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20111229

television

कौन बनेगा करोड़पति को पहले से ही ऐतिहासिक शो की उपाधि हासिल थी. लेकिन वर्ष 2011 में केबीसी के पांचवें संस्करण ने इसे आमलोगों के जोड़ कर साथ ही अमिताभ बच्चन के रूप में शो के होस्ट को प्रस्तुत कर टेलीविजन में नया इतिहास रचा. और वर्ष 2011 का सबसे लोकप्रिय शो बना केबीसी. इसके साथ टेलीविजन पर कई पुराने फॉरमेट बदले. नये चेहरे शामिल हुए. कुछ पुराने चेहरे बरकरार रहे. तो कुछ को दर्शकों ने नापसंद किया.
1.हिंदुस्तान को महसूस किया ः कौन बनेगा करोड़पति
अमिताभ बच्चन व शो कौन बनेगा करोड़पति एक दूसरे से पूरक रहे हैं. लेकिन इस बार इसे खास बना दिया आम लोगों ने भी. पंचकोटि महामनी के साथ प्रसारित होनेवाला केबीसी का पांचवां संस्करण शहरों के साथ साथ गांव की गलियों तक भी जा पहुंचा और खोज निकाला मोतिहारी जैसे आम स्थान से सुशील कुमार के रूप में हीरा. टेलीविजन के इतिहास में पहली बार किसी शो में पांच करोड़ की राशि किसी आम इंसान ने जीती. शो में इस बार गरीब परिवार से संबंध्द रखनेवाले प्रतिभागियों को शामिल किया गया. इस शो का प्रसारण जब तक हुआ सोनीटीवी को सर्वाधिक टीआरपी मिली. अपने पांचों संस्करण में इस बार केबीसी ने सर्वाधिक लोकप्रियता हासिल की.
2.नये चैनल लांच
इस वर्ष टेलीविजन पर कई नये चैनल की शुरुआत हुई जिनमें संजीव कपूर का फूड फूड चैनल 24 घंटे व्यंजन पर आधारित पहला भारतीय चैनल बना. इसके अलावा हाल ही में स्टार गुप्र ने लाइफ ओके नामक चैनल की शुरुआत की. यूटीवी ने अपने नये चैनल यूटीवी स्टार्स की शुरुआत की. इस चैनल के कई शो बेहद पसंद किये जा रहे हैं, जिनमें लव, अप, क्लोज,अप प्रमुख हैं. इनके अलावा सोनी टीवी ने सोनी पिक्स नामक संगीत पर आधारित चैनल की शुरुआत की.
3.सेलीब्रिटिज का रहा आना जाना
इस वर्ष पिछले साल की तुलना में बॉलीवुड के सेलिब्रिटिज टीवी पर सबसे अधिक नजर आये. जिनमें प्रीति जिंटा गिनीस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड लेकर आयीं. संजय दत्त सलमान के साथ बिग बॉस 5 में नजर आये. आमिर खान ने टेलीविजन पर नयी शुरुआत की घोषणा की. रितिक रोशन जस्ट डांस के जज बने. प्रीति ने ही यूटीवी स्टार्स के लिए शो होस्ट किया, जो बेहद पसंद भी किया गया. माधुरी दीक्षित झलक दिखला जा में नजर आयीं. इनके अलारा अपनी फिल्मों के प्रोमोशन के लिए भी सितारों ने टेलीविजन के शोज में आगमन किया. जिनमें सबसे अधिक सेलिब्रिटिज सब टीवी के शो तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सेट पर आये.
4. लव टू हेट यू
स्टार वर्ल्ड ने पहली बार एक ऐसे शो की शुरुआत की, जिसमें एक सेलिब्रिटी के सामने उनके प्रशंसक जो चाहे सवाल पूछ सकते हैं और साथ ही वे उनसे वे सवाल भी पूछ सकते हैं. जिन पर उन्हें गुस्सा आता हो. इस शो के फॉरमेट के अनुसार उन लोगों को शो में शामिल किया जायेगा जो किसी पर्सनैलिटी को किसी विशेष कारण की वजह से न पसंद करते हैं.
5.सच का सामना-2
स्टार प्लस का सबसे लोकप्रिय रियलिटी शो सच का सामना फिर से दर्शकों के साथ रूबरू है. और इस बार सच का सामना भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम पर है. दर्शकों को दोबारा लुभाने में यह शो भी कामयाब हो रहा है.
6.प्यार की उम्र नहीं होती
वर्ष 2011 में वाकई टेलीविजन ने साबित कर दिया कि प्यार उम्र देख कर या उम्र की वजह से नहीं रुक सकती. मसलन वर्ष 2011 में टेलीविजन पर कई परिपक्व लव स्टोरीज की शुरुआत की गयी और दर्शकों द्वारा इसे लोकप्रियता भी मिली. इनमें शो बड़े अच्छे लगते हैं, कुछ तो लोग कहेंगे, दीया और बाती जैसे शो प्रमुख रहे.
7. बासीपन मंजूर नहीं
बिग बॉस हमेशा टेलीविजन का लोकप्रिय शो रहा. लेकिन एक ही फॉरमेट पर प्रसारित होनेवाले इस धारावाहिक को दर्शकों ने इस बार नकार दिया. तमाम मशक्कतों व विवादित सेलिब्रिटिज के आने के बावजूद शो को टीआरपी नहीं मिली.
8. आइएस बनतीं लड़कियों की कहानी
वर्ष 2011 के कई धारावाहिकों ने महिला शिक्षा को प्राथमिकता दी, जिनमें खासतौर से आइएस बनने के ख्वाब सजाती लड़कियों की कहानी को उकेरा गया. जीटीवी के शो अफसर बिटिया व स्टार प्लस के शो दीया और बाती हम, आ रही है सांची ऐसे ही कुछ धारावाहिक हैं. साथ ही बालिका वधू व पवित्र रिश्ता के कई एपिसोड के माध्यम से महिला शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश की गयी.इनके अलावा शोभा सोमनाथ की व वीर शिवाजी जैसे धारावाहिकों के माध्यम से ऐतिहासिक कहानियों को भी परदे पर फिर से दोहराने की पहल हुई. सहारा वन पर चंद्रकांता की भी शुरुआत हुई.
9. पुराने चेहरों की शानदार वापसी
वर्ष 2011 में कई ऐसे चेहरों की दोबारा वापसी हुई, जो कई सालों से परदे से गायब थे. और उनकी यह वापसी शानदार तरीके से हुई. लोकप्रिय अभिनेता राम कपूर व सांक्षी तंवर को बड़े अच्छे लगते हैं शो के माध्यम से बेहद पसंद किया जा रहा है. दर्शक दोबारा रात 10.30 बजने का इंतजार करने लगे हैं. इनके अलावा मोहनिश बहल की वापसी शो कुछ तो लोग कहेंगे से हुई. समीर सोनी ने परिचय से वापसी की है. यह सभी किरदार पसंद किये जा रहे हैं. शाहबाज खान ने देखा एक ख्वाब से वापसी की है.

10. रियलिटी शो जीरो
इस वर्ष कई सालों के बाद रियलिटी शो से दर्शकों ने मुंह मोड़ा. इसकी वजह से कई रियलिटी शोज खास पसंद नहीं किये गये. हालांकि स्टार प्लस के शो जस्ट डांस को अच्छी लोकप्रियता मिली. लेकिन इंडिया गॉट टैलेंट, अमुल छोटे उस्ताद जैसे शो पहले जैसी प्रतिक्रिया नहीं मिली
11.वास्तविक कहानियां
इस वर्ष कलर्स चैनल द्वारा दो सच्ची घटनाओं पर आधारित शो का प्रसारण किया गया. जिनमें फुलवा व हवन प्रमुख रहे. फुलवा फूलन देवी की जीवनी पर आधारित कहानी है. वही हवन में ढोंगी बाबा की सच्चाई को दर्शाया जा रहा है.
बॉक्स में ः
नये चेहरों को भी मिली सराहना
हर वर्ष की तुलना में इस वर्ष कई नये चेहरों को दर्शकों से सराहना मिली जिनमें दीया और बाती के किरदार सूरज-संध्या, एक हजारों में मेरी बहना है की जान्वी और मांडवी व इस प्यार को क्या नाम दूं की जोड़ियों को बेहद पसंद किया गया.
बरकरार रहे जो चेहरे, जोड़ियां
टेलीविजन की ऐसी भी कई जोड़ियां रहीं, जिन्हें दर्शकों ने पसंद किया. और उनकी लोकप्रियता बरकरार रही. इनमें साथ निभाना साथिया की जोड़ियां, गौरी -जगदीश, तेज-टोस्टी, सुहाना-ईशान की जोड़ी को बेहद पसंद किया गया.

कमाल कलम का



रॉकस्टार के जॉर्डन ने रॉक किया तो डर्टी पिक्चर की सिल्क ने सबको चौंकाया. दरअसल, वर्ष 2011 हिंदी सिनेमा के लिए कल्पनशीलता का साल रहा. जिसने भी क्रियेटिवीटी दिखायी. वही चहेते बने. ऐसा कई सालों के बाद हुआ जब केवल फिल्मों के कलाकारों को ही सुपरस्टार की उपाधि नहीं दी गयी, बल्कि उन सभी को ख्याति मिली. पहचान मिली. सराहना मिली. जो इसके योग्य थे. और इस क्रम में सबसे अधिक तवज्जो मिली उन सभी को जिनके कलम ने कमाल दिखाया. फिर चाहे वह गीतकार के रूप में हो या फिर लेखक के रूप में. इस वर्ष कई नयी प्रतिभाओं को मौके मिले तो साथ ही साथ पहले से सक्रिय रहे लेखकों को भी अपनी वास्तविक पहचान हासिल करने में सफलता मिली. कह सकते हैं कि इस वर्ष असल सुपरस्टार तो फिल्म की कहानियां, उसके किरदार व गीत रहे.
1. जेसिका के साथ न्याय ः राजकुमार गुप्ता
बॉलीवुड के वर्ष 2011 की सबसे अच्छी शुरुआत हुई निदर्ेशक राजकुमार गुप्ता की फिल्म नो वन किल्ड जेसिका से. जेसिका लाल हत्याकांड पर जहां वर्षों से लोगों का ध्यान नहीं गया था. दोबारा राजकुमार ने अपनी कहानी के माध्यम से लोगों के सामने जेसिका की कहानी कही. निदर्ेशन के साथ साथ राजकुमार ने फिल्म की कहानी लिखने की जिम्मेदारी पूरी की व जेसिका लाल हत्याकांड से जुड़े सभी अहम पहलुओं को खूबसूरती से उभारा. सबरीना के किरदार में विद्या व मीरा के किरदार में रानी को खूब सराहना मिली. महिला प्रधान फिल्मों में नो वन वर्ष की पहली व सफलतम फिल्मों में से एक रही.
2. राज शेखरः रंगरेज मेरे...
फिल्म तनु वेड्स मनु से दर्शकों को खास उम्मीद नहीं थी. लेकिन फिल्म के रिलीज होने के साथ साथ दर्शकों को तनु और मनु से तो प्यार हुआ ही. साथ ही फिल्म के गीतों ने भी दर्शकों के दिलों में जगह बनायी. पूरे वर्ष फिल्म के गीत दर्शकों की जुबां पर रहे. खासतौर से रंगरेज मेरे... व कितने दफे...गीत की लोकप्रियता के साथ ही नवोदित गीतकार के रूप में राज शेखर ने अच्छी शुरुआत की. राज के गीतों को वडाली ब्रदर्स जैसे दिग्गजों ने आवाज देकर गीत की गरिमा और बढ़ा दी. इस वर्ष के लोकप्रिय फिल्मी गीतों के एल्बम में तनु वेड्स मनु को भी बेहद पसंद किया गया.
3.हिमांशु शर्मा ः तनु-मनु की शादी हुई सफल
यह एक रिस्क था. चूंकि सभी जानते थे कि वर्ल्ड कप के दौरान रिलीज हुई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं दिखा पाती. लेकिन यह फिल्म के लेखक हिंमाशु शर्मा का ही कमाल था, जिन्होंने तनु और मनु की शादी में शामिल होने के लिए दर्शकों को मजबूर ही कर दिया. मुंबई से दूर कानपुर, लखनऊ, दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आधारित प्रेम व शादी के विषय को खूबसूरती से पिरोया हिमांशु ने. नतीजन वर्ष 2011 में दर्शकों ने तनु मनु की शादी में खूब एंजॉय किया.

4. इरशाद कामिल ः कुन फाया कुन...
इम्तियाज अली की फिल्म रॉकस्टार के गीतों ने खूब धमाल मचाया. फिल्म के गीत कुन फाया कुन, साडा हक्क, राजा रानी...सभी गीतों के शब्द दर्शकों की जेहन में बस गये. वजह यह थी कि फिल्म के गीतकार इरशाद कामिल उन्हीं शब्दों को चुना, जो बेहद भावपूर्ण थे. सभी गाने एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक से थे. कह सकते हैं कि हर गीत खुद में एक कहानी बयां कर रहे थे.कुन फाया कुन में दुनिया की सच्चाई नजर आयी तो साडा हक्क में युवाओं की तड़प, कत्या करूं में एक औरत की व्यथा तो राजा रानी में दो प्रेमियों का प्यार, बर्बाद करे अल्फाज में एक प्रेमी की बेबसी. इरशाद के गीतों ने फिल्म के किरदार जॉर्डन को निखारने में बेहद मदद की. लेखक के साथ साथ वे भी बधाई के पात्र हैं. हालांकि इरशाद ने इससे पहले भी कई फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं. लेकिन रॉकस्टार से उन्हें खास पहचान मिली है.

5.तिंग्माशु धुलिया- संजय चौहानः साहेब, बीवी और हिट
फिल्म साहेब, बीवी और गैंगस्टर की रिलीज के साथ बॉक्स ऑफिस पर आठ फिल्में रिलीज हुई थीं. चूंकि फिल्म का खास प्रमोशन नहीं किया गया था, सो,इसके मेकर्स ने भी नहीं सोचा था कि फिल्म को दर्शकों के साथ साथ समीक्षकों द्वारा भी सराहा जायेगा. लंबे अंतराल के बाद किसी फिल्म के संवाद बेहद लोकप्रिय हुए. यह कमाल था फिल्म के निदर्ेशक तिंग्माशु धुलिया व लेखक संजय चौहान का. दोनों के सामांजस्य से बेहतरीन पटकथा तैयार हुई और वन लाइनर संवादों ने धूम मचायी. जिमी शेरगिल के करियर को फिर से इसी फिल्म ने सहारा दिया.
6. रजत अरोड़ा ः एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट ः
साल की सबसे चर्चित फिल्म द डर्टी पिक्चर की सफलता का मुख्य श्रेय जाता है फिल्म के लेखक रजत अरोड़ा. अरसे बाद किसी फिल्म के कई संवाद बेहद लोकप्रिय हुए. रजत द्वारा ही कलमबध्द गीत उ लाला... साल के लोकप्रिय गीतों में शीर्ष पर है. खुद विद्या ने माना कि फिल्म की कामयाबी के असली हकदार रजत अरोड़ा भी हैं. रजत ने सिल्क के किरदार के मुताबिक पूरी फिल्म की कहानी गढ़ी. बिना किसी अपशब्दों का इस्तेमाल किये उन्होंने बोल्ड फिल्म लिखी. रजत ने इस फिल्म के कहानी के माध्यम से हिंदी सिनेमा में महिलाओं पर आधारित बोल्ड विषयों पर फिल्में बनाने की दिशा दी.
7. असली रॉकस्टार ः इम्तियाज अली
प्रेम कहानियों को अलग ही दृष्टिकोण देनेवाले इम्तियाज इस बार भी प्रेम कहानी ही लेकर आये. लेकिन इस बार प्रेम कहानी के अंत ने सबको झकझोर कर रख दिया. एक आम युवा की रॉकस्टार बनने के सफर में प्रेम व दर्द की अहम भूमिका को बेहतरीन ढंग से दर्शाया इम्तियाज ने. नतीजन जॉर्डन वर्तमान युवा पीढ़ी के नये आयकन के रूप में उभर कर सामने आया.
8. दिल को कर दिया पैंचर ः अक्षत वर्मा
तमाम विवादों के बावजूद अक्षत फिल्म डेली बेली की पटकथा से युवा दर्शकों को आकर्षित करने या यूं कहें चौंकाने में कामयाब रहे. लेखक अक्षत ने परंपरागत किरदारों को नये लुक के साथ नयी भाषा दी. और वे युवा दर्शकों को लुभाने में कामयाब भी रहे. शहरी युवाओं को ध्यान में रख कर बनाई गयी फिल्म को छोटे शहरों के युवाओं ने भी पसंद की.
9. ईमानदार व नेक संदेशवाहक ः विकास बहल-नितेश तिवारी
बड़े व गंभीर संदेश को बच्चों के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाती फिल्म चिल्लर पार्टी एक ईमानदार व नेक फिल्म है. फिल्म के लेखक विकास बहल व नितेश तिवारी ने बच्चों पर आधारित अलग तरह की फिल्म का निर्माण किया. जिसमें मस्ती भी थी. एक गंभीर मुद्दा भी. और उसके उपाय भी.
10.युवा लड़कों के पंचिंग स्टारः लव रंजन
इस वर्ष युवा लड़कों की सबसे पसंदीदा फिल्म रही प्यार का पंचनामा. फिल्म के वे दृश्य सबसे अधिक लोकप्रिय हुए. जहां अपनी प्रेमिका से तंग आ चुका प्रेमी अपने पूरे संवाद में लड़कियों के व्यक्तित्व की गाथा गाता है. उस खास दृश्य से कई युवा प्रभावित हुए. टूंकि उनमें केवल लड़कियों की खामियां निकाली गयी हैं. यूटयूब में वह खास दृश्य बार बार देखे गये.
11. साली से भाग डीके तक...अमिताभ भट्टाचार्य
साल के शुरुआत में ही नो वन किल्ड जेसिका के गानों ने धमाल मचाया. नो वन के गीत आली रे साली रे से लेकर फिल्म डेली बेली के गीत भाग डीके बोस जैसे शब्दों को रचने के कारण अमिताभ भट्टाचार्य पर कई तरह के प्रश्न चिन्ह लगाये गये. लेकिन इसके बावजूद साल के सबसे लोकप्रिय गीतों की फेहरिस्त इनके नाम ही रही. मटन सांग.., इंडी की कंडी जैसे गीत भी बेहद लोकप्रिय रहे.
सोयेब मंसूर के बोल
वर्ष 2011 की बेहतरीन फिल्मों की कहानी में फिल्म बोल का नाम गिना जाना भी बेहद जरूरी है. फिल्म लाहौर के निम्न मीडिल क्लास परिवार की कहानी पर आधारित. महिलाओं से संबंधित विषयों को भी प्राथमिकता से दर्शाने की कोशिश की. खासतौर से लिंग भेद के मुद्दे को गंभीरता व बारीकि से दर्शाने की कोशिश में सोयेब मंसूर की फिल्म बोल महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है.


