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20110325

काशी का हूबहू अस्सी मुंबई में


किसी भी फिल्म के लिए उसके लोकेशन व सेट का वास्तविक नजर आना बहुत आवश्यक, खासतौर से तब अगर फिल्म किसी ऐतिहासिक स्थान पर बनायी जा रही हो. ऐसे में अगर हम सिर्फ यह मान कर बैठें कि फिल्म की सफलता सिर्फ निदर्ेशक या कलाकार के हाथ में होती है तो यह हमारी गलत अवधारणा होगी. चूंकि फिल्म की सफलता का श्रेय उससे जुड़े परदे के पीछे के लोगों को भी जाता है. तो इस बार परदे के पीछे में हम आपको सेट डिजाइनर भूपेन सिंह से रूबरू कराते हैं. फिलवक्त व फिल्म मोहल्ला अस्सी के निर्माण में जुड़े हैं.

दोपहर 1 बजे हम अपने फोटोग्राफर के साथ गोरेगांव फिल्म सिटी के मंदिर पर उपस्थित मोहल्ला अस्सी के सेट पर पहुंचे. वहां फिल्म के निदर्ेशक डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी से मुलाकात होनी थी. हमें सेक्योरिटी गार्ड ने अंदर का रास्ता दिखाया और हमारी मुलाकात डॉ चंद्र प्रकाश से हो गयी. बातचीत शुरू करने से पहले ही डॉ साहब ने कहा कि मुझसे बात करने से पहले इसके सेट डिजाइनर से बात करें. फिर हमें पूरे सेट की तफ्तीश की. वहां एक दृश्य की शूटिंग चल रही है. पूरे सेट को देख कर कहीं से नहीं लग रहा था कि हम मुंबई की किसी फिल्म सिटी में हैं. यहां तक कि काशी के पप्पू की दुकान का हूबहू प्रारूप हमारे सामने था. अब तक मन में जिज्ञासा हुई कि इसके सेट डिजाइनर से बात की जाये. नंदिता ने उनसे मिलवाया. जी भूपेन सिंह हैं. सेट डिजाइनर. भूपेन शानदार काम किया है आपने. वे पहले थोड़ा झिझके. बातचीत अखबार के लिए क्या कहूंगा. लिख दो जो देख रहे हो आपलोग. फिर उन्हें थोड़ी देर में बातचीत के लिए मनाया और वह तैयार हुए. भूपेन ने बताया कि उन्होंने फिल्म पिंजर में भी डॉ द्विवेदी के साथ काम किया है. उस वक्त से दोनों साथ हैं. मोहल्ला अस्सी अलग तरह की फिल्म है. इसमें माहौल को पूरा बनारसी लुक देना था. सो, बिल्कुल मेहनत तो ज्यादा थी ही. खासतौर से पप्पू की दुकान का माहौल तैयार करना था. हम बनारस गये. वहंा से तसवीरें लेकर आये. फिर यहां तैयार किया सबकुछ. आप गौर करेंगे तो देखेंगे कि पप्पू की वह दुकान में जिस तरह से राख लगी है. यहां भी लगी है. हमने वही टूटा फैन, केतली जैसी चीजें इस्तेमाल की है, वह भी वही की हैं. भूपेन सिंह ने इससे पहले अन्य और भी दो फिल्मों में काम किया है. लेकिन वह पिंजर और मोहल्ला अस्सी को अपना बड़ा ब्रेक मानते हैंं. वे मानते हैं कि अगर कोई सेट डिजाइनिंग की क्षेत्र में आता है, तो उसे धैर्य रखना होगा और चीजों को बहुत बारीकी से देखने की कला में माहिर होना होगा,

टेलीवुड के कलाकार बने बॉलीवुड में फिल्मकार


ेटेलीवुड और बॉलीवुड का रिश्ता पुराना है. ऐसे कई कलाकार हैं, जो लगातार छोटे परदे के साथ-साथ बड़े परदे पर भी अभिनय करते हैं. चूंकि टेलीवुड के अधिकतर अभिनेता व अभिनेत्री की ख्वाहिश यही होती है कि वे फिल्मों के परदे पर नजर आये. लेकिन ऐसे भी कुछ टेलीवुड अभिनेता हैं, जिन्होंने छोटे परदे पर अभिनय का हुनर बिखेरा. लेकिन बड़े परदे को अभिनय के लिए नहीं निदर्ेशन के लिए चुना. कुछ ऐसे ही टेलीवुड अभिनेता, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के निदर्ेशन क्षेत्र में कदम रखा, उनके निदर्ेशन कार्य पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट.

बस में बैठे हैं नाना पाटेकर, हाथों में गुब्बारे लिये. संग बैठे सारे यात्रियों को हंस कर मुस्कुराकर जिंदगी में खुश होने का पाठ पढ़ा रहे हैं. कुछ देर बार वह एक कब्र पर पहुंचते हैं....और फिर की कहानी आगे बढ़ती है. गुब्बारे नामक इस फिल्म का निदर्ेशन रोहित रॉय ने किया था. जिन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत छोटे परदे के स्वाभिमान धारावाहिक से की थी. गुब्बारे एक बेहद ही छोटी ही लेकिन अत्यधिक भावुक कहानी थी. फिल्म देखने के बाद वाकई इस बात का अनुमान लगा पाना मुश्किल था कि फिल्म का निर्माण एक छोटे परदे के अभिनेता ने किया है. दरअसल, छोटे परदे की कई प्रतिभाओं ने बड़े परदे को अपना निदर्ेशन का भी क्षेत्र माना और गौर करनेवाली बात यह है कि इन सभी छोटे परदे के अभिनेताओं ने बड़े परदे पर सराहनीय काम किया है. लेकिन इन सभी को उस मंजिल तक पहुंचने में एक लंबा सफर लगा है. जिसे वह कभी भूल नहीं सकते. ऐसे अभिनेताओं में रोहित रॉय के साथ साथ आमिर वसिर, कबीर सदानंद, परमीत शेट्ठी और जल्द ही रिलीज होनेवाली फिल्म फालतू का निदर्ेशन कर रहे रेमो का नाम भी आता है.

पंकज कपूर( मौसम)

शुरुआत पंकज कपूर से. पंकज छोटे परदे के साथ-साथ बड़े परदे पर भी हमेशा अभिनय में सक्रिय रहे. उन्होंने लगभग 74 प्ले व धारावाहिकों का निर्माण व निदर्ेशन किया. अभिनय किया. मोहनदास एलऐलबी, वाह भाई वाह, साहबजी बीवीजी, गुलामजी जैसे कई शोज का निर्माण करने के बाद उन्होंने 1982 में पहली फिल्म में मौका मिला. गौरतलब है कि इसके बाद उन्होंने दोनों माध्यमों में अपनी सक्रिय भूमिका निभायी. उन्होंने छोटे परदे पर करमचंद, ऑफिस-ऑफिस व जबान संभाल के जैसे हिट शोज दिये है. और इसी वर्ष वे अपने निदर्ेशन करियर की शुरुआत कर रहे हैं फिल्म मौसम से. फिल्म मौसम में उन्होंने अपने बेटे शाहिद कपूर को मौका दिया है. बकौल पंकज कपूर मैंने निदर्ेशन का फैसला इतने सालों बाद इसलिए लिया क्योंकि मुझे लगा कि अभी मुझे और भी बहुत पु कुछ सीखना था. अब लगा कि कर सकता हूं तो निदर्ेशन शुरू किया.

परमीत शेट्ठी( बदमाश कंपनी)

परमीत शेट्ठी ने जब आदित्य चोपड़ा से अपनी फिल्म बदमाश कंपनी के लिए बात की तो आदित्य ने पहले कई बार ना कहा. लेकिन परमीत ने लगातार कोशिश जारी रखा. अंततः आदित्य ने पूरी स्क्रिप्ट सुनी और परमीत को निदर्ेशन का मौका दिया. लेकिन वह स्क्रिप्ट लेकर जब शाहिद के पास गये और शाहिद ने निदर्ेशन का नाम पूछा तो शाहिद ने यही जवाब दिया कि यार किसे ले रहे हो...आदित्य ने विश्वास जताया और फिर बदमाश कंपनी का निर्माण हुआ. फिल्म को सराहना मिली और खासतौर से स्क्रिप्ट की बेहद तारीफ की गयी. परमीत ने भी अपनी शुरुआत छोटे परदे से की. उन्होंने दिलवाले दुल्हनिया में छोटा सा किरदार भी निभाया था और वे शुरुआती दौर से ही निदर्ेशन के क्षेत्र में आना चाहते थे. परमीत ने अब तक जस्सी जैसी कोई नहीं, मायका, नच बलिये जैसे शो में काम किया है.

कबीर सदानंद( तुम मिलो तो सही)

चैंलेंज व फैमिली नंबर वन जैसे धारावाहिक करने के बाद से ही कबीर ने तय कर लिया था कि वह निदर्ेशन के ही क्षेत्र में जायेंगे. उन्होेंने शुरुआती दौर से ही कई निदर्ेशकों के साथ काम किया. बारीकियां सीखीं. और फिर निदर्ेशन के क्षेत्र में कदम रखा. निदर्ेशन के रूप में पॉप खाओ मस्त हो जाओ में पहली शुरुआत की. लेकिन उन्हें खास पहचान मिली तुम मिलो तो सही. इस फिल्म में उन्हें नाना पाटेकर, डिंपल कपाड़िया जैसे कलाकारों ने अभिनय किया. फिल्म को दर्शकों ने बेहद पसंद किया. जल्द ही सदानंद रिलायंस के लिए फिल्म निर्माण करेंगे.

रोहित रॉय(गुब्बारे)

रोहित राय ने छोटे परदे पर स्थापित कलाकार के रूप में पहचान बनायी. रोहित रॉय ने स्वाभिमान से शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने देश में निकला होगा चांद जैसे शो में अभिनय किया. िफर नच बलिये में उन्हें मौका मिला और इसके साथ-साथ एंकरिंग का सिलसिला भी जारी रखा. रोहित रॉय ने दस कहानियां नामक फिल्म में गुब्बारे नामक फिल्म का निर्माण किया. और वे जल्द ही बड़े बजट की फिल्म बनाने जा रहे हैं.

रेमो डिसूजा ( फालतू)

रेमो ने कुछ बांग्ला फिल्में बनायी हैं. इसके बाद उन्होंने छोटे परदे के डांस इंडिया डांस के शो के कोरियोग्राफर के रूप में शुरुआत की, फिर उन्हें झलक दिखला जा में बतौर जज की भूमिका निभाने का मौका मिला. जल्द ही उनकी फिल्म फालतू रिलीज होनेवाली है. रेमो बताते हैं कि वे हमेशा से कोरियोग्राफर और निदर्ेशन के क्षेत्र में जाना चाहते हैं. सो, उन्होंने हमेशा इसके लिए प्रयास जारी रखा और अब उनकी फिल्म फालतू रिलीज होनेवाली है.

आमिर बसीर( हाउद)

आमिर बसीर ने अपनी शुरुआत छोटे परदे से की थी. उन्होंने चैलेंज जैसे शो में अभिनय किया.

