्म की नींव कई सालों पहले ही रख दी गयी थी. और लगातार राजकुमार व अभिजात इस पर काम कर रहे हैं. हाल ही में राजकुमार ने एक कार्यक्रम के दौरान इस बात की चर्चा की कि जरूरी नहीं कि फिल्मों के आइडियाज तुरंत आ जायें और इस पर उसी वक्त काम कर लिया जाये. बल्कि उन्हें जब भी कोई आइडियाज आते हैं वे उन्हें लिख कर रख लेते हैं. और जिस फ्लोडर में वे इस सुरक्षित रखते हैं वे उसे थॉर्ट फ्लोडर का नाम देते हैं. दरअसल, वास्तविकता भी यही है कि किसी भी बेहतरीन रचना के लिए यह बेहद जरूरी है कि उसका थॉट फ्लोडर बनाया जाये. मसलन तकनीकी रूप से नहीं, बल्कि मानसिक स्तर के अनुसार. कोई भी निदर्ेशक अगर अपनी किसी फिल्म की योजना बनाता है तो सबसे पहले उसके उसी मानसिक फ्लोडर में थॉट यानी विचारों का जमावड़ा होना बेहद जरूरी है. फिल्में दृश्यों से बनती हैं और एक दृश्य के कई फ्रेम में आपको कई चीजें दर्शानी होती हैं. ऐसे में किसी निदर्ेशक के लिए यह कठिन होमवर्क होता है कि वे उन दृश्यों में किन किन बातों को संजोये. किन किन बातों को नहीं. इस लिहाज से अगर विचारों का फ्लोडर तैयार हो तो चीजें बहुत आसान हो जाती हैं, चूंकि फिल्में एक दिन में नहीं बनती और अच्छी फिल्में बनाने में सालों लग जाते हैं. उसकी वजह यही है कि कई निदर्ेशक हैं जो अपनी फिल्मों में डिटेलिंग करते हैं. वे डिटेलिंग कुछ और नहीं, उनके अपने जिंदगी से जुड़े वास्तविक अनुभव, वास्तविक जिंदगी की घटनाएं ही होती हैं और यह डिटेलिंग तभी आ सकती है, जब उसका होम वर्क हो. और वह होम वर्क कुछ और नहीं विचारों का ही फ्लोडर है. बतौर निदर्ेशक राजकपूर ने भी अपने जिंदगी के कई अनुभवों को ही अपनी फिल्मों में हमेशा ही शामिल किया. ऐसा नहीं है कि वे आइडिया उन्हें अचानक आते होंगे. बल्कि वे उनके थॉट फ्लोडर में खुद ब खुद ही सेव हो जाया करते हैं. अकिरा कुरसावा से लेकर जितने में श्रेष्ठ फिल्म मेकर रहे , उन सभी ने वे सृजन की इसी प्रक्रिया से गुजरते रहे हैं.फिल्म मेकिंग का कोर्स कर रहे छात्रों के लिए यह अच्छा मार्गदर्शन है कि हर छात्र को अपना एक थॉर्ट फ्लोडर बनाना ही चाहिए. जब भी उन्हें जो चीजें प्रभावित करती हों वह उन्हें लिखित व मानसिक दोनों तरीके से अपने जेहन में सुरक्षित करें और फिर सृजन करते वक्त उनका सही इस्तेमाल करें. चूंकि यही फिल्म सृजन का सही तरीका है. ऐसी फिल्में में जब परदे पर आती हैं तो उनमें डिटेलिंग स्पष्ट रूप से नजर आती है.

20120402

विदु के सृजन के जश्न की पाठशाला

निर्माता व निर्देशक विदु विनोद चोपड़ा ने इस वर्ष हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने 30 साल पूरे कर लिये हैं या यूं कहें कि उनकी सृजनशीलता ने 30 बसंत देख लिये यहां विदु को सृजनकर्ता की उपाधि इसलिए, क्योंकि विदु विनोद उन निर्देशक व निर्माताओं में से एक हैं, जिन्होंने हमेशा सृजनशीलता को अहमियत दी वे हमेशा व्यावसायिक फिल्में हीं बनाते रहे, लेकिन उन्होंने हमेशा उन कहानियों के अहमियत दी, जो उन्हें पसंद आयी यही वजह है कि 30 सालों में बतौर निर्माता-निर्देशक उन्होंने कम फिल्मों का निर्माण किया इस अवसर पर मुंबई के पीवीआर जुहू में विदु की टीम ने एक फिल्मोत्सव का भी आयोजन किया है इनमें उनके बैनर की सभी फिल्में दिखायी जा रही हैं साथ ही फिल्मों के कलाकार फिल्म से जुड़ी अपनी हसीन यादों व अनुभवों को साझा कर रहे हैं इनमें मुत्रा भाई एमबीबीएस, लगे रहो मुत्राभाई, परिणिता, 3 इडियट्स, परिंदा, खामोश जैसी सभी फिल्में शामिल हैं सबसे खास बात यह है कि इन सभी फिल्मों के कलाकार खुद फिल्म से जुड़ी बातें साझा कर रहे हैं प्राय:। मीडिया से बातें करते हुए फिल्मों के कलाकार कई बातें बहुत सोच समझ कर करते हैं लेकिन इस महोत्सव में सभी खुल कर व बिंदास होकर अपनी बातें बता रहे हैं ऐसे अवसरों की खास बात यह होती है कि कलाकार भी रूटीन तरीके की बातें नहीं करते वे मेकिंग से जुड़े कई सच को बताते हैं अपने अनुभवों को शेयर करते हैं ऐसी बातें निश्चित तौर पर हमें कहीं भी गूगल या इंटरनेट पर नहीं मिलती और न ही किसी मैगजीन के इंटरव्यू में पढ़ने को मिलती है चूंकि उस वक्त कलाकार, निर्माता अलग तैयारी से जवाब देते हैं लेकिन जब ऐसे अवसर होते हैं तो यह उनकी सृजनशीलता के जश्न का वक्त होता है और वे स्वतंत्र होकर ईमानदारी से लोगों के सामने प्रस्तुत होते हैं इस महोत्सव में मुख्य रूप से मुंबई के विभित्र कॉलेज के विद्यार्थियों को भी शामिल किया गया है विद्या बालन, दीया मिर्जा, राजकुमार हिरानी, संजय दत्त, बोमन ईरानी, अरशद वारसी, शबाना आजिमी जैसे सभी कलाकार विद्यार्थियों से बातें कर रहे हैं यह माहौल किसी क्लासरूम की तरह ही लग रहा है विद्यार्थियों के सवालों का वे बिना डिप्लोमेटिक हुए जवाब दे रहे हैं इसी क्रम में विदु ने एक चकित करनेवाला वाक्या सुनाया कि कैसे फिल्म परिंदा में नाना पाटेकर के साथ वास्तविक आग के साथ एक दृश्य फिल्माना था नाना को विदु ने कहा कि आप फ्रायर प्रूफ जैकेट पहन लें नाना ने उसे पहनने से इनकार कर दिया चूंकि वे जैकेट उन्हें अभिनय करने में बाधा पहुंचा रहे थे बहुत मनाने पर वह बुलेट प्रूफ जैकेट पहनने के लिए तैयार हुए लेकिन उन्हें पैरों में नहीं पहना सीन फिल्माने के बाद नाना घायल हुए, लेकिन उन्होंने दृश्य ओके होने के बाद ही विदु को यह बात बतायी इससे स्पष्ट होता है कि नाना जैसे कलाकार उन कलाकारों में से एक हैं जो अपने अभिनय को कितनी शिद्दत से निभाते थे