किरदार के करामात
वर्ष 2011 में सुपरस्टार या किसी अभिनेत्री से अधिक तवज्जो मिली किरदारों को. फिर चाहे वह किरदार मुख्य भूमिका निभा रहा हो या फिर सहयोगी कलाकार. लेखक के गढ़े जो भी किरदारों ने लीक से हट कर अभिनय किया. वे दर्शकों के चहेते बन गये.
मीरा( नो वन किल्ड जेसिका)
नो वन किल्ड जेसिका की किरदार मीरा को दर्शकों ने बेहद पसंद किया. रानी मुखर्जी ने फिल्म में एक बिंदास पत्रकार की भूमिका निभायी थी. दर्शकों को रानी इस रूप में खूब जंची.
जॉर्डन-हीर,( रॉकस्टार)
फिल्म रॉकस्टार में जर्नाधन जाकड़ से जॉर्डन में तब्दील हुए रणबीर व हीर के रूप में नरगिस फकड़ी का किरदार बेहद पसंद आया. खासतौर से जंगली जवानी व आ गंध मचायेंगे बोलते जॉर्डन व हीर के साथ दर्शकों ने भरपूर मनोरंजन किया
सिल्क( डर्टी पिक्चर्स)
साल की सबसे चर्चित व लोकप्रिय किरदार बनी फिल्म द डर्टी पिक्चर की सिल्क. सिल्क के रूप में विद्या ने अपने बोल्ड, बेबाक अंदाज से सबको चौंकाया.
सुजाना( 7 खून माफ)
अपने रास्ते से हर कांटे को बड़ी ही चालाकी से मिटाती फिल्म 7 खून माफ की सूजाना उस दर्शक वर्ग की पसंदीदा किरदार बनी, जो जूल्म सहने नहीं जूल्म का मुंह तोड़ जराब देने में भरोसा करते हैं
पप्पी, तनु, मनु( तनु वेड्स मनु)
फिल्म तनु वेड्स मनु में तनु के रूप में कंगना का बिंदास पियक्कड़ अंदाज लोगों को पसंद आया तो मनु की सादगी. लेकिन लोगों के सबसे चहेते बने पप्पी के रूप में दीपक डोबरियाल, जो सहयोगी कलाकार होने के बावजूद दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब रहे.
रागिनी( रागिनी एमएमएस)
रागिनी एमएमएस की रागिनी यानी केनाज ने लोगों को खूब डराया. साल भर इस किरदार की चर्चा रही.
स्टैनली( स्टैनली का डब्बा )
स्टैनली का डब्बा के स्टैनली के रूप में पार्थो गुप्ते के किरदार को खूब सराहना मिली. दर्शकों को स्टैनली के मासूमियत से प्यार हो गया.
चिल्लर पार्टी गैंग (चिल्लर पार्टी)
फिल्म चिल्लर पार्टी की गैंग जंझिया, फटका, साइलेंसर, इनसाइक्लोपिडिया, अकरम, अफलातून इत्यादि सभी किरदार बच्चों के साथ साथ बड़ों के भी फेवरिट बने.
लवली सिंह (बॉडीगार्ड)
लवली सिंह रिपोर्टिंग सर ...कहनेवाले लवली सिंह के रूप में सलमान खान ने एक बार फिर अपनी दबंगई दिखायी. खासतौर से बच्चों के पसंदीदा किरदार बना बॉडीगार्ड
रा.वन, जी.वन
वीडियो गेम पसंद करनेवाले बच्चों का फेवरिट किरदार रहे फिल्म रा.वन के किरदार रा.वन और जी.वन.
बाजीराव सिंघम( सिंघम)
पुलिस वर्दी से प्यार करनेवाले और ईमानदारी से काम करनेवाले दर्शकों के पसंदीदा किरदार बने सिंघम के बाजीराव सिंघम
सेनोरिटा( जिंदगी मिलेगी न दोबारा)
जिंदगी न मिलेगी दोबारा में सेनोरिटा एक गाने में इस्तेमाल किया गया शब्द था. लेकिन दर्शकों ने फिल्म की नायिका कट्रीना को सनोरिटा की उपाधि से नवाजा. और इस तरह यह किरदार भी बेहद चर्चित रहा.
धुनकी( मेरे ब्रदर की दुल्हन
फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन में अलग तेवर में नजर आयीं कट्रीना को फिल्म के प्रशंसकों ने धुनकी के नाम की उपाधि दी.
खलनायकों के किरदारों में दर्शकों को मर्डर 2 के धीरज पांडे उर्फ प्रशांत नारायण का किरदार बेहद प्रभावशाली लगा. साथ ही सिंघम व बुङ्ढा होगा तेरा बाप के प्रकाश राव के किरदार पसंद आये.

श्रेया घोषाल ः प्रेम कहानी से चिकनी चमेली तक
वर्ष 2011 में सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज देने का श्रेय श्रेया घोषाल को जाता है. इस वर्ष उन्होंने सबसे अधिक गीत गाये और वे लोकप्रिय भी रहे, जिनमें उलाला... के साथ साथ तेरी मेरी प्रेम कहानी...ओ सायेबो और हाल ही रिलीज हुए गीत चिकनी चमेली गीत भी शामिल है.

युवाओं के आदर्श क्यों हैं अनुराग कश्यप




ेमुंबई के वर्सोवा इलाके में आरामनगर में एक गैरेज से मिलती जुलती छोटी सी जगह है. अगर आप यह सोच कर चलें कि उस इलाके के किसी व्यक्ति से पूछने पर आप उस जगह को आसानी से तलाश सकते हैं, तब भी आपको वहां पहुंचने में परेशानी होगी.और अगर पहुंच भी जायें तो वहां की माहौल को देख कर अनुमान नहीं लगा सकते कि उस छोटी सी जगह पर बैठ कर ही देवडी, शैतान, गैंंग ऑफ वसीपुर जैसी फिल्मों की नींव रखी जाती है. पहुंचने पर आप और भी चकित रह जायेंगे. दरवाजे पर पहुंचते ही अगर आपने बोर्ड पर लिखी चेतावनी नहीं पढ़ी, तो निश्चित तौर पर आप गिर सकते हैं. यह पूरा दृश्य लीक से हटकर इंडस्ट्री में अपनी पहचान स्थापित करनेवाले निदर्ेशक अनुराग कश्यप के दफ्तर का है. यहां उनके ऑफिस का विवरण देना लाजिमी इसलिए है, चूंकि वाकई अनुराग जिस प्रवृति के निदर्ेशक हैं. उनके दफ्तर का माहौल भी उनके व्यक्तित्व की झलक दे जाता है. प्रवेश द्वार पर लिखी यह चेतावनी कि संभल कर चलें, वरना आगे ठोकर है. दरअसल, अनुराग कश्यप की अलग व अनोखी दुनिया की एक छवि प्रस्तुत करता है. एक ऐसी दुनिया की झलक जहां अगर आपने खुद सतर्कता नहीं बरती. तो ठोकर लगना लाजिमी है. उनके दरवाजे पर लिखी गयी चेतावनी के माध्यम से शायद अनुराग सजग करना चाहते हैं कि वाकई अगर आप ध्यान से आगे नहीं बढ़े तो आप ठोकर खाकर गिर सकते हैं. जहां मुंबई के हर बड़े निदर्ेशक अंधेरी के पॉश इलाकों में वेल फर्निस्ड स्थानों पर अपने दफ्तर का संचालन करते हैं. वही अनुराग गैरेज सी दिखनेवाली जगह का भी सही इस्तेमाल कर रहे हैं. उनका यह व्यक्तित्व व जिंदगी के प्रति उनकी वास्तविकता उनकी फिल्मों में नजर आता है. यही वजह है कि उनकी फिल्में दिखावटी नहीं होती. उनके किरदार भारी भरकम कपड़ों में नजर नहीं आते. कामयाब होने के बाद आज बी अनुराग ने मुंबई में अपना मकान नहीं खरीदा. जबकि यह सपना मुंबई आये हर व्यक्ति का होता है. इस बात पर वह अपनी बेबाक राय देते हैं कि उन्हें फिल्में बनाना है. वही उनका सपना है.अलग तरह की फिल्में. औरों से अलग और अन्य लोगों को भी मौके दिलाने हैं. वे साफ कहते हैं कि घर नहीं खरीद सकता. फिर फिल्में नहीं बना पाऊंगा. उन्हें अपने दोस्तों पर पूरा भरोसा है. उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर वे मेरा साथ दे देंगे. और भाई अभिनव तो ही. आर्थिक स्थिति बुरी हो जायेगी तो अभिनव साथ दे देगा. यही हैं अनुराग कश्यप. और शायद यही वजह है कि किसी फिल्मी खानदान से न होने के बावजूद उन्होंने अपनी जिद्द व जूनून से इंडस्ट्री में अपनी पहचान ही नहीं बल्कि धाक स्थापित कर ली है. वे फिल्मों में ही जीते हैं. उठते बैठते उनकी जिंदगी में फिल्में ही सबकुछ हैं. वे मीडिया से. आमलोगों से आमलोगों के बीच जाकर बात करते हैं.खासतौर से युवाओं से बात करने में उन्हें बड़ा मजा आता है. वे दो टूक बात करते हैं और दार्शनिक बातों की बजाय फिल्मी जगत की सच्चाई से लोगों को रूबरू कराते हैं. सबकुछ बेबाकी से कहते हैं. जरूरत पड़ने पर इंडस्ट्री के किसी भी व्यक्ति के हक के लिए खड़े हो जाते हैं.फिर चाहे वह उनके दोस्त विक्रमादित्य मोटवाने हों, या संजय बाजपेयी या फिर महानायक अमिताभ बच्चन के खिलाफ बयानबाजी ही क्यों न हो. वे चुप नहीं बैठते. वे निडर हैं. निर्भीक हैं. बेबाक हैं. वे बेबाकी से बिना किसी फिक्र के कहते हैं कि उनकी फिल्म की यही यूएसपी है कि उनकी फिल्म में आमिर नहीं है. कहानी है. वे कहानी को यूएसपी मानते हैं न कि किसी सितारे को. चूंकि वे जानते हैं कि उन्होंने किसी और के दम पर अपनी पहचान नहीं बनायी. देवडी, नो स्मोकिंग, ब्लैक फ्राइडे, उड़ान, दैट्स गर्ल इन यलो बुट्स जैसी प्रयोगात्मक फिल्मों का निदर्ेशन कर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे सिर्फ मसाला नहीं परोसेंगे. उन्होंने कई युवाओं को भी मौका दिया. अनुराग उन निर्माताओं में से एक हैं, जिन्हें अपनी फिल्मों के निर्माण के लिए कई निर्माताओं के दरवाजों पर नकारा जा चुका था. लेकिन अनुराग ने छोटे छोटे प्रयास कर आज अपनी वह जगह बनायी. यही वजह है कि आज वह युवा सिनेमा व युवा निदर्ेशकों के मार्गदर्शक माने जाते हैं. वर्तमान में कोई भी युवा अगर मुंबई आकर निदर्ेशक बनने का ख्वाब देखता है तो वह अनुराग कश्यप को ही अपना आदर्श मानता है. हर युवा निदर्ेशक शान से कहता है कि वह अनुराग कश्यप बनना चाहता है.इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में अनुराग जिस कदर बिना किसी पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली युवाओं को लगातार नया मंच देने की कोशिश कर रहे हैं. शायद ही कोई निदर्ेशक या निर्माता यह करने की हिम्मत रखता हो. उन्हें जब भी मौका मिलता है वे फिल्म इंस्टीटयूशन पर जाते हैं. एमटीवी पर उन्होंने अपने व्यवहारिक निदर्ेशन के अनुभवों को10 सेशन के माध्यम से सांझा किया है, जिसे हर फिल्मी विद्यार्थी को यूटयूब पर जरूर देखना चाहिए. उन्होंने तुम भी नामक संस्था का भी निर्माण किया है. जहां युवा फिल्मकारों की चयनित कहानियों को अनुराग फिल्म बनाने का मौका देंगे. इसके साथ ही हाल ही में उन्होंने अपने दोस्त विक्रमादित्य मोटवाने व विकास बहल के साथ मिल कर फानटॉम नामक कंपनी की शुरुआत की है. जिसमें युवा टैलेंट्स को मौके मिलेंगे. इतना ही नहीं अगर कोई युवा लेखक चाहे तो अपनी कहानी उनके व्यक्तिगत इमेल आइडी पर भी भेज सकते हैं. उनके यही सार्थक प्रयासों ने आज उन्हें भीड़ से अलग चेहरा बना दिया है. हर सफल व्यक्ति के पीछे उसका संघर्ष ही होता है. अनुराग इस लिहाज से अलग नहीं कि वह पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने संघर्ष से जूझते हुए मुकाम हासिल किया. लेकिन अनुराग की तरह इंडस्ट्री में कम ही लोग ऐसे हैं जो कामयाब हो जाने के बावजूद सिर्फ अपनी नहीं बल्कि समूह के बारे में सोचते हैं और नयेपन को मौके देना चाहते हैं. वह महान काम नहीं कर रहे तो कम से कम युवाओं के लिए रास्ते आसान जरूर कर रहे हैं, ताकि कम से कम औरों को उनकी तरह 17 साल का लंबा इंतजार न करना पड़े. और शायद यही वजह है कि वे इंडस्ट्री के कई लोगों के आंखों की किरकिरी हैं. चूंकि इस रूप में ही सही एक तरह की क्रांति तो ला ही दी है उन्होंने.

चलते चलते
अनुराग कश्यप की पहली फिल्म पांच आजतक रिलीज नहीं हुई. इसके बाद भी लंबे अंतराल के बाद ब्लैक फ्राइडे रिलीज हुई. उनकी फिल्में हमेशा विवादों में फंसी.
वास्तविक लोकेशन, सामान्य कैमरे व नये चेहरों, नये तकनीशियनों के साथ काम करना पसंद करते हैं अनुराग.
इम्तियाज, विक्रमादित्य, राजकुमार गुप्ता, विशाल भारद्वाज अनुराग के करीबी दोस्तों में से एक हैं.
विक्रामादित्य की फिल्म उड़ान की पटकथा बहुत साल पहले से तैयार थी. लेकिन निर्माता न मिल पाने के कारण विक्रमादित्य फिल्म नहीं बना पा रहे थे. अनुराग ने उनका साथ दिया.
शुरुआती दौर में अनुराग कश्यप ने मुंबई के फुटपाथों पर भी रात गुजार लेते थे. अभिनेता रघुवीर यादव ने उन्हें अपने घर के छत पर रहने की जगह दी थी.

20111228

लेखकों को भी अब मिलने लगी है तवज्जो ः रजत अरोड़ा



बॉलीवुड के बदलते ट्रेंड की फिल्मों में ऐसे अवसर कम ही आते हैं, जब फिल्में देखने के बाद फिल्म के संवाद लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़े. लेकिन वर्ष 2011 की सबसे चर्चित फिल्म द डर्टी पिक्चर में जितनी तारीफ विद्या बालन के अभिनय की हो रही है, उतनी ही सराहना हो रही है फिल्म के संवाद लेखक रजत अरोड़ा की भी. वन लाइनर व प्रभावशाली संवाद लिखने में माहिर रजत मानते हैं कि लेखकों के लिए यह बॉलीवुड का सबसे बेहतरीन वक्त है.
संक्षिप्त परिचय ः दिल्ली से संबध्द रखनेवाले रजत ने अब तक कई हिंदी फिल्मों के लिए बतौर संवाद लेखक व पटकथा लेखक के रूप में योगदान दिया है. जिनमें वन्स अपन अ टाइम इन मुंबई, चांदनी चौक टू चाइना, टैक्सी नंबर नौ दो ग्यारह, ब्लफमास्टर,हैट्रीक व द डर्टी पिक्चर प्रमुख हैं. रजत ने शुरुआती दौर में सीआइडी जैसे शो से शुरुआत की. उन्होंने डर्टी पिक्चर के लिए गीत भी लिखे हैं.

द डर्टी पिक्चर देखने के बाद थियेटर से बाहर निकलने के साथ लोगों की जुबां पर कई संवादों ने राज कर लिया था. अगले ही दिन फेसबुक पर कई यूजर ने डर्टी पिक्चर के संवाद को पोस्ट करना व अपना अपडेट स्टेटस बना लिया. अखबारों से लेकर, इंटरनेट, इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल, एफएम रेडियो यहां तक कि लोगों ने आपस में बातचीत के दौरान भी फिल्मों के कई लोकप्रिय संवादों को दोहराया. एक संवाद लेखक के लिए इससे बड़ी सफलता और क्या होगी. फिल्म में विद्या बालन के अभिनय के साथ हर तरफ फिल्म के संवाद लेखक रजत अरोड़ा की चर्चा हो रही थी. वजह यह थी कि कई वर्षों बाद किसी हिंदी फिल्म में एक साथ कई संवाद दर्शकों को पसंद आये. उन संवादों में चंचलता भी थी. लेकिन भावनाओं के साथ. यह बेहतरीन कमाल कर दिखाया था रजत ने. रजत ने यूं तो अब तक कई फिल्मों की कहानी लिखी थी. उन फिल्म से उन्हें सफलता भी मिली. लेकिन स्थापित डर्टी पिक्चर ने किया है. बचौर रजत मानते हैं कि यह बॉलीवुड का सबसे बेहतरीन समय है, क्योंकि अब जो काम करेगा, उसे नाम मिलेगा ही. आखिर आज लेखकों को तवज्जो दी जा रही है, तभी तो आपने मुझसे बातचीत करना मुनासिब समझा. वे बताते हैं कि वाकई डर्टी पिक्चर के लिए कहानी लिखना व संवाद लिखना एक चुनौती थी. चूंकि फिल्म के विषय के साथ इस बात का ख्याल रखना था कि फिल्म फुहड़ न हो और न ही संवाद. उन्होंने बताया कि उन्होंने डर्टी पिक्चर लिखते वक्त इस बात का पूरा ख्याल रखा कि सिल्क-सी लड़की अगर नायिका बनने का ख्वाब देखती है तो उसके रास्ते में किस किस तरह की परिस्थितियां आयी होंगी. एक लेखक होने के नाते आपको परिस्थितियां खुद सोचनी होती है. बकौल रजत मैं फिल्म की कहानी लिखते वक्त सिर्फ रिसर्च को तवज्जो नहीं देता. कहानी परिस्थिति, किरदार, उस किरदार को निभा रहे कलाकार, सबकुछ महत्व रखता है. कई बारीकियों को ध्यान में रखने के बावजूद इसके रजत बताते हैं कि फिल्म देखने के बाद कई लोगों ने कहा कि फिल्म में संवाद अश्लील थे. लेकिन गौर करनेवाली बात यह है कि इस फिल्म में बिना किसी गाली जैसे शब्द का इस्तेमाल करने के बावजूद पूरी कहानी गढ़ी गयी. रजत बताते हैं कि संवाद कहानी के किरदार और उसकी डिमांड के अनुसार ही लिखे जाते हैं. अब अगर कहानी सिल्क की है तो उसके व्यक्तित्व के अनुसार ही संवाद लिखे जाने चाहिए. सो, इसे अश्लील नहीं कहा जाना चाहिए. रजत खुश हैं कि हिंदी सिनेमा में फिर से संवादों को तवज्जो दी जा रही है. फिलवक्त रजत वन्स अपन टाइम इन मुंबई के सीक्वेल पर काम कर रहे हैं. रजत सलीम जावेद को अपना आदर्श मानते हैं.
फिल्म के लोकप्रिय संवाद
फिल्में सिर्फ तीन चीजों से चलती हैं एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट...
इतिहास गवा रहा है, मर्दों का जमाना रहा है, औरतों ने आकर आफत की है.