20110323

बीबीसी रेडियो...पूर्णविराम ( सेलिब्रिटी की नजर में भी सेलिब्रिटी है बीबीसी )...





अप्रेल 2011, बीबीसी हिंदी रेडियो सेवा पर पूर्णविराम के साथ ही एक बेहद अजीज आम लोगों से कोसो दूर चला जायेगा. जिस दिन यह घोषणा की गयी. उस दिन से लेकर अब तक आम लोगों के साथ-साथ इस खबर ने फिल्म सितारों व फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी शख्सियतों को भी मायूस किया है. चूंकि वे भी मानते हैं कि बीबीसी का मतलब था सच. जहां आज मीडिया फिल्मी दुनिया पर बेबुनियाद खबरें बनाती हैं. वे मानते हैं बीबीसी के माध्यम से उनकी वास्तविक छवि लोगों तक पहुंची है. इससे यह साफ जाहिर है कि बीबीसी न सिर्फ आम लोगों का बल्कि सिनेमा की दुनिया का भी इकलौता, दुलारा चहेता बच्चा था. अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

वे अंधे थे, लेकिन बीबीसी की वजह से अंधकार में नहीं थे ः संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव बीबीसी हिंदी सर्विस के प्रमुख संपादक रह चुके हैं. उन्होंने ही बीबीसी के मुंबई ब्यूरो की शुरुआत की थी. बीबीसी से उनका जुड़ाव लंबे समय तक रहा. उन्होंने बीबीसी की सफलता की कहानी अपने आंखों से देखी, रची है. कार्यकाल के दौरान उनके सुनहरे अनुभव वे सांझा कर रहे हैं.

मुंबई के नरीमन प्वाइंट में वर्तमान में जहां एक विशाल होटल है. वहां कभी नटराज होटल हुआ करता था. उस दौर में तकनीक इतनी विकसित थी नहीं. न ही इंटरनेट की सही तरीके से सुविधा और न ही मोबाइल फोन की. सो, उस वक्त हमें अपनी स्टोरी दूरभाष के माध्यम से पहले भेजनी होती थी, फिर टेप के माध्यम से. होटलवाले किसी पीसीओ से हमारा संपर्क कराते थे. लगभग हर दिन बात होती ही थी. मैं जिस पीसीओ कके माध्यम से बात करता था. जब उनसे कहता कि मैं बीबीसी के काम के लिए यह संपर्क कराना चाहता हूं तो वह मुझे तुरंत पहचान लेते. कहते आप संजीव हैं बीबीसीवाले हम आपको अच्छी तरह पहचानते हैं. िफर मेरे कार्यक्रम की सुर्खिया, बकायदा उन्हें सारी बातें याद रहती थीं. उस ट्रीप के आखिरी दिन जब मैं उनसे मिलने गया ताकि सारा भुगतान कर दूं. उन्होंने मेरी आवाज से मुझे पहचान लिया. और काफी देर तक हमारी बात हुई. बीबीसी के शोज के बारे में. थोड़ी देर बाद मुझे पता चला कि वह अंधे हैं. मेरे जीवन की इससे बड़ी खुशी की बात और नहीं हो सकती थी कि मुझे लगा कि चलो पत्रकारिता और बीबीसी के माध्यम से हमने कुछ तो ऐसा किया है कि किसी अंधे के जीवन में अंधकार नहीं है. वह बीबीसी से ही पूरी दुनिया को जानते थे. सारी जानकारी रखते थे. यह था बीबीसी. दुख की बात है कि अब ऐसे मानकों के बावजूद अब बीबीसी हमारे साथ न होगा. मेरा मानना है कि हमें भविष्य के बारे में जरूर सोचना चाहिए. लेकिन भविष्य के बारे में भयभीत होकर इस कदर निर्णय नहीं लेना चाहिए कि जो स्थापित चीजें हैं उन्हें समाप्त कर नयी चीजों के बारे में सोचें.

उस दिन एक प्रेस वार्ता के दौरान शाहरुख खान से जब यह पूछा गया कि क्या उन्हें जानकारी है कि बीबीसी हिंदी सेवा पर पूर्णविराम लगाया जा रहा है. उनके चेहरे पर अचानक मायूसी आ गयी थी. उन्होंने बेहद अफसोस के साथ यह बात जाहिर कि अरे यार बीबीसी में क्रिकेट की कंमेट्री सुनने का एक अलग ही मजा था. वहां जब किसी इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया जाता था तो मन में डर बैठ जाता था कि यार बीबीसी में जा रहे हैं. पूरा होमवर्क करके जाना होगा. यह बीबीसी की विश्वसनीयता ही थी जिसने वर्षों तक सिर्फ सिनेमा नहीं बल्कि सिनेमा की संस्कृति को भी बनाये रखा. शशि कपूर अपनी यादों को तरोताजा करते हुए बताते हैं कि पृथ्वी थियेटर जैसे सांस्कृतिक धरोहर को बनाये रखने में ऐसे माध्यम ने अहम भूमिका निभाई थी. श्याम बेनगल जैसे निदर्ेशक इस बात से इनकार करते हैं कि बीबीसी जैसे माध्यम को बंद किया जाना चाहिए. महेश भट्ट मानते हैं कि कुछ चीजें माकर्ेटिंग व बाजार से परे भी सोचनी चाहिए थी. हम लोगों को कुछ कदम उठाने चाहिए थे ताकि कुछ तो अच्छी चीज व उसका अस्तित्व जिंदा रह सके. महेश भट्ट मानते हैं कि बीबीसी ने अब तक सिनेमा पर आधारित जो भी पत्रकारिता की. वह गंभीर पत्रकारिता होती थी. उसने इस्लामिक देशों में उस वक्त जाकर भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता की खबरें लोगों तक पहुंचाई थीं. जब वहां तक पहुंचना लोगों की पहुंच से बाहर था. हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत व पूरे विश्व की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी भी हमें इससे ही मिली है. निदर्ेशक सुधीर मिश्रा भी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि हम धीरे-धीरे खुद अपनी धरोहरों को खोते जा रहे हैं. जिस तरह आज के दौर में दूरदर्शन कोई नहीं देखता. ऐसी अवधारणा के बावजूद हम दूरदर्शन को बंद नहीं कर रहे . फिर बीबीसी ने तो कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं. बीबीसी का मतलब था विश्वसनीयता. किसी फिल्म में अगर मीडिया पार्टनर या साभार में बीबीसी का नाम जुड़ा होता था उसके प्रति विश्वास और बढ़ जाता था. श्याम बेनेगल बताते हैं कि बीबीसी की जितनी पकड़ और पैठ राजनीतिक मुद्दों में रही उतनी ही सिनेमा की समझ भी रखी. 15 अगस्त व 26 जनवरी पर स्वतंत्रता दिवस के बेहतरीन शो ्ायोजित होते थे. बाद के कई सालों तक भी उन्होंने हिंदी सिनेमा के लेजेंड लोगों से जुड़ी रोचक बातें लोगों तक पंहुचायी. मनोज कुमार बताते हैं कि बीबीसी की सबसे खास बात थी कि वह कभी बाते नहीं बनाता था. जिसने जैसा कहा, वह वही बात कहता. अब तक जितना बेहतरीन इंडरव्यू बीबीसी रेडियो ने आयोजित किया था मेरा. किसी ने नहीं किया.सिनेमा, टीवी व थियेटर में सक्रिय रजीत कपूर मानते हैं कि बीबीसी हिंदी रेडियो ने आम लोगों तक, गांव के लोगों को पढ़ना लिखना सिखाया. हमें लोगों तक पहुंचाया. दरअसल, सच्चाई बी यही है कि बीबीसी ने आम लोगों के दिलों में जिस कदर जगह बनायी थी. उसी तरह सेलिब्रिटिज की नजर में बीबीसी सेलिब्रिटी है. सुपरस्टार्स भी मानते हैं कि वह इसके लिए बेचैन रहते थे कि कैसे उन्हें बीबीसी से बुलावा आये और वे वहां लोगों से रूबरू हों. खुद अमिताभ बच्चन इस बात को स्वीकारते हैं कि जया से शादी के बाद वे बीबीसी स्टूडियो गये थे हजारों की संख्या में श्रोताओं ने उनका अभिवादन किया था. उस इंटरव्यू के दौरान उन्हें और जया को बहुत मजा आया था. चूंकि अमिताभ खुद रेडियो में काम करना चाहते थे. इसलिए उन्हें बीबीसी रेडियो स्टूडियो का दिन बेहद रोचक लगा था.

अनपढ़ों की पाठशाला....बीबीसी

भले ही बीबीसी हिंदी रेडियो सेवा को बंद करने की बात पर इससे जुड़े अधिकारी यह दलील दें कि अब इसके श्रोता कम हो गये हैं. इसकी प्रासंगिकता कम हो गयी है. इस वजह से इसे बंद करने का निर्णय लिया गया है. लेकिन अब भी सच्चाई यह है कि इसकी वास्तविक तसवीर हमें किसी गांव में जाकर देखनी चाहिए. गौरतलब है कि 73 वर्षीय हरदेवा राम जितना बीबीसी के जाने से आहत हैं. उतना ही 28 वर्षीय बीएचयू से पढ़ाई कर रहे राजीव के लिए भी बीबीसी उतना ही अजीज है. आम लोगों की नजर में क्या है बीबीसी की अहमियत. उनकी ही जुबानी...