विश्व सिनेमा द लेडी, एक महत्वपूर्ण फिल्म




उन्होंने एक साथ बहुत कम समय व्यतीत किया.लेकिन फिर भी उन दोनों का प्यार कम न हुआ. आंग सान सुई व उनके पति मिकेल एरिस के मिलने की अवधि उनकी जुदाई से बेहद कम है. वे लगभग 17 सालों तक अलग रहे. लेकिन इसके बावजूद एरिस ने अपनी पत्नी का उनके आंदोलन में साथ दिया. लुक बसन द्वारा निदर्ेशित फिल्म द लेडी में सूई के संघर्ष व इस संपर्णवाली प्रेम कहानी की वास्तविक झलक नजर आती है. अनुप्रिया की रिपोर्ट

वर्ष 1989 में आंग सान सुई ने सूरज नहीं देखा . चूंकि उन्हें नजरबंद कर लिया गया था. उन्हें वर्ष 1990 के चुनाव के दौरान नजरबंद किया गया था. चूंकि उन्होंने सच्चाई के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन छेड़ा था. उन्होंने अपने बलबुते अपने देश में ऐसी क्रांति लायी, कि पूरी दुनिया के लिए वह आदर्श बनी.लुक बसन की फिल्म द लेडी हर लिहाज से एक महत्वपूर्ण फिल्म है. चूंकि इस फिल्म में इस महान क्रांतिकारी महिला की जीवनी के साथ साथ उनके पति मिकेल एरिस के प्रेम समर्पण की गाथा को वास्तविक प्रस्तुति दी गयी है. जिस वक्त आंग को गिरफ्तार किया गया था. उस वक्त से लेकर कई सालों तक उनके पति एरिस ने मरते दम तक उनका साथ दिया. फिल्म द लेडी में आंग के जीवन को चरितार्थ करने में अभिनेत्री मिकेल पूरी तरह कामयाब हुई हैं. खुद मिकेल योह बताती हैं कि उन्हें जब इस फिल्म की स्क्रिप्ट मुझे मिली थी. उस वक्त उन्हें सूई के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. लेकिन धीरे धीरे जब उन्होंने सूई के बारे में जानना शुरू किया. उन्हें महसूस हुआ कि एक महिला होने के बावजूद सूई ने कितनी बड़ी कुर्बानी दी. उस वक्त ही उन्होंने तय किया कि वह फिल्म जरूर करेंगी. इस फिल्म में न सिर्फ चेहरे से बल्कि चेहरे के भाव से भी मिकेल ने इस किरदार को पूरी तरह जिया है. फिल्म में परत दर परत आंग के जीवन की पूरी गाथा खुलती जाती है. फिल्म में मुख्यतः सूई व उनके पति की समर्पित प्रेम कहानी पर भी प्रकाश डाला गया है. जिसमें यह दर्शाने की कोशिश की गयी है कि दूर रह कर भी दोनों का प्यार कम न हुआ. शादी के कुछ सालों बाद ही आंग ने आंदोलन को अपनी जिंदगी बना ली. ऐसे में उनके पति ने ही इनके बच्चों का ख्याल रखा. गिरफ्तारी के दौरान 10 सालों में दोनों केवल पांच बार ही मिले. लेकिन उनका प्यार फिर भी बरकरार रहा. वर्ष 1999 में जब मिकेल कैंसर से पीड़ित थे. उस वक्त भी बर्मन पुलिस ने दोनों को मिलने नहीं दिया. फिल्म में सूई के जीवन के इन कड़वे सच व कटु अनुभवों को खूबसूरती से दर्शाया गया है..फिल्म में खासतौर से इस पहलुओं को भी दर्शाया गया कि लगातार अत्याचार सहते हुए भी आंग ने कभी हिंसा का साथ नहीं लिया. किसी शख्सियत पर आधारित फिल्मों की बारीकि क्या हो सकती है, यह इस फिल्म से सीखी जा सकती है. फिल्म में उन सभी बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है, जिनसे आंग प्रभावित थीं. आंग गांधीजी की किताबें पढ़ा करती थीं. सो, कई दृश्यों में लेडी की नायिका भी गांधीजी की किताबें पढ़ती नजर आती हैं. खुद मिकेल मानती हैं कि उन्होंने गौर किया है कि आंग के व्यवहार में गांधीजी की बातों की झलक नजर आती है. सो, फिल्म में मिकेल भी बेहद विनम्र बनी हैं. साथ ही जिस तरह आंग भारत व भारत के आंदोलन से हमेशा प्रभावित रही हैं, उनके लगाव को भी फिल्म में खूबसूरती से दर्शाया गया हो. अगर वाकई दुनिया की नयी पीढ़ी किसी क्रांतिकारी महिला के शांतिपूर्ण आंदोलन की गाथा सुनना या देखना चाहते हैं तो उस लिहाज द लेडी महत्वपूर्ण दस्तावेज है और इसका प्रदर्शन पूरे देश में किया जाना चाहिए.

सिनेमा की नयी सुपरस्टार







हिंदी सिनेमा में ऐसे अवसर कम ही मिलते हैं, जब परदे पर अभिनेत्री की उपस्थिति हो तो उनके कपड़ों से अधिक ध्यान उनके चेहरे के एक्सप्रेशनंस खींचते हों. दरअसल, उनके वह एक्सप्रेशन, उनकी भाव भंगिमा व किरदारों को शिद्दत से जीने की वजह से हीं आज वह विद्या बालन हैं, जो अपनी एकल पहचान बना पाने में कामयाब हो चुकी हैं. आज उन्हें कामयाबी के लिए किसी खान के साथ काम करने की जरूरत नहीं. परिणीता, नो वन किल्ड जेसिका, इश्किया व अब द डर्टी पिक्चर में अपनी बिल्कुल अलग व सशक्त भूमिकाओं से उन्होंने साबित कर दिया है कि वह फिल्मों में हीरो हैं. परिणीता से डर्टी पिक्चर तक के सफर में उन्होंने वे सारी परिस्थितियों का सामना किया है, जिसका सामना हर अभिनेत्री को करना पड़ता है. वे सिर्फ हीरोइन नहीं अभिनेत्री हैं.

मुंबई के बांद्रा इलाके में स्थित गेइटी थियेटर व जूहू स्थित चंदन सिनेमा के दर्शकों की प्रतिक्रिया फिल्मों के हिट होने या होने का एक महत्वपूर्ण मापदंड है. माना जाता है कि अगर फिल्में यहां पसंद आ गयी तो पूरे भारत के सिंगल थियेटर में धूम मचायेगी. चूंकि इन दो थियेटरों में हर वर्ग के दर्शक आते हैं और शायद यही वजह है कि आम दर्शकों की सोच का अनुमान लगाने के लिए हर निदर्ेशक इन दोनों थियेटर के कलेक्शन पर गौर फरमाते हैं. अब तक इन थियेटरों में अभिनेता सलमान खान की फिल्में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं. लेकिन 2 दिसंबर, 2011 को यह रिकॉर्ड टूटा. जब सिल्क की जिंदगी पर आधारित फिल्म द डर्टी पिक्चर ने धमाल मचायी. थियेटर से निकलने के साथ हर किसी की जुबां पर सिर्फ और सिर्फ विद्या का नाम था. सोशल नेटवर्किंग साइट्स, अखबार, एसएमएस जोक्स पर इन दिनों विद्या का ही राज है. डर्टी पिक्चर्स की बॉक्स ऑफिस की शानदार कामयाबी के बाद जब विद्या ने यह कहा कि उन्हें अब खान सरनेम की जरूरत नहीं, बल्कि खान अभिनेताओं को बालन सरनेम लगा लेना चाहिए, तो कई लोगों ने इसे विद्या का बड़बोलापन व उनका घमंड माना. लेकिन सच्चाई यह है कि यह उनका बड़बोलापन नहीं. यह उनके आत्मविश्वासी शब्द हैं. चूंकि उन्होंने यह मुकाम आसानी से हासिल नहीं किया. अपनी मेहनत, लगन व बिना किसी सहारे के अपनी अलग पहचान स्थापित की है. वह भी अकेले.
टूटा भ्रम
डर्टी पिक्चर देखने के बाद दर्शक विद्या के कपड़ों या उनके ठुमकों की नहीं, बल्कि उनके संवाद अदायगी, उनके बोल्ड अंदाज व सिल्क के किरदार को संजीदगी से जीनेवाली अदाकारा की चर्चा कर रहे थे. यह जादू सिर्फ निदर्ेशक की कहानी का नहीं, बल्कि विद्या की मेहनत का ही है, जो आज आम दर्शक से लेकर खास दर्शकों तक को विद्या ने मोह लिया है. विद्या सुपरसितारों की भीड़ में शामिल होते हुए भी सबसे जुदा हैं. उनमें पाखंड, घमंड या बड़बोलापन नहीं. और ऐसा होगा भी नहीं, चूंकि वे जान चुकी हैं कि उन्हें लंबे रेस का घोड़ा बनना है. महज साढ़े पांच सालों में ही उन्होंने इस दुनिया के कई रंग देख लिये हैं. इस मायाजाल को समझने में जहां लोगों के कितने वर्ष बीत जाते हैं विद्या बेहद सजग होकर फूंक फूंक कर अपना हर कदम रख रही हैं. गलतियां उनसे भी हुई, गलत फैसले उन्होंने भी लिये. लेकिन फिर भी वह जल्द ही उन गलतियों को सुधारने में जुट गयीं, और शायद इन्हीं गुणों के कारण वह भीड़ से जुदा होकर बिना किसी सहारे के सफल हैं. संतुष्ट हैं. अभिनय भी हर विषय की तरह एक अध्ययन का विषय है. निस्संदेह अगर आप शिक्षित हों तो इसका असर आपकी पूरी जीवनशैली पर पड़ता है. विद्या ने भी मानवशास्त्र में एमए किया है. जबकि हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियां पढ़ाई को महत्व नहीं देतीं. लेकिन विद्या ने अपने पिता के कहने पर ही पहले अपनी पूरी पढ़ाई खत्म की. और यह बात पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि मानवशास्त्र विषय का ही जादू है जो विद्या किरदारों की मनोस्थिति व अपने दर्शकों के मानवशास्त्र को समझ पाने में कामयाब हैं. अपने अध्ययन के दौरन ही वे इन बातों से वाकिफ हो चुकी होंगी कि आम लोगों की जिंदगी से जुड़े वे कौन कौन से तत्व होते हैं और कैसे एक रिश्ते स्थापित किये जा सकते हैं. यही वजह है कि अपनी शिक्षा के मूल्यों को वह अपने अभिनय क्षेत्र में दर्शाती हैं और अपने किरदारों की बारीकियों व उनकी विशेषताओं को समझते हुए वे आम दर्शक के किरदारों से खुद को जोड़ लेती है. जब वह परिणीता होती है तो वाकई एक बांग्ला आम लड़की नजर आती है तो वही मुंबई के आरजे में मुंबईकर. पा में एक दुखी लेकिन आत्मविश्वासी मां नजर आती हैं तो इश्किया में वह उत्तरीभारत की महिला-सी चालाक चतुर पत्नी, द डर्टी पिक्चर में वे सिल्क बन कर बिंदास , बेबाक, बोल्ड होते हुए भी बेशर्मियत की हद को पार नहीं करती. तमाम बातों के बावजूद विद्या आम दर्शकों से खुद को जोड़ पाने में कामयाब हैं, क्योंकि उन्होंने विषय मानवशास्त्र की बारीकियों को अपने वास्तविक जिंदगी में व्यवहारिक रूप से ढाला है. यही वजह है कि धीरे धीरे ही सही अब वह विद्या का तिलिस्म पैदा करने में कामयाब हो चुकी हैं.
निराला व्यक्तित्व
विद्या की सबसे खास बात यह है कि वे हर भ्रम को तोड़ देती हैं. वे आतंकित नहीं करतीं. वे ग्लैमर का मोह जाल नहीं फैलातीं. वे जो हैं. वे नजर आती हैं. उनकी संवाद अदायगी का अंदाज सबसे निराला है. वे शुध्द, साफ व बेबाक बोलती हैं. उनकी हिंदी अपनी समकक्ष अभिनेत्रियों में सबसे अच्छी है. उन्हें सुन कर आप महसूस करेंगे कि वे हर शब्द को बोलती नहीं जीती हैं. नाप तोल कर बोलना नहीं आता उन्हें. अन्य अभिनेत्रियों की तरह वे अपने अफेयर की बात पर किसी पत्रकार पर नाक भाव नहीं सिकोड़ती. आपत्तिजनक बातों पर भी वह मीडिया का अनादर नहीं करतीं. मजाक बनने के डर से भी वह अपनी शालीनता व आदर सत्कार नहीं भूलती. अपने बड़ों से वह भॣड़ में भी पैर छूकर ही आशीर्वाद लेती हैं. नये पत्रकारों से भी खुल कर बात करती हैं. ऐसे में अगर किसी पत्रकार की कोई खास बात अच्छी लगे तो तारीफ करने से भी नहीं चूकतीं. अपने जवाबों में वह ईमानदार रहती हैं. दिखावाटीपन बिल्कुल नहीं. उनका यही व्यक्तित्व उनके किरदारों में भी नजर आता है. परदे पर दिख रही विद्या वास्तविक जिंदगी में भी उतनी ही मृदुभाषी, संजीदा, और अपनी आलोचनाओं से सबक लेनी वाली अभिनेत्री हैं. एक शब्द में कहें तो अन्य अभिनेत्रियों की तरह वह दोहरी भूमिका नहीं जीतीं.
डगमगाये थे कदम लेकिन जल्द ही हुई सजग
विद्या ने अपनी गुणवता फिल्म परिणीता में ही साबित कर दी थी. महज 26 साल की उम्र में उन्होंने एक संजीदा किरदार निभाया. लेकिन बावजूद इसके उन्हें वह कामयाबी नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थीं. धीरे धीरे ग्लैमर की दुनिया में वह डगमगायी और उन्होंने सलामेइश्क, किस्मत कनेक्शन व भूल भुलैया जैसी फिल्मों में काम किया. लेकिन जल्द ही वे मोहजाल से बाहर हुईं और उन्होंने खुद अपने व्यक्तित्व पर काम शुरू किया. इसमें उनका साथ दिया उनकी बड़ी बहन प्रिया ने. जिन्होंने उन्हें समझाया कि अगर वह अभिनेत्री बनना चाहती है तो फिर कुछ अलग करे. विद्या ने फौरन खुद को संभाला और लगे रहो मुन्नाभाई की आरजे जानवी के रूप में सामने आयी. लेकिन उन्हें वास्तविक या यूं कहें एकल पहचान मिली फिल्म पा में अमिताभ की मां के किरदार व साथ ही इश्किया में एक चालाक महिला के किरदार से. और फिर आयी फिल्म डर्टी पिक्चर में उन्होंने अपने बोल्ड अंदाज से इंडस्ट्री की इस हिचक को खत्म करने पर मजबूर कर दिया कि किसी अभिनेत्री के दम पर भी हिंदी फिल्में हिट हो सकती हैं. दरअसल, वास्तविकता यह है कि विद्या में ऐसी कई विशेषता हैं जो उन्हें एकल पहचान दिलाती है. यह विद्या की ही समझदारी है जो उन्होंने इस बात को पूरी तरह समझ लिया है कि हिंदी सिनेमा में अभिनय प्रधान अभिनेत्रियों की कमी है. ऐसे में उनके पास वे सारे मौके हैं, जब वे इनका सही तरीके से इस्तेमाल करें और अपनी अलग राह बनायें. उन्होंने यह तरीका अपनाया भी.
हिचक को तोड़ा
ग्लैमरस अभिनेत्रियों की भीड़ में विद्या को कभी ग्लैमरस नहीं माना गया, यहां तक कि जब उन्होंने चकाचौंध में आकर पाश्चात्य परिधानों को अपनाया. उन्हें आलोचना मिली. लेकिन फिर जब उन्होंने भारतीय परिधानों की तरफ रुख किया तो लोगों ने मान लिया कि वे केवल सती सावित्री व अपनी उम्र से बड़े किरदार निभाने में ही सशक्त होंगी. उनके हर समारोह में साड़ी पहनने पर भी उनका मजाक उड़ाया गया. लेकिन फिल्म इश्किया में उन्होंने सबको हैरत में डाल दिया. यहां भी वह सती सावित्री की तरह साड़ी में ही लिपटी नजर आयी, ेलेकिन हाथों में बंदूक थाम कर दो ठग पुरुषों को भी उन्होंने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. फिल्म पा में अपनी उम्र से कहीं बड़े अभिनेता की मां बनने का निर्णय किसी नयी उम्र की अभिनेत्री के लिए रिस्की हो सकता है. लेकिन विद्या ने इसकी परवाह नहीं की, क्योंकि शायद वह जानती थीं कि यही उनकी सही राह है. लेकिन जब तक लोग इश्किया के आधार पर बोल्ड छवि की बनाते, उन्होंने नो वन किल्ड जेसिका में जेसिका लाल की बहन का सादा लेकिन सशक्त किरदार सबरीना कर सबको चौंका दिया और वर्ष के अंत में उन्होंने धमाका किया. अपनी सभी बनी बनायी छवियों से दूर उन्होंने सिल्क के रूप में तहलका मचा दिया. इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ बोल्ड सीन दिये, बल्कि बोल्ड परिधानों में भी नजर आयीं.साथ ही बोल्ड संवादों से भी उन्होंने हैरत में डाला. दरअसल, विद्या के इन तमाम रूपों को देख कर अब तय हो चुका है कि विद्या को देखते हुए हर बार चौंकने के लिए तैयार रहना होगा. जल्द ही वे सुजॉय घोष की फिल्म कहानी में भी बिन व्याही मां का किरदार निभाने जा रही हैं.
विद्या-सिल्क में समानता.
लंबे अंतराल के बाद हिंदी सिनेमा में किसी फिल्म की कामयाबी का सेहरा किसी अभिनेत्री के सिर बांधा गया है. फिल्म डर्टी पिक्चर की तरह ही अभिनेत्री विद्या बालन को भी रास्तों में कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा. जिस तरह फिल्म में रेश्मा अपने सपनों को लेकर मद्रास जाती है और उसे बार बार फटकार लगाई जाती है. मशक्कत के बाद उसे काम करने का मौका तो मिलता है, वह शूटिंग भी करती है. लेकिन जब वह फिल्म देखने जाती है तो वह फिल्म में कहीं नजर ही नहीं आती. यह देख कर रेश्मा बहुत दुखी हो जाती है. कुछ इसी तरह वास्तविक जिंदगी में भी विद्या को लगभग 12 मलयालम फिल्मों में काम करने के बावजूद जब उन्होंने वह फिल्में देखीं, उनमें वे नजर आयीं. शायद अपनी जिंदगी से मिलती कहानी की वजह से ही विद्या इस किरदार को बखूबी निभा पायी हैं.विद्या खुद मानती हैं कि अगर शुरुआती दौर में उन्हें तिरस्कृत नहीं किया जाता तो शायद आज वह इस मुकाम पर नहीं होतीं.
विद्या के अनछुए पहलू
विद्या कभी आईने में देख देख कर शबाना आजिमी की फिल्म अर्थ के संवाद दोहराती थी. नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेता के घर पर सिर्फ इसलिए फोन किया करती कि वे व्हाइस मेल पर ही सही उनकी आवाज सुन सके. और आज वे उनके साथ दो फिल्मों में काम कर चुकी हैं. बचपन में वे अपनी पॉकेटमनी बचा कर जरूरतमंदों की सेवा किया करती थी. लेकिन अपने पिता या परिवारवालों से इस बात का जिक्र भी नहीं करतीं.


गेमचेंजर विद्या बालन ः
1.5 से 2.5 करोड़ मेहनताना लेनेवाली विद्या अब 4 से 5 करोड़ रुपये की डिमांड कर रही है.
करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियां भी अब हीरोइन जैसी फिल्मों में बोल्ड अंदाज में पेश आने से नहीं हिचक रही हैं.
इंडस्ट्री में यह शोर अब कम हो चुका है कि केवल खान स्टार या किसी पुरुष नायक की वजह से ही बॉक्स ऑफिस की सफलता संभव है.
इस अवधारणा में बदलाव कि किसी नायिका को सफल होने के लिए खान सरनेम या खान की फिल्में करना ही मापदंड नहीं होगा.

बॉलीवुड में वर्तमान में वही अभिनेत्री नंबर वन है, जिन्होंने अब तक इंडस्ट्री के तीन प्रमुख खान शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान के साथ अभिनय किया हो. अर्थात हिंदी सिनेमा में वही अभिनेत्री सुपरस्टार हैं, जो खान की फेवरिट रही हैं. यानी कि अभिनेत्रियों की काबिलियत परखने का आधार भी
इंडस्ट्री के नायक ही है. उस आधार से करीना कपूर ही एक मात्र अभिनेत्री हैं,जिन्होंने तीनों खान के साथ काम किया है. यानी वही सुपरसितारा हैं. खुद करीना कपूर को भी इस बात का गर्व है. लेकिन वर्ष 2011 की 2 दिसंबर की तारीख ने इस पूरे आधार को ही निराधार साबित कर दिया. जब विद्या बालन अभिनीत फिल्म द डर्टी पिक्चर को बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षा से भी कहीं अधिक कामयाबी मिली. जबकि फिल्म में कोई भी सुपरसितारे नहीं थे. न ही फिल्म से दूर दूर तक किसी खान का नाम जुड़ा था. यह करिश्मा था तो सिर्फ और सिर्फ विद्या बालन का. लोगों के अनुमान के बिल्कुल विपरीत जाकर उन्होंने बिना किसी खान की उपाधि लिये फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अपार सफलता दिलायी. यह वाकई हिंदी सिनेमा में पहली बार हुआ, जब किसी महिला प्रधान फिल्म होने के बावजूद फिल्म को जबदस्त कामयाबी मिली और पूरा का पूरा श्रेय भी महिला कलाकार को मिला. फिल्म की कामयाबी का सेहरा सिर्फ और सिर्फ विद्या के सिर पर बांधा गया. और आश्चर्य तो यह कि विद्या ने अब तक किसी भी खान कलाकारों के साथ काम न करते हुए भी अपने अभिनय से बाकी सभी अभिनेत्रियों को पीछे छोड़ दिया है. विद्या को वाकई गेमचेंजर की उपाधि दी जाये तो यह अतिश्योक्ति न होगी, क्योंकि जिस अंदाज से उन्होंने द डर्टी पिक्चर में अभिनय किया व महिला प्रधान फिल्म होने के बावजूद निर्माताओं को अपार सफलता दिलायी. उससे यह साफ जाहिर है कि अगर अभिनेत्री भी चाहें तो अपन बलबुते वह बॉक्स ऑफिस पर भी राज कर सकती है. विद्या बालन को आज किसी खान सरनेम या फिर खान के साथ काम करने का टैग नहीं चाहिए. वे खुद में ब्रांड बन चुकी हैं और खास बात यह रही है कि उन्होंने यह मुकाम बिना किसी सहारे के हासिल किया है. विद्या के साथ साथ फिल्म द डर्टी पिक्चर की निर्माता एकता कपूर भी बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने अपने शो व विद्या का पहला शो हम पांच से ही विद्या की काबिलियत परख ली और इतने सालों के बाद शुरुआत से शिखर तक दोनों महिलाओं ने साबित कर दिया कि बॉक्स ऑफिस की सफलता केवल अभिनेताओं की बपौती नहीं है. विद्या ने अपने अभिनय का जो स्वरूप डर्टी पिक्चर्स से पेश किया है, वे अब लेडी खान बन चुकी हैं. फिल्म को सफलता मिलते ही अब लगभग सभी निदर्ेशक व अभिनेता विद्या के साथ काम करने को उत्सुक हैं. निस्संदेह विद्या की यह कामयाबी केवल उनकी ही कामयाबी नहीं, बल्कि इंडस्ट्री की हर अभिनेत्री की कामयाबी है. कम से कम इस फिल्म की सफलता के बाद अब निर्माता भी मानेंगे कि महिला प्रधान फिल्में व्यवसायिक रूप से भी सफल हो सकती है और धीरे धीरे ही सही इस फिल्म की वजह से अब महिलाओं को भी फिल्मों की सफलता का श्रेय दिया जाने लगेगा. इस लिहाज से विद्या लीडर साबित हुई हैं, क्योंकि उन्होंने साबित किया है कि सशक्त अभिनय, स्क्रिप्ट की मांग पर अपना सबकुछ समर्पित करने से कामयाबी हासिल की जा सकती है. वे लोगों को चौंकाने में कामयाब हुई हैं. उन्होंने वाकई इस सोच को बदलने में और लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि केवल साइज जीरो या कपड़ों की चमक धमक दिखाना ही अभिनेत्रियों का काम नहीं. अगर जरूरत पड़े तो अभिनेत्री भी अपनी सीमा में रह कर बोल्ड अंदाज में नजर आ सकती हैं. उन्होंने निदर्ेशकों, अभिनेत्रियों और सबसे प्रमुख निर्माताओं को भी नयी दिशा में सोचने का आगाज किया है. इसके साथ ही विद्या ने एक अहम बदलाव यह लाया है कि अब तक इंडस्ट्री में पुरुष नायकों को ही केवल 4 से 5 करोड़ रुपये मेहताना मिला करते थे. जबकि अभिनेत्रियों को अधिकतम 2.5 करोड़. इस फिल्म की कामयाबी के बाद 1.5 से 2.5 करोड़ लेनेवाली विद्या अब निर्माताओं से 4 से 5 करोड़ रुपये मेहताना की मांग कर रही है. और यह वाजिब भी है. उनके इस कदम से बाकी अभिनेत्रियों को भी प्रेरणा मिलेगी और इंडस्ट्री में हो सकता है कि आनेवाले समय में अभिनेत्रियों को भी अभिनेताओं के समकक्ष मेहनताना प्राप्त होने लगे. गेमचेंजर के रूप में विद्या इस रूप में भी कामयाब हो चुकी हैं कि इस फिल्म की सफलता ने बोल्ड विषयों पर फिल्में बनने का रास्ता साफ किया है. साथ ही ए ग्रेड की नायिकाओं को भी राह दिखाई है कि वे बिना किसी हिचक के ऐसी फिल्में स्वीकारेंगी. गौरतलब है कि इस फिल्म की कामयाबी के बाद ही करीना कपूर ने फिल्म हीरोइन में उन सभी चीजों से पाबंदियां हटा दी हैं, जिन्हें वे पहले करने को तैयार नहीं थी. लेकिन विद्या को देखते हुए बाकी सभी अभिनेत्रियों को हिम्मत भी मिली है और उनमें प्रतिस्पर्धा भी आयी है. जाहिर है कि इससे फिल्मों में बोल्डनेस व साथ ही एक दूसरे से खुद को बेहतरीन साबित करने की सोच से कई अभिनेत्रियां अब चरित्रों को भी प्राथमिकता देंगी. लेकिन कामयाबी के साथ आनेवाला समय विद्या के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण भी रहेगा. चूंकि अब उनसे लोगों की उम्मीदें और बढ़ गयी हैं.तो यह बेहद जरूरी है कि आनेवाले समय में भी उनकी क्षमता बरकरार रहे. कम से कम वर्ष 2012 में आनेवाली उनकी सभी फिल्मों पर लोगों की निगाह रहेगी. उन्हें हर फिल्म में खुद को अलग साबित करना होगा. खासतौर से उनकी आगामी फिल्म कहानी का सफल होना बेहद जरूरी है. चूंकि अगर ऐसा नहीं होता है तो एक बार फिर उन पर प्रश्नचिन्ह लगाये जायेंगे. सो, यह बेहद जरूरी है कि उनकी आगामी फिल्म को व्यवसायिक रूप से भी सफलता मिले. चूंकि जब कामयाबी आती है तो अपने साथ कई बाधाओं को भी साथ लाती है. लेकिन अगर उन बाधाओं को पार कर व्यक्ति टिक जाये तो वह सफलता हमेशा बरकरार रहती है. विद्या को अभी इसी चुनौती का सामना करना है. चूंकि इस इंडस्ट्री का यह भी कटु सत्य है कि यह इंडस्ट्री सिर्फ उगते सूरज को ही सलाम करती है. शिखर पर पहुंचना व टिके रहना ही असली चुनौती है और इससे फिलहाल विद्या को गुजरना ही पड़ेगा. आनेवाला समय उनके जीवन में और कठिन व चुनौतियों से भरा होगा. यह तय है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि विद्या की काबिलियत पर भी शक नहीं किया जा सकता. निस्संदेह बदलाव की जो बयार विद्या ने लायी है, वह किसी क्रांति से कम नहीं. अब देखना बस यह है कि इस क्रांति की लौ कब तक बरकरार रहती है.
प्रेरणा ः विद्या अपनी ताकत व प्रेरणा अपने परिवार के सहयोग को मानती हैं, क्योंकि उन्होंने ही विद्या को लगातार मिल रही निराशा के बावजूद उनका साथ दिया. जिस वक्त उन्हें काम नहीं मिल रहा था. वे हमेशा रोती रहती थीं. लेकिन उनके परिवारवालों ने उनका साथ दिया. विद्या खुद बताती हैं कि उनकी बहन व उनके बहनोई ने विद्या को समझाया कि अगर वह वाकई अभिनेत्री बनने आयी हैं तो फिर वह कुछ अलग करें. विद्या ने उनके सुझाव को अपनाया भी आज कीर्तिमान स्थापित किया. साथ ही विद्या अपनी ही गलतियों से प्रेरणा लेती गयीं. और उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी उनका अपने अभिनय को गंभीरता से लेना. उन्होंने चरित्र प्रधान फिल्मों को तवज्जो देना शुरू किया. फिर चाहे इसके लिए उन्हें अपनी उम्र से बड़े किरदारों को ही क्यों न निभाना पड़ा हो.
बदलाव या मोड़ ः यूं तो विद्या के अभिनय की परख व उनकी खूबियां उनकी पहली फिल्म परिणीता में ही नजर आ गयीं थी. इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में बेहतरीन काम किया. लेकिन किस्मत कनेक्शन व सलामेइश्क जैसी फिल्मों में काम करने के बाद उन पर प्रश्न चिन्ह लगा. सो, जल्द ही विद्या ने यह समझ लिया कि उन्हें बदलाव की जरूरत है. उनकी जिंदगी में अहम मोड़ आया. और वे पा व इश्किया जैसी फिल्मों में काम करने के लिए तत्पर हुईं. फिल्म इश्किया में अपने बोल्ड अंदाज से उन्होंने साबित कर दिया कि वे लोगों की सोच से कहीं आगे की नायिका हैं. फिर फिल्म नो वन किल्ड जेसिका व द डर्टी पिक्चर्स से उन्होंने एक अलग ही पहचान स्थापित कर ली.
चुनौतियां ः विद्या किसी फिल्मी खानदान से संबध्द नहीं रखती. जाहिर है, ऐसे में उन्हें शुरुआती दौर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा होगा. साथ ही विद्या अन्य अभिनेत्रियों की तरह बेहद ग्लैमरस अभिनेत्री नहीं मानी जातीं. लेकिन चकाचौंध की इस दुनिया में खुद को स्थापित और भीड़ के साथ कदम मिला कर चलने के लिए कुछ दिनों के लिए विद्या को भी यहां के रंग ढंग में बदलना पड़ा.चूंकि विद्या के सामने अपनी समकक्ष अभिनेत्रियों के समान खूबसूरत दिखना भी एक चुनौती थी. लेकिन जल्द ही विद्या ने अपनी खूबियों को समझा और बिना किसी दिखावे के वह स्थापित व चरित्र प्रधान अभिनेत्री बन गयीं.बिना किसी तामझाम के आज वह अपनी समकक्ष अभिनेत्रियों से कहीं आगे हैं. वे बेहतरीन कलाकारों के साथ काम कर रही हैं और निदर्ेशकों की पसंदीदा हीरोइन बन चुकी हैं. लेकिन आनेवाले समय में विद्या के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह अपनी कामयाबी को किस तरह बरकरार रख पाती हैं.

दिलीप-देव की दोस्ती के कांटे



आज मुंबई के महबूब स्टूडियो में लीजेंड देव आनंद साहब की औपचारिक श्रध्दांजलि सभा का आयोजन किया गया है. देव आनंद का देहांत दिनांक 4 दिसंबर को लंदन में ही हुआ था. और उनकी इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार 10 दिसंबर को लंदन के पुटनी वैली क्रिमैटोरियम में किया गया. यह देव आनंद की फिल्मी व उनके अभिनय का ही जादू था जो व्यस्त रहनेवाले परदेस लंदन में भी बड़ी संख्या में उनके दर्शन के लिए उनके फैन की भीड़ थी. लेकिन जाते जाते भी शायद देव साहब की आंखें उस अनजाने प्रदेश में अपनों की तलाश कर रहे थे. यह तलाश उन लोगों की थी, जिन्हें उन्होंने पहचान दिलायी. जिस हिंदी सिनेमा को उन्होंने अपना पूरा जीवन दिया. इसी दुनिया से संबंध्द रखनेवाले किसी भी शख्स ने उनके अंतिम संस्कार में उपस्थित होना जरूरी नहीं समझा. उम्मीदन आज के शोक सभा में बॉलीवुड के नये दौर व पुराने दौर के सभी कलाकार महबूब स्टूडियो पहुंचें. दरअसल, सच्चाई यही है कि बॉलीवुड में रिश्ते बनाना उसी तरह है जैसे मिट्टी पर मिट्टी से मिट्टी लिखना. लेकिन रिश्ते निभाना उतना ही कठिन है जैसे पानी पे पानी से पानी लिखना. देव आनंद साहब की मौत के बाद भले ही सभी कलाकारों ने उन्हें टि्वटर, अखबारों व कई माध्यमों में श्रध्दांजलि दी हो. लेकिन यह भी कटु सत्य है कि पिछले कुछ सालों से देव आनंद साहब को बॉलीवुड जगत हल्के में लेने लगा था. वजह थी उनके निर्माण में बनी कई फिल्मों का फ्लॉप होना. देव आनंद साहब खुद इस टिस को जाहिर करते थे. उन्होंने खुद एक बातचीत में कहा था कि उन्हें बहुत दुख होता है कि उनके अजीज दोस्त दिलीप कुमार से अब वह बात नहीं कर पाते. चूंकि उनकी पत्नी सायरा बानो फोन कनेक्ट नहीं कराती. यह बात जगजाहिर है कि दिलीप कुमार अब पूरी तरह से सायरा पर आश्रित हैं. सायरा ही उनका ख्याल रखती हैं. देव साहब को इस बात भी हमेशा अफसोस रहा कि जब उन्होंने अपनी फिल्म हम दोनों का रंगीन संस्करण हाल में लांच किया तो उन्होंने बॉलीवुड के सभी दिग्गजों को बुलाया था. खासतौर से उन्हें दिलीप साहब का इंतजार था. खुद देव साहब ने कहा था कि उस वक्त सायरा के साथ दिलीप ने कई आयोजनों में हिस्सा लिया, लेकिन वे देव साहब के निमंत्रण पर नहीं आये. आज भले ही उनकी मृत्यु के बाद इंडस्ट्री उनका गुणगान गाये. लेकिन सच्चाई यह है कि यहां केवल उगले सूरज को ही सलामी दी जाती है. हालांकि देव साहब की मृत्यु के बाद खुद सायरा ने कहा था कि वे इस साल दिलीप साहब का जन्मदिन नहीं मनायेंगी. चूंकि दिलीप साहब बेहद दुखी हैं. लेकिन 11 दिसंबर को दिलीप साहब के जन्मदिन पर भव्य पार्टी का आयोजन किया गया, जिसमें इंडस्ट्री के सभी मशहूर अभिनेता शरीक हुए. शाहरुख, प्रियंका व सायरा ने डांस भी किया. दिलीप कुमार ने अपने अंदाज में सिटी भी बजायी. जबकि ठीक उसके एक दिन पहले ही देव साहब का अंतिम संस्कार किया गया था. लेकिन अपनी फिल्मों के लिए लगातार प्रीमियर या प्रोमोशन के लिए विदेश जानेवाले किसी भी बॉलीवुड शख्सियत के पास देव साहब के अंतिम दर्शन के लिए समय नहीं था. यहां तक कि उन कलाकारों के पास भी नहीं, जिसे देव साहब ने लांच किया था. किसी दौर में त्रिदेव कहलानेवाली यह तिकड़ी लोकप्रियता, ग्लैमर की दुनिया के चक्रव्यू में फंस चुकी थी. जहां दोस्ती की मजबूती का आंकलन नहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस के कलेक्शन के आधार पर रिश्ते बनते व बिगड़ते हैं. जाहिर है कोई भी सुपरसितारा यह नहीं चाहेगा कि उसकी वह छवि बिगड़े. चूंकि चकाचौंध, शोहरत की दुनिया का चरम देखने वाले शख्स के लिए अपनी छवि को साफ सुथरी छवि वाली बनाये रखना एक अहम जिम्मेदारी होती है. ऐसे में फिर चाहे उन्हें अपनी सबसे अजीज वस्तु ही क्यों न खोनी पड़े. अपने अहं को बरकरार रखना ही सबसे अहम हो जाता है. और शायद यही वजह थी कि लगातार फ्लॉप होती फिल्मों की वजह से धीरे धीरे देव अपनी सुपरसितारा वाली छवि को धुमिल करते जा रहे थे और यही वजह थी कि धीरे धीरे अपने लोगों ने भी उनसे किनारा कर लिया था.