तब गांव में हम खाते थे बीबीसी की कसम

हरदेवा राम, उम्र 73 साल, गांव बिरानियां

फतेहपुर शेखावटी, जिला सीकर, राजस्थान

यह कोई 30 पैंतीस साल पुरानी बात है. मेरा एक भतीजा रामेश्वर बगदाद में नौकरी करता था. गांव के कुछ और लोग भी रहते थे. खाड़ी पे के देशों में लेकिन वह हमेशा इराक की तारीफ करता था. दूसरे इस्लामिक देशों सउदी अरब, कतर, दुबई, मस्कट में रहनेवाले लोग उससे चिढ़ा करते थे. मेरे आग्रह पर वह एक ट्रांजिस्टर लाया था. उस समय क्रिकेट की कमेंटरी गांव के युवा ट्रांजिस्टर में सुनते थे. लेकिन मेरी दिलचस्पी सचमुच इसमें नहीं थी. मैं बीबीसी लंदन से आनेवाले समाचार ही सुनने में दिलचस्पी रखता था. वही शाम को पहले आधा घंटे आया करते थे. फिर चालीस मिनट हुए और फिर एक घंटा. मेरे पास रेडियो आते ही मैं गांव के स्कूल गया था और वहां के शिक्षकों से पूछा कि बीबीसी किस जगह आता है. उन्होंने बताया कि बताया कि मीटर वेब में जहां 140 लिखा है, उसी के आस-पास साढ़े सात बजे के आस-पास सुई हिलाएं तो बीबीसी सुनाई देगा. मैं उस दौर के ज्यादातर नामों से परिचित हूं. ओंकारनाथ श्रीवास्तव, परवेज आलम, राजनारायण बिसारिया, अचला शर्मा, विजय राणा और बाद में जुड़े नरेश कौशिक, ममता गुप्ता, सलमा जैदी भी मुझे याद हैं. समाचारों के बाद आनेवाला आजकल बहुत पसंद रहा है मुझे. बाद में बीबीसी हिंदी की कुल चार सभाएं हो गयी थीं मेरे खयाल से. बाद के सालों में बीबीसी समाचार सुनने की आदत इसलिए रही कि मेरे चचेरे भाई दुलाराम का बेटा आर्मी में था और वो सोमालिया में यूएन की शांति सेना में भेजा गया था तो केवल बीबीसी पर ही हम रोजाना सोमालिया के हालात सुन सकते थे. अभी भी रवांडा और दूसरे अफ्रीकी देशों में गांव के कुछ और बच्चे सेना में हैं तो हमें वहां की खबरें सुनने की उत्सुकता रहती है. बीबीसी के अलावा कोई भी वहां की खबरें देता ही नहीं है. मेरा हमेशा परिवार और अपने बेटे पर दबाव रहता था कि वे नियमित रूप से बीबीसी रेडियो पर आनेवाले समाचार सुनें. कई बार समय से पहले लगता था कि बंगाली की सभा चल रही होती थी और बंगाली बोलते हुए लोग अच्छे लगते थे. दोबारा सुनना होता था तो हिंदी की सभा खत्म होते ही वहां से उर्दू समाचार शुरू होते थे और मैं लगातार क्रम में उन्हें सुन सकता था. कितनी ही यादें हैं इंदिरा की हत्या, हमारा पूरा मोहल्ला उदास था और शाम को सब लोग हमारे ही घर में रेडियो से चिपक कर बैठे थे. बीबीसी ने जैसे ही उदास ढंग से पहली पंक्ति बोली कि भारत की प्रधानमंत्री नहीं रहीं. विश्वास नहीं हो रहा था. लेकिन बीबीसी का मतलब था कि खबर तो सच्ची ही होगी. मेरे गांव में बीबीसी एक मुहावरा भी है. जब किसी भी आदमी की सूचना पर यकीन करने का मन न हो तो उससे वह यकीन दिलाने के लिए कहता था कि कसम से पक्का कह रहा हूं. बीबीसी की खबर समझो इसे. पिछले कुछ सालों से मैं शाम की सभाएं सुनने का आदी रहा हूं . पिछले कुछ सालों से गांव में मोबाइल के टावर लग गये हैं और देश दुनिया की दूरियां कम हो गयी हैं. लेकिन बीबीसी के बंद होने की खबर पर मैं परेशान हूं. असल में मेरे जिस भतीजे ने मुझे रेडियो दिया था, वह बगदाद में 25 साल पहले मर गया था. मेरे घर में मेरे सख्त रवैये के कारण मेरा नाम सद्दाम हुसैन रखा गया था. यह मेरे भतीजे और बेटे के बीबीसी सुनने की वजह से ही था. वे राजनीतिक गतिविधियों से वाकिफ रहते थे. अकेला बीबीसी ही ऐसा रहा है जिसने पूरी दुनिया की खबरें सुनाते हुए मुझे ऐसा आदमी बनाया जिसमें इस दुनिया को खूबसूरत बनाने की हमेशा इच्छा रही.मेरा भतीजा जिसने मुझे यह रेडियो दिया था वह नहीं है और अब बीबीसी भी जा रहा है. मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे मेरे परिवार से मेरा हिस्सा अलग हो रहा है.

मां की तरह था बीबीसी

राजीव कुमार, छात्र, बीएचयू,राजीव कुमार, छात्र, बीएचयू, 28 वर्षीय

मेरा जुड़ाव बीबीसी से पुराना रहा है. लेकिन बीच में संपर्क टूटा. फिर पिछले दो सालों से मैं इसे नियमित सुन रहा था. मेरे लिए बीबीसी एक मां की तरह था. सुबह की शुरुआत उसी से होती थी. उसकी खबरें सुन लेना. मतलब कुछ ऐसा था कि मानो किताब पढ़ ली पूरी. मैंने बीबीसी के आम लोगों से जुड़े प्रोग्राम में कई बार टेलीफोनिक बातचीत भी की थी. हम आम लोगों को प्रायः सिनेमा से जुड़ी खबरें पढ़ने सुनने व अपने स्टार्स के बारे में जानना बेहद अच्छा लगता था. सो, इस लिहाज से भी बीबीसी ने हमारे लिए एक मुलाकात जैसे कार्यक्रम व संजीव श्रीवास्तव की आवाज में श्याम बेनगल व प्रतिष्ठित कलाकारों से उनके वक्त की जुड़ी बातें सुनना बेहद रोचक था. तो दूसरी तरफ आइएस की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए वह किसी इनसाइक्लोपिडिया से कम नहीं था

बीबीसी हिंदी रेडियो सेवा जिस तरह सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विषयों पर गहरी पकड़ रखता था. उसी तरह उसके रिपोर्टर सिनेमा पर भी गंभीर पैठ व समझदारी रखते थे. शायद यही वजह है कि बीबीसी रेडियो पर हाल के कुछ वर्षों तक भी व्यस्तताओं व मीडिया से कतराने के बावजूद यह बीबीसी की विश्वसनीयता ही थी कि कोई कलाकार इस माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में नहीं कतराते थे.उनकी यादों में बीबीसी...

शशि कपूर ः हिंदी सिनेमा के जगत के महान शख्सियत में से एक शशि कपूर को बीबीसी हिंदी रेडियो से बेहद लगाव रहा. वे बताते हैं कि कभी शूटिंग के दौरान उन्होंने पहली बार बीबीसी सुना था. घर पर चूंकि कला, इतिहास व सामाजिक गतिविधियों के बारे में चर्चा होती रहती थी. इसलिए भी बीबीसी से जुड़ाव हुआ. वे बताते हैं कि उनके स्पॉट ब्वॉय भी यही कहा करते थे कि सर अगर कोई जानकारी चाहिए तो बीबीसी लगाएं. उस वक्त वैनिटी वैन या मोबाइल फोन या इंटरनेट ये सारी चीजों का प्रचलन तो था नहीं. सारी जानकारी इससे ही मिलती थी. निस्संदेह रेडिये हमेशा हमारा साथी रहा है. पॉकेट ट्रांजिस्टर कहीं भी रख कर सुना जा सकता था. मुझे याद है 2006 की बात रही होगी. हालांकि उससे पहले भी मैं वहां गया हूं. लेकिन बीबीसी रेडियो ने आमंत्रित किया था. विशेष कर कपूर खानदान की पांच पीढ़ियों पर लंबी बातचीत होनी थी. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि 2006 में जबकि मैं इतना बूढ़ा हो चुका था. लोगों नयी फिल्मों को तवज्जो दे रहे थे. लेकिन श्रोता के रूप में दर्शकों के इतने फोन आये. मुझसे सवाल पूछने के लिए. मुझे याद है उस लंबी बातचीत में मैंने अपने परिवार के कई अनछुए पहलुओं पर बातचीत की थी. खासतौर से पृथ्वी थियेटर की नींव, फिर उसका पतन, और उसे अपने कार्यक्रमों के द्वारा बार-बार लोगों से गुजारिश करने पर कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाएं. मुझे फिर से हिम्मत मिली और पृथ्वी दोबारा शुरू हुआ. मैं नहीं लगभग हर अभिनेता इस बात को मानेंगे कि बीबीसी बेफिजूल की नहीं, बल्कि आम लोगों तक पहुंचायी जानेवाली ज्ञानवर्ध्दक बातें ही करेगा. दुख है कि अब वह हमारे साथ नहीं रहेगा.

श्याम बेनेगल ः अधिकतर हम पर मीडिया यह आरोप लगाती रहती है कि हम मीडिया से बातचीत नहीं करते. लेकिन मैं मानता हूं कि हम फिल्मकारों को इस बात से परेशानी नहीं कि हम बात नहीं करना चाहते. बल्कि इससे है कि विषयपरक बातों की बजाय हम निजी और व्यक्तिगत सवालों को ज्यादा तरजीह देते हैं. इस तरह के बेफिजूल बातें करनेवालों को एक बार बीबीसी रेडियो जरूर सुनना चाहिए. बीबीसी रेडियो की जो शैली है. सामान्य, आम लोगों से जोड़नेवाली शैली. मुझे सबसे अधिक यही आकर्षित करती थी. यही वजह है कि मैंने कई बार बीबीसी के माध्यम से लोगों तक अपनी बात पहुंचायी है. हाल के वर्षों तक उनका कार्यक्रम एक मुलाकात सुनता रहा हूं. और उसका हिस्सा भी.

माधुरी दीक्षित ः हां, मैंने सुना और मुझे इस बात का बेहद अफसोस है. चूंकि कॉलेज व स्कूल के दिनों में हम सभी बीबीसी की कसम खाते थे. जो बीबीसी की कसम खाता था. हम समझते थे कि अच्छा सच कह रहा होगा. चूंकि बीबीसी बिल्कुल सच, व विश्वसनीय खबरें सुनाता था. खासतौर से मैं मानती हूं कि उनके लिए जो गांव में हैं. जहां टीवी की पहुंच नहीं वहां लोगों को पूरी दुनिया से जोड़ने का काम तो बीबीसी ने ही किया था. मेरे घर पर पापा अब भी उसे सुनते हैं और फिर उसकी खबर हमें बताया करते थे.

शाहरुख खान ः सबसे अधिक कुछ रोचक था बीबीसी का तो वह था. क्रिकेट मैच सुनना. स्कोर क्या हुआ है. हालांकि ऑल इंडिया रेडियो भी था. लेकिन बीबीसी की खूबी यह थी कि वह पूरे विश्व की खबरें हमें पहुंचाता था.

20110319

होली का टशन





हिंदी सिनेमा व धारावाहिकों में हमेशा होली को खास तवज्जो दिया जाता रहा है. ऑन स्क्रीन होली के गीत या दृश्य दर्शकों को जिस कदर प्रभावित करते हैं. परदे के पीछे इन गीतों व दृश्यों के फिल्मांकन से जुड़े वास्तविक किस्से भी बेहद दिलचस्प हैं. प्रस्तुत है कुछ होली से जुड़ी रील लाइफ की रीयल होली का वास्तविक व जीवंत चित्रण डायरेक्ट सेट से ...

1. फिल्म ः शोले

निदर्ेशक ः रमेश शिप्पी

कलाकार ः अमिताभ बच्चन, जया, हेमा मालिनी, धमर्ेंद्र.

होली के गीत ः होली के दिन दिल खिल जाते हैं....

फिल्म शोले हिंदी सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्मों में से एक है. और फिल्म का गाना होली के दिन दिल खिल जाते हैं.. अब तक दर्शकों को पसंदीदा होली गीत है. जरा अनुमान लगाएं. इस सर्वाधिक गाने की शूटिंग के दौरान क्या क्या दिलचस्प बातें हुई होंगी. द मेकिंग ऑफ शोले में इसका जिक्र है

और धमर्ेंद्र जी ने सबको अलर्ट कर दिया था.