हॉलीवुड का बॉलीवुड में क्रेजीदेवो भवः



एमआइ 4 के बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट आ चुके हैं. जिस हफ्ते यह रिलीज हुई. इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों से अधिक बिजनेस किया. यह तसवीर साफ जाहिर करती है कि भारत में अब हॉलीवुड की फिल्म का बाजार विस्तृत हो चुका है. इस बात से शायद टॉम क्रूज व इस फिल्म के निर्माता अच्छी तरह वाकिफ थे. और उन्होंने इसी का फायदा उठा कर फिल्म के प्रोमोशन के लिए टॉम क्रूज को भारत भेज दिया. यही नहीं, उन्होंने इसमें मोहरे की तरह इस्तेमाल किया अनिल कपूर का. जो कि इस फिल्म का हिस्सा भी हैं. उन्होंने भारत में दिखनेवाले प्रोमो में अनिल को भी शामिल किया. जबकि विदेशी प्रोमो में वे नजर नहीं आये. फिल्म में भी अनिल एक्स्ट्रा के रूप में ही इस्तेमाल हुए हैं. लेकिन टॉम क्रूज ने खुशी-खुशी इस फिल्म की सफलता 3दिसंबर को अपनी फिल्म एम के प्रमोशनल इंवेट में हॉलीवुड के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता टॉम क्रूज भारत आये. वे यह टॉम क्रूज को भारत कुछ इस कदर भा गया कि वह जल्द ही अपनी पत्नी और बेटी के साथ फिर से भारत आ रहे हैं. संभवतः आगामी 16 दिसंबर को. उनके आवभगत में मुंबई व बॉलीवुड ने कोई कसर नहीं छोड़ी. खासतौर से अनिल कपूर( एमआइ4 में वे अभिनय कर रहे हैं ) व उनके परिवार ने मुख्य भूमिका निभायी. रेड कारपेट पर वह टॉम क्रूज के साथ मुस्कुरा रहे थे. टॉम क्रूज जैसे मशहूर हॉलीवुड शख्सियत के साथ अनिल की हुई नयी नयी दोस्ती की खुशफहमी ने बड़बोला बना दिया है. अनिल कपूर इन दिनों अपने ही भारत के बॉलीवुड से हॉलीवुड पर्सनैलिटी की तरह पेश आ रहे हैं. इसी क्रम में इतराते हुए वे कहते फिर रहे हैं कि शाहरुख उनकी वजह से आज इतने बड़े स्टार हैं, क्योंकि उन्होंने बाजीगर छोड़ी थी. तो शाहरुख को मिली. उनका यह बढ़ चढ़ कर बोलना दरअसल, उनकी खुद की जुबानी नहीं, बल्कि फिलवक्त विदेशी रंग चढ़ गया है. दरअसल, अनिल का यह अति उत्साही होना हमारे भारत की ही छवि प्रस्तुत करता है. वे बॉलीवुड के उस भीड़ में अकेले नहीं खड़े, जहां कोई विदेशी कलाकार बॉलीवुड के लिए भगवान होता है. बॉलीवुड के कलाकार भी आम आदमी की तरह ही विदेशी कलाकार के लिए क्रेजी होते हैं. जिस तरह भारत में किसी छोटे से गांव के लिए मुंबई बड़ी नगरिया हैं और यहां के सितारे भगवान. कुछ ऐसे ही बॉलीवुड के कलाकार भी विदेशी कलाकारों को लेकर क्रेजी हैं. फिर चाहे वह टॉम क्रूज, पामेला एडरसर, पेरिस हिल्टन, लेडी गागा या शकीरा का भारत आगमन हो. शाहरुख ने खुद टि्वटर पर शकीरा के साथ अपने परिवार की तसवीर अपलोड की. वे खुद मानते हैं कि शकीरा से मिलना. एक फैन के सपने का सच होना है. शाहरुख की यही बातें दर्शाती हैं कि किस हद तक भारतीय कलाकार विदेशी कलाकारों के फैन हैं. न सिर्फ वे बल्कि उनका पूरा परिवार भी. हाल ही में जब गायिका लेडी गागा दिल्ली में अपने कंसर्ट के लिए आयीं. तो वह पूरी तरह मीडिया में छाई रहीं. सिम्मी गेरेवाल ने भी अपने शो में कहा कि गागा की वजह से शो धन्य हो गया. उनके कंसर्ट को देखने के लिए कई बॉलीवुड सितारें इक्ट्ठे हुए. लोगों ने 40 हजार के टिकट खरीदे. प्रियंका चोपड़ा ने टि्वट पर लिखा कि उन्हें बेहद अफसोस है कि वे गागा से नहीं मिल पायीं . इससे साफ जाहिर है कि हमारी नजर में विदेशी कलाकारों की कद्र क्या है. आम इंसान ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड के कलाकार भी फिरंगी कलाकारों के फैन हैं. फिल्म रा.वन में शाहरुख लेडी गागा का एक गीत रखना चाहते थे. रा.वन के सभी गीत सुनने के बाद यह सवाल जेहन में उठता है कि क्या वाकई गागा के गीत की जरूरत थी. क्या रहबरा..., मोरे पिया...जैसे गीत गागा के गीत के बगैर खूबसूरत नहीं. अकोन ने फिल्म में दो गीत गाये और शाहरुख ने अकोन के लिए अपने घर मन्नत पर शानदार पार्टी भी रखी. जबकि खुद अकोन ने विशाल शेखर के सामने स्वीकारा कि भारत जैसे बाजार कहीं नहीं है. यहां जितने प्रशंसक हैं.उतने कहीं नहीं. अकोन के यही शब्द दरअसल, विदेशी कलाकारों के भारत आगमन का मूल रहस्य है. चूंकि वे जानते हैं कि भारत में उनके चाहनेवालों में बॉलीवुड भी शामिल है, जो बहुत धनी है. सो, वे अपनी शर्तों पर मुंहमांगी रकम के साथ यहां पधारते हैं और बेहद अमीर होकर चले जाते हैं. हम मेटेलिका जैसे रॉक बैंड का स्वागत दिल से करते हैं. लेकिन दूसरी तरफ अपने भारत के रॉक बैंड की सूध लेनेवाला कोई नहीं. शाहरुख छम्मक छलो गीत के लिए अकोन को करोड़ों रुपये देने से नहीं हिचकते. क्योंकि वे भी जानते हैं कि हमारे इंडियन तड़का अगर कहीं से भी थोड़ी फिरंगी छौंक भर लग जाये तो वह हिट ही है समझो. रितिक बेहद दुखी हैं कि वे शकीरा के भारत आगमन पर अपनी बीमारी के कारण यह शो नहीं कर पायेंगे. शायद उन्हें इतना दुख अपनी किसी फिल्म के फ्लॉप होने पर नहीं हुआ होगा. बॉलीवुड में इस बात को लेकर भी चर्चा है कि जेम्स बांड की अगली सीरिज की शूटिंग भारत में होनेवाली है. और खुद जेम्स बांड का किरदार निभा रहे डैनियल क्रैग भारत आनेवाले हैं. उनके स्वागत की तैयारी अभी से जारी है. लेकिन सोचनेवाली बात यह है कि क्या भारतीय कलाकारों को भी विदेशों में वही आदर सत्कार मिलता होगा. शायद नहीं. ऑस्कर विजेता एआर रहमान को छोड़ कर ऐसे कोई भी भारतीय कलाकार नहीं, जिसे पूरी दुनिया जानती हो. निस्संदेह शाहरुख, अक्षय की फिल्में ओवरसिज पर कमाल करती हैं. लेकिन वहां के भी दर्शक और फैन में अधिकतर संख्या अप्रवासी भारतीयों की होती है. भारतीय कलाकारों व उनकी फिल्मों की वास्तविक छवि अगर देखनी हो तो हर वर्ष होनेवाले सबसे प्रतिष्ठित कान फिल्मोत्सव का हिस्सा बनना चाहिए, जहां भारतीय फिल्में किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बन पाती. कुछेक को छोड़ कर. भले ही अनिल कपूर को लगने लगा हो कि उन्हें कोई तीर मार लिया है. लेकिन सच्चाई यही है कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को विदेशी फिल्मों में खास किरदार नहीं दिये जाते है. 16 ऑस्कर विजेता निदर्ेशक हग हडसन ने साफ कहा कि अब भी भारतीय फिल्में विश्व स्तरीय नहीं हैं. उनमें सिर्फ नाच गाना होता है. जबकि उन्होंने भारतीय निदर्ेशकों में सिर्फ और सिर्फ सत्यजीत रे की फिल्मों को स्तरीय कहा.
चलते-चलते
राजकपूर की फिल्में रूस में सबसे अधिक लोकप्रिय होती थी. फिल्म आग व श्री 420 को विदेशों में सबसे अधिक लोकप्रियता हासिल हुई.
भारतीय निदर्ेशकों में सत्यजीत रे एकमात्र निदर्ेशक हैं,जिन्हें ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त है और वह विदेशों में भी लोकप्रिय हैं.
मिथुन चक्रवर्ती को रूस में आज भी लोग जिम्मी जिम्मी के नाम से जानते हैं.
भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी विदेशी फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर को कई ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त हुए.
भारतीय मूल की एकमात्र अभिनेत्री फ्रीडा हैं, जिन्हें विदेशों में लीड किरदार मिलते हैं.वरना शेष अभिनेत्रियां सहायक किरदार ही निभाती हैं.
कृष्णा शाह की फिल्म शालीमार में पहली बार किसी हिंदी फिल्म में विदेशी कलाकारों को अहम भूमिका दी गयी थी. तीन अहम किरदार थे. जॉन सेक्सन, जिन्हें ब्रुस ली के साथ एंटर द ड्रैगन में देखा जा सकता है.रेक्स हैरिसन औप सिल्विया माइल्स.

सूरज के प्रेम की वापसी


पारिवारिक फिल्में बनाने में माहिर राजश्री प्रोडक्शन के सूरज बड़जात्या एक बार फिर से निदर्ेशन में वापसी कर रहे हैं. फिल्म विवाह के बाद उन्होंने ब्रेक लिया था. और इस बार उनकी वापसी खास इसलिए भी है, क्योंकि वह एक बार फिर से अपने सबसे प्रिय अभिनेता सलमान खान के साथ फिल्म बनाने जा रहे हैं. फिलवक्त सलमान बॉलीवुड के सबसे महंगे व सबसे लोकप्रिय अभिनेता बन चुके हैं. आज उनकी पहचान एक्शन व हास्य अभिनेता के रूप में होती है. लेकिन किसी जमाने में सूरज ने ही उन्हें पारिवारिक फिल्मों का लोकप्रिय चेहरा बना दिया था. फिल्म मैंने प्यार किया, हम आपके हैं कौन व हम साथ साथ हैं सलमान के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक रहीं, और इन फिल्मों में वे अपने स्वभाव से बिल्कुल विपरीत नजर आये. फिर भी दर्शकों के चहेते रहे. सलमान खुद अपनी कामयाबी में सूरज का योगदान मानते हैं. सलमान ने शुरुआत भी सूरज के साथ ही की थी. उस दौर में मैंने प्यार किया में आशुतोष गोवारिकर व भागश्री को लेकर मैंने प्यार किया बनाना चाहते थे. लेकिन सलमान फिर भी ऑडिशन के लिए गये. पहले तो सलमान की पतले दूबले शरीर वाली तसवीरें देख कर सूरज ने मना कर दिया. लेकिन जब उन्होंने सलमान का ऑडिशन लिया. वे सलमान के फैन हो गये. इस फिल्म से उन्हें प्रेम का नाम मिला, जो अब सलमान का पसंदीदा नाम बन चुका है. और इस जोड़ी ने तीन सफलतम फिल्मों में काम किया. तीनों ही फिल्मों आज भी भारतीय दर्शकों की पसंदीदा फिल्मों में से एक रहीं. इसके बाद सूरज मैं प्रेम की दीवानी हूं बना रहे थे. सलमान ने उन्हें इस कहानी पर फिल्म न बनाने का सुझाव दिया. लेकिन सूरज को सलमान की बातें पसंद नहीं आयी तो उन्होंने सलमान से दूरी बना ली. लेकिन सलमान से अलग होने के बाद सूरज केवल विवाह के रूप में सफल फिल्म बना पाये. इस सच से सभी वाकिफ हैं कि सूरज व सलमान की जोड़ी करिश्मा करती है. अगर सूरज न होते तो शायद सलमान के पारिवारिक लड़केवाले रूप के दर्शन दर्शक कभी नहीं कर पाते और वे इतने लोकप्रिय नहीं होते. और शायद यही वजह है कि तमाम व्यस्तताओं के बावजूद व सर्वाधिक लोकप्रियता होने के बावजूद सलमान ने दोबारा सूरज का साथ दिया है. हालांकि यह सच है कि आज सलमान को सुपरस्टार बनने के बाद किसी निदर्ेशक के कंधे की जरूरत नहीं लेकिन अभिनेता के रूप में वे भी अब अपनी वर्तमान में बनाई गयी इमेज से बाहर आना चाहते हैं. चूंकि एक सुपरस्टार की चाहत भी यही होती है कि वह सुपरस्टार के साथ साथ अपने अभिनय के लिए भी याद किया जाये. और ऐसे में सलमान जैसे हीरे को निखारने में सूरज से बेहतरीन निदर्ेशक और कौन होता. खबर यह भी है कि सूरज, सलमान के साथ माधुरी भी इस प्रोडक्शन में वापसी करेंगे और तीनों मिल कर हम आपके...सा कुछ करिश्मा कर दिखायेंगे. वर्ष 1994 की प्रेम-निशा की जोड़ी ने निस्संदेह उस दौर के परिवार व युगलों के दिल में खास जगह बनाई थी. जो आज भी बरकरार है. हम आपके...एकमात्र ऐसी हिंदी फिल्म है, जिसे आज भी दर्शक बार बार देखना पसंद करते हैं. इसी फिल्म ने भारतीय शादियों के रस्मों रिवाजों, हंसी मजाक की रौनक बढ़ायी थी.

फैन के किंग की वापसी



डॉन कहो डॉन अपना सा लगता है...
शाहरुख खान अभिनीत व फरहान अख्तर द्वारा निदर्ेशित फिल्म डॉन 2 आज रिलीज हो रही है. हिंदी सिनेमा में यह पहली बार होगा, जब किसी फिल्म के रीमेक का सीक्वेल बनाया गया हो. वर्ष 2006 में बनी फिल्म डॉन सलीम-जावेद की लिखी फिल्म डॉन का ही मॉर्डन स्वरूप था. फिल्म बेहद पसंद की गयी थी. चूंकि फरहान ने अपनी कल्पशीलता व निदर्ेशन की खूबियों से उसमें बेहतरीन रंग भर दिये थे. फिल्म का लोकेशन, स्वरूप व डॉन के रूप में शाहरुख को दर्शकों ने स्वीकारा भी. जबकि वर्ष 2006 में बनी डॉन के रीमेक फिल्म में ही फरहान ने वह सबकुछ दिखाया, जो वह दिखाना चाहते थे. थ्रील, एक्शन व अपने पिता की लिखी पटकथा के साथ उन्होंने पूरा न्याय भी किया था. फिर दोबारा वे कौन से कारक रहे होंगे, जिसने फिल्म के रीमेक के सीक्वेल के लिए प्रेरित कर दिया. वजह साफ है डॉन शब्द व इसके संवाद अपने आप में पूरी तरह ब्रांड बन चुके हैं. खुद फरहान भी ऐसा ही मानते हैं. चूंकि दर्शकों के बीच डॉन स्थापित नाम है. इससे सीधा फायदा फिल्म को मिल सकता है. फरहान युवा दर्शकों के निदर्ेशक हैं. सो, वह यह भलीभांति जाते हैं कि अपने युवा दर्शकों को फिल्म से जोड़ने के लिए क्या क्या तरीके अपनाये जाने चाहिए. फिर चाहे फिल्म डॉन 2 में एक संवाद है जब कुणाल कपूर आकर कहते हैं कि सर, मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं. इस पर डॉन बने शाहरुख कहते हैं कि सर मत कहो, शरीफ सा लगता है डॉन कहो. अपना सा लगता है. फिल्म के यही संवाद दरअसल, इस फिल्म के सीक्वेल की सोच है. फिल्म देखने के बाद आप महसूस करेंगे कि फरहान की डॉन 2 का इससे पहले के बाकी फिल्मों से खास कनेक्शन नहीं. इस बार की कहानी बिल्कुल अलग है, किरदार भी अलग हैं. फरहान चाहते तो इस एक्शन थ्रीलर का नाम कुछ और भी रख सकते थे. लेकिन इसके बावजूद डॉन व उसके फैन फॉलोयिंग को देखते हुए उन्होंने यही नाम तय किया. चूंकि फरहान जानते हैं कि भले ही डॉन नकारात्मक किरदार है. लेकिन फिर भी लोकप्रिय है,सफल है. हिट है. और शायद यही वजह है कि इस बार उन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट डॉन के दो बड़े फैन अमित मेहता व अमरीश शाह को डॉन 2की स्क्रिप्ट लिखने की जिम्मेदारी दी. किसी फैन से स्क्रिप्ट लिखवाने का यह प्रयोग भी इसी फिल्म के साथ पहली बार हो रहा है. चूंकि फरहान जानते हैं कि डॉन अपने फैन के बीच किंग है. (चूंकि फिल्मों के विलेन का भी अलग एट्टीटयूड हो, अलग स्टाइल हो. तो वे भी दर्शकों को बेहद आकर्षित करते हैं) डॉन खलनायक होते हुए भी नायक है. डॉन बुरा होते हुए भी दर्शकों को अपना सा लगता है. इसलिए, फरहान ने तय किया कि डॉन 2 को उनके प्रशंसकों की नजर से देखें और पूरी रूपरेखा, स्वरूप उनकी पसंद की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए तैयार की जाये. इसलिए उन्होंने दो फैन से ही स्क्रिप्ट लिखवाने का रिस्क लिया. इस बार जरूरत के मुताबिक कई नये संवाद जोड़े हैं. लेकिन ब्रांड संवाद डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है का साथ नहीं छोड़ा है. यह इस युवा निदर्ेशक की अकलमंदी है. इससे वे अपने पुराने दर्शकों को तो जोड़े रखने में कामयाब होंगे ही. नये संवादों व एट्टीयूड के साथ वे नया दर्शक वर्ग को तैयार करने में भी कामयाब होंगे. यही वजह है कि शाहरुख और फरहान कहते हैं कि वे तबतक डॉन का निर्माण करते रहेंगे, जब तक दोनों व्हीलर चेयर पर नहीं बैठ जाते. मसलन जब तक वे जवां रहेंगे. सक्रिय रहेंगे वे डॉन का निर्माण करते रहेंगे.