तय हुआ था कि फिल्म में कोई होली पर आधारित गीत का फिल्मांकन किया जाना है. सारी तैयारियां हो चुकी थीं. लेकिन उस दौर में तकनीक इतनंी ज्यादा विकसित नहीं थी. सो, इस बात का भी ध्यान रखा गया था कि कैमरे पर इसकी शूटिंग किस तरह हो. चूंकि होली के सीक्वेंस की शूटिंग के दौरान कैमरा मैन को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. फिल्म के सिनेमेटोग्राफर द्वारका द्विवेचा ने सबको सीन समझाया. फिर शुरुआत हुई. शूटिंग की. सीन कुछ ऐसा था कि गांव के लोगों के सामने बसंती डांस करेगी. और गांववालों में से ही एक गांववाला बसंती को रंग लगाया. चूंकि इसी फिल्म से धमर्ेंद और हेमा नजदीक आये थे. सो धमर्ेंद्र जी यह सुन कर नाराज हो गये और उन्होंने साफ इनकार कर दिया. वे बिल्कुल उस गांववालों को घुरने लगे. निदर्ेशक के समझाने पर उन्होंने कहा कि ठीक है लेकिन हेमा के चेहरे को टच भी न करना. गौरतलब है कि इस पूरी शूटिंग में कुल 72 रिटेक्स हुए हैं. कैमरामैन द्वारका द्विवेचा बताते हैं कि उन्हें इस सीन के फिल्मांकन करने में कई परेशानियां आयी थी. चूंकि गुलाल बार-बार कैमरे के लेंस पर आ रहा था. गौरतलब है कि इस गाने की शूटिंग में जया बच्चन को विधवा का किरदार निभाना था. सो उन्होंने खुद को होली खेलने से बेहद रोक रखा था. वरना जया रंग खेलने में उस्ताद थीं. सो, उन्होंने बमुश्किल खुद पर काबू किया था. शूटिंग के बाद बड़े दुखी मन से उन्होंने जब अमिताभ को यह बताया कि उन्हें रंग केलने की इच्छा है. तो अमिताभ और जया ने जम कर होली खेली.

2.फिल्म ःनदिया के पार

निदर्ेशक ः गोविंद मुनिस

होली गीत ः जोगी जी वाह...वाह

कलाकार ः सचिन, साधना सिंह

शूटिंग के दौरान कितने रिटेक ः 4 से 5

फिर गांववालों ने भी सुहाष को बहुत छेड़ा ः साधना सिंह

फिल्म नदिया के पार का गीत जोगी जी ढ़ूंढ़ के ला दो...होली का बेहद लोकप्रिय गीत है. आज भी कई गांवों में यही गीत विशेष रूप से होली के मौके पर सुना जाता है. फिल्म की अदाकारा साधना सिंह बता रही हैं फिल्म की शूटिंग ेक दौरान जब इस गाने की शूटिंग शुरू हुई तो क्या-क्या दिलचस्प बातें हुईं.

फिल्म नदिया के पार के गीत जोगी जी वाह...जोगी जी का फिल्माकंन जौनपुर के गांव में ही हुआ था. जब हमें पता चला कि फिल्म में होली का गीत होगा. हम सभी मस्ती के मूड में आ गये थे. हमारे साथ शूटिंग में गांववाले भी शामिल हो गये थे. पूरा माहौल होलीमय हो गया था. उस गाने में सचिन के साथ जिन्होंने गूंजा का किरदार निभाया था वह थियेटर आर्टिस्ट थे. हमारे साथ ही मुंबई से गये थे. लेकिन जिस तरह उन्होंने लड़कियों के कपड़े पहन कर पूरी मस्ती में डांस किया था. सभी ने बाद में उनको खूब छेड़ा. दरअसल, यूपी के गांव में शादी व्याह या होली जैसे माहौल में उसी तरह लड़कियों के कपड़े पहन कर सभी नाचते थे. लोग उन्हें नौटंकीबाज कहा करते थे. कुछ ऐसा ही सुहाश ने भी किया था. सबने बाद में वह गीत गा गा कर भी उन्हें खूब छेड़ा. मुझे याद है गांव के अन्य लोग भी शामिल हो गये थे. हालांकि हममें से किसी ने भांग नहीं पी थी. लेकिन खीर, पुरी और सब्जी पकी थी उस दिन. मैंने और सचिन ने भी खूब मस्ती की थी.

3. फिल्म ः एक्शन रिप्ले

निदर्ेशक ः विपुल शाह

कलाकार ः ऐश्वर्या राय, अक्षय कुमार

होली के गीत ः तेरी तो कसम से...

पिछले साल रिलीज हुई फिल्म एक्शन रिप्ले के गीत तेरी तो कसम कोईना हो गयी रे. की शूटिंग के दौरान पूरे सेट को रंग से रंगा जाना था. लेकिन जिस वक्त उस फिल्म की शूटिंग चल रही थी मुंबई में पानी की किल्लत थी. ऐस में फिल्म में कई टैंक पानी की बर्बादी होती. सो, ऐश्वर्या राय ने बिपुल से कहा कि हम रंग की बजाय गुलाल का इस्तेमाल करें तो बेहतर होगा. चूंकि हमें कई रिटेक भी देने होंगे. इससे पानी की बर्बादी होगी. सो, तय हुआ कि गुलाल ही फिल्म में दिखाये जायेंगे. फिर शूटिंग के लिए लगभग कई टैंक गुलाल का इंतजाम किया गया है. चूंकि इस गाने की शूटिंग में कई जूनियर आर्टिस्ट नजर आये हैं. ऐश्वर्या के इस पहल से अन्य कई निदर्ेशकों ने भी बाद की फिल्मों में यही फंडा अपनाया.

4.धारावाहिक ः देख भाई देख

कलाकार ः शेखर सुमन, भावना बलसावर

देख भाई देख हिंदी टेलीविजन के दौर का सर्वाधिक लोकप्रिय धारावाहिक रहा है. धारावाहिक में मुख्य अभिनय निभानेवाली अभिनेत्री भावना बलसावर कैसे उनकी सेट की होली अमिताभ बच्चन के साथ मनायी गयी थी...

कई दिनों तक ईच्छा हुई चेहरे से रंग उतारूं ही न...भावना

आज कल हम प्रायः फिल्मी सितारों को प्रोमोशन के लिए किसी सेट पर या किसी शो में आते देखते हैं. लेकिन उस दौर में जब हमारा लोकप्रिय धारावाहिक देख भाई देख प्रसारित हुआ करता था. किसी बॉलीवुड सेलिब्रिटी का आना. एक बड़ी बात ती. हमलोगों को जब यह जानकारी मिली कि हमारे सेट पर बिग बी आनेवाले हैं. हम सभी बिल्कुल अचंभित रह गये थे. पूरे सेट पर चहलकदमी थी. मैं तो उनके वैन के सामने ही जाकर खड़ी हो जा रही थी. बार-बार. वे आये उन्होंने हमारे साथ जम कर होली खेली. उसके बाद मुझे अपने चेहरे से रंग हटाने की इच्छा ही नहीं हुई. देख भाई देख के सेट की वह यादगार होली थी.

4.धारावाहिक ः क्योंकि सास भी कभी बहू थी

कलाकार ः स्मृति ईरानी व अन्य

क्योंकि सास भी कभी बहू थी टेलीविजन इतिहास का लंबे समय तक चलनेवाले शोज में से एक रहा. इस शो में कई बार होली के सीन फिल्माये गये. स्मृति बता रही हैं क्योंकि के सेट की होली के कुछ राज

रॉनित की नयी शर्ट खराब कर दी थी हमनेः स्मृति ईरानी

क्योंकि सास भी कभी बहू थी में हर पर्व धूमधाम से मनाया जाता था. पहले ही टीम को यह बताया जा चुका था कि हमें होली सीक्वेंस का सूट करना है. इसके बावजूद रॉनित भूल गये थे . वे नयी शर्ट में आये. शूटिंग शुरू से पहले ही हमने उनकी शर्ट खराब कर दी थी. सारे बच्चों ने मिल कर उन्हें रंग में डूबो दिया. और वे बेचारे देखते रह गये.

एकस्ट्रा शॉट

डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी की आनेवाली फिल्म मोहल्ला अस्सी में दर्शकों को बनारस की साक्षात व विख्यात होली देखने का मौका मिलेगा.

फिल्म सिलसिला के गीत रंग बरसे .... में अमिताभ ने वास्तविकता में भंाग पी ली थी. ्ौर अपनी पूर्व प्रेमिका रेखा के साथ उन्होंने इस गाने की शूटिंग में भरपूर लुत्फ उठाया था.

अब तक हिंदी सिनेमा में होली के सर्वाधिक गीत जिस अभिनेता पर फिल्माये गये हैं वे हैं अमिताभ बच्चन. फिल्म सिलसिला का गीत रंग बरसे..., फिल्म बागवां का गीत होली खेले रघुवीरा व फिल्म शोले के गीत होली के दिन भी अमिताभ पर फिल्माये गये हैं. यह सभी गाने सुपरहिट रहे हैं.

20110311

7 पर फिंदा बॉलीवुड




बॉलीवुड का अंकों से प्रेम पुराना नहीं है. कई सालों से हिंदी सिनेमा जगत में अंकों पर आधारित फिल्मों के शीर्षक तय किये जाते रहे हैं. खासतौर से नंबर 10 व 7 बॉलीवुड में हमेशा लोकप्रिय रहे हैं. इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म 7 खून माफ भी इनमें से एक है. बॉलीवुड की कुछ ऐसी ही फिल्मों पर एक नजर, जिसके शीर्षक में नजर आते रहे हैं अंक

हिंदी सिनेमा जगत वर्षों से ज्योतिष विद्या व अंक ज्योतिष पर विश्वास करता आ रहा है. खासतौर से बात जब फिल्मों के शीर्षक की आती है तो निदर्ेशक बहुत सोच समझ कर यह निर्णय लेते हैं. लेकिन ऐसी भी कुछ फिल्में रही हैं जिनका अंक ज्योतिष से कुछ लेना देना नहीं. लेकिन बावजूद इसके उनकी कहानियां नंबरों के पीछे घूमती रही हैं. दस, दस कहानियां, दस विवादिया व दस नंबरी ऐसी कई फिल्में हैं जिनमें 10 अंक का इस्तेमाल किया गया है और कहीं न कहीं फिल्मों की कहानियां भी इसके इर्द-गिर्द घूमती रही हैं. कुछ इसी तरह दर्शकों का मोह रहा है नंबर सात. दरअसल, हमारे जीवन में भी सात नंबर की बहुत एहमियत है. हफ्ते के सात दिन. और इसमें सिमटा है हमारा पूरा संसार. शायद यही वजह है कि निदर्ेशक भी अपनी कहानियों को अंक सात से जोड़ते रहे हैं. यह इतिहास पुराना है.

सात हिंदुस्तानी

शुरुआत सात हिंदुस्तानी. यह फिल्म सात हिंदुस्तानी सिपाहियों पर आधारित थी. फिल्म की पृष्ठभूमि देशभक्ति थी. खासतौर से अमिताभ बच्चन के लिए यह फिल्म सबसे महत्वपूर्ण रही.चूंकि इसी फिल्म से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की. हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा पायी थी. लेकिन फिल्म की कहानी ने लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफलता हासिल की थी.