परदे के पीछे सांता सलमान





आज अब्दुल राशिद सलीम सलमान खान उर्फ सलमान खान का जन्मदिन है. वे आज 46 उम्र के हो चुके हैं. इसे महज संयोग ही कहा जा सकता है कि मान्यताओं के अनुसार पूरे विश्व में जब 25 दिसंबर क्रिसमस के उपलक्ष्य में लोग सांता से विश मांगते हैं और सांता उनकी विश को पूरा भी करते हैं. उसी के ठीक दो दिन बाद सलमान का भी जन्मदिन है. यह तुलना इसलिए कि कई मायनों में सलमान व सांता में कई समानताएं हैं. परदे के पीछे के सलमान वाकई कई लोगों के जीवन में सांता क्लॉज सी ही भूमिका निभाते हैं. यह बात सलमान की अति प्रशंसा करने के इरादे से नहीं, बल्कि कई अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है. फिल्म इंडस्ट्री में मूडी, बिगड़ैल और मस्तमौला रहनेवाले सलमान की वास्तविक छवि अगर जानना चाहे तो आपको उनके परदे के सामने की छवि से बिल्कुल बाहर आना होगा. चूंकि लार्जर देन लाइफ किरदार निभानेवाले सलमान निजी जिंदगी में बेहद दिलदार हैं. वे वाकई जरूरतमंदों के सांता हैं. अगर विश्वास न हो तो कभी मुंबई के ब्रांदा इलाके, खासकर झुग्गी झोपड़ी के बच्चों से बात करें. मुंबई के ऑटो ड्राइवर से बात करें. यहां सलमान सल्लू भाई या अपना सलमान के नाम से भी लोकप्रिय हैं. शायद यही वजह है कि फिल्म धोबी घाट में किरन राव ने मुंबई के चॉल में रहनेवाले नायक का पसंदीदा स्टार सलमान को ही दिखाया. चूंकि सच्चाई भी यही है. सलमान इन आमलोगों के बीच अपनी फिल्मों की वजह से नहीं, बल्कि अपनी नेक सोच की वजह से लोकप्रिय हैं. जिस तरह सांता से आप आंख बंद कर कुछ भी मांग लें, वह आपसे बिना मिले, बिना बताये ही कभी भी आकर आपकी सारी इच्छाएं पूरी करता है. सलमान भी वैसे ही हैं. वे लोगों की मदद करते हैं. लेकिन वे इसकी पब्लिसिटी करना पसंद नहीं करते. ब्रांदा की झुग्गी झोपड़ियों में आग लगने के बाद उन्होंने पूरी बस्ती को ही गोद ले लिया. फिल्म चिल्लर पार्टी के एक स्लम में रहनेवाले लड़के की भी जिम्मेदारी उठायी. हर रविवार ब्रांदा के बैंड स्टैंड पर कई लोगों का मुफ्त में मेडिकल चेकअप किया जाता है. सलमान मानते हैं कि वे जो भी कमाते हैं उनमें अपने उपयोग के लिए थोड़ा ही काफी है. शेष को वे दान करने में ही विश्वास रखते हैं. यही वजह है कि आज उनका ट्रस्ट बीइंग ह्मुमन के माध्यम से देश के कई जरूरतमंदों को मदद पहुंचाया जा रहा है. सलमान के करीबी बताते हैं कि आज भी इंदौर( जहां सलमान का जन्म हुआ) से मुंबई आये किसी भी व्यक्ति की बिना किसी पूछताछ के वे मदद कर देते हैं. हर रोज उनके घर न जाने कितने लोगों के लिए भोजन बनता होगा. वे गोपनीय तरीके से आज भी कई जरूरतमंदों की मदद करते हैं. और शायद यही वजह है कि सलमान के साथ जो भी हैं. वे उनके प्रति वफादार हैं. इसका प्रमाण उस दिन भी नजर आया था, जब एक इंटरव्यू के सिलसिले में सलमान के घर जाने का मौका मिले. वहां काम करनेवाले एक लड़के ने अपनी हाथों पर सलमान नाम गुदवाया था. हमने उसे बहुत मनाने की कोशिश की, कि वह तसवीर के लिए तैयार हो जाये. लेकिन वह टस से मस न हुआ. साफ कहा. नहीं भाई बुरा मान जायेगा. उसके यह शब्द सलमान की धमकियों की वजह से नहीं, बल्कि सलमान के प्रति उसके सम्मान की है. उस लड़के ने कुछ भी नहीं बताया, वह कौन है कहां से आया. लेकिन निश्चित तौर पर वह भी उन लाखों लोगों में से एक था, जिसकी मदद सलमान ने की होगी. इसी तरह फिल्म रेडी देखने के दौरान ब्रांदा के गेइटी ग्लैक्सी जाते वक्त ऑटो ड्राइवर ने कहा कि अपने सलमान की फिल्म है. सुना है सलमान भी आयेगा. हम तो जायेगा फिल्म देखने. अपने ब्रांदा का लड़का है. यह कहने पर कि बॉलीवुड के तो कई हीरो ब्रांदा के ही है तो वह साफ कहते हैं तो क्या हुआ अपना सलमान हमलोग का ख्याल रखता है. बाकी लोग थोड़े ही न. दरअसल, यह सलमान के आम लोगों से जुड़ा दिल का कलेक्शन है. और शायद यही वजह रही कि सलमान सबकी दुआओं की वजह से दोबारा ठीक होकर वापस आये. अपने बॉडीगार्ड शेरा के बारे में सलमान बेझिझकत कहते हैं कि वह चाहे तो उस पर किताब लिख सकता है. उनकी सारी पोल खोल सकता है. लेकिन सलमान जानते हैं कि शेरा ऐसा नहीं करेगा. क्योंकि वह वफादार हैं. कोई व्यक्ति किसी का वफादार तब बनता है, जब सामनेवाला व्यक्ति भी उसकी इज्जत करे. शेरा खुद कहते हैं कि सलमान ने हमेशा शेरा को परिवार का हिस्सा माना है. वे हरगिज उन्हें धोखा नहीं देंगे. सलमान न केवल आम लोगों की बल्कि उनकी भी मदद कर देते हैं, जिनका काम उन्हें पसंद आ जाये. उन्होंने इस तरह इंडस्ट्री में कई लोगों को मौके दिये हैं. जिनमें हिमेश रेशमिया जैसे नाम भी शामिल है. िफलवक्त उन्हें मुद्दसर नामक कोरियोग्राफर का काम पसंद आ रहा है. सो, उन्हें ही सलमान के सारे परफॉरमेंस में काम करने का मौका मिल रहा है. इसके अलावा उन्होंने कई टैलेंट शोज के प्रतिभागियों को कई स्थानों पर मौके दिलाये हैं. इनमें अंडरवाटर ऑथोरिटी गुप्र भी शामिल हैं, जिन्हें उन्होंने इंडिया गॉट टैलेंट में देख कर मौके दिलाये. इसके अलावा कई लोगों को सही सुझाव भी देते हैं. कई टेलीवुड एक्टर मानते हैं कि सलमान उनकी मदद करते हैं और उन्हें उचित सुझाव देते रहते हैं. सलमान कभी दोहरा व्यवहार नहीं करते. वे बाकी सुपरस्टार की तरह बड़े मीडिया हाउस और छोटे मीडिया हाउस में फर्क नहीं करते. एक इवेंट के दौरान जब एक आम टीवी चैनल की लड़की ने आकर कहा कि सलमान प्लीज बाइट देदो, नयी नौकरी है. वरना चली जायेगी. तो सलमान ठहरे और उन्होंने बाइट दी. उनकी देखादेखी जब दूसरे बड़े चैनलवाले भी आये तो सलमान ने रेड सिग्नल दिखा दिया. इससे साफ जाहिर होता है कि सलमान को दिखावे की जरूरत नहीं और उन्हें फर्क भी नहीं पड़ता कि मीडिया उनके बारे में क्या बातें बनाये. वे अपनी मर्जी से जिंदगी जीना चाहते हैं. लेकिन अगर इंडस्ट्री के इस अड़ियल स्टार का असली चेहरा देखना हो तो आपको मुंबई की सड़कों पर आना होगा. वहां के आम लोगों से बातचीत करनी होगी. जिस तरह दक्षिण में रजनीकांत लोगों के लिए भगवान है. मुंबई के कई इलाकों में सलमान भगवान है. वे आम लोगों के लिए बॉडीगार्ड भी हैं. प्रेम भी हैं और सांता भी. चूंकि वे नेक दिल इंसान है. यही वजह है कि सलमान की लगातार नेगेटिव छवि दिखाने के बावजूद आम लोगों में सलमान का क्रेज बरकरार है और यही वजह है कि बिना किसी तामझाम के बावजूद बॉडीगार्ड भी वर्ष की सबसे व बॉलीवुड की सबसे कमाई करनेवाली फिल्म बन जाती है. यह दर्शकों से व आम लोगों से उनके दिल का कनेक्शन का ही सीधा जादू है.

लौटना माधुरी का



दीवा माधुरी दीक्षित को भारत लौटे कई महीने हो चुके हैं. आयी हैं और अब बहुत जल्द ही वह अपने पहले प्यार यानी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लौटने की तैयारी में जुट गयी हैं.फिलवक्त वे नये चैनल लाइफ ओके व फूड फूड चैनल की ब्रांड अंबैस्डर हैं. इसके साथ ही साथ वे कई विज्ञापनों में नजर आ रही हैं. यह हकीकत है कि जीवन में चाहे शादी किसी से भी हो, लेकिन व्यक्ति अपना पहला प्यार नहीं भूलता. कुछ इसी तरह अमेरिका में अपनी सुव्यवस्थित जिंदगी जीने के बावजूद माधुरी अपने पहले प्यार यानी अभिनय को नहीं भूल पायीं और वापस लौट आयीं. अभिनय के प्रति यह उनका पहला प्यार ही है, जिसने उन्हें भारत आने पर मजबूर किया. इसके बावजूद कि भारत लौटने पर उन्हें अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाने में मशक्कत करनी पड़ी. चूंकि फिलवक्त सभी स्कूलों में सेशन मध्यांतर पर चल रहे हैं. वर्ष 1999 में जब माधुरी ने श्रीराम नेने से व्याह रचाने के बाद अभिनय को अलविदा कहने का फैसला किया. तो शायद उनका यह निर्णय परिवार के दबाब में ही था. ये उनकी अपनी मर्जी हरगिज नहीं हो सकती थी. चूंकि जिस दौर में उन्होंने यह फैसला लिया था. उनका करियर शिखर पर था. लेकिन संजय दत्त से बढ़ती नजदीकियों की वजह से उनके परिवार ने उनकी शादी का निर्णय लिया और माधुरी ने भी ऊपरी मन से जाहिर किया कि वे अपनी इतनी लोकप्रियता से संतुष्ट हैं और खुशी खुशी अमेरिका में रहने लगी. लेकिन लाइट कैमरा, एक्शन, चकाचौंध से भरी ऐशो आराम की दुनिया, लोकप्रियता से कोई व्यक्ति खुद को कब तक दूर रख सकता था. माधुरी हमेशा कहती रहीं कि वे खुश हैं. संतुष्ट हैं. लेकिन फिल्मों का प्रेम उन्हें बार बार आकर्षित करता ही रहा. ऐसे में जब यश चोपड़ा ने उन्हें आजा नचले फिल्म का ऑफर दिया तो उन्होंने इसे फौरन स्वीकार लिया. इसके बाद वह फिर से वापस लौट तो गयीं. शरीर से वे अमेरिका में रहीं हमेशा. लेकिन आत्मा हमेशा हिंदी सिनेमा में ही रहा. ऐसे में जब उन्हें दोबारा झलक दिखला जा डांस रियलिटी शो में मौका मिला तो वे फिर लौट आयीं. इस बार उनका स्वागत पहले के वनिस्पत और अधिक किया गया. तमाम बड़े निदर्ेशकों व अभिनेताओं ने उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर की. निर्माता 5 करोड़ तक देने को भी तैयार हो गये. खबर थी कि वे सागर भल्लारी व अभिषेक चौबे की फिल्मों को साइन भी कर दिया है. ( हालांकि फिलवक्त तक उन्होंने कोई फिल्म साइन नहीं की है) उन्होंने देखा कि आज भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं. बॉलीवुड की समकालीन अभिनेत्रियों से लेकर वर्तमान की अभिनेत्रियों में भी उनका ही क्रेज है. वे देख रही हैं कि आज भी उनका कोई सानी नहीं. इसलिए 43 की उम्र में भी उन्होंने मां या भाभी का किरदार निभाने से इनकार कर दिया है. उन्होंने साफ कहा है कि वे सोच समझ कर काम करूंगी. दरअसल, इस मायानगरी के प्रेमजाल में जो भी फंसा है. यही का होकर रह गया. खुद माधुरी ने माना है कि अमेरिका में जब वह अपने पड़ोसियों से कहती कि मैं भारत की फिल्मी अभिनेत्री हूं, कोई विश्वास नहीं करता. उन्हें खास भाव नहीं देता. अमेरिका के किसी मॉल में माधुरी माधुरी करके चिल्लानेवाला फैन नहीं होगा और न ही माधुरी से मिलने की इच्छा में कोई पाकिस्तानी फैन शफीक की तरह बॉर्डर तोड़ कर आ जायेगा. जमशेदपुर के पप्पू सरदार की तरह वहां कोई माधुरी की तसवीरों की पूजा नहीं करता होगा. लताजी से लेकर महानायक अमिताभ बच्चन भी जिस शख्स के कायल हों, वह कैसे खुद पर नाज नहीं करेंगी. जाहिर है इतनी शानोशौकत से जीनेवाली माधुरी को जब अमेरिका में अपने घर को एक आम महिला की तरह संभालना पड़ा होगा तो एक पत्नी की तरह भले ही उन्होंने अपने इस फर्ज को निभाया होगा.लेकिन आत्मा से सिनेमा जगत को दूर नहीं कर पायी होंगी. घर के आईने को साफ करते वक्त हर बार निश्चित तौर पर अपनी मुस्कान को देख कर वह सोचती होंगी कि इसी प्यारी मुस्कान पर तो पूरा भारत फिदा है.और यहां पूछनेवाला कोई नहीं. खाना पकाते वक्त यूं ही जब पैर थिरकते होंगे तो अनायास ही माधुरी के कानों में तालियों की गूंज सुनाई देती होगी, जो उन्हें भारत में अपने नृत्य पर मिलती थी. जाहिर है. किसी भी व्यक्ति के लिए आम से खास बनना जितना कठिन हैं, उससे कहीं ज्यादा कठिन खास से फिर आम बनना होता है. यही वजह है कि चकाचौंध दुनिया में अपनी पूरी जिंदगी बीतानेवाले सितारे सरीके लोगों को जब तवज्जो नहीं मिलता तो वह पागल हो जाते हैं. लोगों की नजरअंदाजगी उन्हें कांटों की तरह चुभती है. राजेश खन्ना सरीके सुपरस्टार ऐसे ही उदाहरण हैं. लोग आज उन्हें सिर्फ अय्याश के रूप में ही जानते हैं. फ्रेंच फिल्म द आर्टिस्ट में इस पहलू को खूबसूरती से उकेरा गया है. कलाकार बिना पैसे के तो जी लेता है.लेकिन लोकप्रियता के बिना नहीं जी पाता. शायद यही वजह है कि न सिर्फ माधुरी बल्कि इससे पहले और भी कई अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने बॉलीवुड को अलविदा कहा लेकिन फिर से वापसी की. पुराने दौर की अभिनेत्री मुमताज ने लंदन के व्यवसायी से शादी की. लंदन गयीं. लेकिन फिर फिल्मी दुनिया में लौट आयीं. उस वक्त उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा के साथ काम करने से भी गुरेज नहीं किया. जबकि उन्होंने कहा था कि वह शत्रुघ्न के साथ कभी काम नहीं करेंगी. इनके अलावा करिश्मा कपूर, पूजा बत्रा, रवीना टंडन भी कुछ ऐसी ही अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने दोबारा वापसी की है. चूंकि लोकप्रियता का नशा अफीम की तरह है, जो एक बार जिंदगी में घुल जाये तो चाह कर भी उससे दूर होना मुमकिन नहीं होता.
चलते चलते
1.माधुरी ने जब अबोध फिल्म पूरी कर ली थी. उसी वक्त उनके परिवारवालों ने माधुरी की शादी के बारे में सोच लिया था. माधुरी की शादी का पहला प्रस्ताव गायक सुरेश वाडेकर को दिया गया था. लेकिन उन्होंने इस रिश्ते को यह कह कर ठुकरा दिया कि लड़की पतली है.
2.जिस दौर में हिंदी सिनेमा में पुरुषों का बोलबाला था. माधुरी दीक्षित अभिनेत्री के रूप में पुरुषों पर हावी हुईं और लेडी अमिताभ कहलायीं.
3. संजय दत्त और माधुरी दीक्षित में नजदीकियां इस कदर बढ़ चुकीं थी कि सुभाष घई ने अपनी फिल्म खलनायक के दौरान माधुरी से कांट्रैक्ट लिखवाया था कि वह फिल्म के दौरान शादी नहीं करेंगी.
4. अबोध फ्लॉप होने के बाद माधुरी ने दो फिल्मों में साइड एक्ट्रेस के रूप में काम किया. फिल्म थी स्वाति व आवारा बाप, जिसमें मिनाक्षी ने लीड किरदार निभाया था.