सत्ते पे सत्ता

अमिताभ बच्चन के लिए अंक 7 लकी रहा है. तभी तो सात हिंदुस्तानी के बाद उनके खाते में एक और फिल्म आयी. 1982 में फिल्म बनी सत्ते पे सत्ता. इस फिल्म का जुड़ाव भी अंक 7 से रहा. फिल्म सात भाईयों के इर्द-गिर्द घूमती है. फिल्म में सभी भाईयों के नाम 7 दिनों पर सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, रवि रखे गये थे. रवि का किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया था.

वो सात दिन

सत्ते पे सत्ता के बाद अगले ही वर्ष यानी 1983 में फिल्म आयी वो सात दिन. मुख्य निभाया अनिल कपूर, पद्दमीनी कोल्हापुरे व नसीरुद्दीन शाह नें. आगे चल कर इसी फिल्म की कहानी पर हम दिल दे चुके सनम बनीं थी.

सेवन डेज इन पेरिस

खबर है कि जल्द ही इमरान व कटरीना सेवन डेज इन पेरिस नामक किसी फिल्म में नजर आयेंगे

सात खून माफ

इस हफ्ते रिलीज हो रही फिल्म सात खून माफ में भी सात का इस्तेमाल किया है. फिल्म में प्रियंका द्वारा उसके सात पतियों की हत्या की कहानी कही गयी है. विशाल भारद्वाज के निदर्ेशन में बनी यह प्रियंका की दूसरी फिल्म है. फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, अनु कपूर, जॉन अब्राह्म ने प्रियंका के पतियों की भूमिका निभाई है.


इन फिल्मों के अलावा अब तक अंकों का इस्तेमाल शीर्षकों में कई बार किया गया है. 100 डेज, दो आंखें 12 हाथ, सौ दिन सास के, जैसी फिल्में में भी कहानी कुछ इन्हीं अंकों के इर्द-गिर्द घूमती रही है.

क्लाइमेस से दर्शकों के ये फासले....





एक दौर था, जब दर्शक थियेटर में सीट पर बैठ कर बस यह सोचा करते थे यार अब क्या होगा. फिल्म का इंटरवल लोगों के मन में और उत्सुकता पैदा करता था. लेकिन हाल की फिल्मों पर गौर करें तो लगभग सभी फिल्में शुरुआत से बेहद अच्छे अंदाज में शुरू होती हैं लेकिन धीरे-धीरे क्लाइमेक्स आते आते कहानी दम तोड़ देती है. थियेटर से बाहर निकलने के बाद दर्शक मायूस हो जाते हैं कि उन्होंने देखा क्या. शुरुआत से अंत तक दर्शकों की उत्सुकता को बांधे न रख पाने वाली कहानियों पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

अकिरा कुरसावा जब निदर्ेशक के रूप में बहत लोकप्रिय हो गये थे. इसके बाद वे कई कॉलेज में फिल्म मेकिंग की ट्रेनिंग देने जाया करते थे. उन्होंने अपने भाषण के दौरान बच्चों को सिखाया था कि किसी भी फिल्म की कहानी तभी बहुत प्र्रभाव छोड़ पाती है. जब वह बेहतरीन हो. उसकी शुरुआत उसका मध्यांतर और क्लाइमेक्स यानी अंत तक कहानी दर्शकों को बांध कर रख सकती है. उनका प्रभाव अब तक भारतीय निदर्ेशकों पर रहा है. बर्गमैन जैसे निदर्ेशकों ने भी इस ग्रामर को हमेशा फॉलो किया है. लेकिन हाल की फिल्मों में देखें तो जिस कदर नये निदर्ेशक व नये प्रयोगों के साथ कहानियां आ रही हैं. वे अपनी फिल्मों के क्लाइमेक्स के साथ बहुत न्याय नहीं कर पाते. गौर करें तो राजकपूर की फिल्मों ज्यादातर आम लोगों पर या लव स्टोरी हुआ करती थी. लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स बेहद दिलचस्प होता था. दर्शक यह अनुमान नहीं लगा पाते थे कि आगे क्या होगा. हमेशा उनकी सोच के विपरीत होता था क्लाइमेक्स. कुछ ऐसा ही उस दौर की थ्रीलर फिल्मों के साथ भी होता था. अंत तक लोगों को पता नहीं चल पाता था कि आखिरकार खुनी कौन है या किस तरह यह होगा. अच्छे किरदार बाद में जाकर खलनायक के रूप में जब लोगों के सामने आते थे. तो सभी यही सोचते थे अरे यह खूनी है. यस खलनायक है. यही वजह थी लोगों की उत्सुकता बरकरार रहती थी. लेकिन हाल की थ्रीलर फिल्मों की बात करें तो सभी फिल्मों में थ्रील जैसा कुछ भी नहीं होता. न ही रोमांच होता है और न ही कोई थ्रील. न ही कोई सस्पेंस जैसी चीजें.

तनु वेड्स मनु

तनु वेड्स मनु जिम्मी शेरगील ही कंगना रनाउत का ब्वॉयफ्रेंड होगा. यह अनुमान उस वक्त ही लोगों ने लगा लिया था जिस वक्त जिम्मी शेरगिल की दोबारा ट्रेन में एंट्री होती है. फिल्म वही से कमडोर पड़ जाती है और लोगों की रुचि घट जाती है. सभी ने इस फिल्म को अंतराल से पहले बेहद पसंद किया. लेकिन बाद में फिल्म कमजोर तो हुई ही. अंत भी बहुत जोरदार या प्रभाव छोड़नेवाला नहीं हुआ. नतीजन दर्शकों ने माना कि यह फिल्म अच्छी तो है लेकिन अंत कुछ खास नहीं रहा.

सात खून माफ

सात खून माफ में लगातार यह दिखाया गया है सुजैना यानी प्रियंका चोपड़ा बहुत क्रांतिकारी स्वभाव की है. वह अपने रास्ते के रोड़े को हटाना जानती थी. रास्ता बदलना उसे नहीं आता था. लकिन अंत में उसने अपनेआप को भगवान को समर्पित कर दिया. तो यह बेहद अटपटी सी समाप्ति हुई.

अज्ञात

फिल्म अज्ञात में लगातार अंत में नायिका को जंगल में रास्ता नहीं मिलता है. अचानक नायिका का पैरा रुक जाता है. और नीचे पानी है. और फिल्म अंत हो जाता है. यहां भी दर्शक रोमांचित होने की बजाय बोर हो जाते हैं.

ये फासले

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ये फासले में महाजार रेडी के आने के साथ ही दर्शक इस बात का अनुमान लगा लेते हैं कि फिल्म में वही खलनायक हैं. फिल्म लगातार खींची जाती है. लेकिन अंततः खलनायक बिल्कुल बेतरतीब तरीके से लोगों के सामने आता है. कहानी का कमजोर पहलू यही है.

कौन

फिल्म कौन नायिका खुद लोगों से डरती रहती हैं. और अंत में वह खुद मर्डरर निकलती हैं. दर्शक फिल्म की कहानी के बीच में ही इस बात का अनुमान लगा चुके थे कि फिल्म में उर्मिला ही खूनी हैं.

रावण

फिल्म रावण की कहानी जितनी कमजोर थी उतना ही उसका क्लाइमेक्स भी. वीरा मर जाता है. और फिल्म वही खत्म हो जाती है. फिल्म में दर्शकों को यही महसूस होता है कि उनके साथ कोई मजाक किया गया है.

बॉक्स में

अच्छी क्लाइमेक्सवाली फिल्में

गौर करें तो ऐसी भी कई फिल्में रही हैं जिनके क्लाइमेक्स शानदार रहे हैं

ज्वेल थीफ

फिल्म ज्वेल थीफ में लोगों को बहुत बाद में यह जानकारी मिलती है कि दरअसल अशोक कुमार खलनायक हैं.

जानी दुश्मन

गांव में हर दुल्हन का खून हो रहा है. लेकिन फिल्म के अंत में लोगों को यह जानकारी मिलती है कि दरअसल संजीव कुमार ही वह खून करते थे.

गुमनाम

फिल्म गुमनाम के अंत में लोगों को पता चलता है कि नायिका नहीं बल्कि नायक का दोस्त खलनायक है.

दबंग

फिल्म दबंग में अंत में लोगों को पता चलता है कि सोनू सुद ने सलमान खान की मां का खून किया था.

रेस

फिल्म रेस में बार-बार कट्रीना, सैफ, बिपाशा और अक्षय खन्ना एक दूसरे से प्यार का नाटक करते हैं. बाद में लोगों को पता चलता है कि सैफ व बिपाशा एक साथ हैं.

20110309

बॉलीवुड के तकनिकी फील्ड में लड़कियां




अरे, लड़कियों में धैर्य नहीं होता. इसलिए वह किसी तकनीकी क्षेत्र में नहीं जा सकती. और अगर चली भी जाये तो बहुत अच्छा नहीं कर सकती. इतने वर्षों के बावजूद जबकि लड़कियों ने हर क्षेत्र में खुद को साबित किया है. अब भी अधिकतर लोगों की यही सोच है. लेकिन अगर गौर करें, तो पिछले कई वर्षों में लड़कियों ने उन क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बनाई है, जिसमें प्रायः पुरुषों का एकाधिकार होता था. आइटी, इंजीनियरिंग के अलावा अब बॉलीवुड में भी महिलाओं ने कुछ तकनीकी क्षेत्रों में अपनी भागीदारी शामिल की है. अगली बार आप जब कभी कोई फिल्म देखने जायें तो कुछ देर ठहर कर जरूर फिल्म के क्रेडिट लाइन पर गौर करें. आपको ऐसी कई लड़कियों का नाम नजर आयेगा, जिन्होंने तकनीकी श्रेणी में अपना योगदान दिया होगा. कैमरे के सामने ही नहीं बल्कि कैमरे के पीछे भी वे अपना कमाल दिखा रही हैं.

1. रश्मि त्रिपाठी, कैमरामैन

कैमरे से इतना प्यार था कि शादी भी कैमरेमेन से कर ली...

संक्षिप्त परिचयः मूल रूप से ओड़िसा की रहनेवाली रश्मि प्रतिष्ठित चैनल में सीनियर वीडियो रिकॉर्डिस्ट हैं. 31 वर्षिय रश्मि पिछले आठ सालों से इस प्रोफेशन से जुड़ी हुई हैं. उन्हें कैमरे से इतना प्यार है कि उन्होंने शादी भी कैमरामैन से ही की है.