ये बेटियां तो बाबुल की रानियां हैं







संजय दत्त ने साफ शब्दों में कहा है. दत्त खानदान की कोई बेटियां फिल्म जगत में कदम नहीं रखेंगी. फैसला फिलवक्त उन्होंने अपनी बेटी त्रिशिला के लिए सुनाया है. उनकी बेटी इसे स्वीकारेंगी भी. यही फरमान अपनी गोद में खेलती बिटियां ( मान्यता की बेटी) के संदर्भ में भी कहा है. जबकि संजय दत्त की मां नरगिस किसी जमाने की सुपरस्टार रह चुकी हैं. स्वयं संजय दत्त की पहली पत्नी ॠचा भी अभिनेत्री रह चुकी हैं. मान्यता दत्त ने भी शुरुआती दौर में कुछ फिल्मों में आयटम सांग किये हैं. काम के दौरान ही संजय दत्त से इन दोनों की नजदीकियां बढ़ीं. उनके पिता सुनील दत्त और नरगिस का मिलन भी सिनेमा जगत ने ही कराया. उस दौर में नरगिस पर राजकपूर को लेकर चरित्र पर कई सवाल उठाये गये थे. इसके बावजूद सुनील दत्त ने उन्हें संगिनी के रूप में स्वीकारा. तो, फिर दत्त खानदान के दूसरे जेनरेशन मसलन संजय दत्त अपनी अगली जेनरेशन की बेटियों को क्यों इस इंडस्ट्री से दूर रखना चाहते हैं? इस सवाल से केवल संजय दत्त पर ही नहीं, बल्कि उन तमाम सुपरसितारा अभिनेताओं पर प्रश्न चिन्ह लगता है, जिन्होंने सिनेमा जगत में राज किया है. लेकिन वह अपनी यह परंपरा अपनी बेटी को बढ़ाते नहीं देख सकते. हिंदी सिनेमा के 98 सालों के इतिहास को खंगाल लें तो ऐसे स्टार पिताओं के उदाहरण की कमी नहीं. फिर चाहे वह सदी के महानायक अमिताभ बच्चन हों, हीमैन धमर्ेंद्र हों, या फिर रंधीर कपूर, ॠषि कपूर या राजेश खन्ना. इसके विपरीत स्टार बेटियों की मम्मियां ने हमेशा बेटियों का साथ दिया. बबीता-रंधीर कपूर, डिंपल कपाड़िया-राजेश खन्ना के रिश्तों की दूरियों की वजह भी यही मुद्दा बना. पिता हरगिज नहीं चाहते थे कि बेटियां इंडस्ट्री में जायें और मां की जिद्द थी कि वे बेटियों को स्वतंत्रता देंगी. हेमा मालिनी-धमर्ेंद्र में भी लंबे समय तक इसी मुद्दे को लेकर जिंदगी में खटास रही. कपूर खानदान के बेटे रंधीर कपूर ने करिश्मा करीना पर सख्ती बरती. लेकिन बबीता ने इसे नहीं स्वीकारा. नतीजन आज रंधीर-बबीता में तलाक नहीं. लेकिन फिर भी दोनों दूर हैं. बबीता ने पहली बार कपूर खानदान की परंपरा तोड़ी. रंधीर कपूर ने लंबे समय तक करिश्मा की फिल्में नहीं देखीं. खानदान की परंपरा तोड़नेवाली पहली लड़की बनने का खामियाजा भुगता करिश्मा ने लेकिन करिश्मा ने अपने बल पर पहचान बनायी. और अब कमान उनकी छोटी बहन करीना कपूर भलिभांति संभाल रही हैं. इसी खानदान की ॠषि कपूर और नीतू कपूर की बेटी ॠध्दिमा कपूर के बारे में नीतू स्वीकारती हैं कि उन्होंने शुरुआती दौर से ही ॠध्दिमा की परवरिश इस कदर की थी कि वह इस क्षेत्र के बारे में सोचे ही न. इससे साफ जाहिर होता है कि फिल्म इंडस्ट्री के कटु अनुभवों से एक अभिनेत्री अपनी बेटी को वाकिफ नहीं कराना चाहती थी. संभव हो कि बच्चन परिवार ने भी शुरू से ही श्वेता को इस इंडस्ट्री में आने के लिए प्रेरित नहीं किया हो. यह सत्य है कि हर पिता हर मोड़ पर अपनी बेटी का सुरक्षा कवच बनना चाहता है. लेकिन जिस इंडस्ट्री में उन पिताओं की पूरी उम्र गुजरी है. उस इंडस्ट्री की हर रग तो वह पहचानते ही होंगे. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद वह बेटियों को आने नहीं देते. आखिर क्यों? धमर्ेंद्र के लाख मना करने के बाद भी हेमा की जिद्द पर ऐषा ने मनमानी की. जाट परिवार की बेटी होने की वजह से उन्हें इंडस्ट्री में कदम रखने के बाद कभी देओल परिवार या पिता का सहयोग नहीं मिला.धमर्ेंद्र की होम प्रोडक्शन कंपनी और हेमा की प्रोडक्शन कंपनी एक नहीं. हाल ही में रिलीज हुई टेल मी ओ खुदा से हेमा ने जब ऐषा को रीलांच किया, तो धमर्ेंद्र आगे तो आये. लेकिन उन्होंने औपचारिकता मात्र ही निभायी. टि्वकंल खन्ना के भी इंडस्ट्री में आने के खिलाफ ही थे राजेश खन्ना. आखिर एक पिता की इस हिचक, इनकार, ऐतराज की वजह क्या है. वजह साफ है कि एक अभिनेता पिता इस दलदल की हकीकत को बखूबी जान चुका होता है. वह जानता है कि यहां अभिनेत्रियों की स्थिति क्या है. हैसियत क्या है. लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं. खासतौर से तब भी जब वे सभी पिता का नाम भी किसी न किसी अभिनेत्री से जुड़ा रहा. धमर्ेंद्र, अमिताभ, शत्रुघ्न, राजेश खन्ना, राज कपूर व दिलीप कुमार के रिश्ते उनके साथ काम कर चुकीं हर अभिनेत्री से जोड़े गये. शायद खुद जब राज कपूर जैसे दिग्गजों ने भी अभिनेत्रियों के साथ रिश्ते जोड़े, तो निश्चित तौर पर कोई पिता नहीं चाहेगा कि उसके खानदान की बेटियों पर कोई बुरी नजर डाले. यही वजह है कि बॉलीवुड में खानदानी बेटियां अपनी मन मर्जी की मालिक नहीं . बात अगर सोनम कपूर और सोनाक्षी की करें, जिनके पिता ने उनका साथ तो दिया. लेकिन उन पर पाबंदियां जारी है. सोनाक्षी को देर रात काम करने की इजाजत नहीं.सोनम कपूर को भी अनिल कपूर द्वारा पुरुष मित्रों से अधिक मेल जोल बढ़ाने पर पाबंदियां हैं. इससे यह साफ जाहिर है कि वे सभी स्टार पिता नहीं चाहते कि उनकी बेटियों को वह सारी परिक्रिया से गुजरना पड़े, जिससे एक अभिनेत्री बनने की प्रक्रिया पूरी होती है. यह कटु सत्य है. मुमकिन हो कि मधुर भंडारकर की आनेवाली फिल्म हीरोइन में हीरोइन बनने की इस पहलू पर से भी परत हटायें तो शायद हीरोइन की जिंदगी के इस हकीकत से भी दर्शक रूबरू हो पायेंगे.
चलते -चलते
1.धमर्ेंद्र ने अब तक ऐषा की कोई भी फिल्म नहीं देखी है. शुरुआती दौर में रंधीर कपूर ने भी करिश्मा की फिल्में देखने से इनकार कर दिया था. अब जाकर रंधीर ने करीना की फिल्में देखनी शुरू की.
2. राजकपूर ने नरगिस को कहा था कि तुम हमेशा मेरे घर की तुलसी हो. घर नहीं ला सकता. नरगिस अंतिम समय तक राजकपूर के लिए अपने मन से स्नेह कम न कर सकीं.
3. इंडस्ट्री में किसी भी पिता ने अपने प्रोडक्शन हाउस के माध्यम से बेटियों को लांच नहीं किया. जबकि धमर्ेंद्र ने विजेता प्रोडक्शन से देओल बेटों को लांच करने में अहम भूमिका निभायी. राजकपूर ने आरके बैनर से अपने तीनों बेटों को लांच किया. शत्रुघ्न ने लवकुश को लांच किया. हैरी बवेजा ने हरमन को लांच किया. वासु भगानी ने जैकी को लांच किया.

20111221

यशराज फिल्मस, 38 साल 50 फिल्में...सिलसिला जारी है




इस वर्ष रिलीज फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन की कामयाबी के साथ ही यशराज फिल्मस ने 50 का आंकड़ा पार कर लिया. वर्ष 1973 में फिल्म आग से शुरू हुई इस प्रोडक्शन कंपनी की मेरे ब्रदर की दुल्हन 50वीं फिल्म थी. यह सिलसिला अब भी जारी है. मेरे ब्रदर...के बाद इसी बैनर की फिल्म मुझसे फ्रांडशिप करोगे को भी सफलता हासिल हुई और इसी साल लेडीज वसर्ेज रिक्की बहल रिलीज हो चुकी है. इश्कजादे जल्द ही रिलीज होगी. अगले साल आमिर खान की धूम व सलमान खान की एक था टाइगर रिलीज होंगी. अपने 38 वर्षों के सफर में यशराज फिल्मस ने हिंदी सिनेमा जगत को कई नये युवा सितारे दिये और साथ ही कई युवा निदर्ेशक भी. वर्तमान में भारत की एकमात्र ऐसी प्रोडक्शन कंपनी है, जो सर्वाधिक नये चेहरों व युवा निदर्ेशकों को मौके दे रहे हैं. पिछले साल इसी बैनर की फिल्म बैंड बाजा बारात को जबरदस्त कामयाबी मिली. फिल्म से रणवीर सिंह लांच हुए और इन दिनों उनकी गिनती लोकप्रिय सितारों में होने लगी है. इसी फिल्म से बतौर निदर्ेशक मनीष शर्मा ने अपनी पहचान स्थापित कर ली. लेडीज वसर्ेज...के निदर्ेशक भी वही हैं. रब ने बना दी जोड़ी से अनुष्का शर्मा ने इंडस्ट्री में कदम रखा और इन दोनों शिखर की अभिनेत्रियों में शुमार हैं. लेडीज वसर्ेज से प्रियंका चोपड़ा की बहन परिणिती चोपड़ा ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा. फिल्म इश्कजादे से बोनी कपूर के बेटे अर्जून कपूर लांच हो रहे हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म मुझसे फ्रेंडशीप करोगे में सभी नवोदित कलाकार हैं और निदर्ेशक नुपूर अस्थाना की भी यह पहली फिल्म है. फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन के निदर्ेशक अली जफर ने भी इसी फिल्म से शुरुआत की. फिल्म लव का द एंड के निदर्ेशक बंपी भी नवोदित निदर्ेशक थे. श्रध्दा कपूर के अलावा सभी नये कलाकार हैं. फिल्म न्यूयॉर्क व काबूल एक्सप्रेस जैसी फिल्में बनानेवाले कबीर खान भी इसी बैनर की देन हैं( फिलवक्त एक था टाइगर का निर्माण). उन्होंने नवोदित निदर्ेशक शाद अली को साथिया, बंटी और बबली व झूम बराबर झूम बनाने का मौका दिया. सिध्दार्थ आनंद, संजय गांधवी,शिमित अमीन व जुगल हंशराज को भी मौक दिया. दरअसल, यशराज हिंदी सिनेमा जगत का वह बड़ा नाम बन चुका है, जिन्होंने नयी प्रतिभाओं को न सिर्फ तराशा, बल्कि उन्हें सही प्लेटफॉर्म भी दिया. उन्हें जहां भी प्रतिभा नजर आयी. उन्होंने मौका दे दिया. गौरतलब है कि उनके बैनर में काम कर रहे कई लेखकों को उन्होंने निदर्ेशक बनने का मौका दिया, जिनमें कबीर खान, शिमित अमीन अली जफर, शाद जैसे निदर्ेशकों का नाम शामिल है. प्रियंका की बहन परिणिती उनके पीआर गुप्र में काम करती थीं. आदित्य को उनमें क्षमता नजर आयी. और उन्होंने उसे नायिका बना डाला. जबकि खुद यशराज के पास आदित्य चोपड़ा जैसे कुशल निदर्ेशक हैं. खुद यश चोपड़ा सफल निदर्ेशकों में से एक रहे. इसके बावजूद उन्होंने अपनी कंपनी में नये लोगों को भरपूर मौके दिये. यह सच है कि आज भी नये लोगों के लिए यहां एंट्री करना मुश्किल है. लेकिन अगर जो एंट्री मिल गयी तो फिर उन्हें मुड़ कर देखने की जरूरत नहीं होती. आज यशराज फिल्म्स ने नये लोगों के लिए ही ह्वाइ फिल्मस भी शुरू किया, जिसके बैनर तले नयी और युवाओं के लिए फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है. इसकी देख-रेख आदित्य की पत्नी करती हैं. यशराज का नाम आज भारत की दूसरे सबसे बड़े फिल्मी खानदान के रूप में होती है. इस सफलता की सबसे बड़ी पूंजी हैं यश चोपड़ा स्वयं व उनके बेटे आदित्य. यश स्वयं जो कलात्मक व सृजनशील व्यक्ति हैं. यह उनका ही जादू है जो दाग से लेकर विजय तक उनकी मशाल जलती रही. काला पत्थर मिल का पत्थर साबित हुई तो कभी कभी और सिलसिला ने अदभुत प्रेम कहानी दिया. वही दूसरी तरफ उनके बेटे आदित्य ने बतौर निदर्ेशक दिलवाले दुल्हनिया...मोहब्बते, रब ने बना दी जोड़ी जैसी फिल्में दी और कामयाब रहे. यह उनके निदर्ेशन का ही जलवा है कि आज भी राज सिमरन की प्रेम सबसे लोकप्रिय है. मुंबई के मराठा थियेटर में आज भी दर्शकों की भीड़ दिलवाले..के लिए होती है. आदित्य ने एक कुशल निर्माता के रूप में भी बागडौर संभाली. वे कभी पार्टी में नहीं जाते. अपनी शर्तों पर जीते हैं. उन्हें फर्क नहीं पड़ता उनके बारे में क्या बातें हो रही हैं. यशराज फिर भी अपनी शर्त पर जीता है. उसके स्टूडियो में किसी दूसरे वैन को जाने की इजाजत नहीं. मच्छर भी उनकी इजाजत के बिना यशराज परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते. वे प्रेस शो नहंीं कराते. नखरे दिखानेवाले फिल्मी सितारों के नखरे सिर्फ यही धरे के धरे रह जाते हैं. केवल सलमान खान की एकमात्र अभिनेता हैं, जिन्होंने 38 सालों में यशराज के बनाये नियमों को तोड़ा और यशराज ने उसे स्वीकार भी किया. यशराज की फिल्मों की सफलता का मूलमंत्र यही है कि आज भी वह पंजाब दिखाता है तो फिल्म में पंजाब दिखता है. जब दिल्ली का जन्नकपुरी दिखाता है तो वह नजर आता है. देहरादून की पहाड़ियों से लेकर सरसो के खेत तक आज भी उनकी फिल्मों में भारत दिखता है. शादियां, प्यार में नोंक-झोंक और संस्कृति दिखती है, जो कि भारत के दर्शकों की रोम रोम में बसी है. वही पारिवारिक दर्शकों के साथ युवा दर्शकों के लिए फ्रेश प्रेम कहानियां प्रस्तुत कर रहा है. बदलते दौर के साथ उन्होंने बस लहजा बदला है. लेकिन दर्शकों की नब्ज को हमेशा ध्यान में रखा है. यही वजह है कि 38 साल पुराने हो जाने के बावजूद यहां ताजगी बरकरार है और यह सिलसिला बरकरार है.
चलते-चलते
1. आदित्य चोपड़ा जब दिलवाले दुल्हनिया की कहानी लिख रहे थे. उस वक्त इस फिल्म के लिए वह हॉलीवुड अभिनेता टॉम क्रूज को लेना चाहते थे. लेकिन टॉम क्रूज ने मना कर दिया था.
2. दिल तो पागल है, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, मोहब्बते, रब ने बना दी जोड़ी, फिल्म दिल तो पागल है, इस कैंप की सर्वाधिक हिट फिल्मों में से एक थी. फिल्म दिल तो पागल है के लिए यश चोपड़ा ने संगीतकार उत्तम सिंह से कुल 100 गीत बनवाये थे. लेकिन फिल्म में केवल 10 गानों का इस्तेमाल किया गया था.
3. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे आज भी दुनिया की सर्वाधिक देखी जानेवाली फिल्म में से एक है. मुंबई के मराठा मंदिर में आज भी इसका प्रदर्शन जारी है.
4. यशराज फिल्मस हमेशा अपने अलग तरह के संगीत के लिए जाना जाता रहा है. यह यश चोपड़ा का संगीत के प्रति समर्पण ही था जो उन्होंने फिल्म वीर जारा में मदन मोहन के पुराने संगीत का इस्तेमाल किया. आनंद बख्शी ने आखिरी बार इसी फिल्म के लिए गीत लिखे थे.