मुंबई के न्यूज चैनलों की भागदौड़ कें रश्मि एक ऐसा चेहरा हैं, जो कैमरे लेकर कहीं भी भीड़ में भी लड़कों को पछाड़ते हुए अपने चैनल के लिए खबर निकाल लाती हैं. बतौर रश्मि मेरे पिताजी आर्मी मैन थे. वे हमेशा से चाहते थे कि मैं कुछ अलग करूं. कुछ ऐसा जो सिर्फ लड़के करते हैं इसलिए मेरे अंदर बचपन से ही यह ख्वाहिश थी कि मैं अलग करूं. कुछ अलग करने की इसी चाह में मैंने डेंटिस्ट की अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी, क्योंकि मैं कुछ भी नियिमित काम नहीं करना चाहती थी. आम लड़कियों वाला काम नहीं करना चाहती थी. मैंने सोचा कि अगर मैं डेंटिस्ट बनूंगी तो वही सब मुझे करना होगा. जो हर दूसरी लड़की करती है. इसी सोच ने मेरा ध्यान कैमरे की ओर किया. मुझे वीडियो फोटोग्राफी का बहुत शौक था सो मैंने इसी मैं अपना कैरियर बनाने का इरादा किया. भारी भरकम कैमरे को लेकर क्या एक लड़की शूट कर सकती है. ऐसा सोचने में ही अजीब लगता था लेकिन यही बात मुझे अट्रैक्ट कर गयी. मैंने टेलिविजन और फिल्म इंस्टीटयूट से कैमरामैन सारी वूमेन का तीन सालों का कोर्स किया. कोर्स करने के बाद मुझे नौकरी ढूंढने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई सब कहते हैं कि महिलाएं को लिए यह फील्ड नहीं है लेकिन मुझे जल्द ही जाब मिल गया. जाब मिलने से ज्यादा परेशानी जाब के पहले दिन हुई. मुझे याद है दीपिका का इंटरव्यू था. उनकी फिल्म ओम शांति ओम के लिए. कैमरा मैन की एक लंबी लाइन लगी हुई थी. कैमरा मैंस को आम तौर पर जेंटलमैन नहीं माना जाता है. उनका लुक भी कुछ ऐसा था किसी के गले में रुमाल बंाधा था तो कोई और अलग लुक में थे. थोड़ी सी नर्वस हुई लेकिन मैं डरी नहीं अपना कैमरा लिया और भीड़ में घुस गयी. मुझे कैमरे के साथ देख कर कुछ लोग बातें करने लगे लड़की कैमरामैन लेकिन कुछ देर बाद सबकुछ सामान्य हो गया. सभी ने आकर न सिर्फ मेरा हौंसला बढ़ाया बल्कि यह भी कहा कि तुम सबसे आगे खड़ी हो जाओ ताकि धक्का मुक्की से तुम्हें ज्यादा परेशान न कर सके. इस तरह मैंने जाना कि अगर हमारे अंदर आत्मविश्वास हो तो रास्ते खुद ब खुद बन जाते हैं. उसके बाद से फिर मैंने पीछे मुडकर नहीं देखा. मेरे पति भी कैमरामैन ही हैं इसलिए घर पर भी सिर्फ और सिर्फ यही बातें होती रहती हैं. आज मेरा एक छह साल का बेटा भी है. बच्चे की वजह से मैंने लेट नाइट शूट करना बंद कर दिया है लेकिन अपने काम के प्रति मेरा पैशन कम नहीं हुआ है.

2. हेमंती सरकार ः

पापा हमेशा प्रोत्साहित करते थे कि इसी क्षेत्र में जाओ...अच्छा रहेगा तेरे लिए

संक्षिप्त परिचय ः हेमंती सरकार, संपादक

पीपली लाइव की वीडियो संपादक. कोलकाता में ज्नम हुआ था. लेकिन पढ़ाई पूरी की बंग्लुरु से. एफटीआइआइ से वीडियो एडिटिंग की पढ़ाई पूरी की. फिर रेणु सलुजा( हिंदी सिनेमा की प्रतिष्ठित संपाकि) के साथ काम किया. परिणिता, बारहा आना जैसी फिल्में भी एडिट की.

अनुषा रिजवी निदर्ेशित फिल्म पीपली लाइव की वीडियो संपादक हेमंती मानती हैं कि वे शुरू से ही तैयार थी कि वे कुछ इसी तरह का काम करना चाहती हैं. घर में माता-पिता से माहौल मिलता रहा. वे भी कला के क्षेत्र से जुड़े थे. सुचित्रा स्टूडियो व अकादमी के लिए उनके परिवारवालों ने बहुत कुछ किया. सो जन्म कोलकाता में हुआ. लेकिन पढ़ाई बाहर से हुई. फिर मौका मिला एफटीआइआइ से जुड़ने का. जुड़ी. वहां से रेणु सलुजा जैसी संपादक से जुड़ने का मौका मिला. वहीं बारिकियां सीखीं. फिर और मौके मिलते गये. तनुजा चंद्रा की फिल्म सुर से पहला मौका मिला. फिर परिणीता, बारह आना और पीपली लाइव करने का मौका मिला. हेमंती इस बात से बिल्कुल इनकार करती हैं कि एक महिला अच्छी संपादक नहीं हो सकतीं. यह सोच बदलनी चाहिए. चूंकि एक संपादक के लिए विजन स्पष्ट होना जरूरी है.

3. सबिता सिंह, सिनेमेटोग्रााफर

मजा आता है कैमरे के पीछे

संक्षिप्त परिचय ः सबिता सिंह. हिंदी सिनेमा की चुनिंदा सिनेमेट्रागाफ्रर में से एक. डिप्लोमा फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित. फिल्म फूंक, धूसर व कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए भी काम

सबिता हरियाणा की रहनेवाली हैं. बतौर सबिता मानती हैं कि हरियाणा की होने की वजह से उनसे कई लोगों ने यह सवाल किया था कि आप उस जगह से हैं तो वहां तो लड़कियों को छूट नहीं मिलती. लेकिन मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं आयी. मुझे मेरे घर परिवार से पूरी छूट मिली. शुरू से मैं फिल्में देखती थी तो सोचती थी कैसे होता होगा काम. तो बस जुड़ गयी. एफटीआइआइ से कोर्स किया. फिव फिल्म क्रमशः के लिए मुझे नेशनल अवार्ड भी मिला तो हौसला बढ़ा. फिर फूंक, धूसर व 404 जैसी िफल्म के लिए बतौर आत्मनिर्भर सिनेमेटोग्राफी करने का मौका मिला.मुझे खुशी है कि अमोल पालेकर व रामगोपाल वर्मा जैसे निदर्ेशकों के साथ काम कर रही हूं. मैं मानती हूं कि आप अगर सिनेमेटोग्राफी के क्षेत्र में आना चाहते हो तो आपको पेंटिंग, कला, लाइट्स, मूड्स, फोटोग्राफी की भी जानकारी होनी चाहिए. यह सोच कर न आये कि पैसे कमाने है. पहले काम करें. फिर पैसे के बारे में सोचें. अपना 100 प्रतिशत दें.

4. बीनल शाह, एनिमेटर

उम्र नहीं काम देखें

संक्षिप्त परिचय ः गुजरात के अहमदाबाद की रहनेवाली बीनल शाह, महज 24 वर्ष की हैं. लेकिन आपको जान कर आश्चर्य होगा कि उन्होंने छोटी सी उम्र में हॉलीवुड फिल्मों के लिए बतौर एनिमेटर के रूप में काम किया है. नाइट एट म्यूजियम , द गोल्डन कंपस( ऑस्कर 2008), द सर्क डयू फिरक, नाइट एट द म्यूजियम, लैंड ऑफ द लॉस्ट, द रेड राइडिंग जैसी फिल्मों में एनिमेशन करती हैं.

बीनल से पूरी बातचीत होने के बाद आखिर में जब उनकी उम्र के बारे में जानकारी मिली तो वाकई आश्चर्य हुआ. महज 24 वर्ष की बीनल बेहतरीन एनिमेटर हैं. बकौल बीनल शुरू से ड्राइंग करती थी. कार्टून देखा करती थी तो सोचती थी ये कैरेक्टर मूव कैसे होते होंगे. इसका मूव कैसे होता है. पापा ने कहा कि तुम्हेंं कला अच्छा लगता है तुम इस क्षेत्र में जाओ. कुछ सीख लो. तो मैंने मुंबई में जीका में एडमिशन लिया. तीन साल किया. काफी कुछ समझ में आया. सीखा. फिर इतना सबकुछ करने के बाद जॉब ढूंढ़ना था. मैंने अप्लाइ किया,रिदिम अ रे स्टूडियो में मौका मिला. यह एक बड़ी कंपनी थी. जिसमें हॉलीवुड की फिल्मों के लिए काम होता था. मैंने अपना ग्रेजुएशन पूरा नहीं किया था. महज 18 साल की उम्र में यहां आ गयी थी. फिर मौके मिले और काम सीखती गयी. यहां लोगों ने बताया कि आप काम जानती हैं कि लेकिन बेस्ट नहीं है. बेस्ट बनना होगा. और नतीजन मैंने लगातार सीखा और खुद को बेस्ट बनाया. मैं नहीं मानती कि लड़कियां अच्छी एनिमेटर नहीं हो सकती. बल्कि वे ज्यादा अच्छा कर सकती हैं.

5. आरती बजाज, फिल्म संपादक

खुश रहें काम खुद अच्छा होगा.

आरती बजाज दिल्ली से हैं. इनकी फेहरिस्त में कई बड़ी व हिट फिल्में शामिल हैं.जब वी मेट, लव आज कल, रॉकस्टार, गुलाल, नो स्मोकिंग, ब्लैक फ्राइडे, नो वन किल्ड जेसिका, हनीमुन ट्रैवल्स, दो दुनी चार, आमिर का संपादन किया.

आरती बेहद बिंदास व खुशमिजाज दिल की व्यक्ति हैं. शायद यही वजह है कि उनकी फिल्मों के संपादन में वह बारीकियां व फ्रेशनेस नजर आता है. आरती बॉलीवुड की प्रतिष्ठित व लोकप्रिय संपादकों में से एक हैं. इम्तियाज लव आज कल के बाद लगातार उनके साथ काम कर रहे हैं. राजकुमार गुप्ता ने भी अपनी फिल्मों के लिए उन्हें ही चुना है. आरती मानती हैं कि वे आराम से और एक वक्त में ही एक ही प्रोजेक्ट पर काम करती हैं. चूंकि उनकी बेटी भी हैं और उन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती हैं. आरती शुरू से चीजों को एक संपादक के रूप में देखती थीं. वे मानती हैं कि संपादक के लिए जरूरी है कि वह अच्छा स्टोरी टेलर हो. कहानी को समझे अपने निदर्ेशक के वीजन को समझे.

6. सनोबर, स्टंट वीमेन

संक्षिप्त परिचय ः सनोबर. बॉलीवुड में इन दिनों सनोबर को स्टंट की ऐश्वर्या कह कर बुलाया जाता है. उन्होंने ऐश्वर्या, ईशा, कट्रीना व बिपाशा जैसी नायिकाओं के लिए स्टंट किये हैं. फिल्म धूम1, 2 और थ्री में भी उन्होंने काम किया है.

सनोबर फिलवक्त सिर्फ 20 वर्ष की हैं. लेकिन बॉलीवुड में लोग उन्हें लेडी डॉन के नाम से जानते हैं. कई लोग उन्हें ऐश्वर्या राय भी कहते हैं. सनोबर इन दिनों बॉलीवुड की चर्चित स्टंट वीमेन में से एक हैं. प्रियंका चोपड़ा व हर चर्चित अभिनेत्री के लिए वे खतरनाक स्टंट कर लेती हैं. सनोबर बताती हैंं कि उन्हें शुरुआत में 1000 रुपये मिलते थे. अब अपनी अनुसार मेहताना लेती हूं. वे मार्शल आर्ट, कराटर्े में पारंगत हैं. हेलीकॉप्टर से कूदना, छलांग लगाना, पानी पर घूमना, खतरों की खिलाड़ी के रूप में वे जाबांजी से स्टंट कर जाती हैं. सनोबर मानती हैं कि कोई भी काम महिलाओं के लिए नामुमकिन तो है नहीं. सबकुछ हासिल किया जा सकता है. अगर आप चाहें तो.

7. अनुराधा पाल, तबलावादक

संक्षिप्त परिचय ः अनुराधा पाल बहु प्रतिष्ठित तबलावादक में से एक हैं. अनुराधा पाल ने अब तक जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, हांग कांग, सिंगापुर, बैंकॉक व अफ्रीका में कांसर्ट किया है. उन्हें इंडिया टुडे ने 30 लीडिंग लेडी ऑफ इंडिया में भी शामिल किया था.

तबलावादक के रूप में अब तक भारत में सिर्फ पुरुष तबलावादक ही नजर आते थे. लेकिन अनुराधा पाल ने उस भ्रम को तोड़ा. वे बचपन से ही तबलावादन से जुड़ी रहीं. उन्हें तबले से बेहद प्यार था. उन्होंने इसमें विशारद हासिल की. और मुकाम हासिल किया.उन्होंने फिल्म गज गामिनी में बैकग्राउंड स्कोर किया है. कान फिल्म फेस्टिवल में फिल्म को सराहना मिली. अनुराधा बताती हैं कि वे एक मात्र भारतीय महिला हैं जिन्होंने वुमाड फेस्टिवल में परफॉर्म किया है. अनुराधा के संगीत की प्रशंसा संगीत इंडस्ट्री से जुड़े बड़े कलाकारों ने भी की है. जाकिर हुसैन उनमें से एक है. अनुराधा मानती हैं कि किसी भी काम के लिए आपका समर्पित होना जरूरी है. तभी सफलता मिलती है.

20110304

चुलबुल, बुलबुल से दबंग, हुड़दंग किरदारों में बदली नायिकाएं



वर्ष 1959 में नूतन अभिनीत व बिमल रॉय निर्मित फिल्म सुजाता जातिय भेदभाव को लेकर बनायी गयी फिल्म थी. फिल्म के अभिनेता सुनील दत्त सुजाता से बेइतहां प्यार करते हैं. मन ही मन सुजाता भी उन्हें बेहद चाहती है .लेकिन जातिय भेदभाव की वजह से वह चुप है और बस चुपचाप सबकुछ सहती जाती है. फिल्म ब्लैकमेल की नायिका अंततः अपनी बात समझाने में असफल रहती है कि रह निर्दोष है. तो वही फिल्म साहिब बीवी गुलाम में मीना कुमारी अपने प्रियवर को दूसरी औरत के दूर करने के लिए टोटके के सिंदूर का टोटका आजमाने से भी गुरेज नहीं करती.चूंकि उसके पास और कोई हथियार भी नहीं था, क्योंकि उस दौर की महिला किरदारों ने चुप होकर सिफ सहना सीखा था. चुप्पी साध कर, घुट घुट कर जीना ही उन्हें हमेशा मुनासिब लगा. मेरे पति परमेश्वर व पिता देवता समान. कुछ ऐसी ही सोच रखती थीं वे. गौरतलब है कि उस दौर में फिल्मों का निर्माण उस दौर के सामाजिक परिस्थितियों को आधार मान कर बनाये जाते रहे थे. जिस तरह स्त्री का चरित्र चित्रण परिवार व समाज में था. वैसा ही सिल्वर स्क्रीन पर भी फिल्माया जाता था, ताकि वास्तविकता लोगों के सामने आ सके. चूंकि उस दौर में महिलाएं बेबस, कठपुतली की तरह हर बात पर चाबी देकर हां या नां में सिर हिलानेवाली एक गुड़िया थी, सो उनका चरित्र चित्रण भी कुछ उसी अंदाज में किया जाता रहा. दरअसल, हिंदी सिनेमा में अधिकतर महिला किरदारों को इस रूप में गढ़ा गया कि अधिकतर फिल्मों में उनकी वास्तविक छवि उभर कर सामने नहीं आ पायी. गौर करें तो यह जरूर था कि कई फिल्मों के नाम महिला किरदारों के नाम पर रखे गये. लेकिन उन फिल्मों में महिला किरदारों की भूमिका न मात्र की होती थी. लेकिन धीरे-धीरे यह प्रथा टूटती नजर आयीय. जिस कदर महिलाओं ने बदलते जमाने के साथ कदमताल करना शुरू किया. सबकुछ बदला. तो फिल्मों ने भी महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदला. अब महिलाएं फिल्मों में रोती या सिसकती नहीं, बल्कि बोल्ड, बिंदास व दबंग रूप में नजर आने लगीं. धीरे-धीरे निदर्ेशकों ने भी यह बात समझी कि महिलाओं का प्रयोग सिर्फ किसी गाने या कपड़ों की नुमाईश के लिए नहीं. गौर करें तो फिल्म गाइड में रोजी अपने पति के साथ घुमने आती है. वहां उसे गाइड राजू से प्यार हो जाता है. अपने पति के अत्याचार व पत्नी को कुछ न समझनेवाले पति से दूरी ने राजू से नजदीकियां बढ़ायीं और उसने सहज स्वीकार किया कि वह राजू से प्यार करती है. एक तरह से देखें तो पति के हाथों मजबूर होकर सिसकनेवाली महिला अचानक इतनी बोल्ड होती पहली बार दिखाई दी थी. हालांकि ब्लैक एंड ह्वाइट के दौर में ऐसी कई फिल्में बनीं. लेकिन गाइड में एक स्वछंद महिला का चेहरा इभर कर लोगों के सामने आये. अपने पति के नक्शे कदम व ईशारों पर नाचनेवाली गुड़िया बार-बार अपने पति के कहने पर अग्नि परीक्षा देनेवाली अचानक तलवार थाम लेती है. फिर सामने मदर इंडिया की छवि उजागर होती है. जिसमें वह अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने से भी नहीं कतराती. फिल्म सीता और गीता में भी महिलाओं के दो स्वरूपों का खूबसूरत चित्रण किया गया है. जिसमें एक रूप को बिंदास, बोल्ड, निर्भय दिखाया गया है तो एक को बेबस और लाचार. लेकिन गौर करें तो धीरे धीरे महिला किरदारों के प्रति लोगों का नजरिया बदलता ही गया. सीता और गीता ही आगे चल कर चालबाज की श्रीदेवी के रूप में नजर आयी. सच यह है कि जैसे जैसे दौर बदले, महिला किरदारों व नायिकाओं ने भी अपनी सोच बदली. अब नायिकाओं के लिए भी बोल्डनेस का मतलब सिर्फ कम कपड़े पहनना नहीं बल्कि अपने किरदार में भी दबंगई लाना था. याद करें तो जीनत अमान व रेखा ने कई फिल्मों में सशक्त अभिनय में इस नजरिये की पुष्टि की है. फिल्म खून भरी मांग में वह अपने पति की खून का बदला लेती है. वह इंस्पेक्टर के रूप में भी नजर आती है. भले ही लीव इन रिलेशनशिप को इतने सालों बाद समझ पायें हों लेकिन फिल्म दीवार में पहली बार परवीन बॉबी अमिताभ बच्चन के साथ लीव इन रिलेशन में रहती है. उस दौर में महिला किरदारों को इस रूप में दिखाना भी एक सराहनीय प्रयास था. धीरे-धीरे महिलाओं ने खुद को और बिंदास और बेफिक्र बनाया. साथ ही उन्होंने अपने किरदारों में आत्मनिर्भरता को भी प्राथमिकता देनी शुरू की. स्मिता पाटिल, शबाना आजमी ने वर्षों से महिलाओं के बंधे बंधाए किरदार को तोड़ने में अहम भूमिका निभायी. फिल्म अर्थ से शबाना आजमी ने साबित किया कि एक महिला कैसे सही होने पर सही इंसान का ही चुनाव कर सकती है. आगे चल कर रेखा ने भी कई फिल्मों में यह सिलसिला जारी रखा. कभी पाकिजा, साहिब बीवी और गुलाम व कई फिल्मों में गुलाम बनी महिलाओं को धीरे धीरे फिजाएं खुली मिली और उन्होंने स्वछंद बिना किसी के परवाह उड़ना शुरू किया और उड़ते उड़ते वह उड़ान इतनी ऊंची होती गयी कि अब वह कॉलेज में डयूड गर्ल बन गयी और लड़की होकर लड़कों की रैगिंग भी लेने लगी. अब वह नो वन किल्ड जेसिका की मीरा की तरह बिंदास गालियां भी देती है. सिगरेट भी फूंकती है और रात के 12 बजे बिना किसी लिफ्ट के सहारे अकेले घर जाने का दमखम भी रखती है. उसके लिए अब सिर्फ शादी, व्याह और प्यार ही सबकुछ नहीं. अब करियर भी उसकी प्राथमिकता बनी. और इस रास्ते में जो भी आया उसे बिंदास न कहने में भी उसे अफसोस नहीं हुआ. फिल्म लव आज कल की मीरा, ब्रेक के बाद की आल्या कुछ ऐसे ही नाम हैं. वे एंवी किसी से शादी नहीं करेंगी. उन्हें अब बोल्ड कहलाना सिर्फ इसलिए पसंद नहीं कि वे कम कपड़ों में नजर आयेें. बल्कि अपने किरदारों की वजह से उन्होंने लड़कों पर अपनी छवि बरकरार की. और अपने इस अंदाज का जादू उन्होंने कुछ इस कदर बिखेरा कि फिल्म इश्किया की कृष्णा वर्मा से दो मर्द धोखे खा गये. लेकिन कृष्णा ने अपने मकसद के लिए उनका इस्तेमाल करने में कोई चूक नहीं बरती. अब घर के किसी कोने में उसे रोना सिसकना और आंसू निकालना मंजूर नहीं था. अपने पति की धोखेबाजी पर वह रोने की बजाय उसका खून करने से भी बाज नहीं आयी. फिल्म सात खून माफ की सुजैना को अपने सच्चे प्यार की खोज तो है लेकिन वे उनसे भी सख्त नफरत करती है जो उन्हें धोखे देते हैं. वे उन्हें अपने रास्ते से ही साफ कर देती है. कभी सड़कों पर गलियों के लड़कों के छेड़ने की वजह से डर कर सहम जानेवाली अचानक टॉम ब्वॉय के रूप में सामने है. महिला पात्र की महत्वपूर्ण फिल्मों में अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो, दमन, दामुल, मृत्युदंड, रुदाली, प्रोवोक्ड, अस्तित्व, चमेली, चांदनी बार जैसी फिल्में भी प्रमुख रही हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तनु वेड्स मनु की तनुजा साफ कहती है कि दिल्ली में पढाई इसलिए नहीं कि पापा जहां कहेंगे वहां शादी कर लेंगे. उसे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है. फिर चाहे कोई भी हो. उसे यह फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कहता है या करता है. अगर उसकी इच्छा है तो वह भी लड़कों की तरह ट्रेन के गेट पर खड़े होकर सिगरेट की फूंक लगा सकती है. और भीड़ भाड़ में भी वह शराब की कश लगाने से गुरेज नहीं करती. जरूरत पड़ने पर वह खुद अभिनेता को बैक सीट पर बिठा कर खुद बाूइक भी चला सकती है. अगर इच्छा है तो वह किसी और की नौकरी करने की बजाय फिल्म बैंड बाजा बारात की श्रूति कक्कर की तरह खुद अपना बिजनेस शुरू कर सकती है. और बेहतरीन वेडिंग प्लानर बन कर भी दिखा सकती है. अब वह इतनी हिम्मत भी रखती है कि लगातार अत्याचार सहने के बाद जरूरत पड़ने पर वह अपने पति को छोड़ कर वापस आ सकती है. कभी पति ही परमेश्वर व मरते दम तक हर हाल में पति की सेवा करनेवाली स्त्री शादी के बाद ही किसी से प्यार करने की हिम्मत रखती है और खुशी खुशी वह उसके साथ घर बसाने को भी तैयार हो जाती है. फिल्म गुजारिश की सोफिया अइंततः सारे बंधन तोड़ कर ईथान के पास सिर्फ प्रेम की चाहत में ही तो आती है. दरअसल, सच्चाई यह है कि हिंदी सिनेमा जगत ने अब इतनी हिम्मत दिखानी शुरू की है कि वे महिला प्रधान फिल्में बनाने लगे हैं. उन्हें विश्वास हो गया है कि महिलाएं सिर्फ गीतों के फिल्माकंन या क्रैबे और ्ाइटम सांग के लिए नहीं बल्कि और भी कई रूपों में अपना जलवा बिखेर सकती हैं. गौरतलब है कि इसी साल 7 जनवरी को सिल्वर स्क्रीन पर एक साथ दो महिला प्रधान फिल्में रिलीज हुईं, नो वन किल्ड जेसिका और विकल्प. नो वन किल्ड में रानी व विद्या ने सशक्त भूमिका निभायी और फिल्म हिट भी हुई. लोगों ने इसे खूब सराहा. फिल्म विकल्प में एक ऐसी अनाथ लड़की की कहानी का सफर दिखाया गया जिसमें वह टैलेंटेड होने की वजह से बुरे लोगों के चंगुल में फंस जाती है . लेकिन फिर अपने दिमाग के दम पर वह खुद को उससे निकालने में भी कामयाब होती है. यह महिला किरदार का ही जलवा होता है जो फिल्म फैशन के माध्यम से मधुर भंडारकर व प्रियंका चोपड़ा को राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करा देता है. जरूरत पड़ने पर वह बिंदास गालियां देने से भी नहीं झिझकती. गौर करें तो धीरे धीरे फिल्मों की नायिकाओं की बोल्डनेस की वजह से ही आम महिलाओं ने भी झिझक तोड़ी है. अब वह कॉलेज व राह चलते लड़कों के अक्ल ठिकाने लगाने से गुरेज नहीं करती. वे अब प्यार सिर्फ इमोशन के आधार पर नहीं बल्कि यह देख कर करती है कि वह लड़का उसे कितनी आजादी देगा. फिल्म तनु वेड्स मनु में एक दृश्य में तनु इस बात का जिक्र करती है कि मनु इसलिए अच्छा है कि क्योंकि वह उसकी आजादी छिनने की कोशिश नहीं करता. जब री मेट की गीत भी अपने प्यार को पाने के लिए पहले घर से भागती है. फिर वापस आती है और फिर जब उसे दूसरे से प्यार हो जाता है वह फिर से उससे शादी करने के लिए रजामंदी हासिल कर लेती है. अब की महिला पात्र अपने परिवार को अपने पसंद के लिए रजांमंद कर लेती है. उसे अब बंदूक की गोलियां नहीं, जेम्स की गोलियां चाहिए. चॉकलेट के पैक्ट्स चाहिए. दरअसल, आज की महिलाएं कुछ सबसे अहम चाहती हैं तो वह है आजादी. चूंकि वह जानती हैं कि बेड़ियां हटा दी जायें तो वह कमाल दिखा सकती हैं इसलिए उन्हें आजादी चाहिए, आत्मनिर्भरता चाहिए और इसी के बल पर वह आगे बढ़ेगी. सबसे अहम जो बार गौर करने की है वह यही है कि अब निदर्ेशकों ने महिला पात्रों को भी लड़कों की तरह ही सिर्फ कपड़ों में नहीं नजरिये में व उनके संवादों में आजादी प्रदान की है.