आकर्टिक सर्किल पर अब्बास-मस्तान का रोमांच


थ्रीलर और एक्शन फिल्मों के उस्ताद अब्बास-मस्तान फिल्म प्लेयर्स के साथ रोमांचक रूप से वापसी कर रहे हैं. प्लेयर्स हॉलीवुड फिल्म द इटैलियन जॉब का हिंदी रीमेक है. यह बॉलीवुड की पहली ऐसी फिल्म है जिसकी शूटिंग सर्वाधिक ठंडे स्थान आर्कटिक सर्किल पर की गयी है. दुनिया के सबसे ठंडे स्थान पर भी फिल्म की शूटिंग का निर्णय लेना ही अपने आप में एक चौंका देनेवाली सोच है. फूल सी पैंपरड रहनेवाली सोनम कपूर और हॉट बिपाशा बसु भी वहां जाकर शूटिंग के लिए तैयार हुए. फिल्म में इन दोनों ही अभिनेत्रियों से कई स्टंट दृश्य भी करवाये. इनकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह भीड़ का हिस्सा नहीं बने. यह अब्बास मस्तान का ही जलवा था कि हाल ही फिल्म की म्यूजिक लांच पर बिपाशा बसु और सोनम कपूर ने कई लाइव स्टंट दिखाये. यह कमाल केवल अब्बास मस्तान ही दिखा सकते हैं. रोमांच के साथ जोखिम दर्शाना ही उनके निदर्ेशन की शैली रही है. उनके अद्वितीय निदर्ेशली शैली की ही यह क्षमता है जो उन्होंने ऐसे स्थान का चुनाव किया.उनकी फिल्में खिलाड़ी, सोल्जर, अजनबी, हमराज व रेस जैसी फिल्में नये दौर की थ्रीलर फिल्मों में सराहनीय रहीं. किसी दौर में ज्वेल थीफ-सरीके फिल्मों ने थ्रीलर के रूप में कीर्तिमान साबित किया. खासतौर से युवा दर्शकों को ऐसी फिल्में बेहद पसंद आने लगीं. अब्बास मस्तान भाईयों ने उन्हीं युवा दर्शकों की नब्ज पकड़ी. जब बॉलीवुड में हर निदर्ेशक लव स्टोरीज और लीक से हट कर फिल्में बनाने को आतुर थे. इन्होंने थ्रीलर विषयों का साथ नहीं छोड़ा. शायद यही वजह रही कि आम कहानियों के साथ भी वे दर्शकों को रोमांच परोसने में हमेशा कामयाब रहे. उन्होंने कम फिल्में बनायी. कुछ असफल भी रहीं. लेकिन हिंदी सिनेमा में थ्रीलर फिल्मों पर अपना एकाधिकार रखा. आज के दौर में जहां अधिकतर फिल्मों के क्लाइमेक्स कमजोर होते हैं. जबकि आज भी उन्होंने क्लाइमेक्स पर अपना कमांड बरकरार रखा है. प्लेयर्स से भी ऐसी ही उम्मीद की जा रही है. उन्होंने कभी पूरे भारत के दर्शक को अपना दर्शक नहीं माना. एक्शन प्रेमी व थी्रलर प्रेमियों के साथ ही वे खुश रहे और यही उनकी सबसे बड़ी यूएसपी बनी. भारत का युवा वर्ग आज भी एक्शन और थ्रीलर फिल्मों का दीवाना है. जबकि इन दिनों हिंदी सिनेमा में ऐसी फिल्में कम बनती हैं. और यही वजह है कि यह युवा वर्ग हॉलीवुड की फिल्मों की तरफ रुख करता है. लेकिन प्लेयर्स के प्रोमोज आते ही उस वर्ग की उम्मीदें बढ़ गयी हैं. युवाओं में खासतौर से लड़कों को प्रोमोज लुभा रहे हैं. पूछने पर कई युवाओं का जवाब है कि वे प्लेयर्स फिल्म का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. दरअसल, अब्बास-मस्तान मिसाल का नाम है जो बॉलीवुड के दिखावे में कभी नहीं रहा. चकाचौंध की इस दुनिया में वे शांत व कुशल व्यवहार के साथ ही जिये. उनके सफेद लिबाज की तरह ही दोनों भाईयों का चरित्र बेहद साफ छवि वाला है.( फिल्म प्लेयर्स की शूटिंग स्नोफॉल के दौरान की गयी है. बर्फ के रंग और निदर्ेशक के कपड़े के रंग मेल खाने की वजह से पहली बार दोनों ने काला जैकेट पहना).इन्होंने कभी अपने करियर में धारा प्रवाह निदर्ेशकों की नकल नहीं की. वर्तमान में जहां अब व्यवसायिक सिनेमा को मद्देनजर रखते हुए संजय लीला भंसाली जैसे क्राफ्ट फिल्में बनानेवाले निदर्ेशक एक्शन फिल्मों की तरफ रुख कर रहे हैं. अब्बास मस्तान ने आज भी थ्रीलर फिल्मों पर कमान संभाल रखी है. हाल के कई वर्षों में थ्रीलर फिल्मों पर अल्पविराम सा लग गया. कुछेक थ्रीलर फिल्में आयीं भी. लेकिन उनमें हॉरर व थ्रील का मिला जुला अनुपात रहा. लेकिन प्लेयर्स की वापसी से फिर से उम्मीद जगी है. कई सुपरसितारों के करियर को संभालने व उन्हें चमकाने में इस जोड़ी की अहम भूमिका रही. अक्षय को एक्शन हीरो के रूप में, फिल्म बाजीगर से शाहरुख चमके. फिर बादशाह से उन्हें बादशाह की उपाधि मिली. सोल्जर से बॉबी देओल व हमराज-रेस से अक्षय खन्ना की डूबती नैया. यह संभव है कि अभिषेक बच्चन की नैया भी इस फिल्म से पार लग जाये. आप आंकलन करें तो इस जोड़ी के साथ लगभग हर सितारा अपनी अलग पहचान स्थापित करने में कामयाब रहा है. एक निदर्ेशक की इससे बड़ी सफलता और क्या होगी. यह जोड़ी कलाकारों को सही तरीके से तराशने में माहिर हैं. और यही वजह है कि हर लोकप्रिय सितारा आज भी इस जोड़ी के साथ काम करना चाहता है. बॉलीवुड की दुनिया में हमने अब तक कई जोड़ियां बनती देखी ( जतीन-ललित, नदीम-श्रवण) और लंबे समय के बाद टूटते भी. यह ऐसी दुनिया है जो भाई-भाई व बहन बहन में भी दूरियां बना देता है ( लता-आशा हमेशा एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी रहीं) लेकिन यह जोड़ी अपनी सादगी.एक दूसरे भाई के लिए प्यार व आदर सत्कार की भावना के साथ सफलता से अपना पारी खेल रहे हैं. वाकई सोच में संयम, बिना किसी मन मुटाव के, बेहद समझदारी से व्यवसाय कर रहे हैं. ये जोड़ी आज सफल है. संतुष्ट है. क्योंकि आज भी भीड़ में इन भाईयों ने अलग दुनिया बना रखी है. यह जोड़ी बॉलीवुड के उन रिश्तों के लिए एक आदर्श है, जो यह दलीलें देते फिरते हैं कि शोहरत आने के बाद कोई सगा नहीं होता. उस लिहाज से अब्बास-मस्तान एक नाम नहीं एक मिसाल है.
चलते-चलते
1.अब्बास-मस्तान एकमात्र भाई बंधू हैं, जिन्होंने अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ सफेद कपड़े पहने और जूते भी सफेद ही पहने.
2. पहली बार फिल्म वो कौन थी देख कर अब्बास मस्तान के ख्याल में थ्रीलर फिल्में बनाने का धुन चढ़ा था.
3. शुरुआती दौर में कुछ गुजराती फिल्मों का निर्माण किया.
4. उनकी फिल्म बाजीगर पहले अनिल कपूर को ऑफर की गयी थी. लेकिन उनके मनाही पर फिल्म शाहरुख को मिली.
5. अक्षय कुमार को खिलाड़ी कुमार की उपाधि इन्हीं की फिल्म खिलाड़ी से मिली.
6. पहली बार किसी निदर्ेशक ने सबसे ठंडे स्थान पर जाकर शूटिंग की है.

अब हीरोइन को भी नोटिस करना शुरू किया हैः प्रियंका चोपड़ा



लोगों ने अब हीरोइन को भी नोटिस करना शुरू किया हैः प्रियंका चोपड़ा
डॉन ताकतवर है तो क्या. रोमा भी उससे कम नहीं. डॉन चालाक है तो रोमा चालबाज. वह दुश्मनी भी सोच समझ कर करता है तो रोमा को भी पता है प्यार में दुश्मनी मोल लेने वालों को किस तरह सबक सिखाना है. फिल्म डॉन2 में इस बार जितनी महत्वपूर्ण व केंद्रीय भूमिका शाहरुख निभा रहे हैं. उतनी ही तवज्जो रोमा उर्फ प्रियंका चोपड़ा के किरदार को भी दी गयी है.
अपने खास अंदाज, स्टंट से छुई मुई सी दिखनेवाली प्रियंका चोपड़ा फिल्म डॉन2 में सबको हैरत में डालनेवाली है. इस फिल्म में वाकई वह साबित करना चाहती हैं कि वह भी खतरों की खिलाड़ी हैं. प्रियंका चोपड़ा ने अब तक कई चरित्र व अभिनय प्रधान फिल्में करके यह साबित कर दिया है कि वह बेहतरीन अदाकारा हैं. और शायद यही वजह है कि अब निदर्ेशक अपनी फिल्मों में जब उन्हें लेते हैं तो उनके किरदारों पर भी मुख्य रूप से काम करते हैं,

प्रियंका, डॉन 2 में जितनी चर्चा शाहरुख खान के किरदार को लेकर हो रही है. प्रोमोज देख कर लोगों का मानना है कि आपके किरदार में भी बिल्कुल नयापन हैं. रोमा के किरदार के बारे में विस्तार से बताएं.
जी हां, यह बिल्कुल सच है कि इस बार डॉन 2 में मुझे कई चीजें पहली बार करने का मौका मिल रहा है. निदर्ेशक फरहान ने रोमा का किरदार केवल डॉन के साथ प्यार करने के लिए नहीं रचा. बल्कि उन्होंने इस बात का भी ख्याल रखा है कि इस किरदार में क्या क्या खूबियां हो सकती हैं. इस फिल्म में मैंने रोमा का किरदार निभाया है. जिसे पता चल जाता है कि जिससे वह प्यार करती है वह विजय नहीं डॉन है. सो, वह कसम खाती है कि वह पुलिस की नौकरी करेगी और डॉन को सबक सिखायेगी. सबक सिखाने के दौरान ही ऐसी कई अजीबोगरीब चीजें होंगी, जिसे देख कर दर्शक इस बात को स्वीकारेंगे कि अब लड़कियां भी फिल्मों में स्टंट कर सकती हैं. वह भी बन सकती हैं खतरों की खिलाड़ी.
आपने हमेशा अपनी बातचीत में कहा है कि हिंदी फिल्मों में पुरुषों का बोलबाला है. और उनके किरदारों को अधिक तवज्जो दी जाती है.
जी हां, मैं बिल्कुल इस बात से सहमत हूं. आप खुद इस बात पर गौर करें कि अगर हम अपने हीरोज की तरह स्टंट करने लगती हैं, तो लोग उसका माखौल बना देते हैं, जबकि वे कभी इस बारे में नहीं सोचते कि उस दृश्य के लिए हमने भी उतनी ही मेहनत की होगी, जितनी एक पुरुष करते हैं. हिंदी फिल्मों में वाकई महिलाओं को ध्यान में रख कर वैसी स्क्रिप्ट नहीं लिखी जाती, जिसमें महिलाएं सुपर हीरोइन बन जायें. अगर वह वैसा करें, तो हंस देते हैं. लोग हमें आज भी परियों के रूप में ही उड़ते देखना चाहते हैं. सुपरहीरो या स्टंट के दृश्यों में नहीं.
लेकिन, यह साल तो महिला प्रधान फिल्मों के लिए खास रहा. नो वन किल्ड से लेकर डर्टी पिक्चर्स तक में महिलाओं ने कमाल दिखाया है.
जी, इस बात से पूरी तरह वाकिफ हूं और खुश भी हूं कि धीरे धीरे अब महिलाओं के लेकर बोल्ड विषयों पर फिल्में बनने लगी हैं और नायिकाओं को भी अब लोग ऐसे रूपों में बिना उन पर छींटाकशी किये अपनाने लगे हैं.
विद्या बालन ने डर्टी पिक्चर्स फिल्म में बेहतरीन व बोल्ड अदाकारी से साबित कर दिया कि वह बेहतरीन अभिनेत्री हैं. आपको किसी तरह की असुरक्षा महसूस हो रही.
जी बिल्कुल नहीं, आप या मैं यह कभी नहीं भूल सकती कि मैंने ही फैशन फिल्म से एक नयी शुरुआत की. पहली बार इसी फिल्म से मैं मानती हूं कि अभिनेत्री का बोल्ड विषय पर बोल्ड रूप लोगों के सामने आया था. मैं मानती हूं कि मैं शुरुआत की थी. अब परंपरा आगे बढ़ रही है. हां, लेकिन एक बात से खुश हूं कि बॉलीवुड वाकई महिला प्रधान फिल्मों के लिए तत्पर हो रहा है.
आपने सात खून माफ, फैशन, ह्वाट्स योर राशि जैसी महिला प्रधान फिल्में कीं. फिर आपने अंजाना अंजानी जैसी फिल्में करने का मन कैसे बना लिया.
क्योंकि मैं चाहती हूं कि हर बार मैं दर्शकों को चौंकाती रहूं. वह जब तक यह सोचें कि अरे यार प्रियंका तो बस ऐसे ही किरदार निभा सकती हैं. मैं कुछ ऐसा कर जाऊं कि वह सोच में और हैरत में पड़ जायें. अरे, प्रियंका ने तो कमाल कर दिया.
आप अपनी भूमिकाओं से अभिनेत्री के रूप में स्थापित हो चुकी हैं. आगे की क्या और कैसी तैयारी है. किस तरह की सावधानियां बटोर रही हैं.
मैं इस बात से बेहद खुश हूं कि लोग मुझे हीरोइन नहीं एक्ट्रेस मानते हैं. मसलन लोग जानते हैं कि मैं अच्छा अभिनय भी करूंगी, सिर्फ शोपीस की तरह खूबसूरत लिबाज में ही नजर नहीं आऊंगी. मेरे लिए भी यह सफर कम कठिन नहीं रहा था. मुझे मेहनत करनी पड़ी और मैं अपनी हर फिल्म के लिए बहुत मेहनत करती हूं. और जब फिल्में फ्लॉप होती हैं तो मुझे रोना भी बहुत आता है. दो दो हफ्तों तक मेरे आंसू रुकते नहीं हैं. मेरे लिए मेरी हर फिल्में खास होती हैं. हर किरदार. मैं भावनात्मक रूप से जुड़ जाती हूं फिल्मों से. यह सच है कि अब लोगों ने मानना शुरू किया है. वरना शुरुआत में मुझे भी परेशानी हुई है. आगे की बस इतनी तैयारी है कि वैसी किसी भी फिल्म में काम नहीं करूंगी जिसमें मेरे किरदार खास न हो. मुझे फिल्म में केंद्रीय नहीं खास भूमिका चाहिए. सावधानी बस इतनी बरत रही हूं कि लगातार मेरे बारे में हो रहे लींक अप्स की बातों का अपने दिल या दिमाग पर कोई असर नहीं होने दे रही है.
आप कई निदर्ेशकों की पसंदीदा अभिनेत्री हैं. अब तक जिनके साथ भी आपने काम किया. क्या क्या सीखा.
आशुतोष सर के साथ मैंने बहुत कुछ सीखा है. और मैं हमेशा उनसे टच में रहती हूं. उनकी खास बात यह हैं कि लोग कुछ भी कहें वह अपना काम करते हैं और फोक्सड होकर करते हैं. वे किरदार, कॉस्टयूम, लोकेशन हर बात का बारीकि से ध्यान रखते हैं. विशाल सर ने मुझे कमीने की शूटिंग के बाद कहा था. तुम बुरी आदत बन गयी हो... मेरी. मसलन यहां उनके कहने का अर्थ था कि वे मेरे अभिनय के आदि होते जा रहे हैं. फरहान के साथ डॉन2 दूसरी फिल्म है. फरहान जानते हैं कि प्रियंका को लिया है तो उसके किरदार पर भी काम करना होगा. और मैं खुश हूं कि उन्होंने मुझ पर विश्वास कर मुझसे कई स्कैरी काम करा लिये हैं. उन्होंने मुझे जबरन मलेशिया के वास्तविक जेल में समय व्यतीत कराया. कई स्टंट कराये. कई ऐसी जगहों व सुरंगों, अंधेरे स्थानों पर शूटिंग कराया है. लेकिन मैं खुश हूं चूंकि उन्होंने विश्वास किया है मुझ पर.
झारखंड के जमशेदपुर से आपका गहरा रिश्ता रहा है. अब आना जाना नहीं हो पाता. कुछ पुरानी यादें शेयर करें?
जमशेदपुर मेरे नाना नानी का घर है. लेकिन मैं चूंकि नाना की बेटी थी और इसलिए मैं झारखंड की भी बेटी हूं. यह सच है कि नाना अब दुनिया में नहीं. लेकिन मैं नाना नानी के बेहद करीब रही हूं. आज भी वहां जाती हूं और झारखंड से जुड़ाव रहेगा मेरा. झारखंड स्थापना दिवस पर मुझे बुलाया गया था. मैं आनेवाली थी. ऐन मौके पर किसी वजह से नहीं आ पायी. फिलवक्त नानी यहां मुंबई में साथ रहती हैं और वे झारखंड की खबरों से मुझे कनेक्ट रखती हैं. मेरा जन्म जमशेदपुर में हुआ. पढ़ाई वही हुई. मां पापा के साथ मेडिकल कॉलेज के खूब चक्कर मारे हैं मैंने. इतने चक्कर की अस्पताल की महक से चिढ़ सी हो गयी थी. सो, मैंने तय कर लिया था कि भविष्य में कुछ भी बनूं डॉक्टर नहीं बनूंगी. वैसे मैंने तय किया था कि क्यों न इंजीनियर बन जाऊं. बचपन में नानाजी के घर में बाहर बड़ा सा ग्राउंड था और वहां मुझे गिल्ली डंडा खेलना बेहद अच्छा लगता है. वैसे मैं बचपन से ही लड़कों के खेल खेलने में माहिर थी.
अभिनेत्री के साथ साथ अब आप सिंगर भी बन गयी हैं. और गीतकार भी. शुरु से दिलचस्पी थी. कैसे वक्त निकालती हैं.
मैं भारत में रहती हूं तो कभी गीत नहीं लिखती. मैं जब लॉस एंजिल्स जाती हूं तो वहां एक स्टूडियो है. वही बैठ कर गीत लिखती हूं. मैंने जिंदगी में जो भी हासिल किया. किसी की कोई प्लानिंग नहीं थी.बस इतना जानती हूं कि अब भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं. अभी बहुत कुछ हासिल करना है.