20110301

रील लाइफ पर हमेशा नजर आता रहा है खिलाड़ियों और उनके पिता का द्वंद्व


हिंदी सिनेमा जगत में अब तक जितनी भी फिल्में खेल को आधार मान कर बनाई जाती रही हैं या बन रही हैं, इन सभी फिल्मों में एक बात समान है वह है हर खिलाड़ी के किरदार निभानेवाले अभिनेता अभिनेत्री को अपने परिवार व पिता का विरोध झेलना पड़ा है.

हर तरफ वर्ल्ड कप का माहौल है. टीम इंडिया पूरे जोश में है. लेकिन दबाव बेहद है कि वे मैच जीत पायेंगे या नहीं. चूंकि पूरे देश ने वर्ल्ड कप पर निगाहें लगा रखी है उन्हें वर्ल्ड कप जरूर चाहिए. हम खेल के प्रशंसक कई बार यह भूल जाते हैं कि कितनी परेशानियों के बाद कोई खिलाड़ी उस काबिल बनता है कि वह वर्ल्ड कप खेल पाता है. दरअसल, सच यह है कि हमारे देश में खेल का करियर एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे हमेशा विकल्प के रूप में देखा गया है न कि मुख्य करियर के रूप में. बॉलीवुड में कई बार इस विषय पर फिल्में भी बनायी गयी है. अगर आप गौर करें तो अब तक जितनी भी फिल्में बॉलीवुड में बनी हैं. खेल पर आधारित. सभी फिल्मों में खिलाड़ी अभिनेता या अभिनेत्री के परिवारवाले उन्हें खेलते नहीं बल्कि आइएस, कोई बिजनेस या फिर लड़की हो तो उनकी शादी कर देना चाहते हैं. उन्हें हमेशा यही महसूस होता है कि खेल(स्पोट्र्स) किसी का भी करियर नहीं हो सकता. वह सिर्फ शौक मात्र है. हो सकता है कि ऐसी कई वास्तविक कहानी हमारे कई खिलाड़ियों की जिंदगी से जुड़ी हो. अगर हिंदी सिनेमा में अब तक की खेल पर आधारित फिल्मों पर गौर करें तो हर फिल्म में शुरुआती दौर में खिलाड़ी के पिता का उसके खेले जाने का विरोध ही नजर आता है. फिर चाहे हाल ही में रिलीज हुई फिल्म पटियाला हाउस हो, या फिर बेंड इट लाइक बेकहम हो. आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है. वजह है कि अनिश्चिता, करियर में हार जाने का डर या फिर अगर वे खुद हार गये हैं तो कभी भी अपने बेटे या बच्चों को उस फील्ड पर हारते नहीं देखना चाहते. कभी जिस मैदान से उन्हें बेहद प्यार था. वे अचानक खत्म हो जाता है. इस डर की वजह यह भी हो सकती है कि हमारे देश में खेल को किसी जंग से कम नहीं आका जाता. जब हम किसी टीम के खिलाफ खेल रहे होते हैं तो हम दरअसल, खेल नहीं जंग कर रहे होते हैं. हमारे देश में लोगों की सोच कुछ ऐसी ही है. अगर हार गये तो फिर वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहते. उन पर सिर्फ और सिर्फ छींटाकशी की बारिश होती है और कुछ नहीं. इसका जीता जागता स्वरूप हमने चक दे इंडिया में देखा है. जिसमें खिलाड़ी कबीर खान के हार जाने के बाद उन्हें यह जिल्लत सहनी पड़ती है कि वे जान बूझ कर हार गया. फिर उसी जिद्द में उसे अपने आप को बेगुनाह साबित करने के लिए फिर से खुद को तैयार करना पड़ता है और फिर जीतने पे के बाद ही उसकी बेगुनाही साबित होती है. अन्यथा वह गद्दार घोषित हो जाता है. हमारे देश में आज तक खेल को खेल की दृष्टि नहीं देखा गया. शायद यही वजह है कि खिलाड़ियों पर हमेशा दबाव बना रहता है. हालांकि फिल्मों के माध्यम से खेल के कई प्रारूपों को प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है और साथ ही अपने परिवार से जूझते खिलाड़ियों की मनसा का भी सही चित्रण किया गया है. दरअसल, खेल एक ऐसा खेल है जिसमें वाकई आखिरी वक्त पर कुछ भी हो सकता है. सबकुछ लाइव है. शायद यही वजह है कि फिल्मकारों को बार-बार इस पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित करता है.

बेंड इट लाइक बेकहम

गुरविंदर चड़्ड़ा की बेहतरीन फिल्म बेंड इट लाइक बेकहम की नायिका बेकहम की फैन है और वह बेहतरीन फुटबॉल खेलती है. अपने परिवार से छुप छुप कर वह खेलती है. लेकिन उसके परिवार. पंजाबी परिवार बिल्कुल उसे खेलने की इजाजत नहीं देता. वह चाहता है कि वह शादी कर ले. चूंकि खेल कोई क्षेत्र नहीं है. अनुपम खेर ने फिल्म में एक विरोधी पिता की शानदार भूमिका निभाई है.

पटियाला हाउस

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म पटियाला हाउस में गट्टू इंग्लैंड के लिए नहीं खेलेगा. बाबूजी ने यह फरमान सुना दिया और गट्टू ने खेलना भी छोड़ दिया. कई वर्षों तक इस फरमान की वजह से गट्टू खेल से दूर रहा. लेकिन अंततः अपने पिता के विरोध के बावजूद वह खेला और जीत भी हासिल की. पूरी फिल्म में पिता और बेटे के खेल को लेकर द्वंद्व नजर आता रहा.

इकबाल

एक गूंगे व बहरे खिलाड़ी के रूप में श्रेयस तलपड़े ने शानदार अभिनय किया था. वह गूंगा था. बहरा था. लेकिन अच्छा क्रिकेट खेलता था. लेकिन इसके बावजूद उसके साथ उसके कोच ने नाइंसाफी की. फिर इकबाल ने दोबारा सिखना शुरू किया. इस बार कोच के रूप में नसीरुद्दीन शाह मिले और वह खेलता गया. इस फिल्म में लगातार इकबाल प्रैक्टिस करता. अपने पिता से छुप छुप कर. बाद में पिता उसके क्रिकेट स्नेह को समझते हैं और फिर उसका हौंसला बढ़ाते हैं.

विक्टरी

फिल्म विक्टरी में भी हरमन बावेजा के पिता नहीं चाहते थे कि वह खेल के क्षेत्र में जाये. फिर बाद में वह अनुमति दे देते हैं.